Saturday, 17 August 2019

यह पानी हमारा नहीं है !!

यह पानी हमारा नहीं
चंद्रभूषण
पानी के बारे में हम इतना ज्यादा जानते हैं कि कुछ और जानने की किसे पड़ी है? लेकिन वैज्ञानिकों की भविष्यवाणी है कि मौजूदा सदी की ही किसी तारीख में दुनिया के लिए पानी पेट्रोलियम से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाएगा, सो दिलचस्पी मर-मर कर जिंदा भी हो जा रही है। हकीकत यह है कि दुनिया में पानी की कोई कमी नहीं है, लेकिन उसका जितना हिस्सा सीधे काम में लाया जा सकता था, वह लगभग सारा का सारा लाया जा चुका है।

धरती का 97 फीसदी पानी समुद्री है, जिसे खारे से मीठा बनाना अगर कभी सस्ता हो सका तो भी उसकी मात्रा सीमित होगी। बचे 3 फीसदी का 70 प्रतिशत ध्रुवीय इलाकों या ग्लेशियरों में है, जिसपर हाथ लगाना विनाश का एक्सीलरेटर दबाने जैसा ही होगा। ज्यादा बड़े पैमाने पर देखें तो पानी की दुर्लभता का हाल यह है कि पृथ्वी के सारे पड़ोसी पिंडों चंद्रमा, शुक्र, मंगल और बुध पर यह या तो सिरे से नदारद है, या कहीं अवशेष रूप में है भी तो मौजूदा टेक्नॉलजी से बाल्टी भर पानी जुटाने में शायद भारत के जीडीपी जितनी रकम खर्च करनी पड़ जाए।

जर्मनी की म्युंस्टर यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता हाल में मॉलिब्डेनम आइसोटोप्स पर काम करके इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि सौरमंडल के बाकी चट्टानी ग्रहों की तरह पृथ्वी के लिए भी पानी कोई प्राकृतिक वस्तु नहीं है। इसकी स्वाभाविक उपस्थिति बृहस्पति या उससे दूर के ग्रहों पर ही मानी जा सकती है। पृथ्वी बनने के 10 करोड़ साल बाद उसी तरफ से आए जिस पिंड की टक्कर से चंद्रमा की सृष्टि हुई, धरती का सारा पानी उसी की देन है। सो, बात पानी की हो तो जरा संभल के!

Saturday, 10 August 2019

प्रकृति का विफल प्रयोग नहीं हैं ऐडियाकारन

प्रकृति का विफल प्रयोग नहीं हैं एडियाकारन
चंद्रभूषण
स्थापित मान्यताओं की गुलामी विज्ञान में भी खूब देखी जाती है। केकड़ों के करीब दिखने वाली अति प्राचीन, लगभग 50 करोड़ साल पुरानी कैंब्रियन जीव जातियों को ही सृष्टि के सबसे प्रारंभिक जानवर मानने का रिवाज लंबे समय तक जीव विज्ञान में चलता रहा। उन्नीसवीं सदी में इसे जीवाश्म विज्ञान का चरम समझा जाता था। इस मान्यता से न हट पाने के चलते ही 1868 में कनाडा में जब इससे भी दस करोड़ साल पुराने, बहुत ही सुंदर, सुडौल जीवाश्म खोजे गए तो अगले अस्सी-नब्बे वर्षों में दक्षिणी अमेरिका, अफ्रीका और आस्ट्रेलिया तक दुनिया में बहुत दूर-दूर की जगहों पर इनके दोहराव के बावजूद कभी इन्हें गैस के सोतों के निशान तो कभी किसी किस्म का पौधा कहकर खारिज कर दिया जाता था।

1946 में दक्षिणी आस्ट्रेलिया की एडियाकारा पहाड़ियों में ऐसे विविध रूपों वाले जीवाश्मों की खोज एक साथ होने के बाद इन्हें 'एडियाकारन बायोटा' का नाम दिया गया। लेकिन हाल तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया था कि ये पौधे थे या जानवर, या कुछ और। किसी चित्रकार के बनाए हुए से लगने वाले, छह फुट तक चौड़े जीवाश्म अपने पीछे छोड़ गए इन जीवों का अभी धरती पर मौजूद किसी भी जीवधारी के साथ कोई मेल नहीं है। यही कारण है कि जीववैज्ञानिक परिवार निर्धारण में इनकी जगह कहां सुनिश्चित की जाए, यह भी तय नहीं हो पा रहा था। इनके अस्पष्ट कुल नाम में लगा ‘बायोटा’ इस दुविधा को ही दर्शाता है। एक राय इन्हें पृथ्वी पर प्रकृति का विफल प्रयोग मानने की है, क्योंकि एक जैविक प्रयोग के रूप में अगर ये सफल होते तो इनकी संततियों का कोई न कोई रूप धरती पर बाद में भी मौजूद होता।

हकीकत यह है कि कैंब्रियन युग की शुरुआत के साथ ही इनके जीवाश्मों की निरंतरता अचानक कुछ इस तरह टूट जाती है, जैसे गधे के सिर से सींग। इसकी दो-तीन वजहें हो सकती हैं। एक तो यह कि वातावरण में कोई ऐसा बदलाव हुआ हो कि इनका जीवित रह पाना संभव न रह गया हो। दूसरा यह कि ये कैंब्रियन जंतुओं की खुराक बन गए हों। और तीसरा यह कि एक जीवजाति के रूप में इनका जारी रहना अपने भीतर से ही असंभव हो गया हो और इनके गायब होने के क्रम में जीवन की निरंतरता कायम रखने के लिए सृष्टि को एककोशिकीय जीवों का ही इवॉल्यूशन नए सिरे से करके कैंब्रियन जीवों की रचना करनी पड़ी हो।

इस तीसरे तर्क के साथ समस्या यह है कि एडियाकारन जीवों का आधिपत्य धरती पर थोड़ा-बहुत नहीं, पूरे नौ करोड़ 30 लाख साल कायम रहा। पत्थरों पर उनकी शुरुआती छापें 63 करोड़ 50 लाख साल पहले से मिलनी शुरू होती हैं और 54 करोड़ 20 लाख साल पहले वाले समय के तुरंत बाद अचानक मिलनी बंद हो जाती हैं। इसकी तुलना अगर स्पीलबर्ग की बहुचर्चित फिल्म ‘जुरासिक पार्क’ से चर्चा में आए जुरासिक युग से करें तो वह पांच करोड़ साठ लाख साल लंबा ही चल पाया था। अब, अगर हम डाइनोसोरों को प्रकृति के सबसे सफल प्रयोगों में से एक मानते हैं, तो इसकी लगभग दोगुनी अवधि तक धरती पर राज करने वाली जीवजाति को प्रकृति का विफल प्रयोग बताने का कोई औचित्य नहीं बचता।

