Friday, 15 September 2017

बिना हुनर के कैसी इंजीनियरिंग ?

न कौशल न विकास :क्या करें इस डिग्री-डिप्लोमा का
शशांक द्विवेदी
डिप्टी डायरेक्टर , मेवाड़ यूनिवर्सिटी, (राजस्थान )

पिछले दिनों एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि युवाओं में प्रतिभा का विकास होना चाहिए । उन्होंने डिग्री के बजाय योग्यता को महत्त्व देते हुए कहा था कि छात्रों को स्किल डेवलपमेंट पर ध्यान देना होगा । आज देश में बड़ी संख्या में इंजीनियर पढ़ लिख कर निकल तो रहें है लेकिन उनमे स्किलकी बहुत बड़ी कमी है इसी वजह से लाखों इंजीनियर हर साल बेरोजगारी का दंश झेल रहें है । इंडस्ट्री की जरुरत के हिसाब से उन्हें काम नहीं आता । एक रिपोर्ट के अनुसार हर साल देश में लाखों इंजीनियर बनते है लेकिन उनमें से सिर्फ 15 प्रतिशत को ही अपने काम के अनुरूप नौकरी मिल पाती है बाकी सभी बेरोजगारी का दंश झलने को मजबूर है । इसीलिए देश में इंजीनियरिंग का करियर तेजी से आकर्षण खो रहा है । देश के राष्ट्रीय कौशल विकास निगम के अनुसार सिविल, मैकेनिकल और इलेक्ट्रिक इंजीनियरिंग जैसे कोर सेक्टर के 92 प्रतिशत इंजीनियर और डिप्लोमाधारी रोजगार के लिए प्रशिक्षित नहीं हैं. इस सर्वे ने भारत में उच्च शिक्षा की शर्मनाक तस्वीर पेश की है । यह आंकड़ा चिंता बढ़ाने वाला भी है, क्योंकि स्थिति साल दर साल खराब ही होती जा रही है ।
देश में इंजीनियरिंग को नई सोच और दिशा देने वाले महान इंजीनियर भारत रत्न मोक्षगुण्डम् विश्वेश्वरैया की जयंती 15 सितम्बर को देश में इंजीनियरस डे या अभियंता दिवस के रूप में मनाया जाता है । मैसूर राज्य(वर्तमान कर्नाटक )के निर्माण में अहम भूमिका निभाने वाले मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया अपने समय के सबसे प्रतिभाशाली  इंजीनियर  थे । जिन्होंने बांध और सिंचाई व्यवस्था के लिए नए तरीकों का इजाद किया। उन्होंने आधुनिक भारत में सिंचाई की बेहतर व्यवस्था और नवीनतम तकनीक पर आधारित नदी पर बांध बनाए तथा पनबिजली परियोजना शुरू करने की जमीन तैयार की। सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण की तकनीक में उनके योगदान को भूलाया नहीं जा सकता। आज से लगभग 100 साल पहले जब साधन और तकनीक इतनी ज्यादा उन्नत नहीं थी । विश्वेश्वरैया ने आम आदमी की समस्याओं को सुलझाने के लिए इंजीनियरिंग में कई तरह के इनोवेशन किये और व्यवहारिक तकनीक के माध्यम आम आदमी की जिंदगी को सरल बनाया । असल में इंजीनियर वह नहीं है जो सिर्फ मशीनों के साथ काम करें बल्कि वह है जो किसी भी क्षेत्र में अपने मौलिक विचारों और तकनीक के माध्यम मानवता की भलाई के लिए काम करे ।
देश और समाज के निर्माण में एक इंजीनियर की रचनात्मक भूमिका कैसे होनी चाहिए इस बात को विश्वेश्वरैया के प्रेरणादायक जीवन गाथा से जाना और समझा जा सकता है । विश्वेश्वरैया न केवल एक कुशल इंजीनियर थे  बल्कि देश के सर्वश्रेष्ठ योजना शिल्पी, शिक्षाविद् और अर्थशास्त्री भी थे । तत्कालीन सोवियत संघ (रूस) द्वारा वर्ष 1928 में तैयार पंचवर्षीय योजना से भी आठ वर्ष पहले 1920 में अपनी पुस्तक रिकंस्ट्रक्टिंग इंडिया में उन्होंने भारत में पंचवर्षीय योजना की परिकल्पना प्रस्तुत कर दिया था । 1935 में उनकी एक  पुस्तक प्लान्ड इकॉनामी फॉर इंडिया देश के विकास के लिए योजना बनाने के लिए बहुत महत्वपूर्ण थी । वह 98 वर्ष की उम्र में भी उन्होंने प्लानिंग पर एक पुस्तक लिखा । ईमानदारी और कर्त्तव्य के प्रति अपनी वचनबध्दता उनके जीवन की सबसे बड़ी विशेषता थी।  बंगलुरू स्थित हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स की स्थापना में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही ।
आज से कई दशक पहले गाँधी जी ने कहा था की देश की समग्र उन्नति और आर्थिक विकास के लिए तकनीकी शिक्षा का गुणवत्ता पूर्ण होना बहुत जरुरी है उन्होंने इसको प्रभावी बनाने के  लिए कहा था की कॉलेज में हाफ-हाफ सिस्टम होना चाहिए मतलब की आधे समय में किताबी ज्ञान दिया जाये और आधे समय में उसी ज्ञान का व्यावहारिक पक्ष बताकर उसका प्रयोग सामान्य जिन्दगी में कराया जाये । भारत में तो गाँधी जी की बाते ज्यादा सुनी नहीं गई पर चीन ने उनके इस प्रयोग को पूरी तरह से अपनाया  और आज स्तिथि यह है की चीन  उतपादन की दृष्टि में चीन भारत से बहुत आगे है ,भारतीय बाजार चीनी सामानों से भरे पड़े है दिवाली ,रक्षाबंधन हमारे देश के प्रमुख त्यौहार है पर आज बाजार में सबसे ज्यादा पटाखे और राखिया चीन की ही बनी हुई मिलती है ।
वास्तव में हम अपने ज्ञान को बहुत ज्यादा व्यावहारिक नहीं बना पाए है । नंबर होड़ युक्त शिक्षा प्रणाली ने मौलिकता को ख़त्म कर दिया । इस तरह की मूल्यांकन और परीक्षा प्रणाली नई सोच और मौलिकता के लिए ठीक नहीं है। आज तकनीकी शिक्षा में खासतौर पर इंजीनियरिंग में इनोवेशन की जरुरत है सिर्फ रटें रटाए ज्ञान की बदौलत हम विकसित राष्ट्र बनने का सपना साकार नहीं कर सकते । देश की आतंरिक और बाहरी चुनौतियों से निपटने के लिए हमें दूरगामी रणनीति बनानी पड़ेगी । क्योंकि भारत  पिछले छह दशक के दौरान अपनी अधिकांश प्रौद्योगीकीय जरूरतों की पूर्ति दूसरे देशों से कर रहा है । हमारे घरेलू उद्योगों ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी जोरदार उपस्थिति दर्ज करायी है इसलिए देश  की जरूरतों को पूरा करने के लिए भारतीय उद्योग के कौशल संसाधनों एवं प्रतिभाओं का बेहतर उपयोग करना जरुरी है । क्योंकि आयातित टेक्नोलॉजी  पर हम  ब्लैकमेल का शिकार भी हो सकते  है।  
स्वतंत्रता प्राप्ति के समय हमारा इंजीनियरिंग व प्रौद्योगिकी ढाँचा न तो विकसित देशों जैसा मजबूत था और न ही संगठित। इसके बावजूद   प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हमने काफी कम समय में बड़ी उपलब्धियाँ हासिल की । स्वतंत्रता के बाद भारत का प्रयास यही रहा है कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के माध्यम से आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन भी लाया जाए। जिससे देश के जीवन स्तर में संरचनात्मक सुधार हो सके । इस उद्देश्य में  हम कुछ  हद तक सफल भी रहें है लेकिन अभी भी इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकी को आम जन मानस से पूरी तरह से जोड़ नहीं पाये है ।
आज देश को विश्वेसरैया जैसे इंजीनियरों की जरुरत है जो देश को एक नई दिशा दिखा सके क्योंकि आज के आधुनिक विश्व में विज्ञान,तकनीक और इंजीनियरिंग के क्रमबद्ध विकास के बिना विकसित राष्ट्र का सपना नहीं सच किया जा सकता । इसके लिए देश में इंजीनियरिंग की पढाई को और आकर्षक ,व्यवहारिक और रोजगारपरक बनाने की जरुरत है ।

