Monday, 9 October 2017

भरे पेट की भूख

आमतौर पर इसे इंसान का लालच माना जाता है। यह भी कहा जाता है कि कुछ लोगों के पेट की क्षुधा कभी शांत नहीं होती। अगर आप में नाप-तौल कर खाने की कोई जिद नहीं है या आपके सामने कम खाने की कोई मजबूरी नहीं है, तो अक्सर हमारा मन पेट भर जाने के बाद थोड़ा सा और खाने का करता है। दूसरे शब्दों में यह भी कहा जाता है कि पेट तो भर गया, लेकिन मन नहीं भरा। हर कोई कभी न कभी इस अनुभव से जरूर गुजरता है, और कुछ लोग तो इस अनुभव से अक्सर गुजरते हैं। बावजूद इसके कि उनकी गिनती आदतन ठूंस-ठूंसकर खाने वालों में नहीं होती। ऐसा क्यों होता है, यह सवाल लंबे समय से वैज्ञानिकों को परेशान करता रहा है। खाना हम पेट भरने के लिए यानी शरीर की जरूरत पूरी करने के लिए खाते हैं। लेकिन जब पेट भर जाता है, भूख शांत हो जाती है और हम शरीर की जरूरत भर का खा लेते हैं, तब भी मन कुछ और खाने को क्यों मचलता है? अक्सर हम इसे अच्छे स्वाद के प्रति व्यक्ति के लालच से जोड़कर देखते हैं, लेकिन वैज्ञानिकों ने पाया कि बात इतनी सरल नहीं है। और सबसे बड़ी बात है कि यह आदत सिर्फ हम इंसानों की ही नहीं, बल्कि दुनिया के लगभग सभी जीव-जंतुओं की होती है।
यूनिवर्सिटी ऑफ वरमांट के शरीर रसायनशास्त्र विशेषज्ञ मार्क बोटन और स्कॉट शीपर्स ने इसको समझने के लिए चूहों पर एक दिलचस्प प्रयोग किया। उन्होंने 32 मादा चूहे लिए और उनके पिंजरे में यह व्यवस्था कर दी कि जब पिंजरे में लगा लीवर दबाएंगे, तो उन्हें स्वादिष्ट खाना मिलेगा। 12 दिन के इस प्रयोग में उन्होंने पाया कि जब चूहों को भूख लगी होती है, तो वे अपनी जरूरत के हिसाब से सामान्य रूप से लीवर को दबाते हैं। लेकिन जब ऐसे चूहों को पिंजरे में पहुंचा दिया जाता है, जिनके पेट भरे हों, तो वे लीवर को कुछ ज्यादा ही दबाते हैं। यह प्रयोग बताता है कि खाली पेट का भोजन से एक संबंध होता है, जबकि भरे पेट का भोजन से दूसरा संबंध होता है। जब भूख लगी हो, तो कोई भी खाना चाहता है और पेट भरा हो, तो वह खाने के लिए और भी ज्यादा बेचैन हो उठता है। दूसरे शब्दों में हम यह भी कह सकते हैं कि भरे पेट की भूख, भूखे पेट की भूख के मुकाबले ज्यादा बलवती होती है। इसका एक मतलब यह भी है कि भरे पेट के बावजूद और खाने की प्रवृत्ति को हम भले ही इंसान का लालच मानते हों, लेकिन यह फितरत सभी जीवों में पाई जाती है। यानी इसका कारण सभ्यतागत नहीं, बल्कि जैविक है।
पहले यह माना जाता था कि खाना कई लोगों के लिए नशे की लत की तरह हो जाता है और वे खाते ही जाते हैं। हर बार ठूंस-ठूंसकर खाने वालों के लिए अभी भी यही धारणा है, लेकिन अब भरे पेट की भूख को अलग और ज्यादा व्यापक नजरिये से देखा जाने लगा है। अगर हम इन दो प्रवृत्तियों को दो अलग-अलग स्थितियां मान लें, तो भी दोनों का रिश्ता किसी के व्यक्तिगत लालच से कम और उसके शरीर के रसायनशास्त्र से ज्यादा है। हालांकि शरीर में ऐसी कौन सी प्रक्रियाएं हैं, जो इसका कारण बनती हैं, इसे हम अभी तक पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं। मीठी चीजें खाते समय भूख बढ़ने की प्रवृत्ति पर शोध करते समय वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे थे कि ऐसे में हमारा शरीर शर्करा का संग्रह शुरू कर देता है और शरीर में ऐसे रसायन बनते हैैं, जो शरीर को और ज्यादा खाने का संदेश भेज देते हैं। शायद ऐसा ही इस मामले में भी होता हो। आपातकाल के लिए भोजन का संग्रह करना हमारे शरीर की एक मूल प्रवृत्ति मानी जाती है। शायद यही भोजन उपलब्ध होने पर हमारी भूख को बढ़ाती है।
(साभार : दैनिक हिंदुस्तान )

