Thursday, 29 October 2020

तकनीक की रेलमपेल


चंद्रभूषण

टेक्नॉलजी की उठापटक के मामले में नब्बे का दशक अद्वितीय समझा जाएगा। कोई चीज आसमान से उतर कर अचानक जमीन पर छा जाती। फिर देखते ही देखते ऐसे गायब होती जैसे गधे के सिर से सींग। इन बदलावों के पीछे हजारों-लाखों परिवारों की बर्बादी की कहानी भी मौजूद होती, लेकिन उस तरफ किसी का ध्यान मुश्किल से ही जा पाता था। 1990 में मैंने दिल्ली में पेजर का चलन शुरू होते देखा था, जो जल्द ही किसी फैशन स्टेटमेंट की शक्ल ले बैठा। टी-शर्ट तब कम लोग पहनते थे। पैंट में खुंसी कमीज, चौड़ी बेल्ट और उस पर सामने दाईं ओर सजा मोटरोला का अल्फा-न्यूमेरिक पेजर। 

महानगरों में किराये पर रहते हुए घूम-फिरकर दिमागी दिहाड़ी मारने वाले पेजरधारी शाम को ठिकाने पर पहुंचते तो उन्हें यह भी पता चल जाता कि उनसे कौन, कहां, किस नंबर पर संपर्क करना चाहता था। नए-नए पीसीओ बूथ भी उसी समय खुले थे, जहां डायल के बजाय बटन वाले फोन पर अगले दिन का प्रोग्राम फिक्स हो जाता था। इस पेजर और पीछे-पीछे पीसीओ बूथ को भी भारतभूमि पर आने और यहां से जाने में बमुश्किल दस साल लगे। इनको और साथ में कैमरा, ट्रांजिस्टर, टेप रिकॉर्डर, जेबी म्यूजिक सिस्टम और ‘डिजिटल डायरी-कैलकुलेटर’ को भी दुनिया से उठा देने का श्रेय जिस एक चीज को जाता है, वह मोबाइल फोन शुरू में एक भद्दी, जेबजलाऊ चीज के रूप में हमारे सामने प्रकट हुआ। 

शायद 1996 की बात है, दो साल पुराने एक प्राइवेट टीवी न्यूज प्रोग्राम ने, जो जल्द ही स्वतंत्र न्यूज चैनल की शक्ल लेने वाला था, ऐसा ही ईंटनुमा एक फोन अपने कामकाज के सिलसिले में महीने भर के लिए मेरे एक मित्र के सुपुर्द कर रखा था। यह चीज अपने पास न होने का हीनताबोध तब किसी में नहीं दिखता था क्योंकि भारी कीमत के चलते तब इसे छापाखाने जैसा कोई संस्थागत संसाधन ही माना जाता था। इसकी इनकमिंग कॉल उस समय 16 रुपये और आउटगोइंग 32 रुपये प्रति मिनट हुआ करती थी! एक और चीज उन दिनों खूब नजर आती थी- वीएचएस, जिसका जीवनकाल मोटे तौर पर 1980 से 1995 तक रहा। 

आम लोग इसे फिल्मों का टेप कहते थे जिसे चलाने के लिए वीसीपी नाम की एक डिवाइस को टीवी से जोड़ना पड़ता था। गांवों में नौटंकी, बिरहा और तमाम लोकनृत्यों को यह बेहूदा चीज अकेले ही निगल गई। मुंबइया सिनेमा इसके खौफ में कुख्यात स्मगलरों का पोसुआ बन गया। बहरहाल, पहले सीडी फिर डीवीडी ने वीएचएस को कुल पन्द्रह साल की उम्र में ही स्वर्गवास मेल पर चढ़ा दिया। लेकिन इन डिस्कों के नए अवतार ब्लू-रे का शुरू में जितना हल्ला था, वह कंप्यूटर, मोबाइल और इंटरनेट की तेज तरक्की के सामने व्यर्थ सिद्ध हुआ। इन भीषण बदलावों ने समाज में बहुतेरे स्मार्ट लोगों को जन्म दिया, लेकिन कुछेक हमारे जैसे कूल डूड भी पैदा किए, जो पॉप टेक्नॉलजी और गैजेट्स को कोई भाव नहीं देते।

Saturday, 17 October 2020

सुपरकंडक्टिविटी से बचेगा संसार

चंद्रभूषण

पिछली सदी में दुनिया की तरक्की जिस हद तक बिजली के दायरे में जारी खोजों पर निर्भर करती थी, कुछ वैसा ही मामला इस सदी में सुपरकंडक्टिविटी के साथ है। सुपरकंडक्टिविटी यानी बिजली का बिना रेजिस्टेंस के गुजर जाना। आम जनजीवन से इसका अनुमान लगाना असम्भव है। आप किसी सुपरकंडक्टिव मटीरियल का एक छल्ला बनाकर उसमें करेंट छोड़ दें। छल्ले में लगातार बिजली दौड़ती रहेगी, बिना किसी सोर्स के। यह वैसा ही है जैसे कोई सड़क इतनी चिकनी हो कि उसपर उतारी गई गाड़ी बिना एक्सिलरेटर दबाए अपनी शुरुआती स्पीड से ही चलती चली जाए।

सुपरकंडक्टिविटी कुछ खास पदार्थों का एक ऐसा भौतिक गुण है, जो बीती एक सदी में ही पकड़ में आया है। इसके होने की बुनियाद को लेकर खोजबीन जारी है। तांबा और चांदी जैसे सुचालकों का रेजिस्टेंस तापमान घटाने पर कम होता जाता है, यह जानकारी पहले से थी। लेकिन डच भौतिकशास्त्री हाइक कैमरलिंग ओन्स ने 1911 में बताया कि हर सुचालक के लिए तापमान की एक खास दहलीज ऐसी होती है, जिसके नीचे जाते ही उसका रेजिस्टेंस अचानक जीरो हो जाता है। 

यह अलग बात है कि इस दहलीज को शुरू में एब्सोल्यूट जीरो से जरा ही ऊपर -270 डिग्री सेंटिग्रेड के आसपास माना जाता था। ऐसा तापमान, जिसे उच्च भौतिकी की प्रयोगशालाओं में ही हासिल किया जा सकता है, वह भी बहुत ज्यादा बिजली खाने वाली भारी मशीनों के जरिये। इधर अच्छी बात यह हुई है कि जैसे-जैसे अत्यंत ऊंचे विभव पर काम करने वाले विद्युत चुंबकों की मांग बढ़ी है, वैसे-वैसे अपेक्षाकृत कम ठंड में भी सुपरकंडक्टिव हो जाने वाले पदार्थ खोजे जाने लगे हैं।

हालिया खबर रूम टेंप्रेचर सुपरकंडक्टिविटी की है। हालांकि इसे अव्यावहारिक स्थितियों में, सामान्य वायुदाब से लाखों गुना दबाव डालकर हासिल किया गया है। फ्यूजन रिएक्टर से लेकर पटरी छोड़कर चलने वाली ट्रेनें और विंड एनर्जी जैसे अक्षय ऊर्जा स्रोत कम खर्चीली सुपरकंडक्टिविटी मांग रहे हैं। रही बात फ्रंटलाइन रिसर्च की तो ज्यादातर क्षेत्रों की तरह चीनी और अमेरिकी इसमें भी बाकियों से बहुत आगे हैं। दुनिया की उम्मीदें उन्हीं पर टिकी हैं क्योंकि ग्लोबल वॉर्मिंग से बचाव का सुपरकंडक्टिविटी के सिवा और कोई रास्ता नहीं है।

