Saturday, 23 May 2020

खतरे में वेलविट्शिया

चंद्रभूषण
ऑस्ट्रियन वनस्पतिशास्त्री और चिकित्सक फ्राइडरिख वेलविट्श उन्नीसवीं सदी के मध्य में किसी दिन अंगोला के अटलांटिक तटीय रेगिस्तान में घूम रहे थे कि नंगे सख्त पहाड़ों और तपती रेत से भरे इस निचाट इलाके में अचानक उन्हें एक पौधा दिख गया। लंबी हरी-सूखी पत्तियों के बेतरतीब ढूह के बीच लाल-बैंगनी फल जैसी चीजें। उस पौधे ने वेलविट्श को इतना चकित किया कि कुछ देर वे वहीं आंखें मूंदे बैठे रहे। यह सोचकर कि अगर यह उनका भ्रम हुआ तो आंख खोलते ही गायब हो जाएगा।

संसार की कुछ सबसे पुरानी, विचित्र और विलुप्ति के कगार पर खड़ी वनस्पतियों में आज इस वेलविट्शिया मिराबिलिस की गिनती होती है। इसे और चाहे जो भी कहें, पौधा तो नहीं कहना चाहिए क्योंकि इनकी औसत उम्र 300 साल से ज्यादा होती है और इनमें कुछ तो 2000 साल से भी ज्यादा पुराने हैं। वनस्पतिशास्त्रियों के बीच वेलविट्शिया को जिंदा जीवाश्म कहने का चलन है क्योंकि यह जुरासिक युग की वनस्पति है, जब दुनिया में फल-फूल जैसा कुछ होता ही नहीं था। चीड़ की तरह सारे पेड़-पौधे सीधे अपने बीज बनाया करते थे।

वेलविट्शिया का डेढ़ से लेकर छह फुट तक ऊंचा तना होता है, जिससे सिर्फ दो पत्तियां निकलती हैं और वे सैकड़ों, हजारों साल तक बढ़ती, सूखती, टूटती चली जाती हैं। गहरी जड़ों के बावजूद जिंदा रहने के लिए ओस और कोहरे से नमी जुटाने वाले इस रफ-टफ पेड़ का ग्लोबल वार्मिंग कुछ नहीं कर पाएगी, ऐसा वैज्ञानिक हाल तक मानते थे। लेकिन अभी उनका अध्ययन बता रहा है कि इसका यह सदी पार कर लेना भी एक चमत्कार होगा।

Saturday, 16 May 2020

भौतिकी का पांचवां बल

चंद्रभूषण
क्या भौतिकशास्त्र की बुनियाद हिलने वाली है? एक सदी से जो सिद्धांत इसे थामे हुए हैं, क्या उनमें भारी रद्दोबदल का वक्त आ गया है? एक विचित्र खीझ पिछले कई दशकों से भौतिकशास्त्रियों को लपेटे में लिए हुए है। 1920 के दशक में स्थापित दो सिद्धांतों थिअरी ऑफ रिलेटिविटी और क्वांटम मेकेनिक्स के जरिये सूक्ष्म से लेकर विराट तक लगभग हर प्रेक्षण की व्याख्या हो जाती है। हालांकि इन सौ सालों में प्रेक्षणों का स्तर दोनों पैमानों पर बहुत आगे जा चुका है।

समस्या दो जगहों से आ रही है। सिद्धांत के स्तर पर यह कि थिअरी ऑफ रिलेटिविटी जिस गुरुत्व के इर्दगिर्द घूमती है, उसकी क्वांटम मेकेनिक्स में कोई व्याख्या नहीं है। और व्यवहार के स्तर पर यह कि कुछ बड़े प्रेक्षणों की व्याख्या न क्वांटम मेकेनिक्स के पास है, न थिअरी ऑफ रिलेटिविटी के पास। मसलन, ब्रह्मांड का फैलना। प्रेक्षण बता रहे हैं कि यह 72 किलोमीटर प्रति सेकंड प्रति मेगापारसेक की रफ्तार से फैल रहा है। यानी हमसे 33 लाख प्रकाश वर्ष दूर स्थित नीहारिकाएं 72 किमी प्रति सेकंड की रफ्तार से दूर भाग रही हैं और वे 33 करोड़ प्रकाश वर्ष दूर हुईं तो उनके दूर भागने की रफ्तार 7200 किमी प्रति सेकंड है।

भौतिकी के चार मूल बलों में सभी की प्रवृत्ति पास खींचने की ही है। दूर भगाने का गुण सिर्फ विद्युत चुंबकीय बल में है, वह भी तब जब समान आवेश वाले पिंड आसपास हों। ग्रहों, तारों, नीहारिकाओं पर कोई आवेश होता नहीं, फिर यह कौन सा अज्ञात बल है जो उन्हें एक-दूसरे से दूर भगा रहा है? हंगरी के भौतिकशास्त्री अत्तिला क्रास्नाहोर्के 2015 से इस पांचवें बल की बुनियाद सूंघ लेने का दावा कर रहे हैं, हालांकि उन्हें गंभीरता से लेने की शुरुआत पिछले साल ही हुई है।

Saturday, 2 May 2020

ओजे-287 और देसी दिमाग


चंद्रभूषण
पिछले 130 वर्षों से ओजे-287 खगोलशास्त्रियों के लिए चुनौती बना हुआ है। कर्क राशि में प्लूटो जितनी चमक वाली एक चीज आकाश कुसुम की तरह अचानक उभरती है, फिर 12 साल के लिए गायब हो जाती है। बाद में गहरे प्रेक्षणों से पता चला कि दो तेज चमक के बीच मौजूद यह 12 साल का फासला भी हर बार न सिर्फ लगभग 20 घंटे कम हुआ जाता है, बल्कि हर तेज चमक के कुछ समय बाद एक हल्की चमक भी दर्ज की जाती है।

मामले का और बड़ा उलझाव इस प्रेक्षण के साथ शुरू हुआ कि ज्यादा चमक और कम चमक के बीच का समयांतराल निश्चित नहीं है। कभी यह एक साल नापा जाता है तो कभी बढ़ते-बढ़ते दस साल तक चला जाता है। 1891 में पहली बार यह चीज खगोलशास्त्रियों के सामने नमूदार हुई थी। तब से अब तक तकनीक और प्रस्थापना, दोनों दृष्टियों से उनका शास्त्र बहुत आगे जा चुका है। समझ यह बनी है कि ओजे-287 कोई चीज नहीं बल्कि साढ़े तीन अरब प्रकाश वर्ष दूर घटित होने वाली एक आवर्ती घटना है।

15 करोड़ सूर्यों जितना वजनी एक ब्लैक होल 18 अरब सूर्यों जितने वजनी, कहीं ज्यादा बड़े ब्लैक होल की परिक्रमा कर रहा है। लेकिन यह परिक्रमा ग्रहों द्वारा सूर्य की परिक्रमा जैसी न होकर आकाश की सापेक्ष वक्रता के कारण बहुत ही जटिल है। भारत की प्रतिष्ठित संस्था टीआईएफआर के दो वैज्ञानिकों प्रो. अचंवीदु गोपकुमार और उनके शोधछात्र लंकेश्वर डे ने इस परिक्रमा पथ की इतनी सटीक गणना की कि कम चमक वाला प्रेक्षण हाल में उनके बताए समय से मात्र ढाई घंटे के अंदर दर्ज कर लिया गया।

Monday, 27 April 2020

लॉकडाउन: खास लोगों के लिए खास सलाहें


Special Tips for the Patients with Specific Diseases

लॉकडाउन के दौरान परेशानी तो सभी को हो रही है, लेकिन बड़ी परेशानी उन्हें होती है जो दूसरे मोर्चों पर भी चुनौती का सामना कर रहे हैं। शुगर, बीपी,
किडनी और अस्थमा के मरीज अगर ऐहतियात बरतें तो यह दौर आसानी से गुजर जाएगा। एक्सपर्ट डॉक्टरों से बातचीत के बाद पेश हैं ऐसे मरीजों के लिए खास टिप्स:

जिन्हें शुगर है...

डायबीटीज दो तरह की होती है:
1. टाइप-1 डायबीटीज
यह शरीर के अचानक इंसुलिन हॉर्मोन बनाना बंद करने पर होती है और बचपन में ही हो जाती है। इसके मरीज बहुत कम होते हैं। इसमें शरीर के ग्लूकोज को कंट्रोल करने के लिए इंसुलिन देना पड़ता है।

2. टाइप-2 डायबीटीज
गलत लाइफस्टाइल, मोटापा और बढ़ती उम्र की वजह से टाइप-2 डायबीटीज होती है। इसमें शरीर में कम मात्रा में इंसुलिन बनता है। ज्यादातर मरीज इसी कैटिगरी में आते हैं। अमूमन ये मरीज टैब्लेट्स लेते हैं।