बहरहाल, असल सवाल एडियाकारन जीवों की जाति निर्धारित करने का है कि वे जानवर थे या पौधे या इन दोनों से अलग कोई अद्भुत, अनोखी चीज। अभी पिछले हफ्ते एक चीनी और एक ब्रिटिश जीव विज्ञानी ने अपनी साझा रिसर्च में दावा किया है कि एडियाकारन हकीकत में जानवर थे और उनमें सब के सब नहीं तो कुछेक चल-फिर भी सकते थे। यह निष्कर्ष उन्होंने अपेक्षाकृत बाद की एक जीवजाति स्ट्रोमैटोवेरिस साइग्मोग्लेना के जीवाश्म के अध्ययन के आधार पर निकाला है। यह जीवाश्म 51 करोड़ 80 लाख साल पुराना है, यानी एडियाकारन जीवों का दौर खत्म हो जाने के ढाई करोड़ साल बाद का। लेकिन इसके कुछ लक्षण एडियाकारन से मिलते-जुलते हैं।

ब्यौरे में जाएं तो हर जानवर में खाना पचाने की कोई सुनिश्चित व्यवस्था- आर-पार जाने वाला कोई छेद- जरूर होता है। इसका अपवाद स्पंज हैं, जिनमें यह नहीं होता। वे पूरे शरीर से पानी सोखते-निकालते रहते हैं और इसी क्रम में पोषक तत्वों को अपने भीतर जमा करने और उच्छिष्ट के उत्सर्जन का काम भी संपन्न कर लेते हैं। इस नजर से एडियाकारन स्पंज और उससे बाद के जानवरों के बीच की कोई चीज हो सकते हैं। इस तरह की कुछ संरचनाएं स्ट्रोमैटोवेरिस साइग्मोग्लेना के जीवाश्मों में नजर आ रही हैं। लेकिन इन्हें एडियाकारन की ही परंपरा वाली जीवजाति मानने की वजह सिर्फ एक है कि दोनों की बनावट थोड़ी-बहुत मिलती-जुलती है। यह और बात है कि इस मामूली मिलान के आधार पर ढाई करोड़ के फासले को नजरअंदाज कर देना ज्यादातर जीवविज्ञानियों को रास नहीं आ रहा।

सृष्टि से पहले !!

जो रहा सृष्टि से पहले
चंद्रभूषण
जैसे हमारे सौरमंडल में सारे ग्रह सूरज के इर्दगिर्द एक ही दिशा में घूमते हैं, उसी तरह हमारी आकाशगंगा में सारे तारे भी इसके केंद्र की एकदिश परिक्रमा करते हैं। लेकिन इस किस्से में आगे एक बड़ा झोल आता है। हम जैसे-जैसे सूरज से दूर जाते हैं, ग्रहों की रफ्तार कम होती जाती है। 14.96 करोड़ किमी दूरी से सूरज का चक्कर काट रही पृथ्वी यह काम 29.78 किमी/सेकंड की गति से करती है, जबकि सूरज से 449.50 करोड़ किमी दूर नेपच्यून सिर्फ 5.43 किमी/सेकंड की चाल से अपनी राह नापता है। लेकिन आकाशगंगा के केंद्र का चक्कर काट रहे तारों के साथ मामला पता नहीं क्यों बिल्कुल उलटा है। दूरी बढ़ने के साथ उनकी रफ्तार घटने के बजाय बढ़ती जाती है।

जैसे, केंद्र से कोई 30 हजार प्रकाशवर्ष दूर स्थित सूरज अपना रास्ता 220 किमी/सेकंड की गति से तय करता है, जबकि इससे तीन गुना से भी ज्यादा दूर (केंद्र से 1 लाख प्रकाशवर्ष दूर) के तारे 275 किमी/सेकंड की स्पीड से फर्राटा मारते हैं। और यह उलटबांसी सिर्फ आकाशगंगा तक सीमित नहीं है। ऐसी हजारों स्पाइरल गैलेक्सीज के ब्यौरे खगोलशास्त्रियों के पास हैं और उन सबमें बाहरी तारों की रफ्तार भीतर वालों से ज्यादा देखी गई है। यह तभी संभव है जब इनके बाहरी हिस्सों में कोई ऐसी चीज भरी हो, जिसके प्रेक्षण का कोई तरीका हमारे पास नहीं है। इस अज्ञात चीज ‘डार्क मैटर’को लेकर मोटा हिसाब यह है कि इसका वजन सभी ज्ञात चीजों का पांच गुना है, और हाल की एक गणना के अनुसार इसे सृष्टि के प्रस्थान बिंदु ‘बिग बैंग’ से भी पुराना होना चाहिए!

Friday, 2 August 2019

सबसे स्थिर स्थिरांक

सबसे स्थिर स्थिरांक
चंद्रभूषण
137.03599913
एक अजीब संख्या, जिस पर भौतिकशास्त्री लट्टू रहते हैं। दशमलव का निशान छोड़ दें तो कुल 11 अंकों की ऊपर लिखी संख्या में ऐसी क्या खास बात है जिसने एक जमाने से भौतिकशास्त्रियों को इसका दीवाना बना रखा है? सैद्धांतिक भौतिकशास्त्री इसे पूरे ब्रह्मांड का सबसे स्टेबल कॉन्स्टैंट मानकर चलते हैं, जबकि प्रायोगिक भौतिकशास्त्री ब्रह्मांड के सुदूरतम कोनों में इस संख्या के मान में थोड़ा बहुत भी झोल दिख जाने की जुगत में जुटे रहते हैं।

दरअसल यह भौतिकी के तीन सबसे बुनियादी स्थिरांकों- क्वांटम मेकेनिक्स में कदम-कदम पर इस्तेमाल होने वाला प्लैंक स्थिरांक h, निर्वात में प्रकाश का वेग c और इलेक्ट्रान पर मौजूद आवेश e का एक विशिष्ट मेल है। साथ में इसमें गणित के सबसे बुनियादी अनुपात पाई का तड़का भी लगा हुआ है। यह एक खास राशि hc / 2πe 2 का गणितीय मान है, जिसमें सारी इकाइयां एक-दूसरे कट जाती हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो यह सिर्फ एक संख्या है, जिसका आठ दशमलव अंकों तक मान 137.03599913 आता है।

