Friday, 14 September 2018

आइए, हिंदी दिवस पर अंग्रेजी से सीखें


हरजिंदर, वरिष्ठ पत्रकार 
इस महीने की शुरुआत हिंदी के लिए एक अच्छी खबर के साथ हुई थी। ऑनलाइन कारोबार की अगुवा कंपनी अमेजनने अपना हिंदी साइट शुरू किया है। यानी हिंदी अब ऑनलाइन खरीदारी की भाषा भी बन गई है। बेशक, इस बहुराष्ट्रीय कंपनी ने ऐसा हिंदी की सेवा के लिए नहीं किया, बल्कि हिंदीभाषी समुदाय के बीच अपनी कारोबारी संभावनाओं के विस्तार के लिए किया है। संचार सुविधाओं के प्रसार ने स्मार्टफोन को अब देश के उन कोनों तक पहंुचा दिया है, जहां अंग्रेजी अपनी पकड़ खो बैठती है। ऐसे लोगों की क्रय-क्षमता के दोहन के लिए भारतीय भाषाओं का सहारा लेना तकरीबन सभी ऑनलाइन कंपनियों की मजबूरी बनता जा रहा है। अमेजन ने तो हिंदी के साथ ही तमाम दूसरी भारतीय भाषाओं की मदद लेने की घोषणा भी कर दी है। लेकिन हिंदी की शुरुआत सबसे पहले हुई है, क्योंकि हिंदी ही ऐसी भाषा है, जिससे देश के बड़े भौगोलिक विस्तार तक पहंुच बनाई जा सकती है।  
मानक हिंदी के तौर पर आज जिस खड़ी बोली का इस्तेमाल किया जाता है, उसे लेकर एक धारणा यह भी है कि यह भाषा हाट और बाजार में पैदा हुई, वहीं पली-बढ़ी है। तमाम तरह के समाजवादी रुझानों के चलते हिंदी क्षेत्र की राजनीति भले ही लंबे समय तक बाजार की संभावनाओं के खिलाफ खड़ी दिखाई देती रही हो, लेकिन सच यही है कि जैसे-जैसे बाजार का विस्तार हुआ है, हिंदी का आधार मजबूत होता गया है। चाहे वह फिल्मों के रूप में मनोरंजन का बाजार हो या फिर उपभोक्ता उत्पादों का। उत्पाद के ऊपर के सारे लेबल भले ही अंग्रेजी में हों, लेकिन अगर उसे बेचना है, तो विज्ञापन हिंदी में ही देने होंगे। यह बात देसी-विदेशी कंपनियों ने बहुत पहले ही समझ ली थी कि उत्पादन प्रक्रिया की भाषा          भले ही कोई भी हो, पर उपभोक्ताओं से संवाद की          भाषा स्थानीय ही रखनी होगी। हालांकि इसमें एक विडंबना भी छिपी है कि हिंदी के जो विज्ञापन दिन-रात हमारे दिल-दिमाग पर छाए रहते हैं, उनके खुद के उत्पादन की भाषा अंग्रेजी है।
वैसे यह विडंबना कोई नई नहीं है। यह ऐसी समस्या नहीं है, जो अंग्रेजों या अंग्रेजी के साथ आई हो। ज्ञान-विज्ञान व प्रशासन की भाषा और लोक भाषा के बीच का अंतर भारत में काफी समय से रहा है, शायद सदियों से। और जहां ज्ञान-विज्ञान व प्रशासन की भाषा हिंदी बनाने की कोशिश हुई है, वहां एक ऐसी हिंदी सामने आई है, जो कुछ भी हो, लोकभाषा नहीं है। इसे अच्छी तरह समझना हो, तो उत्तर प्रदेश के किसी कल-कारखाने में चले जाइए। वहां नियम यह है कि मजदूरों व कर्मचारियों से संबंधित कानूनों को हिंदी में लिखकर दीवार पर चिपकाना होगा, ताकि कर्मचारी उन्हें आसानी से पढ़ सकें। लेकिन पढ़ सकने का सच यह है कि मजदूर या कर्मचारी तो दूर, हिंदी भाषा में पीएचडी करने वाला भी उस भाषा को पढ़कर समझ नहीं सकता। एक दूसरा उदाहरण दिल्ली मेट्रो है, जहां हर कुछ देर के बाद यह उद्घोषणा होती है- दृष्टिबाधित व्यक्तियों हेतु बने स्पर्शणीय पथ पर न चलें।शासन-प्रशासन के लिए हिंदी के इस्तेमाल पर जोर देने वालों ने हमें जो अनुवाद की भाषा दी है, उसने दरअसल अंग्रेजी की सत्ता को ही मजबूत करने का काम किया है। 
लेकिन हिंदी लोकभाषा बनी रहने के साथ ही ज्ञान-विज्ञान और शासन-प्रशासन की भाषा भी बने, यह हिंदी क्षेत्र का पुराना सपना है। हर साल हिंदी दिवस दरअसल इसी सपने को दोहराने व संकल्प बनाने की सोच के साथ आता और चला जाता है। इस दिन हम हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की बात तो करते ही हैं, उसे विश्व भाषा बनाने के लिए जुट जाने की भी सोचते हैं। वैसे हिंदी एक अर्थ में विश्व भाषा तो है ही, यह दुनिया की चौथी सबसे          ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है और इस मामले में अंग्रेजी से थोड़ा ही नीचे है। लेकिन जब यह तर्क दिया जाता          है, तो बात दरअसल इसे अंग्रेजी की तरह प्रभावी भाषा बनाने की होती है, वरना अंग्रेजी भी तीसरे नंबर की           बोली जाने वाली भाषा ही है। उससे ऊपर चीन की मंदारिन और स्पेनिश है, हिंदी दिवस पर हम इन भाषाओं की बात कभी  नहीं करते। 
यहां यह जान लेना जरूरी है कि पिछले तकरीबन दो सौ साल में अंग्रेजी दुनिया की इतनी प्रभावी भाषा कैसे बन गई? इसका एक श्रेय अंग्रेजी साम्राज्यवाद को दिया जाता है, हालांकि यह आधा ही सच है। सही-गलत जो भी तरीका अपनाया गया हो, पर एक दौर में अंग्रेजी समाज इतना ताकतवर हो गया कि दुनिया के एक बहुत बड़े हिस्से में अपना सिक्का चलाने की स्थिति में आ गया। अंग्रेजों ने दुनिया के तमाम देशों पर न सिर्फ अपने देश की आबोहवा में पनपे नियम-कानूनों, तौर-तरीकों, भोजन-पहनावों, पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों, यहां तक कि मछलियों को थोपा, बल्कि उन्हें अपनी भाषा के साथ चलने चलाने की मजबूरी भी दी। इसी के साथ दूसरा आधा सच यह है कि अंग्रेजी दरअसल औद्योगिक क्रांति की भी भाषा थी। औद्योगिक क्रांति और उसके उत्पादों के साथ यह दुनिया के उन कोनों में भी पहंुच गई, जहां अंग्रेजों का साम्राज्यवाद भी नहीं पहुंच पाया था। 
अंग्रेजी के इस इतिहास का सबक सिर्फ इतना है कि कोई भाषा जब किसी बड़े बदलाव की भाषा या उसका जरिया बनती है, तो जहां-जहां वह बदलाव पहंुचता है, वहां-वहां वह भाषा भी अपनी जड़ें जमाने लगती है। इसे इस तरह भी देखें कि आज हम जिस हिंदी का इस्तेमाल करते हैं, उसे विस्तार मिलना तब शुरू हुआ, जब देश के एक बड़े हिस्से में स्वतंत्रता संग्राम की भाषा बनी। यह स्वतंत्रता संग्राम ही था, जिसने पंजाबी, गुजराती और मराठीभाषी क्षेत्रों में हिंदी को सहज स्वीकार्य बनाया।
एक दूसरी तरह से देखें, तो भाषा की जमीन और उसके आसमान का मामला सेवा, सपने और संकल्प का मामला नहीं है, बल्कि यह उस भाषा-भाषी समाज की समृद्धि, ताकत और उसके किसी मंजिल विशेष की ओर बढ़ने का मामला है। आइए, इस हिंदी दिवस पर हिंदीभाषी समाज को समृद्ध और ताकतवर बनाने का संकल्प लें। फिर हिंदी अपने आप ताकतवर हो जाएगी- एक के साधे सब सधे।


विज्ञान-तकनीक की भी भाषा बने हिंदी

सूर्यकांत मिश्र

जब रूस, चीन, जर्मनी, फ्रांस आदि अपनी भाषा का प्रयोग कर समर्थ बन सकते हैं तो हम क्यों नहीं बन सकते?