Friday, 9 October 2020

फिजिक्स, फिलॉस्फी और पेनरोज का नोबेल

चंद्रभूषण

भौतिकशास्त्रियों के बीच आम धारणा यही रही है कि रॉजर पेनरोज को नोबेल प्राइज कभी नहीं मिलेगा। उनके मित्र स्टीफन हॉकिंग अपने लिए घोषित कर चुके थे कि उन्हें यह पुरस्कार तभी मिल सकता है जब किसी ब्लैक होल से रेडिएशन का होना दर्ज कर लिया जाए। इसकी संभावना अगले हजारों साल में भी नहीं दिख रही, लिहाजा नोबेल मुद्दे पर उन्हें सब्र ही करना पड़ेगा। कमोबेश ऐसी ही स्थिति पेनरोज की भी रही है। गणितज्ञों में भौतिकशास्त्री और भौतिकशास्त्रियों में गणितज्ञ! संयोग कहें कि पिछले तीन-चार वर्षों में नीयर-इन्फ्रारेड टेलिस्कोपों की ताकत बढ़ने और एडैप्टिव ऑप्टिक्स की तकनीक सुधरने से ब्लैक होलों पर सीधे नजर रखना संभव हो गया है। गुरुत्व तरंगों (ग्रैविटेशनल वेव्ज) की मेहरबानी से न्यूट्रॉन स्टार और ब्लैक होल के टकराने जैसी असंभव समझी जाने वाली घटनाएं निरंतर खबरों में रहने लगी हैं। नतीजा यह कि 87 की उम्र में नोबेल का सेहरा पेनरोज के सिर पर सज गया।

इस साल भौतिकी का नोबेल पुरस्कार उनके अलावा राइनहार्ड गेंजेल और एंड्रिया गेज को मिला है। पुरस्कार की आधी राशि रॉजर पेनरोज को 1965 में यह सिद्ध करने के लिए कि थिअरी ऑफ रिलेटिविटी अनिवार्य रूप से ब्लैक होल के सृजन की ओर ले जाती है। कसरत का महत्व इस बात में था कि थिअरी ऑफ रिलेटिविटी के खोजी अल्बर्ट आइंस्टाइन को दिवंगत हुए तब तक दस साल हो चुके थे, और वह अपनी अंतिम सांस तक यही मानते रहे कि ब्लैक होल की धारणा में निश्चय ही कोई झोल है। किसी बिंदु पर हर तरफ से सिर्फ एक ही बल (गुरुत्व) कार्य करे, उसे संतुलित करने वाले सभी बल समाप्त हो जाएं, यह बात तर्क और बुद्धि से परे है। खैर, भौतिकी में सुंदर सिद्धांत लगातार आते रहते हैं लेकिन वजन उन्हें तभी मिलता है, जब वे प्रेक्षणों की कसौटी पर बाकी सिद्धांतों से ज्यादा खरे उतरें। 


पेनरोज को इस कसौटी पर कसने का काम अपनी टीमों और टेलिस्कोपों के साथ हवाई और चिली में सालोंसाल बैठे गेंजेल और गेज ने किया- हमारी आकाशगंगा के केंद्र में अनुमानित ब्लैक होल ‘सैजिटेरियस ए स्टार’ की टोह लेकर। बहरहाल, रॉजर पेनरोज पर बात करना केवल इसलिए जरूरी नहीं है कि उन्हें भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिल गया। यह तो हर साल ही मिलता है और इसके अधिकारी हर बार प्रायः दो या तीन लोग पाए जाते हैं। रॉजर पेनरोज द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद उभरे प्राकृतिक दर्शन के गिने-चुने नामों में एक हैं। उनके काम का दायरा गणित, खगोल विज्ञान, फंडामेंटल फिजिक्स, गणितीय कला और कंप्यूटर साइंस से लेकर मनोविज्ञान को छूता हुआ पदार्थ और चेतना की संधि तक फैला है। और इनमें से किसी भी क्षेत्र में उनकी भूमिका सिर्फ पाला छूकर निकल जाने वाली नहीं है। हर जगह उनकी कोई ऐसी छाप मौजूद है कि उधर से गुजरते हुए आपको उनके द्वारा किए गए बदलावों को नोटिस लेना पड़ता है। 


एक मायने में यह ब्रिटिश गणितज्ञ यूरोप के महान उद्बोधन काल की याद दिलाता है, जिसमें हर कद्दावर चिंतक की एक से अधिक शास्त्रों और भाषाओं में गहरी गति हुआ करती थी। दो साल पहले गुजरे स्टीफन हॉकिंग की रॉजर पेनरोज के साथ अक्सर तुलना की जाती थी, लेकिन काम पर गौर करें तो दोनों का फर्क जगजाहिर है। निजी तौर पर मैंने पेनरोज का नाम सबसे पहले 1989 में पटना में सुना था, जब पॉप्युलर दायरे में उनकी पहली किताब ‘द एंपरर्स न्यू माइंड’ अभी आई ही आई थी। वैज्ञानिक दर्शन में दिलचस्पी रखने वाले नौजवानों का रुझान उस समय स्टीफन हॉकिंग की लोकप्रिय किताब ‘अ ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम’ की तरफ था जो 1988 में आते-आते ही पूरी दुनिया पर छा गई थी। इसकी एक वजह यह भी थी कि सीधे पेपरबैक में आई यह किताब ज्यादा महंगी नहीं थी और साल भर में इसका पाइरेटेड संस्करण भी दिल्ली में दरियागंज से लेकर पटना में गांधी मैदान तक किताबी चोर बाजारों में सहज उपलब्ध होने लगा था। 


लेकिन कानपुर आईआईटी से तुरंत लौटा मेरा मित्र झटपटिया पढ़ाई में बिला शक मुझसे बहुत आगे था और मेरी हॉकिंग चर्चा को उसने तत्काल अपनी पेनरोज चर्चा के नीचे दबोच लिया। बचकानी बातों से आगे चलें तो ‘अ ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम’ भी कोई बहुत आसान किताब नहीं है लेकिन ‘द एंपरर्स न्यू माइंड’ उच्च गणित से गुजर चुके लोगों के लिए भी एक कठिन किताब है। आपको पुरानी धारणाएं बदलने और कोशिश करके नई धारणाओं को समझने, उनको अंगीकार करने के लिए खुद को तैयार रखना होता है। हां, पेनरोज की किताब भी गणित या कंप्यूटर साइंस के छात्रों के लिए नहीं, आम पाठकों के लिए ही है। बस, स्टीफन हॉकिंग की तरह पाठकों पर रहम करने के लिए फॉर्म्यूलों से बचने का कोई आग्रह उनके यहां नहीं है। 


किताब का सार-संक्षेप जैसा कुछ है ही नहीं तो उसे यहां प्रस्तुत करने का सवाल कहां पैदा होता है लेकिन मोटे तौर पर कहें तो यह किताब कंप्यूटर आधारित ज्ञान मीमांसा को खारिज करती है, कि अगर सभी शास्त्रों और गतिविधियों के उचित अल्गॉरिथ्म पर्याप्त शक्ति वाले कंप्यूटरों में फीड किए जा सकें तो सारी समस्याओं का कहीं ज्यादा तेज और सटीक समाधान सहजता से मानव जाति को उपलब्ध होने लगेगा। पेनरोज इस किताब में बाकायदा दो धन दो बराबर चार की तरह सिद्ध करते हैं कि ऐसे सभी समाधान अलग-अलग और मिलकर भी यथार्थ के आसपास नहीं ले जा सकेंगे। यह प्रक्रिया उन्हें चेतना-चिंतन की ओर ले जाती है- दर्शन की प्राचीनतम समस्या के गणितीय आयाम की ओर। पेनरोज से मेरी दूसरी किताबी मुलाकात इसी सिलसिले में अनेस्थीसियोलॉजिस्ट (बेहोशी विज्ञानी) स्टुअर्ट हैमरॉफ के साथ मिलकर लिखी गई उनकी किताब ‘द लार्ज, द स्माल ऐंड द ह्यूमन माइंड’ के कुछ अंशों के अनुवाद के दौरान हुई, जिसमें चेतना को क्वांटम मेकेनिक्स के जरिये समझने की उनकी कोशिश ने हैरान किया था। 


इसकी प्रस्थापनाओं को कई जीव विज्ञानियों ने काटा, लेकिन फिर दोनों पक्षों के बीच कुछ समझदारी भी बनी। आने वाले दशकों में भौतिकी और जीव विज्ञान के संधि स्थल पर होने वाले काम की दिशा शायद यही रहे। लेकिन वैज्ञानिक दायरों में सबसे ज्यादा बात 2016 में आई पेनरोज की किताब ‘फैशन, फेथ ऐंड फैंटसी इन द न्यू फिजिक्स ऑफ द यूनिवर्स’ पर हुई है, जिसमें उन्होंने भौतिकी की बहुचर्चित ‘स्ट्रिंग थिअरी’ को एक निराधार फैशन, ‘क्वांटम मेकेनिक्स’ को उथले स्तर पर गटक ली गई आस्था, और खगोलशास्त्र का एक अनिवार्य घटक समझे जाने वाले ‘कॉस्मिक इन्फ्लेशन’ को एक फैंटसी, कपोल कल्पना करार दिया है। उम्मीद करें कि नए दौर के भौतिकशास्त्री उनकी इन आपत्तियों को गंभीरता से लेंगे।

