Friday, 29 November 2019

एक ही ध्यान विधि कर देती है कल्याण

एक ही ध्यान विधि कर देती है कल्याणः श्री एम
An Interview with Spiritual Guru Sri M

आजकल जब बीएचयू विवाद के सिलसिले में संस्कृत में विद्वान मुस्लिम प्रफेसर की चर्चा हो रही है, ऐसे में एक ऐसे आध्यात्मिक गुरु से आपको रूबरू कराते हैं जो एक पारंपरिक मुस्लिम परिवार में पैदा हुए और फिर हिंदू धर्म की नाथ परंपरा से दीक्षित योगी बन गए। यह संन्यासी नहीं, मगर साधना सिखाते हैं। सिद्ध योगी हैं, पर शादीशुदा भी हैं। दो बच्चे हैं। हजारों अनुयायी हैं, लेकिन बड़े-बड़े और आलीशान आश्रम नहीं हैं और न ही साबुन-तेल आदि का कारोबार करते हैं। यह 70 बरस के मुमताज अली हैं जो 'श्री एम' के नाम से विख्यात हैं। 'सत्संग फाउंडेशन' के जरिए अपने मिशन को अंजाम दे रहे हैं। मिशन यह कि सब धर्मों-जातियों के लोग आपस में मिल-जुलकर रहें और ध्यान के माध्यम से अपने भीतर से जुड़कर शांति-आनंद महसूस करें। आंध्र प्रदेश में मदनपल्ली में रहते हैं। देश-विदेश में घूम-घूमकर क्रियायोग और ध्यान सिखाते हैं। इसका एक पैसा नहीं लेते। इन्होंने आजकल के कई दूसरे गुरुओं की तरह अध्यात्म को धंधा नहीं बनाया है। अपनी चर्चित आत्मकथा 'एक योगी का आत्मचरित' में अपने अनोखे आध्यात्मिक अनुभवों के बारे में लिखा है जिन पर एक बारगी यकीन नहीं होता। पिछले दिनों जब वह दिल्ली आए तो राजेश मित्तल ने उनसे बातचीत की। पेश हैं खास हिस्सेः

Q. आपने ध्यान पर हाल में एक किताब लिखी है। तो ध्यान क्या इतना आसान है कि बिना किसी गुरु के, दीक्षा-दक्षिणा के चक्कर में पड़े बिना उसे सीखा जा सकता है?
A. अगर कोई शख्स पूरी किताब पढ़ ले, ऐसा न हो कि एक चैप्टर में ध्यान का जो ब्योरा दिया हुआ है, खाली उसे पढ़े। अगर पूरा पढ़े और उसमें जो सावधानियां लिखी गई हैं, वे भी समझ में आ जाएं तो जरूर वह शख्स ध्यान करना शुरू कर सकता है। किताब लिखने का मेरा मकसद ही यही है। दरअसल ध्यान को बड़ा रहस्यपूर्ण बना दिया गया है, मंत्र-दीक्षा के परदों के जरिए।

Q. आप ध्यान के लिए रोज महज 15 मिनट का एक अभ्यास बताते हैं। इसे कितने अरसे तक करके कहां तक पहुंचा जा सकता है? या यह सिर्फ गृहस्थों के लिए ही है?
A. जवाब देने के लिए मैं आपको एक कहानी सुनाऊंगा। सच्ची घटना है। बहुत बड़े योगी थे श्यामाचरण लाहिड़ी। बनारस में रहते थे। उनके ढेर सारे शिष्य थे। इनमें एक प्रफेसर साहब भी थे जो सांख्य, वेदांत, तर्कशास्त्र - सब पढ़े हुए आदमी थे। उनको लाहिड़ी महाशय ने क्रिया योग की बेसिक टेक्नीक सिखाई। वह हर 4 हफ्ते गुजरने के बाद बनारस आते थे और बोलते थे कि अगली टेक्नीक कब मिलेगी। लाहिड़ी महाशय के एक और शिष्य थे जो पोस्टमैन थे। उन्होंने पढ़ाई-लिखाई ज्यादा नहीं की थी। खाली पता पढ़ लेते थे। लाहिड़ी महाशय ने जब बेसिक टेक्नीक प्रफेसर को दी थी, उसी समय पोस्टमैन को भी यही टेक्नीक दी थी। एक साल गुजर जाने पर जब प्रफेसर साहब अगली टेक्नीक सिखाने पर जोर दे रहे थे, तभी पोस्टमैन भी आ गया। लाहिड़ी महाशय ने उसे बुलाया। पूछा, ‘तुझे अगली टेक्नीक कब दूं?’ पोस्टमैन बोला, ‘महाराज, मुझे अभी छोड़ दीजिए। जो आपने सिखाया था, उसे रोजाना करता हूं। अब तो बाहर जाता हूं तो लोग समझते हैं, पीने लगा हूं क्योंकि अब मैं ठीक से चल नहीं पाता। अंदर इतना आनंद हो रहा है कि समझ नहीं आता कि चिट्ठियां कैसे पहुंचाऊं। यह हालत हो गई है मेरी। अगर आप आगे की टेक्नीक देंगे तो मेरी क्या हालत होगी। मत दीजिए।’ फिर लाहिड़ी महाशय ने प्रफेसर को कहा, ‘भैया, सुन लिया। तो बार-बार मत पूछिए, अगली टेक्नीक क्या है।’ मैं यह इसलिए कह रहा हूं कि अगर बेसिक टेक्नीक को ही पूरे मन से करना शुरू करें, लगातार करें तो ज्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं। ध्यान कोई विंडो शॉपिंग नहीं है कि एक टेक्नीक यहां से सीख ली, फिर दूसरी टेक्नीक किसी दूसरे गुरु से। जो टेक्नीक जानते हैं, उसी पर फोकस रखकर लगातार करते रहें तो कहीं तक भी जा सकते हैं। करते-करते ऐसा वक्त आएगा कि जो जरूरी है, वह आप तक अपने आप पहुंच जाएगा। ऐसी प्रवृत्ति गलत है कि थोड़े दिन करके ही कहने लगें कि कुछ हो नहीं रहा।

Q. तो क्या कभी ऐसी स्टेज आ सकती है कि जो अभी गृहस्थ है, वह संन्यास की तरफ चला जाए या गृहस्थ में रहते हुए ही आत्मज्ञान हासिल हो जाएगा?
A. मैंने अभी जिन लाहिड़ी महाशय का जिक्र किया, वह तो गृहस्थ थे, संन्यासी नहीं थे। मगर क्रिया योग के अभ्यासी थे। थोड़े लोग संन्यास भी लिए हुए हैं- युक्तेश्वर महाराज, योगानंद परमहंस वगैरा। ये सभी संन्यासी थे। मेरे गुरु महेश्वर नाथ बाबाजी भी संन्यासी ही थे। लेकिन खुद मैं गृहस्थ हूं। मुझे मेरे गुरु ने संन्यास लेने की इजाजत नहीं दी। यानी गृहस्थ भी आध्यात्मिक ऊंचाई तक पहुंच सकते हैं। मगर ऐसे लोग भी होते हैं जो संन्यास लेकर अपना पूरा वक्त ध्यान, साधना और समाधि में बिताना चाहते हैं। ये लोग संन्यास ले सकते हैं।

Q. यानी संन्यासी बनें या गृहस्थ, कोई फर्क नहीं पड़ता?
A. फर्क पड़ता है क्योंकि मुझे लगता है कि संन्यासी बनकर रहने से मुश्किल है गृहस्थ बनकर साधना करना।

Q. यह तो उल्टी बात हो गई कि संन्यासी का जीवन आसान है?
A. हां, एक तरह से उल्टी बात ही है। सचाई यह है कि साधना के हिसाब से गृहस्थ का जीवन आसान नहीं है। जो ब्रह्मचारी से सीधा संन्यास ले लेते हैं, उनके लिए थोड़ा आसान है क्योंकि उनके लिए बाहरी परिस्थितियां ज्यादा चुनौती नहीं बनतीं। अब अगर आप संन्यासी बन जाएं और गेरुआ पहनकर कहीं आश्रम में रहें या दूर कुटिया में रहकर आप ध्यान कर रहे हैं तो कोई आपको परेशान करने वाला नहीं है और न ही आपको कोई शिष्य बनाना है, न कुछ काम करना है। हमारी हालत ऐसी नहीं है। हम बस में जाते हैं, कार में जाते हैं, प्लेन में जाते हैं, लोगों को मिलते हैं। तो हमारे फंस जाने के आसार काफी ज्यादा होते हैं। मेरी दिली इच्छा थी कि मैं गेरुआ पहनकर कहीं अकेला संन्यासी बनके घूमता रहूं। पर गुरुजी का कहना था कि यह नहीं होगा, तुम्हारा काम अलग है। तुम गृहस्थों के साथ काम करोगे, इसलिए तुम्हारे लिए गृहस्थ बनना ही बेहतर है। तो मैं गृहस्थ बन गया। आज भी कभी-कभी लगता है कि संन्यास ले लूं। फिर सोचता हूं, बाबाजी ने ठीक ही कहा। संन्यास ले लेता तो समाधि में ही बैठे रहने में मन रम जाता। लेकिन ढेर सारे लोग हैं जिन्हें अध्यात्म के सही स्वरूप के बारे में समझाने का काम किया है। तब यह काम कहां हो पाता।