दुनिया में चीन की भाषा मंदरिन के बाद हिंदी बोलने वाले दूसरे स्थान पर हैं। अंतरराष्ठीय संपर्क भाषा अंग्रेजी होने के बावजूद हिंदी भी धीरे-धीरे अपना अंतरराष्ट्रीय स्थान ग्रहण कर रही है। भारत की बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था, बढ़ता हुआ बाजार, हिंदी भाषी उपभोक्ता, हिंदी सिनेमा, प्रवासी भारतीय, हिंदी का विश्व बंधुत्व भाव हिंदी को बढ़ाने में सहायक सिद्ध हो रहे हैं। यही कारण है कि अब अंग्रेजी माध्यम के कई टीवी चैनलों को हिंदी भाषा में प्रस्तुतीकरण करना पड़ रहा है। हिंदी भाषा को विश्व पटल पर स्थापित करने के लिए एक बड़ी चुनौती संयुक्त राष्ट्र में हिंदी भाषा को सातवीं भाषा के रूप में स्थान दिलाना है। इसके लिए भारत के विदेश मंत्रलय की ओर से प्रयास किए जा रहे हैं। इसी के तहत विश्व हिंदी सचिवालय की मॉरीशस में स्थापना हुई, जिसका उद्घाटन इसी वर्ष मार्च में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा किया गया। हाल में विश्व हिंदी सम्मेलन भी मारीशस में ही संपन्न हुआ। यह भी अच्छा है कि संयुक्त राष्ट्र की ओर से सप्ताह में एक दिन-शुक्रवार को हिंदी भाषा में एक समाचार बुलेटिन का प्रसारण शुरू किया गया है। इससे दुनिया भर में फैले हिंदी भाषियों को अपनी भाषा में संयुक्त राष्ट्र द्वारा विश्व के समाचार प्राप्त होने शुरू हो गए हैं। विश्व पटल पर हिंदी को स्थापित करने में सबसे बड़ा कदम पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा तब उठाया गया था, जब उन्होंने 1977 में भारत के विदेश मंत्री के रूप में संयुक्त राष्ट्र महासभा को पहली बार हिंदी में संबोधित किया था। कुछ समय पहले संपन्न वल्र्ड इकोनॉमिक फोरम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा भी हिंदी में संबोधन देना उसी कड़ी को आगे बढ़ाने वाला रहा। भाषा को आगे बढ़ाने के लिए राजनीतिक प्रतिबद्धता बहुत आवश्यक होती है। यह प्रतिबद्धता अंतरराष्ट्रीय स्तर के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर भी मजबूती से प्रदर्शित की जाए, इसकी प्रबल आवश्यकता है। आज हिंदी पूरी दुनिया में सिर्फ बोल चाल और संपर्क भाषा के रूप में ही नहीं बढ़ रही है, बल्कि आधुनिक भी होती जा रही है। हिंदी भाषा के आधुनिक बाजार को देखते हुए गूगल, याहू इत्यादि भी हिंदी भाषा को बढ़ावा दे रहे हैं। आज हिंदी केवल भारत, भारतवासियों, प्रवासी भारतीयों की भाषा ही नहीं है, बल्कि कई विकसित और विकासशील देशों में हिंदी अपना स्थान बना रखी है। अमेरिका जैसे सबसे समर्थ राष्ट्र में हिंदी भाषा के प्रचार प्रसार के लिए 150 संस्थान हिंदी को सिखा रहे हैं। अन्य पश्चिमी देशों में भी हिंदी पढ़ाई जा रही है। इसके चलते हिंदी समर्थ हो रही है। उसमें नए-नए शब्द समाहित हो रहे हैं। हिंदी भाषा में 25 लाख से ज्यादा अपने शब्द हैं। दुनिया में समाचार पत्रों में सबसे ज्यादा हिंदी के समाचार पत्र हैं। इसे देखते हुए हम कह सकते हैं कि विश्व पटल पर हिंदी अपना प्रमुख स्थान बना रही है, लेकिन उसके समक्ष अनेक चुनौतियां भी हैं। ये चुनौतियां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं, राष्ट्रीय स्तर पर भी हैं। हिंदी की स्वीकार्यता बढ़ाना अभी भी एक अधूरा लक्ष्य बना हुआ है। हिंदी को जीवन के विविध क्षेत्रों जैसे विज्ञान, चिकित्सा विज्ञान, तकनीक, विधि, अर्थशास्त्र, संचार विज्ञान और अन्य अनेक क्षेत्रों में समृद्ध करना अभी भी शेष है। विज्ञान, तकनीक, विधि और चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में हंिदूी भाषा को समृद्ध करने के प्रयास और संघर्ष होते रहे हैं। कुछ संघर्ष तो खासे लंबे खिंचे। बतौर उदाहरण आइआइटी दिल्ली के छात्र श्यामरुद्र पाठक का संघर्ष। 1985 में जब उन्होंने आइआइटी दिल्ली के छात्र के तौर पर बीटेक की प्रोजेक्ट रिपोर्ट हिंदी में लिखी तो उसे अस्वीकार कर दिया गया। जब वह अपनी प्रोजेक्ट रिपोर्ट हिंदी में ही पेश करने को लेकर अडिग बने रहे तो उनका मामला संसद में गूंजा। आखिरकार आइआइटी दिल्ली के प्रशासन को झुकना पड़ा। इसके बाद पाठक ने अन्य क्षेत्रों में हिंदी के हक के लिए लड़ना शुरू किया। ऐसे कुछ और लोग हैं जो इसके लिए संघर्षरत हैं कि सुप्रीम कोर्ट में न्याय अपनी भाषा में मिले और संसद में कानून के निर्माण की भाषा हंिदूी हो। क्या यह विडंबना नहीं कि देश की सबसे बड़ी अदालत में न्याय की भाषा हमारी अपनी नहीं? इसी तरह संसद में विधि निर्माण की भाषा भी मूलत: अंग्रेजी है। श्यामरुद्र पाठक के संघर्ष का स्मरण करते हुए मैं यह उल्लेख करना चाहूंगा कि 1991 में जब मैंने अपने एमडी पाठ्यक्रम की थीसिस हिंदी में प्रस्तुत करने का निर्णय किया तो किंग जार्ज मेडिकल कालेज, लखनऊ के तत्कालीन प्रशासन के विरोध के फलस्वरूप लगभग एक वर्ष तक संघर्ष करना पड़ा। अंतत: जब उत्तर प्रदेश विधानसभा से सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित हुआ तब मुङो हंिदूी में शोध प्रबंध जमा करने की अनुमति मिली। हम इसकी अनदेखी नहीं कर सकते कि दुनिया के लगभग सभी विकसित देशों ने अपनी भाषा में ही विज्ञान, तकनीक और चिकित्सा विज्ञान में पढ़ाई को महत्व दिया है। रूस, चीन , जर्मनी, जापान, फ्रांस जैसे सक्षम देशों में प्रारंभिक से लेकर उच्च शिक्षा की पढ़ाई उनकी अपनी भाषा में होती है। आखिर जब ये देश अपनी-अपनी भाषा का प्रयोग कर समर्थ बन सकते हैं तो हम क्यों नहीं बन सकते? माना कि अंग्रेजी अंतरराष्ट्रीय भाषा है, लेकिन यह कहना सही कैसे है कि वह प्रगति की भी भाषा है? भारतीय भाषा सर्वेक्षण की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में केवल 7-8 प्रतिशत लोग ही अंग्रेजी भाषा में पारंगत है, बाकी हिंदी अथवा अन्य भारतीय भाषाओं का प्रयोग करते हैं। हमारे देश में लगभग 500 मेडिकल कॉलेज हैं और सभी में चिकित्सा शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी है। अधिकतर मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस प्रथम वर्ष में चिकित्सकीय पाठ्यक्रम के अतिरिक्त अंग्रेजी भाषा की भी पढ़ाई होती है ताकि छात्र एमबीबीएस की पढ़ाई समझने के लिए अंग्रेजी भाषा में पारंगत हो सकें। इस समस्या को दूर करने का एक मात्र उपाय यही है कि उच्च शिक्षा का माध्यम भी हंिदूी एवं अन्य भारतीय भाषाओं में हो ताकि विद्यार्थियों को अपनी सरल भाषा में शिक्षा मिले और उन्हें अंग्रेजी सीखने का अतिरिक्त मानसिक बोझ न पड़े। यह एक तथ्य है कि छात्रों का अच्छा-खासा समय अंग्रेजी सीखने में खप जाता है। यह समय के साथ ऊर्जा की बर्बादी है। यह बर्बादी इसलिए हो रही है कि अच्छी उच्च शिक्षा अंग्रेजी में ही उपलब्ध है। (लेखक किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय, लखनऊ में रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग के विभागाध्यक्ष हैं)