(लेखक शशांक द्विवेदी चितौड़गढ, राजस्थान में मेवाड़ यूनिवर्सिटी में डिप्टी डायरेक्टर हैं और  टेक्निकल टूडे पत्रिका के संपादक हैं। 12 सालों से विज्ञान विषय पर लिखते हुए विज्ञान और तकनीक पर केन्द्रित विज्ञानपीडिया डॉट कॉम के संचालक है  । एबीपी न्यूज द्वारा विज्ञान लेखन के लिए सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर का सम्मान हासिल कर चुके शशांक को विज्ञान संचार से जुड़ी देश की कई संस्थाओं ने भी राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया है। वे देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लगातार लिख रहे हैं।)

Thursday, 14 September 2017

हिंदी कैसे बनेगी विज्ञान की भाषा ?

हिंदी दिवस पर विशेष 
शशांक द्विवेदी
डिप्टी डायरेक्टर, मेवाड़ यूनिवर्सिटी   
पिछले दिनों केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. हषर्षवर्धन ने कहा कि  विज्ञान में हिंदी के उपयोग को अगर सार्थक बनाना है तो वैज्ञानिक सोच को आत्मसात करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि विज्ञान की जानकारी आम आदमी तक पहुंचे, ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए।   उनकी बात से सहमत हुआ जा सकता है लेकिन मूल समस्या यह है कि बुनियादी या प्राथमिक स्तर पर हिंदी में पढाया जाने वाला विज्ञान माध्यमिक शिक्षा के बाद स्नातक स्तर पर किसी काम में नहीं आता क्योकि तब भाषा बदलती है बीएससी ,एमएससी ,इंजीनियरिंग सहित सभी प्रोफ़ेशनल कोर्सेस की भाषा अंग्रेजी है ऐसे में देश के करोड़ों छात्र अपने बुनियादी विज्ञान के ज्ञान का प्रयोग अपनी भाषा में नहीं कर पाते माध्यमिक शिक्षा के बाद सारी पढाई अंग्रेजी में होने की वजह से वो हीनभावना के शिकार भी होते है साथ में उनकी विज्ञान  में खुद की कोई सोच विकसित नहीं हो पाती या सीधे शब्दों में कहें तो बच्चें अंग्रेजी से सीधे तौर पर सहज नहीं हो पाते जिससे कि उनमें मौलिकता की कमी हो जाती है बहुत बार तो हिंदी माध्यम के छात्र इंजीनियरिंग आदि प्रोफेशनल कोर्सेस में पिछड़ते चले जाते है जबकि वही छात्र माध्यमिक स्तर पर पढाई में बहुत अच्छे होते है कुलमिलाकर ये स्तिथि बदलनी चाहिए ,छत्रो को अपनी भाषा में शिक्षा प्राप्त करने की आजादी होनी चाहिए बिना इसके वो हमेशा हीनभावना महसूस करेगा .माध्यमिक स्तर के बाद विज्ञान,इंजीनियरिंग ,मेडिकल और प्रोफ़ेशनल कोर्सेस की भाषा हिंदी में होनी चाहिए तभी विज्ञान का सही मायनों में प्रसार होगा हिंदी में विज्ञान को शैक्षणिक स्तर के साथ साथ रोजगार की भाषा भी बनाना होगा कहने का मतलब यह है कि अगर कोई छात्र हिंदी माध्यम से विज्ञान या इंजीनियरिंग आदि की पढाई करें तो उसे बाजार भी सपोर्ट करें जिससे कि उसे नौकरी मिल सके उसके साथ रोजगार के मामले में भेदभाव नहीं होना चाहिए सरकार को इसके लिए एक व्यवस्था विकसित करनी होगी तभी हिंदी विज्ञानं की भाषा बन पायेगा इसी तरह हिंदी में विज्ञान संचार  को भी रोजगारपरक बनाते हुए बढ़ावा देना होगा  
इस सबके बीच एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि हिंदी में विज्ञान या विज्ञान संचार की स्तिथि देश में क्या है ?क्या इस पर भी सरकार ने या हिंदी चिंतकों ने कभी ध्यान दिया है । देश में हिंदी में विज्ञान संचार बहुत उन्नत स्तिथि में नहीं है ।  इसकी सबसे बड़ी वजह शायद हिंदी में विज्ञान संचार रोजी -रोटी से नहीं जुड़ पाया है । इसमें कैरियर की दृष्टि से भी पूर्णकालिक रूप में बहुत ज्यादा अवसर नहीं है । देश के अधिकांश हिंदी अखबारों और इलेक्ट्रानिक चैनलों में विज्ञान पत्रकार नहीं है । न ही इन माध्यमों में निकट भविष्य में विज्ञान पत्रकारों के लिए कोई संभावनाएं दिखती है । देश में इस समय जितना भी विज्ञान लेखन और पत्रकारिता हो रही है अधिकांशतया पार्ट टाइम हो रही है । वही लोग ज्यादातर विज्ञान लेखन कर रहें है जो हिंदी के उत्थान के लिए सरकारी विभागों से जुड़े है या वो लोग जो पद और पैसे से सम्रद्धिशाली है । कहने का मतलब आर्थिक रूप से संपन्न व्यक्ति ही हिंदी में विज्ञान लेखन कर रहें है ।कुछ सार्थक करने का प्रयास स्वतंत्र और पूर्णकालिक रूप से हिंदी में विज्ञान लेखन के लिए बहुत कम अवसर है । इसलिए हिंदी में विज्ञान संचार या पत्रकारिता को सबसे पहले  आकर्षक रोजगार से जोड़ना पड़ेगा तभी यह उन्नत दिशा में पहुचेगा ।
देश में विज्ञान ,अनुसंधान और शोध  से सम्बंधित कुछ ही खबरे  मीडिया में जगह बना रही है सिर्फ विज्ञान और तकनीक से जुड़ी सनसनीखेज खबरें ही खबरिया चैनलों में जगह बना पाती है । जबकि देश की प्रगति और आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा यह क्षेत्र देश में पूरी तरह से उपेक्षित है । वैज्ञानिक जागरूकता और जन सशक्तीकरण के परिप्रेक्ष्य में हिंदी में विज्ञान पत्रकारिता की महत्वरपूर्ण भूमिका हो सकती है। हिंदी में विज्ञान संचार और स्थानीय स्तर पर देशी वैज्ञानिकों की जानकारी देने वाले लेखन का सामने आना जरूरी है। अमेरिका में दस परिवारों में से एक परिवार जरूर अपनी भाषा में वैज्ञानिक पत्रिका पढ़ता है। अमेरिका में वैज्ञानिक लेख नहीं लिखते। विज्ञान पत्रकार ही लेख लिखते हैं। हमारे देश में  वैज्ञानिक पत्रकारिकता अभी भी शैशव अवस्था में है ,इसे ज्यादा प्रोत्साहन की जरुरत है तभी स्वस्थ व जनहितकारी विज्ञान पत्रकारिता हर माध्यम से आम लोगों के सामने आएगी।
हमारे देश में 3500 से भी अधिक हिन्दी विज्ञान लेखकों का विशाल समुदाय है परन्तु प्रतिबद्ध लेखक मुश्किल से 5 या 7 प्रतिशत ही होंगे। इन लेखकों ने विज्ञान के विविध विषयों और विधाओं में 8000 से भी अधिक पुस्तकें लिखी हैं परन्तु इनमें से अधिकतर पुस्तकों में गुणवत्ता का अभाव है। मौलिक लेखन कम हुआ है और संदर्भ ग्रंथ न के बराबर हैं। लोकप्रिय विज्ञान साहित्य सृजन में प्रगति अवश्य हुई है परन्तु सरल , सुबोध विज्ञान साहित्य जो जन साधारण की समझ में आ सके कम लिखा गया है। इंटरनेट पर आज हिन्दी में विज्ञान सामग्री अति सीमित है। विश्वविद्यालयों तथा राष्ट्रीय वैज्ञानिक संस्थानों में कार्यरत विषय विशेषज्ञ अपने आलेख शोधपत्र अथवा पुस्तकें अंग्रेजी में लिखते हैं। वह हिन्दी अथवा अन्य भारतीय भाषा में विज्ञान लेखन में रुचि नहीं रखते। संभवत भाषागत कठिनाई तथा वैज्ञानिक समाज की घोर उपेक्षा उन्हें आगे नहीं आने देती। हिन्दी में विज्ञान विषयक शोधपत्रों आलेखों को प्रस्तुत करने के लिए अंग्रेजी के समकक्ष विज्ञान मंचों की स्थापना की आवश्यकता है। अकादमिक संस्थाओं के माध्यम से भी विज्ञान लेखन को दृढ़ता देने के प्रयास सुनिश्चित करने होंगे। किसी शोधार्थी का मूल्यांकन सिर्फ उसके शोध प्रबंध से प्रकाशित शोधपत्रों से ही नहीं, बल्कि विज्ञान को आम जनता के बीच पंहुचाने में सफलता के पैमाने पर रखकर भी होना चाहिए ।