Q. कुछ लोग गुरु बन जाते हैं और कहते हैं कि मोक्ष दूंगा। कैसे पता लगता है कि साधक अब सिद्ध बन गया है, अब वह बटोरने के बजाय बांट सकता है? यह तय करने का हक किसे है?
A. बड़ा मुश्किल सवाल है। इतना कहूंगा कि अगर आपके गुरु बहुत पहुंचे हुए हैं तो वह सर्टिफाई सकते हैं कि अब तुम तैयार हो। दूसरा यह है कि अगर कोई व्यक्ति इस स्थिति पर पहुंच जाए, जहां संतुष्टि के लिए बाहरी दुनिया पर निर्भरता नहीं रहती, जहां आनंद अंदर से आना शुरू हो जाए, जहां उसे निंदा और स्तुति एक ही लगे। स्तुति से कोई ऊपर उठ नहीं जाता और निंदा से कोई नीचे गिर नहीं जाता। यह स्थिति अगर मन में स्थिर हो जाए, अगर स्थितप्रज्ञता हो जाए, तब कह सकते हैं कि हां, अब हम सिखा सकते हैं। तब तक आपको हजारों अलौकिक अनुभूतियां (विजन) भी हो जाएं, तब भी वहां नहीं पहुंचेंगे। विजन तो किसी योगी से कहीं ज्यादा एलएसडी अडिक्ट को होते हैं।

Q. अंदर से कोई किस स्तर पर है, इसकी असलियत या तो इंसान को खुद पता है या फिर, आपके मुताबिक, उसके गुरु को। लेकिन अगर कोई सामने वाला ऐसा दावा कर रहा है तो उसकी हकीकत हमें कैसे मालूम हो सकती है?
A. इसके लिए उसके जो बाहरी तामझाम हैं, उन पर ज्यादा ध्यान न दें। जैसे कि दाढ़ी कितनी लंबी है, सिर पर क्या बांधा है, चेले-चपाटे कितने रसूख वाले हैं। इन चीजों से प्रभावित न हों। देखें कि उसका स्वभाव कैसा है, जीवन में सादगी है या लग्जरी, अनुभव भी है या खाली ज्ञान ही है। यह भी देखना चाहिए कि देने के लिए आए हैं या हमारे पास से कुछ लेने के लिए आए हैं। जो असल में पहुंचा हुआ होता है, वह ध्यान, ज्ञान, भक्ति, जप, मंत्र, दीक्षा को पैसे से नहीं बेचता। वह जो अमीर-गरीब, मंत्री-संत्री नहीं देखता। वह ज्यादा पैसे देने वाले को खास तवज्जो नहीं देता।

Q. आजकल ध्यान की विधियां चंद हेर-फेर करके अपना ठप्पा लगाकर बेची जा रही हैं, पर आपने अपनी ध्यान विधि को कोई नाम नहीं दिया है। ऐसा क्यों?
  A. आप कैसे नाम देंगे। यह जो संपदा हमारे पास है, वह ऋषियों की दी हुई है। हम इसे बेच नहीं सकते। जब बेचना शुरू कर देते हैं तो अध्यात्म खत्म हो जाता है, कारोबार चालू हो जाता है। आजकल यह आम है। अगर मंत्र दीक्षा के लिए परंपरा के चलते दक्षिणा की जरूरत है तो एक रुपया और फूल ले लो। अगर इससे कमाने लगे तो कोई पैसेवाला आ गया तो उसकी पूछ ज्यादा होगी। जो गरीब आदमी होगा लेकिन सच्चा साधक, उसे कोई नहीं पूछेगा। अध्यात्म में राजा और रंक एक समान होने चाहिए।

Q. कई बाबा लोग संयम-त्याग की बात करते-करते खुद रईस बन गए हैं। बड़े-बड़े आश्रम बना लिए हैं।
A. अरे, क्या बताएं आपको। एक महाराज हैं, बड़े प्रसिद्ध हैं। हाल में मैंने उनका एक विडियो देखा। किसी ने उनसे पूछा, आप उपनिषद क्यों नहीं सिखाते? वह बोले, 'उपनिषद की क्या जरूरत है। मैं तो हूं।' रामकृष्ण परमहंस ने उपनिषद नहीं पढ़े थे, मगर उन्होंने भी ऐसे नहीं कहा कि उपनिषद की क्या जरूरत है, मैं हूं। अब स्वामी विवेकानंद ने उपनिषद पूरे पढ़े हैं। उन्होंने मना नहीं किया क्योंकि यह अलग तरीका है, ज्ञान का।

Q. आज के समय के जो आध्यात्मिक गुरु हैं, उनमें से आप किन्हें सम्मान देते हैं?
A. मैं इस पर कुछ नहीं बोलूंगा।

Q. आपने उस अवस्था को पाया तो आपको कब लगा कि अब मैं बांटने निकल सकता हूं?
A. 25 साल का था जब बाबा जी ने जब मुझे अपने पास से उतारा। बोलेः 'जाओ, अभी तुम संसार में उतरो, गृहस्थ बनो। लेकिन तुम अभी किसी को कुछ नहीं सिखाओगे क्योंकि तुम अभी इस लायक नहीं हुए हो। जब तक तुम्हें ये-ये संकेत न मिलें, तब तक किसी को कुछ नहीं सिखाना। ये अनुभूतियां होने तक मुंह मत खोलना।' मैं दूसरे लोगों के सत्संग में जाता था। कभी-कभी लगता था कि ये क्या बात कर रहे हैं। यह तो गलत है। क्यों बोल रहे हैं। लेकिन मैं मुंह नहीं खोल सकता था क्योंकि बाबाजी का ऑर्डर था। कभी-कभी यह बहुत टॉर्चर लगता था। सोचता था कि अब तो हम सिखा सकते हैं। फिर भी मुझे थोड़ा संकोच हुआ कि करना है या नहीं। 37 का था जब शादी कर ली। बाद में दो बच्चे भी हुए। फिर 40 साल का हो गया। एक दिन में बेंगलुरु गया। वहां हमारे एक दोस्त हैं। जूलर हैं। उन्होंने कहा कि थियोसोफिकल सोसाइटी में संडे को कुछ बोल सकते हो क्या। मैंने कहा, सोचकर बताऊंगा। मैंने घर जाकर आंखें मूंदीं। बाबाजी से प्रार्थना की। मैंने कहाः 'बाबाजी, मुझे लग रहा है, आपने जैसा कहा, अभी मैं तैयार हूं। मैं जाऊं या नहीं, कोई संकेत दे दीजिए।' फिर सो गया। नींद में एक अजीबोगरीब संकेत मिलाः मैं एक ट्रेन में बैठा हूं और ट्रेन पर लिखा है- सत्संग। मैं उसके अंदर बैठा हूं, बाहर देख रहा हूं। बाबाजी आ रहे हैं। पैर में जूते नहीं हैं मगर रेलवे गार्ड के सफेद कपड़े पहने हैं और सिर पर टोपी भी नहीं है। हाथ में एक ग्रीन लैंप लेकर हिला रहे हैं। ट्रेन ने सीटी मारी और चली गई। मैं अचानक उठा और सोचा, यह संकेत ही तो है। मैं संडे को वहां गया। मैंने सोचा कि कोई 2-4 लोग बैठे होंगे। जब देखा तो वहां हॉल में सौ आदमी बैठे थे। मुझे लगा, अभी क्या होगा। मैं बैठा, फिर मुझे ध्यान आया कि बाबाजी ने मुझे बहुत साल पहले कहा था, एक समय आएगा कि तुम्हें ढेर सारे लोगों के सामने भाषण देना होगा। मैंने कहा, कैसे हो पाएगा। बाबाजी बोले, तुम्हारे सामने जो बैठा होगा, उससे बात करना। भूल जाओ दूसरे लोगों को। मुझे यह आइडिया याद आ गया। मैंने सामने वाले सज्जन को देखा और उनसे बात करना शुरू किया। उन्हें हिमालय की अपनी यात्रा के बारे में बताया। यह पहला सत्संग था। फिर आगे सिलसिला शुरू हो गया।