Tuesday, 31 July 2018

आत्मनिर्भर बनने की ओर अग्रसर है CSIR

आमतौर पर फंड के दबाव से जूझते रहने और सरकारी अनुदानों पर आश्रित होने का तगमा झेल रही केंद्र सरकार के कई संस्थाओं से अलग विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय की महत्वपूर्ण संस्था सीएसआईआर (CSIR) ने विगत 3 सालों में कैसे अपनी कमाई को दोगुना कर लिया है और कैसे आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रही है ये एक पहेली से कम नहीं। यहां ये जानना जरूरी है कि सीएसआईआर ने बाहरी कैश-फ्लो बढ़ाकर ये चमत्कार किया है। सीएसआईआर निजी(प्राइवेट) कंपनियों के हाथों अपनी लाइसेंसिंग पेटेंटेड टेक्नोलॉजी साझा या बेचकर ही आत्मनिर्भर बना है।कैसे किया कायाकल्प?
विगत वर्ष की तुलना में सीएसआईआर ने इस वर्ष (2017-18) निजी क्षेत्र की कंपनियों को अपनी तकनीक देकर करीब 70% ज्यादा कमाई की है। सीएसआईआर के डायरेक्टर जनरल गिरीश साहनी इसे संस्था के आत्मनिर्भर बनने की दिशा में सबसे अहम करार देते हैं। चालू वित्त वर्ष में कुल कमाई लगभग 963 करोड़ रुपये रहा, जिसमें 515 करोड़ रुपये की आय निजी क्षेत्र की कंपनियों को टेक्नोलॉजी का लाइसेंसिंग हस्तांतरण करके हुई है, जबकि 448 करोड़ की आय सरकारी कंपनियों से हुई है। सीएसआईआर के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि सरकारी कंपनियों की तुलना में निजी कंपनियों से आय ज्यादा हुई है। इससे पहले सीएसआईआर ने वर्ष 2016-17 में 727 करोड़ रुपये कमाए थे मगर उसमें प्राइवेट कंपनियों से की गयी कमाई 302 करोड़ था, जबकि सरकारी संस्थाओं से हुई कमाई 424.45 करोड़ रुपए था। इससे पहले 2015-16 और 2014-15 में निजी कंपनियों से हुई कमाई 100-200 करोड़ रुपए से ज्यादा कभी नहीं रही। सीएसआईआर के डीजी गिरीश साहनी कहते हैं कि प्राइवेट कंपनियों से 500 करोड़ रुपये की कमाई ज्यादा नहीं है, बल्कि ये इस बात का संकेत है कि सीएसआईआर अपने पेटेंट के जरिए निजी कंपनियों से अब ज्यादा से ज्यादा धन कमा रहा है और आगे और भी धन कमा सकता है।
व्यावसायिक सोच और परिणाम प्राप्ति पर जोर:           
वर्ष 2015 में सीएसआईआर की देहरादून में आयोजित बैठक इसके कायाकल्प में निर्णायक साबित हुआ। जहां ये तय किया गया कि आगामी 2-3 सालों में संस्था के सभी 38 लैब को आत्मनिर्भर बनाया जायेगा। ये भी तय किया गया कि संस्था के वैज्ञानिकों द्वारा गरीब वर्ग को ध्यान में रखकर प्रतिवर्ष कम से कम 12 गेम चेंजिंग टेक्नोलॉजी का निर्माण किया जायेगा।
सीएसआईआर के सूत्र बताते हैं कि संस्था को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 26 सितम्बर 2016 को सीएसआईआर फाउंडेशन दिवस कार्यक्रम में संस्थान के वैज्ञानिकों से “पेटेंट लाइसेंसिंग की जगह टेक्नोलॉजी निर्माण पर विशेष ध्यान देने पर बल दिया। इससे संस्थान के वैज्ञानिकों को और भी जनोपयोगी शोध, निर्माण और उसका उपयोग बढ़ाने की दिशा में बल मिला। मोदी के एक सुझाव से वैज्ञानिकों में सालों से अपने शोध को पेटेंट कराकर लाइसेंस रखने की प्रवृति से अलग अब अमल में लाने योग्य तकनीक बनाने और उसके उपयोगी बनाने की प्रथा का तेजी से विकास हुआ।
विगत 4 सालों में सीएसआईआर ने 600 विभिन्न टेक्नोलॉजी का लाइसेंस किया है। इस दिशा में महज 1 मिनट में दूध में मिलावट का पता लगा लेने वाला मशीन “क्षीर टेस्टर” और “क्षीर स्कैनर” का निर्माण किया है जिसके जरिए मिलावट में प्रयुक्त यूरिया, साल्ट, डिटर्जेंट,साबुन,सोडा, बोरिक एसिड और हाइड्रोजन पेरोक्साइड आदि का पता लग जाता है।
सीएसआईआर ने “दृष्टि ट्रांसमिसोमीटर” का निर्माण पूर्णतः
देशी तकनीक के जरिए सिविल एविएशन सेक्टर को विजिबिलिटी मापने का एक पूर्ण घरेलू यंत्र मिल गया है जिससे विमानों की आवाजाही आसान हुई है। अबतक देशभर के 21 एयरपोर्ट पर इसका सफल उपयोग हो रहा है। इसी तरह डायबिटिज की बढ़ती समस्या से लड़ने के लिए जड़ी-बूटियों पर आधारित पूर्णतया घरेलू तकनीक से एंटी-डायबिटिक दवा “बीजीआर-34” बनाया है जिसे एक देशी प्राइवेट कंपनी को सस्ता दवा निर्माण के लिए दिया है,उस कंपनी ने महज 2 साल में 100 करोड़ से ज्यादा का व्यवसाय किया है। अब इस तरह के सैकड़ों जनोपयोगी पेटेंट को तकनीक का रूप देकर धनोपार्जन किया जाना संभव हो रहा है।
सीएसआईआर ने व्यावसायिक प्रवृति को ध्यान में रखते हुए अपने सभी 38 लैब्स को साफ-साफ निर्देश दिए है कि अपना खर्च स्वयं वहन करने की दिशा में काम करें और सरकारी अनुदान की बजाए स्वपोषित व्यवस्था का निर्माण किया जाना चाहिए। सीएसआईआर ने अब अपना अप्रोच पूरी तरह परिवर्तित करते हुए सिर्फ कागजी रिसर्च की बजाए अब उपयोग में लाए जाने और लाइसेंस प्राप्त करने योग्य रिसर्च पर ध्यान बढ़ा दिया है।
अपनी बदले सोच की वजह से ही सीएसआईआर की वर्ष 2017 की विश्व रैंकिंग में भारी उछाल आया है। शिमागो इंस्टिट्यूट रैंकिंग वर्ल्ड रिपोर्ट में पिछले 2 सालों में 30 पोजिशन उछाल लेकर 1207 देशी सरकारी संस्थाओं में से 9वें स्थान पर रहा, जबकि विश्वभर के 5250 संस्थानों में से सीएसआईआर 75वें स्थान पर रहा।
सीएसआईआर की बाहरी कैश फ्लो ने नई ऊंचाई को छुआ है। वर्ष 2017-18 के दौरान 235 टेक्नोलॉजी और उत्पाद को निजी कंपनियों को लाइसेंस दिया है। विगत वित्त वर्ष में बाहरी कैश-फ्लो को नीचे दिए गए चार्ट से बखूबी समझा जा सकता है।
ये सीएसआईआर की सोच में बदलाव का ही नतीजा है कि विगत 2 सालों में इसने अपनी इंडस्ट्रियल आय को लगभग तीन गुना कर एक नए इतिहास को रचने में सफल हुआ है लेकिन संस्था में ही कुछ वैज्ञानिकों द्वारा दबी जुबान से सीएसआईआर के पूर्ण व्यावसायिक सोच का विरोध भी होने लगा है। वैसे वैज्ञानिकों का मानना है कि ज्यादा प्रोडक्ट ओरिएंटेड अप्रोच संस्था के अनुसंधान को दीर्घ काल में प्रभावित कर 