कुलमिलाकर सही मायनों में हिंदी विज्ञान की भाषा तभी हो सकती है जब उसे  शैक्षणिक स्तर पर ठीक से बढ़ावा मिलें मतलब स्नातक और शोध स्तर पर हिंदी के काम को स्वीकार्यता हो । साथ में हिंदी में विज्ञान संचार रोजगारपरक भी हो,दुसरी बात अपनी भाषा में विज्ञान को लोगों तक पहुँचाने के लिए वैज्ञानिक समाज को भी आगे आना होगा ।संचार माध्यमों के साथ-साथ वैज्ञानिकों की भी जिम्मेदारी है कि वो हिंदी में विज्ञान की सामग्री   को लोगों तक पहुंचाने में सहयोग करें। इंटरनेट और डिजीटल क्रांति के जरिए हिंदी सहित क्षेत्रीय भाषाओं में विज्ञान को और प्रभावी बनाया जा सकता है। इसके लिये हमें हर स्तर पर सकारात्मक और सार्थक कदम उठाने होंगे ।

सबसे बुरे दौर में उच्च शिक्षा

शशांक द्विवेदी
डिप्टी डायरेक्टर, मेवाड़ यूनिवर्सिटी ,राजस्थान 
नवभारत टाइम्स 
देश में इस समय उच्च और तकनीकी शिक्षा के बुरे दिन आ चुके हैं । पिछले पाँच साल से उच्च शिक्षा का समूचा ढांचा चरमरा रहा था लेकिन किसी सरकार ने इसके लिए कुछ नहीं किया ।अब ये पूरी तरह से ध्वस्त हो चुका है। पिछले दिनों उच्च और तकनीकी शिक्षा की सबसे बड़ी नियामक संस्था ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन (एआईसीटीई) ने तय किया है कि जिन इंजिनियरिंग कॉलेजों में 30 प्रतिशत से कम दाखिले हो रहे हैं, उन्हें बंद किया जाएगा । फ़िलहाल देश भर में एआईसीटीई से संबद्ध 10,361 इंजीनियरिंग कॉलेज है जिनमें कुल 3,701,366 सीटें है(लगभ 37 लाख ) , अब इनमें करीब 27 लाख सीटें खाली हैं । जोकि बहुत बड़ा और भयावह आँकड़ा है , देश में उच्च शिक्षा के हालात इतने  बदतर हो चुके हैं कि एआईसीटीई ने तय किया है कि जिन कॉलेजों में पिछले 5 सालों में 30 पर्सेंट से कम सीटों पर दाखिले हुए हैं, उन्हें अगले सत्र से बंद किया जाएगा ।
पिछले दिनों रिलीज हुई फिल्म बाबुमोशय बंदूखबाज में एक डायलाग है कि आदमी की जिन्दगी में उसका किया हुआ जरुर उसके सामने आता है । ये डायलाग देश में उच्च शिक्षा की सबसे बड़ी नियामक संस्था एआईसीटीई पर पूरी तरह से फिट बैठता है , क्योंकि पहले तो इन्होने बिना ठीक से जांचे परखे ,गुणवत्ता की चिंता किये बगैर देश में हजारों हजार इंजीनियरिंग कॉलेज खोलनें के लाइसेंस दिए और बिना माँग आपूर्ति ,रोजगार का विश्लेषण किये बगैर 37 लाख सीटें कर दी ,अब जब उनमें से 27 लाख सीटें खाली रह गई तो इनके हाथ पैर फूल गए । तो यहाँ मुख्य सवाल तो एआईसीटीई से ही है कि इन्होने पहले कुछ क्यों नहीं किया ? जब तकनीकी शिक्षा का आधारभूत ढांचा चरमरा रहा था तब एआईसीटीई ने कोई ठोस कदम क्यों नही उठाया ? आखिर इतने बड़े पैमाने पर सीट खाली रहनें से और कालेजों के बंद होनें का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर ही तो पड़ेगा ।
ये बात सही है की देश में उच्च और तकनीकी शिक्षा की बुनियाद 2010 से ही हिलने लगी थी और 2014 तक लगभग 10 लाख सीटें खाली थी। लेकिन तीन साल पहले मोदी सरकार आने के बाद ये उम्मीद जगी थी की उच्च शिक्षा के लिए कुछ बेहतर होगा लेकिन धरातल पर कुछ खास नही हुआ । मतलब सिर्फ सरकार बदली लेकिन नीतियाँ लगभग वही रही और अब हालात ऐसे हो गएँ हैं  जिन्हें संभालना बहुत मुश्किल दिख रहा है । सरकार का सारा ध्यान हिंदुत्व के अजेंडे पर लगा रहा दुसरी तरफ देश में उच्च शिक्षा तेजी से अपनी साख खोती चली गयी ।  इस सत्र में तो ऐसे हालात हो गए कि आईआईटीज में भी छात्रों में रुचि कम होती दिखाई दे रही है। आईआईटीज  में 2017-18 सत्र के लिए 121 सीटें खाली रह गई हैं। पिछले चार साल में आईआईटी में इतनी सीटें कभी खाली नहीं रहीं। आईआईटी के निदेशक मानते हैं कि सीटें खाली रहने का कारण छात्रों को मनपसंद विकल्प न मिलना है।
देश में स्किल इंडिया के इतने हल्ले के बावजूद देश में अनस्किल्ड लोगों की संख्या और बेरोजगारी तेजी से बड़ी है इसी वजह से हाल में हुए केंद्रीय मंत्रिमंडल के विस्तार में कौशल विकास मंत्री को उनके नान परफार्मेंस की वजह से हटाया गया । रुढी को उनके पद से हटाया गया लेकिन इससे क्या फर्क पड़ता है कि कौन आया और कौन गया क्योंकि जब धरातल पर नीतियों का क्रियांवयन ही नहीं होगा तो योजनायें बनाने से क्या हासिल होगा ।
देश में फ़िलहाल जो माहौल है उसे देखकर तो यही लगता है कि उच्च शिक्षा के जो हालात है वो अभी और बदतर होंगें । हालत यह हो गयी है कि इंजीनियरिंग की जिस डिग्री को हासिल करना कभी नौकरी की गारंटी और पारिवारिक प्रतिष्ठा की बात मानी जाती थी, आज वह डिग्री छात्रों और अभिभावकों के लिए एक ऐसा बोझ बनती जा रही है जिसे न तो केवल घर पर रख सकते हैं और न ही फेंक सकते हैं। देश में यही हालत प्रबंधन के स्नातकों की है ,एसोचैम का ताजा सर्वे बता रहा है कि देश के शीर्ष 20 प्रबंधन संस्थानों को छोड़ कर अन्य हजारों संस्थानों से निकले केवल 7 फीसदी छात्र ही नौकरी पानें के काबिल हैं । यह आंकड़ा चिंता बढ़ानेवाला इसलिए भी है, क्योंकि स्थिति साल-दर-साल सुधरने की बजाय लगातार खराब ही होती जा रही है। 2007 में किये गये ऐसे सर्वे में 25 फीसदी, जबकि 2012 में 21 फीसदी एमबीए डिग्रीधारियों को नौकरी देने के काबिल माना गया था।
नियामक संस्थाओं और केंद्र सरकार का सारा ध्यान सिर्फ कुछ सरकारी संस्थानों पर ही रहता है । जबकि देश भर के  90 प्रतिशत युवा निजी विश्वविद्यालयों और संस्थानों से शिक्षा लेकर निकलते है और सीधी सी बात है अगर इन  90  प्रतिशत छात्रों पर कोई संकट होगा तो वो पूरे देश की अर्थव्यवस्था के साथ साथ सामाजिक स्तिथि को भी नुकसान पहुंचाएगा । सिर्फ  आईआईटी और आईआईएम की बदौलत विकसित भारत का सपना साकार नहीं हो सकता ।
कौशल विकास की जरुरत
असल में हमनें यह बात समझनें में बहुत देर कर दी की  अकादमिक शिक्षा की तरह ही बाजार की मांग के मुताबिक उच्च गुणवत्ता वाली स्किल की शिक्षा देनी भी जरूरी है। एशिया की आर्थिक महाशिक्त दक्षिण कोरिया ने स्किल डेवलपमेंट के मामले में चमत्कार कर दिखाया है और उसके चौंधिया देने वाले विकास के पीछे स्किल डेवलपमेंट का सबसे महत्वपूर्ण योगदान है। इस मामले में उसने जर्मनी को भी पीछे छोड़ दिया है। 1950 में दक्षिण कोरिया की विकास दर हमसे बेहतर नहीं थी। लेकिन इसके बादउसने स्किल विकास में निवेश करना शुरू किया। यही वजह है कि 1980 तक वह भारी उद्योगों का हब बन गया। उसके 95 प्रतिशत मजदूर स्किल्ड हैं या वोकेशनलीट्रेंड हैं, जबकि भारत में यह आंक़डा तीन प्रतिशत है। ऐसी हालत में भारत कैसे आर्थिक महाशिक्त बन सकता है ?
देश में इंजीनियरिंग और प्रबंधन कॉलेज लगातार बढ़े लेकिन उनकी गुणवत्ता नही बढीं , न ही इंडस्ट्री की बदलती जरूरतों के मुताबिक उनका पाठ्यक्रम अपग्रेड किया गया । हमें यह बात अच्छी तरह से समझनी होगी की “”स्किल इंडिया”” के बिना “”मेक इन इंडिया”” का सपना भी नहीं पूरा हो सकता । इसलिए इस दिशा में अब ठोस और समयबद्ध प्रयास करनें होंगे। इतनी बड़ी युवा आबादी से अधिकतम लाभ लेने के लिए भारत को उन्हें स्किल बनाना ही होगा जिससे युवाओं को रोजगार व आमदनी के पर्याप्त अवसर मिल सकें । सीधी सी बात है जब छात्र स्किल्ड होगें तो उन्हें रोजगार मिलेगा तभी उच्च और तकनीकी शिक्षा में व्याप्त मौजूदा संकट दूर हो पायेगा ।
मांग और पूर्ति में संतुलन बनाना जरूरी
आज यूजीसी और एआइसीटीइ से यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि क्या उनके पास प्रबंधन और इंजीनियरिंग डिग्रीधारियों की वर्तमान और भावी मांग के संबंध में कोई तथ्यपरक व विश्वसनीय आंकड़ा है?
क्या भविष्य में नये संस्थान, कॉलेज व यूनिवर्सिटियां खोलते समय में यह ध्यान में रखा जायेगा कि एमबीए, इंजीनियरिंग, फार्मेसी, मेडिकल और डेंटल शिक्षा के कोर्सों की मांग और पूर्ति में संतुलन बना रहे? इसका विश्लेषण केंद्रीय मानव संसाधन विकास  मंत्रालय और देश की प्रमुख नियामक संस्थाओ को ठीक ढंग से करना पड़ेगा क्योंकि देश में उच्च शिक्षा को लेकर जो मौजूदा संकट है उसका एक प्रमुख कारण नियामक संथाओं का प्रभावी ढंग से काम न कर पाना भी है । अगर इन्होने शुरुआत में ही उच्च शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित की होती तो आज देश उच्च शिक्षा के संकट को नही झेल रहा होता।
(लेखक शशांक द्विवेदी राजस्थान के मेवाड़ यूनिवर्सिटी में डिप्टी डायरेक्टर हैं और  टेक्निकल टूडे पत्रिका के संपादक हैं)