स्कूलों की निगरानी का बिखरा तंत्र

हरिवंश चतुर्वेदी डायरेक्टर, बिमटेक
अच्छी शिक्षा एक ऐसा जादू है, जो एक या दो पीढ़ियों में एक गरीब परिवार की सूरत और सीरत बदल देती है। लेकिन राष्ट्रीय राजधानी के आस-पास घटी हाल की कुछ घटनाओं ने अभिभावकों को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि वे अपना पेट काटकर भव्य इमारतों वाले महंगे स्कूलों में भले ही अपने बच्चों की भरती करा लें, किंतु यह न समझें कि वहां बचपन सुरक्षित है। हर रोज जब तक बच्चे स्कूल से सही-सलामत घर वापस नहीं आते, आजकल मां-बाप एक तनाव सा महसूस करते हैं। 
किसी भी सामाजिक त्रासदी के बाद लोगों का मायूस होना, चिंतित होना और आंदोलित होना स्वाभाविक है। किंतु कुछ समय बाद ऐसा लगने लगता है कि व्यवस्था पुराने ढर्रे पर चल रही है। मासूम बच्चों और महिलाओं के साथ अमानवीय व्यवहार करने वालों को यह खौफ नहीं होता कि वे ऐसा करने के बाद बच नहीं पाएंगे। दिल दहलाने वाले हादसों को कुछ दिनों बाद भुला दिया जाता है और फिर वही पुरानी स्थिति लौट आती है। 
मोटी फीस वसूल करने वाले स्कूलों में मासूम बच्चों के साथ दुराचार, उनकी निर्मम हत्या, ऊंचाई से गिरकर उनका मरना, स्वीमिंग पूल में डूबना, बस से कुचलना या खेल के मैदान में गंभीर चोटें लगना ऐसी घटनाएं हैं, जो हमारी स्कूली शिक्षा के मौजूदा चरित्र के बारे में कुछ संकेत देती हैं। वैसे ये हादसे प्राइवेट स्कूलों तक ही सीमित नहीं हैं। सरकारी स्कूलों में भी हादसे होते हैं। खासकर गांवों के प्राइमरी स्कूलों में मिड-डे मील योजना में बच्चों को दिए जाने वाले खाने से अक्सर उनके गंभीर रूप से बीमार पड़ने के समाचार आते रहते हैं। पर चूंकि इन सरकारी स्कूलों में अब गरीब परिवारों के बच्चे पढ़ते हैं, तो मीडिया में खबर आने पर भी हड़कंप नहीं मचता। 
उदारीकरण के 25 वर्षों में निजी स्कूलों का तेजी से विस्तार हुआ है। हर शहर, कस्बे और ग्रामीण क्षेत्रों में भव्य इमारतें, स्मार्ट शिक्षक व सड़कों पर दौड़ती स्कूली बसें दिखाई देती हैं। इन स्कूलों में आए दिन होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों में जब बच्चे नाचते-गाते हैं, तो मोबाइल से फोटो लेते अभिभावकों की खुशी साफ-साफ दिखती है। ऊपर से तो इन स्कूलों में सब कुछ ठीक-ठाक दिखाई देता है, मगर गहराई में जाएं, तो आपको आसन्न खतरों के संकेत मिलेंगे। स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे, खासतौर से प्राइमरी कक्षाओं के बच्चे इतने मासूम होते हैं कि वे हर तरह के खतरों, जोखिम, दुराचार और दुर्घटना की आशंका को खुद नहीं पहचान सकते। इन सभी आशंकाओं से उन्हें बचाने के लिए स्कूल में हर पल और हर जगह एक शिक्षक, सुरक्षा गार्ड, आया या सहायक की जरूरत होती है, जो तुरंत हस्तक्षेप करके मासूम बच्चों को नुकसान होने से बचाए। क्या स्कूलों में काम करने वाले शिक्षक, आया या स्टाफ अमूमन ऐसा कर पाते हैं
अक्सर देखा गया है कि निजी स्कूलों का प्रबंधन बच्चों की हिफाजत पर उतना ध्यान नहीं दे पाता, जितना कि उसे देना चाहिए। इन स्कूलों के अध्यापक, स्टाफ, आया और सुरक्षा गार्ड या तो इन हादसों को रोकने और इनसे निपटने के लिए प्रशिक्षित नहीं हैं या फिर उनके ऊपर काम का इतना बोझ रहता है कि वे समय रहते बच्चों की मदद नहीं कर पाते। 1980 के दशक में दिल्ली की स्कूली बसों में जब बच्चों के साथ होने वाली दुर्घटनाएं बढ़ीं, तो 1985 में सुप्रसिद्ध वकील एम सी मेहता ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर सीबीएसई से हस्तक्षेप की मांग की थी। 16 दिसंबर, 1997 को सुप्रीम कोर्ट ने सीबीएसई को आदेश दिया था कि वह स्कूलों की बसों में बच्चों की सुरक्षा के लिए समुचित निर्देश जारी करे। सीबीएसई ने वर्ष 2004, 2012, 2014 और 2017 में कई सर्कुलर जारी किए, जो स्कूली बसों में सुरक्षा इंतजाम तक सीमित थे। 
केंद्र सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अनुसार, देश में इस वक्त 8.47 लाख प्राइमरी, 4़.25 लाख अपर प्राइमरी और 244 लाख सेकेंडरी स्कूल हैं, जिनमें 25.95 करोड़ विद्यार्थी शिक्षा पाते हैं। इन स्कूलों में बच्चों की मानसिक व शारीरिक सुरक्षा सुनिश्चित करना केंद्र व राज्य सरकारों, सीबीएसई, राज्य शिक्षा बोर्डों, स्कूल प्रबंधन और अभिभावकों की सामूहिक जिम्मेदारी है। निस्संदेह, यह एक चुनौतीपूर्ण कार्य है, मगर इसे अंजाम देना असंभव नहीं। 
स्कूलों को अभी तक जो निर्देश दिए गए हैं, उनका किस सीमा तक परिपालन किया जा रहा है, इसके कोई आधिकारिक आंकड़़े उपलब्ध नहीं हैं। प्रबंध शास्त्र का एक प्रमुख सिद्धांत है कि अगर किसी चीज का मापन नहीं हो सकता, तो उसका प्रबंध भी नहीं किया जा सकता। स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा के लिए राष्ट्रीय स्तर पर ऑडिट मैनुअल लागू किया जाना चाहिए। हर स्कूल की सुरक्षा तैयारियों की द्विवार्षिक जांच होनी चाहिए और स्कूलों को ’, ‘बी’, ‘सीगे्रड के आधार पर विभिन्न श्रेणियों में विभाजित किया जाना चाहिए। श्रेणी मिलने पर पुरस्कार और सीश्रेणी मिलने पर दंड दिया जाना चाहिए। स्कूलों की सुरक्षा ऑडिट के आंकड़े उसकी वेबसाइट पर डाले जाने चाहिए। 
स्कूल की समग्र क्वालिटी तथा सुरक्षा तैयारियों को सुधारने का एक अन्य तरीका वाउचर प्रणालीया डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर’ (डीबीटी) है। कई लैटिन अमेरिकी देशों में इसका उपयोग किया जा चुका है। इसके अंतर्गत सरकार गरीब अभिभावकों को स्कूल की फीस चुकाने के लिए कैश वाउचर देती है, जिसे वे किसी भी स्कूल में देकर अपने बच्चों को पढ़ा सकते हैं। सरकार स्कूलों को ग्रांट न देकर डीबीटी द्वारा भी उनकी क्वालिटी तथा सुरक्षा तैयारी को नियंत्रित कर सकती है। इस प्रणाली से खराब स्कूलों को बंद होना पड़ता है। 
स्कूलों में हो रहे हादसों से देश के जनमानस में बेचैनी व असुरक्षा की भावना फैल रही है। ऐसे में, प्रशासनिक, प्रबंधकीय और वित्तीय उपायों के साथ-साथ वैधानिक उपायों की भी जरूरत है। 2009-10 में शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई ऐक्ट) लागू किया गया था और सभी निजी स्कूलों की 25 प्रतिशत सीटें निर्धन-वर्ग के विद्यार्थियों के लिए आरक्षित की गई थीं। इसी कानून में एक ऐसा प्रावधान जोड़ा जा सकता है, जो हर स्कूली बच्चे को स्कूल में शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक सुरक्षा की गारंटी प्रदान करे। 


