Saturday, 25 April 2020

अभी नहीं कीड़ा कयामत

चंद्रभूषण
कीट-पतंगों को लेकर दुनिया की राय मिली-जुली है। पौधों के परागण में अहम भूमिका के चलते मधुमक्खियां, भौंरे और कुछ अन्य कीड़े खेती-बागवानी की जरूरी शर्त हैं। जुगनू और तितली जैसे कीड़ों का रिश्ता हमारे सौंदर्यबोध से है लिहाजा इनका कम दिखना तुरंत खटकता है। दूसरी तरफ टिड्डी और स्टेमबोरर जैसे कीड़े फसलों को भयंकर नुकसान पहुंचाते हैं। उनके प्रकोप का जिक्र भी लोगों में सिहरन पैदा करता है, जैसा अभी पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान, पश्चिमी अफ्रीका और खाड़ी क्षेत्र के कई देशों में कर रहा है।

जाहिर है, हम चाहते हैं कि मच्छर और टिड्डियां दुनिया में कम दिखें जबकि तितली, मधुमक्खियां और जुगनू ज्यों के त्यों बने रहें। लेकिन दुनिया हमारे चाहने से नहीं चलती। संसार की सभी जीवजातियों में सबसे बड़ी तादाद कीड़ों की है, पर उनके लिए वक्त बहुत बुरा जा रहा है। 2017 में जर्मनी से प्रकाशित एक सैंपल बेस्ड रिपोर्ट में बताया गया था कि बीते 27 वर्षों में वहां उड़ने वाले कीड़ों की तौल घटकर एक चौथाई रह गई है। इससे पहले कैलिफोर्निया में बादाम के बागानों की उपज तेजी से गिरी तो खोजबीन से पता चला कि उनका परागण करने वाली मधुमक्खियां कम बची हैं।

यूरोप-अमेरिका की कुछ और रिपोर्टों का साझा नतीजा ‘इंसेक्ट अपोकलिप्स’ (कीड़ा कयामत) जैसे लेखों में जाहिर हुआ और इसे स्थायी खाद्यान्न संकट की आहट की तरह देखा जाने लगा। अभी बृहस्पतिवार को ‘साइंस’ मैगजीन में छपे एक विश्वव्यापी अध्ययन में बताया गया है कि मामला उतना विकट नहीं है, हालांकि प्रति दशक 9.2 फीसदी कीड़ों की कमी वाली बात इसमें भी स्वीकार की गई है।

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