Friday, 5 May 2017

3 तरीकों से सुरक्षित बनाएं अपना ऑनलाइन ट्रांजेक्शन

रोहित कुमार  
नोटबंदी के बाद भले ही कैशलेस को बढ़ावा मिल रहा हो मगर ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं है जो ऑनलाइन ट्रांजेक्शन यानी ऑनलाइन लेनदेन से घबारते हैं। अक्सर ऐसे यूजर को चिंता सताती है कि कहीं कोई उनके एटीएम कार्ड की जानकारी सेव करके बैंक खाते में सेंध न लगा दे। ध्यान रहे कि साइबर संसार में कुछ एप और सॉफ्टवेयर ऐसे हैं जो कंप्यूटर पर टाइप होने वाले सभी बटन की जानकारी का डाटा तैयार करते हैं। इससे वह आपके कार्ड की जानकारी सेव कर सकते हैं। इस समस्या से बचने के लिए यूजर ऑन स्क्रीन कीबोर्ड और इकॉग्निटो टैब का प्रयोग कर सकते हैं। आइए जानते हैं कि कैसे अपने ऑनलाइन लेनदेन को सुरक्षित बनाया जा सकता है
ऐसे करें प्रयोग करें ऑन स्क्रीन कीबोर्ड
अपने कंप्यूटर को छोड़ किसी अन्य व्यक्ति का कंप्यूटर या लैपटॉप इस्तेमाल कर रहे हैं तो बैंक अकाउंट में लॉग-इन करके बिलों का ऑनलाइन भुगतान करते वक्त ऑनस्क्रीन कीबोर्ड यानी कि वर्चुअल कीबोर्ड का प्रयोग करना चाहिए। इस कीबोर्ड को कंप्यूटर पर खोलने के लिए उसके स्टार्ट मेन्यूमें जाएं और वहां दिए प्रोग्रामपर क्लिक करें। इससे आपको वर्चुअल कीबोर्डका विकल्प मिलेगा। कीबोर्ड खोजने में दिक्कत आए तो सर्च बार में on screen keyboard टाइप करके भी देख सकते हैं। वर्चुअल कीबोर्ड पर माउस से क्लिक करके अक्षर और अंकों को टाइप किया जा सकता है। इसमें भी सेटिंग का विकल्प है जिसको यूजर अपने मनमुताबिक बदल सकते हैं।
मुफ्त वाई-फाई के लालच से बचें
मुफ्त में मिलने वाले इंटरनेट की लालच में यूजर अक्सर सार्वजनिक स्थलों, होटल-रेस्तरां, रेलवे स्टेशन, एयरपोर्ट आदि पर मिलने वाली वाई-फाई सुविधा का इस्तेमाल करते हैं। हालांकि कई मामलों में ऐसे वाई-फाई कनेक्शन असुरक्षित भी होते हैं। मिसाल के तौर पर रेलवे स्टेशन पर जो मुफ्त वाई-फाई है वह जरूरी नहीं है रेलवे मंत्रालय की ओर दिया जा रहा हो। कई बार हैकर उस यूजरनेम से जुड़ा हुआ एक नाम तैयार कर लेते हैं और उससे मुफ्त वाई-फाई देकर फोन से जरूरी जानकारी चुरा लेते हैं या लेनदेन के दौरान वह आपके बैंक खाते पर सेंध भी लगा सकते हैं। इनसे बचने के लिए मोबाइल फोन में एंटी-वायरस सॉफ्टवेयर और ऑपरेटिंग सिस्टम को समय-समय पर अपडेट करते रहें।
इनकॉग्निटो टैब भी है बेहतर विकल्प ऑनलाइन
बैंकिंग या ट्रांजेक्शन के लिए आप गूगल क्रोम ब्राउजर में इनकॉग्निटो और इंटरनेट एक्सप्लोरर में प्राइवेट ब्राउजिंग मोड का सहारा ले सकते हैं। क्रोम यूजर इनकॉग्निटो टैब को खोलने के लिए स्क्रीन पर ऊपर के हिस्से में दाईं ओर दिए तीन लाइनों वाले विकल्प पर क्लिक करें और इनकॉग्निटो टैब पर जाएं। इस टैब पर की गई ब्राउजिंग हिस्ट्री, ब्राउजर बंद करते ही डिलीट हो जाती है। सिस्टम दोबारा खोलने पर यह दिखाई नहीं देती। यानी हिस्ट्री के आधार पर कोई आपके अकाउंट में सेंध लगाने की कोशिश नहीं कर सकता। इनकॉग्निटो टैब की पहचान एक टॉपी और चश्मा लगाए एक व्यक्ति होता है जो ऊपर बाईं ओर दिखाई देता है।


अनूठे चंद्र मिशन की तैयारी में चीन

शशांक द्विवेदी
डिप्टी डायरेक्टर, मेवाड़ यूनिवर्सिटी, राजस्थान  
चंद्रमा की दूसरी ओर यान उतारने वाला पहला देश होगा चीन 
हाल में ही चीन ने अपने महत्वाकांक्षी अंतरिक्ष कार्यक्रम के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि वह वर्ष 2018 में चंद्रमा की दूसरी ओर की थाह लेने के लिए यान भेजेगा और वहां यान को सुगमता से उतारने वाला वह दुनिया का पहला देश बन जाएगा। 'चीन स्पेस एक्टिविटीज इन 2016' शीर्षक से जारी किए गए श्वेत पत्र में कहा गया है कि अगले पांच वर्षों में चीन अपनी चंद्र अन्वेषण परियोजना को जारी रखेगा। इससे पहले चीन चंद्रमा पर रोवर उतार चुका है लेकिन अब चंद्रमा की दूसरी ओर की थाह लेना चाहता है, जहां अभी तक कोई भी अन्य देश नहीं पहुंच सका है। श्वेत पत्र के मुताबिक इस अन्वेषण योजना में तीन रणनीतिक कदम उठाने हैं, वह हैं 'कक्षा में स्थापित करना, सतह पर उतारना और लौटना।' चेंज-5 चंद्र अन्वेषण वर्ष 2017 के अंत तक शुरू होगी।
आखिर क्या है चांद की दूसरी तरफ?
यह अभी तक एक अनसुलझा रहस्य है कि चाँद के दुसरी तरफ क्या है ? कुछ हॉलीवुड फिल्मों में दिखाया गया है कि चांद के अंधेरे हिस्से में परग्रही रहते हैं। कुछ का मानना है कि यहां नाजियों का सीक्रेट आर्मी बेस है। लेकिन सच तो यह है कि पृथ्वी से चंद्रमा की दूसरी तरफ का महज 18 प्रतिशत हिस्सा दिखाई देता है। वहां क्या है, कैसा वातावरण है, यह अभी तक रहस्य है, इसके बारे में वैज्ञानिक ज्यादा नहीं जानते। इसलिए इसे चंद्रमा का अंधेरा हिस्सा भी कहते हैं। चांद का एक ही हिस्सा क्यों दिखता है? इसे समझने के लिए हम एक ऐसे बच्चे का उदाहरण लेते हैं, जिसने एक रस्सी से पत्थर बांध रखा है और वह गोल घूम रहा है।   उसके साथ पत्थर भी घूमता है, लेकिन पत्थर का वही हिस्सा उसके सामने रहता है जो रस्सी से बंधा है।  धरती के ग्रैविटेशन फोर्स के कारण चंद्रमा की बंधे रहने जैसी स्थिति होती है ठीक रस्सी से बंधे पत्थर जैसी। लिहाजा, धरती से चंद्रमा का एक ही हिस्सा दिखाई देता है।

