Monday, 8 July 2019

विज्ञान और नास्तिकों की बेचैनी

दया सागर
विज्ञान और नास्तिकों की बेचैनी और छटपटाहट मैं समझ सकता हूं। दुनिया के सबसे बड़े वैज्ञानिकों में गिने जाने वाले स्टीफन हॉकिंग ने मरने से पहले कहा कि इस दुनिया को बनाने वाला कोई भगवान नहीं है। यह दुनिया भौतिकी के नियमों के हिसाब से अस्तित्व में आई। उनके मुताबिक बिंग बैंग गुरुत्वाकर्षण के नियमों का ही नतीजा था। स्टीफन हॉकिंग ने अपनी नई किताब 'द ग्रैंड डिजाइन' में ईश्वर की किसी भी भूमिका की संभावना खारिज करते हुए कहा कि ब्रह्मांड का निर्माण शून्य से भी हो सकता है।
पता नहीं क्यों मुझे डार्विन की थ्योरी ठीक लगती है कि इंसान जानवरों का वंशज है। ईश्वर ने उसे पैदा नहीं किया। क्योंकि उसे सीधे ईश्वर ने बनाया होता तो वह इतना उपद्रवी कैसे हो सकता है? जितना मैंने पढ़ा और समझा है मैं इसी नतीजे पर पहुंचा हूं कि हमने ईश्वर को अपनी कल्पनाओं में इन बेकार के कामों में जबरदस्ती फंसा दिया है। ईश्वर कोई मिस्‍त्री नहीं जो बनाने बिगाड़ने का काम करे। वह किसी इंसान बनाने वाली फैक्ट्री की मशीन भी नहीं जो बतौर प्रोडक्ट इंसान पैदा करता चला जाए। पहले इंसान को पैदा करे फिर एक दिन मार दे। फिर किसी नए गर्भ में जन्म दे और एक दिन उसे कत्ल कर दे। कभी रोग से कभी किसी एक्सीडेंट में या कभी उम्र के साथ शरीर को जीर्ण शीर्ण करके। फिर कभी कोई जन्म से विकृत बच्चा हो तो उसका जिम्मेदार भी ये खुदा है। पंड़ित मौलवी कहें ये तुम्हारे और इस नवजात  के पूर्व जन्म का फल है। और इसके लिए आप ईश्वर को कोसें। नही माफ कीजिए ईश्वर ये सब नहीं करता और न ये सब करना चाहता है।
और सृष्टि को बनाना और फिर उसे चलाना भी कितना बोरिंग, कितना ऊबाऊ काम है। क्या आप सोचते हैं अरबों से साल ईश्वर यही काम कर रहा है? जैसे कि वह कोई की-मैन हो। सुबह पानी की सप्‍लाई ऑन करे शाम को आफॅ करे। कुछ नहीं तो रोज सुबह उठ कर सृष्टि में घड़ी की तरह चाभी भरे।  
स्टीफन एकदम सही कह कहे हैं कि ब्रह्मांड या प्रकृति के सारे नियमों को विज्ञान से समझा जा सकता है। बस हमें सूत्र पकड़ने हैं। सटीक तौर पर वह थ्योरम खोजनी है जिससे यह सृष्टि बनी। या सृष्टि का शून्य से विस्तार हुआ तो उसका फार्मूला क्या था? यह कोई कठिन काम नहीं। मुझे पूरी उम्मीद है एक न एक दिन विज्ञान ये साबित कर देगा हमारे जिन्दा रहते।
तो ये सारा ड्रामा क्या है?
इसका जवाब मैंने वेद, उपनिषदों और आगे वेदान्त में पाया। दरअसल हमने सृष्टि और सृष्टा को अलग अलग मान लिया। जैसे कि पश्चिम ने मान लिया। लेकिन हमारे वेद फिर तैतरीय उपनिषद ने साफ कहा-शुरू में कुछ नहीं था न सत न असत न स्वर्ग न अंतरिक्ष न पृथ्वी। यानी शून्य था और उसी से सृष्टि का विस्तार हुआ।   भारतीय धर्मग्रन्थ कहते है की सृष्टि की रचना के पहले कुछ नहीं था न प्रकाश था न अन्धकार था न पृथ्वी थी न आसमान था अगर था तो सिर्फ शून्य। बाद में शंकराचार्य ने अपने अद्वैतवाद सिद्धान्त में कहा- ब्रह्मांड में सिर्फ ईश्वर है और कोई दूसरा अन्य नहीं। यानी पेड़ पौधे हवा मनुष्य जो भी है वो ईश्वर है और ईश्वर के सिवाय और कुछ नहीं। । विज्ञान कहता है की शून्य से अचानक ही एक बैंग के साथ ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई यानी सम्पूर्ण ब्रह्मांड की उत्पत्ति किसी एक से ही हुई है। तो शंकराचार्य और पौराणिक ग्रन्थ दोनों ही स्टीफन के दावों की पुष्टि करते हैं। विज्ञान कहता है कि ब्रह्मांड की उत्पत्ति के पहले कुछ नहीं था।  हमारे ग्रं‌थ भी कहते है की ब्रह्मांड की उत्पत्ति कुछ नहीं था।
अब आप कहेंगे फिर ईश्वर बीच में कहां से आ गया? क्यों आ गया?
बिलकुल ठीक प्रश्न है। हमारे प्राचीन ग्रंथ और कुछ आधुनिक दार्शनिकों ने इसे बखूबी समझाया है। रसायन विज्ञान में एक अजीबो गरीब वैज्ञानिक प्रक्रिया है कैटेलेटिक एजेंट । ये ऐसे तत्वों का जोड़ है जो खुद किसी क्रिया में हिस्सा नहीं लेता लेकिन फिर भी इनके बिना कोई क्रिया नहीं हो सकती। इसे ऐसे समझें। जल यानी पानी हाईड्रोजन और ऑक्सीजन का जोड़ है। विज्ञान भी कहता है कि हाईड्रोजन और ऑक्सीजन के अलावा पानी में और कुछ नहीं है। यानी जल एक रसायनिक पदार्थ है जिसका रसायनिक सूत्र H2O है। यानी हाईड्रोजन के दो अणु और आक्सीजन के एक अणु से मिलकर पानी बनता है। लेकिन विज्ञान के विद्यार्थी जानते हैं कि सिर्फ हाईड्रोजन और ऑक्सीजन मिलने से पानी नहीं बनता। उसे पानी बनने के लिए कैटेलेटिक एजेंट की भी जरूरत पड़ती है। हैरत की बात है कि अगर आप हाईड्रोजन और ऑक्सीजन के जोड़ को तोड़ें तो ये केटेलेटिक एजेंट की ऊर्जा आपको कहीं नहीं दिखेगी।  केटेलेटिक एजेंट की मौजूदगी ही उसका रोल उसकी भूमिका है। ये करता कुछ नहीं सिर्फ मौजूद रहता है। ये न हो तो पानी का अस्तित्व भी न हो। ऐसे ही ईश्वर है। वह करता कुछ नहीं सिर्फ मौजूद रहता है। उसके रहने भर से प्रकृति अपना काम करती है। कल ये प्रकृति भी नहीं रहेगी तो वह रहेगा। क्योंकि प्रकृति से पहले भी वह था। उसकी मौजूदगी के बिना यह सृष्टि नहीं चल सकती। इसकी मौजूदगी में सृष्टि खुद ब खुद चलती है।
फिर आप कह सकते हैं कि बस इतना सा ही काम है तो उसका होना क्यों जरूरी है?
ये सवाल उठ सकता है। बेशक ये तार्किक प्रश्न है। इसे ऐसे समझें। हर एक बीज अपने आप में एक ब्रह्मांड है। एक बीज में कितनी आपर संभावनाएं छिपी हैं। दुनिया के सारे पेड़ नष्ट हो जाएं ‌सिर्फ एक बीज पूरे संसार को पेडों से ढक सकता है। वह बीज पेड बनेगा। उस पर फूल और फल आएंगे और उसके साथ आएंगे अन्नत बीज। फिर हर बीज से एक नया पेड़ बनेगा। यह प्रक्रिया जारी रहेगी। आप समझें ईश्वर हर बीज को अंकुरित नहीं कर रहा है। यह वैज्ञानिक प्रक्रिया है। जिसके तहत बीज अंकुरित होते हैं। तो इस हिसाब से सारे बीज अनिवार्य रूप से अंकुरित होने चाहिए। लेकिन नहीं। ऐसा नहीं होता। सिर्फ वही बीज अंकुरित होते हैं जिन्हें ईश्वर चाहता है। बीज के अंकुरण में ईश्वर की मौजूदगी अनिवार्य है। यही ईश्वर की  महत्ता है। ये वाकई एक अबूझ पहेली है। लेकिन दिलचस्प है। ईश्वर की मेरी खोज जारी है। और आपकी?

 संदर्भ ग्रंथ-
कॉसमाालॉजी आफ ‌दि ऋग्वेदा-एच डब्लू वालिस
तैतरीय उपनिषद तृतीय संस्करण चौखम्बा प्रकाशन
आईडिया आफ गॉड -प्रिगिंल, पैटिसन
तर्कदीपिका अथल्ये का द्वितीय संस्करण
Times of Refreshing: A Worship Ministry Devotional By Tom Kraeuter, Gerrit Gustafson, Kent Henry, Bob Kauflin, Patrick Kavanaugh
Man's Fate and God's Choice: An Agenda for Human Transformation-By Bhimeswara Challa

Saturday, 29 June 2019

आयुर्वेद में भी होती है सर्जरी

आयुर्वेद में भी होती है सर्जरी
Know about Surgery in Ayurveda

भारत में आज भले ही आयुर्वेद लोगों की पहली पसंद न हो, लेकिन एक वक्त था जब यहां एलोपैथी का नाम तक नहीं था। लोग आयुर्वेद से ही सभी तरह का इलाज कराते थे। इसमें सर्जरी भी शामिल थी। ईसा पूर्व छठी सदी (आज से लगभग 2500 साल पहले) में धंवंतरि के शिष्य सुश्रुत ने सुश्रुत संहिता की रचना की जबकि एलोपैथी में मॉडर्न सर्जरी की शुरुआत 17-18वीं सदी में मान सकते हैं। आयुर्वेदिक सर्जरी से जुड़ी तमाम जानकारी दे रहे हैं डॉ. राजीव पुंडीर

बेशक आयुर्वेद भारत का बहुत ही पुराना इलाज का तरीका है। जड़ी-बूटियों, मिनरल्स, लोहा (आयरन), मर्करी (पारा), सोना, चांदी जैसी धातुओं के जरिए इसमें इलाज किया जाता है। हालांकि कुछ लोग ही इस बात को जानते हैं कि आयुर्वेद में सर्जरी (शल्य चिकित्सा) का भी अहम स्थान है। सुश्रुत संहिता में स्पेशलिटी के आधार पर आयुर्वेद को 8 हिस्सों में बांटा गया है:

1. काय चिकित्सा (मेडिसिन): ऐसी बीमारियां जिनमें अमूमन दवाई से इलाज मुमकिन है, जैसे विभिन्न तरह के बुखार, खांसी, पाचन संबंधी बीमारियां
2. शल्य तंत्र (सर्जरी): वे बीमारियां जिनमें सर्जरी की जरूरत होती है, जैसे फिस्टुला, पाइल्स आदि
3. शालाक्य तंत्र (ENT): आंख, कान, नाक, मुंह और गले के रोग
4. कौमार भृत्य (महिला और बच्चे): स्त्री रोग, प्रसव विज्ञान, बच्चों को होने वाली बीमारियां
5. अगद तंत्र (विष विज्ञान): ये सभी प्रकार के विषों, जैसे सांप का जहर, धतूरा आदि जैसे जहरीले पौधे का शरीर पर पड़ने वाले असर और उनकी चिकित्सा का विज्ञान है।
6. रसायन तंत्र (रीजूवनेशन और जेरियट्रिक्स): इंसानों को स्वस्थ कैसे रखा जाए और उम्र का असर कैसे कम हो।
7. वाजीकरण तंत्र (सेक्सॉलजी): लंबे समय तक काम शक्ति (सेक्स पावर) को कैसे संजोकर रखा जाए।
8. भूत विद्या (साइकायट्री): मनोरोग से संबंधित।