Q. वे अनुभूतियां कौन-सी थीं जिनका अनुभव होने के बाद ही आपको गुरु बनने की इजाजत थी?
A. जब बाबाजी ने मुझे उतारा था, तब मेरी अवेयरनेस का लेवल गले (विशुद्धि चक्र) तक था। यहां तक अगर जागृति जाए तो किसी भी चीज के बारे में आदमी बखूबी बोल सकता है। विशुद्धि चक्र वाक् से जुड़ा है। बाबाजी ने कहा था, 'जब तक अवेयरनेस सिर के ऊपरी हिस्से तक (सहस्रार चक्र) न पहुंचे, मुंह मत खोलना।' तब सहस्रार तक कभी-कभार पहुंच जाता था, पर वहां टिक नहीं पाता था। एक बार तीन दिन के लिए मैं कहीं गया था। मुझे पूरा याद नहीं है। उसके बाद वापस आया तो लगा कि एक-आधे सेकंड के अंदर जब भी चाहूं, तब अवेयरनेस को सहस्रार तक ला सकता हूं। यही तो बाबाजी ने कहा था कि जब ऐसा हो जाएगा, तब तुम सिखा सकते हो। अभी मैं आपसे बात कर रहा हूं तो अटेंशन वहां गया तो शुरू हो गया। मगर उसको मैं नीचे ला रहा हूं क्योंकि अभी आपसे बातचीत करनी है।

Q. यह जो सहस्रार चक्र तक पहुंचना है, इस स्थिति को कहते क्या हैं?
A. इस एक स्थिति को बयां करने के लिए कई शब्द हैंः मोक्ष, निर्वाण, बुद्धत्व आदि। मुझे कैवल्य शब्द पसंद है। इसका मूल शब्द है केवल। कैवल्य की स्थिति में ऐसा महसूस होता है कि कुछ नहीं है, खाली मैं हूं। मैं मतलब ईगो नहीं। जो तू है, वो मैं हूं। हम सब एक ही हैं। बाकी कुछ है ही नहीं। केवल एक ही है। सामान्य स्थिति में हम यह सचाई महसूस नहीं कर पाते।

Q. कैवल्य या आत्मज्ञान पाने का क्या सिर्फ यही एक तरीका है, सहस्रार चक्र तक पहुंचना?
A. अलग-अलग तरीके हैे। जैसे जो योग का तरीका है, उसमें अवेयरनेस सहस्रार तक हो जाए तो हम कैवल्य कह सकते हैं। मगर वेदांत के मुताबिक जब मन की सारी शंकाएं मिट जाती हैं, मन स्थिर हो जाता है और यह समझ में आ जाता है कि एक ब्रह्म ही है, बाकी कुछ नहीं।  भक्ति के मार्ग में तब, जब भक्ति इतनी हो जाए कि लगे, खाली भगवान हैं, मैं भी नहीं हूं। तो इसके अलग-अलग तरीके होते हैं।

Q. अभी आपने जो तीन स्टेज बताईं, यहां कोई साधक जब पहुंच जाता है तो वहां पर पहुंचने के बाद वापस पुरानी स्टेज पर आ जाता है या हमेशा वहीं बना रहता है?
A. पहले-पहल वहां टच करके आते हैं। पहले जाते हैं, फिर आते हैं। साधना करते-करते बाद में ऐसी स्थिति आती है कि अवेयरनेस वहां जब तक चाहें, टिकाकर रख सकते हैं। दुनियावी कामों के लिए लौटना पड़ता है। लेकिन जब चाहें, सेकंडों में वहां दुबारा पहुंच सकते हैं।

Q. साधना के मार्ग में सिद्धियों को लेकर आम लोगों में बड़ा ग्लैमर दिखता है। क्या सिद्धि नाम की कोई चीज होती भी है?
A. होती है, मोक्ष प्राप्ति सबसे बड़ी सिद्धि है। और कुछ नहीं है। बाकी सब बेकार है।

Q. लेकिन क्या अलौकिक शक्तियां नाम की कोई चीज है?
A. है क्योंकि मन का विस्तार और विकास हो जाता है। ऐसे में आदमी की क्षमता बढ़ जाती है। यह सच है, मगर इस पर ज्यादा ध्यान नहीं देना चाहिए। इससे हम अपने मूल उद्देश्य से भटक जाते हैं।

Q. क्या साधना में कोई ऐसी स्टेज आती है जहां पहुंचने के बाद सारा ज्ञान डाउनलोड हो जाता है? उसके बाद कोई किताब पढ़ने की जरूरत नहीं? किसी ज्ञानी के पास जाकर सीखने की जरूरत नहीं?
A. उपनिषद में कहा गया है कि एक ज्ञान ऐसा है जिसका अनुभव होने पर दूसरे किसी ज्ञान की जरूरत नहीं रह जाती। यह ज्ञान परब्रह्म का ज्ञान है। और दूसरा कुछ है ही नहीं। केवल वही है। ऐसा ज्ञान अगर हो जाए तो दूसरे किसी ज्ञान की जरूरत नहीं पड़ती। क्या करेंगे दूसरे ज्ञान का, कोई जरूरत नहीं पड़ती इसलिए दूसरा कुछ पढ़ने की जरूरत नहीं, ऐसा कहा गया है। इसका मतलब यह नहीं कि योगी जो समाधि में पहुंच गया, वह पार्टिकल फिजिक्स के बारे में भी जानता है। मगर मन का ऐसा विस्तार हो जाता है कि अगर वह चाहे तो जरूर ट्यून-इन करके मालूम कर सकता है। मगर हर वक्त वह सारी नॉलेज लेकर नहीं घूमता।

Q. मतलब यह कि क्वांटम फिजिक्स के बारे में आपको जानना है तो आप ट्यून-इन करके उस बारे में जान सकते हैं। क्या ऐसा सचमुच संभव है? क्या आपने कभी करके देखा है? तो क्या आपको कोई किताब पढ़ने की अब जरूरत नहीं है? क्या आपको किसी साधु-महात्मा के पास जाकर कुछ सीखने की जरूरत नहीं रही?
A. साधु-महात्मा के पास अब जाकर सीखने की कोई जरूरत नहीं क्योंकि ऐसे साधु-महात्मा कम हैं। मगर जहां तक साइंस की बात है तो मैं क्वांटम फिजिसिस्ट, बायोलजिस्ट वगैरा लोगों से मिलता रहता हूं।  ऐस्ट्रनामिकल सोसाइटी और इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस, बेंगलुरु में बोलने के लिए जाता रहता हूं। तब क्वांटम फिजिक्स के बारे में बात करनी पड़ती है। इसलिए मैं थोड़ा कुछ सीख जाता हूं। किताब पढ़कर नहीं। कुछ कनेक्ट कर लेता हूं। फिर वहां सारे साइंटिस्ट बैठे हैं तो उनसे बातचीत करने से कुछ हमें समझ में आ जाता है। पर उन्हें नहीं बताता हूं। सोचेंगेः बड़ा खतरनाक आदमी है, हमारे फील्ड में घुसपैठ कर रहा है। उपमा देकर अपनी बात कहता हूं, देखो ऐसा है। अभी कभी-कभी किताब वगैरा भी पढ़ लेता हूं। मगर मैं जो भी पढ़ता हूं, मेरे दिमाग में नहीं रहता। भूल जाता हूं। मेरा प्रोग्राम होता है तो मझे याद नहीं रहता है कि टॉपिक क्या है। कार से उतरते वक्त पूछता हूं कि आज सब्जेक्ट क्या है। ऐसे में आयोजक अगर नए हों तो वे एकदम डिप्रेस्ड हो जाते हैं। अरे, इनको तो सब्जेक्ट भी नहीं मालूम। क्या बोलेंगे। मगर जो मुझे जानते हैं, वे कहते हैं, हो जाएगा। तो वहां जाकर कुछ होता है। क्या होता है, पता नहीं।

Q. विज्ञान इतना खर्च यह खोजने में करता है कि एलियंस है कि नहीं, ब्लैक होल के पार कोई दूसरा यूनिवर्स है कि नहीं, तो आप उनकी मदद कर दें। आप सीधा उत्तर दे सकते हैं। 
A. उत्तर दे सकता हूं, मगर कोई उसे लेने वाला नहीं है। कोई मानेगा नहीं। आज का माहौल ऐसा है कि अगर साइंटिस्ट कहेगा, तभी उसे मानेंगे। इसलिए वैज्ञानिकों की हम मदद कर सकते हैं। जो असल में बड़े साइंटिस्ट होते हैं, वे बड़े खुले दिमाग वाले होते हैं।

Q. मैं कुछ तथ्य जानना चाहता हूं। क्या एलियंस हैं? हैं तो कहां हैं? 
A. एलियंस हैं, मगर कहां हैं, यह नहीं बोलूंगा।

Q. क्या उनकी सभ्यता हमसे ज्यादा विकसित है?
A. ज्यादा विकसित है।

Q. क्या कभी आप उनसे मिले या बातचीत हुई? 
A. मैं क्या बताऊं, लोग हंसेंगे। मैं इतना कह सकता हूं कि वे हैं और यह पहली बार नहीं है कि वे धरती से संपर्क में हैं। अभी नहीं, हजारों साल से संपर्क में हैं। हमारी भोगवादी संस्कृति के कारण यह धरती खत्म होने वाली है। इसे कैसे बचाएं, वे इन कोशिशों में हैं। मुझे लगता है कि 50 बरसों के अंदर या इससे कहीं जल्दी उनके और हमारे वैज्ञानिकों के बीच संपर्क स्थापित हो जाएगा। वे छिपकर रहते हैं।