चंद्रमा पर अभियान 

चंद्रमा पर सबसे पहले 13 सितंबर, 1959 को सोवियत संघ का अंतरिक्ष यान लूना 2 उतरा।  उसके बाद अमेरिका के अपोलो 11 के यात्री 20 जुलाई 1969 को सबसे पहले चंद्रमा पर उतरे।  1969 से 1972 तक अमेरिका ने छह बार मानव को चंद्रमा पर उतारा। अभी तक अमेरिका अकेला देश है जिसने चंद्रमा पर मनुष्य को उतारा। दिसंबर 1972 में उसने ये अभियान बंद कर दिया।
भारत का चंद्रयान

भारत की स्पेस एजेंसी इसरो ने 14 नवंबर 2008 को मून इम्पैक्ट प्रोब को चंद्रमा पर उतारा। यह चंद्रयान-1 से चंद्रमा पर छोड़ा गया था।  चीन ने चांग ई-1 को एक मार्च 2009 को चंद्रमा पर उतारा। चांग ई-3 एक दिसंबर 2013 को भेजा गया और 14 दिसंबर 2013 को चंद्रमा पर उतरा।
अंतरिक्ष में चीन की बढ़त
 चीन 2030 तक अंतरिक्ष में सबसे शक्तिशाली देश बनना चाहता है। बीजिंग ने अगले चार साल में मंगल ग्रह को छूने का भी एलान किया है। चीन अगले एक दशक में अंतरिक्ष रिसर्च के क्षेत्र में सबसे आगे निकलना चाहता है। पिछले दिनों चीन के नेशनल स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन के उपप्रमुख वु यानहुआ ने बीजिंग में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इसकी जानकारी दी थी । वु के मुताबिक 2020 में मंगल पर पहली खोजी मशीन भेजी जाएगी। यह मशीन मंगल का चक्कर काटेगी और आंकड़े जुटाएगी। इसके बाद मंगल की सतह के नमूने लेने के लिए एक और मशीन लाल ग्रह पर भेजी जाएगी। मंगल के अलावा गुरु और उसके चंद्रमा के लिए भी खोजी मिशन भेजा जाएगा।
वु ने कहा, "कुल मिलाकर हमारा लक्ष्य है कि 2030 तक चीन दुनिया की बहुत बड़ी अंतरिक्ष शक्ति बन जाए।" चीन ने अंतरिक्ष अभियान देर से शुरू किये थे ,1970 के दशक तक उसने कोई सैटेलाइट नहीं भेजी. जबकि इसी दौरान अमेरिका, रूस और भारत भी अतंरिक्ष अभियान में आगे बढ़ते गए लेकिन बीते तीन दशकों में चीन ने अंतरिक्ष अभियान में अरबों डॉलर झोंके हैं। बीजिंग ने रिसर्च और ट्रेनिंग पर भी खासा ध्यान दिया है यही वजह है कि 2003 में चीन ने चंद्रमा पर अपना रोवर भेज दिया और वहां अपनी लैब बना दी। चीन अब 20 टन भारी अंतरिक्ष स्टेशन भी बनाना चाह रहा है। अमेरिका और रूस के बाद चीन तीसरा ऐसा देश बन चुका है जिसने पांच लोगों को अंतरिक्ष में भेजा है।

सच्चाई यह है कि चीन अंतरिक्ष में अपनी ताकत बढ़ाना चाहता है। वह 2017 में पहला अंतरिक्ष कार्गो शिप थियानचोऊ अंतरिक्ष प्रयोगशाला के पास भेजना चाहता है। इससे प्रयोगशाला को ईंधन और अन्य सामान आपूर्ति की जा सकेगी। अंतरिक्ष कार्यक्रमों के मामले में चीन, भारत से आगे है,उसका बजट भी हमसे बड़ा है। चीन का अंतरिक्ष कार्यक्रम एक ओर युद्ध-तकनीक से जुड़ा है, वहीं वह असैनिक तकनीक का विकास भी कर रहा है। भारत के मुकाबले चीन के पास ज्यादा भार ले जानेवाले रॉकेट हैं और उसका अपना स्पेस स्टेशन तैयार हो रहा है। वह अंतरिक्ष में मानव-युक्त उड़ान संचालित कर चुका है और जल्दी ही चंद्रमा की सतह पर भी अपना यात्री उतार देगा। अंतरिक्ष में उपग्रहों को नष्ट करने की तकनीक का परीक्षण कर उसने सैनिक इस्तेमाल में महारत भी हासिल कर ली है।

चीन का अंतरिक्ष कार्यक्रमों पर भारी खर्च
चीन अंतरिक्ष कार्यक्रमों पर अरबों डॉलर खर्च कर रहा है ,साथ ही चीन दूसरे देशों की अंतरिक्ष एजेंसियों के साथ मिलकर काम करने की इच्छा भी बार बार जता चुका है लेकिन अमेरिकी संसद ने 2011 से अपनी अंतरिक्ष एजेंसी नासा को चीन के साथ काम करने से रोक रखा है। अमेरिका इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा मानता है। लेकिन बीते सालों में नासा को भी बड़े पैमाने पर बजट कटौती का सामना करना पड़ा है।
अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने अंतरिक्ष अभियानों में तेजी लाने के संकेत दिये हैं अंतरिक्ष विशेषज्ञ रॉबर्ट वॉकर और पीटर नैवारो के मुताबिक, "कम निवेश से अमेरिकी सरकार के अंतरिक्ष कार्यक्रमों पर असर पड़ा है, वहीं चीन और रूस सैन्य रणनीति को ध्यान में रखते हुए बहुत तेजी से आगे निकलते जा रहे हैं" दोनों अंतरिक्ष में अमेरिका के दबदबे को खत्म करना चाह रहे हैं
पिछले दिनों चीनी राष्ट्रपति ने कहा कि अंतरिक्ष कार्यक्रम को देश की राष्ट्रीय सुरक्षा में मददगार होना चाहिए। देश को अंतरिक्ष शक्ति बनाने पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि चीन नागरिक इरादों के लिए एंटी सैटेलाइट मिसाइलों का परीक्षण कर चुका है। वहीं चीनी अंतरिक्ष एजेंसी के उपप्रमुख वु यानहुआ ने अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम को शांतिपूर्ण बता रहें है लेकिन माना जा रहा है कि ट्रंप के सत्ता में आने के बाद चीन और अमेरिका तीखी होड़ छिड़ेगी और इसका असर अंतरिक्ष से लेकर समंदर तक हर जगह नजर आएगा।