घर पर कैसे करें मैनेज
-फिजिकल ऐक्टिविटी पूरी तरह न छोड़ें। अभी बाहर नहीं जाना है इसलिए घर पर ही ऐक्टिव रहें।
- रोजाना करीब 10,000 कदम चलने की कोशिश करें। अगर लगातार टाइम नहीं मिल रहा तो 15-15 मिनट 3 बार वॉक कर लें।
- आप घर की बालकनी या छत पर वॉक कर सकते हैं। इन दिनों आप दोस्तों और रिश्तेदारों से मोबाइल पर खूब बात कर रहे होंगे तो बेहतर है कि बैठकर बात करने के बजाय घूम-घूम कर बात करें।
आपने 10,000 कदम चले हैं या नहीं, इस पर निगाह रखने के लिए अपने मोबाइल में स्टेप ट्रैकर ऐप डाउनलोड कर लें। एंड्रॉयड और iOS के लिए ऐसे कुछ ऐप्स हैं: Google Fit, Step Counter, Pedometer, Runtastic Steps, Fitbit, Runkeeper आदि।
- एरोबिक्स के लिए डांस या ज़ुंबा कर सकते हैं। डांस करने से मन भी खुश होता है और वजन भी कम होता है।
- योग करें। अगर वॉक कर पा रहे हैं तो आसन न भी करें तो चलेगा। लेकिन प्राणायाम और ध्यान जरूर करें। इनसे तनाव कम होता है।
- अपनी शुगर को रेग्युलर चेक करें। रेग्युलर का मतलब है, जैसा डॉक्टर ने बताया है, मसलन रोजाना या हफ्ते में। इस नियम को जरूर फॉलो करें।
- खाने को हल्का रखें। तले-भुने और हेवी खाने के बजाय फल और सब्जियों पर फोकस करें।
- अगर अचानक शुगर लो हो जाए तो फौरन टॉफी या चीनी खा लें। आराम से लेट जाएं और अपने डॉक्टर से फोन पर बात करें।

ब्लड ग्लूकोज टेस्ट
यह दो बार किया जाता है: खाली पेट (फास्टिंग) और नाश्ता या ग्लूकोज लेने के बाद (पीपी)।
फास्टिंग ब्लड शुगर (नॉर्मल): 70-100 mg/dl
पोस्ट प्रैंडियल (पीपी) शुगर: 70-140 तक mg/dl
(खाने का पहला कौर खाने के 2 घंटे बाद पीपी होना जाहिए।)

ये भूल कर भी न करें
- इंसुलिन का इंजेक्शन लगाते हुए ध्यान रखें कि मरीज ने खाना जरूर खाया हो क्योंकि इंसुलिन ब्लड शुगर लेवल को कम करता है। अगर कोई बिना खाना खाए यह इंजेक्शन लगा ले तो ब्लड शुगर लेवल लो यानी हापोग्लाइसीमिया हो सकता है।
- इंसुलिन हमेशा नाश्ता करने और डिनर करने के 15-20 मिनट बाद लेना चाहिए। दो इंजेक्शनों के बीच 10-12 घंटों का फासला होना जरूरी है। खाने के एकदम साथ न लगाएं क्योंकि ऐसा करने से ब्लड शुगर लेवल बढ़ सकता है।
- किसी वजह से मरीज सुबह या शाम को इंजेक्शन लगाना भूल जाता है तो मरीज को दो इंजेक्शन एक साथ कभी नहीं लगाने चाहिए। कभी मरीज को लगता है कि आज खाने पर कंट्रोल नहीं हो पाएगा तो वह इंसुलिन की मात्रा बढ़ा सकता है।
- इंसुलिन की क्वॉलिटी बरकरार रखने के लिए इसे 8 से 10 डिग्री तापमान पर रखना चाहिए। फ्रिज में ही इंसुलिन को रखें।
-टाइप-2 डायबीटीज के मरीज अगर किसी समय की दवाई खाना भूल जाएं तो एक साथ 2 वक्त की दवाएं न खाएं।

खा सकते हैं
कार्बोहाइड्रेट: चोकर वाला आटा, जौ, जई, रागी, दलिया, मल्टिग्रेन ब्रेड, काला चना, सोया, राजमा
फल: सेब, चेरी, जामुन, मौसमी, संतरा, स्ट्रॉबेरी, शहतूत, आलूबुखारा, नाशपाती, अंजीर
सब्जियां: ककड़ी, तोरी, टिंडा, सेम, शलजम, खीरा, चने का साग, सोया का साग, लहसुन, पालक, मेथी, आंवला, घीया
दूसरी चीजें: टोंड दूध और उससे बनी चीजें, छिलके वाली दालें, मछली (बिना ज्यादा तेल और मसाले वाली), फ्लैक्ससीड्स, छाछ आदि

कम खाएं
कार्बोहाइड्रेट: बिना चोकर का आटा, सूजी, सूजी के रस, ब्राउन ब्रेड, सफेद चना
फल: अमरूद, पपीता, तरबूज, खरबूजा
सब्जियां: अरबी, आलू, जिमीकंद, गोभी
मीठा: आर्टिफिशल स्वीटनर, खांड (बिना रिफाइन वाली शुगर)
दूसरी चीजें: टोंड दूध और उससे बनी चीजें, बिना छिलके वाली दालें, अंडा, चिकन, बादाम, अखरोट, देसी घी, अच्छे तेल (सरसों, ऑलिव, कनोला, राइसब्रैन आदि)

ना खाएं
कार्बोहाइड्रेट: सफेद चावल, मैदा, पूरी, समोसा, वाइट ब्रेड
फल: आम, चीकू, अंगूर, केला
सब्जियां: शकरकंद, आलू
मीठा: मिठाई, चीनी, गुड़, शहद, गन्ना, आइसक्रीम, जैम, केक, पेस्ट्री, कुकीज़
दूसरी चीजें: फुल क्रीम दूध और उससे बनी चीजें, रेड मीट, कोल्ड ड्रिंक्स, रिफाइंड ऑयल।

नोट: अगर शुगर के साथ-साथ कोई दूसरी बीमारी भी हो जैसे किडनी तो यह डाइट लागू नहीं होगी। बेहतर यही है कि डॉक्टर की राय से ही अपना डाइट चार्ट बनाएं। डॉक्टर से मिल नहीं सकते तो फोन पर बात लें।

होम्योपैथी के अनुसार दवाएं
Nux Vomica, Argentum Nitricum, Lycopodium
नोट: दवा होम्योपैथ की सलाह से ही लें।

आयुर्वेदिक नुस्खे
-10 बिलपत्र सुबह-शाम पानी के साथ पीसकर लें।
-सूखा आंवला और सौंफ बराबर मात्रा में लेकर बारीक पीस लें। एक-एक चम्मच सुबह-शाम पानी के साथ लें।
-लहसुन की एक कली सुबह खाली पेट लें।

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बीपी और कोलेस्ट्रॉल की परेशानी है तो...

नॉर्मल रीडिंग
-कोलेस्ट्रॉल 200 तक नॉर्मल
नॉर्मल ब्लड प्रेशरः अपर बीपी 130 से नीचे और लोअर बीपी 80 से नीचे

अगर किसी को हाई बीपी या लो बीपी की समस्या है तो नई एक्सरसाइज शुरू करने से पहले किसी डॉक्टर से फोन पर जरूर पूछ लें। वैसे अगर पहले से एक्सरसाइज करते आ रहे हैं तो उसे जारी रख सकते हैं।

जरूरी एक्सरसाइज
- दिल की बीमारी से बचने के लिए रोजाना कम-से-कम आधा घंटा कार्डियो एक्सरसाइज करना जरूरी है। इससे वजन कम होता है, बीपी कम हो जाता है और दिल की बीमारी की आशंका 25 फीसदी कम हो जाती है।
- कार्डियो एक्सरसाइज में तेज वॉक, जॉगिंग, साइकलिंग, स्विमिंग, एरोबिक्स, डांस आदि शामिल होते हैं। लेकिन अभी ये सभी एक्सरसाइज करना मुश्किल है इसलिए घर में ही वॉक करें 45 मिनट से 1 घंटा टहलें। अगर डांस करने की इच्छा हो तो यह कई एक्सरसाइज से बेहतर है। 15 से 20 मिनट डांस में दे सकते हैं।
इनके अलावा
- 5 मिनट डीप ब्रिदिंग, 10 मिनट अनुलोम-विलोम और 5 मिनट शीतली प्राणायाम करें। शीतली प्राणायाम खासतौर पर मन को शांत रखता है और बीपी को मेंटेन करता है।
- 15 मिनट के लिए मेडिटेशन करें।
- हेवी एक्सरसाइज जैसे कि वेट लिफ्टिंग आदि डॉक्टर की सलाह से ही करें।
- ऐसे आसन डॉक्टर की सलाह के बिना न करें, जिनमें सारा वजन सिर पर या हाथों पर आता है, जैसे कि मयूरासन, शीर्षासन आदि।
- शवासन करें। आंखें बंद करके पूरे शरीर के अंगों को बारी-बारी से महसूस करें। इससे मांसपेशियों का तनाव कम होता है और बीपी नॉर्मल रहता है।

ध्यान रखें 10 बातें
-स्मोकिंग न करें। इससे दिल की बीमारी की आशंका 50 फीसदी बढ़ जाती है।
-अपना लोअर बीपी 80 से कम रखें। ब्लड प्रेशर ज्यादा हो तो दिल के लिए काफी खतरा है।
-फास्टिंग शुगर 80 से कम रखें। डायबीटीज और दिल की बीमारी आपस में जुड़ी हुई हैं।
- तनाव न लें। दिल की बीमारियों की बड़ी वजह तनाव है।
-चूंकि आजकल लॉकडाउन है इसलिए जरूरी न हो तो बाहर से किसी को चेकअप के लिए न बुलाएं। शुगर और बीपी को मॉनिटर करनेवाली मशीन की मदद लें।
-डायबीटीज है तो शुगर के अलावा बीपी और कॉलेस्ट्रॉल को भी कंट्रोल में रखें।

क्या खाएं
- हाई फाइबर और लो फैट वाली डाइट जैसे कि गेहूं, ज्वार, ओट्स, बाजरा आदि का आटा या दलिया
- फ्लैक्स सीड्स (अलसी के बीज) आधा चम्मच रोजाना
- एक-दो कली लहसुन रोजाना
- 5-6 बादाम और 1-2 अखरोट रोजाना
- फल और सब्जियां खूब खाएं। दिन भर में अलग-अलग रंग के 5 तरह के फल और सब्जियां खाएं।
- जामुन, पपीता, सेब, आड़ू जैसे लो-ग्लाइसिमिक इंडेक्स वाले फल
- हरी सब्जियां, साग, शलजम, बीन्स, मटर, ओट्स, सनफ्लावर सीड्स आदि
- ऑलिव ऑयल, कनोला, तिल का तेल और सरसों का तेल, थोड़ी मात्रा में देसी घी भी अच्छा।