Friday, 6 July 2018

पर्यावरण सरंक्षण पर बातें नहीं, ठोस काम जरूरी


विश्व पर्यावरण दिवस(5 जून ) पर विशेष 
शशांक द्विवेदी  
पूरी दुनियाँ की जलवायु में तेजी से परिवर्तन हो रहा है ,बेमौसम आंधी ,तूफ़ान और बरसात से हजारों लोगों की जान जा रही है साथ ही सभी ऋतु चक्रों में तेजी से बदलाव देखने को मिल रहा है । सच्चाई यह है कि पर्यावरण सीधे सीधे हमारे अस्तित्व से जुड़ा मसला है । दुनियाँभर में पर्यावरण सरंक्षण को लेकर काफी बातें, सम्मेलन, सेमिनार आदि हो रही है परन्तु वास्तविक धरातल पर उसकी परिणिति होती दिखाई नहीं दे रही है । जिस तरह क्लामेट चेंज दुनियाँ में भोजन पैदावार और आर्थिक समृद्धि को प्रभावित कर रहा है, आने वाले समय में जिंदा रहने के लिए जरूरी चीजें इतनी महंगी हो जाएगीं कि उससे देशों के बीच युद्ध जैसे हालात पैदा हो जाएंगे । यह खतरा उन देशों में ज्यादा होगा जहाँ कृषि आधारित अर्थव्यवस्था है । पर्यावरण का सवाल जब तक तापमान में बढोत्तरी से मानवता के भविष्य पर आने वाले खतरों तक सीमित रहा, तब तक विकासशील देशों का इसकी ओर उतना ध्यान नहीं गया । परन्तु अब जलवायु चक्र का खतरा खाद्यान्न उत्पादन पर पड रहा है, किसान यह तय नहीं कर पा रहे है कब बुवाई करे और कब फसल काटें । तापमान में बढ़ोत्तरी जारी रही तो खाद्य उत्पादन 40 प्रतिशत तक घट जायेगा, इससे पूरे विश्व में खाद्यान्नों की भारी कमी हो जायेगी । ऐसी स्थिति विश्व युद्ध से कम खतरनाक नहीं होगी । एक नई अमेरिकी स्टडी में दावा किया गया है कि तापमान में एक डिग्री तक का इजाफा साल 2030 तक अफ्रीकी सिविल वार होने के रिस्क को 55 प्रतिशत तक बढा सकता है । यानी महज अगले 12  वर्षों में अफ्रीकी देशों में संकट गहरा सकता है । यह स्टडी यूनिवर्सिटी आफ कैलीफोर्निया के इकानमिस्ट मार्शल बर्क द्वारा की गई है । इसमें कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण बनी स्थितियों में अकेले अफ्रीका के उप सहारा इलाके में युद्ध भड़कने से 3 लाख 90 हजार मौतें हो सकती हैं । इन युद्धों के बहुत विनाशकारी होनें की आशंका है ।
नेचर क्लाइमेट चेंज एंड अर्थ सिस्टम साइंस डाटा जर्नल में प्रकाशित  एक रिपोर्ट के अनुसार चीन, अमेरिका और यूरोपीय संघ के वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में क्रम से 26 ,15 और 11 फीसद की हिस्सेदारी है जबकि भारत का आंकड़ा सात फीसद है। इसमें बताया गया है कि प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन के मामले में भारत की हिस्सेदारी 2.44 टन है जबकि अमेरिका, यूरोपीय संघ और चीन की प्रति व्यक्ति हिस्सेदारी क्रम से 19.86 टन, 8.77 और 8.13 टन है।यह रिपोर्ट ब्रिटेन के ईस्ट एंजलिया विश्वविद्यालय के ग्लोबल कार्बन परियोजना द्वारा किये गये एक अध्ययन पर आधारित है ।  दुनियाँ भर में कार्बन उत्सर्जन की बढती दर ने पर्यावरण और खासकर जैव विविधता को बड़े पैमानें पर नुकसान पहुँचाया है , एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले एक दशक में विलुप्त प्रजातियों की संख्या पिछले एक हजार वर्ष के दौरान विलुप्त प्रजातियों की संख्या के बराबर है। जलवायु में तीव्र गति से होने वाले परिवर्तन से देश की 50 प्रतिशत जैव विविधता पर संकट है। अगर तापमान से 1.5  से 2.5  डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होती है तो 25 प्रतिशत प्रजातियां पूरी तरह समाप्त हो जाएंगी।  अंतरराष्ट्रीय संस्था वर्ल्ड वाइल्ड फिनिशिंग ऑर्गेनाइजेशन ने अपनी रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि 2030 तक घने जंगलों का 60 प्रतिशत भाग नष्ट हो जाएगा। वनों के कटान से वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की कमी से कार्बन अधिशोषण ही वनस्पतियों व प्राकृतिक रूप से स्थापित जैव विविधता के लिए खतरा उत्पन्न करेगी। मौसम के मिजाज में होने वाला परिवर्तन ऐसा ही एक खतरा है। इसके परिणामस्वरूप हमारे देश के पश्चिमी घाट के जीव-जंतुओं की अनेक प्रजातियां तेजी से लुप्त हो रही हैं।
पिछले दिनों पर्यावरण और वायु प्रदूषण का भारतीय कृषि पर प्रभाव शीर्षक से प्रोसिडिंग्स ऑफ नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस में प्रकाशित एक शोध पत्र के नतीजों ने  सरकार ,कृषि विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों की चिंता बढ़ा दी है । शोध के अनुसार भारत के अनाज उत्पादन में वायु प्रदूषण का सीधा और नकारात्मक असर देखने को मिल रहा है। देश  में धुएं में बढ़ोतरी की वजह से अनाज के लक्षित उत्पादन में कमी देखी जा रही है। करीब 30 सालों के आंकड़े का विश्लेषण करते हुए वैज्ञानिकों ने एक ऐसा सांख्यिकीय मॉडल विकसित किया जिससे यह अंदाजा मिलता है कि घनी आबादी वाले राज्यों में वर्ष 2010 के मुकाबले वायु प्रदूषण की वजह से गेहूं की पैदावार 50 फीसदी से कम रही। कई जगहों पर खाद्य उत्पादन में करीब 90 फीसदी की कमी धुएं की वजह से देखी गई जो कोयला और दूसरे प्रदूषक  तत्वों की वजह से हुआ। भूमंडलीय तापमान वृद्धि और वर्षा के स्तर की भी 10 फीसदी बदलाव में अहम भूमिका है। कैलिफॉर्निया विश्वविद्यालय में वैज्ञानिक और शोध की लेखिका जेनिफर बर्नी के अनुसार ये आंकड़े चौंकाने वाले हैं हालांकि इसमें बदलाव संभव है। संयुक्त राष्ट्र में जलवायु परिवर्तन के लिए बने अंतर सरकारी पैनल(आइपीसीसी)  रिपोर्ट में भी इसी तरह की चेतावनी दी गई थी । जलवायु परिवर्तन - प्रभाव, अनुकूलन और जोखिमशीर्षक से जारी इस रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव पहले से ही सभी महाद्वीपों और महासागरों में विस्तृत रूप ले चुका है। रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण एशिया को बाढ़, गर्मी के कारण मृत्यु, सूखा तथा पानी से संबंधित खाद्य की कमी का सामना करना पड़ सकता है। कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाले भारत जैसे देश जो केवल मानसून पर ही निर्भर हैं, के लिए यह काफी खतरनाक हो सकता है। जलवायु परिवर्तन की वजह से दक्षिण एशिया में गेहूं की पैदावार पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है । साथ ही वैश्विक खाद्य उत्पादन भी धीरे-धीरे घट रहा है। एक खास बात यह भी है कि जलवायु परिवर्तन से न केवल फसलों की उत्पादकता प्रभावित हो रही है बल्कि उनकी पोष्टिकता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है । एशिया में तटीय और शहरी इलाकों में बाढ़ की वृद्धि से बुनियादी ढांचे, आजीविका और बस्तियों को काफी नुकसान हो सकता है। ऐसे में मुंबई, कोलकाता, ढाका जैसे शहरों पर खतरे की संभावना बढ़ सकती है। पिछले दिनों पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने भी जलवायु परिवर्तन पर इंडियन नेटवर्क फॉर क्लाइमेट चेंज असेसमेंट की रिपोर्ट जारी करते हुए चेताया था कि यदि पृथ्वी के औसत तापमान का बढ़ना इसी प्रकार जारी रहा तो अगामी वर्षों में भारत को इसके दुष्परिणाम झेलने होंगे। इसका सीधा असर देश की कृषि व्यवस्था पर भी पड़ेगा ।
पूरी दुनियाँ की जलवायु में तेजी से परिवर्तन हो रहा है ,बेमौसम आंधी ,तूफ़ान और बरसात से हजारों लोगों की जान जा रही है साथ ही सभी ऋतु चक्रों में तेजी से बदलाव देखने को मिल रहा है । सच्चाई यह है कि पर्यावरण सीधे सीधे हमारे अस्तित्व से जुड़ा मसला है । दुनियाँभर में पर्यावरण सरंक्षण को लेकर काफी बातें, सम्मेलन, सेमिनार आदि हो रही है परन्तु वास्तविक धरातल पर उसकी परिणिति होती दिखाई नहीं दे रही है । जिस तरह क्लामेट चेंज दुनियाँ में भोजन पैदावार और आर्थिक समृद्धि को प्रभावित कर रहा है, आने वाले समय में जिंदा रहने के लिए जरूरी चीजें इतनी महंगी हो जाएगीं कि उससे देशों के बीच युद्ध जैसे हालात पैदा हो जाएंगे । यह खतरा उन देशों में ज्यादा होगा जहाँ कृषि आधारित अर्थव्यवस्था है । पर्यावरण का सवाल जब तक तापमान में बढोत्तरी से मानवता के भविष्य पर आने वाले खतरों तक सीमित रहा, तब तक विकासशील देशों का इसकी ओर उतना ध्यान नहीं गया । परन्तु अब जलवायु चक्र का खतरा खाद्यान्न उत्पादन पर पड रहा है, किसान यह तय नहीं कर पा रहे है कब बुवाई करे और कब फसल काटें । तापमान में बढ़ोत्तरी जारी रही तो खाद्य उत्पादन 40 प्रतिशत तक घट जायेगा, इससे पूरे विश्व में खाद्यान्नों की भारी कमी हो जायेगी । ऐसी स्थिति विश्व युद्ध से कम खतरनाक नहीं होगी । एक नई अमेरिकी स्टडी में दावा किया गया है कि तापमान में एक डिग्री तक का इजाफा साल 2030 तक अफ्रीकी सिविल वार होने के रिस्क को 55 प्रतिशत तक बढा सकता है । यानी महज अगले 12  वर्षों में अफ्रीकी देशों में संकट गहरा सकता है । यह स्टडी यूनिवर्सिटी आफ कैलीफोर्निया के इकानमिस्ट मार्शल बर्क द्वारा की गई है । इसमें कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण बनी स्थितियों में अकेले अफ्रीका के उप सहारा इलाके में युद्ध भड़कने से 3 लाख 90 हजार मौतें हो सकती हैं । इन युद्धों के बहुत विनाशकारी होनें की आशंका है ।