यह भी दिलचस्प है कि इतने महत्वपूर्ण स्थिरांक को अभी तक कोई नाम नहीं दिया गया है। अलबत्ता इसकी उलट राशि (1 में इसका भाग देने पर मिलने वाली संख्या) को ग्रीक अक्षर अल्फा के रूप में लिखा जाता है और इसे फाइन स्ट्रक्चर कॉन्स्टैंट (महीन ढांचा स्थिरांक) के रूप में जाना जाता है। इसका मूल्य 0.0072973525664 के करीब आता है, और यह ऊपर बताई गई अपनी विलोम संख्या जितना सटीक नहीं है।

हाल तक ऐसा समझा जाता था कि ब्रह्मांड के किसी भी छोर पर अल्फा के मान में दशमलव के तेरहवें स्थान तक भी कोई बदलाव नहीं आ सकता। लेकिन जैसे-जैसे इंसानी प्रेक्षणों का दायरा बढ़ता जा रहा है, कई अरब प्रकाश वर्ष की दूरी पर दर्ज किए गए आंकड़े इसमें जरा-मरा बदलाव भी दिखा रहे हैं। ऐसा प्रेक्षणों की गलती से भी हो सकता है और यह भी संभव है कि भौतिकी की सबसे बुनियादी मान्यता- ‘यह सृष्टि और इसके नियम हर जगह बिल्कुल एक-से हैं’- में ही कोई झोल हो। बहरहाल, इससे 137.03599913 के दुर्निवार आकर्षण में कोई कमी नहीं आने वाली।

Wednesday, 31 July 2019

जीवन नहीं साध सकते अद्भुत तारें

जीवन नहीं साध सकते अद्भुत तारे
चंद्रभूषण
सितारों का साइज बहुत बड़ा हो सकता है। इतना बड़ा कि उनकी मोटाई सूर्य के इर्द-गिर्द शनि ग्रह की कक्षा जितनी हो जाती है, जिसका साल हमारे 12 वर्षों के बराबर है। सूरज से पृथ्वी तक की दूरी की दस गुनी चौड़ाई वाला तारा बाकायदा प्रेक्षित किया जा चुका है। इसका नाम वाईवी स्कूटी है और यह स्कूटम तारामंडल में स्थित है। इसकी त्रिज्या सूरज की 1708 गुनी है (192 कम या ज्यादा)! इस हिसाब से इसका वजन सूरज का एक अरब गुना तो होना ही चाहिए। लेकिन हकीकत में यह सूरज से महज दस-बारह गुना ज्यादा वजनी है।

इस विसंगति का कारण यह है कि वाईवी स्कूटी एक मरता हुआ तारा है। ज्यादातर तारे मरने से पहले बुरी तरह फूल जाते हैं और फिर भारी विध्वंस के साथ फट कर मर जाते हैं। पीछे एक अजर-अमर सफेद बौने तारे के रूप में अपनी दहकती हुई धुरी छोड़ते हुए। लेकिन आकार के विपरीत तारों के वजन पर भौतिकी की कुछ सख्त सीमाएं लागू होती हैं। कुछ समय पहले तक ऐसा माना जाता था कि किसी भी तारे का वजन हमारे सूरज के डेढ़ सौ गुने से ज्यादा नहीं हो सकता।

यह सीमा पिछले कुछ वर्षों में बुरी तरह टूटी है, हालांकि यह भी कुछ अलग ढंग से मरणशील तारों के साथ ही देखा जा रहा है। अभी तक दर्ज किया गया सबसे वजनी तारा आरएमसी 136 ए-1 है, जो हमारी आकाशगंगा की सैटेलाइट गैलेक्सी लार्ज मैगेलनिक क्लाउड में स्थित है। इसका वजन हमारे सूरज का 315 गुना नापा गया है। किसी अज्ञात कारण से इस गैलेक्सी में कई सारे तारे सूरज के डेढ़ सौ गुने से भी ज्यादा वजनी हैं। लेकिन ये सभी बेहद चमकीले तारे वुल्फ-रायेट श्रेणी में आते हैं, जिनकी खासियत यह होती है कि वे बहुत जल्दी मर जाते हैं।

हमारे सूरज की कुल उम्र लगभग 10 अरब साल मानी जाती है, जिसका आधे से जरा कम हिस्सा यह पार कर चुका है। इसके विपरीत वुल्फ-रायेट श्रेणी के तारे सिर्फ 50 लाख साल जीते हैं और फिर अपने इर्द-गिर्द भारी तत्वों का एक जखीरा बिखेरते हुए फट कर छितरा जाते हैं। सृष्टि के विकास में इन तारों की सबसे बड़ी भूमिका यह है कि ये दुनिया को सिर्फ हाइड्रोजन और हीलियम का अंबार बने रहने से आगे ले जाते हैं। इन गैसों के संलयन (फ्यूजन) को अंजाम देने वाली इन तारों की भट्ठी में ही वह कार्बन बना है, जिससे और चीजों के अलावा सभी जीवधारियों के शरीरों का भी निर्माण हुआ है, जो न सिर्फ इंसानी बल्कि हर तरह की चेतना का आधार हैं।

इन ब्यौरों से एक बात साफ है कि तारे का बहुत बड़ा या वजनी होना उसके स्थायित्व के खिलाफ जाता है। जिंदगी संभाल सकने वाले ग्रह जिन तारों के इर्द-गिर्द खोजे जाते हैं, उनकी उमर चार-पांच अरब साल या इससे ज्यादा होनी चाहिए। कारण यह कि ग्रहों की उम्र तारे से तो कम ही होगी, और कामचलाऊ इवॉल्यूशन के लिए भी तीन-चार अरब साल का वक्त तो मिलना ही चाहिए। इस काम के लिए सूरज से छोटे तारे ज्यादा मुफीद माने जाते हैं क्योंकि अक्सर उन्हें ज्यादा उम्र का वरदान मिला होता है। बहुत बड़े, बहुत चमकीले, बहुत वजनी तारे चमत्कृत करने के लिए ही ठीक हैं। जीवन रचने जैसे महीन काम उनसे नहीं हो पाएंगे।

Wednesday, 24 July 2019

उड़नतश्तरी की मिस्ट्री

Do Aliens n UFO Exist?