साक्षरता को मिशन बनाने की जरूरत

एम वेंकैया नायडू, उप-राष्ट्रपति 
चूंकि भारत भी आज दुनिया के तमाम देशों की तरह 51वां विश्व साक्षरता दिवस मना रहा है, तो इस मौके पर राष्ट्रों की तरक्की में साक्षरता की केंद्रीय भूमिका की तरफ मैं आप सबका ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूं। यह वह दिन है, जब हम अपने स्वतंत्रता संघर्ष और महात्मा गांधी के शब्दों को याद कर सकते हैं, जिन्होंने कहा था कि अशिक्षा एक अभिशाप और शर्म है, जिसे मुक्ति पाई जानी ही चाहिए। यह वह दिन है, जब हम अपनी स्वतंत्रता के 70 वर्षों की तरक्की पर निगाह डाल सकते हैं। पंडित नेहरू ने 15 अगस्त, 1947 की मध्य रात्रि को बड़े ही सार्थक शब्दों में कहा था, ‘आम आदमी को आजादी व अवसर मुहैया कराने के लिए और सामाजिक-आर्थिक व राजनीतिक संगठनों के सृजन के लिए, जो देश के हरेक पुरुष व स्त्री को इंसाफ व आनंदपूर्ण जीवन की गारंटी दे’ हमें विकास के मार्ग पर कदम बढ़ाने की जरूरत है। 
हमने इन वर्षों में जो तरक्की की सीढ़ियां चढ़ी हैं, जो मील के पत्थर गाड़े हैं, उन्हें गर्व से देख सकते हैं। 1947 में देश जब आजाद हुआ था, तब महज 18 प्रतिशत भारतीय लिख-पढ़ सकते थे। आज करीब 74 फीसदी भारतीय साक्षर हैं। 95 प्रतिशत से भी अधिक बच्चे स्कूल जा रहे हैं और 86 फीसदी नौजवान कामकाज के लायक शिक्षित हैं। यह कोई कम बड़ी उपलब्धि नहीं है। हालांकि, हमें अपनी पुरानी सफलताओं से प्रेरणा लेते हुए भविष्य की ओर अग्रसर होना है।
निस्संदेह, हमें अभी लंबी दूरी तय करनी है। हम इस तथ्य की भी अनदेखी नहीं कर सकते कि करीब 35 करोड़ युवा व प्रौढ़ शिक्षा की दुनिया से बाहर हैं, और इसके कारण भारत की तरक्की और विकास में वे कोई सार्थक भूमिका नहीं निभा पा रहे। इसके अलावा करीब 40 प्रतिशत स्कूली बच्चे प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद भी बुनियादी साक्षरता कौशल से वंचित रह जाते हैं। हमारे  सामने एक बड़ी चुनौती है, जिससे हमें व्यवस्थित रूप से निपटना है।
आज के दिन ने हमें अपनी सामूहिक उपलब्धि का उत्सव मनाने का अवसर दिया है। यह हमारे अथक प्रयासों की प्रेरक कहानी है। अनेक व्यक्तियों और संस्थाओं ने इस राष्ट्रीय कोशिश में अपना योगदान दिया है। त्रावणकोर और बड़ौदा के बौद्धिक शासकों ने शिक्षा के अवसरों का विस्तार किया था। महात्मा गांधी से पे्ररणा लेते हुए वेल्दी फिशर और लौबाह ने 1953 में लखनऊ में लिटरेसी हाउस की स्थापना की थी। प्रौढ़ शिक्षा के क्षेत्र में 1959 में ही ग्राम शिक्षण मुहिम जैसे कार्यक्रम चलाए गए थे। लेकिन 1990 के दशक में सरकार के राष्ट्रीय साक्षरता मिशन ने इन प्रयासों को जबर्दस्त रफ्तार दी। और इन तमाम प्रयासों को ही इस बात का श्रेय जाता है कि आज हमारी तीन-चौथाई आबादी लिख-पढ़ सकती है।
हालांकि, वैश्विक परिप्रेक्ष्य में चुनौतियां अब भी कम नहीं हैं और वे फौरन ध्यान दिए जाने की मांग भी करती हैं। सरकार मानती है और जैसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने श्यामन (चीन) के ब्रिक्स सम्मेलन में बीते 5 सितंबर को कहा भी है कि ‘‘हमारे विकास संबंधी एजेंडे का आधार ‘सबका साथ, सबका विकास’ की धारणा है। यानी सामूहिक प्रयास और समावेशी विकास।’’ अगले पांच वर्षों में एक नए भारत को आकार देने में भी देश जुटा हुआ है। वैश्विक रूप से हम जनवरी 2016 के उस संयुक्त राष्ट्र के ‘2030 एजेंडा फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट’ के प्रति प्रतिबद्ध हैं। इस वैश्विक एजेंडे में एक ‘सार्वभौमिक साक्षर दुनिया’ की परिकल्पना की गई है। और इस एजेंडे के एक लक्ष्य को, जो खास तौर से नौजवानों और प्रौढ़ों की साक्षरता पर केंद्रित है, साल 2030 तक हासिल करना है।
अगर हमें 2030 तक साक्षर दुनिया की लक्ष्य-प्राप्ति की ओर तेजी से बढ़ना है और भारत को यह सुनिश्चित करना है कि देश के सभी नौजवान और प्रौढ़ों की एक बड़ी संख्या इस कौशल को प्राप्त कर सके, तो हमें अपनी पुरानी रणनीति की समीक्षा करनी होगी और कौन सी नीति  कारगर रही व कौन निरर्थक, यह जानने के बाद देश के भीतर व बाहर के सफल उदाहरणों से सबक सीखना  होगा। निस्संदेह, इसे एक सामूहिक प्रयास बनाना पड़ेगा, जिसमें सरकार की भूमिका अग्रणी हो, लेकिन सिविल सोसायटी और निजी क्षेत्र भी सक्रिय भूमिका निभाएं। इस स्पष्ट सोच के साथ कि शिक्षा की उत्प्रेरक भूमिका नए भारत को आकार दे सकती है, इसे एक सामाजिक मिशन बनाना पड़ेगा।
मुझे प्रसिद्ध तेलुगु कवि गुरजाड अप्पाराव की पंक्तियां याद आ रही हैं, जिसका आशय यह है कि ‘हमारे कदमों के नीचे की धरती देश नहीं है, बल्कि जो इस भूमि पर बसे हैं, वे लोग देश होते हैं।’ लोगों के जीवन की गुणवत्ता ही किसी देश का चरित्र बताती है। यह समानता है, जो यह तय करती है कि विकास के सुुफल का किस तरह वितरण हुआ? हम समावेशी विकास के प्रति समर्पित देश हैं। हम अपने कार्यक्रम इस तरह गढ़ रहे हैं, जिसमें कोई पीछे न छूट पाए। ऐसे में, यह स्वाभाविक है कि एक सहभागी, जीवंत और अधिक समावेशी लोकतंत्र के निर्माण में साक्षरता पहला जरूरी कदम है।
साक्षरता एक नागरिक को अपने उन अधिकारों के इस्तेमाल में सक्षम बनाती है, जो उसे संविधान से मिले हुए हैं। यह देखा गया है कि गरीबी, शिशु मृत्यु-दर, जनसंख्या-वृद्धि , लैंगिक गैर-बराबरी जैसी समस्याओं से शिक्षित समाज बेहतर तरीके से निपटते हैं। भारतीय परिप्रेक्ष्य में साक्षरता हमारे देश व समाज के वंचित तबकों के सशक्तीकरण और उनके जीवन स्तर को सुधारने में अहम भूमिका निभा सकती है।  
 