कुलमिलाकर अमेरिका चांद पर इंसान को उतारने वाला अकेला देश भले ही हो, चीन ने भी इस मामले में अमेरिका को टक्कर देने की तैयारी में कमर कस ली है। चीन की अंतरिक्ष एजेंसी ने कहा है कि वे चांद पर 2018 तक अपने देश का झंडा लगाने की तैयारी कर चुका है। यही नहीं चीन ने इस परियोजना में अमेरिका को भी पीछे छोड़ने की तैयारी कर ली है।

Saturday, 27 August 2016

पृथ्वी से मिलता जुलता नया ग्रह मिला

वैज्ञानिकों ने पृथ्वी जैसे एक ग्रह का पता लगाया है। इस ग्रह का तापमान सही है इसलिए इसके सतह पर पानी भी तरल अवस्था में ठहर सकता है। इसे देखते हुए यह ग्रह हमारे सौरमंडल के बाहर यह ऐसी जगह हो सकती है जहां जीवन मुमकिन हो।
खगोलविदों के एक अंतरराष्ट्रीय दल को इस ग्रह के साफ साफ सबूत मिले हैं जो करीब चार प्रकाशवर्ष की दूरी पर स्थित है। यह ग्रह प्रॉक्सिमा सेंताउरी तारे की परिक्रमा करता है। यह तारा हमारे सोलर सिस्टम में सबसे नजदीक है। इस नए संसार को प्रॉक्सिमा बी नाम दिया गया है और यह 11 दिन में अपनी परिक्रमा पूरी करता है। साथ ही इसका तापमान इसकी सतह पर तरल अवस्था में जल के ठहरने के लिहाज से मुनासिह है। रिसर्चरों ने कहा है कि यह पर्वतों की दुनिया पृथ्वी से थोड़ी बड़ी है और हमारा सबसे नजदीक बिना गैर-सौरीय ग्रह है। इस अध्ययन का प्रकाशन नेचरनाम के जर्नल में हुआ है।