नेचर क्लाइमेट चेंज एंड अर्थ सिस्टम साइंस डाटा जर्नल में प्रकाशित  एक रिपोर्ट के अनुसार चीन, अमेरिका और यूरोपीय संघ के वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में क्रम से 26 ,15 और 11 फीसद की हिस्सेदारी है जबकि भारत का आंकड़ा सात फीसद है। इसमें बताया गया है कि प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन के मामले में भारत की हिस्सेदारी 2.44 टन है जबकि अमेरिका, यूरोपीय संघ और चीन की प्रति व्यक्ति हिस्सेदारी क्रम से 19.86 टन, 8.77 और 8.13 टन है।यह रिपोर्ट ब्रिटेन के ईस्ट एंजलिया विश्वविद्यालय के ग्लोबल कार्बन परियोजना द्वारा किये गये एक अध्ययन पर आधारित है ।  दुनियाँ भर में कार्बन उत्सर्जन की बढती दर ने पर्यावरण और खासकर जैव विविधता को बड़े पैमानें पर नुकसान पहुँचाया है , एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले एक दशक में विलुप्त प्रजातियों की संख्या पिछले एक हजार वर्ष के दौरान विलुप्त प्रजातियों की संख्या के बराबर है। जलवायु में तीव्र गति से होने वाले परिवर्तन से देश की 50 प्रतिशत जैव विविधता पर संकट है। अगर तापमान से 1.5  से 2.5  डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होती है तो 25 प्रतिशत प्रजातियां पूरी तरह समाप्त हो जाएंगी।  अंतरराष्ट्रीय संस्था वर्ल्ड वाइल्ड फिनिशिंग ऑर्गेनाइजेशन ने अपनी रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि 2030 तक घने जंगलों का 60 प्रतिशत भाग नष्ट हो जाएगा। वनों के कटान से वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की कमी से कार्बन अधिशोषण ही वनस्पतियों व प्राकृतिक रूप से स्थापित जैव विविधता के लिए खतरा उत्पन्न करेगी। मौसम के मिजाज में होने वाला परिवर्तन ऐसा ही एक खतरा है। इसके परिणामस्वरूप हमारे देश के पश्चिमी घाट के जीव-जंतुओं की अनेक प्रजातियां तेजी से लुप्त हो रही हैं। 
पिछले दिनों पर्यावरण और वायु प्रदूषण का भारतीय कृषि पर प्रभाव शीर्षक से प्रोसिडिंग्स ऑफ नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस में प्रकाशित एक शोध पत्र के नतीजों ने  सरकार ,कृषि विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों की चिंता बढ़ा दी है । शोध के अनुसार भारत के अनाज उत्पादन में वायु प्रदूषण का सीधा और नकारात्मक असर देखने को मिल रहा है। देश  में धुएं में बढ़ोतरी की वजह से अनाज के लक्षित उत्पादन में कमी देखी जा रही है। करीब 30 सालों के आंकड़े का विश्लेषण करते हुए वैज्ञानिकों ने एक ऐसा सांख्यिकीय मॉडल विकसित किया जिससे यह अंदाजा मिलता है कि घनी आबादी वाले राज्यों में वर्ष 2010 के मुकाबले वायु प्रदूषण की वजह से गेहूं की पैदावार 50 फीसदी से कम रही। कई जगहों पर खाद्य उत्पादन में करीब 90 फीसदी की कमी धुएं की वजह से देखी गई जो कोयला और दूसरे प्रदूषक  तत्वों की वजह से हुआ। भूमंडलीय तापमान वृद्धि और वर्षा के स्तर की भी 10 फीसदी बदलाव में अहम भूमिका है। कैलिफॉर्निया विश्वविद्यालय में वैज्ञानिक और शोध की लेखिका जेनिफर बर्नी के अनुसार ये आंकड़े चौंकाने वाले हैं हालांकि इसमें बदलाव संभव है। संयुक्त राष्ट्र में जलवायु परिवर्तन के लिए बने अंतर सरकारी पैनल(आइपीसीसी)  रिपोर्ट में भी इसी तरह की चेतावनी दी गई थी । ‘जलवायु परिवर्तन - प्रभाव, अनुकूलन और जोखिम’ शीर्षक से जारी इस रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव पहले से ही सभी महाद्वीपों और महासागरों में विस्तृत रूप ले चुका है। रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण एशिया को बाढ़, गर्मी के कारण मृत्यु, सूखा तथा पानी से संबंधित खाद्य की कमी का सामना करना पड़ सकता है। कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाले भारत जैसे देश जो केवल मानसून पर ही निर्भर हैं, के लिए यह काफी खतरनाक हो सकता है। जलवायु परिवर्तन की वजह से दक्षिण एशिया में गेहूं की पैदावार पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है । साथ ही वैश्विक खाद्य उत्पादन भी धीरे-धीरे घट रहा है। एक खास बात यह भी है कि जलवायु परिवर्तन से न केवल फसलों की उत्पादकता प्रभावित हो रही है बल्कि उनकी पोष्टिकता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है । एशिया में तटीय और शहरी इलाकों में बाढ़ की वृद्धि से बुनियादी ढांचे, आजीविका और बस्तियों को काफी नुकसान हो सकता है। ऐसे में मुंबई, कोलकाता, ढाका जैसे शहरों पर खतरे की संभावना बढ़ सकती है। पिछले दिनों पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने भी जलवायु परिवर्तन पर इंडियन नेटवर्क फॉर क्लाइमेट चेंज असेसमेंट की रिपोर्ट जारी करते हुए चेताया था कि यदि पृथ्वी के औसत तापमान का बढ़ना इसी प्रकार जारी रहा तो अगामी वर्षों में भारत को इसके दुष्परिणाम झेलने होंगे। इसका सीधा असर देश की कृषि व्यवस्था पर भी पड़ेगा ।
दुनियाँ भर के देशों की जलवायु और मौसम में परिवर्तन हो रहा है।  पिछले दो सालों में देश के कई इलाकों में बेमौसम बरसात और सूखे की वजह से किसानों की बड़ी आबादी बेहद मुश्किल दौर से गुजर रही है । पिछले साल अचानक आई बेमौसम बारिश ने कहर ढाते हुए कई राज्यों की कुल 50 लाख हेक्टेयर भूमि में खड़ी फसल बर्बाद कर दिया था । मौसम में तीव्र परिवर्तन हो रहा है ,ऋतु चक्र बिगड़ चुके है। मौसम के बिगड़े हुए मिजाज ने देश भर में समस्या पैदा कर दी है । सच्चाई यह है कि देश में कृषि क्षेत्र में मचे हाहाकार का सीधा संबंध जलवायु परिवर्तन से है । यह सब जलवायु परिवर्तन और हमारे द्वारा पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने  की वजह से हो रहा है ।
जलवायु परिवर्तन संपूर्ण मानवता के लिये एक बहुत बड़ा खतरा है ।एक अहम् बात और है कि सौर ,विंड जैसी वैकल्पिक ऊर्जा पर जोर देकर हम अपनी उर्जा जरूरतों के साथ साथ ग्लोबल वार्मिंग पर काबू कर सकतें है। बड़े पैमानें पर वैकल्पिक उर्जा  के उपयोग और उत्पादन के लिए अब पूरे विश्व को एक साथ आना होगा तभी कुछ हद तक वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में कुछ कमी आ पायेगी । 
कुलमिलाकर देश के प्राकृतिक संसाधनों का ईमानदारी से दोहन और पर्यावरण के संरक्षण के लिए सरकारी प्रयास के साथ साथ जनता की  सकारात्मक भागीदारी की जरुरत है । जनता के बीच जागरूकता फैलानी होगी, तभी इसका संरक्षण हो पायेगा । पर्यावरण संरक्षण का सवाल पृथ्वी के अस्तित्व से जुड़ा है। इसलिए हम सभी को इसके लिए संजीदा होना होगा  ।
(लेखक राजस्थान के मेवाड़ यूनिवर्सिटी में डिप्टी डायरेक्टर हैं और टेक्निकल टूडे मैगज़ीन के संपादक है )