सार्वभौमिक साक्षरता के लक्ष्य को हासिल करने के लिए हमें अपनी द्वीपक्षीय रणनीति जारी रखनी पड़ेगी। एक, हमें प्री-प्राइमरी शिक्षा और स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता सुधारनी होगी, ताकि हमारे सभी स्नातकों के पास आवश्यक साक्षरता कौशल हो। दूसरी, उन तमाम लोगों को सीखने के अवसर दिए जाने चाहिए, जिन्होंने स्कूल का मुंह नहीं देखा या जिन्हें बीच में किन्हीं वजहों से स्कूल छोड़ना पड़ा। हमें उन नौजवानों व प्रौढ़ों को भी ये मौके देने होंगे, जिन्हें अपनी आजीविका के अवसरों के विस्तार के लिए बुनियादी कौशल हासिल करने की जरूरत है।
(साभार : दैनिक हिंदुस्तान )

कूड़े का प्रबंधन और हमारी आदतें

सुनीता नारायण, पर्यावरणविद व महानिदेशक, सीएसई
हर दिन आती नई-नई खबरों के बीच गाजीपुर हादसे को  चंद रोज में ही हम भूलने लगे हैं। दिल्ली-उत्तर प्रदेश सीमा पर स्थित इस इलाके में पिछले दिनों कूड़े के पहाड़ के ढहने से दो लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। इस घटना के बाद संबंधित अमला सक्रिय जरूर हुआ, लेकिन वह सक्रियता भी चंद रोज में ही शांत होती दिखने लगी है। यहां आशय उस दुर्भाग्यपूर्ण घटना को फिर से शब्द देने का नहीं, बल्कि उस घटना के बहाने देश में कचरा प्रबंधन की स्थिति पर ध्यान खींचना है।
हम यह तो बखूबी जानते हैं कि कचरा आज एक बड़ी समस्या बन चुका है। मगर यह शायद ही हम जानते हैं कि इसका समाधान सिर्फ उसके निस्तारण की तकनीक में नहीं, बल्कि घरेलू स्तर के पृथक्करण तंत्र से तकनीक को जोड़ने में छिपा है, ताकि लैंडफिल एरिया (भराव क्षेत्र) तक उसके पहुंचने की नौबत ही न आए। यानी उसे पहले ही साफ किया जा सके और किसी न किसी रूप में उसका दोबारा इस्तेमाल हो सके। अगर ऐसा नहीं किया गया, तो ऊर्जा या अन्य दूसरे कामों के लिए कचरे का कोई मोल नहीं रह जाएगा। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि हमारी कचरा प्रबंधन प्रणाली इस मोर्चे पर निष्क्रिय-सी दिखाई देती है।
यह स्थानीय निकायों की जवाबदेही है कि वे शहरी ठोस कचरा (एमएसडब्ल्यू) कानून 2016 के अनुसार स्रोत पर ही कचरे को अलग-अलग करना सुनिश्चित करें। इसका अर्थ यह है कि लोगों को इसके लिए जागरूक किया जाए और फिर इस सूखे व गीले या सड़न योग्य या दोबारा इस्तेमाल होने वाले कचरे को नगर निकाय अलग-अलग जमा करके उनके उचित निस्तारण की व्यवस्था करे। असल में, कचरा प्रबंधन को लेकर एक आसान सा समाधान यही दिखता है कि उसे जमा करो और भराव क्षेत्र में डाल दो या फिर प्रोसेगिंग प्लांट (निपटान इकाई) के हवाले कर दो। मगर देश-दुनिया के अनुभव बताते हैं कि कचरे को अलग-अलग किए बिना निस्तारित किए जाने वाले कूड़े से तैयार ईंधन की गुणवत्ता खराब होती है और वह हमारे काम का नहीं रह जाता है। लिहाजा हमारे नगर निगमों को घर के स्तर पर ही कचरे को अलग-अलग करने की मुहिम चलानी चाहिए। 
इस मामले में गोवा की राजधानी पणजी एकमात्र ऐसा शहर है, जिसने इस व्यवस्था को सही मायने में जमीन पर उतारा है। वहां घरों से अलग-अलग दिन अलग-अलग कचरा जमा किया जाता है। इससे घरों में ही कचरे का पृथक्करण सुनिश्चित हो जाता है। इतना ही नहीं, वहां ऐसा न करने वाले नागरिकों पर जुर्माने की व्यवस्था तो है ही, कॉलोनी स्तर पर ही कचरे के निस्तारण की व्यवस्था भी की गई है। और सबसे खास बात यह कि होटल जैसे बड़े-बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के लिए बैग मार्किंग सिस्टम भी बनाया गया है, ताकि नियमों का उल्लंघन करने वाले प्रतिष्ठानों को पकड़ा जा सके और दंडित किया जा सके।
केरल के अलेप्पी में एक दूसरी व्यवस्था काम करती है। वहां म्युनिसिपल कॉरपोरेशन कचरा जमा नहीं करता, क्योंकि वहां ऐसी कोई जगह ही नहीं, जहां इसे फेंका जा सके। वहां के एकमात्र भराव क्षेत्र को नजदीकी गांव वालों ने बंद करा दिया है। साफ है, जब म्युनिसिपैलिटी कचरा जमा ही नहीं कर रहा, तो लोग इसका खुद प्रबंध कर रहे हैं। वे इसे अलग-अलग जमा करते हैं और फिर उससे जितनी खाद बना सकते हैं, बनाते हैं। यह खाद घरेलू बागवानी में काम आती है। रही बात नॉन-बायोडिग्रेडेबल (प्राकृतिक तरीके से न सड़ने वाला) कचरे की, तो इस मोर्चे पर सरकार सक्रिय है। ऐसे कचरों के निस्तारण के लिए वह पहले से ही व्यवस्थित अनौपचारिक वेस्ट-रिसाइकिलिंग क्षेत्रों की मदद लेती है। इस व्यवस्था को अपनाकर म्युनिसिपैलिटी ने कचरे के भंडारण या उसकी ढुलाई आदि पर होने वाला अपना खर्च भी बचा लिया है।
यह कचरा प्रबंधन का एक पहलू है। इसका दूसरा पहलू यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि ऐसे कूडे़ के लिए कहीं कोई जगह ही न छोड़ी जाए, जिसे छांटकर अलग न किया गया हो। मतलब साफ है कि शहरों में लैंडफिल एरिया का प्रबंधन सख्ती से किया जाए। एमएसडब्ल्यू कानून 2015 में कहा गया है कि लैंडफिल एरिया का इस्तेमाल सिर्फ ऐसे कचरे के लिए होना चाहिए, जो दोबारा उपयोग लायक न हो, किसी दूसरे काम में इस्तेमाल न आ सके, जो ज्वलनशील या रिएक्टिव न हो। सवाल यह है कि इसे लागू कैसे किया जाए? फिलहाल नगर निगम या नगर पालिकाएं कचरा प्रबंधन को लेकर जो अनुबंध करती हैं, उसमें अधिक से अधिक मात्रा में कचरे को भराव क्षेत्र तक लाने को प्रोत्साहित किया जाता है। चूंकि ठेकेदार को कचरे की मात्रा के अनुसार ही रकम अदा की जाती है, यानी अधिक से अधिक कचरा व उसी अनुपात में ठेकेदारों का आर्थिक लाभ। इतना ही नहीं, इन निकायों को कचरे को फिर से इस्तेमाल के लायक बनाने की बजाय उसे जमा करना, ढुलाई करना और फिर भराव क्षेत्र में फेंक देना कहीं ज्यादा आसान लगता है।