Q. वे अभी धरती पर हैं?
A. हो सकता है।

Q. क्या माइंडफुलनेस यानी साक्षी भाव हर वक्त बना रह सकता है, क्या 24 घंटे, सातों दिन?
A. कभी-कभी टूट जाता है मगर जो योगी है, वह कोशिश करता है कि 24 घंटे यह चले।

Q. नींद में भी? 
A. आमतौर पर नींद में जो होता है, वह बाद में याद नहीं रहता। लेकिन योगी की स्थिति ऐसी होती है कि उसकी अवेयरनेस बनी रहती है। नींद में क्या हुआ, पूरा याद रहता है। उसे आम नींद नहीं आती, नींद में बड़े आनंद का अनुभव होता है।

Q. मौत के बाद क्या होता है?
A. इसी सवाल पर नचिकेता को यमदेव ने कहा था, 'मौत है ही नहीं, होना क्या है। आम समझ में लगता है, अभी जीवन है,  फिर मौत है। तुम असल में मृत्यु-रहित हो। तुम्हारा न जन्म होता है, न मृत्यु।' मगर दूसरे तरीके से अगर देखा जाए तो स्थूल शरीर की मौत के बाद सूक्ष्म शरीर जीवित रहता है और अपने कर्म के हिसाब से दूसरे लोक में जाता है। मगर अपनी अधूरी इच्छाएं पूरी करने के लिए इस दुनिया में वापस आता है। अगर कुछ नहीं रहता तो वापस नहीं आता। जायादातर लोग वापस आते हैं।

Q. बैठकर ध्यान करना जरूरी है या चलते-फिरते होश में रहना? 
A. दोनों जरूरी हैं लेकिन बैठकर ध्यान करना ज्यादा जरूरी है। सिटिंग मेडिटेशन किए बिना आपको स्थिरता हासिल नहीं होगी। रोज कम से कम 10 मिनट ध्यान कर लेना चाहिए।

Q. ऐसा क्यों होता है कि हम जानते हुए भी गलत काम करते जाते हैं। बदलाव स्थायी नहीं होता। आपके सत्संग में जाएं तो अच्छा लगता है, लेकिन दो दिन बाद हम फिर अपने पुराने ढर्रे पर वापस आ जाते हैं। 
A. यह प्रकृति का खिंचाव है। प्रकृति किसी को आसानी से बाहर निकलने नहीं देती। यह कठिन लड़ाई होती है। हमारे साथ भी ऐसा हुआ था। असल में हमारे दिमाग में यह बैठ गया है कि हम कमजोर हैं, हमसे होगा नहीं। ध्यान हमें इन बनावटी सीमाओं से छुटकारा दिलाता है।

Q. तमाम आलतू-फालतू काम हो जाते हैं, बस ध्यान करना ही रह जाता है। जब भी वक्त की तंगी होती है तो पहली बलि ध्यान की होती है। इस स्थिति से कैसे बाहर निकलें?
A. इसके लिए एक चीज मन में रखनी चाहिए कि मेरी सबसे पहली प्राथमिकता ध्यान है। बाकी काम बाद में भी हो सकते हैं। ध्यान हर हाल में करना है।

Q. ध्यान करना कभी-कभी स्वार्थ लगता है। जो वक्त हमें परिवार को देना चाहिए, वह वक्त हम सिर्फ अपने मजे के लिए लगा रहे हैं।
A. ऐसा सोचिए कि मैं जो मोक्ष प्राप्ति के लिए ध्यान कर रहा हूं, यह पत्नी के लिए, बच्चों के लिए, सबके लिए अच्छा है।

Q. मैं कभी जब लंबे-लंबे समय ध्यान करता था, एक-एक, दो-दो घंटे। पत्नी कहा करती थी कि आप पार्क गए तो गए। लोग आधे घंटे में आ जाते हैं और आप इतने लेट। उन दिनों मैंने महसूस किया कि एक खास तरह की उदासी और सुस्ती मेरे अंदर आ गई थी। फिर मैंने इसे छोड़ दिया। ऐसी स्थिति में क्या करना सही है?
A. यह दुनिया पांच तत्वों से बनी है और इन पांच तत्वों के तीन गुण हैंः सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण। कुदरत की हर चीज और हर इंसान  में ये तीनों गुण रहते हैं। ये गुण हर इंसान में अलग-अलग अनुपात में होते हैं। जो इंसान साधना करके मोक्ष पाना चाहता है, उसे सतोगुण ज्यादा चाहिए। जो आदमी संसारिक सुख भोगना चाहता है, उसे रजोगुण की जरूरत होती है। रजोगुण एेक्टिविटी है- फुल ऑफ एेक्शन। इस संसार में जीने के लिए यह जरूरी गुण है। आखिर में है तमोगुण। यह इसलिए रखा गया है ताकि हम सोकर अपने तन-मन को रिचार्ज कर सकें। सुस्ती तमोगुण है। हर आदमी में यह थोड़ा तो होता ही है, मगर कई लोगों में ज्यादा होता है। उन्हें इसे सतोगुण में बदल देना चाहिए। तमोगुण से सीधा कूदकर सतोगुण में नहीं जा सकते। रजोगुण से गुजरना जरूरी है क्योंकि रजोगुण से काम करके मन को साफ कर आगे बढ़ सकते हैं। आपके सवाल के संदर्भ में बता रहा हूं। हम सतोगुण में सीधे चले जाते हैं, लगातार ध्यान ही करते रहते हैं। तब कभी-कभी तमोगुण उसके बीच में आकर उससे जुड़ जाता है। तब हमें जब आलस होता है तो हम समझते हैं कि मैं समाधि में हूं, सत्व में हूं। यहां गलती हो जाती है। इसे संभालना चाहिए। यहां रजोगुण यानी ऐक्शन जरूरी है। इसीलिए स्वामी विवेकानंद ने रामकृष्ण मिशन में कहा था कि हर समय आप लोग संन्यासी हो सकते हैं, मगर ध्यान नहीं कर सकते। कारण यह कि सतोगुण में जब जाते हैं तो हो सकता है कि तमोगुण इसके बीच में जम जाए। तब मन उदास हो जाता है और शरीर सुस्त। ऐसे में अच्छा है कि हम काम करें। मगर संन्यासी किसके लिए काम करे। अपने लिए तो कुछ जरूरी है नहीं। खाना और रहने की जगह तो यों ही मिल जाती है। इसलिए संन्यासी दूसरों के लिए करें। इससे मन साफ होता है। तब सतोगुण का जो असर होता है, वह तमोगुण में नहीं जा पाता। इसीलिए सभी धर्मों में सेवा रखी गई है। मैं कोई नई चीज नहीं कह रहा। यह ऋग्वेद से है- ‘आत्मनो मोक्षार्थम् जगत् हिताय च'। यानी इंसान को अपने मोक्ष के साथ-साथ दुनिया के कल्याण के लिए भी काम करना चाहिए। साधना के साथ-साथ सेवा करना जरूरी है।
साभार -नवभारतटाइम्स से राजेश मित्तल

Saturday, 23 November 2019

दुरंगी सतह चांद की

चंद्रभूषण
चंद्रमा पर न हवा चलती है, न पानी बहता है, न कोई ऐसी भूगर्भीय उथल-पुथल होती है, जिससे उसकी सतह की शक्ल बदलती हो। जब-तब गिरने वाले उल्कापिंडों से पैदा हुई क्षणिक हलचलों को छोड़ दें तो वहां ऐसा कुछ भी नहीं होता जिससे चंद्रमा को लेकर वैज्ञानिकों की राय अचानक बदल जाए। लेकिन अपोलो की तर्ज पर तैयार हो रहे नासा के नए चंद्र अभियान आर्टेमिस की ताजा रिपोर्ट पर भरोसा करें तो वैज्ञानिक इस बात को लेकर चकित हैं कि चंद्रमा की सतह एकरंगी नहीं है।

उस पर गहरे और हल्के रंग वाले वैसे ही सुडौल लहरियादार पैटर्न दिखते हैं, जैसे धरती पर रेगिस्तानों में या समुद्र तटों पर नजर आते हैं। लूनर स्वर्ल (चंद्र भंवर) नाम की इन संरचनाओं के बनने का कारण क्या है, इस पर वैज्ञानिकों के बीच बहस जारी है। पृथ्वी जैसा कोई एकीकृत चुंबकीय क्षेत्र चंद्रमा का नहीं है लेकिन चुंबकीय सुई उसके अलग-अलग इलाकों में काफी कमजोर मगर अलग-अलग चुंबकीय क्षेत्र प्रदर्शित करती है।

एक वैज्ञानिक राय यह है कि जहां भी यह चुंबकीय क्षेत्र ज्यादा मजबूत है वहां सूरज से सौर वायु के रूप में आने वाले उच्च ऊर्जा वाले आवेशित कण छिटक कर परे चले जाते हैं। इससे ये इलाके कम फुंकते हैं और इनका रंग हल्का रह जाता है। इस राय का सही या गलत होना 2024 में ही पक्का होगा जब अमेरिकी चंद्रयात्री चंद्रमा का सघन चुंबकीय सर्वे करेंगे।