न खाएं
- मक्खन, मलाई, वनस्पति घी आदि सैचुरेडिट फैट
- मैदा, सूजी, सफेद चावल, चीनी, आलू यानी सफेद चीजें
- पैक्ड चीजें मसलन पैक्ड जूस, बेकरी आइटम्स, सॉस आदि
- रोजाना आधे चम्मच से ज्यादा नमक न लें
- बहुत मीठी चीजें (मिठाई, चॉकलेट) आदि

होम्योपैथी के अनुसार दवाएं

जिन्हें सिर्फ हाई बीपी की परेशानी है
Kali Phos, Aconite, Rauwolfia

दिल की बीमारियों के साथ हाई बीपी की शिकायत भी है
Crataegus, Digitalis, Strophanthus

नोट: दवा होम्योपैथ की सलाह से ही लें। अगर पहले से कोई दवा ले रहे हैं तो नियम से लेते रहें।

आयुर्वेदिक नुस्खे
कोलेस्ट्रॉल और हाई बीपी में
-सुबह खाली पेट लहसुन की 1-2 कलियां पानी के साथ लेने से कोलेस्ट्रॉल के स्तर में कमी आती है।
-आंवले का चूर्ण 1 चम्मच सुबह-शाम पानी के साथ लें। कच्चा आंवला उपलब्ध हो तो 2-3 आंवले सुबह-शाम चबाकर खाएं।
-पीपल की कोंपलों का रस 2 चम्मच और शहद 1 चम्मच मिलाकर सुबह-शाम लें।

लो बीपी में
-मौसमी, संतरे, अनार या गाजर का रस सुबह-शाम लेना चाहिए।
-शारीरिक मेहनत वाला काम नहीं करना चाहिए।
-भोजन के बाद हींग वाली छाछ लें।
-आंवलों का रस और शहद 2-2 चम्मच मिलाकर सुबह-शाम चाटें।
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किडनी की समस्या में...

बिना डायलिसिस के
- किडनी खराब होने पर डाइट पर बहुत तरह की पाबंदियां लग जाती हैं। ऐसे में डॉक्टर और डायटिशन की सलाह से ही डाइट लें।
-लिक्विड की मात्रा भी डॉक्टर ही तय करते हैं। उसी के अनुसार लिक्विड लें। लिक्विड का मतलब सिर्फ पानी से नहीं है। इसमें पानी के साथ दाल, जूस सबकुछ शामिल होता है।

खाने में इनसे करें परहेज
-फलों का रस, कोल्ड ड्रिंक्स, चाय-कॉफी, नीबू पानी, नारियल पानी, शर्बत आदि।
- सोडा, केक और पेस्ट्री जैसे बेकरी प्रॉडक्ट्स और खट्ट‌ी चीजें।
- केला, आम, नीबू, मौसमी, संतरा, आडू, खुमानी आदि।
- मूंगफली, बादाम, खजूर, किशमिश और काजू जैसे सूखे मेवे।
- चौड़ी सेम, कमल ककड़ी, मशरूम, अंकुरित मूंग आदि।
- अचार, पापड़, चटनी, सॉस, सत्तू, अंकुरित मूंग और चना।
- मार्केट के पनीर के सेवन से बचें। बाजार में मिलने वाले पनीर में नीबू, सिरका या टाटरी का इस्तेमाल होता है। इसमें मिलावट की भी गुंजाइश रहती है।

कैसे तैयार करें खाना-
- वेजिटेबल ऑयल और घी आदि बदल-बदल कर इस्तेमाल करें।
- घर पर ही नीबू के बजाय दही से डबल टोंड दूध फाड़कर पनीर बनाएं।
- खाना पकाने से पहले दाल को कम-से-कम 2 घंटे और सब्जियों को 1 घंटे तक गुनगुने पानी में रखें। फिर इस पानी को फेंक दें। इससे उनमें पोटेशियम की मात्रा कम हो जाएगी। इसे लीचिंग प्रोसेस कहते हैं।
-महीने में एकाध बार लीचिंग प्रक्रिया अपनाकर घर में छोले और राजमा भी खा सकते हैं, पर इसकी तरी के सेवन से बचें।
-नॉनवेज खानेवाले रेड मीट का सेवन नहीं करें। चिकन और मछली भी एक सीमित मात्रा में ही खाएं।
-रोजाना कम-से-कम दो अंडों का सफेद हिस्सा खाने से जरूरी मात्रा में प्रोटीन मिलता है।

डायलिसिस वाले बरतें ये सावधानियां
- डायलिसिस कराने वालों को लिक्विड चीजें कम लेनी चाहिए। अमूमन डायलिसिस के मरीजों को 24 घंटे में 1 लीटर लिक्विड लेने के लिए कहा जाता है।
- इस बात का जरूर ध्यान रखना चाहिए कि लिक्विड चीजों में सभी तरह के पेय शामिल होते हैं यानी इसमें पानी के अलावा दूध, दही, चाय, कॉफी, आइसक्रीम, बर्फ और दाल-सब्जियों की तरी भी शामिल हैं। यही नहीं, रोटी, चावल और ब्रेड आदि में भी पानी होता है।
- लिक्विड पर कंट्रोल रखने से दो डायलिसिस के बीच में मरीज का वजन (जिसे वेट गेन या वॉटर रिटेंशन भी कहते हैं) अधिक नहीं बढ़ता। दो डायलिसिस के बीच में ज्यादा वजन बढ़ने से डायलिसिस का प्रॉसेस पूरा होने पर कई बार कमजोरी या चक्कर आने की शिकायत भी होने लगती है।
-वैसे तो डॉक्टर हफ्ते में 3 बार डायलिसिस कराने को कहा जाता है, लेकिन लॉकडाउन की स्थिति में अगर एक या दो बार मिस भी हो जाए तो एक डायलिसिस जरूर कराना चाहिए। यह ध्यान रहे कि ऐसा बार-बार न हो।
-अगर डायलिसिस मिस हुआ है तो लिक्विड लेते समय मात्रा का ध्यान जरूर रखें।
- किडनी के जो मरीज डायलसिस पर नहीं हैं, उन्हें कम प्रोटीन और डायलसिस कराने वाले मरीजों को ज्यादा प्रोटीन की जरूरत होती है। आपने खानपान की पूरी जानकारी डायट एक्सपर्ट से ले रखी होगी। उसे ही फॉलो करें।
- डायलिसिस कराने वाले शख्स को कोई भी दवा लेने से पहले अपने किडनी एक्सपर्ट (नेफ्रॉलजिस्ट) से सलाह जरूरी है।

लिक्विड का सेवन ऐसे कम करें
डायलिसिस कराने वाला शख्स नीचे लिखे तरीकों से लिक्विड का सेवन कम कर सकता है:
- गर्मियों में 500 एमएल की कोल्ड ड्रिंक की बोतल में पानी भरके उसे फ्रीजर में रख लें। यह बर्फ बन जाएगा और फिर इसका धीरे-धीरे सेवन करें।
- फ्रिज में बर्फ जमा लें और प्यास लगने पर एक टुकड़ा मुंह में रखकर घुमाएं और फिर उसे फेंक दें।
- गर्मियों में रुमाल भिगोकर गर्दन पर रखने से भी प्यास पर काबू पाया जा सकता है।
- घर में छोटा कप रखें और उसी में पानी लेकर पिएं।
- खाना खाते समय दाल और सब्जियों की तरी का सेवन कम-से-कम करने की कोशिश करें।

होम्योपैथिक दवाएं
AAL SERIUM, Apis, Apocynum
नोट: होम्यॉपथी डायलिसिस बंद कराने में सक्षम नहीं है लेकिन यह ऐसे मरीजों की सहायक जरूर है। ऐलोपैथी दवाओं के साथ ही होम्योपैथी दवाओं के सेवन से मरीज ज्यादा सेहतमंद रह सकता है।

आयुर्वेदिक नुस्खे
बीमारी की वजह के आधार पर ही जरूरी दवा खाने की सलाह दी जाती है:
-आक के पत्तों को सुखाकर और जलाकर राख कर लें। आधा चम्मच यह राख थोड़ा-सा नमक मिलाकर 1 गिलास छाछ में मिलाकर सुबह-शाम लें।
- वरुण, पुनर्नवा, अर्जुन, वसा, कातुकी, शतावरी, निशोध, कांचनार, बाला, नागरमोथा, भूमि आमलकी, सारिवा, अश्वगंधा और पंचरत्नमूल आदि दवाओं का इस्तेमाल किडनी के इलाज में किया जाता है।
- किडनी की बीमारी का लगातार इलाज जरूरी है और यह ताउम्र चलता है। किडनी की बीमारी का इलाज से ज्यादा मैनेजमेंट होता है।

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अस्थमा है तो...