Monday, 5 October 2020

रेगिस्तानों का आपसी बिरादराना

Chandrabhushan

दुनिया का सबसे बड़ा रेगिस्तान अफ्रीका का सहारा मरुस्थल है, लेकिन यह दुनिया का सबसे पुराना रेगिस्तान नहीं है। सबसे पुराना रेगिस्तान होने का सेहरा मंगोलिया और चीन में पसरे गोबी के अपेक्षाकृत ठंडे मरुस्थल के सिर बंधा है। कार्बन डेटिंग के आधार पर हुई हाल की एक खोज में पाया गया है कि यह मरुस्थल तीन करोड़ साल पुराना है। भारत और पाकिस्तान में फैला थार मरुस्थल इसकी तुलना में तकरीबन आधा ही पुराना है, हालांकि संसार का सबसे बड़ा सब-ट्रॉपिकल मरुस्थल होने का दर्जा इसे ही हासिल है।
दिलचस्प बात यह कि गोबी और थार, दोनों ही रेगिस्तानों के पीछे मुख्य खलनायक की भूमिका हिमालय पर्वत शृंखला ने ही निभाई है, जिसके खुद के बनने की कहानी लगभग साढ़े चार करोड़ साल पुरानी है। अगर खलनायक एक है तो दोनों मरुस्थलों की शुरुआत समय के इतने बड़े अंतर के साथ क्यों हुई? उनका भौगोलिक स्वरूप, उनकी वनस्पतियां, इतिहास में उनकी भूमिका इतनी अलग क्यों है? इसकी मुख्य वजह यह बताई जा रही है कि गोबी मरुस्थल को हिमालय के अलावा दो और खलनायकों का भी सामना करना पड़ा।
अब से दो करोड़ साल पहले धरती तेजी से ठंडी हुई तो उत्तरी ध्रुव का बर्फीला दायरा बहुत बढ़ गया और गोबी क्षेत्र में दक्षिण के साथ-साथ उत्तर से आने वाली नमी भी रुक गई। इसके एक करोड़ साल बाद अल्टाई पर्वत शृंखला बनी तो एक ढक्कन गोबी के पश्चिम में भी जा लगा और नमी का सारा किस्सा ही खत्म हो गया। इसके विपरीत थार क्षेत्र को समुद्र की नजदीकी के चलते बीच-बीच में हरा होने का भी मौका मिलता रहा और दस-बीस हजार वर्षों का ऐसा ही एक छोटा सा वक्फा यहां सिंधु घाटी की सभ्यता के उदय और अस्त का साक्षी बन गया।

Monday, 28 September 2020

गूगल के जन्मदिन पर विशेष

 आओ गूगल को सर्च करें

Top Google Tips


27 सितंबर को गूगल के 22वें जन्मदिन पर स्पेशल


हमें इंटरनेट पर जब भी कुछ सर्च करना होता है तो तुरंत गूगल पर जाते हैं लेकिन क्या कभी हमने गूगल को सर्च किया है? आज गूगल अपना 22वां जन्मदिन मना रहा है। इस मौके पर राजेश भारती बता रहे हैं कि कैसे आप गूगल सर्च का बेहतरीन इस्तेमाल कर सकते हैं। साथ ही जानेंगे गूगल के कुछ खास फीचर्स:


सर्च आसान बनाने वाले टॉप 5 टिप्स

1. सटीक जानकारी के लिए

किसी खास विषय की पूरी जानकारी के लिए उस विषय या वाक्य को कोट्स ('') में टाइप करें।

ऐसे समझें: अगर आपको सिविल सर्विस की ऑनलाइन तैयारी से जुड़ी जानकारी चाहिए तो गूगल सर्च बॉक्स में ''online preparation of civil services exam'' टाइप करें। इसके बाद सिविल सर्विस की ऑनलाइन तैयारी वाले ही रिजल्ट दिखेंगे।


2. अनचाहा रिजल्ट हटाने के लिए

सर्च के दौरान रिजल्ट में किसी खास सब्जेट के बारे में जानकारी नहीं चाहिए तो उस सब्जेक्ट से पहले माइनस (-) लगा दें।

ऐसे समझें: अगर आप फ्लू के बारे में सर्च करना चाहते हैं लेकिन कोरोना या कोविड-19 या स्वाइन फ्लू के बारे में जानकारी नहीं चाहते तो गूगल सर्च में flu -corona -covid-19 -swine टाइप करें। अब जो भी रिजल्ट आएगा उनमें दूसरे फ्लू की जानकारी होगी, कोरोना या स्वाइन फ्लू की नहीं। इसी तरह आप दिल्ली के बारे में जानना चाहते हैं लेकिन दिल्ली की बारिश के बारे में नहीं तो आपको गूगल सर्च में Delhi -rain टाइप करना होगा।


3. अधूरी से पूरी जानकारी के लिए

अगर आपको किसी वाक्य के कुछ शब्द नहीं पता या आधी-अधूरी जानकारी है तो उन शब्दों के बिना ऐस्टरिस्क (*) लगाकर बाकी का वाक्य लिख दें। सही रिजल्ट आपके सामने होगा। ऐस्टरिस्क (*) को हम स्टार का चिह्न भी कह देते हैं।

ऐसे समझें: अगर आप गूगल सर्च के जरिए जानना चाहते हैं कि डायमंड से महंगी चीजें क्या-क्या हैं तो आपको *costlier than diamond टाइप करना होगा।


4. PDF फाइल के लिए

किसी खास विषय की PDF फाइल चाहते हैं तो गूगल सर्च में विषय और फिर filetype:PDF टाइप करना होगा।

ऐसे समझें: अगर भारत के संविधान से जुड़ी कोई जानकारी PDF में चाहिए तो constitution of india filetype:PDF टाइप करें।


5. सही जगह जानने के लिए

अगर कहीं घूमने का प्लान बना रहे हैं और यह नहीं पता कि वहां या आसपास कौन-कौन-सी चीजें देखने लायक हैं तो गूगल सर्च में उस जगह का नाम लिखकर स्पेस दें और फिर attractions टाइप कर दें।

ऐसे समझें: मान लें कि आपने नैनीताल घूमने का प्लान बनाया है और उसके आसपास की घूमने या जाने लायक जगह नहीं पता। ऐसे में गूगल सर्च में nainital attractions टाइप करें। नैनीताल के आसपास की जगहों के बारे में पूरी जानकारी तुरंत मिल जाएगी।


Google Docs: तैयार करें किसी भी प्रकार का डॉक्युमेंट, किसी के भी साथ करें शेयर


अगर कोई डॉक्युमेंट तैयार करना चाहते हैं तो इसकी सुविधा भी गूगल देता है। यह है गूगल डॉक्स यानी गूगल डॉक्युमेंट्स। इसके इस्तेमाल के लिए अलग से एमएस ऑफिस की जरूरत नहीं है। सिर्फ जीमेल आईडी होनी जरूरी है। इस पर डॉक्युमेंट्स तैयार कर किसी भी ईमेल आईडी पर शेयर कर सकते हैं। गूगल डॉक्स का इस्तेमाल ऐसे करें:


डेस्कटॉप या लैपटॉप पर

- जीमेल अकाउंट में लॉगइन करें। राइट साइड में टॉप पर 9 डॉट स्क्वेर शेप में दिखेंगे। इन पर क्लिक करें।

- एक विंडो खुलेगी जिसमें अपने अकाउंट समेत 12 चीजें दिखेंगी। इनके आगे और भी ऑप्शन हैं जिनके लिए स्क्रॉल करें। आगे Docs नाम की ऐप्लिकेशन पर क्लिक करें।