इस सोच को बदलने के लिए जरूरी है कि लैंडफिल टैक्स लगाया जाए। अनुबंध इस तरह के हों कि कचरे के लिए नगरपालिका कोई भुगतान न करे, बल्कि ठेकेदारों से इसके लिए रकम वसूली जाए। यह व्यवस्था कचरा निस्तारण इकाइयों को भी आर्थिक लाभ पहुंचाएगी और सुनिश्चित करेगी कि भराव क्षेत्र तक कम से कम कचरा पहुंचे। यहां यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि कचरे के आधार पर घरों से भी टैक्स वसूला जाए और अगर वे घरेलू कचरा अलग-अलग नहीं करते, तो उनसे जुर्माना लिया जाए। हमें यह मानना ही होगा कि हर घर, हर प्रतिष्ठान, हर होटल कचरा पैदा करने का स्रोत है, इसलिए वह प्रदूषक  है। लिहाजा उन पर भी वह टैक्स लगना चाहिए, जो किसी अन्य प्रदूषक इकाई पर लगता है, वरना हमारे शहर कचरे के ढेर में तब्दील हो जाएंगे।
इस मामले में ‘निम्बी’ यानी नॉट इन माई बैकयार्ड (मेरे घर के पीछे नहीं) अभियान एक गेम-चेंजर साबित हो सकता है। अब गरीब व गांव-समाज के लोग अपने-अपने घरों के पीछे कचरा फेंकने का विरोध करने लगे हैं। वे अब ऐसी जगहों के आस-पास कतई नहीं रहना चाहते, जहां लैंडफिल एरिया हो। वाकई जब यह भूमि अपनी है, तो फिर इसे साफ रखने की जिम्मेदारी भी हमारी ही होनी चाहिए। क्या हम ऐसा करेंगे?

Saturday, 7 October 2017

नोबेल पुरस्कार 2017 के विजेता

नोबेल पुरस्कार 2017 के विजेताओं की सूची: नोबेल पुरस्कार 2017 की घोषणा नोबेल फाउंडेशन द्वारा जारी की जा रही है। नोबेल फाउंडेशन द्वारा स्वीडन के वैज्ञानिक अल्फ्रेड नोबेल की याद में वर्ष 1901 में शुरू किया गया यह शांति, साहित्य, भौतिकी, रसायन, चिकित्सा विज्ञान और अर्थशास्त्र के क्षेत्र में विश्व का सर्वोच्च पुरस्कार है। अर्थशास्त्र के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार की शुरुआत 1968 से की गई। पहला नोबेल शांति पुरस्कार 1901 में रेड क्रॉस के संस्थापक ज्यां हैरी दुनांत और फ़्रेंच पीस सोसाइटी के संस्थापक अध्यक्ष फ्रेडरिक पैसी को संयुक्त रूप से दिया गया। इस पुरस्कार के रूप में प्रशस्ति-पत्र के साथ 14 लाख डालर की राशि प्रदान की जाती है। नोबेल पुरस्कार 2017 के विजेताओं की सूचि एवं उनके कार्य निम्नलिखित है:
चिकित्सा के नोबेल पुरस्कार 2017 के विजेता: अमेरिका के तीन वैज्ञानिकों- जैफ्री सी हाल, माइकल रोसबाश तथा माइकल डब्ल्यू यंग को इस साल के चिकित्सा के नोबेल पुरस्कार के लिए चुना गया है।
भौतिकी के नोबेल पुरस्कार 2017 के विजेता: अमेरिकी खगोलविज्ञानियों बैरी बैरिश, किप थोर्ने तथा रेनर वेस को गुरुत्व तरंगों की खोज के लिए मंगलवार (3 अक्टूबर) इस साल का भौतिक विज्ञान का नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा की गयी है।
रसायन के नोबेल पुरस्कार 2017 के विजेता: जैक्स ड्यूबचित, जोएचिम फ्रैंक और रिचर्ड हेंडरसन को रसायन विज्ञान (केमिस्ट्री) का नोबेल पुरस्कार 2017 दिया गया। तीनों वैज्ञानिकों को बॉयोमालीक्यूल्स के सॉल्यूशन के उच्च संकल्प संरचना के निर्धारण के लिए क्रायो इलेक्ट्रान माइक्रोस्कोपी विकसित करने को लेकर सम्मानित किया गया।
शांति के नोबेल पुरस्कार 2017 के विजेता: इसकी घोषणा 6 अक्टूबर 2017 को होगी।
अर्थशास्त्र / इकोनॉमिक्स के नोबेल पुरस्कार 2017 के विजेता: इसकी घोषणा 9 अक्टूबर 2017 को होगी।

साहित्य अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार 2017 के विजेता: इसकी घोषणा अगले महिने होगी।