इन दिनों यों तो पलूशन काफी कम है जोकि अस्थमा के मरीजों के लिए बहुत अच्छा है। लेकिन सांस से जुड़ी बीमारी के मरीजों को कोरोना से बचाव के लिए ज्यादा ध्यान रखना है क्योंकि उनका रेस्पिरेटरी सिस्टम पहले से ही संवेदनशील है। इस बात का जरूर याद रखें कि अगर कोई अस्थमा का मरीज है तो उसे वर्तमान लॉकडाउन की स्थिति में जरूर सेल्फ आइसोलेशन में चले जाना चाहिए। परिवार के बाकी सदस्यों के साथ कम-से-कम बैठने की कोशिश करनी चाहिए। वह जितना अलग रहेंगे, उतना ही उनके लिए और बाकी लोगों के लिए सही रहेगा।

अमूमन कब बढ़ता है अस्थमा
-रात में या सुबह तड़के
-ठंडी हवा या कोहरे से
-ज्यादा कसरत करने के बाद
-बारिश या ठंड के मौसम में
-दवाएं नियमित रूप से लें
-आजकल चूंकि घर पर हैं और अस्थमा के मरीज हैं तो सूखी सफाई यानी झाड़ू से घर की साफ-सफाई से बचें। अगर ऐसा करते हैं तो ठीक से मुंह-नाक ढक कर करें। वैसे, वैक्यूम क्लीनर का इस्तेमाल करना बेहतर है। गीला पोंछा और पानी से फर्श धोना भी अच्छा विकल्प हो सकता है।
•- दिन में एक बार एकाध घंटे के लिए घर की खिड़की-दरवाजे खोल दें ताकि बाहर की ताज़ा हवा अंदर आ सके।
-बेडशीट, सोफा, गद्दे आदि की भी नियमित सफाई करें, खासकर तकिया की क्योंकि इसमें काफी सारे एलर्जीवाले तत्व मौजूद होते हैं। हफ्ते में एक बार चादर और तकिए के कवर बदल लें और दो महीने में पर्दे धो लें।
•-कम-से-कम फिलहाल कारपेट हटा दें। बाद में भी अगर इस्तेमाल करना ही चाहते हैं कम-से-कम 6 महीने में ड्राइक्लीन करवाते रहें।
-•कॉकरोच, चूहे, फफूंद आदि को घर में जमा न होने दें।
•-बहुत ठंडे से बहुत गर्म में अचानक न जाएं और न ही बहुत ठंडा या गर्म खाना खाएं।
•-रुटीन ठीक रखें। वक्त पर सोएं, भरपूर नींद लें और तनाव न लें।
-गुनगुने पानी से कुल्ला करना फायदेमंद है।
-जो मरीज लगातार नेबुलाइजर से भाप लेते हैं। अगर वह पहले दिन में 2 बार भाप लेते थे तो अब 4 बार तक ले सकते हैं।

खानपान का रखें ख्याल
अगर पिछले दिनों में खानपान में परहेज नहीं कर पाए हैं तो यह मौका परहेज के लिहाज से बेहतरीन है। इस समय मजबूरी नहीं है कि ऑफिस जाने की जल्दी है तो जो मिल जाए, वही खा लें।
-जिस चीज को खाने से सांस की तकलीफ बढ़ जाती हो, वह न खाएं। डॉक्टर सिर्फ ठंडी चीजें खाने से मना करते हैं। साथ ही जंक फूड से अस्थमा अटैक की आशंका ज्यादा होती है।
-एक बार में ज्यादा खाना नहीं खाना चाहिए। इससे छाती पर दबाव पड़ता है।
-विटामिन ए (पालक, पपीता, आम, अंडे, दूध, चीज़, बेरी आदि), सी (टमाटर, संतरा, नीबू, ब्रोकली, लाल-पीला शिमला मिर्च) और विटामिन ई (पालक, शकरकंद, बादाम, सूरजमुखी के बीज आदि ) और एंटी-ऑक्सिडेंट वाले फल और सब्जियां जैसे कि बादाम, अखरोट, राजमा, मूंगफली, शकरकंद आदि खाने से लाभ होता है।
-अदरक, लहसुन, हल्दी और काली मिर्च जैसे मसालों से फायदा होता है।
-रेशेदार चीजें जैसे कि ज्वार, बाजरा, ब्राउन राइस, दालें, राजमा, ब्रोकली, रसभरी, आडू आदि ज्यादा खाएं।
-फल और हरी सब्जियां खूब खाएं।
-रात का भोजन हल्का और सोने से दो घंटे पहले होना चाहिए।

क्या न खाएं
-प्रोट्रीन से भरपूर चीजें बहुत ज्यादा न खाएं।
-रिफाइन कार्बोहाइड्रेट (चावल, मैदा, चीनी आदि) और फैट वाली चीजें कम-से-कम खाएं।
-अचार और मसालेदार खाने से भी परहेज करें।
-ठंडी और खट्टी चीजों से परहेज करें।

ये जरूर खाएं
ओमेगा-3 फैटी एसिड: ओमेगा-3 फैटी एसिड साल्मन, टूना मछलियों में और मेवों व अलसी में पाया जाता है। ओमेगा -3 फैटी एसिड फेफड़ों के लिए लाभदायक है। यह सांस की तकलीफ एवं घरघराहट के लक्षणों से निजात दिलाता है।
फोलिक एसिड: पालक, ब्रोकली, चुकंदर, शतावरी, मसूर की दाल में फोलेट होता है। हमारा शरीर फोलेट को फोलिक एसिड में तब्दील करता है। फोलेट फेफड़ों से कैंसर पैदा करने वाले तत्वों को हटाता है।
विटमिन सी: संतरे, नींबू, टमाटर, कीवी, स्ट्रॉबरी, अंगूर और अनानास में भरपूर विटमिन सी होता है, सांस लेते वक्त शरीर को ऑक्सीजन देने और फेफड़ों से विषाक्त पदार्थों को निकालने के लिए मदद करते हैं।
लहसुन: इसमें मौजूद एलिसिन तत्व फेफड़ों से फ्री रेडिकल्स को दूर करने में मदद करते हैं। लहसुन संक्रमण से लड़ता है, फेफड़ों की सूजन कम करता है।
बेरी: बेरीज ऐंटीऑक्सिडेंट होते हैं।

होम्योपैथी में दवाएं
Bryonia, Natrium Sulphur, Sulphur, Arsenic Album
नोट: दवा होम्योपैथ की सलाह से ही लें।

आयुर्वेदिक नुस्खे
-आधा चम्मच रीठे के छिलके का चूर्ण सुबह खाली पेट एक सप्ताह तक मरीज को पानी के साथ लेना चाहिए। इस दौरान खाने में सिर्फ खिचड़ी और उसमें 1 चम्मच घी दें।
-अदरक के एक चम्मच रस में उतना ही शहद मिलाकर सुबह-शाम लेने से भी फायदा होता है।

एक्सपर्ट पैनल
डॉ. के. के. अग्रवाल
पूर्व अध्यक्ष, IMA

डॉ. अरुण गर्ग
सीनियर कंसल्टंट सर्जन, ईएनटी

डॉ. प्रशांत जैन
सीनियर यूरॉलजिस्ट

डॉ. अंशुल वार्ष्णेय
जनरल फिजिशन

डॉ. आर. पी. पाराशर
पंचकर्मा हॉस्पिटल

डॉ. सुशील वत्स
सीनियर होम्योपैथ

संडे नवभारत टाइम्स में प्रकाशित

फल-सब्जियों में लॉक करें ताजगी

Tips to keep Fruits n Vegetables fresh for longer time

लॉकडाउन में हम सबकी कोशिश यही होती है कि घर से बाहर कम ही निकले। फिर भी जरूरी चीजों के लिए बाहर जाना ही पड़ता है। ऐसे में जब भी हम सब्जी या फलों की खरीदारी के लिए बाहर जाते हैं तो ज्यादा से ज्यादा मात्रा में खरीदते हैं ताकि बार-बार हमें बाहर नहीं जाना पड़े। लेकिन एक समस्या भी इसी के साथ पैदा हो जाती है कि ज्यादा मात्रा में सब्जी और फलों को स्टोर कैसे किया जाए ताकि उसकी ताजगी बरकरार रहे और पैसा बर्बाद न हो। इसी बारे में एक्सपर्ट लोगों से बात कर पूरी जानकारी दे रहे हैं लोकेश के. भारती

खरीदारी करते समय रखें ध्यान

 1.
सूती कपड़े का बैग लेकर जाएं

इससे दो फायदे हैं। एक तो सब्जी खरीदकर एक जगह रखना आसान होता है, दूसरा जब सब्जियों को धोने की बारी आती है तो सूती बैग समेत धोना आसान रहता है।

 2.
कुछ पका, कुछ कम पका लें

सब्जियों के मामले में तो कुछ कम पका खरीदने से कोई खास फायदा नहीं होता, लेकिन कुछ फलों के मामले में कम पका खरीदने से उसकी लाइफ कुछ लंबी जरूर हो जाती है। मसलन केला और पपीता अगर कम पका खरीदेंगे तो दो-तीन दिनों तक वे आराम से चल जाएंगे। इसलिए अपनी जरूरत के अनुसार कुछ केला और पपीता पका हुआ खरीदें ताकि उसे उसी दिन से खाना शुरू कर सकें जबकि कुछ मात्रा में कम पका केले और पपीता खरीदें ताकि उन्हें तीन दिनों के बाद भी खा सकें।

खरीदकर जब घर पहुंचें

सब्जियों और फलों की लाइफ घर में उन्हें धोने के साथ ही शुरू हो जाती है। सही तरीके से धोने का फायदा यह है कि एक तो उन पर मौजूद केमिकल और बैक्टीरिया खत्म हो जाते हैं, साथ ही उनकी लाइफ भी बढ़ जाती है।

धुलाने और सुखाने का तरीका
सब्जियों और फलों को सबसे पहले 2 फीसदी नमक या 2 फीसदी इमली के पानी (5 लीटर पानी में 100 ग्राम नमक या 100 ग्राम इमली) में डुबाकर छोड़ दें। सब्जियों को 35 से 40 मिनट तक और फलों को 10 से 15 मिनट तक। यहां एक बात का ध्यान रखना जरूरी है कि साग, धनिया, पुदीना और कढ़ी पत्ता को 10 से 15 मिनट ही इस पानी में डुबाकर रखें। इसके बाद इन्हें निकालकर पंखे की हवा में सूखने दें। धूप में सूखने के लिए कतई न रखें। इसके लिए इन सभी को किसी साफ चटाई या बेडशीट पर फैला सकते हैं। 20 से 25 मिनट में अमूमन ये सूख जाते हैं। इसके बाद बारी आती है इन्हें सही तरीके से पैक करने और सही जगह रखने की।