- आप नए टैब पर पहुंच जाएंगे जो Docs का होगा।

- पहली बार Docs ऐप्लिकेशन खोल रहे हैं तो स्क्रीन पर Welcome to google docs दिखेगा। इस स्क्रीन के ऊपर राइट कोने में क्रॉस के निशान पर क्लिक करें। अब आप Docs के पेज पर हैं।

- पेज के लेफ्ट साइड में टॉप पर तीन छोटी समानांतर लाइनें हैं, वहां क्लिक करें। अब Docs, Sheets, Slides, Forms, Settings, Help & Feedback और Drive के लिंक दिखेंगे। Docs माइक्रोसॉफ्ट के MS Word जैसा, Sheets एक्सेल शीट की तरह और Slides पावर पॉइंट प्रेजन्टेशन (PPT) जैसा है।

- डॉक्युमेंट बनाना है तो Docs पर क्लिक करें। अब जो पेज खुलेगा, उसके लेफ्ट साइट में एक ब्लैंक डॉक्युमेंट है जिसके बीच कलरफुल प्लस का निशान दिखेगा। ब्लैंक डॉक्युमेंट खोलने के लिए प्लस के निशान पर क्लिक करें या टेम्पलेट का इस्तेमाल कर सकते हैं।

- अब डॉक्युमेंट में टाइप कर सकते हैं। मान लें कि आपने ब्लैंक डॉक्युमेंट खोला तो इसके ऊपर लेफ्ट साइड में Untitled document लिखा दिखेगा। इस पर क्लिक करके आप अपने डॉक्युमेंट को कुछ भी नाम दे सकते हैं।

- जहां नाम लिखा, उसके नीचे File, Edit, View, Insert आदि ऑप्शन मिलेंगे, जिनका इस्तेमाल करके डॉक्युमेंट को बेहतर तरीके से लिख सकते हैं और उसमें कोई पिक्चर या ग्राफ जोड़ सकते हैं।

- डॉक्युमेंट पूरा होने पर उसी समय या बाद में शेयर कर सकते हैं।

- डॉक्युमेंट बाद में शेयर करने के लिए इसे ओपन करें। इसके राइट साइड में ऊपर कोने में नीले रंग के बॉक्स में Share का ऑप्शन है। शेयर करने के लिए क्लिक करें।

- अब Share with people and groups नाम से एक स्क्रीन खुलेगी। यहां Add people and groups दिखाई देगा। क्लिक करके मनचाही ईमेल आईडी टाइप करें। अब राइट साइड में Editor लिखा दिखेगा यानी जिसके साथ उसे शेयर कर रहे हैं, वह हर चीज को बदल सकता है। अगर आप चाहते हैं कि वह डॉक्युमेंट को सिर्फ पढ़ सके तो जहां Editor लिखा है, वहां क्लिक करें। अब एक छोटी स्क्रीन खुलेगी। उसमें तीन ऑप्शन Viewer, Commenter और Editor दिखाई देंगे। इसमें से Viewer पर क्लिक कर दें।

- अब स्क्रीन के नीचे राइट कॉर्नर में नीले रंग की स्क्रीन में Send लिखा होगा। इस पर क्लिक कर दें। वह फाइल उस शख्स के पास चली जाएगी।


ऐंड्रॉइड स्मार्टफोन पर

- फोन में जीमेल पर आईडी लॉगइन होनी चाहिए।

- अब गूगल प्ले स्टोर से Google Docs ऐप डाउनलोड करें।

- ऐप खोलें। सबसे नीचे राइट कॉर्नर में एक प्लस का निशान दिखेगा। इसपर टैप करें।

- प्लस के निशान पर टैप करते ही दो ऑप्शन Choose template और New document दिखेंगे।

- अगर आपको नया डॉक्युमेंट टेम्पलेट के साथ बनाना है तो Choose template पर टैप करें और जो टेम्पलेट पसंद आए उस पर टैप करके डॉक्युमेंट खोलें। अब नीचे राइट कॉर्नर में पेन के आइकन पर टैप करें और टेम्पलेट में बदलाव कर डॉक्युमेंट तैयार कर लें।

- अगर बिना टेम्पलेट के नया डॉक्युमेंट बनाना है तो New document पर टैप करें।

- जो पेज खुलेगा, उसमें टाइप कर लें। डॉक्युमेंट तैयार है तो ऊपर लेफ्ट कॉर्नर में राइट का निशान देखें और उसे टैप करें। इससे डॉक्युमेंट सेव हो जाएगा।

- अब पेज के ऊपर लेफ्ट कॉर्नर में बने तीर के निशान पर टैप करके वापस Docs के पहले पेज पर आ जाएं। यहां सारे डॉक्युमेंट्स दिखाई देंगे। उनका नाम बदलना है तो डॉक्युमेंट के नीचे राइट साइड में तीन डॉट पर टैप करें। एक नई स्क्रीन आएगी। नीचे Rename के ऑप्शन पर जा सकते हैं।

- डॉक्युमेंट शेयर करने के लिए नीचे राइट कॉर्नर में दिए तीन डॉट पर टैप करें। जो स्क्रीन आएगी उसमें Share के ऑप्शन पर टैप करें और फिर जिसके साथ शेयर करना है उसकी ईमेल आईडी टाइप कर दें। ईमेल आईडी के ठीक नीचे Viewer, Commenter और Editor वाले ऑप्शन में से एक चुनें। अब स्क्रीन के नीचे राइट साइड में तीर का निशान टैप करें। डॉक्युमेंट उस शख्स तक

पहुंच जाएगा।


आईफोन पर

- फोन में जीमेल पर आईडी लॉगइन होनी चाहिए।

- अब ऐप स्टोर से Google Docs ऐप डाउनलोड करें।

- ऐप खोलें। अगर आप पहली बार Docs ऐप्लिकेशन पर क्लिक कर रहे हैं तो 'Welcome to google docs लिखा हुआ दिखेगा। सबसे नीचे राइट कॉर्नर में एक प्लस का निशान दिखेगा। उसे टैप करें।

- प्लस के निशान पर टैप करते ही दो ऑप्शन Choose template और New document दिखेंगे। अगर नया डॉक्युमेंट टेम्पलेट के साथ बनाना है तो Choose template पर टैप करें। अब आपको दिए गए नमूनाें में से कोई अपनी जरूरत का नमूना चुनने के बाद अपना डॉक्युमेंट तैयार कर लें।

- अगर बिना टेम्पलेट के नया डॉक्युमेंट बनाना है तो New document पर टैप करें। इसके बाद जो विंडो खुलेगी, उसमें Untitled document लिखा होगा। यहां डॉक्युमेंट को कोई नाम दे सकते हैं। सीधे क्रिएट ऑप्शन भी सिलेक्ट कर सकते हैं क्योंकि डॉक्युमेंट को बाद में भी Rename कर सकते हैं।

- जो पेज खुलेगा उसमें टाइप कर लें। डॉक्युमेंट तैयार है तो ऊपर लेफ्ट कॉर्नर में राइट के निशान पर टैप करें। इससे डॉक्युमेंट सेव हो जाएगा।

- अब पेज के ऊपर लेफ्ट कॉर्नर में बने तीर के निशान पर टैप करके वापस Docs के पहले पेज पर आ जाएं। यहां आपको सभी डॉक्युमेंट्स दिखाई दे जाएंगे। इनका नाम बदलना है तो हर डॉक्युमेंट के नीचे राइट साइड में तीन डॉट पर टैप करें। एक नई स्क्रीन आएगी जिसमें नीचे की ओर Rename का ऑप्शन टैप करें।

- डॉक्युमेंट को शेयर करने के लिए वापस उन्हीं डॉट्स पर टैप करें। फिर वही ऑप्शन दिखेंगे। Share ऑप्शन पर टैप करें और फिर मनचाहे शख्स की ईमेल आईडी टाइप कर दें। ईमेल आईडी के ठीक नीचे Viewer, Commenter और Editor वाले ऑप्शन में से एक चुनें।

- इसके बाद स्क्रीन पर नीचे लेफ्ट में Add a message और राइट साइड में नीला ट्राइंगल दिखाई देगा। ट्राइंगल पर टैप करें। अब फाइल उस शख्स तक पहुंच जाएगी।