Friday, 8 June 2018

सुखी संख्याएं और सुख देने वाली संख्याएं

चंद्रभूषण 
नंबर थिअरी को गणित की रानी कहा जाता है। रीक्रिएशनल मैथमेटिक्स (मनोरंजन से जुड़ा गणित) भी इसी दायरे में आता है, हालांकि नंबर थिअरी खुद में बड़ा विशद शास्त्र है। इसकी दो दिलचस्प धारणाएं कम से कम नाम के मामले में एक-दूसरे से इतनी मिलती-जुलती हैं कि इन पर एक साथ चर्चा करने का दिल करता है। इनकी उत्पत्ति बिल्कुल अलग-अलग जगहों से है, और आपस में इनका कुछ भी लेना-देना नहीं है।
संस्कृत शब्द हर्षदका अर्थ खुश कर देने वाला/वाली है और कुछ खास प्राकृतिक संख्याओं को यह नाम देने का श्रेय महाराष्ट्र के डहानू जिले के स्कूलटीचर व शौकिया गणितज्ञ डीआर कापरेकर (1905-1986) को जाता है। ऐसी सभी संख्याएं, जिनमें अपने अंकों के योगफल का भाग चला जाता है, हर्षद संख्याएं कहलाती हैं। जैसे 12 एक हर्षद संख्या है, क्योंकि इसमें 1+2=3 का भाग चला जाता है।
कोई कह सकता है कि यह तो एक बहुत सामान्य धारणा है, इसको इतना ज्यादा वजन देने की क्या जरूरत है। लेकिन कापरेकर जी का रीक्रिएशनल मैथमेटिक्स में योगदान इतना बड़ा और मौलिक है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसी संख्याओं को उनके द्वारा दिए गए नाम हर्षद नंबर्ससे ही जाना जाता है। दूसरे, हर्षद नंबर से जुड़ी नई-नई धारणाएं भी लगातार आती जा रही हैं। जैसे, 2005 में गणितज्ञ ई. ब्लोएम द्वारा पेश की गई मल्टिपल हर्षद नंबर’ (एमएचएन) की धारणा।
उदाहरण में जाएं तो 6804 अपने अंकों के योग 18 से कट जाती है और भागफल 378 आता है। यह संख्या फिर अपने अंकों के जोड़ 18 से कट जाती है और भागफल 21 आता है। फिर 21 भी अपने अंकों के योग 3 से कट जाती है, जिससे आने वाला भागफल 7 खुद 7 से कट जाता है। इस प्रकार 6804 को चौगुनी हर्षद संख्याकहा जा सकता है, और एक गणितीय श्रेणी के रूप में इसे एमएचएन-4 कहा जाएगा।
यह तो हो गई सुख देने वाली संख्या। लेकिन हैपी नंबर्स यानी सुखी संख्याओं की अलग ही दुनिया है और इनका हर्षद नंबर्स से कुछ भी लेना-देना नहीं है। इनका खोजी कौन है, यह भी किसी को पक्का नहीं पता, लेकिन सबसे पहले इनपर चर्चा रूस में होनी शुरू हुई थी। हैपी नंबर्स वे हैं, जिनके अंकों के वर्ग का योगफल करते जाने पर अंतिम नतीजा 1 निकलता है।
जैसे 19 को लें तो पहली बार 1 का वर्ग 1 और 9 का वर्ग 81 जोड़ने पर 1+81=82 आता है। दूसरी बार 8 का वर्ग 64 और 2 का वर्ग 4 जोड़ने पर 68, तीसरी बार 6 का वर्ग 36 और 8 का वर्ग 64 जोड़ने पर 100 आता है और चौथी बार 1, 0 और 0 का वर्ग जोड़ने पर 1 आ जाता है। यानी 19 एक हैपी नंबर है। 50 से नीचे की हैपी नंबर्स का जिक्र करना हो तो ये 1, 7, 10, 13, 19, 23, 28, 31, 32, 44 और 49 हैं। इनके बड़े दिलचस्प पैटर्न बनते हैं और इस दायरे में नई-नई खोजें होती रहती हैं।


Friday, 4 May 2018

स्टीफन हॉकिंग का ‘आखिरी’ शोधपत्र


चंद्रभूषण 
स्टीफन हॉकिंग का आखिरी शोधपत्र प्रकाशित होने की चर्चा गरम है। बेल्जियन भौतिकशास्त्री टॉमस हर्टोग के साथ उनका यह काम कॉस्मॉलजी के इन्फ्लेशनमामले से संबंधित है, जिस पर हम यहां थोड़ी चर्चा करेंगे। लेकिन इससे पहले यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि 14 मार्च 2018 को दिवंगत हुए बहुचर्चित थिअरेटिकल फिजिसिस्ट स्टीफन हॉकिंग का यह अंतिम रिसर्च पेपर नहीं है।
उनके प्रिय शोध क्षेत्र ब्लैकहोलों पर केंद्रित कई और शोधपत्र आने वाले दिनों में भी प्रकाशित होते रहेंगे। यह बात और है कि ये सारे पेपर किसी न किसी के साथ मिलकर ही लिखे हुए हैं। 75 साल की उम्र पाए स्टीफन के लिए अपने अंतिम वर्षों में अकेले दम पर पर्याप्त सामग्री जुटाकर उसपर फैसलाकुन ढंग से काम करना संभव नहीं था, हालांकि इसका दूसरा पहलू यह भी था कि उनके साथ अपना नाम जोड़ना नई पीढ़ी के हर भौतिकशास्त्री का सपना हुआ करता था।
बहरहाल, बड़े फलक की विषयवस्तु इन्फ्लेशन पर टॉमस हर्टोग के साथ मिलकर किया हुआ उनका यह काम कॉस्मॉलजी से जुड़े भौतिकशास्त्रियों और उनके करीब पड़ने वाले गणितज्ञों के बीच चर्चा का विषय बनेगा। खासकर इस शोधपत्र की यह प्रस्थापना कि बिग बैंग के बाद गुजरे एक सेकंड के बहुत ही छोटे हिस्से में- जिसे इन्फ्लेशन का समय कहा जाता है- समय जैसी किसी चीज का कोई अस्तित्व नहीं था।
किसी को यह बात अटपटी लग सकती है, क्योंकि बात चाहे सेकंड के कितने भी छोटे हिस्से की क्यों न हो, समय तो समय है। उसके न होने की बात का भला क्या मतलब है? यहां आपको इस बात का मतलब समझाने का दावा इन पंक्तियों का लेखक नहीं कर सकता, क्योंकि सीमावर्ती भौतिकी की बहुत सारी बातों का कोई व्यावहारिक मतलब समझ पाना आला से आला दर्जे के भौतिकशास्त्रियों के भी बूते से बाहर की बात हुआ करती है। वहां सारा मतलब गणित की भाषा में ही समझना पड़ता है।
तो सवाल यह बचता है कि क्या हॉकिंग और हर्टोग ने सृष्टि के प्रारंभिक क्षणों का कोई ऐसा गणितीय समीकरण ढूंढ निकाला है, जो समय जैसी किसी चीज के बिना भी सफलतापूर्वक काम कर सकता हो? जवाब नहीं में है। उन्होंने एक प्रस्थापना भर दी है, जिसका खंडन-मंडन होना अभी बाकी है।
अब थोड़ी बात इन्फ्लेशन के बारे में, जिसे 1979 से ब्रह्मांड के निर्माण से जुड़ी दूसरी सर्वाधिक महत्वपूर्ण मान्यता जैसी प्रतिष्ठा प्राप्त है। पहली मान्यता 1927 में दी गई, 1929 में लगभग और 1964 में पूरी तरह पुष्ट मान ली गई बिग बैंग की प्रस्थापना की है। इस प्रस्थापना के मुताबिक बिग बैंग वह बिंदु है, जहां से देशकाल की शुरुआत होती है।
ब्रह्मांड में आकाशगंगाओं के एक-दूसरे से दूर भागने की दर का अध्ययन करके यह नतीजा निकाला गया है कि अनंत विस्तार का सारा किस्सा दरअसल 13.8 अरब साल पहले एक बिंदु से शुरू हुआ था, जिसके पहले आकाश और समय नहीं था, और अगर रहा भी हो तो उसके बारे में जाना नहीं जा सकता।
1964 में कॉस्मिक बैकग्राउंड रेडिएशन (सीआरबी) की खोज से बिग बैंग पर तो पक्की मोहर लग गई लेकिन दो नए सवाल भौतिकशास्त्रियों को परेशान करने लगे। पहला यह कि ब्रह्मांड हर तरफ एक जैसा क्यों है, और दूसरा यह कि ब्रह्मांड में कहीं द्रव्य के होने और कहीं न होने की गुंजाइश कैसे पैदा होती है। इन दोनों सवालों का जवाब 1979 में एलन गुथ ने इन्फ्लेशन की थीसिस के जरिये दिया।
इसके मुताबिक बिग बैंग के समय को शून्य समय नहीं बल्कि क्वांटम समय माना जाए, यानी 1 के बाद 36 शून्य लगाकर एक बहुत बड़ी संख्या बनाई जाए, फिर एक सेकंड समय को उससे भाग देने पर जो आए, उतना समय। क्वांटम थिअरी की अनिवार्य प्रस्थापना 'अनिश्चितता का सिद्धांत' पर बिग बैंग की खरा उतरने के लिए ऐसा करना जरूरी है।
10 की ऋण 36 घात सेकंड वाले इस क्वांटम समय से लेकर 10 की ऋण 33 घात वाले समय के बीच ब्रह्मांड अपने सूक्ष्म आकार का कम से कम साठ बार दो गुना होता चला गया- यह इन्फ्लेशन का सिद्धांत है। समय का यह इतना छोटा हिस्सा भी समय ही कहलाएगा, लेकिन हॉकिंग और हर्टोग की प्रस्थापना के मुताबिक यह समय न होकर स्पेस की तीन विमाओं में ही समाहित है। यानी शून्य समय।
अच्छा होगा कि हम इस प्रस्थापना के खंडन-मंडन का इंतजार करें। वैसे, स्टीफन हॉकिंग के ही कद के, बल्कि अपने शास्त्र में उनसे कहीं ज्यादा कद्दावर गणितज्ञ रॉजर पेनरोज शुरू से ही इन्फ्लेशन की धारणा को ही खारिज करते आए हैं। बाल की खाल निकालने वाली इन बहसों के देर-सबेर कुछ व्यावहारिक अर्थ भी निकलेंगे। तब तक चीजों और सिद्धांतों के नामों का आनंद लेते रहें।