तो ऐसे स्टोर करें इन्हें

फ्रिज में ऐसे संभालकर रखें सब्जी व फल

 1.
एक साथ नहीं

फ्रिज में सब्जी या फलों को स्टोर करते समय ज्यादातर लोग इस तरह की गलती करते हैं। एक साथ ही सभी सब्जियों या फलों को रख देते हैं। यह गलत है। दरअसल, हर फल को पकने में लगने वाला समय, उनकी श्वसन क्रिया की गति, उससे निकलने वाली गैस अलग-अलग होती है। इसलिए कभी भी इन सभी को एक साथ स्टोर नहीं करनी चाहिए।

 2.
पॉलिथीन का उपयोग

सब्जी को पॉलिथीन में बंदकर फ्रिज में रखें। भिंडी को फ्रिज में स्टोर करना है तो उसके साथ करेला और परवल स्टोर न करें। हां, एक ही तरह के दो फलों मसलन संतरा और मौसमी को एक साथ स्टोर कर सकते हैं। पॉलिथीन में रखने के बाद उसमें सुई से 20 से 30 छेद बना दें ताकि फल और सब्जियां सांस ले सकें और पॉलिथिन में इनसे निकलने वाली गैस जमा न हो। अगर फ्रिज में बिना पॉलिथीन के रखेंगे तो फल और सब्जियां जल्दी खराब हो जाएंगी और अगर पॉलिथीन में 20-30 सुराख नहीं करेंगे तो भी वे जल्दी खराब हो जाएंगे।

अगर घर में फ्रिज न हों या इस लॉकडाउन में खराब हो गया हो तो इन्हें फ्रिज के बाहर भी इसी तरह स्टोर कर सकते हैं। फर्क सिर्फ इतना ही पड़ेगा कि फ्रिज में जहां ऐसी सब्जियां 7 से 10 दिनों तक फ्रेश रहती हैं, वहीं फ्रिज के बाहर ये 3 से 4 दिन तक ही फ्रेश रह पाएंगी।

इन्हें न रखें फ्रिज में
कुछ सब्जियां ऐसी भी हैं जिन्हें फ्रिज में रखने की जरूरत नहीं होती। मसलन आलू, प्याज, लहसुन। इन सब्जियों की मियाद बाहर भी अच्छी-खासी होती है। इन्हें धोकर स्टोर न करें, नमी से ये खराब हो जाते हैं। लहसुन को बाहर किसी जूट के थैले में स्टोर करना अच्छा रहता है।

इस प्राथमिकता से फ्रिज में रखें चीजें
- सबसे नीचे के खाने में फल और सब्जी
-नीचे से दूसरे या बीच के खाने में दूध, मीट, मछली
- सबसे ऊपर के खाने में दही और बना हुआ खाना

जरूरी टिप्स
-बास्केट में टमाटर को सबसे ऊपर रखें। इसके ऊपर सब्जियों को न रखें क्योंकि टमाटर पर दबाव पड़ने से ये जल्दी खराब होते हैं।
-केले को सड़ने से बचाने के लिए उसके डाल से काटे गए ऊपरी भाग को प्लास्टिक से लपेट कर रख दें।
-कच्चे टमाटर को कमरे के तापमान पर रखें और पके हुए टमाटर को पॉलिथीन में लपेटकर फ्रिज में रखें।
-नीबू को खुले में फ्रिज में न रखें। पॉलिथीन में ही सुराख करके रखें। बाहर किसी शीशे के बाउल में पानी डालकर भी इन्हें रख सकते हैं।
-गाजर को लंबे समय तक ताजा रखने के लिए ऊपरी हिस्से को, जहां से पत्ते निकलते हैं, काटकर हटा दें और किसी एयर टाइट कंटेनर में डालकर फ्रिज में रख दें।
-इमली को सही रखने के लिए इसकी बाहरी सतह पर नमक लगा दें। फिर फ्रिज में रख दें
-जामुन एक के ऊपर एक दबाकर किसी छोटे बर्तन में न रखें। इन्हें छेद वाले खुले बर्तन में फैलाकर रखें, जिससे उनमें हवा लगती रहे।

हफ्ते भर की प्लानिंग
सब्जी की खरीदारी करने से पहले पूरे हफ्ते की प्लानिंग कर लें। संडे से लेकर शनिवार तक किस दिन क्या खाना है, इसकी प्लानिंग कर लेंगे तो अच्छा रहेगा। यह प्लानिंग किसी सब्जी की कितनी लाइफ होती है, उसके अनुसार होनी चाहिए। यानी अगर पालक साग, धनिया या पुदीना आदि ला रहे हैं तो उसे शुरुआत के दो दिनों में ही खाना होगा। यही तरीका फलों के मामले में भी अपना सकते हैं। मसलन केला या अंगूर को जल्दी खा लेना। अगर आप बाजार जाकर सब्जी और फल ला रहे हैं तो ऐसी प्लानिंग कर सकते हैं:

रविवार और सोमवार को खाएं
सब्जी: पालक या दूसरे साग बनाएं। धनिया या पुदीने की चटनी बना सकते हैं। चटनी बनाने के बाद ये 10 दिनों तक चल जाते हैं।
फल: शहतूत, केला, अंगूर

मंगलवार और बुधवार को खाएं
सब्जी: तोरई, घीया (लौकी), कच्चा केला
फल: पपीता, केला, अंगूर

गुरुवार और शुक्रवार को खाएं
सब्जी: भिंडी, परवल, गोभी, गाजर, बैंगन
फल: संतरा, सेब

शनिवार को खाएं
सब्जी: इस दिन हरी सब्जियों के बजाय छोले, राजमा बना सकते हैं।
फल: सेब

नोट: अपनी जरूरत और स्वाद के अनुसार इसमें बदलाव कर सकते हैं।

इन्हें पकाकर भी कर सकते हैं स्टोर

टमाटर
इनसे टमाटर का पेस्ट तैयार किया जा सकता है जिसे 10 से 15 दिनों तक फ्रिज में रखकर उपयोग कर सकते हैं। इसके लिए टमाटर को पानी में 10 से 15 मिनट उबाल लें। इसके बाद ठंडा होने पर टमाटर के छिलके को हटा दें। फिर बचे हुए भाग को ऐसे भी रख सकते हैं या फिर मिक्सी में चलाकर पेस्ट बना लें। फिर इसे स्टोर कर दें। खास बात यह है कि इस तरह टमाटर को स्टोर करने से इसमें मौजूद एंटी-ऑक्सिडेंट लाइकोपिन (इसी वजह से टमाटर लाल रंग का और स्वादिष्ट होता है) की मात्रा बढ़ जाती है जो हमारे शरीर के लिए फायदेमंद है।

कढ़ी पत्ता
कढ़ी पत्ता का उपयोग अमूमन कढ़ी या फिर दक्षिण भारतीय व्यंजन मसलन: डोसा मसाला, सांभर, इडली आदि बनाने में किया जाता है। इसे स्टोर करने का सबसे बेहतरीन उपाय है कि इसे तेल में फ्राई कर लें। फ्राई करने के बाद इसे फ्रीज में रख दें और जब जरूरी पड़े उपयोग कर लें। यह 1 महीने तक भी खराब नहीं होगा।

धनिया और पुदीना
इन दोनों की चटनी लजीज होती है। जब इन्हें स्टोर करना हो तो पॉलिथीन में सुराख करके करें, ये 7 दिनों तक चल जाते हैं। अगर किसी को इससे भी ज्यादा लंबे समय तक स्टोर करना है तो इनका पेस्ट तैयार कर लें। इसके लिए इन्हें सीधे मिक्सी में चला लें।

एक्सपर्ट पैनल
रेखा शर्मा, पूर्व चीफ डाइटिशन, एम्स
परमीत कौर, चीफ डाइटिशन, एम्स
डॉ. शिखा शर्मा, न्यूट्री-डायट एक्सपर्ट
ईशी खोसला, सीनियर डायट एक्सपर्ट
प्रेरणा कोहली, सीनियर क्लिनिकल साइकॉलजिस्ट
रामरोशन शर्मा, प्रिंसिपल साइंटिस्ट, पूसा इंस्टिट्यूट

संडे नवभारत टाइम्स में प्रकाशित 19.04.2020

बढ़ रही है दुष्ट लहरों की ऊंचाई

चंद्रभूषण
समुद्री सचाइयों और जहाजी गप्पों के बीच फर्क करना सदा से एक कठिन काम रहा है। गहरे समुद्र में कई-कई दिन थपेड़े खाने के बाद बचाए गए नाविकों ने ऐसे किस्से पहले भी सुनाए हैं कि समुंदर एकदम शांत था, तभी अचानक एक बहुत ऊंची लहर उठी और उनकी नाव को निगल गई। लेकिन ऐसे किस्सों को सच मानने या न मानने की दुविधा पहली बार 1826 में बनी, जब फ्रांसीसी नौसेना के कप्तान जूल ड्यूमां द’उर्विल ने हिंद महासागर में अपने तीन साथियों के साथ 33 मीटर (108 फुट) ऊंची एक लहर दर्ज करने की बात सार्वजनिक की और वैज्ञानिक फ्रांस्वा अरागो ने इसके लिए उनका मजाक उड़ाया।