गूगल के ये प्रॉडक्ट भी कम नहीं

Google Meet: इस ऐप के जरिए पर्सनल अकाउंट से 100 लोगों के साथ और G Suite (बिजनेस अकाउंट) के जरिये 250 लोगों के साथ विडियो कॉल से मीटिंग की जा सकती है। इसका इस्तेमाल लैपटॉप या मोबाइल दोनों में किया जा सकता है। यह ऐप पूरी तरह फ्री है। गूगल प्ले स्टोर से डाउनलोड कर सकते हैं।


Google Duo: गूगल के इस ऐप के जरिए एक साथ 32 लोगों से विडियो कॉल कर सकते हैं। यह भी गूगल प्ले स्टोर से ले सकते हैं।


Google Lens: इस ऐप्लिकेशन से हम किसी भी चीज का फोटो खींचकर उसकी जानकारी ले सकते हैं। यही नहीं, फोटो पर लिखे वाक्यों का मनचाही भाषा में अनुवाद भी कर सकते हैं। गूगल लेंस का इस्तेमाल ऐप डाउनलोड करके या गूगल असिस्टेंट के जरिए कर सकते हैं, क्योंकि गूगल असिस्टेंट में भी गूगल लेंस का ऑप्शन मिलता है।


गूगल के जन्मदिन की क्या है सही तारीख

आज गूगल अपना 22वां बर्थडे मना रहा है। गूगल के बर्थडे की तारीख को लेकर भ्रम की स्थिति रही है। गूगल साल 2005 तक अपना जन्मदिन 7 सितंबर को मनाता रहा है। वहीं 2005 के बाद गूगल ने अपना जन्मदिन 8, 26 और 27 सितंबर को मनाया है। पिछले साल भी गूगल ने अपना 21वां जन्मदिन 27 सितंबर को मनाया था। हालांकि इनमें से कोई भी तारीख गूगल के जन्मदिन से जुड़ी नहीं है।

दरअसल, गूगल पर ही मौजूद जानकारी के मुताबिक गूगल की स्थापना 4 सितंबर 1998 को हुई थी लेकिन इस तारीख का इस्तेमाल कभी भी बर्थडे के तौर पर नहीं किया। साल 2013 में गूगल ने माना था कि वह चार अलग-अलग तारीखों पर अपना बर्थडे मनाता आया है लेकिन अब 27 सितंबर को ही हर साल अपना बर्थडे मनाएगा। वह इसलिए क्योंकि गूगल ने अपना पहला डूडल 27 सितंबर 1998 को बनाया था। इसी तारीख को अब गूगल जन्मदिन का जश्न मनाता है।


संडे नवभारत टाइम्स में प्रकाशित 

Monday, 14 September 2020

खोदना है तो झुकना होगा


चंद्रभूषण

ऑस्ट्रेलिया में आदिवासी अधिकारों से जुड़ी एक बड़ी जंग जीत ली गई है। ब्रिटिश-ऑस्ट्रेलियाई मालिकाने वाली संसार की दूसरी सबसे बड़ी माइनिंग कंपनी रियो टिंटो ने आदिवासी आस्था के एक प्रतीक स्थल को तहस-नहस करने को लेकर अपने सीईओ जीन सेबेस्टिएन जाक को कंपनी से निकाल दिया है, साथ ही कंपनी के दो और बड़े अधिकारियों को भी बर्खास्त कर दिया है। आगे के लिए सख्त नसीहत के साथ यह जिल्लत उसे पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में झेलनी पड़ी है, जहां आदिवासियों का प्रभाव भी कुछ खास नहीं है। 

लगभग भारत जितने क्षेत्रफल में लखनऊ से कम आबादी वाला ऑस्ट्रेलिया का यह सबसे बड़ा प्रांत हर साल दुनिया का 32 प्रतिशत लोहा, 11 प्रतिशत अल्युमिनियम और 6 प्रतिशत सोना उपजाता है और इसका ज्यादातर फायदा रियो टिंटो के ही खाते में जाता है। लेकिन 2013 में कुराना और पिनिकुरा कबीलों के एतराज के बावजूद उसने लाल रेगिस्तानी इलाके जूकान खड्ड में खुदाई करने का फैसला किया, क्योंकि वहां उसे काफी अच्छा लौह अयस्क मिलने की उम्मीद थी। 


इस इलाके की कुछ गुफाओं की कार्बन डेटिंग से पता चला है कि यह सतत निवास वाली दुनिया की कुछ सबसे पुरानी जगहों में एक है। 46 हजार साल से इंसानों का आवास बनी इन गुफाओं में चार हजार साल पुरानी एक चोटी भी मिली है, जिसमें कई लोगों के बाल गुंथे हुए हैं। इन बालों के जेनेटिक विश्लेषण से पता चला कि ये कुराना कबीले के ही पूर्वजों के बाल हैं- बिल्कुल अभी के जैसे, पर 4000 साल पुराने! आदिवासी अधिकार कार्यकर्ताओं के दबाव में रियो टिंटो को लिखित में मानना पड़ा है कि आगे से स्थानीय आबादी को भरोसे में लिए बगैर वह कोई खुदाई नहीं करेगी।

Saturday, 25 July 2020

सैटेलाइट से छूटी मिसाइल

चंद्रभूषण
अंतरिक्ष में जारी रूसी गतिविधियों को लेकर अमेरिका इधर काफी डरा हुआ है। 25 नवंबर 2019 को रूस ने अपने जासूसी उपग्रह कॉस्मॉस 2542 को कक्षा में स्थापित किया। अगले महीने, दिसंबर में स्थापित अमेरिकी स्पेस कमान ने इसपर सख्ती से नजर रखी। लेकिन 11 फरवरी 2020 को उसकी ओर से एक विचित्र बयान आया कि इस उपग्रह ने अपने भीतर से एक और उपग्रह निकाल दिया, जिसका नाम कॉस्मॉस 2543 है और ये दोनों मात्र 100 मील की दूरी से एक अमेरिकी जासूसी उपग्रह का पीछा कर रहे हैं।

अमेरिकी हुकूमत ने इसके खिलाफ रूस से एतराज जताया। लेकिन अभी बीती 15 जुलाई को पता चला कि कॉस्मॉस 2543 से निकली कोई तीसरी चीज एक और रूसी उपग्रह के बगल से होकर गुजर गई! अमेरिकी स्पेस कमान ने उसे एंटी-सैटेलाइट मिसाइल कहा और इसे अंतरिक्ष के सैन्यीकरण का नमूना बताया, हालांकि इस चीज ने लक्षित रूसी उपग्रह को नष्ट नहीं किया। रूसियों का कहना है कि वह दूसरे उपग्रह से निकला तीसरा उपग्रह भर है, कोई मिसाइल नहीं।

पिछले दस-बारह सालों में अमेरिका, चीन, भारत और रूस ने जमीन से एंटी-सैटेलाइट मिसाइलों का सफल परीक्षण किया है, लेकिन सैटेलाइट से सैटेलाइट पर मिसाइल छोड़ने का यह पहला मामला है, भले ही घातक हो या न हो। अबतक माना जाता रहा है कि कक्षा में स्थापित होने पर कोई उपग्रह बाकी उपग्रहों से स्थिर दूरी बनाकर एक निश्चित रफ्तार से चलता रहता है। बाद में कचरा बनकर उधर ही घूमता है या धीरे-धीरे नीचे आकर नष्ट हो जाता है। यह पहला मौका है जब उपग्रह द्वारा उपग्रह का पीछा करने, मिसाइल मारने की बात सुनी जा रही है। क्या इसे हम अंतरिक्ष युद्ध की प्रस्तावना समझें?