Tuesday, 23 August 2016

आसमान में बढ़ी हमारी ताकत

स्वदेशी तेजस लड़ाकू विमान वायुसेना में शामिल
शशांक द्विवेदी
डिप्टी डायरेक्टर (रिसर्च), मेवाड़ यूनिवर्सिटी,चितौड़गढ़ ,राजस्थान   
आख़िरकार लंबे इंतजार और तमाम तरह के सफ़ल परीक्षण के बाद स्वदेशी तकनीक से निर्मित हल्के लड़ाकू विमान तेजसको वायुसेना के बेड़े में शामिल कर लिया गया । तेजस को बेंगलुरु में एक भव्य समारोह में वायुसेना की 45वीं स्क्वैड्रन फ्लाइंग डैगर्समें शामिल किया गया ।इस विमान को पिछले तीन दशक से डिजाइन एवं विकसित किया जा रहा था। इन विमानों के बेड़े का नाम 'फ्लाइंग डैगर्स फोर्टीफाइव' है। वायुसेना के इतिहास में यह पहला मौका होगा जब देश में निर्मित किसी युद्धक विमान की स्क्वाड्रन का सपना साकार हुआ है । वायुसेना के दक्षिणी वायु कमान के एयर ऑफिसर कमांडिंग-इन चीफ एयर मार्शल जसबीर वालिया की मौजूदगी में एयरक्राफ्ट सिस्टम टेस्टिंग एस्टेबलिशमेंट (एएसटीई) में एलसीए स्क्वाड्रन को शामिल किया गया। तेजस 1350 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से आसमान का सीना चीर सकते हैं, जो दुनिया के सबसे बेहतरीन फाइटर प्लेन को टक्कर देने की हैसियत रखता है । सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) ने इन लड़ाकू विमान का निर्माण किया है. इसके साथ ही स्वदेशी लड़ाकू विमान का हिंदुस्तान का सपना 30 साल की मेहनत के बाद पूरा हो गया है ।तेजस की तुलना फ्रांस के 'मिराज 2000', अमेरिका के एफ-16 और स्वीडन के ग्रि‍पेन से की जा रही है।
फिलहाल तो तेजस दो साल बेंगलुरु में रहेंगे और फिर इन्हें तमिलनाडु के सुलूर भेज दिया जाएगा। बीते 17 मई को तेजस में अपनी पहली उड़ान भरने वाले एयर चीफ मार्शल अरूप राहा ने विमान को बल में शामिल करने के लिए अच्छा बताया था। वायुसेना ने कहा है कि इस वित्तीय वर्ष में कुल छह विमान और अगले वित्तीय वर्ष में करीब आठ विमान शामिल करने की योजना है। तेजस अगले साल वायुसेना की लड़ाकू योजना में नजर आएगा और इसे फ्रंटफुट वाले एयरबेस पर भी तैनात किया जाएगा । तेजस के सभी स्क्वाड्रन में कुल 20 विमान शामिल किए जाएंगे, जिसमें चार आरक्षित रहेंगे। ये हल्के लड़ाकू विमान (लाइट कॉम्बेट एयरक्राफ्ट एलसीए) पुराने पड़ चुके मिग-21 की जगह लेंगे।
यहां तक की नई 45-स्कावड्रन को वही फ्लाईंग डैगर्सनाम दिया गया है जो मिग-21 का था । अगले साल यानि 2017 तक इस स्कावड्रन में करीब 16 लड़ाकू विमान शामिल हो जायेंगे. वायुसेना एचएएल से 120 तेजस खरीदेगा। विशेषज्ञों के मुताबिक, एक तेजस की कीमत करीब ढाई सौ करोड़ रूपये है।
तेजस प्रोजेक्ट में देरी
1983 मे शुरू हुए इस प्रोजेक्ट की कीमत करीब 560 करोड़ रुपये थी, लेकिन अब इसकी कीमत 10,398 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। पिछले साल अप्रैल में सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में इस स्वदेशी विमान की देरी पर कई सवाल खड़े किए थे। रिपोर्ट में प्रोजेक्ट के 20 साल पीछे चलने, ट्रैनर एयरक्राफ्ट ना होने, प्रोजेक्ट की बढ़ती कीमत और विमान की तकनीक और फाइनल ऑपरेशनल क्लीयरंस पर भी सवाल खड़े किए थे। देश में ही लड़ाकू विमान बनाने की अवधारणा 1970 के दशक में रखी गयी थी, वहीं इस पर वास्तविक काम 80 के दशक में ही शुरू हो पाया और पहली उड़ान जनवरी 2001 में भरी गयी। देश में स्वदेशी तकनीक से एयरक्राफ्ट निर्माण की गति भी अभी बहुत धीमी है जिसे बढ़ानी पड़ेगी तभी हम रक्षा क्षेत्र में वाह्य चुनौतियों का सामना कर पायेंगे । लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एलसीए) प्रोग्राम को मैनेज करने के लिए 1984  में एलडीए (एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी) बनाई गई थी। एलसीए ने पहली उड़ान 4 जनवरी 2001 को भरी थी। अब तक यह कुल 3184 बार उड़ान भर चुका है।
एक अंतरराष्‍ट्रीय सुरक्षा और रक्षा विशेषज्ञ की रिपोर्ट के अनुसार अस्‍त व्‍यस्‍त खरीद व विकास कार्यक्रम के चलते भारतीय वायुसेना को चीन और पाकिस्‍तान से बड़ा खतरा है। विशेषज्ञ एश्‍ले टेलिस की रिपोर्ट ट्रबल्‍स, दे कम इन बटालियंस: द मेनिफेस्‍ट ट्रेवेल्‍स ऑफ द इंडियन एयर फोर्समें वायुसेना की वर्तमान स्थिति का पैना लेखा जोखा पेश किया गया है। इसमें भारतीय वायुसेना की पड़ोसी देशों का सामना करने की तैयारी का भी जायजा दिया गया है। इसके अनुसार कुछ पैमानों पर भारत की हवाई क्षमता अपर्याप्‍त है जिसे तत्काल बढानें की जरुरत है । भारत के रक्षा बजट में कई गंभीर रूकावटें हैं। इसके चलते खरीद में देरी होती है। साथ ही स्वदेशी तकनीक से एयरक्राफ्ट निर्माण की गति भी अभी बहुत धीमी है जिसे बढ़ानी पड़ेगी तभी हम रक्षा क्षेत्र में वाह्य चुनौतियों का सामना कर पायेंगे ।