फिर महान जर्मन गणितज्ञ कार्ल फ्रेडरिक गॉस ने अपने सांख्यिकी सिद्धांतों से हिसाब लगाकर बताया कि किसी तूफानी समुद्र में अगर 12 मीटर यानी चौमंजिला इमारत जितनी ऊंची लहरें उठ रही हों तो भी वहां कोई लहर 15 मीटर से ज्यादा ऊंची नहीं आ सकती। यह भी कि 30 मीटर ऊंची लहर का नंबर अगर कभी आएगा भी तो 10 हजार साल में एक बार से ज्यादा नहीं। लेकिन 1984 में शांत समुद्र में 11 मीटर ऊंची लहर दर्ज किए जाने से लेकर अब तक के हजारों प्रेक्षणों ने गॉस के इस गणित को गलत साबित किया है।

आधुनिक समुद्री जहाजों में लहरों की ऊंचाई लगातार दर्ज करते रहने का इंतजाम होता है। कुल लहरों में दो-तिहाई ऊंची लहरों की औसत ऊंचाई को ‘सिग्नीफिकेंट वेव हाइट’ (एसडब्लूएच) और इसकी दोगुनी से भी ऊंची लहर को 'रोग वेव' (दुष्ट लहर) का नाम दिया गया है। पिछले महीने छपी साउथंपटन यूनिवर्सिटी की उत्तरी अटलांटिक में 22 वर्ष (1994-2016) के जहाजी आंकड़ों पर आधारित एक रिसर्च  बता रही है कि समय बीतने के साथ दुष्ट लहरों की संख्या कम हो रही है लेकिन इनकी ऊंचाई ज्यादा होती जा रही है। यह भी कि ठंडे, शांत समुद्रों में इनका खतरा बहुत बढ़ गया है।

Saturday, 25 April 2020

विषाणु-विज्ञानी डेविड बाल्टीमोर से कुछ सवाल और उनके जवाब

प्रश्नकर्ता विषाणु-विज्ञानी डेविड बाल्टीमोर से  ( जिन्होंने एचआईवी के उस एन्ज़ाइम की खोज की जिससे यह विषाणु अपने आरएनए से डीएनए बनाता है और जिसके लिए उन्हें नोबेल-पुरस्कार दिया गया।  ) :
 "साधारण ज़ुकाम भी कई बार कोरोनावायरसों से हो सकता है। इस ज़ुकाम को हम वैश्विक महामारी यानी पैंडेमिक क्यों नहीं मानते ?"

उत्तर : "साधारण ज़ुकाम यानी कॉमन कोल्ड भी एक वैश्विक महामारी है। पर यह मारक नहीं है। सैकड़ों क़िस्म के विषाणु ज़ुकाम पैदा कर सकते हैं , इनमें अनेक कोरोनाविषाणु भी हैं। पर हम इनकी बहुत चिन्ता नहीं करते , क्योंकि हम अपना ध्यान रख लेते हैं। लोगों ( विशेषकर बच्चों ) में ज़ुकाम होता है , कुछ दिनों में ठीक हो जाता है। ये अधिकांश कोरोनाविषाणु गम्भीर बीमारी नहीं पैदा करते , इसलिए हम इनकी चिन्ता भी नहीं करते। ज़ुकाम की वैश्विक महामारी यानी ढेर सारे लोगों में नाक बहना-हरारत-बुख़ार-खाँसी जैसे लक्षण होना और फिर प्रतिरक्षा-तन्त्र के प्रयासों से ठीक हो जाना।"

"ज़ुकाम की उपेक्षा करना भी ठीक नहीं है। सार्वजनिक स्वास्थ्य-अधिकारी सामान्य ज़ुकाम ( कॉमन कोल्ड ) के विषाणुओं का अध्ययन करते हैं और उसके प्राकृतिक विकास , संक्रामकता ,फैलाव व अन्य बातों का भी। पर एक सीमा से अधिक हम ज़ुकाम पर संसाधन व्यय नहीं करते।"

"कोविड-19 विषाणु 1-5 % में मारक है। सामान्य ज़ुकाम लगभग कभी मारक नहीं। कोविड-19 के खिलाफ़ हमारे भीतर कोई विशिष्ट प्रतिरक्षा अभी विकसित नहीं। यह रोग नया है , इसका विषाणु भी। हम इसके फैलाव को रोकने का प्रयास कर रहे हैं क्योंकि इससे मृत्यु हो रही हैं और सामाजिक जीवन की अस्तव्यस्त करने की क्षमता सामान्य से कहीं अधिक है। हमने ऐसा कुछ सन् 1918 की एच1 एन 1 इन्फ़्लुएन्ज़ा-महामारी से समय से नहीं देखा है।"

प्रश्न : "क्या आप हमें एचआईवी-महामारी ( एपिडेमिक ) के बारे में कुछ बता सकते हैं ?"

उत्तर : "एड्स महामारी तब शुरू हुई , जब लॉस एंजल्स में कुछ लोग डॉक्टरों के पास विचित्र लक्षणों के साथ पहुँचने लगे। इन लक्षणों के मूल में क्षीण होता प्रतिरक्षा-तन्त्र था। यह सिंड्रोम पहले कभी नहीं देखा गया था : अनेक ऐसे लक्षण जो त्वचा व मुँह में उभरते थे। इनमें से अधिकांश लोग समलैंगिक पुरुष थे और इन्हें उन डॉक्टरों ने देखा , जो समलैंगिक पुरुषों के उपचार में कुछ विशेषज्ञता रखते थे।"

"डॉक्टरों ने इन मरीज़ों को सीडीसी , एटलांटा रिपोर्ट किया वहाँ उन्होंने इन्हें अलग पाया। फिर अनेक अन्य डॉक्टरों ने कहा कि उन्हें भी ऐसे मरीज़ मिल रहे हैं। तब इसे एक अज्ञात कारण वाले सिंड्रोम का नाम दिया गया और इसे एचआईवी के नाम से पहचाने जाने में समय लगा। एक बार यह स्पष्ट हो गया कि इसका कारण एक विषाणु है , तब यह सोचा जाने लगा कि यह एक-व्यक्ति-से-दूसरे में फैलता है। इससे इस समस्या को समझने में कुछ बेहतरी हुई , यह एक ऐसा कीटाणु था जो पहले हमें कभी नहीं मिला था। बाद में हमने जाना कि एचआईवी एक रेट्रोवायरस है : अनेक उन रेट्रोवायरसों की तरह जिनपर हम दसियों साल से काम कर रहे हैं। ये रेट्रोवायरस अपने भीतर आरएनए रखते हैं और कोशिकाओं के भीतर पहुँच कर एक ख़ास एन्ज़ाइम द्वारा डीएनए का निर्माण करते हैं। इसी एन्ज़ाइम की खोज के लिए मुझे सन् 1975 में नोबेल पुरस्कार दिया गया। अस्सी के दशक में इन रेट्रोविषाणुओं की क़िस्म बेहतर समझ में आ गयी थी , पर इस तरह की ( रेट्रोविषाणु से होने वाली ) किसी बीमारी को लोग पहली बार देख रहे थे।"

"एचआईवी को जब ट्रेस किया गया तब इसका सम्बन्ध बन्दरों से निकला , जो अफ़्रीका में मिलते हैं। उनसे चिम्पैंजियों में और फिर मनुष्यों में। यह प्रसार बहुत सफल तो नहीं था, लेकिन फिर भी हो गया था। बहुत सफल इसलिए नहीं, क्योंकि एचआईवी बहुत संक्रामक विषाणु नहीं है। अस्सी व नब्बे के दशकों में यह और स्पष्ट हो गया।"

"इस बीच एचआईवी संसार-भर में फैला। इसके कारण लोग ख़ूब बीमार हुए और अनेक मृत्यु हुईं। इन विषाणुओं को रोकने वाली इन्हिबिटर-दवाएँ बनायी गयी , कुछ पर तुरन्त टेस्ट हुए। इनमें से एक एजेडटी बहुत असरदार सिद्ध हुई , हालांकि इसका असर कम देर तक रहता था क्योंकि विषाणु म्यूटेट करके अपने स्वरूप को बदल लेता था और दवा से बच निकलता था। लेकिन इससे दवाएँ कैसे विकसित करनी हैं --- इसका रास्ता खुल गया। फिर अनेक कम्पनियों ने अनेक दवाएँ बना डालीं और इनमें से कई बेहतरीन थीं।"

"वैज्ञानिकों ने विषाणु को समझा और उसकी कमज़ोरियों को भी। उन्हीं कमज़ोरियों को समझकर टारगेट किया गया दवाओं को बनाने के लिए। ढेरों दवाएँ तैयार हो गयीं। आज एड्स एक दीर्घकालिक रोग है किन्तु अब मारक नहीं रहा। कम-से-कम विकसित देशों में तो यह थम गया क्योंकि यहाँ दवाएँ उपलब्ध रहीं।  अब हम एचआईवी-युक्त एक संसार में रहते हैं। एड्स नहीं गया , पर अब यह हमें उस तरह से मार नहीं पा रहा।"

प्रश्न : "यानी एड्स-महामारी दवाओं के कारण धीमी पड़ी , पर बिना टीके के। एचआईवी का टीका क्यों नहीं बना ?"