Tuesday, 17 April 2018

मंगल पर जाएंगी रोबोट-मक्खियां


मुकुल व्यास 
नासा के शोधकर्ता ऐसी रोबोटिक मक्खियों का डिजाइन तैयार कर रहे हैं जो मंगल पर उड़कर वहां के बारे में नई जानकारियां जुटा सकें। अमेरिकी अंतरिक्ष प्रशासन एजेंसी ने पिछले दिनों इस परियोजना के बारे में खुलासा किया। यह परियोजना अभी आरंभिक अवस्था में है, लेकिन इसका मकसद मंगल के अन्वेषण के लिए इस समय प्रयुक्त की जा रही रोवर का बेहतर विकल्प खोजना है। रोवर के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि एक यह आकार में बड़ी और भारी भरकम होती है तथा बहुत ही सुस्त चाल से मंगल की सतह पर सरकती है। इस वजह से इसके कार्यक्षेत्र का दायरा बहुत सीमित हो जाता है। इसके अलावा रोवर के निर्माण में खर्चा भी बहुत आता है। यदि रोवर की जगह मंगल पर सेंसरों से युक्त सूक्ष्म रोबोटों को भेजा जाए तो वे सतह पर तेजी के साथ दूसरे इलाकों में जाकर कारगर ढंग से सूचनाएं एकत्र कर सकेंगे। 1इस तरह के सूक्ष्म रोबोटों के निर्माण की लागत भी बहुत कम आएगी। नासा के अधिकारियों के अनुसार इन रोबोटों का आकार अमेरिका में पाई जाने वाली बंबलबीजैसा होगा। मंगल पर भेजी जाने वाली रोबोटिक मक्खी मार्सबीकहलाएगी। मंगल पर मक्खियां भेजना ज्यादा व्यावहारिक है, क्योंकि मंगल का गुरुत्वाकर्षण कम है। पृथ्वी की तुलना में मंगल का गुरुत्वाकर्षण सिर्फ एक-तिहाई है। वैज्ञानिकों का मानना है कि वहां के पतले वायुमंडल को देखते हुए रोबोट-मक्खी अन्वेषण के लिहाज से ज्यादा बेहतर स्थिति में होंगी। ये मक्खियां न सिर्फ मंगल की सतह को नापेंगी, बल्कि उसके वायुमंडल के नमूने भी एकत्र करेंगी। उनका मुख्य लक्ष्य वहां मीथेन गैस की मौजूदगी का पता लगाना होगा। मीथेन गैस की मौजूदगी जीवन की संभावना की ओर इशारा करती है। इस समय मंगल पर सक्रिय क्यूरियोसिटी रोवर को मीथेन गैस की उपस्थिति के कुछ संकेत मिले हैं, लेकिन इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिला कि यह गैस किसी जैविक गतिविधि से उत्पन्न हो रही है या इसका निर्माण किसी और वजह से हो रहा है।रोबोट मक्खियों का इस्तेमाल मंगल पर ही नहीं, बल्कि पृथ्वी पर भी होगा। हम सभी जानते हैं कि फसलों और फल-सब्जियों के परागण में मक्खियों और कीट-पतंगों की बड़ी भूमिका होती है। दुनिया में मक्खियों की आबादी घट रही है जिसका फसल उत्पादन पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। इस समस्या से निपटने के लिए शोधकर्ता ऐसी रोबोटिक मक्खियां विकसित कर रहे हैं जो पौधों का परागण कर सकें। पिछले कुछ वषों से वैज्ञानिक मधुमक्खियों की आबादी में गिरावट रोकने के उपाय खोज रहे हैं। हमारे भोजन में प्रयुक्त एक-तिहाई पेड़-पौधों का परागण मधुमक्खियों द्वारा किया जाता है, लेकिन इन मधुमक्खियों की संख्या तेजी से कम हो रही है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के शोधार्थियों ने 2013 में पहली रोबोट मक्खी बनाई थी जो बिजली के स्नोत से जुड़ने के बाद हवा में मंडरा सकती थी। इसके बाद यह टेक्नोलॉजी तेजी से विकसित हुई। आज ये रोबोट-मक्खियां सतह पर चिपक सकती हैं और पानी में भी तैर सकती हैं और अब इनका प्रयोग मंगल ग्रह पर भी किए जाने की तैयारी है।

Facebook के सही उपयोग के कुछ सूत्र:

Dr. Avyact Agrawal

Facebook पर मैं लगभग एक वर्ष से हूँ। इस बीच ज़हाँ आप सबने बहुत प्यार दिया, मेरी किताब आपकी वज़ह से आयी और बिकी। कुछ बेहद अच्छे मित्र मिले। कुछ गहरे लेखक मिले। फिर मेरे यूट्यूब चैनल को भी एक अच्छी शुरुआत आपने
दिलवाई।

वहीँ मेरा इनबॉक्स रोज़ाना लोगों की मानसिक और शारीरिक समस्याओं  से भरा रहने लगा।

कुछ समस्याएं तो लोगों की पोस्ट और बातें सुनकर मुझे फेसबुक की ही दी हुई लगने लगीं। तो सोचा मेरे एक वर्ष के अनुभव, मनोविज्ञान और व्यक्तित्वों की समझ के अनुरूप फेसबुक का खुशहाल उपयोग के कुछ सूत्र लिखूँ। शायद कुछ लोगों के काम आएं।

1. पहला सूत्र तो यही है कि इस बात को दिल की गहराइयों तक स्वीकार कर लें कि फेसबुक आपके रोज़मर्रा के जीवन में 0.1 प्रतिशत से ज़्यादा अहमियत नहीं रखता। इसे एक मनोरंजन और ज्ञान अर्जित का अच्छा साधन मानें लेकिन रिश्ते ढूँढने और बनाने का बिल्कुल नहीं।