क्यों खास है तेजस
तेजस एकल ईंजन वाला हल्के वजन वाला बेहद फुर्तीला और बहुत सी भूमिकाओं को निभाने में सक्षम सुपरसोनिक लड़ाकू विमान है। इसे पहले लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट के नाम से जाना जाता था जिसे पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपई ने तेजस नाम दिया था।  तेजस 4.5 जेनरेशन का विमान है, जो कि हर ऊंचाई पर सुपरसोनिक क्षमता से लैस हैं। आज किसी भी फाइटर जेट को डेवलप करने के लिए स्ट्रेंथ एक अहम प्वाइंट होता है। इसका मकसद है कोई एयरक्राफ्ट राडार क्रॉस सेक्शन यानी आरसीएस में कम से कम हो। एयरक्राफ्ट के हर वैरिएंट में यह फीचर दिया गया है। तेजस जैसे हल्के लड़ाकू विमान पर भारतीय वायुसेना के पायलटों का प्रशिक्षण पहले ही शुरू हो चुका है । तेजस का इंटीग्रेटेड तकनीक हवा में बहुत देर तक एक ही स्थान पर स्थिर रह सकता है। वहीं इसमें मल्टी मोड राडार लगा है, जबकि यह सुपरसोनिक रफ़्तार 1920 किलोमीटर प्रति घंटे की  अधिकतम रफ़्तार से उड़ने की क्षमता है। आज के दौर में तेजस दुनिया का सबसे हल्का और छोटा लड़ाकू विमान है जो अपनी रफ़्तार और सटीकता के लिए जाना जाता है। इस विमान के निर्माण में कम्पोजिट मटेरियल का इस्तेमाल किया गया है, जिसके वजह से है अपनी अधिकतम रफ़्तार तक पहुंच जाता है।तेजस का कॉकपिट शीशे का बना है, जिससे पायलट को रियल टाइम डेटा मिलता है। साथ ही इसमें सभी प्रकार की मिसाइल से हमला करने की क्षमता है। तेजस 50 हजार फीट की ऊंचाई तक उड़ान भर सकता है। तेजस के विंग्स 8.20 मीटर चौड़े , लंबाई 13.20 मीटर, ऊंचाई 4.40 मीटर और वजन 6560 किलोग्राम है। विशेषज्ञों के अनुसार तेजस पाकिस्तान और चीन द्वारा संयुक्त रूप से विकसित और निर्मित जेएफ-17 विमान की तुलना में बेहतर है क्योंकि इसका अधिकांश निर्माण ऐसे मिश्रण से हुआ है जो इसे हल्का और बहुत दक्ष बनाता है। इसके तीक्ष्ण गोला-बारूद और बम इसे सटीक तरीके से निशाना साधने में सक्षम बनाते हैं। तेजस विमान मिग-21 विमानों की जगह लेगा और इसे हवा से हवा में प्रहार और जमीनी हमले के लिए इस्तेमाल में लाया जाएगा और यह सुखोई 30 एमकेआई जैसे बड़े लड़ाकू विमानों के लिए भी सहायक हो सकता है।
दुनियाँ के बेहतरीन लड़ाकू विमानों में है तेजस
सिंगल और डबल सीटर लड़ाकू विमानों की पांचवीं पीढ़ी के विमानों में भारत द्वारा विकसित और भारत में ही निर्मित तेजस पूरी तरह से दुनिया के सर्वश्रेष्ठ लड़ाकू विमानों में शामिल हो चुका है।स्टील्थ तकनीक से लैस ये विमान भारत की हर जरूरत को पूरा करेगा, जो भारत की वायुसेना और जलसेना दोनों की ही उपयोग के लिए है। ये हल्का विमान है और बेहद कम समय में ही दुश्मन पर हमला करने में सक्षम है। तेजस की चकाचौंध से अभी से पूरी दुनिया थर्रा रही है । भारतीय वायुसेना पूरी तरह से सिर्फ तेजस के ही 3 स्वॉइड्रन बनाना चाहती है, जो दुनिया के किसी भी लक्ष्य को वेधने में सक्षम है। तेजस कम उंचाई में उड़ान भरकर महज 15 मिनट में पाकिस्तान के किसी भी शहर को तहस नहस कर सकता है। इसपर परमाणु हथियारों की तैनाती भी की जाएगी। तेजस की सबसे बड़ी खूबी उसका किसी भी मौसम और किसी भी समय उड़ान भरकर हमला करने की है, जिससे भारत पड़ोसी देशों पर किसी भी युद्ध के शुरुआती चरण में भी बढ़त बना लेगा। इसे किसी भी मिसाइल से नहीं गिराया जा सकेगा।

कुलमिलाकर स्वदेशी तकनीक से बने तेजस के भारतीय वायुसेना में शामिल होनें से उसे और मजबूती मिलेगी । साथ ही एशियाई देशों के बीच एक सैन्य शक्ति संतुलन भी स्थापित हो पायेगा
(लेखक शशांक द्विवेदी चितौड़गढ, राजस्थाइन में मेवाड़ यूनिवर्सिटी में डिप्टी डायरेक्टर (रिसर्च) है और  टेक्निकल टूडे पत्रिका के संपादक हैं। 12 सालों से विज्ञान विषय पर लिखते हुए विज्ञान और तकनीक पर केन्द्रित विज्ञानपीडिया डॉट कॉम के संचालक है  । एबीपी न्यूज द्वारा विज्ञान लेखन के लिए सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर का सम्मान हासिल कर चुके शशांक को विज्ञान संचार से जुड़ी देश की कई संस्थाओं ने भी राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया है। वे देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लगातार लिख रहे हैं।)