सर्जरी शुरुआत से ही आयुर्वेद का एक खास हिस्सा रहा है। महर्षि चरक ने जहां चरक संहिता को काय-चिकित्सा (मेडिसिन) के एक अहम ग्रंथ के रूप में बताया है, वहीं महर्षि सुश्रुत ने शल्य-चिकित्सा (सर्जरी) के लिए सुश्रुत संहिता लिखी। इसमें सर्जरी से संबंधित सभी तरह की जानकारी उपलब्ध है।
सर्जरी के 3 भाग बताए गए हैं:
1. पूर्व कर्म (प्री-ऑपरेटिव)
2. प्रधान कर्म (ऑपरेटिव)
3. पश्चात कर्म (पोस्ट-ऑपरेटिव)

इन तीनों प्रक्रियाओं को पूरा करने के लिए 'अष्टविध शस्त्र कर्म' (आठ विधियां) करने की बात कही गई है:
1. छेदन (एक्सिजन): शरीर के किसी भाग को काट कर निकालना
2. भेदन (इंसिजन): किसी भी तरह की सर्जरी के लिए शरीर में चीरा लगाना
3. लेखन (स्क्रैपिंग): शरीर के दूषित भाग को खुरच कर दूर करना
4. वेधन (पंक्चरिंग): शरीर के फोड़े से पूय (पस) या दूषितद्रव लिक्विड को सुई से छेद करके निकालना
5. ऐषण (प्रोबिंग): भगंदर जैसी बीमारियों को जांचना। इसमें टेस्ट के लिए धातु के उपकरण एषणी (प्रोब)की मदद ली जाती है।
6. आहरण (एक्स्ट्रक्सन): शरीर में पहुंचे किसी भी तरह के बाहरी पदार्थ को औजार से खींचकर बाहर निकालना, जैसे: गोली, पथरी या दांत
7. विस्रावण (ड्रेनेज): पेट, जोड़ों या फेफड़ों में भरे अतिरिक्त पानी को सुई की मदद से बाहर निकालना
8. सीवन (सुचरिंग): सर्जरी के बाद (शरीर में चोट लगने से कटे-फटे अंग और त्वचा) को वापस उसी जगह पर जोड़ देना

इनके अलावा, घाव कितने तरह के होते हैं, सीवन (घाव सीने या कटे अंगों को जोड़ने) में इस्तेमाल होने वाला धागा कैसा होना चाहिए, सीवन कितने तरह की होती हैं और सीवन का काम किस प्रकार से करें, ये सभी बातें बहुत ही विस्तार से सुश्रुत संहिता मे समझाई गई हैं।
जाहिर है, जब सर्जरी होती है तो इसमें सर्जिकल इंस्ट्रूमेंट्स की भी जरूरत होगी। सुश्रुत ने 101 तरह के यंत्रों के बारे में बताया है। विभिन्न प्रकार की चिमटियां (फोरसेप्स) और दर्शन यंत्र (स्कोप्स) शामिल हैं। ताज्जुब की बात है कि सुश्रुत ने चिमटियों का जो वर्णन विभिन्न पशु-पक्षियों के मुंह की आकृति के आधार पर किया था, वे औजार आज भी उसी प्रकार से वर्गीकृत हैं। इन औजारों का उपयोग मॉडर्न मेडिसिन के सर्जन जरूरत के हिसाब से वैसे ही कर रहे हैं, जैसा पहले आयुर्वेद के सर्जन करते थे।
कौन-कौन-सी सर्जरी किन-किन बीमारियों में करनी चाहिए, यह वर्णन भी सुश्रुत संहिता में किया गया है। बड़ी सर्जरी जैसे उदर विपाटन (लेप्रोटमी) किन रोगों में करें और छोटी या बड़ी आंत (स्मॉल या लार्ज इंटस्टाइन) में छेदन (एक्सिजन), भेदन (इंसिजन) करने के बाद उनका मिलान और सीवन (घाव को सीने का काम) किस प्रकार से करें और चीटों का इस्तेमाल कैसे करें, इसके बारे में भी सुश्रुत संहिता में उल्लेख है।
आयुर्वेदिक सर्जरी की खासियत
खून में होने वाली गड़बड़ी को आयुर्वेद में बीमारियों का सबसे अहम कारण माना गया है। इन्हें दूर करने के दो उपाय बताए गए हैं: पहला है, सिर्फ दवाई लेना और दूसरा दवाई के साथ खून की सफाई (रक्त-मोक्षण)। दूषित रक्त को हटाना सर्जरी की एक प्रक्रिया है। इसके लिए आयुर्वेद में खास विधि अपनाई जाती है।

लीच थेरपी
आयुर्वेद में खून की सफाई के लिए जलौकावचरण (लीच थेरपी) का विस्तार से वर्णन किया गया है। जैसे: किस तरह के घाव में जलौका यानी जोंक (लीच) का उपयोग करना चाहिए, यह कितने प्रकार की होती है, जलौका किस प्रकार से लगानी चाहिए और उन्हें किस तरह रखा जाता है, ऐसे सभी सवालों के जवाब हमें सुश्रुत संहिता में मिलते हैं। आर्टरीज और वेन्स में खून का जमना और पित्त की समस्या से होने वाले बीमारी, जैसे: फोड़े, फुंसियों और त्वचा से जुड़ी परेशानियों में लीच थेरपी से जल्दी फायदा होता है।
दरअसल, जलौका दो तरह के होते हैं: सविष (विषैली) और निर्विष (विष विहीन)। चिकित्सा के लिए निर्विष जलौका का प्रयोग किया जाता है। इन दोनों को देखकर भी पहचाना जा सकता है। निर्विष जलौका जहां हरे रंग की चिकनी त्वचा वाली और बिना बालों वाली होती है। सविष जलौका गहरे काले रंग का और खुरदरी त्वचा वाला होता है। इस पर बाल भी होती हैं। अमूमन निर्विष जलौका साफ बहते हुए पानी में मिलती हैं, जबकि सविष जलौका गंदे ठहरे हुए पानी और तालाबों में पाई जाती है। ऐसा माना जाता है कि जलौका दूषित रक्त को ही चूसती है, शुद्ध रक्त को छोड़ देती है। जलौका (लीच) लगाने की क्रिया सप्ताह में एक बार की जाती है। इस प्रक्रिया में मामूली-सा घाव बनता है, जिस पर पट्टी करके उसी दिन रोगी को घर भेज दिया जाता है।

प्लास्टिक सर्जरी
प्राचीन काल में युद्ध तलवारों से होते थे और अक्सर योद्धाओं की नाक या कान कट जाते थे। कटे हुए कान और नाक को फिर से किस प्रकार से जोड़ा जाए, इस प्रक्रिया की पूरी जानकारी सुश्रुत संहिता में दी गई है। इसके लिए संधान कर्म (प्लास्टिक सर्जरी) की जाती थी। इन्हीं खासियतों की वजह से महर्षि सुश्रुत को 'फादर ऑफ सर्जरी' भी कहा जाता है। फिलहाल आयुर्वेद में प्लास्टिक सर्जरी चलन में बहुत कम है।

क्षार सूत्र चिकित्सा: खून बहाए बिना सर्जरी
शरीर के कई ऐसे हिस्से हैं जिन पर सर्जिकल इंस्ट्रूमेंट्स से सर्जरी नहीं करने की बात कही गई है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए गुदा (एनस) में होने वाली समस्याएं, जैसे: अर्श या बवासीर (पाइल्स) और भगंदर (फिस्टुला) में 'क्षार सूत्र चिकित्सा' का इस्तेमाल बहुत कामयाब रहा है। इस इलाज में मरीज को अपने काम से छुट्टी भी नहीं लेनी पड़ती क्योंकि कोई बड़ा जख्म नहीं बनता और खून भी नहीं निकलता। यह ब्लडलेस सर्जरी का बेहतरीन उदाहरण है।
यह सच है कि जब से ऐनिस्थीसिया की खोज हुई है, शरीर के किसी भी हिस्से की सर्जरी करना आसान हो गया है, लेकिन एनस जैसी जगहों पर सर्जरी से मिलने वाली कामयाबी को लेकर अभी निश्चिंत नहीं हुआ जा सकता। यही वजह है कि आयुर्वेद में फिस्टुला या पाइल्स के मामले में सर्जरी इंस्ट्रूमेंट्स (औजारों) की मदद से नहीं बल्कि क्षार (ऐल्कली) की जाती है। क्षार की सबसे बड़ी विशेषता है कि यह औजार न होते हुए भी किसी अंग को काटने, हटाने की उतनी ही क्षमता रखता है जितना कि कोई सर्जिकल इंस्ट्रूमेंट।

क्या होते हैं क्षार (ऐल्कली)?
इस काम के लिए कुछ खास औषधीय पौधों का प्रयोग किया जाता है, जैसे: अपामार्ग (लटजीरा), यव, मूली, पुनर्नवा, अर्क
इनमें से जिस भी पौधे का क्षार बनाना हो, उसके पंचांग (पौधे के सभी 5 भाग: जड़, तना, पत्ती, फूल और फल) को सबसे पहले धोकर सुखा लिया जाता है। इसके बाद इनके छोटे-छोटे टुकड़े करके एक बड़े बर्तन में रखकर उसको जला लेते हैं।
जलाने में किसी प्रकार का ईंधन या दूसरी चीजों का इस्तेमाल नहीं करते हैं। पौधे के टुकड़ों को जला दिया जाता है।
जलने के बाद बनी राख को 8 गुने जल में घोला जाता है। इसके बाद महीन कपड़े से कम से कम 21 बार छानकर उसे तब तक उबाला जाता है जब तक कि पूरा पानी भाप न बन जाए। इसके बाद बर्तन में नीचे जो लाल या भूरे रंग का पाउडर बचता है, उसे ही क्षार कहते हैं। बर्तन से उसे खुरचकर और थोड़ा पीसकर किसी कांच की शीशी में इस तरह से जमा किया जाता है कि उसका संपर्क हवा से पूरी तरह से खत्म हो जाए क्योंकि क्षार हवा की नमी सोखकर अपना असर खो देते हैं।

कितने तरह के क्षार?
क्षार दो तरह के होते हैं। जिनका प्रयोग औषधि के रूप में खाने के लिए किया जाता है उन्हें पानीय (खाने लायक) क्षार कहते हैं। जिनका इस्तेमाल घाव या किसी अंग विशेष पर किया जाता है, उन्हें प्रतिसारणीय (शरीर पर लगाने वाले) क्षार कहते हैं। क्षार सूत्र बनाने के लिए शरीर पर लगाने वाले क्षारों यानी प्रतिसारणीय क्षार का प्रयोग किया जाता है।

क्या होता है क्षार सूत्र और ये कैसे बनाए जाते हैं?
पक्के धागे पर क्षार की लगभग 21 परतें चढ़ाकर जो सूत्र या धागा बनाया जाता है उसे ही क्षार सूत्र कहते हैं। इसका इस्तेमाल सर्जरी में किया जाता है। क्षार सूत्र बनाने के लिए मुख्य रूप से 4 चीजों की जरूरत पड़ती है:
1. पक्का धागा
2. धागा बांधने के लिए एक फ्रेम
3. औषधियां