अगर राय सही हुई तो खेमे गाड़ने के लिए हल्के रंग वाली जगहें ज्यादा सही रहेंगी क्योंकि वहां रेडिएशन एक्सपोजर तुलनात्मक रूप से कम रहेगा। इनके बरक्स गहरे रंग वाले इलाकों में नमी होने की संभावना ज्यादा है, बशर्ते वे ध्रुवीय दायरे में हों और उन्हें कोई आड़ मिली हुई हो।

Saturday, 16 November 2019

अलग तरह का जीवन

चंद्रभूषण
पृथ्वी पर जीवन का समूचा ढांचा सिर्फ दो रासायनिक अणुओं पर टिका है- डिऑक्सीराइबो न्यूक्लिक एसिड (डीएनए) और राइबो न्यूक्लिक एसिड (आरएनए)। इनमें भी जीवन का आधार पहला वाला ही है। किसी भी जैविक संरचना से जुड़ी सारी सूचनाएं इसमें संचित होती हैं और इसी के जरिये एक से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती हैं। किसी बच्चे की नाक लंबी होगी या चपटी, रंग गोरा होगा या काला, यहां तक कि बड़ा होकर वह अकेलखोर निकलेगा या मिलनसार, यह सब सिर्फ और सिर्फ उसके डीएनए पर निर्भर करता है, जो उसे आधा-आधा उसकी मां और पिता से हासिल होता है।

इसके बरक्स आरएनए की भूमिका सीमित है। इसके अणु छोटे होते हैं और कोशिका के भीतर इनकी मुख्य भूमिका प्रोटीन बनाने के सूक्ष्म कारखानों राइबोजोम्स और न्यूक्लियस में स्थित डीएनए के बीच संदेशवाहक जैसी होती है। वैज्ञानिकों की एक बड़ी उत्सुकता यह है कि इन दो के अलावा क्या कोई तीसरे प्रकार का रासायनिक अणु भी हो सकता है, जिसे प्रकृति ने शुरू में ही जेनेटिक सामग्री के रूप में आजमाकर खारिज कर दिया हो।

कंप्यूटर पर इस दिशा में किया गया काम उन्हें 11 लाख 60 हजार से भी ज्यादा वैकल्पिक अणुओं के संधान की तरफ ले गया है, हालांकि प्रयोगशाला में इनके निर्माण और परीक्षण का काम अभी बाकी है। कण भौतिकी में ऐसा कहा जाता है कि जो हो सकता है, वह होता है। यानी जिस भी कण की प्रस्थापना दी जाती है, वह कभी न कभी खोज भी लिया जाता है। तो क्या भविष्य में किसी ग्रह-उपग्रह पर कोई गैर-डीएनए-आरएनए आधारित जीवन भी खोजा जा सकेगा?

Friday, 1 November 2019

पुराने कंप्यूटर को कैसे करें अपग्रेड ?

संत समीर
हमारे जैसे ग़रीब-ग़ुरबों के लिए, जो अपने पुराने कम्प्यूटर की रफ़्तार से आजिज़ आ चुके हैं, पर नए कम्प्यूटर में पैसा लगाने से बचना चाहते हैं। परसों मैंने अपने क़रीब आठ साल पुराने कम्प्यूटर को अपग्रेड करते समय जो अनुभव किया वह आपको बताता हूँ।

कम्प्यूटर की रफ़्तार बढ़ाने का सबसे आसान तरीक़ा यह है कि आप ऑपरेटिङ्ग सिस्टम को चलाने के लिए अब तक जो हार्ड डिस्क ड्राइव (HDD) इस्तेमाल कर रहे थे, उसकी जगह पर एसएसडी (SSD) लगाइए। यह आपके कम्प्यूटर की रफ़्तार कई गुना तेज़ कर देगी। इसका मतलब यह न समझें कि आपकी पुरानी हार्ड ड्राइव बेकार हो जाएगी। ऑपरेटिङ्ग सिस्टम के अलावा यह आपके बाक़ी सारे माल-असबाब का ज़ख़ीरा (डेटा) पूर्ववत, बल्कि पहले से कुछ ज़्यादा सुरक्षित ढङ्ग से सहेजने का काम करती रहेगी।

एचडीडी और एसएसडी में अन्तर यह है कि एचडीडी ठीक-ठाक इस्तेमाल की जा रही हो तो इसकी उम्र आठ-दस साल ही मानिए, क्योंकि यह मैकेनिकल होती है। इसके ठोस दिखने वाले डिब्बे के भीतर मोटर, घिर्री, बेल्ट का समायोजन होता है। कान लगाकर इसकी तेज़ रफ़्तार की सनसनाहट आप महसूस कर सकते हैं। एसएसडी नाम से ही है, सॉलिड स्टेट ड्राइव, यानी इसके भीतर कोई ऐसी चीज़ नहीं होती, जो चलती या घूमती हो। यह पूरी तरह सॉलिड होती है, इस नाते इसकी उम्र भी बहुत ज़्यादा होती है। यह जिस तकनीक पर काम करती है, वह दिलचस्प है, पर उसका विस्तार ज़्यादातर लोगों के शायद काम का न हो। बस इतना ध्यान देना चाहिए कि आप ऐसी एसएसडी लें, जिसमें कण्ट्रोलर बढ़िया लगा हो। डेटा संयोजित करने की ज़िम्मेदारी कण्ट्रोलर ही निभाता है। सामान्य टाइपिङ्ग वग़ैरह के ही काम निकालने हों तो बिना कण्ट्रोलर वाली सस्ती एसएसडी से भी काम चला सकते हैं, पर मेरी राय में आप एक ऐसी एसएसडी लें कि पाँच-दस साल तक भी आपको तकनीकी रूप से पिछड़ जाने का मलाल न हो।

केवल एसएसडी के फ़ायदे सुनकर ही कोई भी एसएसडी ख़रीदने का फ़ैसला मत ले लीजिए, क्योंकि अभी हाल यह काफ़ी महँगी आती है और बिना सोचे-समझे कुछ भी ख़रीद लेने पर, अगर यह आपके कम्प्यूटर में न लग पाई, तो पछताना पड़ सकता है।

एसएसडी कई तरह की होती है, पर ज़्यदातर कामों के लिए तीन तरह की एसएसडी पर निगाह डाल लेना पर्याप्त है। पुराने ज़्यादातर कम्प्यूटरों में 2.5 SATA-3 एसएसडी लगाकर काम चलाया जा सकता है। जिनके कम्प्यूटरों में सिर्फ़ SATA-2 पोर्ट है, उनमें भी यह लग जाती है। यह बात ज़रूर है कि कम्प्यूटर में अगर SATA-3 पोर्ट हो तो रफ़्तार ज़्यादा अच्छी मिलेगी। एक एसएसडी है M.2 SATA ..पर कम्प्यूटर में ठीक से ताक-झाँक करके देख लें कि उसमें M.2 पोर्ट हो तभी इसे ख़रीदने का फ़ैसला लें। लैपटॉप में यह पोर्ट होता ही है, इसलिए यह लैपटॉप के लिए बेहतर है। वैसे इन दोनों तरह की एसएसडी की रफ़्तार में ज़्यादा अन्तर नहीं है। M.2 में आप केबल लगाने की झण्झट से बच जाते हैं बस। सबसे बढ़िया रफ़्तार वाली एसएसडी है M.2 NVMe…। SATA केबल वाली एसएसडी की तुलना में इसकी रफ़्तार सात-आठ या दस गुना तक तेज़ हो सकती है। इसके लिए देखना पड़ेगा कि कम्प्यूटर के मदरबोर्ड में ZEN 3x4 पोर्ट है या नहीं। बॉयस में भी NVMe सपोर्ट होना चाहिए, अन्यथा भूलकर भी इसे न ख़रीदें। बॉयस की अनुकूलता देखने के लिए थोड़ी ज़्यादा तकनीकी जानकारी चाहिए, पर SATA  और M.2 पोर्ट आपको मदरबोर्ड पर साफ़-साफ़ लिखे दिख जाएँगे।

कम दाम में मेरे लिहाज से WD Blue SATA SSD और Seagate BARACUDA SATA एसएसडी बढ़िया हैं। ये तीन से चार हज़ार रुपये के आसपास मिल जाएँगी। मैंने BARACUDA SATA-3  अमेजॉन से दीवाली ऑफ़र में तीन हज़ार में ख़रीदी। लेनी हो तो 120 जीबी वाली मत लीजिए। कम-से-कम 240 या 250 जीबी वाली लीजिए, तो आपको यह मलाल न रहेगा कि यह जल्दी से भर गई। समझदारी इस बात में भी है कि एसएसडी में ऑपरेटिङ्ग सिस्टम के अलावा दूसरी सामग्री मत रखिए। अन्य चीज़ों के लिए आप अलग एसएसडी या एचडीडी इस्तेमाल में लाइए। 250 जीबी से बड़ी एसएसडी लें तो ही इसमें पार्टीशन करके अन्य सामग्री रखें, लेकिन 500 जीबी के आसपास की एसएसडी आठ-दस हज़ार रुपये से कम में नहीं मिलेगी। सस्ता तरीक़ा यही है कि ऑपरेटिङ्ग सिस्टम एसएसडी पर चलाइए और अन्य चीज़ों के लिए 1-2 टीबी या इससे भी बड़ी एचडीडी ख़रीद लीजिए।