UFO का नाम आते ही जेहन में अजब-गजब शक्लों वाले और खास तरह के एक स्पेस क्राफ्ट की शक्ल उभरती है। शायद ही कोई ऐसा हो, जिसने शरीर में झुरझुरी मचा देनेवाले यूएफओ के किस्से सुने-सुनाएं न हों। 2 जुलाई को वर्ल्ड यूएफओ डे पर विजय सिंह ठकुराय तर्क की कसौटी पर कस रहे हैं यूएफओ के किस्सों को:

रात का अंधेरा गहरा रहा है। सोने की कोशिश करते आप बिस्तर पर करवटें बदल रहे हैं। अचानक कमरे में नाइट लैंप रहस्यमय तरीके से बंद हो जाता है। बमुश्किल 3-4 फुट लंबे, अपेक्षाकृत बड़े बाल-रहित सर और बड़ी-बड़ी आंखों वाले कुछ अजीबोगरीब जीवों को आप अचानक अपने कमरे की दीवार से आर-पार गुजरते हुए पाते हैं। वे आपको सोते हुए ही उठाकर कमरे से बाहर निकलते हैं और उड़ते हुए हवा में घूम कर रहे एक तश्तरीनुमा यान में घुस जाते हैं। यान में पहुंचकर आपको एक लैब जैसे कमरे में स्ट्रेचर पर लिटाकर बांध दिया जाता है। आप हिलने-डुलने में असमर्थ होने के कारण उन दूसरे ग्रह के निवासियों को बेबसी से खुद पर टेस्ट करते हुए देखने के अलावा कुछ नहीं कर पाते। मशीनें आपके शरीर, खास तौर पर आपके प्राइवेट पार्ट, की टेस्टिंग कर रही हैं। अगर आप पुरुष हैं तो आपके स्पर्म निकाल लिए जाएंगे। अगर आप स्त्री हैं तो संभावना है कि आपके यूटरस में स्पेशल स्पर्म प्रत्यारोपित कर दिए जाएंगे। ये एलियन अक्सर आप पर उनसे सेक्स संबंध बनाने का दबाव भी डाल सकते हैं। इसके बाद आपको वापस सोते हुए ही अपने कमरे में छोड़ दिया जाएगा। उठकर आप कन्फ्यूज रहेंगे कि जो आपके साथ हुआ, वह हकीकत था या कोई सपना?

दावे फ्लाइंग सॉसर के
उड़़नतश्तरी या फ्लाइंग सॉसर शब्द चलन में तब आया था, जब 24 जून 1947 में अमेरिकी पायलट केनेथ अर्नाल्ड ने वॉशिंगटन में अजीबोगरीब 9 आकृतियों को हवा में अजीब तरीके से उड़ते हुए देखा था। मीडिया द्वारा पूछे गए एक सवाल के जवाब में अर्नाल्ड ने कहा कि ये रहस्यमयी आकृतियां उसी प्रकार हिल रही थीं जिस तरह समुद्र की लहरों में एक तश्तरी हिलती है। अर्नाल्ड की बात को समझे बिना अगले दिनों के अखबार ‘तश्तरीनुमा उड़नयंत्रों’ के वजूद की खबरों से पटे पड़े थे और दुनिया भर में तश्तरीनुमा आकृतियों के देखे जाने की खबर आम बात हो गई थी, बिना यह जाने-समझे कि अर्नाल्ड ने जो देखा, वह कोई तश्तरी नहीं बल्कि पंखों वाली हवाई जहाज जैसी संरचना थी। बाद में इन्हें यूएफओ यानी अनाइडेंटिफाइड फ्लाइंग ऑब्जेक्ट भी कहा जाने लगा। सन 1961 को एक शाम अमेरिकी कपल बैटी तथा बरनै हिल ने दफ्तर से लौटते वक्त पहाड़ों में एक चमकदार चीज देखी, जिससे आतंकित होकर उन्होंने मुख्य रास्ता छोड़ पहाड़ी तंग रास्तों से होते हुए घर पहुंचकर जान बचाई। इस घटना ने हिल दंपती को एलियंस से जुड़े दस्तावेज खंगालने के लिए प्रेरित किया और उनके अंदर यह धारणा मजबूत होती गई कि जो उन्होंने देखा था, वह असल में एक उड़नतश्तरी थी। इस घटना के कुछ दिन बाद बकौल हिल दंपती के, एलियंस ने उनके घर से उनका अपहरण कर लिया और अपने यान में ले गए जहां से बाद में उन्हें वापस घर छोड़ दिया गया और अगले कुछ साल हिल दंपती चर्चा का केंद्र बने रहे। उन पर किताबें लिखी गईं और वे टीवी कार्यक्रमों का हिस्सा बनते रहे। क्या हिल दंपती ने जो देखा, वह हकीकत था? या कोई सपना या मानसिक भ्रम? जो भी है, इतना पक्का है कि इस तरह के दावों के चलते उन्हें मिली प्रसिद्धि ने दुनिया में प्रसिद्ध होने की चाह रखनेवाले लोगों को एक आसान रास्ता दिखा दिया और तब से अब तक हजारों लोग उड़नतश्तरी देखने या एलियंस द्वारा किडनैप होने और खुद पर एलियंस द्वारा यौन प्रयोग करने का दावा कर चुके हैं।

इन सभी दावों पर अगर यकीन किया जाए तो पिछले कुछ दशकों में औसतन हर रोज एलियंस किसी न किसी इंसान के अपहरण को अंजाम दे रहे हैं। पृथ्वी पर सभी देशों की सरकारें, वैज्ञानिक समुदाय या जिम्मेदार संस्थाएं इन एलियंस की मौजूदगी से अनजान हैं या कुछ दावों के अनुसार जानबूझकर देशों की सरकारें आम जनता को एलियंस की हमारे बीच मौजूदगी से अनजान रखना चाहती हैं। ये सारे दावे गले उतरने वाले तो नहीं लगते।
एलियंस द्वारा यौन प्रयोगों के सहारे मानव नस्ल को संवर्धित करने की अफवाहें पिछले कुछ दशकों से पश्चिमी जगत में चर्चा में रही हैं। सवाल यह है कि एलियंस को आखिर हर कुछ रोज पर किसी इंसान के अपहरण करने की इतनी मशक्कत करने की जरूरत क्या है? क्यों नहीं वे किसी इंसान के स्पर्म लेकर जेनेटिक कोड पढ़कर जितनी चाहे, उतनी कॉपी तैयार कर लेते? अत्याधुनिक तकनीक से संपन्न एलियंस के मुकाबले हम इंसान तक कोशिकाओं की क्लोनिंग करने में कामयाब रहे हैं। एलियंस के साथ संपर्क होने का दावा करनेवाले और किसी भी सवाल का जवाब देने का दावा करनेवाले कई इंसानों के साथ वैज्ञानिकों ने घंटों गुजरे हैं ताकि पता लगाया जा सके कि ये अत्याधुनिक एलियंस ब्रह्मांड के विषय में तकनीकी रूप से कितनी जानकारी रखते हैं और नतीजा हमेशा सिर्फ एक आया है। कोई भी सवाल जिसका जवाब एक औसत तकनीकी ज्ञान से ऊपर की जानकारी रखनेवाले शख्स से अपेक्षित है, जवाब में हमेशा एक लंबा सन्नाटा ही मिला है। पर नैतिकता या इंसानी जिम्मेदारियों के सिलसिले में अगर कोई सवाल पूछा जाए जैसे कि ‘क्या हमें मिलजुलकर रहना चाहिए?’ तो तथाकथित एलियंस जवाब देने में कतई संकोच नहीं करते। साफ जाहिर है कि अक्सर ये कथित एलियंस उतना ही जानते हैं, जितना उनसे संपर्क होने का दावा करनेवाला शख्स जानता है।