4. स्पेशलिस्ट
औषधियां: स्नुही दूध (कैक्टस के पौधे से निकला हुआ लिक्विड), उपरोक्त में से कोई भी क्षार (बेस) और हल्दी पाउडर।
सबसे पहले स्पेशलिस्ट सुबह में स्नुही यानी कैक्टस के कांटेदार पौधे के तने पर चाकू से सावधानीपूर्वक तेज चीरा लगाता है। चीरा लगाते ही तने से दूध निकलने लगता है जिसे कांच की शीशी में इकट्ठा कर लिया जाता है। एक फ्रेम पर धागा कस कर पहले ही रख लिया जाता है। करीब 50 ml दूध में रुई को डुबोकर फ्रेम पर लगे धागे पर 10 बार लगाया जाता है। हर बार दूध लगाने के बाद धागे को धूप में रख कर सुखा लेते हैं, फिर उसी पर दूसरा लेप लगाते हैं। इसके बाद 7 बार दूध लगाकर फिर क्षार के पाउडर को धागे के ऊपर लगा कर सुखा लिया जाता है। अंत में 4 बार दूध, फिर क्षार और हल्दी, तीनों को धागे के ऊपर लगाकर तेज धूप में सुखा लिया जाता है और फिर फ्रेम पर से उतार लिया जाता है। करीब 1 फुट लंबे धागे को काटकर कांच की परखनली में रख लिया जाता है। इस परखनली को अच्छी तरह से सील कर दिया जाता है ताकि उसमें हवा न घुस सके। यह काम विशेषज्ञ सर्जरी में इस्तेमाल होने वाले दस्ताने पहनकर करता है क्योंकि स्नुही दूध और क्षार काफी तेज होते हैं। इनमें त्वचा (स्किन) को काटने की क्षमता होती है। विकल्प के तौर पर बढ़िया क्वॉलिटी की पॉलिथीन की थैली में भी क्षार सूत्र को अच्छी तरह से सील करके रखा जा सकता है।
आजकल क्षार सूत्र बनाने में काफी प्रगति हुई है। केंद्रीय आयुर्वेदिक अनुसंधान केंद्र ने आईआईटी, दिल्ली के सहयोग से क्षार सूत्र बनाने की ऑटोमैटिक मशीन तैयार की है, जिसकी सहायता से काफी कम समय में क्षार सूत्र तैयार किए जा सकते हैं।

किन बीमारियों में क्षार सूत्र का इस्तेमाल
क्षार सूत्र का इस्तेमाल अर्श या बवासीर (पाइल्स) और भगंदर (फिस्टुला) जैसी बीमारियों में किया जाता है। यह सर्जरी कहलाती है और इस काम को आयुर्वेदिक सर्जन ही अंजाम देते हैं। अच्छी बात यह है कि इस इलाज में किसी प्रकार की काट-छांट नहीं होती, न ही खून निकलता है।
दूसरी बीमारियां, जिनमें क्षार सूत्र का प्रयोग किया जाता है, वे हैं: नाड़ीवण (साइनस), त्वचा पर उगने वाले मस्से और कील। नाक के अंदर होने वाले मस्से में भी क्षारों का प्रयोग किया जाता है जिससे वे धीरे-धीरे कटकर नष्ट हो जाते हैं। त्वचा पर होने वाले उभार या ग्रंथियों को भी क्षार सूत्र से बांध कर नष्ट किया जा सकता है।

बवासीर में क्षार सूत्र ट्रीटमेंट
बवासीर में गुदा (एनस) में जो मस्से बन जाते हैं, उनकी जड़ को क्षार सूत्र से कसकर बांध दिया जाता है जिससे वे खुद ही सूख कर गिर जाते हैं। ये काम दो प्रकार से होते हैं। मस्से अगर बड़े हैं तो सर्जन एनस के बाहर (बाह्य अर्श या एक्सटर्नल पाइल्स) और अंदर वाले अर्श (इंटरनल पाइल्स) की जड़ों में क्षार सूत्र को बांध देते हैं। लेकिन अगर मस्से की जड़ें छोटी हैं या फिर ज्यादा अंदर की तरफ हैं तो क्षार सूत्र को अर्धचंद्राकार सुई में पिरोकर उसे मस्से की जड़ों के आर-पार करके जड़ की चारों ओर कसकर बांध दिया जाता है। इस काम में लोकल ऐनिस्थीसिया की जरूरत होती है और कभी-कभी स्पाइनल या जनरल ऐनिस्थीसिया की भी। ऐसे में किसी ऐनिस्थीसिया स्पेशलिस्ट की मदद ली जाती है, जिससे क्षार सूत्र बांधने का काम सही तरीके से हो सके और मरीज को दर्द भी न हो।
फिस्टुला का इलाज
भगंदर यानी फिस्टुला में गुदा के आसपास पहले एक फोड़ा निकलता है। एलोपैथी में इसका इलाज यह है कि इस फोड़े में छेद करके पस को बाहर निकाल दिया जाता है, फिर छेदन करके उस हिस्से को काटकर अलग कर देते हैं। इसके बाद सामान्य तरीके से मरहम-पट्टी करके मरीज को छोड़ दिया जाता है। ऐसे घाव को भरने का समय घाव की लंबाई, चौड़ाई और गहराई के हिसाब से कुछ दिनों से लेकर हफ्तों या महीनों तक हो सकता है। कुछ मरीजों में एक बार ठीक होने के बाद समस्या फिर से उभर आती है और दोबारा सर्जरी की जरूरत पड़ती है। बार-बार सर्जरी की वजह से मरीज के एनल स्फिंक्टर के क्षतिग्रस्त होने का खतरा बढ़ जाता है जिससे मरीज के मल को रोकने की शक्ति कम हो जाती है। ऐसे में फिस्टुला के इलाज के लिए बहुत ज्यादा सर्जरी भी नहीं की जा सकती। इस स्थिति में क्षार सूत्र-चिकित्सा काफी कामयाब है।
मस्सों को हटाना मुमकिन
मस्सों की जड़ों में क्षारसूत्र को खास तरह की गांठ द्वारा बांधा जाता है। इसमें मस्सों को अंदर कर दिया जाता है और धागा बाहर की ओर लटकता रहता है। इसे बेंडेज द्वारा स्थिर कर दिया जाता है।
-मस्सों को हटाने में एक से दो हफ्ते का समय लग सकता है।
-इस दौरान क्षारसूत्र के जरिए दवाएं धीरे-धीरे मस्से को काटती रहती हैं और आखिरकार सुखाकर गिरा देती हैं। मस्से गिरने के साथ ही धागा भी अपने आप गिर जाता है। इसमें दर्द नहीं होता।
-इस दौरान मरीज को कुछ दवाओं का सेवन करने के लिए कहा जाता है और ऐसी चीजें ज्यादा खाने की सलाह दी जाती हैं जो कब्ज दूर करने में सहायक हों। इनके अलावा गर्म पानी की सिकाई और कुछ व्यायाम भी बताए जाते हैं।
-क्षारसूत्र चिकित्सा के लिए अस्पताल में भर्ती होने की भी जरूरत नहीं होती।

आयुर्वेदिक सर्जरी के बाद 10 बातें जो जरूर ध्यान रखें:
1. सर्जरी से पहले मरीज और उसके रिश्तेदारों को होने वाले सर्जरी और उसके नतीजे के बारे में पूरी जानकारी रखनी चाहिए।
2. सर्जरी के पहले और बाद में क्या नहीं खाना, खाना कब और कैसे शुरू करना है जैसी बातें आयुर्वेदिक चिकित्सक की सलाह से ही करनी चाहिए।
3. दवाई कब लेनी है, खाने के बाद लेनी है या पहले, अगर पहले लेनी है तो कितनी देर पेट खाली रहने के बाद, दवाई लेने के कितनी देर बाद खाना खाना है, जैसी बातों को अच्छी तरह से समझ लें।
4. सर्जरी के बाद जख्म की साफ-सफाई, पट्टी आदि डॉक्टर की देखरेख में ही करवाएं क्योंकि आपकी थोड़ी-सी जल्दबाजी और लापरवाही सर्जरी को असफल बना सकती है।
5. किसी भी प्रकार की एक्सरसाइज या शारीरिक मेहनत तब तक न करें जब तक कि आपका डॉक्टर इसकी इजाजत न दे।
6. फिजिकल रिलेशन बनाने में जल्दी न करें और डॉक्टर के निर्देशों का पालन करें।
7. शरीर की सफाई रखें और गर्मी में ठंडे पानी से और सर्दी में गर्म पानी से नहाएं।
8. कपड़े और बेड की चादर आदि को हर दिन बदलें ताकि इन्फेक्शन दूर रहे।
9. कार या बाइक चलाने की जल्दी न करें। पूरी तरह से ठीक होने तक इंतजार करें।
10. अपने सर्जन में, उनकी योग्यता में पूरा विश्वास रखें। सर्जरी के बाद होने वाली किसी भी समस्या जैसे, घाव से खून आने, भूख न लगने, बुखार हो जाने, दस्त होने, घाव में दर्द होने, पेशाब में परेशानी होने पर फौरन ही डॉक्टर से संपर्क करें।
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जरूरी सवालों के जवाब
Q. किस तरह की सर्जरी आयुर्वेद से करनी चाहिए और किस तरह की नहीं?
A. किसी भी इलाज की विशेषता उसकी अपनी टेक्नॉलजी और दवाइयां होती हैं। बड़ी से बड़ी और छोटी से छोटी सर्जरी में भी आयुर्वेद के सर्जन आयुर्वेदिक से जुड़ी तकनीक और दवाओं का ही इस्तेमाल करते हैं। माना जाता है कि ऐसा कोई भी इलाज जिसमें दूसरी फील्ड के तरीकों और इलाज का इस्तेमाल करना पड़े, अपनी विशेषता खो देता है। जैसे यदि किसी मरीज को सर्जरी के दौरान किसी भी अवस्था में वेन्स के द्वारा (इंट्रा-वीनस) ग्लूकोज, वॉटर, मिनरल्स, ब्लड और दवाइयां देने की जरूरत पड़े तो यह आयुर्वेद के बुनियादी उसूलों के खिलाफ है। इस बात पर जोर दियाय जाता है कि जहां आयुर्वेद और एलोपैथी के बीच कोई फर्क ही न रहे, ऐसी सर्जरी आयुर्वेदिक सर्जन को नहीं करनी चाहिए। हां, लोकल एनिस्थीसिया या पूरी तरह से बेहोश करने की जरूरत हो तो सिर्फ मदद के तौर पर एलोपैथी के इस तरीके का इस्तेमाल के लिए विशेषज्ञ की सहायता ली जा सकती है।

Q. अगर कोई सर्जरी होती है तो आयुर्वेद में क्या इसके लिए कोई अतिरिक्त चुनौती भी है?
A. सर्जरी किसी भी तरह की हो चुनौती तो होती है, लेकिन आयुर्वेद की सर्जरी कम जोखिम वाली है।

Q. मान लें, किसी ने आयुर्वेदिक डॉक्टर से सर्जरी कराई। अगर कोई समस्या आ गई तो क्या वह दोबारा आयुर्वेदिक सर्जन के पास जाए या एलोपैथिक सर्जन के पास?
A. अमूमन आयुर्वेदिक सर्जरी के बाद होने वाली किसी भी समस्या के लिए पहले उसी आयुर्वेदिक सर्जन के पास जाना चाहिए, जिसने सर्जरी की है। ध्यान देने वाली बात यह है कि मरीज का सर्जन में विश्वास और सर्जन का खुद में विश्वास मरीज को जरूर फायदा पहुंचाता है। यही किसी भी इलाज की कामयाबी की चाबी है। कई बार ऐसा देखा जाता है कि मरीज को सब कुछ करने के बाद भी मॉडर्न सर्जन से फायदा नहीं मिल रहा है तो वह आयुर्वेदिक सर्जन के पास पहुंचता है। यहां भी फायदा न मिलने पर वह वापस एलोपैथिक सर्जन के पास चला जाता है। तो कहने का मतलब यह है कि मरीज को फायदा होना चाहिए और इसके लिए वह कहीं भी, किसी के भी पास जाने के लिए आजाद है। यह एक सामान्य चलन है।

Q. आयुर्वेद की सर्जरी एलोपैथी से अलग और बेहतर कैसे है?
A. आयुर्वेदिक सर्जरी और एलोपैथिक सर्जरी दोनों ही अपने आप में खास हैं। इनमें आपस में कोई कॉम्पिटिशन या विरोध नहीं है। आयुर्वेद की प्लास्टिक सर्जरी और क्षार सूत्र चिकित्सा को एलोपैथी ने खुशी से अपनाया है। आधुनिक एलोपैथिक सर्जन भी इन विधियों से मरीजों का इलाज कर रहे हैं। सर्जरी एक तकनीक है जो दोनों विधियों में लगभग सामान्य है। अगर कोई फर्क है तो वह दवाइयों का है जो सर्जरी के दौरान मरीज को दी जाती है और उन्हीं के आधार पर हम एक को आयुर्वेदिक सर्जरी और दूसरी को एलोपैथिक सर्जरी कहते हैं। इनमें कुछ अपवाद हैं, जैसे: क्षार सूत्र चिकित्सा, अग्नि कर्म, जलौका-लगाना और रक्त मोक्षण सिर्फ आयुर्वेद की खासियत हैं। वहीं, ऑर्गन ट्रांसप्लांट, बाईपास सर्जरी, लेजर और की-होल रोबॉटिक सर्जरी आदि एलोपैथी की खासियत हैं।