Thursday, 5 October 2017

गुरुत्वीय तरंगों से किस तरह बदलेंगी हमारी दुनियाँ

चंद्रभूषण 
सौ साल तक तो यह अटकल ही चलती रही कि इस तरह की कोई चीज संभव है या नहीं। यह आश्चर्य की बात है कि इसी दुविधा के माहौल में कुछ लोग इन तरंगों को दर्ज करने के उपकरण बनाने में भी जुटे रहे। उनके साहस का अंदाजा लगाकर आप सिर्फ उनके सामने सिर ही झुका सकते हैं। नोबेल कमिटी ने इतना ही किया है। न इससे कम, न ज्यादा। जरा सोचकर देखिए, गुरुत्वीय तरंगों को अगर तरंग माना जाए तो ये किस चीज में चलने वाली तरंगें हैं? इनके रास्ते में करोड़ों प्रकाश वर्ष की दूरी ऐसी गुजर जाती है, जहां एक छोटा से छोटा कण तक नहीं होता, दूसरी तरफ ये ब्लैक होल जैसे इलाकों से भी गुजरती हैं, जिनसे पार पाना रोशनी तक के लिए नामुमकिन होता है।
2015 में आइंस्टाइन ने जनरल थिअरी ऑफ रिलेटिविटी के तहत अपनी तरफ से अकाट्य ढंग से स्पेस-टाइम (देश-काल) संजाल की संकल्पना दी थी। एक ऐसी चीज, जो खुद में कुछ भी नहीं है, लेकिन जो हर जगह, हर चीज में, हर समय में समान रूप से फैली हुई है। भारतीय दर्शन में पंचम तत्व आकाश की व्याख्या कुछ-कुछ इसी रूप में की जाती है, लेकिन समय वहां नदारद है। आइंस्टाइन के यहां आकाश और समय आपस में जुड़े हुए हैं, एक ही अमूर्त व्यक्तित्व के अलग-अलग चेहरों की तरह। और सबसे बड़ी बात यह कि भारतीय दर्शन का आकाश एक सर्वव्यापी स्थिर तत्व है, जबकि आइंस्टाइन का देशकाल फैलता-सिकुड़ता है। यहां तक कि इसमें छेद भी हो सकता है।
उस समय ही आइंस्टाइन का कहना था कि किसी बहुत भारी पिंड को, सूरज से कई गुना भारी पिंड को, अगर बहुत ज्यादा त्वरण मिल जाए, यानी उसकी रफ्तार अचानक बहुत ज्यादा बढ़ जाए तो वह देशकाल में ऐसी विकृति ला सकता है, जो अबाध रूप से आगे बढ़ती हुई एक तरह की तरंग जैसी शक्ल ले सकती है। यह बात आम समझ से परे है। अव्वल तो उस समय तक ऐसे किसी पिंड और उसे मिल सकने वाले इतने बड़े त्वरण की कल्पना करना भी लगभग असंभव था। फिर, मान लीजिए, ऐसी अनहोनी हो ही जाए, तो स्पेस में आने वाले किसी फैलाव या सिकुड़ाव को नापा कैसे जाएगा? जिस भी पैमाने से इसे नापना होगा, क्या वह खुद भी उतना ही फैल या सिकुड़ नहीं जाएगा?
यह उधेड़बुन आखिरकार 2015 में खत्म हुई और पिछले साल, यानी 2016 में पहली बार गुरुत्वीय तरंग की शिनाख्त का प्रकाशन हुआ। पता चला कि 30 सूर्यों के आसपास- एक थोड़ा कम, एक थोड़ा ज्यादा- वजन वाले दो ब्लैक होल एक अरब तीस करोड़ प्रकाश वर्ष दूर एक-दूसरे के करीब आते हुए रोशनी की आधी रफ्तार (एक सेकंड में लगभग डेढ़ लाख किलोमीटर) से घूमने लगे और फिर आपस में मिलकर एक हो गए। इस क्रम में ऊर्जा कितनी निकली? सेकंड के भी एक बहुत छोटे हिस्से में इतनी, जितनी तीन सूर्यों को पूरा का पूरा ऊर्जा में बदल देने पर निकल सकती है। इतनी भीषण घटना से देशकाल में पैदा हुई जो थरथरी एक अरब तीस करोड़ वर्षो में चल कर धरती तक पहुंच पाई, उसका आकार इतना छोटा था कि हमारा दिमाग उसकी कल्पना भी नहीं कर सकता। यूं समझें कि सूरज से धरती तक का आकाश इसके असर में जरा देर के लिए एक परमाणु बराबर सिकुड़ गया।
बहरहाल, शुरू में कुछ लोगों ने यह भी कहा कि संभव है, यह थरथरी किसी और हलचल से पैदा हुई हो। लेकिन पिछले डेढ़-दो वर्षों में यह सिलसिला बढ़ते-बढ़ते कुछ दिन पहले चौथी तरंग के प्रेक्षण तक पहुंचा और यह तय हो गया कि आने वाले दिनों में विज्ञान की कुछ सबसे बड़ी सनसनियां गुरुत्वीय तरंगों के जरिये रचे जाने वाले खगोलशास्त्र के ही हिस्से आने वाली हैं। लेकिन इससे खगोल विज्ञान की सेहत पर फर्क क्या पड़ेगा? सबसे पहला तो यह कि आर्यभट्ट से लेकर आज तक का खगोलशास्त्र पूरी तरह रोशनी पर निर्भर है, जो खुद में बहुत भरोसेमंद जरिया नहीं है। स्पेक्ट्रोमेट्री और एक्स-रे, गामा-रे टेलिस्कोपों के साथ भी यह सीमा जुड़ी है कि कुछ मामलों में उनके नतीजे बहुत धुंधले हो जाते हैं। जैसे, ब्लैक होल को ही लें तो उससे कोई रोशनी बाहर ही नहीं आती, लिहाजा अटकलबाजी के सिवाय वहां ज्यादा कुछ करने को होता ही नहीं।
इसके विपरीत गुरुत्वीय तरंगें किसी भी जिंदा या मुर्दा तारे की परवाह नहीं करतीं। वे खाली जगहों से भी उतनी ही आसानी से गुजरती हैं, जितनी आसानी से महाशून्य (द ग्रेट वॉयड) से। इन्हें धोखा देना या अपने दायरे में जकड़कर बाहर निकल जाने देना सृष्टि के सबसे बड़े ब्लैक होल के भी वश की बात नहीं है। कुछ वैज्ञानिक तो इतने आशावान हो चले हैं कि उन्हें लगता है, भविष्य की गुरुत्वीय तरंग वेधशालाएं सृष्टि के आरंभ बिंदु ‘बिग बैंग’ का भी कुछ हाल-पता ले सकती हैं, जहां तक पहुंचने की उम्मीद भी किसी टेलिस्कोप से नहीं की जाती। असल में, ब्रह्मांड की बिल्कुल शुरुआती रचनाएं भी बिग बैंग से कम से कम चार लाख साल बाद की हैं। तो नोबेल प्राइज की खबरों में ही न डूबे रहिए। मजे लीजिए, नजर के सामने खुल रहे इस नए शास्त्र के, जिसे कल तक कल्पना से भी परे माना जाता था।