दिल है कि मानता नहीं
एक बार एक रेस्तरां के बाहर अचानक लोगों की भीड़ लग गई। आसमान में चमकती हुई एक रहस्यमयी चीज को देख लोग तरह-तरह के कयास लगा रहे थे। किस्मत से भीड़ में एक खगोल वैज्ञानिक भी था, जिसने अपनी दूरबीन लाकर उस चमकती हुई चीज को देख कर घोषणा की कि किसी को घबराने की जरूरत नहीं। आसमान में चमकती चीज और कुछ नहीं बल्कि इंसानों द्वारा छोड़ा गया, पृथ्वी के चक्कर लगाता एक सैटलाइट है। इन सैटलाइट्स को अक्सर सूर्योदय या सूर्यास्त के वक्त अनुकूल हालात में चमकता हुआ देखा जा सकता है। खगोल वैज्ञानिक हैरान रह गया, जब उसने लोगों के चेहरे पर एक अजीब-सी मायूसी देखी। वजह पूछने पर जवाब मिला, ‘खाने की टेबल पर बैठकर एक चमकते हुए सैटलाइट के बारे में बात करने में क्या मजा आएगा?’ जबरन रोमांच खोजने के साथ-साथ इंसानी फितरत यह भी है कि वह अनसुलझे सवालों का अपने मन-मुताबिक जवाब खोज लेती है। अक्सर इंसान आसमान में चमकती हुई किसी चीज को देख रोमांचित होकर यूएफओ चिल्लाते हैं। जो आपको मालूम ही नहीं है, उसे किसी दूसरी गैलक्सी से आया यूएफओ समझ लेना कहां की समझदारी है? क्यों हम यह जानने की कोशिश नहीं करते कि आसमान में चमकती चीजें असल में असामान्य स्थितियों में चमकते नजदीकी ग्रह, सूरज की रोशनी के कारण चमकते गोलाकार बादल, वायुमंडल में प्रवेश करनेवाले धूमकेतु, उल्कापिंडों के टुकड़े तथा रॉकेट बूस्टर्स आदि दर्जन भर कारण हो सकते हैं।

कहीं यह दिमागी लोचा तो नहीं
भूख, प्यास, नींद, डिप्रेशन, ब्रेन डिसऑर्डर और लोकप्रियता की भूख के कारण अक्सर लोगों को मानसिक भ्रम हो जाता है। क्या कारण है कि एलियंस द्वारा मानवों को अक्सर उनकी नींद से उठाकर ही किडनैप किया जाता है? मानसिक भ्रम समय और काल की सीमाओं से परे हर समाज के अनिवार्य अंग रहे हैं। लोगों की अपेक्षाओं के अनुरूप ये मानसिक भ्रम किसी को भूत-प्रेतों का दर्शन कराते हैं तो किसी को ईश्वर के फरिश्तों का तो किसी को एलियंस का। अगर आपने किसी रहस्याकृति, रोशनी, एलियन आदि किसी चीज का साक्षात्कार किया है तो यह फैसला कैसे हो कि जो आपने देखा, वह आपका मानसिक भ्रम नहीं है? विज्ञान आपके निजी अनुभवों पर यकीन नहीं करता। वह ठोस सबूत मांगता है और आजकल दुनिया में जब दर्जनों फोटोशॉप सॉफ्टवेयर ‘Add UFO’ बटन की सुविधा देते हैं तो बेशक आपका सबूत एक फोटोग्राफ से बढ़कर होना चाहिए। एलियंस के वजूद का सवाल हमारे जमाने का सबसे असाधारण सवाल है और गौरतलब है कि असाधारण सवालों के जवाब देते वक्त पेश सबूत भी असाधारण ही होने चाहिए।

एरिया 51 की पहेली
अक्सर इंटरनेट पर नासा या दूसरी संस्थाओं के हवाले से एलियंस के अस्तित्व की पुष्टि की जाती रही है। अमेरिका द्वारा एरिया 51 में एलियंस को रखने की खबरों को हम अक्सर गॉसिपिंग साइट्स पर पढ़ते रहते हैं। देखा जाए तो ये सभी हवाई खबरें हैं। हकीकत से इनका कोई नाता नहीं है। विज्ञान एलियंस की मौजूदगी की संभावना से इनकार नहीं करता और खुद एलियन सभ्यताओं को खोज निकालने के लिए जुटा है। 16 नवंबर 1974 में नासा साइंटिस्ट कार्ल सगन और उनकी टीम ने M13 स्टार क्लस्टर की तरफ रेडियो वेव्स के रूप में मानव डीएनए, सौरमंडल का नक्शा, गणित में कुछ अंक यानी मानवता से जुड़ी कुछ बेसिक जानकारियां भेजी थीं। इस रेडियो वेव्स रूपी मेसेज को M13 तक प्रकाश गति से चलने के बावजूद पहुंचने में 25 हजार साल का समय लगेगा। अगर कोई एलियन सभ्यता वहां है और हमारे संदेशों को पकड़कर हमें जवाब भेजती है तो उनके जवाब अगले 25 हजार साल में हम तक पहुंच पाएंगे। तब तक क्या हम अपना अस्तित्व सुरक्षित रख पाएंगे? असल में ब्रह्मांड की अद्भुत विराटता दूसरी आकाशगंगाओं में कथित रूप से मौजूद एलियन सभ्यताओं से हमारे संपर्क में सबसे बड़ी चुनौती है। आज हमारे सबसे तेज चलनेवाले स्पेसशिप द्वारा भी अगर हम अपने सबसे नजदीक मौजूद तारे प्रोक्सिमा सेंचुरी पर जाने की सोचें तो यह एकतरफा यात्रा 19 हजार साल लंबी होगी। लाइट की स्पीड से संदेश भेजना भी ब्रह्मांड की विशालता के सामने नाकाफी है और गैलक्सीज के बीच संदेश के लेन-देन में भी इतनी वक्त लगेगा, जितने वक्त में न जाने कितनी सभ्यताएं पैदा होकर काल के ग्रास में समा जाती हैं।