Q. क्या नहीं खाना और क्या खाना चाहिए?
A. इस विषय में डॉक्टर के निर्देशों का पालन करें। आयुर्वेद में अमूमन कम तेल और कम मिर्च-मसालों वाली चीजें ही खाने के लिए कहा जाता है। यदि मरीज को शुगर और हाई बीपी की समस्या है तो डॉक्टर ने जिस तरह का खाना बताया है, उसका पूरी तरह से पालन करना चाहिए। यह भी मुमकिन है कि डॉक्टर कुछ दिनों के लिए सिर्फ तरल पदार्थ लेने को कहे। ऐसे में डॉक्टर की कही गई बातों को जरूर मानें। वह जिस तरह का पेय लेने को कहे, वही लें। अपने मन से कुछ भी न लें।

Q. डॉक्टर की डिग्री कम से कम क्या होनी चाहिए?
A. सर्जरी एक स्पेशल साइंस है, जिसके लिए स्पेशल एजुकेशन और प्रैक्टिस की जरूरत होती है। आयुर्वेद में भी सर्जन बनने के लिए तीन साल की मास्टर ऑफ सर्जरी (एमएस आयुर्वेद) की जरूरत होती है जो ग्रैजुएशन (बीएएमएस) के बाद ही की जा सकती है। वैसे, महारत हासिल करने के लिए एमएस आयुर्वेद करने के बाद पीएचडी भी की जा सकती है, लेकिन एक आयुर्वेद सर्जन बनने के लिए कम से कम एमएस आयुर्वेद बहुत जरूरी है।

आयुर्वेदिक सर्जरी के लिए 4 बेहतरीन सरकारी संस्थान
1. बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी, वाराणसी
          www.bhu.ac.in

2. गुजरात आयुर्वेद यूनिवर्सिटी, जामनगर
         www.ayurveduniversity.com

3. ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ आयुर्वेद, नई दिल्ली
          https://aiia.gov.in

4. नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ आयुर्वेद, जयपुर
        www.nia.nic.in

साभार संडे नवभारत टाइम्स 

गर्मी और हीटवेव में झुलसा यूरोप

हीट वेव में झुलसा यूरोप
चंद्रभूषण
यूरोप में ठेठ गर्मियों के महीने जुलाई-अगस्त माने जाते हैं। 70,000 लोगों की जान लेने वाली सन 2003 की ऐतिहासिक यूरोपियन हीट वेव इन्हीं महीनों में आई थी। जून का हाल वहां हमारे मार्च जैसा खुशनुमा ‘अर्ली समर’ वाला होता है। लेकिन इस साल जून के महीने में ही यूरोप में गर्मी के सारे रिकॉर्ड टूट रहे हैं। इस हफ्ते शुक्रवार-शनिवार को कई यूरोपीय शहरों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस के पार चले जाने की आशंका जताई गई है।

अभी कुछ दिन पहले दिल्ली में दिखा यह टेंपरेचर यूरोप के लिए आसमान टूटने जैसा है। लोगों का शरीर वहां की ठंड में रहने का आदी होता है। ज्यादातर यूरोपीय घरों में एयर कंडीशनर तो दूर, पंखे तक नहीं लगे हैं। नतीजा यह कि आजाद खयाल गोरे लोग गर्मी से राहत पाने के लिए बियर या किसी ज्यादा सख्त अल्कॉहलिक पेय की बोतलें पकड़कर तालाब, झील या नदी में घुस जाते हैं। वहां कुछ देर बाद सिर पर गर्मी और नशा एक साथ चढ़ जाने के चलते वे ऊंघ और बेहोशी के बीच की दशा में चले जाते हैं और कई बार इसी हाल में डूबकर मरे हुए पाए जाते हैं।

कुछ लोग इतनी गर्मी में ऊलजलूल हरकतें भी करने लगते हैं। जर्मनी की राजधानी बर्लिन को घेरे हुए एनसीआर नुमा प्रांत ब्रैंडेनबर्ग की पुलिस ने भरी दोपहरी में खुली सड़क पर अंधाधुंध मोपेड भगा रहे एक बुजुर्ग सज्जन को रोककर उनकी तस्वीरें जारी की हैं। हेल्मेट तो क्या इस कृत्य के समय उनके तन पर कपड़े की एक चिंदी भी नहीं दिख रही। वजह पूछने पर बोले- ‘गर्मी लग रही थी, क्या करता!’

Saturday, 22 June 2019

विज्ञान कथाओं की विशेषताएं

विज्ञान कथाओं की विशेषताएँ -
हरीश गोयल
महाविपत्ति(catastrophe /apocalypse )  भी कई प्रकार की होती है ।
महामारी की महाविपत्ति -
महामारी से संक्रमित मानवता का विनाश –
मेरी शेली की विज्ञान कथा ‘द लास्ट मैन’ (1826 ) प्लेग की महामारी कोन्सटेंटिनोपोल से  प्रारम्भ होती है । महामारी से संक्रमित होकर सारी मानवता का नाश हो जाता है ।केवल एक व्यक्ति शेष रहता है । फ़्रेंकेंस्टीन मोंस्टर की तरह एक नौका में दक्षिण की ओर जाता है नितांत अकेला तथा क्षुब्ध ।
मानव द्वारा भी कृत्रिम रूप से जीवाणु/वाइरस का स्ट्रेन उत्पन्न महामारी फैलाई जाती है तथा मानवता का विनाश किया जाता है ।स्टीफन किंग की कथा ‘स्ट्रेंड’(1978) में जैविक युद्ध के तहत एक वैज्ञानिक हैजा के जीवाणु का एक स्ट्रेन तैयार करता है इसके संक्रमण से विश्व की 99% आबादी समाप्त हो जाती है ।
मेरी कथा  ‘जीवाणु बम में एक ‘डाउन सिंड्रोम’ से ग्रसित व्यक्ति मरीचि को ह्यूमन जीनोम प्रोजेक्ट के तहत सुपर इंटेलिजेंट बना दिया जाता है ।वह इसका प्रयोग विकासवाद की गुत्थी सुलझाने के लिए करता है ।लेकिन यह गुत्थी सुलझाते हुए कब वह हैवानियत का पुर्जा बन जाता है ,पता ही नहीं चलता ।वह जीवाणुओं के म्यूटेशन पर कार्य करने लगता है तथा जीवाणु का एक ऐसा स्ट्रेन ईजाद करता है जो पृथ्वी पर अज्ञात था ।वह  प्लेग के जीवाणु ‘येर्सिनिया पेस्टिस ‘को एक नये जीवाणु स्ट्रेन ‘मरीचि पेस्टिस’ तैयार  करता है. मरीचि उसका स्वयं का नाम है । उसका शैतानी दिमाग तेजी से काम करने लगता है ।वह इस नए स्ट्रेन का प्रयोग जीवाणु बम बनाने के लिए करता है तथा शत्रु राष्ट्र से सांठगांठ करएक राष्ट्र   के महानगरों पर बम गिरा देता है । लोग प्लेग  की महामारी से जूझते रहते हैं ।उसका कोई एंटीडोट उस समय मौजूद नहीं था ।मरीचि यहीं नहीं रुकता है ।वह एक उपग्रह से यह साजिश रचता है तथा विश्व के अमेरिका और रूस जैसे शक्तिशाली राष्ट्रों को निशाना बनाने की सोचता है लेकिन उसका भंडा फूट जाता है.

डॉ राजीव रंजन उपाध्याय की कथा ‘क्वा हेक’ में अन्तरिक्ष यात्रियों की एक टीम टेकायन प्रॉपल्शन यान में  सैर करते हुए कैसरी -55 के एक दूसरे ग्रह पर पहुँचते है ।वे वहाँ दूसरी बार पहुँचते हैं ।पहली बार जब वे वहाँ गए थे तो उन्होने उस निर्जन ग्रह पर एक मानव बस्ती बसाई थी ।उन्होने  चंद्रमा की  धरती से  ‘फेक्टो तकनीक’ द्वारा ‘पदार्थ पारण’(teleportation) कर वहाँ बस्ती बसाते हैं ।. अब वे यह जानना चाहते हैं कि उनके द्वारा बसाई गयी बस्ती कैसी होगी ?लेकिन जब वे उक्त ग्रह पर पहुँचते  हैं तो पाते हैं कि वह बस्ती उजाड़  चुकी है ।वे चहुं ओर मानव जाति के कंकाल ही कंकाल पाते हैं केवल एक क्वा हेक नाम की बच्ची जीवित बचती है.वह' मतिभ्रम'(hallucination )  का शिकार  हो जाती है .डॉ आसियां के अनुसार क्वा हेक की यह स्थिति ‘चार्ल्स बोंनेट सिंड्रोम’के कारण थी ।उसे स्वस्थ होने के लिए रिट्रो वाइरस वैक्सिन’ लगाए जाते हैं। क्वा हेक तनिक स्वस्थ होने पर ग्रह पर बसी आबादी के कंकाल में तब्दील होने का राज खोलती है ।वह बताती है कि एक वर्ष पूर्व एक धूमकेतु अपनी विशाल पूंछ को लहराते हुए आसमान से गुजरा ।उसके अदृश्य होते ही वातावरण में अंधकार छा गया।आसमान से धूमकेतु के हल्की बूंदों के   धूलिकण गिरने लगे ।इससे मानव आबादी पहले मतिभ्रम का शिकार हुई ।बाद में वह  कंकाल में परिणत हो गयी  । स्पष्ट था कि उस धूलिकण में वाइरस थे जिससे आबादी कि यह स्थिति हुई ।

Friday, 14 June 2019

पानी की ए टू जेड कहानी

...ताकि पानी न करे पानी-पानी
Water Purification: A to Z

हाल में नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने केंद्र सरकार से कहा है कि जिन इलाकों में पानी ज्यादा खारा नहीं है, वहां आरओ के इस्तेमाल पर बैन लगाया जाए क्योंकि इससे पानी की बहुत बर्बादी होती है और यह सेहत के लिए मुफीद भी नहीं है। खास बात यह है कि महानगरों में पानी सप्लाई करने वाली एजेंसियां भी इस बात पर जोर देती हैं कि उनका पानी सौ फीसदी शुद्ध है, लेकिन हकीकत यह है कि महानगरों में सबसे ज्यादा आरओ वॉटर प्योरिफायर ही बिक रहे हैं। क्या है शुद्ध पानी का फंडा और आरओ के इस्तेमाल में है समझदारी, एक्सपर्ट्स से बात करके ब्योरा रहे हैं वीरेंद्र वर्मा:

दिल्ली, मुंबई या लखनऊ समेत देश के ज्यादातर शहरों में पानी का स्रोत या तो नदियां हैं या फिर ग्राउंड वॉटर। इनके पानी को ही साफ करके वहां की सरकारी एजेंसियां लोगों के घरों में पानी की सप्लाई करती हैं। सरकारी एजेंसी कच्चे पानी को साफ करके पाइपलाइन के जरिए लोगों के घरों में पहुंचाती है। हालांकि यहां दिक्कतें पुरानी पाइपलाइनों की वजह से आती हैं या फिर फैरूल से घर तक पानी पहुंचने के दौरान पानी में अशुद्धियां मिलती हैं। अगर कहीं लीकेज होती है तो सप्लाई वाले पानी में सीवर का पानी मिलने की आशंका बढ़ जाती है क्योंकि कई जगह पीने की पाइपलाइनें और सीवर की पाइपलाइनें साथ-साथ गुजरती हैं।
पानी की पाइपलाइन पर सीधे मोटर लगाने से भी गंदा पानी आ जाता है। कई बार हमें यह पता नहीं होता कि पाइप में सप्लाई आ रहा है या नहीं। अगर नहीं आ रहा है और हम मोटर चालू कर देते हैं तो मोटर बाहर की गंदगी खींच लेता है।
सप्लाई वाले पानी में अमूमन सबसे ज्यादा अशुद्धियां फेरूल से आपके घर तक जाने वाले पाइप में मिलती हैं। ऐसे में बेहतर रहेगा कि पानी का कनेक्शन जल बोर्ड के लाइसेंसी प्लंबर से ही कराएं और अगर पानी में गड़बड़ी आ रही है तो सबसे पहले अपनी लाइन की जांच कराएं। जरूरी हो तो पाइपलाइन बदलवा लें। फैरूल वह जॉइंट होता है, जहां पर जल बोर्ड की पाइपलाइन से घरों में पानी का कनेक्शन दिया जाता है। यहां लीकेज होने पर घरों के अंदर गंदा पानी सप्लाई होने लगता है।