2. हमेशा आइडियाज़, विचार, विचार धारा  की बातें करें और ज़हन में रखें किसी व्यक्ति की बातें न करें तीसरे से। खासकर नकारात्मक चर्चा से बचें। जो पसंद नहीं उसे इग्नोर कर दें, unfriend कर दें , ब्लॉक कर दें लेकिन नकारात्मक पोस्ट करना ,स्क्रीनशॉट पब्लिक करने का अर्थ यह है कि उस व्यक्ति को आप अपने खूबसूरत ज़हन में ज़रूरत से ज़्यादा महत्त्व और ज़गह दे रहे हैं।

3. रिश्तों  और मित्रता के दो अर्थ मैं देखता हूँ,  पहला यह कि
मित्र या रिश्ता आपको यह अहसास और विश्वास दिला सके कि आपकी किसी मुश्किल में वह साथ देगा अपनी सामर्थ्य अनुसार दूसरा यह कि आपको वह आगे बढ़ते देखना चाहेगा और इसके लिए आपके मिशन या प्रोजेक्ट में अपनी सामर्थ्य अनुसार मदद करेगा। फेसबुक पर आपसे जुड़े  मित्र या कथित रिश्ते का रवैया आपके प्रति उस व्यक्ति के व्यक्तित्व की भीतर तक पड़ताल कर सकता है। इन दो criteria के अलावा मित्रता या रिश्ते के दावे झूठे होते हैं। Facebook friend से ये अपेक्षाएं नहीं होतीं लेकिन कोई दावा करे मित्रता या रिश्ते का तो इन दो पहलुओं पर उसकी परीक्षा ले लेना।
उदाहरण के लिए, मेरे किसी मित्र ने मुझसे इनबॉक्स पर किताब लिखने या स्वास्थ्य सम्बंधित जानकारी पर कोई सलाह मांगी और मैं उसे ज़वाब तक न दूं लेकिन कहूँ कि मैं तो सबका हूँ।
एक जनरल रूल यह भी है कि जो सबका हो , कम ही सम्भावना है कि वो किसी का भी होगा। क्योंकि हम मनुष्य सीमित क्षमता लिए हुए होते हैं निभाने की। हर वक़्त नए रिश्तों की तलाश में लगे लोग लाज़िमी है पुराने रिश्तों की उपेक्षा कर ही ऐसा कर सकते हैं। माँ तक 5 बच्चे पैदा कर ले तो नए पर ज़्यादा ध्यान देगी, बड़ा बच्चा माँ के समय और गोद के लिए तरसेगा, कभी पिट भी जायेगा। यह तब जब वह बराबरी से प्यार करने वाली माँ है। गुणा भाग ,हैसियत देख मित्रता करने वाला कोई व्यक्ति नहीं।
पहले तो मैं कहूँगा फेसबुक पर रिश्ते मत तलाशिये असल जीवन के रिश्ते मज़बूत कीजिये और अपने खालीपन को भरिये। हाँ कोई बहुत अच्छा मिल ही जाये तो जुड़िये लेकिन रिश्तों की फ़ौज़ नहीं होती, भगवान की तक रिश्तों की फ़ौज़ नहीं होती। राधा राधा थीं और बाक़ी गोपियाँ गोपी।

प्रकृति ने आप जैसा पूरी इंसानी सभ्यता के इतिहास में दूसरा कोई नहीं बनाया। आप बेहद uniqe हैं। इसलिए स्वाभिमान का ख़याल हमेशा रखें किसी भी रिश्ते में।

3. आपकी timeline आपके मस्तिष्क का extention है।
 उद्वेलित मन की अवस्था में कुछ भी न लिखें। लोग भले वाह वाह कह दें लेकिन आपके व्यक्तित्व का कोई भीतरी कमज़ोर हिस्सा लोगों को दिख जायेगा। और आपकी इमेज से चिपक जायेगा।

4. फेसबुक जब तक मनोरंजन करे खुशी और ज्ञान दे इस पर रहें। लेकिन दुःख देने लगे, ईर्ष्या,कुंठा,जोड़ तोड़ , recognition पाने की अदम्य इक्छा जैसी बातें मन में आने लगे तो कुछ दिन के लिए इससे दूर हो जाएं।

5. आपकी पारिवारिक जिम्मेदारी, और व्यावसायिक जिम्मेदारी
को उपेक्षित कर कभी इसे समय न दें।

6. फेसबुक पर कुछ लोग ज़्यादा लोकप्रिय हो जाते हैं। यदि आप हो गए हैं तो ज़्यादा खुश मत हो जाइए। इसका प्रभाव असल जीवन में नगण्य है। कोई भी 'फेसबुक सेलिब्रिटी' असल जीवन में एक अलग जीवन जीता है।
उदाहरण के लिए मेरी पहचान असल जीवन में मेरे शहर में एक चिकत्सक के रूप में है फेसबुक पर लिखने वाले लेखक के रूप में नहीं। आपका प्रमुख काम ही आपकी पहचान है इसलिए मुगालते मत पालिए। follower की संख्या दरअसल आपसे प्रभावित लोगों का प्रतिबिम्ब बिल्कुल भी नहीं।

7. हालाँकि यह व्यक्तिगत मसला है कि कौन क्या पोस्ट करता है और सभी मुद्दों की ज़रूरत है लेकिन फ़िर भी मुझे लगता है हिन्दू मुस्लिम , जात पात के मसले इतने जटिल हैं कि फेसबुक पर नहीं सॉल्व किये जा सकते वरन् उल्टा होता है इसका, लोग और भी नफ़रत से भर जाते हैं तार्किक दृष्टि की ज़गह। लिखना भी है तो अपने विचारों और अनुभवों को एक विनम्र, तर्कपूर्ण और विस्तारित पोस्ट का रूप दें और सही मंशा से करें जैसा कि
Tabish Siddiqui करते हैं। क्योंकि ये विषय विरोध आमंत्रित करते हैं।

8. बेहद अहम् यह कि इनबॉक्स पर चैट करने से बचें। और chat की भी है तो कम से कम् उन स्क्रीन शॉट्स को औरों को न भेजें न ही पोस्ट करें। यह व्यक्तित्व का बड़ा नकारात्मक पहलू दिखाता है। और आपकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगाता है।

9. बहसीले और नकारात्मक कमेंट करने वालों से बहस में उलझने की ज़गह सीधे ब्लॉक करें।

10. स्वाभिमान अवश्य रखें। कोई भी इतना बड़ा नहीं कि आपकी किसी भी पोस्ट को 'कभी भी' लाइक तक करने में कष्ट महसूस करे , गुणा भाग करे और आप उस पर वारे वारे जाओ।
दरअसल यह व्यव्हार एक बेहद calculatIive और स्वार्थी व्यक्तित्व की निशानी होती है। साथ ही व्यक्ति के स्वयं को आपसे बहुत ऊपर समझने के दम्भ को भी यह व्यव्हार प्रदर्शित करता है। छोटे छोटे क्लू  आपको व्यक्ति की भीतरी कोशिकाओं तक का प्रतिबिम्ब बता देते हैं बशर्ते कि आपमें नज़र हो यह देख सकने की।

11. जो अच्छा लिखे अच्छा काम करे उसकी दिल खोल कर प्रशंसा कीजिये,शेयर करिये,लाइक करिये, छोटे छोटे साथ दीजिये। जैसे मैं विजय सिंह ठकुराय का फैन उनकी किताब का इंतज़ार कर रहा हूँ जिससे मैं उसे खूब प्रमोट कर सकूं। प्रशंसा जैसी मुफ़्त की चीज़ में क्या कंजूसी करना। किसी अच्छे की प्रशंसा हमारे भीतर के अहम्,ईर्ष्या ,कुंठा को धोने का काम करती है मन साफ़ करती है। और साफ मन सुन्दर चमकते चेहरे और अच्छे स्वास्थ्य के लिए बेहद ज़रूरी है। मतलब मुफ़्त की चीज़ और बेहतरीन कॉस्मेटिक है किसी अच्छे की प्रशंसा।

12. महिलाएं वैसे तो बेहद बुद्धिमान हैं फिर भी अज़नबी पुरुषों से चैटिंग अवॉयड करें तो ज़्यादा सुख है।

13. अंत में बाहर के सुन्दर मौसम का आनंद लीजिये, ठंडी हवा को गालों से टकराने दीजिये घर की बालकनी में बैठे।
किसी बच्चे के संग खेलिए,उसे बॉल स्पिन करना सिखाइये कभी बैट पकड़ना, किसी पपी को दुलारिये, किसी पौधे को पानी दीजिये, फूल को निहारिये, नीले आसमान को देखिये, रात को तारे गिनिये, कुछ अच्छी डिश बनाइये, डांस करिये

मोबाइल स्क्रीन के परे अपनी असल दुनिया के मुद्दे ही आपके मन में  घूमना चाहिए मोबाइल से नज़र हटते ही।

मैं या मुझसा कोई कितना भी अच्छा दिखे फेसबुक पर perfect नहीं।