Sunday, 19 July 2020

संसार की सबसे पुरानी रोटियां


चंद्रभूषण
साढ़े चौदह हजार साल पहले पकी कुछ रोटियों की खुशबू ने अभी इतिहासकारों से ज्यादा वैज्ञानिकों को सम्मोहित कर रखा है। कारण यह कि इतिहासकारों के लिए अभी इस बात को जेहन में अंटाना ही मुश्किल हो रहा है, क्योंकि दुनिया में सबसे पहले कहीं भी खेती होने के जो प्रमाण मिले हैं, उनका समय साढ़े नौ हजार साल पहले से ज्यादा पुराना नहीं है। इसे एक हजार साल और पहले खींच ले जाएं तो भी यही कहना होगा कि ये रोटियां खेती शुरू होने से कम से कम चार हजार साल पहले पकी थीं। यह भला कैसे संभव हुआ, और अगर हुआ भी तो बिना खेती के रोटियां आखिर बनीं किस चीज से।

संसार की सबसे पुरानी सभ्यता तुर्की, सीरिया, जॉर्डन और इजराइल के अर्धचंद्राकार इलाके में दर्ज की गई है, जहां सबसे पहले खेती होने के प्रमाण पाए गए। जिस चूल्हे में इन साढ़े चौदह हजार साल (इंसानी पीढ़ियों में बात करें तो लगभग सात सौ पीढ़ी) पुरानी जली हुई रोटियों के 24 अवशेष पाए गए हैं, वह जॉर्डन की शुबैका-1 साइट में स्थित है। यह जमीन में खुदा हुआ एक पाषाणकालीन चूल्हा है, जिसमें रोटियां पकाते हुए लोग किसी इंसानी हमले, प्राकृतिक आपदा या जानवर के डर से इन्हें अधबीच में ही छोड़कर भाग खड़े हुए होंगे। इनकी उम्र कार्बन डेटिंग के जरिये निकाली गई है।

लेकिन ये अवशेष रोटियों के ही हैं, भुने हुए दानों के नहीं, इसका पता कैसे चला होगा? दरअसल, भुने हुए दानों और रोटियां का रसायनशास्त्र बिल्कुल अलग होता है। रोटियां, यानी पिसे हुए दानों और पानी के गुलगुले मिश्रण का सीधे आग में या भाप में या बीच में तवे जैसा कोई माध्यम रख कर पकाया जाना। इस लिहाज से इस चूल्हे को तंदूर से मिलती-जुलती चीज माना जा सकता है।

एक्स-रे परावर्तन के जरिये ज्ञात हुई केमिस्ट्री चूल्हे में मौजूद अ‌वशेषों को रोटियों जैसी ही किसी चीज से जोड़ पा रही है। इसमें काम आए दाने बाजरा, जई या किसी अतिप्राचीन गेहूं के हो सकते हैं। साथ में कुछ अवशेष आलू या शकरकंदी जैसे किसी कंद वनस्पति के भी हो सकते हैं।

यह इलाका नटूफियन सभ्यता से जोड़कर देखा जाता है, जिसका समय साढ़े बारह हजार साल पहले से लेकर साढ़े नौ हजार साल पहले के बीच का माना जाता रहा है। मानव सभ्यता के उस घुमंतू दौर में इसी जाति ने एक जगह जमकर रहना शुरू किया और यहीं संसार का सबसे पुराना शहर जेरिको बसाया। लेकिन जिस पाषाणकालीन चूल्हे में जली रोटियों के अवशेष पाए गए हैं, वह अगर किसी और अधिक पुरानी सभ्यता से नहीं जुड़ा है तो नटूफियन सभ्यता को निर्धारित आयु से दो हजार साल और पीछे ले जाने का श्रेय उसी को जाएगा।

इन रोटियों के लिए जहां-तहां से जुटाए गए अनाज को पीसकर आटा बनाया गया होगा, इसकी उम्मीद कम है। एक जगह और समय में अनाज की बहुत कम उपलब्धता को देखते हुए चक्की जैसी कोई चीज उस दौर के लिए सुदूर भविष्य की टेक्नॉलजी ही जान पड़ती है। तो क्या कभी रोटियां गीले या नम अनाज को सीधे पत्थरों से कूटकर भी बनाई और पकाई जाती रही होंगी?

अपने जीवन के एक ठीक-ठाक हिस्से में मैंने  घर के पिसे आटे की रोटियां ही खाई हैं। बिजली या डीजल से चलने वाली चक्की शुरू होने के बाद महज पांच-दस सालों में उस दौर को याद करना भी कठिन हो गया। कितनी अच्छी बात है कि एडवांस टेक्नॉलजी के बल पर आज हम साढ़े चौदह हजार साल पुरानी तकनीक से पकी रोटी को भी याद कर पा रहे हैं!

Sunday, 5 July 2020

आम पन्ना नहीं है यह!


आम पन्ना नहीं है यह!
This is special page on MANGOES

गर्मियों के मौसम में सबसे ज्यादा पसंद किया जानेवाला फल है आम। इसे आम और खास, सभी लोग बड़े शौक से खाते हैं। यह हमारी सेहत को दुरुस्त बनाए रखने में मददगार है। अगर आप बहुत ज्यादा और बेवक्त आम खाते हैं तो इससे आपकी सेहत को नुकसान भी पहुंच सकता है। आम से जुड़ी ऐसी ही कुछ जरूरी जानकारियां एक्सपर्ट्स से बात करके बता रही हैं कविता शर्मा

आम पकाने के तरीके
कच्चे आमों को सीधे किसानों से खरीदकर ट्रकों में मंडी पहुंचाया जाता है। वहां से रिटेलर कच्चे आमों की पेटियां खरीद लेता है और बाजार की मांग के हिसाब से आम को पका-पकाकर बेचता रहता है।

1. कैल्शियम कार्बाइड (Calcium Carbide)
भारत में ज्यादातर आम इसी के उपयोग से पकाए जाते हैं। कैल्शियम कार्बाइड (Calcium Carbide) से आम पकाना काफी आसान और सस्ता होता है। कार्बाइड को आम की पेटी में रखकर एक दिन के लिए छोड़ दिया जाता है और अगले ही दिन आम पककर तैयार हो जाते हैं। कार्बाइड सेहत के लिए हानिकारक है। यह फल के अंदर मौजूद नमी के साथ मिलकर एसिटीलीन (Acetylene) गैस बनाता है, जिससे फिर एसिटाइलिड (Acetylide) बनता है। इससे गंभीर बीमारियां हो सकती हैं। फिलहाल एशिया  की सबसे बड़ी मंडी आजादपुर मंडी (दिल्ली) में कार्बाइड की खुली पुड़िया का चलन दो साल से बंद है।

2. चीनी पुड़िया (Ethephon)
आम पकाने के लिए आजकल इथेफोन (Ethephon) का इस्तेमाल किया जाता है। इसे चीन से मंगाया जाता है। यह सफेद रंग का पाउडर सैशे होता है। इस पुड़िया को हल्के गुनगुने पानी में डुबोकर आम की पेटी के बीच में रखकर छोड़ दिया जाता है। इससे निकलने वाली गैस से 18 से 20 घंटे के अंदर आम पककर तैयार हो जाते हैं। हालांकि इस प्रक्रिया में समय-सीमा का ध्यान रखना बेहद जरूरी होता है क्योंकि कम समय में आम कच्चे रह जाएंगे और ज्यादा समय में ज्यादा पकने से उनके गलने की आशंका बढ़ जाती है। अभी इसके बुरे असर के बारे में पता नहीं चला है।

3. राइपनिंग चैंबर
आम को पकाने का सबसे बेहतरीन तरीका राइपनिंग चैंबर का इस्तेमाल है। ‘सफल’ इसी का इस्तेमाल करता है। इसमें आम को बड़े चैंबर में रखकर एथिलीन गैस का कसंट्रेशन पावर 80 से 100 ppm तक रखा जाता है। इस दौरान कमरे का तापमान 18 डिग्री तक होना चाहिए। गैस में आमों को 24 घंटे तक रखा जाता है, फिर गैस बाहर निकालकर 3 दिनों तक उन आमों को यूं ही चैंबर में पड़ा रहने देते हैं। इस दौरान आम पककर तैयार हो जाते हैं। ऐसे पकने वाले आम स्वास्थ्य के लिए बिल्कुल हानिकारक नहीं होते। इस तरीके से पके आमों का स्वाद बेहद लजीज होता है।