पानी में गड़बड़ियां
पानी में दो तरह की अशुद्धियां होती हैं: घुलनशील और अघुलनशील। ये केमिकल और बायलॉजिकल होती हैं। केमिकल अशुद्धियां कई बातों पर निर्भर करती हैं। मसलन, अगर पानी के स्रोत के पास फैक्ट्रियां हैं तो उनकी गंदगी पानी में जाएगी। इसी तरह सेनेटरी लैंडफिल की गंदगी रिसकर जमीन के नीचे के पानी को खराब कर देती है। दिल्ली में गाजीपुर और भलस्वा लैंडफिल के साथ ऐसा ही हुआ है। स्टडी के मुताबिक, इन दोनों सैनिटरी लैंडफिल के 10 किलोमीटर तक के दायरे के अंडरग्राउंड वॉटर की क्वॉलिटी काफी खराब हो चुकी है। अगर खेती में कीटनाशकों का बहुत इस्तेमाल होता है तो ये केमिकल अंडरग्राउंड वॉटर में मिलकर उसे गंदा कर देते हैं।

पीने का पानी कैसा हो?
BIS स्टैंडर्ड
TDS: 0-500 ppm
pH level: 6.5-7.5
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WHO स्टैंडर्ड
- पानी में 300 से कम टीडीएस है तो उसे एक्सेलेंट कैटिगरी का माना जाता है।
- 300 से 600 के बीच की टीडीएस को गुड कैटिगरी में माना जाता है।
- 600 से 900 के बीच के टीडीएस को फेयर कैटिगरी में माना जाता है।
- 1200 से ज्यादा के टीडीएस वाले पानी को खराब कैटिगरी में माना जाता है।

BIS के नियम
पीने के पानी की जांच के लिए बीआईएस (ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स) ने जो स्टैंडर्ड बनाए हैं वे बीआईएस-10500 के तहत आते हैं। इनके अनुसार पानी में टीडीएस की मात्रा 0 से 500 पीपीएम (पार्ट्स प्रति मिलियन) होनी चाहिए। साथ ही पीएच लेवल 6.5 से 7.5 के बीच होना चाहिए। इससे ज्यादा होने पर यह नुकसानदेह है। बीआईएस के मुताबिक, पानी में कुल 82 तरह की अशुद्धियों की जांच होनी चाहिए। ये फिजिकल पैरामीटर-6, कैमिकल (टॉक्सिक)-23+16, रेडियोएक्टिव-3, पेस्टिसाइड्स-18, बैक्ट्रियोलोजिकल-2, माइक्रोस्कॉपिक-13 हैं। डब्ल्यूएचओ ने पानी की जांच के लिए 300 से 400 तरह के पैरामीटरस तय किए हैं, चूंकि भारत में बीआईएस के मानक लागू होते हैं, इसलिए पानी की जांच बीआईएस के मानकों पर सही मानी जाती है।

TDS क्या है?
पानी में घुली हुई सभी चीजों को टीडीएस (टोटल डिसॉल्व्ड सॉलिड्स) कहते हैं। इसमें सॉल्ट, कैल्शियम, मैग्निशियम, पोटैशियम, सोडियम, कार्बोनेट्स, क्लोराइड्स आदि आते हैं। ड्रिंकिंग वॉटर को मापने के लिए टीडीएस (टोटल डिसॉल्व्ड सॉलवेंट), पीएच और हार्डनेस लेवल देखा जाता है। बीआईएस (ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड) के मुताबिक, मानव शरीर अधिकतम 500 पीपीएम (पार्ट्स प्रति मिलियन) टीडीएस सहन कर सकता है। अगर यह लेवल 1000 पीपीएम हो जाता है तो शरीर के लिए नुकसानदेह हैं। लेकिन फिलहाल आरओ से फिल्टर्ड पानी में 18 से 25 पीपीएम टीडीएस मिल रहा है जो काफी कम है। इसे ठीक नहीं माना जा सकता। इससे शरीर में कई तरह के मिनरल नहीं मिल पाते। यहां एक सवाल और है कि हमारे घरों में जो पीने के पानी की सप्लाई सरकारी एजेंसियां करती हैं, उनकी कितनी जांच होती है?

सरकारी प्लांट से घर तक ऐसे पहुंचता है पानी
1. सरकारी एजेंसियों के वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट में पानी नदी या नहर के जरिए आता है तो सबसे पहले पानी में मौजूद अशुद्धियों की जांच होती है। इसके बाद तय किया जाता है कि उस पानी को किस विधि से साफ किया जाना चाहिए।
2. पानी की जांच करने के बाद उसमें क्लोरीन मिलाई जाती है। उसके बाद फिटकरी, पॉली एल्युमिनियम क्लोराइड मिलाया जाता है, ताकि पानी की गंदगी साफ हो सके।
3. इसके बाद पानी क्लोरीफायर में जाता है, जहां अशुद्धियां और गाद नीचे बैठ जाती हैं। यहां पानी की दो बार टेस्टिंग होती है।
4. क्लेरीफायर से पानी फिल्टर हाउस में जाता है, जहां पानी छाना जाता है। फिर से पानी की जांच होती है। इसके बाद पानी को प्लांट में मौजूद जलाशयों में भेजा जाता है। यहां पर दोबारा से क्लोरीनेशन होता है। पानी साफ करने के बाद जितनी भी बार पानी की जांच होती है, उसमें घुलनशील और अघुलनशील अशुद्धियों की जांच की जाती है। अगर पानी में कोई भी गड़बड़ी पाई जाती है तो पानी की सप्लाई रोक दी जाती है। प्लांट से पानी साफ होने के बाद अंडर ग्राउंड रिजरवॉयरों में जाता है। यहां भी घरों में सप्लाई करने से पहले जांच की जाती है। इसके बाद भी जल बोर्ड लोगों के घरों में भी जाकर पानी के सैंपल जांच के लिए उठाता है। इसलिए आरओ कंपनियों का आरोप गलत है कि जल बोर्ड पानी की जांच सही से नहीं करता।

क्या कहा है NGT ने
एनजीटी के निर्देश पर नैशनल एन्वॉयरनमेंट इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टिट्यूट (Neeri), सेंट्रल पलूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB) और IIT-Delhi ने आरओ के इस्तेमाल पर एक रिपोर्ट तैयार कर एनजीटी को सौंपी है। रिपोर्ट के आधार पर एनजीटी ने 28 मई को पर्यावरण मंत्रालय को जारी निर्देश में ये बातें कही हैं:
-देश में 16 करोड़ 30 लाख लोग ऐसे हैं, जिन्हें पीने के लिए साफ पानी नहीं मिलता। यह संख्या पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा है।
-विकसित देशों में भी आरओ का इस्तेमाल कम करने पर जोर दिया जाता है। वहां समंदर के पानी को पीने लायक बनाने के लिए आरओ इस्तेमाल होता है क्योंकि इस पानी में TDS बहुत होता है। वहीं भारत में मौजूद पानी में टीडीएस की मात्रा कम होने के बावजूद आरओ की डिमांड दिन ब दिन बढ़ रही है।
-आरओ सिस्टम बनाने वाली कंपनियों ने पानी को लेकर लोगों में डर का माहौल बना दिया है।
-घरों में सप्लाई होने वाले पानी में अगर TDS 500mg/लीटर से कम है तो RO को बैन कर देना चाहिए।
-लोगों के घरों में जो पानी सप्लाई होता है, उसमें TDS कितना है, यह कैसे पता चले। इसके लिए सरकार को उस पानी के बारे में बिल के जरिए पूरी जानकारी दी जानी चाहिए। बिल पर लिखा रहे कि इस पानी का स्रोत क्या है और उसमें TDS कितना है।
-आरओ सिस्टम से पानी में मौजूद जरूरी मिनरल्स भी पूरी तरह निकल जाते हैं। विदेशों में आरओ के बुरे असर देखा जा रहा है। वहां के लोगों में कैल्शियम और मैग्निशियम की कमी होने की शिकायत आने लगी है। इसलिए भारत में आरओ सिस्टम बनाने वाली कंपनियां यह ध्यान रखें कि पानी में कम से कम 150mg/लीटर टीडीएस जरूर मौजूद रहे।
-जिन इलाकों के पानी में आर्सेनिक और फ्लोराइड जैसे खतरनाक तत्वों की मौजूदगी है, वहां के लिए भी ऐसी तकनीक लाई जाए जिससे कि इनका स्तर कम हो सके ताकि आरओ की जरूरत वहां भी नहीं पड़े।
-आरओ से पानी साफ होने की प्रक्रिया में अमूमन 80 फीसदी पानी बर्बाद हो जाता है और 20 फीसदी ही पीने लायक मिलता है। आरओ कंपनियों को ऐसी मशीन बनाने के लिए कहा जाए, जिसके द्वारा कम से कम 60 फीसदी पानी पीने लायक बने और 40 फीसदी से ज्यादा पानी बर्बाद न हो। वहीं साफ पानी प्राप्त करने की क्षमता को आगे कम से कम 75 फीसदी तक बढ़ाई जाए।

RO कंपनियों का पक्ष
'आरओ पर पाबंदी लगाना समस्या का हल नहीं है। दरअसल, पानी में टीडीएस के साथ-साथ माइक्रोप्लास्टिक, आर्सेनिक, कीटनाशक जैसी दूसरी अशुद्धियां भी होती है जिन्हें आरओ के जरिए हटाया जाना जरूरी है। जहां तक पानी की बर्बादी की बात है तो हमने ऐसी तकनीक विकसित की है कि 80% की जगह 50% पानी ही बर्बाद होता है। हम और रिसर्च करके इसे घटाने की कोशिश कर रहे हैं। BIS और WHO के मापदंडों में कहीं भी यह नहीं बताया है कि टीडीएस कम से कम कितना हो। फिर भी हम यह सुनिश्चित करते हैं कि हमारे आरओ में कम से कम 50mg/लीटर टीडीएस पानी निकले। यह पानी स्वाद और सेहत के लिए मुफीद होता है। डब्ल्यूएचओ ने कहा है कि एक दिन में 4 ग्राम से ज्सादा सॉल्ट नहीं लेना चाहिए, लेकिन भारत एक व्यक्ति 9 ग्राम सॉल्ट लेता है। अगर पानी में ज्यादा टीडीएस होता है तो और ज्यादा सॉल्ट शरीर के अंदर जाता है। उससे ब्लड प्रेशर बढ़ता है। एनजीटी ने जो सवाल उठाए हैं, उसके लिए भी सही तथ्य पेश करने पड़ेंगे ताकि आरओ को लेकर भ्रम की स्थिति ना बने।'
-महेश गुप्ता, चेयरमैन, केंट आरओ

क्या कहते हैं डॉक्टर
'अगर टीडीएस 100 तक है तो वह ठीक है। हां, किडनी के मरीजों के लिए 50 से 100 के बीच टीडीएस होना चाहिए।'
-डॉ़ के. के. अग्रवाल, सीनियर कार्डियॉलजिस्ट

'सेफ वॉटर के लिए अगर बैक्टीरिया, वायरस हटाने हैं तो पानी उबालने से ये सब मर जाते हैं, लेकिन अगर उसमें हेवी मेटल्स हैं तो वे उबालने से नहीं जाएंगे। उसके लिए आरओ की जरूरत होती है।'
-डॉ़ एस. के. सरीन, डायरेक्टर, इंस्टिट्यूट ऑफ लिवर एंड बाइलरी साइंसेज