एसएसडी इंस्टालेशन का तरीक़ा आमतौर पर किसी से पूछेंगे या इण्टरनेट वग़ैरह पर देखेंगे तो दिमाग़ घनचक्कर हो सकता है, इसलिए मैं अपना आज़माया आसान-सा तरीक़ा बताता हूँ। लोग आपको बताएँगे कि आप सबसे पहले बॉयस में जाकर SATA पोर्ट का विकल्प पहले वाले से हटाकर उस पर कीजिए, जिस पोर्ट पर आपने एसएसडी को जोड़ा है..बूट ऑप्शन को हार्डड्राइव से बदल कर यूएसबी पर कीजिए, वग़ैरह-वग़ैरह। मेरे हिसाब से बॉयस पर आपको जाने की ज़रूरत तभी पड़ सकती है, जबकि इसके पहले आपने विण्डोज़ इंस्टॉल करते समय दूसरा तरीक़ा इस्तेमाल किया हो। अगर आपके पास बूटेबल पेनड्राइव है और पहले भी आपने पेनड्राइव से ही विण्डोज़ इंस्टॉल किया हो तो बॉयस को छेड़ने की ज़रूरत नहीं है। बॉयस के साथ दिक़्कत यह है कि अगर आपको इसकी ठीक से जानकारी नहीं हो, तो ज़रा भी ग़लती आपको बड़े झमेले में डाल सकती है। यहीं पर यह भी ध्यान रखें कि बूटेबल पेनड्राइव के लिए RUFUS वग़ैरह के झमेले में भी फ़ँसने की ज़रूरत नहीं है। बूटेबल पेनड्राइव आप माइक्रोसॉफ़्ट की वेबसाइट पर जाकर बड़ी आसानी से बना सकते हैं।

आपको करना दरअसल यह है कि जिस SATA  पोर्ट में ऑपरेटिङ्ग सिस्टम चलाने वाला आपका पहले वाला एचडीडी लगा हुआ है, उसके SATA  केबल को छोड़ी देर के लिए मदरबोर्ड के SATA  स्लाट से बाहर निकाल दीजए। पॉवर केबल भले लगा रहे, इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। अब जो स्लाट आपने ख़ाली किया है, उसी में एसएसडी से SATA केबल जोड़िए। यह ऑपरेटिङ्ग सिस्टम के बॉयस में जाने से बचा लेगा और आपके सिस्टम का डिफाल्ट डिवायस अपने आप चयनित हो जाएगा। अब मज़े में पेनड्राइव लगाइए और कम्प्यूटर ऑन करके विण्डोज़ इंस्टॉल कीजिए। ध्यान रखें कि विण्डोज़ इंस्टॉलेशन के बाद कम्प्यूटर अपने आप रिस्टार्ट होना शुरू हो तो पेनड्राइव बाहर निकाल लीजिए, वरना यह बार-बार विण्डोज़ इंस्टॉल करने को कहेगा और आप क्लिक पर क्लिक मारते रहेंगे और बात आगे न बढ़ेगी। विण्डोज़ इंस्टॉल करने के बाद पहले वाली हार्ड ड्राइव का SATA केबल मदरबोर्ड के किसी भी अन्य SATA पोर्ट से जोड़ दीजिए, इसके सारे पार्टीशन आपके कम्प्यूटर पर दिखाई देने लगेंगे। ऑपरेटिङ्ग सिस्टम वाले पार्टीशन को आप रखना चाहें तो रखें अन्यथा फार्मेट करके उपयोग में लें।

इस अपग्रेड से मुझे एक बात और पता चली कि हर तरफ़ सब कुछ नक़ली ही नहीं है। जब मैं परसों की रात विण्डोज़ इंस्टॉल कर रहा था तो एक बार डरा कि कहीं मेरे विण्डोज़-10  प्रोफेशनल की ‘एक्टिवेशन-की’ ओरिजिनल न हुई तो कम्प्यूटर ब्लाक भी हो सकता है। असल में दो साल पहले जब मैंने ईबे की वेबसाइट से विण्डोज़-10 प्रोफेशनल का डिजिटल ‘की-Key’ सिर्फ़ सात सौ रुपये में ख़रीदने का फ़ैसला लिया था तो आशङ्का भी हुई थी कि दस-बारह हज़ार रुपये की एक्टिवेशन-की भला सात सौ रुपये में कैसे मिल सकती है? मैंने बेवसाइट से बात की तो उन्होंने माइक्रोसॉफ्ट से ख़रीदी के तौर-तरीक़ों के बारे में कुछ बातें बताईं। बातें तो ख़ैर आधी-अधूरी ही समझ में आईं, पर आश्वस्त होकर मैंने ऑर्डर दे दिया। बाद में इण्टरनेट पर सर्च करने की कोशिश की तो यूट्यूब वग़ैरह पर लोगों ने यही बताया था कि इतनी सस्ती की-Key नक़ली हो सकती है। यह भी कि बेचने वाला बेचने के बाद पकड़ से ग़ायब हो जाता है। यह भी हो सकता है कि ऐसी ‘की-Key’ दो-चार महीने काम करे और फिर ब्लाक हो जाए। बहरहाल, मेरा विण्डोज़-10 प्रोफोशनल ओरिजिनल निकला। उस वक़्त इंस्टॉलेशन में कुछ परेशानी हुई तो फ़ोन करने पर बेवसाइट ने पूरी प्रक्रिया भी समझाई। दो साल बाद परसों जब मैंने इसे रिइंस्टॉल करते हुए माइक्रोसॉफ्ट की वेबसाइट पर लॉगिन किया तो मेरा नाम सिस्टम पर आटोमैटिक सर्च हुआ, मुझे दुबारा से की-Key डालने की ज़रूरत नहीं पड़ी और सारे अपडेट ओके हुए। यह ‘ओईएम की’ है, इसलिए इसका इस्तेमाल सिर्फ़ एक कम्प्यूटर पर ही मैं कर सकता हूँ (यह बात अलग है कि अवैध जुगाड़ मुझे मालूम है), लेकिन यह लाइफटाइम वाला है, तो अपडेट हमेशा मिलते रहेंगे। एसएसडी लगने के बाद कम्प्यूटर की रफ़्तार फर्राटेदार है।

इसे मैंने महज़ इसलिए लिखा है कि तकनीक से भी थोड़ी-सी मुहब्बत बुरी नहीं है।

Tuesday, 22 October 2019

टेढ़े क्यों बैठे हैं सूरज दादा

चंद्रभूषण
सोलर सिस्टम के अनसुलझे रहस्यों में एक सूरज की धुरी का झुकाव भी है। सौरमंडल के आठो ग्रह एक समतल में रहकर सूरज का चक्कर लगाते हैं। हम जानते हैं कि सोलर सिस्टम के कुल वजन के 1000 हिस्सों में 998 अकेले सूरज के हवाले हैं। बाकी 2 हिस्सों में न सिर्फ सारे ग्रह बल्कि उनके सभी उपग्रह, क्षुद्र ग्रह, उल्काएं, धूमकेतु और धूल वगैरह सब आ जाते हैं। ऐसे में भौतिकी की राय यही बनती है कि सौरमंडल की धुरी और सूरज की धुरी, दोनों बिल्कुल एक होनी चाहिए।

लेकिन खगोलविज्ञानी काफी पहले से जानते रहे हैं कि सूरज की अपनी घूर्णन धुरी सौरमंडल की घूर्णन धुरी से सवा सात डिग्री झुकी हुई है। यूं कहें कि सौरमंडल की तख्ती पर सूरज कुछ टेढ़ा सा बैठा है। यह बात इतनी बेतुकी है कि इसके कारणों पर वैज्ञानिक दायरों में बात तक नहीं होती। लेकिन सौरमंडल के कुछ बाहरी पिंडों का व्यवहार देखकर तीन साल पहले सौरमंडल के नवें ग्रह की प्रस्थापना क्या आई, कई बंद पड़े सवालों के ताले खटाखट खुलने शुरू हो गए। मौजूदा सदी ने सोलर सिस्टम के बाहरी इलाकों के बारे में हमारा समूचा नजरिया ही बदल डाला है।

कोंस्टैंटिन बैटीगिन और माइक ब्राउन ने पाया कि नेप्च्यून से काफी दूर स्थित सौरमंडल के बिल्कुल बाहरी सदस्यों की कक्षाएं इसके तल से ऊंचा कोण बना रही हैं। यह तभी संभव है, जब यूरेनस या नेप्च्यून जैसा, यानी पृथ्वी की तुलना में कम से कम दसगुना वजनी कोई ग्रह सौरमंडल के तल से 30 डिग्री या इससे ज्यादा झुकी हुई लगभग बीस हजार वर्षों की कक्षा में सूरज का चक्कर लगा रहा हो। खोजियों का हिसाब कहता है कि ऐसे किसी पिंड की मौजूदगी अरबों साल में सौरमंडल के तल को उतना झुका सकती है, जितना झुकाव उसकी और सूरज की धुरियों के बीच देखा जाता है।

Friday, 18 October 2019

सृष्टि क्या यह तारा बनाने के बाद रची गई?