Friday, 29 September 2017

5 जी से उम्मीदें और चुनौतियाँ

देश में मोबाइल टेलीफोन की 4-जी डाटा सेवा बहुत पहले ही शुरू हो गई थी, लेकिन अभी भी इसे लेकर की जाने वाली शिकायतें कम नहीं हुई हैं। आप 4-जी के जरिए किसी से बात करें, तो इसकी संभावना बहुत कम ही है कि बातचीत बिना किसी बाधा के पूरी हो जाए। मोबाइल पर इस सेवा के जरिए कोई वीडियो देखना कितना परेशानी भरा होता है, वह 4-जी इस्तेमाल करने वाले जानते हैं। हालांकि जब 4-जी सेवा शुरू हुई थी, तब कहा यही गया था कि अब ये सारी समस्याएं खत्म हो जाएंगी। कई लोगों का अनुभव तो यह भी है कि बहुत सी जगहों पर यह सेवा 3-जी और यहां तक कि 2-जी की गति से ही चलती है। दिल्ली जैसे महानगर तक में हर जगह आपके फोन पर 4-जी की सिग्नल दिखाई दे, यह जरूरी नहीं है, जबकि दिल्ली उन जगहों में से है, जहां सबसे पहले यह सेवा शुरू हुई थी। लेकिन इन सारी समस्याओं के बावजूद अगर सरकार ने 2020 तक 5-जी की सेवा शुरू करने की घोषणा की है, तो उसका अपना महत्व है। हालांकि बाधाएं बहुत हैं, फिर भी अगर हम इसे कर सके, तो तकनीक के कैलेंडर में भारत के पिछड़ेपन को दूर करने का एक काम तो होगा ही।
इसे समझने के लिए दुनिया और भारत में डाटा सेवाओं के आगमन को जानना जरूरी है। दुनिया में 1-जी सेवा ने 1979 में दस्तक दी थी और 1981 में यह कई पश्चिमी देशों में इस्तेमाल होने लगी थी। यानी उस समय, जब हम ग्राहम बेल के जमाने के फोन से ही काम चला रहे थे, कंप्यूटर जैसी चीजें हमारे सार्वजनिक तो क्या, औद्योगिक विमर्श में भी नहीं थीं। लेकिन दस साल के भीतर दुनिया ने 2-जी सेवाओं का इस्तेमाल शुरू कर दिया और हम तब मोबाइल सेवा को भारत में लाने पर ही विचार कर रहे थे। 3-जी सेवाओं में भी हम इतना ही पिछडे़ रहे। इस मामले में हम कितना पिछड़े, इसे इस उदाहरण से समझा जा सकता है कि जब दुनिया ने 4-जी को अपना लिया, उसके कुछ समय बाद हमारे देश में 2-जी स्पेक्ट्रम का घोटाला हुआ, जिसका मामला आज भी अदालतों के चक्कर लगा रहा है। 5-जी सेवाओं की सरकार की घोषणा को हमें इस पृष्ठभूमि में देखना चाहिए। 5-जी सेवाओं पर पूरी दुनिया में इस समय शोध हो रहा है, लेकिन इनका व्यावसायिक इस्तेमाल अभी कहीं भी शुरू नहीं हुआ है। उम्मीद है कि हर कहीं इसका इस्तेमाल 2020 में ही शुरू हो सकेगा। यानी यह पहला मौका होगा, जब इस कैलेंडर में हम पिछड़ेंगे नहीं। 
यह भी ध्यान रखना होगा कि 5-जी की यह घोषणा उस समय की जा रही है, जब देश की टेलीकॉम कंपनियां अपनी परेशानियों को लेकर काफी हाय-तौबा कर रही हैं। यह कहा जा रहा है कि टेलीकॉम उद्योग बीमार होने के कगार पर है और इसको बचाने के लिए सरकार को रियायतें देनी चाहिए। हो सकता है कि ऐसी बहुत सी बातें बाजार में बढ़ती प्रतिस्पद्र्धा के बीच अतिशयोक्ति के रूप में सामने आ रही हों, लेकिन सरकार को 5-जी की शुरुआत से पहले तमाम शंकाओं का निवारण तो करना ही होगा। डाटा सेवाओं की शुरुआत के पिछले अनुभव बहुत अच्छे नहीं रहे हैं, खासकर 3-जी सेवा के। सरकार ने इसे राजस्व उगाहने के एक बड़े प्रयास के रूप में शुरू किया था और स्पद्र्धा के कारण कंपनियों ने स्पेक्ट्रम नीलामी में बढ़-चढ़कर बोली भी लगाई थी। इसके कारण 3-जी सेवाएं इतनी महंगी हो गई थीं कि वे आम उपभोक्ता से बहुत दूर चली गईं। 3-जी और 4-जी सेवाओं, दोनों के मामले में यह कहा गया था कि इससे किसानों, मंडियों, व्यापारियों को आपस में जोड़ने का रास्ता तैयार होगा, लेकिन यह सब अभी तक नहीं हुआ। क्या 5-जी में यह हो पाएगा?
(साभार : हिंदुस्तान संपादकीय )

गुरुत्व तरंगों से छंट रहा है ब्रह्मांड का धुंधलका

चंद्रभूषण  
साइंस-टेक्नॉलजी में एक नए युग की शुरुआत का साक्षी बनने का सौभाग्य हर पीढ़ी को प्राप्त नहीं होता लेकिन हमारी पीढ़ी इस दृष्टि से एक खास मामले में सौभाग्यशाली है। हम ग्रैविटेशनल वेव ऐस्ट्रॉनमी (
गुरुत्वीय तरंग खगोलशास्त्र) के प्रारंभ के साक्षी बन चुके हैं। पिछले साल अमेरिका में लुईजियाना और वॉशिंगटन प्रांतों में बनी लीगो वेधशालाओं ने पहली बार गुरुत्वीय तरंग की शिनाख्त की थी। वह सिलसिला 27 सितंबर की घोषणा के साथ इस तरह की चौथी शिनाख्त दर्ज कर चुका है लेकिन इस बार की, यानी चौथी शिनाख्त की खासियत यह है कि इसमें अमेरिका से बाहर, इटली की एक गुरुत्व तरंग वेधशाला वर्गो भी शामिल है।
जिस तरह हम दो आंखों से देखकर किसी चीज की दूरी का अंदाजा लगाते हैं और जीपीएस कम से कम छह (तीन+तीन) उपग्रहों के जरिये धरती पर किसी चीज की लोकेशन ठीक-ठीक बता देता है, उसी तरह तीन जगहों से लिए गए गुरुत्वीय तरंगों के प्रेक्षण लगभग सटीक ढंग से बहुत अधिक ऊर्जा प्रक्षेपण वाली किसी अंतरिक्षीय घटना के स्रोत का अंदाजा दे सकते हैं। 27 सितंबर को घोषित की गई यह घटना 1 अरब 80 करोड़ साल पुरानी है, जब हमारे सूर्य के लगभग 31 और 25 गुना वजनी दो ब्लैक होल आपस में टकराए और तीन सूर्यों के वजन के बराबर ऊर्जा छोड़ते हुए 53 सूर्यों जितने वजनी ब्लैक होल में बदल गए।
इसके पहले दर्ज की गई तीनों घटनाएं भी 30 सूर्यों से थोड़ा कम या ज्यादा वजन वाले ब्लैक होलों के आपस में टकराने की थीं लेकिन वे ब्रह्मांड में कहां घटी थीं, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल था। पिछले महीने दर्ज की गई घटना की सूचना लीगो की पकड़ में आने के एक मिनट के अंदर दुनिया के 25 टेलिस्कोपों तक रवाना कर दी गई, जिन्होंने तुरत-फुरत अपने कैमरे उसकी संभावित दिशा में घुमा दिए। इनमें प्रकाश को दर्ज करने वाले टेलिस्कोपों से लेकर एक्स-रे और गामा-रे टेलिस्कोपों तक विविध प्रकार के दूरदर्शी शामिल थे। यह और बात है कि वे कुछ भी देख नहीं पाए, क्योंकि घटना का स्रोत पकड़ पाने के मामले में लीगो का हाथ कुछ ज्यादा ही तंग था।
कितना तंग?
इसका अंदाजा इस बात से लगाएं कि हमारा चंद्रमा धरती से नजर आने वाले आकाश का 1 वर्ग डिग्री हिस्सा भर घेरता है, लेकिन लीगो ने 1000 वर्ग डिग्री (और समझाकर कहें तो 31.5 डिग्री लंबाई और इतनी ही चौड़ाई वाले) इलाके की ओर इशारा किया था। ऐस्ट्रॉनमी में इस सूचना का कोई मतलब नहीं है। इसके विपरीत दो के बजाय तीन वेधशालाओं से लिए गए 27 सितंबर के प्रेक्षण में घटना का स्रोत 60 वर्ग डिग्री (साढ़े सात डिग्री गुणे साढ़े सात डिग्री) के इलाके में बताया गया। यह दायरा भी काफी बड़ा है और अभी तक मालूम नहीं कि इस बार कोई टेलिस्कोप कुछ देख पाया है या नहीं लेकिन देखे जाने की संभावना इस बार कई गुना बढ़ गया है।