पानी साफ करने के परंपरागत तरीके
पानी को उबालना: वैसे तो पानी को साफ और पीने योग्य बनाने के लिए ढेरों तरीके मौजूद हैं, लेकिन सबसे पुराना तरीका है पानी को उबालना। दुनियाभर में इस परंपरागत तरीके को लोग अपनाते हैं। पानी को कम-से-कम 20 मिनट उबालना चाहिए और उसे ऐसे साफ कंटेनर में रखना चाहिए, जिसका मुंह छोटा हो ताकि उसमें गंदगी न जाए। उबले पानी को ढक कर रखें। हालांकि उबालने से पानी साफ तो हो जाता है, लेकिन उसमें मौजूद हेवी मेटल्स नहीं निकल पाते।

कैंडल वॉटर फिल्टर: पानी को साफ करने के लिए दूसरा मुफीद तरीका है कैंडल वॉटर फिल्टर। इसमें समय-समय पर कैंडल बदलने की जरूरत होती है ताकि पानी बेहतर तरीके से साफ हो सके। सिरैमिक से बने कैंडल्स पानी से बैक्टीरिया हटाते हैं। हालांकि यह पानी में घुले हुए केमिकल को निकाल नहीं पाता। इसके कैंडल को 6 महीने या इस्तेमाल के हिसाब से बदलते रहना चाहिए। कैंडल की कीमत करीब 550 रुपये से शुरू होती है। फिल्टर के साइज के साथ-साथ कीमत बढ़ती रहती है।

क्लोरिनेशन: पानी साफ करने के लिए क्लोरिनेशन बहुत पुरानी प्रक्रिया है। पानी को हानिकारक बैक्टीरिया से बचाने के लिए नगरपालिका, अस्पताल, रेलवे आदि की टंकियों में क्लोरीन का इस्तेमाल किया जाता है। इस प्रक्रिया से पानी साफ होने के साथ-साथ उसके रंग और गंध में भी बदलाव आ जाता है। क्लोरिनेशन से बैक्टीरिया मर जाते हैं। हालांकि इसका इस्तेमाल सही मात्रा में किया जाना चाहिए क्योंकि ज्यादा क्लोरीन से पानी के स्वाद के साथ हमारी सेहत पर भी असर पड़ता है। घरों में इसका इस्तेमाल करना हो तो एक्सपर्ट की सलाह लें।

पानी साफ करने के आधुनिक तरीके
RO (रिवर्स ऑस्मोसिस)
आरओ पानी साफ करने की ऐसी तकनीक है, जिसमें प्रेशर डालकर पानी को साफ किया जाता है। इस तकनीक में पानी में घुली अशुद्धियां, पार्टिकिल्स और मेटल खत्म हो जाते हैं। आरओ का इस्तेमाल उन इलाकों में करना चाहिए जहां पानी में टीडीएस (टोटल डिसॉल्व्ड सॉल्ट) ज्यादा हो यानी पानी खारा हो। मसलन बोरवेल के पानी के लिए या समुद्री इलाकों के लिए आरओ सही है।
खूबियां
- आरओ के पानी में कोई भी अशुद्धि नहीं रहती।
- बैक्टीरिया और वायरस को ब्लॉक कर बाहर करता है।
- क्लोरीन और आर्सेनिक जैसी अशुद्धियों को भी साफ करता है।
कमियां
- बिजली की जरूरत पड़ती है।
- यह नॉर्मल से ज्यादा टैप वॉटर प्रेशर में काम करता है।
- औसतन 20 से 50 फीसदी पानी आरओ के रिजेक्ट सिस्टम से बर्बाद होता है।
- कई आरओ हमारे पीने के पानी से जरूरी मिनरल्स को बाहर कर देते हैं।

कौन-सा RO लें?
आरओ के इतने ब्रैंड्स और फीचर्स आने के बाद सबसे ध्यान रखने वाली बात यह है कि जो भी फाइनल करें, वह आपके इलाके के सप्लाई वॉटर के हिसाब से हो। मसलन, अगर मेट्रो सिटी में रह रहे हैं तो जाहिर है कि वहां का पलूशन लेवल ज्यादा होगा। इसका असर सप्लाई हो रहे पानी पर भी पड़ेगा। ऐसे में प्योरीफायर वही लें जिसमें RO, UV, UF तीनों तकनीक हो। इसके साथ ही चूंकि जरूरी मिनरल्स की शरीर को जरूरत होती है, ऐसे में बाजार में आ चुकी TDS (टोटल डिसॉल्व्ड सॉल्ट) कंट्रोलर तकनीक से लैस प्योरिफायर ही लें, जिससे शरीर में बैलेंस बना रहे।

UV (अल्ट्रावॉयलेट)
इस तकनीक से पानी में मौजूद बैक्टीरिया और वायरस खत्म होते हैं। यह पानी में घुली क्लोरीन और आर्सेनिक को साफ नहीं कर सकता। इसका इस्तेमाल उन इलाकों में ही होना चाहिए जहां ग्राउंड वॉटर पहले से मीठा हो और सिर्फ बैक्टरिया को खत्म किए जाने की जरूरत हो। मसलन, पहाड़ी और कम प्रदूषण वाले इलाकों के लिए ठीक है। इसे समुद्री इलाकों में या प्रदूषित शहरों में इस्तेमाल करना सही नहीं होगा।
खूबियां
- सभी बैक्टीरिया और वायरस को खत्म कर देता है।
- यह नॉर्मल टैप वॉटर प्रेशर में काम कर सकता है।

अल्ट्रा फिल्ट्रेशन (UF)
यह एक फिजिकल तकनीक है। इसे ग्रैविटी तकनीक भी कहते हैं। इसमें किसी केमिकल का उपयोग किए बिना पानी साफ हो जाता है। इसमें तकनीक अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन तरीका एक ही है और वह यह कि यह ग्रैविटी की वजह से इसमें पानी विभिन्न परतों से होते हुए नीचे पहुंचती है और इस दौरान पानी साफ हो जाता है। कुछ में इसके लिए मेंब्रेन (झिल्ली) का इस्तेमाल होता है तो कुछ में सेरेमिक का जिससे पानी छनकर साफ होकर मिलता है।
खूबियां
- बिजली की जरूरत नहीं।
- बैक्टीरिया और वायरस को मार कर पानी से बाहर करता है।
- नॉर्मल टैप वॉटर प्रेशर में काम कर सकता है।
-किसी केमिकल इस्तेमाल नहीं होता।
-यह सस्ता है।
कमियां
पानी हार्ड हो और क्लोरीन और आर्सेनिक की मात्रा ज्यादा हो तो इसका कोई फायदा नहीं। यह घुली हुई अशुद्धियों को साफ नहीं कर पाता।

पोर्टेबल प्योरिफायर
यह छोटे आकार का होता है। इसमें अक्सर नैनो टेक्नॉलजी या फिर मेटल बेस्ट प्योरिफिकेशन होता है।
खूबियां
-इसमें बिजली की जरूरत नहीं होती।
-इसे कहीं भी साथ ले जाना आसान है।
-इसे सीधे टैप में लगाकर साफ पानी मिल जाता है।
कमियां
-ज्यादा गंदा पानी के लिए कारगर नहीं।
-हार्ड वॉटर या खारे पानी में काम नहीं करता।
-बैक्टीरिया और वायरस को निकालने की इसकी क्षमता कम होती है।

हैलोजन टैब्लेट: इमर्जेंसी या ट्रैकिंग के दौरान पानी साफ करने के लिए हैलोजन टैब्लेट का इस्तेमाल किया जाता है। ये गोलियां पानी में पूरी तरह घुल जाती हैं। बाजार में पोर्टेबल एक्वा वॉटर टैब्लेट्स की 50 टैब्लेट्स लगभग 500 रुपये में आती हैं। इसी तरह एक्वाटैब्स वॉटर प्योरिफिकेशन की 100 टैब्लेट्स लगभग 1100 रुपये में आती हैं।

चंद जल सूत्र
Q. फिल्टर होने के कितने दिनों बाद तक उस पानी को पी सकते हैं?
A. आरओ से फिल्टर होने के बाद पानी अगर सही तापमान यानी फ्रिज में रखा है तो करीब एक हफ्ते तक ठीक रहता है।

Q. फिल्टर को कितने समय पर बदल लेना चाहिए?
A. अगर आप अपने घर में हर दिन 20 लीटर पानी साफ करते हैं तो फिल्टर को 6 महीने के अंदर बदल देना चाहिए।

Q. पानी साफ होने के बाद आरओ से बर्बाद हुआ पानी पौधों में डाल सकते हैं?
A. एक अनुमान के मुताबिक दिल्ली में घरों में लगे आरओ से हर दिन काफी पानी बर्बाद हो जाता है। इतने पानी से करीब 20 लाख लोगों की प्यास बुझाई जा सकती है। चूंकि आरओ पानी से सारी अशुद्धियां निकाल देता है तो बर्बाद हुए पानी में प्रदूषण ज्यादा होता है। अगर इस पानी को पौधों में डालेंगे तो पानी के जरिए प्रदूषण पौधों में भी जाएगा। साथ ही, यह पानी जमीन के अंदर जाने पर जमीन के पानी को भी खराब करेगा। हालांकि, कुछ कंपनियों का यह दावा कि इस पानी को स्टोर करके गार्डनिंग कर सकते हैं। इस बेकार पानी को इस्तेमाल करने का बेस्ट तरीका है कि इसका इस्तेमाल कपड़ा धोने और साफ-सफाई में किया जाए।

Q. कहा जाता है कि आरओ वॉटर से बाल धोने से फायदा होता है। क्या यह सही है?
A. चूंकि आरओ वॉटर से प्रदूषण फैलाने वाले कण निकल जाते हैं। इसलिए आरओ के पानी से बाल धोने से फायदा हो सकता है।

Q. पानी की टंकी के लिए सबसे बेहतरीन मटीरियल कौन-सा है?
A. वॉटर टैंक किसी भी मैटिरियल का हो अगर उसमें पानी लगातार निकलता और भरता रहता है तो वह हानिकारक नहीं है। अगर पानी के टैंक में पानी लंबे समय तक जमा रहता है तो मटीरियल से फर्क पड़ सकता है। वैसे फूड ग्रेड प्लास्टिक का पानी टैंक सबसे अच्छा माना जाता है। इससे पानी की क्वॉलिटी खराब नहीं होती। आजकल स्टेनलेस स्टील की भी टंकियां आने लगी हैं। सीमेंट की टंकियों की परंपरा पुरानी है।

Q. तांबे या चांदी के बर्तन में पानी पीने से क्या वाकई फायदा होता है?
A. तांबे या चांदी के बर्तन में पानी पीने से तभी फायदा होता है जब पानी पहले से साफ हो। गंदा पानी इन बर्तनों में रखकर पीने से फायदे के बजाय नुकसान करेगा क्योंकि जब पानी तांबे, चांदी या सोने जैसे मेटल के संपर्क में आता है तो आयोनाइजेशन प्रक्रिया होती है। अगर पानी साफ होता है तो यह फायदा करता है, लेकिन अगर पानी गंदा हुआ तो यह नुकसानदायक साबित होता है।

Q. क्या स्टेनलेस स्टील का परंपरागत वॉटर फिल्टर शुद्ध पानी देता है?
A. स्टेनलेस स्टील का परंपरागत वॉटर फिल्टर तभी कामयाब होता है जब पानी में टीडीएस या क्लोराइड या फ्लोराइड या वायरस जैसी हानिकारक अशुद्धियां नहीं हैं। अगर ये अशुद्धियां हैं तो वह पानी शुद्ध नहीं कर पाता।

Q. घर के अंदर पानी सप्लाई के लिए किस तरह की पाइप अच्छी मानी जाती हैं?
A. फूड ग्रेड प्लास्टिक की पाइपलाइनें सबसे अच्छी मानी जाती हैं। जीआई पाइप में जंग लगने की आशंका होती है।

Q. अगर गर्मी में पानी की टंकी से बहुत गर्म पानी आ रहा है हो तो क्या आरओ को बंद कर देना चाहिए?
A. अगर पानी की टंकी का पानी 40 से 45 डिग्री सेल्सियस तक गर्म है तो आरओ चलाने में कोई दिक्कत नहीं है। अगर इससे ज्यादा गर्म होता है तो आरओ को बंद कर देना चाहिए।