चंद्रभूषण

धरती से 190 प्रकाशवर्ष दूर स्थित मेथुसेलह नाम का एक तारा खगोलविज्ञानियों के लिए बहुत बड़ी समस्या बना हुआ है। इसकी त्रिज्या सूरज की ठीक दोगुनी है। यानी इसका घनत्व अगर सूरज जितना होता तो इसका वजन सूरज के आठ गुने के आसपास होता। लेकिन इसके वजन की माप सूरज की अस्सी फीसदी ही निकलती है। दूसरे शब्दों में कहें तो इसका घनत्व सूरज के दसवें हिस्से के बराबर निकलता है। इसकी वजह यह है कि यह तारा मुख्यत: हाइड्रोजन और हीलियम से बना है। सूरज पर इफरात में मौजूद लोहे जैसी धातुएं इसमें न के बराबर हैं।

तारा भौतिकी की दृष्टि से यह अनोखी बात है और इससे पहली नजर में ही जाहिर होता है कि यह तारा बहुत पुराना है। उस वक्त की रचना, जब सृष्टि में धातुओं का कहीं नामोनिशान ही नहीं था! इस तारे का आधिकारिक नाम मेथुसेलह नहीं बल्कि एचडी 140283 है। मेथुसेलह नाम इसे बाइबल के सबसे बुजुर्ग चरित्र के आधार पर दिया गया, जिसकी उम्र वहां 969 साल बताई गई है। तारों की उम्र पता करने का एक जटिल शास्त्र है और तारा अगर बहुत ज्यादा दूर न हो तो इस काम में काफी सटीक नतीजे तक पहुंचा जा सकता है।

मेथुसेलह के मामले में यह आंकड़ा शुरू में 20 अरब साल का निकला था, जिसे जल्द ही 16 अरब साल पर ला दिया गया। समस्या यह थी कि ब्रह्मांड की जो उम्र निकाली गई है, वह किसी भी सूरत में 13 अरब 80 करोड़ (गलती की रेंज 21 करोड़ ) साल से पीछे नहीं जाती। तो क्या मेथुसेलह ब्रह्मांड बनने, दूसरे शब्दों में कहें तो समय की शुरुआत के भी 2 अरब 20 करोड़ साल पहले से हमारे पड़ोस में टिमटिमा रहा है। भौतिकीविदों के लिए यह एक पागल कर देने वाली प्रस्थापना थी लिहाजा इस सदी के गुजरे 18 वर्षों में वे मेथुसेलह की उम्र के पीछे ही पड़ गए और खींचतान कर इसे 14 अरब 27 करोड़ साल तक ले आए।

ब्रह्मांड की उम्र से यह फिर भी 47 करोड़ साल ज्यादा निकलती थी, लेकिन तारे की उम्र के साथ लगभग 80 करोड़ साल आगे-पीछे गलती की रेंज लगाकर चलें तो इसकी उत्पत्ति को एक छोर तक ठेलकर 13 अरब 66 करोड़ साल पहले तक ले जाया जा सकता है। इस आधार पर भौतिकशास्त्री यह सोचकर राहत की सांस ले सकते हैं कि मेथुसेलह नाम के तारे का जन्म ब्रह्मांड की उत्पत्ति के 14 करोड़ साल बाद ही हो पाया था। बात यहीं निपट जाती तो ठीक था। लेकिन इसके समानांतर एक नई मुश्किल यह खड़ी होती जा रही है कि ब्रह्मांड की ही उम्र का हिसाब वक्त बीतने के साथ बिगड़ता जा रहा है और दिनोंदिन इसे नीचे सरकाना पड़ रहा है।

ब्रह्मांड के फैलाव को निरूपित करने वाले जिस हबल कांस्टैंट के मान पर इसकी उम्र निर्भर करती है, उसकी माप नवीनतम प्रेक्षणों के अनुसार अधिक दर्ज की जाने लगी है। फॉर्मूले में यह कांस्टैंट नीचे की तरफ आता है, यानी इसका मान बढ़ने पर ब्रह्मांड की उम्र कम निकलती है। 13 अरब 80 करोड़ साल इसकी उम्र हबल कांस्टैंट के 67.4 किलोमीटर प्रति मेगापारसेक मान पर निकाली गई थी, लेकिन अभी इसे 10 फीसदी ज्यादा यानी 73 या 74 किलोमीटर प्रति मेगापारसेक निकाला जा रहा है। इस आधार पर हिसाब लगाने के बाद ब्रह्मांड की उम्र 12 अरब 70 करोड़ साल ही निकलती है। यानी बुढ़ऊ स्टार अब भी ब्रह्मांड से पुराना ही जान पड़ता है!

Thursday, 17 October 2019

दुरंगा इयापीटस और उसकी ऊंची दीवार

चंद्रभूषण
टाइटन और रिया के बाद शनि के तीसरे सबसे बड़े उपग्रह इयापीटस को सौरमंडल का सबसे रहस्यमय, सबसे आश्चर्यजनक पिंड माना जाता रहा है। करीब साढ़े तीन सौ साल पहले शनि और उसके इर्दगिर्द के माहौल का बारीकी से अध्ययन करने वाले फ्रांसीसी खगोलविद जिओवानी कैसिनी ने पाया कि इयापीटस पर चाहे कितनी भी बारीकी से टेलिस्कोप की नजर गड़ाए रखी जाए, पर वह अपने आधे रास्ते भर ही दिखाई पड़ता है। बाकी वक्त वह देखते-देखते ऐसे गायब हो जाता है, जैसे गधे के सिर से सींग।

फिर अंतत: जिओवानी कैसिनी ने ही इसकी वजह खोजी कि यह पिंड आधा बर्फ की तरह सफेद और आधा कोलतार की तरह काला है । ध्यान रहे, एक ही पिंड में रंग का इतना बड़ा फर्क खगोलशास्त्र के लिए आज भी एक अनोखी बात है। बाद में टेलिस्कोप और ताकतवर हुए तो पता चला कि इयापीटस की शक्ल कुछ ऐसी है जैसे दो गोलार्धों को जोर से चिपका कर गोले की शक्ल दी गई हो और इस कोशिश में यह गोला बीच से उभर आया हो। कुछ ऐसे, जैसे फैक्टरी में बनी हुई प्लास्टिक की गेंद।

इसके भी कुछ समय बाद दर्ज किया गया कि इसकी भूमध्यरेखा के तीन चौथाई हिस्से पर बीस किलोमीटर ऊंची एक दीवार फैली है, जो तली में दो सौ किलोमीटर चौड़ी है। इससे ज्यादा आश्चर्यजनक बात तो किसी अंतरिक्षीय पिंड के बारे में सोचना भी मुश्किल है। इस तरह की विकृतियां किसी छोटी-मोटी चट्टान नुमा उल्का के साथ होतीं तो बात समझ में आती, लेकिन इयापीटस हमारे चंद्रमा के लगभग आधे आकार वाला एक ठीकठाक बड़ा उपग्रह है, लिहाजा इनकी व्याख्या को लेकर आज भी काम चल ही रहा है।

यहां ब्यौरे में जाएं तो इयापीटस शनि का चक्कर लगभग 35 लाख किलोमीटर (पृथ्वी और चंद्रमा के फासले का कोई नौ गुना) दूरी से लगाता है और अपने ग्रह का एक चक्कर लगाने में इसे लगभग ढाई महीने लगते हैं। लेकिन इसकी कक्षा शनि के बाकी उपग्रहों और छल्लों की तुलना में काफी तिरछी है, जो कि इससे जुड़ी एक और पहेली है। बहरहाल, इयापीटस की खोज से लेकर अब तक यूरोप-अमेरिका में इसे लेकर काफी किस्से गढ़े जा चुके हैं।

इन किस्सों में एक यह भी है कि यह सौरमंडल के बाहर से आई हुई कोई चीज है और इस पर पृथ्वीवासियों के लिए चीनी प्रकृति दर्शन में निर्माण और विनाश के इस्तेमाल होने वाले यिन/यांग जैसे भयानक संदेश दर्ज हैं। अभी कैसिनी यान के पर्यवेक्षणों के जरिये इयापीटस से जुड़े कुछ रहस्यों पर से पर्दा हटा है, हालांकि इस क्रम में एक ऐसी प्रस्थापना भी सामने आई है, जिसने खगोलशास्त्रियों को हैरान कर रखा है।