आने वाले दिनों में जब चीन, भारत और जापान में भी गुरुत्वीय तरंगों को दर्ज करने की व्यवस्था हो जाएगी, तब शायद टेलिस्कोपों को चंद्रमा जितने दायरे वाला ही आकाश खंगालना पड़ेगा और तब संभवत: उच्च ऊर्जा प्रक्षेपण वाली घटनाओं को एक साथ दो तरीकों से दर्ज किया जा सके। एक रोशनी या इसके करीब पड़ने वाली एक्स-रे, गामा-रे आदि के जरिए और दो- गुरुत्वीय तरंगों के जरिए, जो कि दुनिया के लिए एक बिल्कुल नई चीज है। यह कुछ-कुछ ऐसा है, जैसे दुनिया का नक्शा आप जहाजी यात्राओं के जरिए और उपग्रह द्वारा लिए गए प्रेक्षण के जरिए बनाकर दोनों को टैली कर सकें। ब्रह्मांड हमारे सामने ज्यादा साफ शक्ल में नुमायां हो रहा है। क्या हम दिमागी तौर पर इसे देखने के लिए तैयार हैं?

Thursday, 28 September 2017

चार सौ साल और पुराना हुआ शून्य

चंद्रभूषण 
एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्वतंत्र संख्या के रूप में शून्य की खोज भारत में ही हुई है, इस बात को लेकर पूरी दुनिया में आम सहमति है। लेकिन यह ठीक-ठीक कब हुई, इसका खोजी कौन था, इसे लेकर आज भी बहस खत्म नहीं हुई है। इस सिलसिले में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की एक लाइब्रेरी में रखी पेशावर के पास के एक गांव बख्शाली में मिली एक बौद्ध पांडुलिपि की हाल में हुई कार्बन डेटिंग से एक अद्भुत जानकारी प्राप्त हुई है।बख्शाली पांडुलिपि दरअसल बौद्ध भिक्षुओं के प्रशिक्षण में काम आने वाली भोजपत्र पर लिखी लगभग सत्तर पन्नों की एक किताब है। इसे अब तक नवीं सदी की रचना माना जाता रहा है। इसकी खास बात यह है कि इसमें सैकड़ों जगह बिंदु के रूप में गणितीय शून्य के निशान बने हुए हैं। नवीं सदी में ही ग्वालियर के एक मंदिर में भी एक गोलाकार शून्य का निशान बनाया गया था, जिसकी तस्वीरें गणित के इतिहास से जुड़ी हर लाइब्रेरी में लगी रहती हैं। लिहाजा अभी तक आम धारणा यही थी कि इस निशान का प्रचलन नवीं सदी के आसपास ही हुआ होगा।गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त के यहां शून्य की अवधारणा 628 ईस्वी में आती है, हालांकि इसके लिए उन्होंने कोई चिह्न नहीं निर्धारित किया। इसलिए माना जाता रहा है कि इसके सौ-दो सौ साल बाद बिंदु या गोले की शक्ल में शून्य बनाया जाने लगा होगा। लेकिन इधर बख्शाली पांडुलिपि की कार्बन डेटिंग से दो बातें पता चलीं। एक तो यह कि इसके सारे भोजपत्र एक साथ नहीं लिखे गए हैं और इनकी लिखावट में कई सदियों का फासला है। और दूसरी यह कि इनमें सबसे पुराने भोजपत्र की लिखाई 224 ई. से 383 ई. के बीच की है।बीच वाली 160 साल की अवधि इस मामले में कार्बन डेटिंग का ‘एरर मार्जिन’ है। यानी दावे के साथ सिर्फ इतना कहा जा सकता है कि यह लिखाई न तो 224 ई. से पहले की है, न ही 383 ई. के बाद की।
इसमें कोई शक नहीं कि दर्शन में शून्यवाद की अवधारणा तीसरी सदी ईसा पूर्व के बौद्ध दार्शनिक नागार्जुन की दी हुई है। उनके ही ग्रंथ माध्यमक का प्रसिद्ध वाक्य है- ‘शून्य है तो सब कुछ संभव है, शून्य नहीं है तो कुछ भी संभव नहीं है।’ लेकिन इस अवधारणा का गणितीय शून्य से कोई जुड़ाव हो सकता है, इस पर विद्वानों में कभी सहमति नहीं बन सकी।
अभी गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त से कम से कम चार सौ साल पुरानी एक लिखाई में शून्य पा लिए जाने के बाद हम काफी पुख्तगी के साथ यह कह सकते हैं कि केवल दार्शनिक शून्य के ही नहीं, गणितीय शून्य के आविष्कारक भी नागार्जुन ही हैं। खासकर इस बात को ध्यान में रखते हुए कि पेशावर के इर्दगिर्द का इलाका पारंपरिक रूप से महायानियों का था, जो अपना आदिपुरुष नागार्जुन को ही मानते हैं।