उत्तर : "यह दिलचस्प कहानी है। हम अक्सर सोचते हैं कि जब कोई नया विषाणु खोजा जाएगा , तब सबसे पहले उसके खिलाफ़ टीका बनेगा , न कि दवा। हमने अनेक विषाणुओं चेचक ( स्मॉलपॉक्स ) , पोलियो , खसरा ( मीज़ल्स ) , मम्प्स , रूबेला के खिलाफ़ टीके ही बनाये हैं। जब अस्सी के दशक में मैं जब इस विषाणु पर शोध कर रहा था , तब मुझे लगा था कि इस विषाणु के खिलाफ़ टीका बना पाना शायद सम्भव न हो। कारण कि विषाणु म्यूटेट कर सकता है : अपना जेनेटिक स्वरूप बदल सकता है। जो नित्य प्रतिरक्षा-तन्त्र को भरमा रहा है , उससे कैसे लड़ा जाएगा ? यही कारण है कि सफल टीका न बन सका। किसी विषाणु की रोकथाम इतनी मुश्किल नहीं रही , हालांकि आज भी मेरे कुछ साथी एचआईवी का टीका बनाने में लगे हुए हैं।"

प्रश्न : "तो अब एचआईवी और सार्स-सीओवी 2 में अन्तर बताइए। एचआईवी-पैंडेमिक और कोविड-19-पैंडेमिक में आप अन्तर क्या पाते हैं ?"

उत्तर : "सबसे बड़ा अन्तर तो व्यक्ति-से-व्यक्ति में फैलाव का है। एचआईवी मुश्किल से फैलता है , सार्स-सीओवी 2 अत्यधिक संक्रामक है। फिर ये दोनों विषाणु अलग-अलग विषाणु-परिवारों के हैं। सार्स-सीओवी 2 कोरोनाविषाणु है , एचआईवी एक रेट्रोविषाणु है। एकदम भिन्न विकास , एकदम अलग कार्यप्रणाली। ( हाँ , दोनों विषाणु हैं यह अलग बात है ! )"

"ये दोनों विषाणु मनुष्य में जानवरों से आये। एचआईवी बन्दरों से , सार्स-सीओवी 2 सम्भवतः चमगादड़ों से। दोनों मानवों के लिए नये हैं। कोरोनाविषाणुओं के खिलाफ़ कोई दवा नहीं है क्योंकि कोरोनाविषाणु अब तक बड़ी समस्या नहीं रहे। सार्स और मर्स जैसे रोग जब सामने आये , तब कुछ हलचल हुई किन्तु इन्हें भी अपेक्षाकृत तेज़ी से नियन्त्रित कर लिया गया।"

साभार - स्कन्द शुक्ला

#skandshukla22

अभी नहीं कीड़ा कयामत

चंद्रभूषण
कीट-पतंगों को लेकर दुनिया की राय मिली-जुली है। पौधों के परागण में अहम भूमिका के चलते मधुमक्खियां, भौंरे और कुछ अन्य कीड़े खेती-बागवानी की जरूरी शर्त हैं। जुगनू और तितली जैसे कीड़ों का रिश्ता हमारे सौंदर्यबोध से है लिहाजा इनका कम दिखना तुरंत खटकता है। दूसरी तरफ टिड्डी और स्टेमबोरर जैसे कीड़े फसलों को भयंकर नुकसान पहुंचाते हैं। उनके प्रकोप का जिक्र भी लोगों में सिहरन पैदा करता है, जैसा अभी पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान, पश्चिमी अफ्रीका और खाड़ी क्षेत्र के कई देशों में कर रहा है।

जाहिर है, हम चाहते हैं कि मच्छर और टिड्डियां दुनिया में कम दिखें जबकि तितली, मधुमक्खियां और जुगनू ज्यों के त्यों बने रहें। लेकिन दुनिया हमारे चाहने से नहीं चलती। संसार की सभी जीवजातियों में सबसे बड़ी तादाद कीड़ों की है, पर उनके लिए वक्त बहुत बुरा जा रहा है। 2017 में जर्मनी से प्रकाशित एक सैंपल बेस्ड रिपोर्ट में बताया गया था कि बीते 27 वर्षों में वहां उड़ने वाले कीड़ों की तौल घटकर एक चौथाई रह गई है। इससे पहले कैलिफोर्निया में बादाम के बागानों की उपज तेजी से गिरी तो खोजबीन से पता चला कि उनका परागण करने वाली मधुमक्खियां कम बची हैं।

यूरोप-अमेरिका की कुछ और रिपोर्टों का साझा नतीजा ‘इंसेक्ट अपोकलिप्स’ (कीड़ा कयामत) जैसे लेखों में जाहिर हुआ और इसे स्थायी खाद्यान्न संकट की आहट की तरह देखा जाने लगा। अभी बृहस्पतिवार को ‘साइंस’ मैगजीन में छपे एक विश्वव्यापी अध्ययन में बताया गया है कि मामला उतना विकट नहीं है, हालांकि प्रति दशक 9.2 फीसदी कीड़ों की कमी वाली बात इसमें भी स्वीकार की गई है।

Tuesday, 21 April 2020

शुगर की लत छुड़ाना है जरूरी

...गर है शुगर की लत,
इन दिनों है छुटकारे का बेहतरीन मौका
Get rid of Sugar Addiction during Lockdown

शुगर अडिक्शन के शिकार हम लोगों के लिए लॉकडाउन के ये दिन अच्छे नहीं चल रहे। मिठाई की दुकानें बंद हैं तो दिन बेचैनी में कट रहे हैं। हालांकि एक्सपर्ट का मानना है कि इस आदत से छुटकारा पाने का यह बेहतरीन मौका है और अगले कुछ दिनों में आप इससे मुक्ति के लिए पूरी कोशिश कर सकते हैं और संभव है कि आप इसमें सफल भी रहें। इस आदत को छोड़ने के बारे में एक्सपर्ट लोगों से बात कर पूरी जानकारी दे रहे हैं लोकेश के. भारती

मीठा पसंद करने वालों की भी अपनी मजबूरी होती है। मिठाई न मिले तो ऐसे लोग परेशान हो जाते हैं। 'शुगर अडिक्शन' के शिकार ऐसे लोगों को अगर मीठा न मिले तो उन्हें लगता है कि कुछ खाया ही नहीं। कई लोग तो मिठाई देखते ही उस पर टूट पड़ते हैं और कितना भी खा लें, उनका मन नहीं भरता। बेशक ऐसे लोगों के लिए आजकल मिठाई के ऑप्शन काफी कम हैं। सारे होटल और रेस्तरां बंद हैं और घरों में इतनी मिठाइयां तो बन नहीं सकतीं। ऐसे में वे परेशान तो हैं, लेकिन अगर इस समय वे खुद को मिठाई से दूर कर लें और उसकी जगह फ्रूट्स जैसे ऑप्शन को आदत में शामिल कर लें तो इस लॉकडाउन में यह बहुत बड़ी उपलब्धि होगी।

क्या है शुगर अडिक्शन
खाना खाने के बाद मीठा खाने का मन लगभग सभी का करता है। अगर आपको लगता है कि मीठा नहीं खाया तो खाना पूरा नहीं हुआ और हर बार खाने के बाद कुछ मीठा होना ही चाहिए तो आप शुगर अडिक्ट हैं। लेकिन जिन लोगों को मीठा न मिलने पर इसकी जरूरत महसूस नहीं होती या जिन्हें मीठा खाना याद भी नहीं रहता, उन्हें शुगर अडिक्ट नहीं माना जा सकता।

क्यों होती है लोगों में यह समस्या
अगर किसी को शुगर अडिक्शन की परेशानी है तो इसका सीधा-सा मतलब है कि उसकी आंत में गुड और बैड बैक्टीरिया का अनुपात सही नहीं है। हमारे गलत खानपान (ज्यादा तेल मसाला, जंक फूड आदि) की वजह से अमूमन ऐसा होता है। इससे आंत सही तरीके से काम नहीं करती। पाचन ठीक तरीके से नहीं होता। इस समस्या से निपटना भी इस लॉकडाउन में मुमकिन है। हम अगर हर दिन सुबह में खाली पेट एक गिलास गुनगुने पानी में आधा नीबू निचोड़ कर पिएं तो फर्क 10 दिनों में ही दिखने लगेगा। हमारी आंत में गुड बैक्टीरिया की संख्या बढ़ने लगेगी और पाचन क्रिया सही होने लगेगी। इसलिए शुगर की आदत को छोड़ने के लिए शरीर को नीबू पानी से डिटॉक्सिफाई करना भी जरूरी है।

अडिक्शन को क्यों करें नमस्ते
आजकल हर शख्स को मिठाई और नमक से दूरी बनाने की सलाह डॉक्टर और डायटिशन देते हैं क्योंकि इनसे शुगर, मोटापा और बीपी जैसी परेशानी पैदा होती हैं।
-अगर कोई नियमित रूप से मिठाई खाए तो यह मोटापा और डायबीटीज का कारण बन सकता है।
- कई लोगों को दिन में खाने के बाद अगर मिठाई न मिले तो काम में मन नहीं लगता है।
- रात में खाना के बाद मीठा खाने को न मिले तो अच्छी नींद नहीं आती।

लॉकडाउन में छोड़ना आसान
आजकल हम लोगों के पास वक्त की कोई कमी नहीं है। ऐसे में किसी भी आदत को छोड़ना दूसरे दिनों की तुलना में अभी आसान है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि चीजों की उपलब्धता ही नहीं है। फिर घर से बाहर निकलना ही मुश्किल है। अगर कोई बाहर निकल भी गया तो शराब और सिगरेट की दुकानें बंद हैं। इसलिए ऑप्शन बहुत कम हैं। सिर्फ शुगर ही क्यों, शराब, सिगरेट जैसी बुरी आदतों को भी इस लॉकडाउन के दौरान छोड़ा जा सकता है।
यहां एक सवाल उठना लाजमी है कि अगर कोई घर में ही मीठा बनवाकर खाए तो फिर उसका क्या? हां, यह मुमकिन है लेकिन किसी रेस्तरां से या होटल से खरीदकर खाने की तुलना में इतनी तरह के व्यंजन घर बनाना बहुत मुश्किल है।