Q. आजकल में गली-गली में वॉटर प्यूरिफायर यूनिटें लग गई हैं। इनसे गैलन में पानी पैककर मोहल्लों, खासकर बाजारों में बेचा जाता है। क्या उस पानी की क्वॉलिटी स्तरीय होती है?
A. कई इलाकों में पानी की सप्लाई कम होने या पानी साफ न होने की वजह से लोग पानी की 20 लीटर का गैलन खरीदते हैं। यह 40-70 रुपये में आता है। इसे सप्लायर कई बार इस्तेमाल करते हैं और अक्सर इन्हें ढंग से साफ नहीं किया जाता। हालांकि कुछ बड़ी कंपनियां साफ-सफाई का ख्याल रखती हैं। बोतल की गंदगी के अलावा पानी की क्वॉलिटी पर भी सवाल है। हां, अगर किसी ने बीआईएस से लाइसेंस लिया हो तो उसका पानी पी सकते हैं।

Q. क्या पानी फूड कैटिगरी में शामिल है?
A. भारत में पानी फूड कैटिगरी में नहीं है। दुनिया के तमाम देशों में इसे फूड कैटिगरी में रखा गया है। अगर पानी फूड की कैटिगरी में आ जाता है तो उस पर 'प्रीवेंशन ऑफ फूड अडल्ट्रेशन ऐक्ट' लागू होगा। ऐसे में अगर पानी में कोई मिलावट हुई तो यह आपराधिक श्रेणी में आ जाएगा और पानी सप्लाई करने वाली एजेंसी पर केस दर्ज हो जाएगा। भारत में अधिकतर पानी की सप्लाई सरकारी एजेंसियों के पास ही है। अगर इस दायरे में पानी आता है तो लोगों को साफ पानी देने की जिम्मेदारी इन एजेंसियों की हो जाएगी।
Q. क्या कोई प्राइवेट कंपनी भी पानी की जांच करती है? क्या इसके लिए पैसे भी लगते हैं?
A. अगर पानी गंदा आ रहा है तो इसकी जांच जल बोर्ड की लैबरेटरी से कराई जा सकती है। यह पूरी तरह से फ्री है। प्राइवेट कंपनियों से भी जांच कराई जा सकती है। मिनिस्ट्री ऑफ साइंस के तहत एनएबीएल प्रमाणित लैबरेटरी से पानी की जांच कराई जा सकती है। एनएबीएल की वेबसाइट www.nabl-india.org पर जाकर, ऊपर लिखे Laboratory Search को क्लिक करने पर Accredited Laboratories का ऑप्शन आता है, इसमें जरूरी जानकारी भरने पर आपको नजदीकी लैब के बारे में पूरी जानकारी मिल जाती है। यहां से पूरे देश की लैबरेटरीज की जानकारी और उनके नंबर लिए जा सकते हैं।

घर में क्वॉलिटी चेक
मार्केट में पानी का टीडीएस मापने की एक पेननुमा मशीन आती है। इसे डिजिटल टीडीएस मीटर कहते हैं। यह मीटर 600 से 1500 रुपये तक की आता है। हालांकि इससे सिर्फ टीडीएस का ही पता चलेगा। दिल्ली जल बोर्ड की लैब में फोन करके भी सैंपल चेक करवा सकते हैं। जल बोर्ड की टीम सैंपल उठाने आएगी और जांच के बाद आपको पूरी रिपोर्ट देगी। ऐसा ही दूसरे शहरों की पानी सप्लाई करने वाली सरकारी एजेंसी करती है।

दिल्ली में पानी की जांच के लिए इन नंबरों पर संपर्क किया जा सकता है:
टोल फ्री: 1916
011-23634469
9650291021

आखिर में निचोड़ क्या है?
Q. अगर सरकारी एजेंसी द्वारा पीने के पानी की सप्लाई की जा रही है तो क्या प्योरिफायर की जरूरत है?
A. अगर सरकारी एजेंसियों की पाइपलाइनें सही हैं, उनमें लीकेज नहीं है और पानी घर की टंकी में स्टोर भी नहीं किया जा रहा यानी पानी सीधे इस्तेमाल कर रहे हैं तो वह पानी पीने के लिए सेफ है। इसके लिए प्योरिफायर की जरूरत नहीं है, लेकिन अमूमन ऐसा कम ही होता है। पानी की पाइप्स में लीकेज भी होते हैं और हम उन्हें टंकी में स्टोर भी करते हैं। ऐसे में सेरमिक फिल्टर वाला प्योरिफायर इस्तेमाल करना चाहिए।

Q. अगर पीने के पानी का सोर्स ग्राउंड वॉटर है, तब कौन-सा प्योरिफायर इस्तेमाल करें?
A. इसके लिए जरूरी है कि सबसे पहले ग्राउंड वॉटर की जांच कराएं। अगर पानी साफ है तो सिर्फ फिल्ट्रेशन से काम चल जाएगा। सच तो यह है कि ज्यादातर जगहों पर ग्राउंड वॉटर साफ है, लेकिन फैक्ट्री या डंप एरिया के करीब के ग्राउंड वॉटर में केमिकल्स मिल जाते हैं। अगर पानी में आर्सेनिक, क्लोराइड या फ्लोराइड की मौजूदगी है, तब आरओ लगाना जरूरी हो जाता है।

Q. क्या आरओ प्यूरीफायर से मिनरल्स वाकई निकल जाते हैं?
A. आरओ पानी से सूक्ष्म पोषक तत्व भी निकाल देता है। इन तत्वों के निकलते ही पानी की पीएच वैल्यू गिर जाती है यानी पानी फिर ऐसिडिक बन जाता है। पीएच का स्केल 0-14 के बीच होता है। पीएच वेल्यू 7 से नीचे होने पर पानी ऐसिडिक होता है। 7 से ऊपर होने पर पानी अल्केलाइन होता है। हमारा शरीर 97 फीसदी तक अल्केलाइन है। पीने लायक पानी की पीएच वैल्यू 6.5 से 8.5 के बीच होना चाहिए।

Q. आजकल आरओ कंपनियां दावा करती हैं कि वे पानी में मिनरल्स भी मिलाती हैं। क्या यह दावा सही है? और इससे सेहत पर कोई बुरा असर तो नहीं पड़ता?
A. आरओ के जरिए पानी साफ करने से अशुद्धियों के साथ-साथ पानी के पोषक तत्व भी खत्म हो जाते हैं। इसलिए आजकल कई आरओ कंपनियां मिनरल्स कैंडल्स के जरिए बाहर से पोषक तत्व भी पानी में मिलाती हैं। उनका यह दावा किसी हद तक सही है। दूसरा भी तरीका है। सबसे पहले पानी से बैक्ट्रीरिया मारने के लिए यूएफ फिल्टर से पानी को साफ किया जाता है। अब 90 फीसदी पानी को आरओ तकनीक में से गुजारा जाता है। इससे घुलनशील अशुद्धियां जैसे मैग्निशियम, कैल्शियम और मिनरल्स आरओ के जरिए खत्म हो जाती हैं। यूएफ फिल्टर से साफ किए हुए बाकी 10 फीसदी पानी को अब इसमें मिला दिया जाता है ताकि मिनरल्स की कमी पूरी की जा सके। इससे सेहत पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता है।

Q. क्या आरओ का पानी पीना सेहत के लिए हानिकारक है?
A. पानी में मौजूद हर तरह की चीजों को आरओ निकाल देता है। इसमें केमिकल्स, मिनरल्स, पल्यूटेंट्स और टीडीएस भी शामिल हैं। पानी से मिनरल्स को भी पूरी तरह निकाल देने से लंबे समय तक मिनरल रहित पानी पीना सेहत के लिए समस्या पैदा कर सकता है। एक तरफ कैल्शियम के निकल जाने से हड्डियों में कमजोरी आ सकती है तो मैग्निशियम की कमी से क्रैंप्स हो सकते हैं। हालांकि, इसमें बहुत ज्यादा घबराने की जरूरत नहीं है। कारण यह है कि अब ज्यादातर आरओ कंपनियां अपने आरओ के पानी में मिनरल्स मिलाने लगी हैं।

...और आखिर में एक एक्सपर्ट की राय
घर में अगर सरकारी पानी आ रहा है तो आरओ लगवाने की कोई जरूरत नहीं है। आरओ का पानी मिनरल-रहित होता है- यह बात सामने आने पर कंपनियां अब कुछ मात्रा में मिनरल मिलाने लगी हैं। पर यह कोई समाधान नहीं है। वे एक फिक्स्ड फॉर्म्युले में मिनरल मिलाते हैं, पर यह फॉर्म्युले किसने तय किया है? किस आधार पर तय हुआ है? हर इलाके का जमीन का पानी अलग किस्म का होता है और पानी में करीब 140 किस्म के मिनरल होते हैं। आरओ हर तरह के वायरस का भी खात्मा नहीं कर पाता। मसलन: सुपरबग वायरस।
-संजय शर्मा, प्रेसिडेंट, Be Enviro Wise

संडे नवभारत टाइम्स 

Tuesday, 4 June 2019

थोड़ी सी तपिश जरूरी है शरीर को

थोड़ी तपिश किस कदर ज़रूरी है पढ़ें.

डरिये. क्योंकि डरना जरुरी है.

बैठे बैठे अचानक पैर 'फ्रीज' हो जाना.
डॉ रिंकी सिद्धार्थ
USA की एक बड़ी कम्पनी है United Health Group. इसकी कुछ शाखायें हमारे देश में भी हैं.. मेरे छोटे बहनोई कुछ समय पहले तक इसी कम्पनी में कार्य कर रहे थे. फिलहाल भारत में इस कम्पनी को OPTUM के नाम से भी जाना जाता है.

लगभग दो ढाई वर्ष पहले की बात है. उसी कम्पनी की ग्रेटर नोएडा ब्रांच में एक युवा इंजीनियर जॉब कर रहे थे. अभी शादी हुई नहीं थी तो अकेले ही एक कमरे में रहते थे. सुबह उठकर नहा धोकर ऑफिस के समय से बहुत पहले ही ऑफिस पहुंच जाते थे.  वहां ऑफिस की कैन्टीन में ही नाश्ता करने के बाद अपने केबिन में पहुंचकर कम्प्यूटर पर शुरु हो जाते थे.  दिन में खाना ऑफिस कैन्टीन में.  शाम को ऑफिस टाइम के बाद भी रुकना.  वहीं डिनर करना और रात को 9-10 बजे के आसपास कमरे पर जाकर सो जाना.

यह सज्जन कई बार शनिवार और रविवार (वहां 5 day week चलता है) को भी ऑफिस चले जाते थे.  ज़िन्दगी आराम की गुजर रही थी.

एक दिन ऑफिस में बैठे हुये इन सज्जन को टॉयलेट जाने की आवश्यकता महसूस हुई.  लेकिन वह अपने पैरों को हिला ही नहीं सके.  खड़े होना चाह रहे थे -खड़े न हो सके.  उन्होंने अपने आसपास बैठे साथियों को आवाज देकर बताया कि मैं खड़ा नहीं हो पा रहा हूं, तो साथियों ने समझा कि वह मजाक कर रहे हैं.  यह सज्जन रूआंसा हो उठे और इनकी आवाज बहुत घबराकर निकलने लगी तब जाकर इनके मित्रों ने इनकी बात को सीरियसली लिया. उन्होंने खड़े करने की कोशिश की, पर यह तो पैरों पर खड़े हो नहीं हो पा रहे थे. तुरन्त एक बड़े अस्पताल को फोन कर एम्बुलेंस बुलाई गई. उन्हें उठाकर एम्बुलेंस में और फिर अस्पताल पहुंचाया गया.  वहां पहुंचकर कई टैस्ट किये गये तो पता चला कि शरीर में विटामिन डी लगभग समाप्त हो गया था, और इसकी वजह से उनके घुटनों में जोड़ सूखकर अकड़ गये थे.