स्पेस में धरती से संदेश
इस समय मानवता द्वारा प्रक्षेपित 5 स्पेसशिप (Pioneer 10-11, Voyager 1-2, New Horizons) सौरमंडल की सीमाओं को पार कर बाहरी ब्रह्मांड में कदम रख चुके हैं। इन सभी स्पेसशिप में हमने मानवता से संबंधित कई रेकॉर्ड्स रखे हैं। इनमें 5 सितम्बर 1977 को प्रक्षेपित और 40 साल से लगातार यात्रा कर रहा और वर्तमान में हमसे लगभग 21 अरब किलोमीटर दूर पहुच चुके यान वॉयेजर-प्रथम पर वैज्ञानिकों ने एक गोल्डन डिस्क छोड़ी है, जिसमें मानव सभ्यता से संबंधित 115 फोटोज, संगीत, हमसे जुड़ी कुछ बेसिक जानकारी और हमारी गैलक्सी का ज्ञात नक्शा भी अटैच है। कुछ और साल तक वॉयेजर में लगे प्लूटोनियम आधारित एनर्जी प्लांट कम्युनिकेशन के लिए उसे जरूरी ऊर्जा देता रहेगा। कुछ साल बाद वॉयेजर से हमारा संपर्क टूट जाएगा और वॉयेजर लगभग 40,000 किलोमीटर/घंटा की चाल से ब्रह्मांड में अपना सफर लगातार जारी रखेगा, जब तक कि कोई चीज टकरा कर इसे रोक नही देती। अगले कुछ लाख या करोड़ों सालो में वॉयेजर की यह यात्रा उसे ना जाने कितने सितारों के करीब ले जाएगी। उम्मीद है, एक दिन सुदूर ब्रह्मांड में मौजूद कोई एलियन सभ्यता वॉयेजर को ढूंढकर उसमें मौजूद रेकॉर्ड्स को देख और समझ पाए और एक दिन जान पाए कि सुदूर ब्रह्मांड के किसी कोने में हम इंसान रहते हैं या रहते थे।
साभार नवभारत टाइम्स

Tuesday, 23 July 2019

मुर्दा सितारों का महताण्डव

मुर्दा सितारों का महातांडव
चंद्रभूषण
ओजे-287 नाम का आकाशीय पिंड खगोलविज्ञानियों को 1891 से परेशान करता आ रहा है। शुरू में सिर्फ इतना पता था कि यह कोई ऐसी चीज है, जो हर 12 साल बाद बहुत धुंधली सी, लगभग प्लूटो जितनी बड़ी दिखाई पड़ती है, फिर यूं गायब हो जाती है, जैसे गधे के सिर से सींग। करीब एक सदी बाद, 1981 में पता चला कि यह चीज धरती से कम से कम साढ़े तीन अरब प्रकाश वर्ष दूर है। लेकिन अभी कुछ ही समय पहले ठीक-ठीक मापा गया कि इसकी जड़ में सूरज का 18 अरब गुना वजनी एक मरा हुआ तारा, ब्लैक होल है।

बहरहाल, कल्पना को भी धता बताने वाले इस ब्लैक होल के साथ एक बहुत बड़ी पेचीदगी भी जुड़ी है। सभी जानते हैं कि ब्लैक होल से रोशनी बाहर नहीं आती। यानी दिखने जैसा वहां कुछ होता ही नहीं। इसके होने का अंदाजा एक्स-रे की धाराओं और पड़ोसी पिंडों की गति से ही लगाया जाता है। तो फिर यहां बीच-बीच में जो दिखता है, वह क्या है? पाया गया कि इस नियमित दृश्य की वजह एक खास खगोलीय घटना है। ओजे-287 के कुछ-कुछ समय बाद दिखाई पड़ने का कारण यह है कि सूरज का 14 करोड़ गुना वजनी एक और ब्लैक होल इसकी परिक्रमा करते हुए निरंतर इसके करीब आ रहा है।

दूरी घटते जाने से इसका 12 वर्ष का परिक्रमा काल हर चक्कर में 20 मिनट कम होता जाता है। एक काफी लंबोतरी, दीर्घवृत्तीय कक्षा में प्रचंड गति से चलता हुआ यह छोटा ब्लैक होल जब भी बड़े वाले ब्लैक होल के इर्द-गिर्द फैली गैसों से होकर गुजरता है, एक भयानक विस्फोट होता है और इतनी ऊर्जा निकलती है कि इससे आप अगर सूरज से पृथ्वी की दूरी की 23 लाख 65 हजार 200 गुनी दूरी पर बैठे हों, तो भी यह आपको तंदूर की तरह सेंक डालेगा। दोनों मुर्दा तारों का यह महातांडव अभी 10 हजार साल और देखने को मिलेगा। उसके बाद संहारक मात्रा में ऊर्जा पैदा करते हुए दोनों मिलकर और भी बड़े लेकिन पूरी तरह अदृश्य ब्लैक होल में बदल जाएंगे।

जाहिर है, अभी हर बारह साल पर एक बार दिखने वाला ओजे-287 आगे चलकर और जल्दी-जल्दी दिखने लगेगा और उसका आकार तथा उसकी दृश्यता भी लगातार बढ़ती जाएगी। सम्भव है, सुदूर भविष्य में इसके अंतिम दौर में हम इसे कुछ समय तक शुक्र ग्रह जैसी या उससे भी चमकीली किसी स्थिर चीज की तरह देखें, जिसके तुरंत बाद इसका किस्सा हमारे लिए खत्म हो जाएगा। लेकिन दोनों इतने विशाल ब्लैक होलों के विलय का हमारे जीवन पर भी किसी तरह का प्रभाव पड़ सकता है या नहीं, इस बारे में वैज्ञानिकों की कोई निश्चित राय नहीं बन पाई है।

Friday, 19 July 2019

दुनियाँ की सबसे पुरानी रोटियों का इतिहास

संसार की सबसे पुरानी रोटियां
चंद्रभूषण
साढ़े चौदह हजार साल पहले पकी कुछ रोटियों की खुशबू ने अभी इतिहासकारों से ज्यादा वैज्ञानिकों को सम्मोहित कर रखा है। इतिहासकारों के लिए अभी इस बात को जेहन में अंटाना ही मुश्किल हो रहा है, क्योंकि दुनिया में सबसे पहले कहीं भी खेती होने के जो प्रमाण मिले हैं, उनका समय साढ़े नौ हजार साल पहले से ज्यादा पुराना नहीं है। इसे एक हजार साल और पहले खींच ले जाएं तो भी यही कहना होगा कि ये रोटियां खेती शुरू होने से कम से कम चार हजार साल पहले पकी थीं। यह भला कैसे संभव हुआ, और अगर हुआ भी तो बिना खेती के रोटियां आखिर बनीं किस चीज से?