4. घर पर पकाएं आम
अगर आप फलों के राजा आम के शौकीन हैं, लेकिन कैल्शियम कार्बाइड से पके आम आपको डराते हैं तो आपके लिए मदर डेयरी हल लेकर आई है। मदर डेयरी के 'सफल' बूथों पर आजकल कच्चे आम की पेटियां मौजूद होती हैं, जिन्हें आप खुद पकाकर मीठा रसीला स्वाद ले सकते हैं। आप अपने इस पसंदीदा अखबार नवभारत टाइम्स की खबरों से कभी-कभार पक भी जाते होंगे।😀 इसी की मदद से आप आम भी पका सकते हैं। सबसे पहले आप आमों को साफ पानी में धोकर सुखा लें। फिर अखबार में एक-एक आम अलग-से अच्छी तरह से लपेटकर सामान्य तापमान पर किसी भी गत्ते के डिब्बे, बर्तन या जार में रख दें। 3 से 5 दिन में कच्चा आम पककर तैयार हो जाएगा, वह भी केमिकल का इस्तेमाल किए बिना। ध्यान रहे कि कमरे का तापमान कम-से-कम 30 डिग्री होना चाहिए। एसी वाले कमरे में इन्हें बिल्कुल न रखें। हालांकि इस प्रोसेस में पूरी पेटी में एक-दो आम खराब भी हो सकते हैं।

बाजार में जब हम आम खरीदने जाते हैं तो अक्सर हमारे मन में सवाल उठता है कि आम मीठा होगा कि नहीं, सही तरह से पका है भी कि नहीं। सवाल यह भी रहता है कि आम को पकाने के जो अलग-अलग तरीके बाजार में उपलब्ध हैं उनकी पहचान आप किस तरह से कर सकते हैं। आइए जानते हैं कि सही तरीके से पके आम की पहचान कैसे की जाए:

ऐसे खरीदें सही आम
-देखें कि आम के ऊपर अम्लीय रस के दाग-धब्बे न हो।
- आम पर किसी रसायन के अलग-अलग सफेद या नीले निशान न हों।
- कई बार आम को इस तरह के केमिकल्स से पकाया जाता है जो हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक होते हैं। अगर आम पर समान रूप से सफेद पाउडर होगा तो वह प्राकृतिक तरीके से पका होगा। हालांकि इसे बहुत बारीकी से चेक करना पड़ेगा, लेकिन आप ऐसा करें क्योंकि हेल्थ के लिए यह बहुत जरूरी है। आम पर अगर केमिकल पाउडर होगा तो वह आम पर असमान रूप से लगा हुआ दिखेगा।
- अमूमन आम को छूकर भी उसके पकने का अंदाजा लगाया जा सकता है। पका हुआ आम थोड़ा सॉफ्ट होता है। अधपका आम कहीं से सॉफ्ट और कहीं से ठोस होगा। जबकि कच्चा आम पूरा ही ठोस होगा।
- एक दूसरा तरीका यह है कि आप आम को बिल्कुल नीचे से अंगूठे से हल्का दबाकर देखें। पका हुआ आम छूने में सॉफ्ट लगेगा। इसके लिए आपको पूरे आम को दबाकर देखने की जरूरत नहीं है।
- राइपनिंग मेथड से पके आमों का रंग एक समान होगा क्योंकि यह एक समान तापमान में पकाए जाते हैं और यह खाने में काफी स्वादिष्ट और दिखने में बेहद खूबसूरत रंग के होते हैं।

पहचानें खतरनाक आम
- आम को कैल्शियम कार्बाइड से पकाया गया है, इसका पता लगाना आसान नहीं है। फिर भी हम कुछ बातों का ध्यान रख सकते हैं:
- आम की ज्यादातर किस्मों के कुदरती पकने का सीजन मई-जून ही होता है। इसलिए इससे पहले बिल्कुल पीले आम कार्बाइड से पके ही हो सकते हैं। अप्रैल महीने में मिलने वाला आम अधिकतर इसी तरह से पकाया जाता है। हो सके तो मई से पहले आम खाने से परहेज करें।
- हर किस्म का आम अपनी खुशबू लिए होता है, लेकिन जबरदस्ती पकाए आम में खुशबू या तो होती नहीं या बहुत कम होती है। आम को सूंघ कर पता लगा सकते हैं।
- प्राकृतिक तरीके से नहीं पकाए गए आम का छिलका तो पूरी तरह पीला होगा लेकिन अंदर से वह पूरी तरह से पका नहीं होगा। इस तरह से पके आम में सूखापन होगा और जूस भी कम होगा।
- अगर पीले आम पर कहीं-कहीं हरे धब्बे या झुर्रियां-सी नजर आएं या काटने पर अंदर कहीं-से लाल, कहीं-से हल्का पीला नजर आए तो समझ जाइए कि आम में घपला है।
- अगर पानी से भरी बाल्टी में डालने पर आम तैरने लगें या ऊपर आ जाएं तो समझें कि केमिकल से पकाए गए हैं।

आम खाने के सही तरीके
...तकि केमिकल से हो सेहत को कम नुकसान
- आमों को नमक मिले गुनगुने पानी में एक-दो घंटे के लिए छोड़ दें।
- किसी बड़े बर्तन में पानी भरकर उसमें 4 चम्मच बेकिंग सोडा डाल दें। 15 मिनट के लिए आम इसमें डुबो दें। अब साफ पानी से धोकर आमों को पोंछ लें।
- एक बर्तन में गर्म पानी भरकर उसमें 2-3 चम्मच हल्दी डाल दें। जब पानी ठंडा हो जाए तो उसमें आम डाल कर घंटा भर रखें। फिर साफ पानी से धोकर खाएं।
- किसी बड़े बर्तन में पानी भरकर उसमें 1 कप सफेद सिरका डाल दें। इसमें आम भिगोकर रखें और साफ पानी से धोकर इस्तेमाल करें।
-आम खाते वक्त  उसका ऊपरवाला हिस्सा मुंह से नहीं, चाकू से काटें और वहां से कुछ बूदें रस निकालने के बाद खाएं।
- छिलके को काटने के बाद आम खाएंगे तो केमिकल का असर काफी कम हो जाएगा।

...ताकि बढ़ न जाए शुगर
आमतौर पर डायबीटीज के मरीजों को मीठी चीजें खाने के लिए मना किया जाता है। आम के सीजन में आम से परहेज रखना उनके लिए थोड़ा मुश्किल हो जाता है। ऐसे में जिन पेशट्ंस का शुगर लेवल थोड़ा कंट्रोल होता है, वे हफ्ते में दो बार एक-एक आम खा सकते हैं। लेकिन इसके साथ ही वे एक्सरसाइज करना न भूलें।

किस टाइम खाना ठीक होगा
टाइप-1 डायबीटीज पेशंट्स आम को एक स्नैक्स की तरह ले सकते हैं। आम को खाने के साथ खाने से परहेज करें। जब भी आम खाएं तो आधी चपाती कम खाएं। इससे आम और चपाती से मिलने वाली कार्बोहाइड्रेट की मात्रा का संतुलन ठीक बना रहेगा। दोपहर में खाने के बाद आप आम खा सकते हैं और ईवनिंग स्नैक्स में भी आम का सेवन किया जा सकता है।
टाइप-2 डायबीटीज के पेशंट्स को आम या मीठे फल नहीं खाने चाहिए।

आम के फायदे
आम में क्या ऐसी खासियत है कि इसे सभी फलों का राजा बना दिया गया है। दरअसल आम स्वादिष्ट होने के साथ-साथ बहुत ही गुणकारी फल है। इसमें मौजूद विटामिंस, बीटा कैरोटीन और फाइबर इसकी गुणवत्ता को और अधिक बढ़ा देते हैं। आइए जानते हैं आम खाने के फायदे:
बढ़ाता है इम्युनिटी
आम एक पोषक फल है। इससे हमारा इम्युनिटी सिस्टम ठीक बना रहता है। कई तरह के रोगों से लड़ने की क्षमता इससे बढ़ती है।
आंखों की रोशनी बढ़ाता है
आम में विटामिन ए की भरपूर मात्रा होने के कारण यह हमारी आंखों के लिए बेहद लाभकारी माना जाता है। तो आप अपने डेली रूटीन में आम को जरूर शामिल करें।
बदहजमी के लिए अच्छा
यदि आप अपच की समस्या से परेशान हैं तो ऐसे में आम आपके लिए काफी मददगार साबित हो सकता है। यह बिना पचे ही अवशोषित होने वाला फल है।
एनर्जी बढ़ाने में सहायक
मीठा खाने के लिए अक्सर मना किया जाता है लेकिन मीठे फलों को खाने से सीधे एनर्जी मिलती है। इससे आपको जल्दी थकान भी महसूस नहीं होगी।