उनको अगले दो दिनों में 6-6 लाख IU के विटामिन डी के तीन इंजेक्शन लगाये गये.  कैल्सियम व विटामिन बी 12 के भी हैवी डोज दिये गये.  4-5 दिन हॉस्पीटल रहकर घर वापस आ गये.

और इस पूरी समस्या की वजह?? धूप में बिल्कुल न निकलना.  हर समय AC में रहना.. दूध, दही, कच्चा पनीर जैसी चीजों का बहुत कम प्रयोग करना.  शारीरिक व्यायाम बहुत कम करना.

अगर आप स्वयं या आपके कोई परिचित यह समझते हैं कि आप बिल्कुल फिट हैं, आपको कैल्सियम या विटामिन डी की कोई कमी नहीं है तो इस ऊपर के उदाहरण को फिर से पढ़िये.  एक तीस वर्ष के आसपास की आयु का बिल्कुल फिट जवान आदमी अचानक ही अपने पैरों पर खड़ा भी नहीं हो सका.

मेरी 35-40 वर्ष से ऊपर के सभी स्वस्थ /अस्वस्थ महिलाओं और पुरुषों से विनम्र प्रार्थना है कि अगर आप पहले से विटामिन डी और विटामिन बी 12 नहीं ले रहे हैं तो एक बार विटामिन डी व विटामिन बी 12 का टैस्ट जरूर करा लें. अगर आपकी ये दोनों रिपोर्ट सही आयें तो इसी पोस्ट के नीचे अपनी रिपोर्ट शेयर करते हुये अपने 2000₹ बेकार करने के लिये मुझे बहुत बुरा भला कहें..

लेकिन मेरा दावा है कि 35-40 वर्ष की आयु से अधिक वाले 90% से अधिक का विटामिन डी और विटामिन बी 12 लेवल जरूर जरूर कम आयेगा, बहुत कम आयेगा.

कृपया एक बार ये दोनों टैस्ट जरूर करवा लें. और भविष्य में हो सकने वाली बीसियों बीमारियों को होने से पहले ही अपने से दूर रखिये.

Sunday, 2 June 2019

नवें ग्रह की खोज में

नवें ग्रह की खोज में
चंद्रभूषण
परंपरा से नवग्रह पूजन के आदी हम भारतीयों के लिए प्लूटो के ग्रहसूची से बाहर हो जाने के बाद ग्रहों का घट कर आठ ही रह जाना किसी पर्सनल ट्रैजडी से कम नहीं है। लेकिन सौर मंडल के बाहरी हिस्से पर काम कर रहे अंतरिक्ष विज्ञानियों की मानें तो आने वाले समय में ग्रहों की संख्या एक बार फिर आठ से बढ़कर नौ हो सकती है। हवाई के मौना-की पर्वत पर कनाडा और फ्रांस के सहयोग से बने विशाल टेलीस्कोप से 2013 और 2017 के बीच किए गए आउटर सोलर सिस्टम ओरिजिन्स सर्वे (ओसोस) ने बाहरी सौरमंडल में 840 पिंड खोजकर रहस्यों का बहुत बड़ा पिटारा खोल दिया है।

इनमें 2015 बीपी 519 समेत उन नौ पिंडों का आकर्षण सबसे ज्यादा है, जो सूरज की परिक्रमा 20 हजार साल या इससे भी ज्यादा समय में सौरमंडल के ग्रहीय तल से काफी झुकी हुई कक्षाओं में करते हैं। हमारी पृथ्वी के कुछ सहोदर ऐसे भी हैं, जिनका एक साल हमारे 20 हजार वर्षों से भी ज्यादा लंबा होता है, यह बात किसी को भी हैरत में डाल सकती है। लेकिन इनकी शिनाख्त के साथ ही यह सवाल भी उठ खड़ा हुआ है कि सूरज से इतनी दूर इनकी मौजूदगी की वजह क्या हो सकती है।

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि ऐसा इस सुदूर इलाके में किसी बड़े ग्रह की उपस्थिति में ही संभव है, जिसका वजन पृथ्वी का दस गुना हो सकता है। सूरज से इतनी दूर, इतने विराट अंधियारे दायरे में सौर परिवार के इस संभावित नवें वरिष्ठ सदस्य की उपस्थिति के संकेत कैसे खोजे जाएं, यह खगोल विज्ञान का अगला सिरदर्द साबित होने जा रहा है।

Saturday, 1 June 2019

जैवविविधता और योद्धा की देह गंध

योद्धा की देह गंध
चंद्रभूषण
अमेजन नदी के उत्तरी छोर पर मौजूद तर जलवायु वाले जंगली इलाके आज भी अपने रहस्यों के लिए जाने जाते हैं। दुनिया के आधे वर्षा-वन यहीं हैं और जंगल खत्म करने के तमाम उपायों के बावजूद जैव-विविधता की वैश्विक राजधानी होने का गौरव इसी क्षेत्र को प्राप्त है। अभी इस इलाके के प्रिप्रिओका नाम के पौधे की जड़ से निकली खुशबू धरती के हर कोने को अपनी गिरफ्त में लेती जा रही है।

इस खुशबू का स्वरूप कुछ ऐसा है कि इससे बनी परफ्यूम स्त्री-पुरुष दोनों पर फबती है और नमकीन, मीठे दोनों तरह के खानों के साथ भी इसका जबर्दस्त मेल बैठता है। भारत की पहचान इसके इत्र और मसालों से जुड़ी रही है, लिहाजा सुदूर ब्राजील से आई एक खुशबू को इतना ऊंचा मुकाम मिलना हमें अजीब लग सकता है। लेकिन प्रिप्रिओका की गंध समझने और फैलाने का काम ही बमुश्किल 50 साल पहले शुरू हुआ है, लिहाजा नई चीज मानकर हमें इसकी कद्र करनी चाहिए।

उत्तरी ब्राजील के आदिवासियों में अद्भुत देह गंध वाले पिरीपिरी नाम के एक अजेय योद्धा के किस्से कहे जाते हैं, जो कहीं भी खुद को घेर लेने वाली सुंदरियों से परेशान रहता था। एक बार सुपी नाम के ओझा की बिटिया ने अपने बाप से पिरीपिरी को वश में करने का तरीका पूछा और पूर्णिमा की रात में उसके पैर अपनी जुल्फों से बांधने लगी।

संयोगवश ठीक उसी समय योद्धा पिरीपिरी की नींद खुल गई और वह बादल बनकर सदा के लिए गायब हो गया। कथा के मुताबिक पिरिपिरिओका (अभी प्रिप्रिओका) धरती पर उसी योद्धा की आखिरी निशानी है। हालांकि इसकी खुशबू का जायजा आप करीब 2000 रुपये लगाकर ही ले पाएंगे।

Friday, 31 May 2019

कितना सुरक्षित है आरओ का पानी ?

स्कंद शुक्ला
यह किस आधार पर तय हो कि भारतीय जनता कहाँ आरओ का पानी पिये और कहाँ नहीं ? आरओ यानी रिवर्स ओस्मोसिस की पद्धति से प्राप्त पानी किन अशुद्धियों को पानी से हटाता है ? क्या पूरे भारत के हर महानगर और हर गाँव का हर व्यक्ति आरओ-जल पीने लगे ? और इस तरह से इस जलपान के दुष्प्रभाव क्या हैं ?

आपके घर में आरओ-यन्त्र लगा है ? यदि हाँ , तो आपने इसे लगवाने का निर्णय कैसे लिया ? किस आधार पर ? क्या सचिन तेन्दुलकर और हेमा मालिनी के विज्ञापनों को देखकर ? अथवा किसी वैज्ञानिक आधार पर मिली जागरूकता की वजह से ?

भारत में पेयजल का संकट बढ़ रहा है और आने वाले समय में यह और भीषण रूप लेगा : ऐसे में यह जानना महत्त्वपूर्ण है कि आरओ के अन्धे प्रयोग ने पानी की बर्बादी में बड़ी भूमिका निभायी है। इसी बाबत नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने पर्यावरण-मन्त्रालय को पत्र लिखा है और कहा है कि जिन स्थानों में टोटल डिजॉल्व्ड सॉलिड्स ( टीडीएस ) की मात्रा 500 मिलीग्राम / लीटर से कम हो , वहाँ आरओ के प्रयोग पर प्रतिबन्ध लगा देना चाहिए।

पेयजल में कई प्रकार की अशुद्धियाँ हो सकती हैं। घुले हुए ठोस पदार्थ ( टीडीएस ) जिनका ऊपर ज़िक़्र किया गया है , उनमें से एक हैं। भारत में अलग-अलग स्थानों में टीडीएस की मात्रा पानी में अलग-अलग है। आरओ इन पदार्थों को पानी से अलग कर देता है। लेकिन हर स्थान पर ये पदार्थ इतने नहीं कि इन्हें निकालने की ज़रूरत पड़े। उलटा इन्हें हर जगह निकालने से पानी का जो 'अतिशुद्धीकरण' आरओ मशीनों द्वारा किया जाता है , उससे पानी की गुणवत्ता गिर जाती है।

कुछ हद तक टीडीएस हमें चाहिए, हमारे लिए ज़रूरी है। टीडीएस-मुक्त जल पीना कोई बहुत अच्छी बात नहीं। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि टीडीएस की मात्रा एक निश्चित हद में रहे , न ज़्यादा और न कम। आरओ-यन्त्र टीडीएस को पानी से अलग कर देते हैं। इस क्रम में लगभग अस्सी प्रतिशत तक पानी बरबाद होता है और केवल बीस प्रतिशत पीने योग्य पानी मिलता है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का मन्त्रालय से निवेदन है कि प्राप्त पानी कम-से-कम 60 % हो , ऐसा प्रावधान आरओ-निर्माता दें। यानी चालीस प्रतिशत से अधिक पानी बर्बाद न हो।

आरओ-यन्त्र विकसित देशों में वहाँ इस्तेमाल होते हैं , जहाँ समुद्री पानी से लवण अलग करके उसे पीने योग्य बनाना होता है। भारत में इन्हें लगाने की एक भेड़चाल चल पड़ी है। जिसे देखो , आरओ का पानी पी रहा है और आरओ-यन्त्र लगवा रहा है ? क्यों , यह जानकारी है ही नहीं। जो थोड़ा बहुत टीडीएस को जानते हैं , वे उसे एकदम मानव-शरीर का शत्रु समझे बैठे हैं।

यह आपका कर्त्तव्य और अधिकार दोनों है कि अपने जलकल-संस्थान से संवाद स्थापित करें। वहाँ अभियन्ता व अन्य अधिकारियों से मिलें। पूछें कि जो पानी आप पी रहे हैं , उसमें टीडीएस कितना है ? क्या 500 से अधिक है ? क्या आपको अपने घरों में आरओ लगवाने की ज़रूरत है ? कहीं आरओ लगवा कर आप पेयजल को दोयम दर्ज़े का नहीं बना रहे ? कहीं आपके आरओ-यन्त्र के कारण अस्सी फीसदी पानी नाली में तो नहीं ?  अगर हाँ , तो यह कितनी बड़ी नासमझी और कितनी बड़ी बर्बादी है !

आरओ-यन्त्रों की बिक्री जनता में भय फैला कर चल रही है , ऐसा नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का मानना है। यह प्रचार करो कि हर जलस्रोत एकदम प्रदूषित है। हर जगह जीवाणु हैं , हर जगह टीडीएस एकदम उच्च। हर पानी के स्रोत में फ़्लोराइड है और आर्सेनिक भी। कौन जाकर अपने अपने इलाक़े के जेई से सच्चाई जानेगा ? सब केवल टीवी पर महानायकों-महानायिकाओं को देखेंगे और 'शुद्ध पानी' के लिए उनका कहा मान लेंगे। विज्ञापन की विज्ञान पर जीत होगी।

( इस लेख के साथ नीचे नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की रिपोर्ट पर आधारित लेख का लिंक दे रहा हूँ। कुछ अख़बारों में इस ख़बर का विवरण भी। इन्हें पढ़िए। अपने स्थानीय जलकल-अभियन्ता से मिलिए। पूछिए उनसे कि क्या आपका पेयजल इतना अशुद्ध है , जितना बाज़ार बताता है ? क्या पूरे देश में हर व्यक्ति को आरओ का पानी ही पीना चाहिए ? )