संसार की सबसे पुरानी सभ्यता तुर्की, सीरिया, जॉर्डन और इजराइल के अर्धचंद्राकार इलाके में दर्ज की गई है, जहां सबसे पहले खेती होने के प्रमाण पाए गए। जिस चूल्हे में इन साढ़े चौदह हजार साल (इंसानी पीढ़ियों में बात करें तो लगभग सात सौ पीढ़ी) पुरानी जली हुई रोटियों के 24 अवशेष पाए गए हैं, वह जॉर्डन की शुबैका-1 साइट में स्थित है। यह जमीन में खुदा हुआ एक पाषाणकालीन चूल्हा या तंदूर है, जिसमें रोटियां पकाते हुए लोग किसी इंसानी हमले, प्राकृतिक आपदा या जानवर के डर से इन्हें अधबीच में ही छोड़कर भाग खड़े हुए होंगे। इनकी उम्र कार्बन डेटिंग के जरिये निकाली गई है।

लेकिन ये अवशेष रोटियों के ही हैं, भुने हुए दानों के नहीं, इसका पता कैसे चला होगा? दरअसल, भुने हुए दानों और रोटियां का रसायनशास्त्र बिल्कुल अलग होता है। रोटियां, यानी पिसे हुए दानों और पानी के गुलगुले मिश्रण का सीधे आग में या भाप में या बीच में तवे जैसा कोई माध्यम रख कर पकाया जाना। इस लिहाज से इस चूल्हे को तंदूर के ज्यादा करीब की चीज माना जा सकता है। एक्स-रे परावर्तन के जरिये ज्ञात हुई केमिस्ट्री इस चूल्हे में मौजूद अ‌वशेषों को रोटियों जैसी ही किसी चीज से जोड़ पा रही है।

इसमें काम आए दाने बाजरा, जई या गेहूं की किसी अतिप्राचीन किस्म के हो सकते हैं। कुछ अवशेष शकरकंदी जैसे किसी कंद वनस्पति के भी हो सकते हैं।यह इलाका नटूफियन सभ्यता से जोड़कर देखा जाता है, जिसका समय साढ़े बारह हजार साल पहले से लेकर साढ़े नौ हजार साल पहले के बीच का माना जाता रहा है। मानव सभ्यता के उस घुमंतू दौर में इसी जाति ने एक जगह जमकर रहना शुरू किया और यहीं संसार का सबसे पुराना शहर जेरिको बसाया।

लेकिन जिस पाषाणकालीन चूल्हे में इन जली रोटियों के अवशेष पाए गए हैं, वह अगर किसी और अधिक पुरानी सभ्यता से नहीं जुड़ा है तो नटूफियन सभ्यता को निर्धारित आयु से दो हजार साल और पीछे ले जाने का श्रेय उसी को जाएगा। इन रोटियों के लिए जहां-तहां से जुटाए गए अनाज को पीसकर आटा बनाया गया होगा, इसकी उम्मीद कम है। एक जगह और समय में अनाज की बहुत कम उपलब्धता को देखते हुए जांता या चक्की जैसी कोई चीज उस दौर के लिए सुदूर भविष्य की टेक्नॉलजी ही जान पड़ती है।

तो क्या कभी रोटियां कच्चे, गीले या नम अनाज को सीधे पत्थरों से कूटकर भी बनाई और पकाई जाती रही होंगी? अपने जीवन के एक ठीक-ठाक हिस्से में मैंने  घर के पिसे आटे की रोटियां ही खाई हैं। बिजली या डीजल से चलने वाली चक्की शुरू होने के बाद महज पांच-दस सालों में उस दौर को याद करना भी कठिन हो गया। कितनी अच्छी बात है कि एडवांस टेक्नॉलजी के बल पर आज हम साढ़े चौदह हजार साल पुरानी तकनीक से पकी रोटी को भी याद कर पा रहे हैं!