एक दिन में कितने आम खाएं
कितने आम खाना है, यह काफी हद तक आपके रुटीन पर निर्भर करता है। अगर आप बहुत ऐक्टिव नहीं हैं और एक्सरसाइज नहीं करते हैं तो दिन भर में 2 से ज्यादा आम न खाएं। अगर आप ज्यादा आम खाना चाहते हैं तो बाकी चीजें जैसे कि कार्बोहइड्रेट (रोटी, चावल, मैदा, बेसन आदि) कम कर दें। वैसे, अगर कोई बीमारी नहीं है, वजन भी ज्यादा नहीं है और कसरत भी करते हैं तो दिन भर में 3-4 आम तक खा सकते हैं। इससे ज्यादा आम खाना सही नहीं है।

कैसे भी खा सकते हैं
आम को आप खाली पेट या खाने के बाद कैसे भी खा सकते हैं। खाते समय मात्रा का जरूर ध्यान रखें। कहा जाता है न कि अति हर चीज की बुरी होती है। इसीलिए अपनी डाइट का ख्याल रखते हुए आम खाएंगे तो यह आपके लिए फायदेमंद ही होगा।
पानी पी सकते हैं
आम खाने से पहले या बाद में पानी पी सकते हैं कि नहीं इसे लेकर लोगों में बहुत कन्फ्यूजन है। जवाब यह है कि आम खाने से पहले और बाद में, कभी भी आप पानी पी सकते हैं।

आम की प्रचलित किस्में
माना जाता है कि पूरी दुनिया में आमों की 1500 से ज्यादा किस्में हैं, जिनमें 1000 किस्में भारत में उगाई जाती हैं। हर किस्म की अपनी ही अलग पहचान, महक और स्वाद होता है लेकिन उनमें भी कुछ बेहद प्रचलित किस्म हैं, जिन्हें बड़े शौक से खाया जाता है...

अल्फांसो: इस आम को आमों का राजा भी कहा जाता है। इसे मुख्य रूप से महाराष्ट्र में उगाया जाता है। अलग-अलग राज्यों में इसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है। बादामी, गुडू, और कगड़ी हापुस आदि इसी के नाम हैं। यह मीडियम साइज का तिरछापन लिए अंडाकार और संतरी पीला रंग का होता है। इसका गूदा मुलायम और रेशारहित होता है। यह अप्रैल से जून के बीच आता है। मार्केट रेट 150 से 200 रुपये किलो है।

सिंदूरी: यह आम आंध्र प्रदेश की पैदावार है। यह मध्यम आकार का अंडाकार आम है। इस आम का ऊपरी हिस्सा लाल और बाकी हरा रंग का होता है। इसे अप्रैल-मई के महीने में खरीदा जा सकता है। मार्केट रेट 100 से 120 रुपये किलो है।

सफेदा: यह खासतौर से आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु का है। इसे बैंगनपल्ली और बेनिशान नाम से भी जाना जाता है। यह आकार में बड़ा और थोड़ा मोटा होता है। इसका रंग सुनहरा पीला होता है। यह अप्रैल और मई के महीने में आता है। इसे आमतौर से मैंगो शेक बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। मार्केट रेट 75 से 80 रुपये किलो होता है।

तोतापरी: यह मुख्य रूप से आंध्रप्रदेश का है। बाजार में यह मई में आता है। यह आकार में थोड़ा लंबा होता है। इसकी तोते की चोंच जैसी नोक निकली होती है। यह स्वाद में थोड़ा खट्टा होता है। माज़ा, स्लाइस, फ्रूटी आदि ड्रिंक्स बनाने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है। मार्केट रेट 55 रुपये किलो है।

केसर: यह गुजरात की प्रमुख किस्म है। मई के अंत में बाजारों में आसानी से यह उपलब्ध होती है। इसमें गूदा अधिक होता है और इसकी गुठली पतली होती है। खाने में बहुत मीठा और रसदार होता है। मार्केट रेट 50 से 60 रुपये किलो है।

दशहरी: यह यूपी का सबसे मशहूर आम है। यह साइज में मीडियम, लेकिन कुछ लंबा होता है। बिना कार्बाइड या मसाले से पके दशहरी आम का रंग हरा होता है। कैल्शियम कार्बाइड या अन्य किसी रसायन से पके दशहरी आम का रंग हरा और पीला मिक्स होता है। आम की यह किस्म देशभर में सबसे ज्यादा पसंद की जाने वाली किस्म है। यह जून-जुलाई महीने में उपलब्ध होता है। यह खाने में मीठा और स्वाद से भरपूर होता है। मार्केट रेट 70 रुपये किलो है।

लंगड़ा: यह किस्म यूपी-बिहार में खूब पॉपुलर है। मध्य जून से जुलाई मध्य तक यह आता है। यह मीडियम अंडाकार साइज का होता है। इसका रंग हरा होता है और इसमें रेशे कम होते हैं। इसे ज्यादा दिन तक सुरक्षित नहीं रखा जा सकता है। इसका मार्केट रेट 70 रुपये किलो है।

चौसा: यह यूपी की फसल है। मुख्य रूप से जुलाई से अगस्त महीने में आता है। साइज में मीडियम अंडाकार और थोड़ा पतला होता है। इसका रंग पीला होता है। यह बेहद रसदार और मीठा होता है। मार्केट रेट 100 रुपये किलो है।

डिंगा: यह लखनऊ की प्रसिद्ध उपज है। यह आकार में थोड़ा छोटा अंडाकार और गोल्डन सुनहरे रंग का होता है। इस आम को आमतौर पर चूसकर खाया जाता है। जुलाई से अगस्त के बीच यह आता है। खाने में स्वादिष्ट मीठा और रेशेदार होता है। मार्केट रेट 50 रुपये किलो है।

फजली: यह आम सीजन का सबसे अंतिम आम होता है। लोग अगस्त तक इसका स्वाद लेते हैं। आम का सीजन जब खत्म हो जाता है तब यह आता है। मार्केट रेट 80 से 90 रुपये किलो है।

नोट: आम की कीमतें इलाके के हिसाब से कम-ज्यादा हो सकती हैं।

ज्यादा जानकारी......
वेबसाइट
mango.org
यहां से आपको आम की क्वॉलिटी चेक करने से लेकर इससे जुड़ी तमाम जानकारियां मिल सकती हैं।
tarladalal.com
इस वेबसाइट पर आपको आम से बनी सैकड़ों रेसपी मिलेंगी, जिनमें मैंगो कुल्फी, मैंगो श्रीखंड, मैंगो बर्फी, मैंगो जैम और भी ना जाने क्या-क्या हैं।
allrecipes.com
यहां आपको मैंगो लस्सी, मैंगो शर्बत, मैंगो आइसक्रीम और भी ढेर सारी डिश बनाने के तरीके मिलेंगे। 300 से भी ज्यादा व्यंजनों में कई तरह के अचार और चटनी भी हैं।

फेसबुक पेज
Mango Lovers
आम से बनने वाले अलग-अलग तरह के व्यंजन इस फेसबुक पेज पर आपको मिल जाएंगे।

मोबाइल ऐप
Hebbar's Kitchen
इस ऐप में आपको आम से जुड़ी कई तरह की अच्छी डिश बनाने के टिप्स मिल सकते हैं। खासियत यह है कि यहां पर आपको विडियो मिलेंगे और यह ऐप एंड्रॉयड और आईओएस, दोनों के लिए हैं।

यू-ट्यूब चैनल
NishaMadhulika
इस यू-ट्यूब चैनल पर आम से जुड़े ढेर सारे व्यंजन मिलेंगे। शाकाहारी लोगों को यह चैनल खासतौर पर पसंद आएगा। इसी नाम से वेबसाइट भी है।
Sanjeev Kapoor Khazana
शेफ संजीव कपूर के इस चैनल पर आपको मिलेगीं आम की तमाम डिश, जो न सिर्फ खाने में स्वादिष्ट हैं, बल्कि बनाने में आसान भी हैं।

संडे नवभारत टाइम्स में प्रकाशित