चीनी की लत छोड़ने के 5 बेहतरीन तरीके

 1.
खाने के बाद ब्रश करें

यह सच है कि जब हम कुछ नमकीन खाते हैं तो हमें मीठा खाने की तलब ज्यादा होती है। ऐसे में इससे बचने का सबसे बेहतरीन तरीका है कि खाने के बाद फौरन ही ब्रश कर लें। इससे एकतरफ जहां दांतों की सफाई हो जाएगी, वहीं मुंह का स्वाद भी बदल जाएगा। एक बार जब स्वाद बदल जाता है तो मीठा खाने की तलब भी काफी कम हो जाती है। खाने के फौरन बाद ब्रश करना वैसे अच्छा नहीं होता क्योंकि हमारी लार पाचन में मदद करती है। इसलिए ऐसा शुरू के 5-10 दिन ही करें। यानी जब तक आदत छूट न जाए तब ब्रश के ऑप्शन को आजमा सकते हैं।

 2.
नींद कुछ खराब होने दें

डिनर के बाद मीठा अगर नहीं खाएंगे तो मुमकिन है कि नींद कुछ देर में आए। पर, आजकल यह चल सकता है। जब ऑफिस जाना होता था तो एक रात नींद न आने से अगले दिन ऑफिस जाना मुश्किल हो जाता था। चूंकि आजकल ऑफिस नहीं जाना है तो सुबह में सफर के एक-दो घंटे बचते ही हैं। ऐसे में अगर रात में नींद नहीं आएगी तो सुबह में नींद पूरी कर सकते हैं और थोड़ा लेट भी उठ सकते हैं।

 3.
खा सकते हैं ड्राई फ्रूट्स भी

किशमिश हो या फिर खजूर, मिठाई की जगह हम इन्हें ले सकते हैं। 10 से 12 किशमिश या फिर 2 से 3 खजूर दिनभर में लेना सही रहता है। एक बार खाने के बाद 5 से 6 किशमिश और एक खजूर पर्याप्त है। ऐसे में इन ड्राई फ्रूट्स को घर पर जरूर रखना चाहिए। अच्छी बात यह है कि इनकी लाइफ भी काफी लंबी होती है और इन्हें खाने से सेहत पर भी कोई समस्या नहीं आती।

 4.
फ्रूट्स की आदत डालें

किसी को बार-बार मीठा खाने की आदत है तो उसे छोड़ने के लिए वह फल का सहारा ले सकता है। मौसमी फल (अंगूर, पपीता, सेब, शहतूत, संतरा आदि) के एक-दो पीस ही मीठा खाने की आपकी इच्छा को खत्म कर सकते हैं। ऐसे में घर में फल रखें। इन्हें अच्छी तरह धोकर और ढककर रखें। जब भी मीठा खाने का मन करे, फल खा लें। ध्यान दें कि अगर आपको जुकाम या बुखार है तो रात में फल कम खाएं, केले तो न ही खाएं। कारण, केला बलगम पैदा कर सकता है। और हां, कोशिश हो कि खाने के फौरन बाद ही फ्रूट्स नहीं खाएं। कम से 2 घंटे का गैप दें। अगर 2 घंटा नहीं बर्दाश्त कर सकते तो 1 घंटा जरूर रूकें।

 5.
सौंफ भी है अच्छा विकल्प

खाना खाने के बाद मीठा खाने का मन करे तो सौंफ खाना एक अच्छा ऑप्शन है। यह हल्की मीठी होती है और इससे सांस की बदबू भी दूर होती है। हकीकत यह है कि होटल और रेस्तरां में भी खाना खत्म होने के बाद सौंफ और मिश्री दी जाती है। इसकी सबसे बड़ी वजह सौंफ की खासियत ही है। दरअसल, सौंफ सांस की बदबू को पूरी तरह खत्म कर देती है। लेकिन यहां इस बात का ध्यान रखें कि सौंफ के साथ मिश्री न हो।
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ऐसा सोचना नहीं है सही
मिथ: मिठाई या चीनी की जगह गुड़ खाना ठीक रहता है।
सचाई: यह सही नहीं है। अगर हमने मिठाई की जगह गुड़ का सेवन किया तो भले ही कैलरी कम हो जाए, लेकिन मीठे की आदत नहीं जाएगी। हां, चीनी की तुलना में बेहतर ऑप्शन जरूर है, लेकिन शुगर अडिक्शन छोड़ने के लिए सही नहीं है।

मिथ: मिठाइयों का शौक अडिक्शन नहीं है।
सचाई: खुद की आदतों पर अगर गौर करेंगे तो संदेह कहीं रह नहीं जाता कि आप अडिक्ट हैं। एक सिंपल फंडा है: अगर कोई शख्स बिना मिठाई के 10 दिन रह ले और इस दौरान उसे मीठा खाने की जरूरत महसूस न हो तो वह शुगर अडिक्ट नहीं है। इस फंडे पर आदतों को देखें और तय करें कि अडिक्शन है या नहीं।

मिथ: रोटी-चावल का ज्यादा सेवन शुगर अडिक्शन में नहीं आता।
सचाई: हां, यह सच है कि कार्बो यानी रोटी या चावल का स्वाद मीठा नहीं होता, लेकिन पचने के बाद ये भी ग्लूकोज ही बनाते हैं और फैट के रूप में बदलकर शरीर में जमा हो जाते हैं। यही कारण है कि शुगर पेशंट या फिर जिन्हें अपना वजन कम करना होता है, उन्हें रोटी-चावल से दूरी बनाकर रखने के लिए कहा जाता है। सच तो यह है कि हम इन्हें सीधे तौर पर तो मिठाई नहीं कह सकते, लेकिन जब हम शुगर अडिक्शन को छोड़ने की बात करते हैं तो इन पर निर्भरता कम जरूर करनी चाहिए। दिन में अगर 3 चपाती या 2 कटोरी चावल खाते हैं तो रात में 1 चपाती और आधी कटोरी चावल से ज्यादा नहीं खाना चाहिए।

मिथ: चाय या कॉफी में चीनी से दिक्कत नहीं है।
सचाई: कई लोगों को खाने के बाद मीठे के रूप में चाय या कॉफी पीना अच्छा लगता है। उन्हें यह सेहत के लिहाज से सही लगता है क्योंकि इसमें कैलरी की मात्रा मिठाई की तुलना में काफी कम होती है। 1 कप चाय या कॉफी में 50 से 70 कैलरी तक होती है, जबकि 1 गुलाब जामुन में 300 से 350 कैलरी होती है। यह सच है कि चाय या कॉफी में कैलरी कम है, लेकिन खाने के बाद इन्हें पीने पर दूसरे नुकसान बहुत ज्यादा हैं:
- खाने के फौरन बाद इन्हें पीने पर खाना पचने में परेशानी होती है, इसलिए पेट में गैस की समस्या हो सकती है।
- ये डाययूरेटिक (ज्यादा यूरिन बनाने वाले) होती हैं यानी शरीर से ज्यादा मात्रा में पानी को यूरिन बनाकर निकालते हैं। ऐसे में शरीर की कोशिकाओं में पानी की कमी होती रहती है।
- भले ही इसमें कैलरी कम हो, लेकिन चाय या कॉफी में भी चीनी ही ली जा रही है। यह भी उसी तरह है, जैसे एक मिठाई। मिठाई में भी चीनी तो सीधे तौर पर कोई खाता नहीं है।

मिथ: आर्टिफिशल स्वीटनर से नुकसान नहीं।
सचाई: इस तरह की सोच ज्यादातर लोग रखते हैं कि आर्टिफिशल स्वीटनर में कैलरी नहीं होती, इसलिए चाय या कॉफी में मिलाकर पीने से समस्या नहीं है। लेकिन उन्हें यह समझना होगा कि यह कोई नेचरल चीज नहीं है। शुगर-फ्री चीजों (चॉकलेट, डाइट कोक, बेकरी आइटम आदि) में शुगर अल्कोहल, फ्रक्टोस, सैक्रीन, मैल्टोडेक्सट्रिन आदि होते हैं जोकि शुगर नहीं हैं, लेकिन इनमें कार्बोहाइड्रेट काफी ज्यादा होते हैं, जिससे ब्लड ग्लूकोज़ लेवल पर असर पड़ता है। प्रेग्नेंट महिलाएं, बच्चे को दूध पिलाने वाली मांएं और बच्चे आर्टिफिशल स्वीटनर का इस्तेमाल न करें। यह बात कोरी अफवाह है कि आर्टिफिशल स्वीटनर्स से कैंसर, सदमा, दौरा, मेमरी लॉस जैसे समस्याएं हो सकती हैं। किसी भी रिसर्च में यह साबित नहीं हुआ है। हालांकि एक स्टडी में कहा गया है कि जिन लोगों को डायबीटीज नहीं है और उन्हें वजन कम करने में मदद नहीं मिलती, उलटे डायबीटीज जैसी मेटाबॉलिक बीमारियां होने का खतरा होता है। बेहतर है कि इन स्वीटनर्स को कम मात्रा में ही इस्तेमाल किया जाए।

एक्सपर्ट पैनल
डॉ. समीर पारिख, सीनियर साइकाइट्रिस्ट
रेखा शर्मा, पूर्व चीफ डाइटिशन,एम्स
परमीत कौर, चीफ, डाइटिशन, एम्स
डॉ. शिखा शर्मा, न्यूट्री-डायट एक्सपर्ट
ईशी खोसला, सीनियर डायट एक्सपर्ट
प्रेरणा कोहली, सीनियर क्लिनिकल साइकॉलजिस्ट
रामरोशन शर्मा, प्रिंसिपल साइंटिस्ट, पूसा इंस्टिट्यूट

संडे नवभारत टाइम्स में प्रकाशित 19.04.2020