Monday, 8 July 2019

विज्ञान और नास्तिकों की बेचैनी

दया सागर
विज्ञान और नास्तिकों की बेचैनी और छटपटाहट मैं समझ सकता हूं। दुनिया के सबसे बड़े वैज्ञानिकों में गिने जाने वाले स्टीफन हॉकिंग ने मरने से पहले कहा कि इस दुनिया को बनाने वाला कोई भगवान नहीं है। यह दुनिया भौतिकी के नियमों के हिसाब से अस्तित्व में आई। उनके मुताबिक बिंग बैंग गुरुत्वाकर्षण के नियमों का ही नतीजा था। स्टीफन हॉकिंग ने अपनी नई किताब 'द ग्रैंड डिजाइन' में ईश्वर की किसी भी भूमिका की संभावना खारिज करते हुए कहा कि ब्रह्मांड का निर्माण शून्य से भी हो सकता है।
पता नहीं क्यों मुझे डार्विन की थ्योरी ठीक लगती है कि इंसान जानवरों का वंशज है। ईश्वर ने उसे पैदा नहीं किया। क्योंकि उसे सीधे ईश्वर ने बनाया होता तो वह इतना उपद्रवी कैसे हो सकता है? जितना मैंने पढ़ा और समझा है मैं इसी नतीजे पर पहुंचा हूं कि हमने ईश्वर को अपनी कल्पनाओं में इन बेकार के कामों में जबरदस्ती फंसा दिया है। ईश्वर कोई मिस्‍त्री नहीं जो बनाने बिगाड़ने का काम करे। वह किसी इंसान बनाने वाली फैक्ट्री की मशीन भी नहीं जो बतौर प्रोडक्ट इंसान पैदा करता चला जाए। पहले इंसान को पैदा करे फिर एक दिन मार दे। फिर किसी नए गर्भ में जन्म दे और एक दिन उसे कत्ल कर दे। कभी रोग से कभी किसी एक्सीडेंट में या कभी उम्र के साथ शरीर को जीर्ण शीर्ण करके। फिर कभी कोई जन्म से विकृत बच्चा हो तो उसका जिम्मेदार भी ये खुदा है। पंड़ित मौलवी कहें ये तुम्हारे और इस नवजात  के पूर्व जन्म का फल है। और इसके लिए आप ईश्वर को कोसें। नही माफ कीजिए ईश्वर ये सब नहीं करता और न ये सब करना चाहता है।
और सृष्टि को बनाना और फिर उसे चलाना भी कितना बोरिंग, कितना ऊबाऊ काम है। क्या आप सोचते हैं अरबों से साल ईश्वर यही काम कर रहा है? जैसे कि वह कोई की-मैन हो। सुबह पानी की सप्‍लाई ऑन करे शाम को आफॅ करे। कुछ नहीं तो रोज सुबह उठ कर सृष्टि में घड़ी की तरह चाभी भरे।  
स्टीफन एकदम सही कह कहे हैं कि ब्रह्मांड या प्रकृति के सारे नियमों को विज्ञान से समझा जा सकता है। बस हमें सूत्र पकड़ने हैं। सटीक तौर पर वह थ्योरम खोजनी है जिससे यह सृष्टि बनी। या सृष्टि का शून्य से विस्तार हुआ तो उसका फार्मूला क्या था? यह कोई कठिन काम नहीं। मुझे पूरी उम्मीद है एक न एक दिन विज्ञान ये साबित कर देगा हमारे जिन्दा रहते।
तो ये सारा ड्रामा क्या है?
इसका जवाब मैंने वेद, उपनिषदों और आगे वेदान्त में पाया। दरअसल हमने सृष्टि और सृष्टा को अलग अलग मान लिया। जैसे कि पश्चिम ने मान लिया। लेकिन हमारे वेद फिर तैतरीय उपनिषद ने साफ कहा-शुरू में कुछ नहीं था न सत न असत न स्वर्ग न अंतरिक्ष न पृथ्वी। यानी शून्य था और उसी से सृष्टि का विस्तार हुआ।   भारतीय धर्मग्रन्थ कहते है की सृष्टि की रचना के पहले कुछ नहीं था न प्रकाश था न अन्धकार था न पृथ्वी थी न आसमान था अगर था तो सिर्फ शून्य। बाद में शंकराचार्य ने अपने अद्वैतवाद सिद्धान्त में कहा- ब्रह्मांड में सिर्फ ईश्वर है और कोई दूसरा अन्य नहीं। यानी पेड़ पौधे हवा मनुष्य जो भी है वो ईश्वर है और ईश्वर के सिवाय और कुछ नहीं। । विज्ञान कहता है की शून्य से अचानक ही एक बैंग के साथ ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई यानी सम्पूर्ण ब्रह्मांड की उत्पत्ति किसी एक से ही हुई है। तो शंकराचार्य और पौराणिक ग्रन्थ दोनों ही स्टीफन के दावों की पुष्टि करते हैं। विज्ञान कहता है कि ब्रह्मांड की उत्पत्ति के पहले कुछ नहीं था।  हमारे ग्रं‌थ भी कहते है की ब्रह्मांड की उत्पत्ति कुछ नहीं था।
अब आप कहेंगे फिर ईश्वर बीच में कहां से आ गया? क्यों आ गया?
बिलकुल ठीक प्रश्न है। हमारे प्राचीन ग्रंथ और कुछ आधुनिक दार्शनिकों ने इसे बखूबी समझाया है। रसायन विज्ञान में एक अजीबो गरीब वैज्ञानिक प्रक्रिया है कैटेलेटिक एजेंट । ये ऐसे तत्वों का जोड़ है जो खुद किसी क्रिया में हिस्सा नहीं लेता लेकिन फिर भी इनके बिना कोई क्रिया नहीं हो सकती। इसे ऐसे समझें। जल यानी पानी हाईड्रोजन और ऑक्सीजन का जोड़ है। विज्ञान भी कहता है कि हाईड्रोजन और ऑक्सीजन के अलावा पानी में और कुछ नहीं है। यानी जल एक रसायनिक पदार्थ है जिसका रसायनिक सूत्र H2O है। यानी हाईड्रोजन के दो अणु और आक्सीजन के एक अणु से मिलकर पानी बनता है। लेकिन विज्ञान के विद्यार्थी जानते हैं कि सिर्फ हाईड्रोजन और ऑक्सीजन मिलने से पानी नहीं बनता। उसे पानी बनने के लिए कैटेलेटिक एजेंट की भी जरूरत पड़ती है। हैरत की बात है कि अगर आप हाईड्रोजन और ऑक्सीजन के जोड़ को तोड़ें तो ये केटेलेटिक एजेंट की ऊर्जा आपको कहीं नहीं दिखेगी।  केटेलेटिक एजेंट की मौजूदगी ही उसका रोल उसकी भूमिका है। ये करता कुछ नहीं सिर्फ मौजूद रहता है। ये न हो तो पानी का अस्तित्व भी न हो। ऐसे ही ईश्वर है। वह करता कुछ नहीं सिर्फ मौजूद रहता है। उसके रहने भर से प्रकृति अपना काम करती है। कल ये प्रकृति भी नहीं रहेगी तो वह रहेगा। क्योंकि प्रकृति से पहले भी वह था। उसकी मौजूदगी के बिना यह सृष्टि नहीं चल सकती। इसकी मौजूदगी में सृष्टि खुद ब खुद चलती है।
फिर आप कह सकते हैं कि बस इतना सा ही काम है तो उसका होना क्यों जरूरी है?
ये सवाल उठ सकता है। बेशक ये तार्किक प्रश्न है। इसे ऐसे समझें। हर एक बीज अपने आप में एक ब्रह्मांड है। एक बीज में कितनी आपर संभावनाएं छिपी हैं। दुनिया के सारे पेड़ नष्ट हो जाएं ‌सिर्फ एक बीज पूरे संसार को पेडों से ढक सकता है। वह बीज पेड बनेगा। उस पर फूल और फल आएंगे और उसके साथ आएंगे अन्नत बीज। फिर हर बीज से एक नया पेड़ बनेगा। यह प्रक्रिया जारी रहेगी। आप समझें ईश्वर हर बीज को अंकुरित नहीं कर रहा है। यह वैज्ञानिक प्रक्रिया है। जिसके तहत बीज अंकुरित होते हैं। तो इस हिसाब से सारे बीज अनिवार्य रूप से अंकुरित होने चाहिए। लेकिन नहीं। ऐसा नहीं होता। सिर्फ वही बीज अंकुरित होते हैं जिन्हें ईश्वर चाहता है। बीज के अंकुरण में ईश्वर की मौजूदगी अनिवार्य है। यही ईश्वर की  महत्ता है। ये वाकई एक अबूझ पहेली है। लेकिन दिलचस्प है। ईश्वर की मेरी खोज जारी है। और आपकी?

 संदर्भ ग्रंथ-
कॉसमाालॉजी आफ ‌दि ऋग्वेदा-एच डब्लू वालिस
तैतरीय उपनिषद तृतीय संस्करण चौखम्बा प्रकाशन
आईडिया आफ गॉड -प्रिगिंल, पैटिसन
तर्कदीपिका अथल्ये का द्वितीय संस्करण
Times of Refreshing: A Worship Ministry Devotional By Tom Kraeuter, Gerrit Gustafson, Kent Henry, Bob Kauflin, Patrick Kavanaugh
Man's Fate and God's Choice: An Agenda for Human Transformation-By Bhimeswara Challa