इसका एक हिस्सा काला दिखने की वजह शनि का एक और- लगभग अदृश्य सा उपग्रह फीब है, जो लगभग काला है और जो अपने मूलपिंड की उलटी दिशा में घूमने वाले सौरमंडल के कुछ गिने-चुने पिंडों में एक है। फीब किसी पुच्छल तारे की तरह अपने पीछे अत्यंत विरल सामग्री छोड़ता हुआ चलता है, जो इयापीटस के एक हिस्से पर गिरकर करोड़ों वर्षों से इसपर पोचारा फेरती आ रही है। इस चीज के चलते शनि का एक और छल्ला भी बन गया है, जो दिखता नहीं।

सबसे बड़ी पहेली इयापीटस के बीचोबीच खड़ी हजारों मील लंबी दीवार है, जिसकी ऊंचाई हमारे एवरेस्ट शिखर की भी ढाईगुनी है। इसके लिए प्रस्थापना यह दी गई है कि शनि से बहुत ज्यादा दूरी होने के कारण किसी समय इयापीटस का अपना एक उप-उपग्रह भी हुआ करता था, जो इसके आकर्षण के चलते धीरे-धीरे टूट-बिखर कर इस पर गिरता चला गया। अनुमान है कि कुछ समय इयापीटस के उप-उपग्रह (मूनमून) की तरह गुजार लेने के बाद इसके विघटन की प्रक्रिया शुरू हुई होगी, जो पचास करोड़ से एक अरब साल के बीच में पूरी हो गई होगी।

सौरमंडल में तो छोड़िए, अब तक प्रेक्षित ब्रह्मांड में भी मूनमून जैसी कोई चीज कहीं दर्ज नहीं की जा सकी है। अगर यह सुनिश्चित किया जा सका कि किसी मूनमून या उप-उपग्रह के अवशेष ही इयापीटस की कुछ काली-कुछ सफेद, बेहद ऊंची और चौड़ी दीवार के रूप में आज भी इयापीटस पर दर्ज हैं तो यह एस्ट्रोफिजिक्स के लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी!

Tuesday, 15 October 2019

लैपटॉप में लिखकर करें टाइप

टिप संख्या दो - लैपटॉप या पीसी पर हिंदी या किसी भी भाषा में बोल कर टाइप करना
सूरजप्रकाश
आपको जानकर आश्चर्य होगा windows 10 और उसके बाद में वर्जन में आप लैपटॉप या पीसी पर पर बिना कोई सेटिंग किए सीधे ही english, chinese, french, german, spanish, Portuguese और Italian भाषा में बोलकर टाइप कर सकते हैं और जो टाइप किया है उसे सुन भी सकते हैं। इसके लिए वर्ड फाइल के दायीं तरफ dictation के बटन को दबाना भर होता है।

लेकिन पीसी या लैपटॉप में दी गई सैकड़ों भाषाओं में बोलकर टाइप करने के लिए आपको कुछ सेटिंग्स करनी पड़ती हैं और इसके लिए कुछ बेसिक जरूरतें हैं।
1. Google chrome
2. Google Doc
3. हिंदी या जिस भाषा में आप बोल कर टाइप करना चाहते है वह आपके सिस्टम में होनी चाहिये। bhashaindia.com से windows version के हिसाब से कोई भी भारतीय भाषा डाउनलोड की जा सकती है।
4. नेट कनेक्शन

पहले आप google chrome के जरिए google docs खोलें। गूगल क्रोम खोलने पर आपको स्क्रीन पर नौ रंगीन बिंदु नजर आते हैं। इनमें से एक गूगल डाक्स का है। अगर गूगल डॉक्स इन नौ में नहीं है तो more में आपको मिल जाएगा।

google docs में blank document खोलने पर आपको टूलबार में छठे नंबबर पर tools दिखायी देगा। tools को स्क्रौल करेंगे तो नीचे नौंवें नंबर पर आपको वॉइस टाइपिंग नजर आएगा। वॉइस टाइपिंग को क्लिक करेंगे तो बाई तरफ एक माइक बना नजर आएगा। माइक जब ऑफ होता है तो काले रंग का होता है। उसके ऊपर भाषा में इंग्लिश लिखा है। इंग्लिश को क्लिक करेंगे तो भाषाओं की लंबी सूची नजर आएगी। हिंदी काफी नीचे है। हिंदी सेलेक्ट कर लें। अब माइक ऑन करें। माइक का रंग बदल कर लाल हो जाता है।
बोलकर हिंदी में टाइप करने के लिए आपका सिस्टम तैयार है।

ईयरफोन या ब्लू टूथ ईयरफोन या माइक हो तो बेहतर वरना वैसे भी काम चल जाता है।

आपकी बात कहे जाने और टाइप किए जाने में 1 सेकंड का अंतर आता है। जैसे जैसे बोलते जाएंगे और टाइप होता जाएगा। लैपटॉप या पीसी पर टाइप करने में यह सुविधा रहती है कि आप एंटर करके अगली लाइन में जा सकते हैं। थोड़े से अभ्यास से आप अपने बोलने की पिच और गति सेट कर सकते हैं। सिस्टम अगर कोई शब्द नहीं पकड़ रहा तो चिंता न करें। बाद में spell check से या खुद ही एडिट कर सकते हैं।

आप इस मैटर को कॉपी पेस्ट करके वर्ड फाइल में ले जा कर सेव कर सकते हैं या ऊपर टूलबार में दिये गये शेयर बटन बटन का इस्तेमाल करके भी एमएस वर्ड फाइल में भेज सकते हैं।

 अगर आपने अपने मोबाइल में भी गूगल डॉक्स डाउनलोड किया हुआ है तो आपकी यह फाइल अपने आप आपके मोबाइल के गूगल डाक्स में पहुंच जाएगी जिस तरह मोबाइल के गूगल डाक्स की फाइल लैपटाप में अपने आप जा जाती है। आपको ट्रांसफर करने की जरूरत नहीं है।

बस याद रखें कि गूगल डाक्स गूगल क्रोम के जरिये ही खोलना है और नेट कनेक्शन होना चाहिये।

तो आज ही शुरू करें और कोई तकलीफ हो तो बंदा हाजिर है।

Sunday, 13 October 2019

चाँद का भी कोई चांद !!

चांद का भी कोई चांद
चंद्रभूषण
अंतरिक्षीय पिंडों में एक-दूसरे का चक्कर लगाने की सहज वृत्ति होती है। ग्रह-उपग्रह छोड़िए, धरती पर गिरने वाले ज्यादातर उल्कापिंड भी ऐसे ही जोड़ों में आते हैं। ऐसे में यह आश्चर्य की बात ही कही जाएगी कि हमारे सौरमंडल में इतने सारे (फिलहाल 200 से भी ज्यादा दर्ज) उपग्रहों की मौजूदगी के बावजूद अभी तक एक भी उपग्रह का उपग्रह नहीं खोजा जा सका है। क्या प्रकृति ऐसे पिंड बना ही नहीं सकती? या यह केवल हमारे अपने सौरमंडल की सीमा है?

सवाल की गहराई में जाएं तो उपग्रहों के गणित पर काफी सारा काम डेढ़-दो सौ साल पहले किया जा चुका है, लेकिन उससे सिर्फ दो परिभ्रमणकारी पिंडों, मसलन ग्रह और उपग्रह के बीच की अधिकतम दूरी का अंदाजा मिलता है। हिल स्फेयर नाम की यह सीमा हमारे चंद्रमा के मामले में 60 हजार किलोमीटर है। इससे ज्यादा दूरी पर घूमने वाली कोई चीज चांद के बजाय पृथ्वी के ही चक्कर लगाएगी।

स्थिर कक्षा इस 'हिल स्फेयर' की तिहाई-चौथाई दूरी पर ही बन पाती है। इससे ज्यादा दूरी पर लाखों साल तक चलने वाली कक्षाएं जरूर बन सकती हैं पर देर-सबेर पिंड अपना घाट छोड़ देगा। अगर हमारे चंद्रमा का कोई उप-उपग्रह होता तो वह 15-20 हजार किलोमीटर की कक्षा में उसका चक्कर लगाता पाया जाता। हालांकि ज्वारीय बलों के प्रभाव में उसकी कक्षा क्रमश: छोटी होती जाती और वह चंद्रमा पर गिर जाता। लेकिन यह मजबूरी हर जगह तो लागू नहीं होती होगी।

सौरमंडल से बाहर का पहला चंद्रमा खोजे जाने की बात इसी महीने सामने आई है। हमसे 8000 प्रकाशवर्ष दूर स्थित एक ग्रह केप्लर 1625बी का नेप्च्यून के आकार वाला- यानी हमारी पृथ्वी का 17 गुना वजनी- उपग्रह उसका चक्कर हमारे चंद्रमा की आठ-नौगुनी दूरी से लगा रहा है। फिलहाल जानने का कोई तरीका भले न हो, पर इतने विशाल पिंड का कोई उप-उपग्रह क्यों नहीं हो सकता? मान लीजिए अगर यह हुआ तो अंग्रेजी में इसे क्या कहेंगे? कुछ वैज्ञानिकों ने ऐसे पिंडों के लिए ‘मूनमून’ कुलनाम प्रस्तावित किया है!