Saturday, 10 April 2021

फिजिक्स की जमीन पर बड़ा भूचाल

चंद्रभूषण

भौतिकी की दुनिया में किसी बहुत बड़े बदलाव की सनसनी फैली हुई है। ठीक दो हफ्ते के अंतर पर- क्रमशः 23 मार्च और 7 अप्रैल को- दुनिया की दो सबसे बड़ी प्रयोगशालाओं एलएचसी और फर्मीलैब द्वारा एक ही मूलभूत कण म्यूऑन को लेकर दो बिल्कुल अलग संदर्भों में जारी रिपोर्टों ने सृष्टि रचना की मौजूदा समझ में कुछ ढांचागत बदलावों की ओर इशारा किया है। इस सनसनी की तुलना 2012 में हिग्स बोसॉन (गॉड पार्टिकल) खोजे जाने के बाद बने माहौल से ही की जा सकती है, लेकिन दोनों में एक बुनियादी फर्क है। हिग्स बोसॉन की खोज ने जहां कण भौतिकी के स्टैंडर्ड मॉडल को संपूर्ण बनाया था, वहीं हाल-फिलहाल म्यूऑन को लेकर मचा गदर इस मॉडल में बदलाव की गुंजाइश बनाते हुए अर्से बाद बुनियादी स्तर के गतिरोध भंग का संकेत दे रहा है।

यूरोपियन ऑर्गनाइजेशन फॉर न्यूक्लियर रिसर्च (सर्न) की लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर (एलएचसी) लैब और अमेरिका की फर्मीलैब में हुए प्रयोगों और उनके नतीजों पर बात करने से पहले हमें थोड़ी कोशिश म्यूऑन का सिर-पैर समझने की भी कर लेनी चाहिए। भारतीय न्यूक्लियर साइंटिस्ट होमी जहांगीर भाभा ने अपने कैंब्रिज के दिनों में गुब्बारों से लिए गए कॉस्मिक किरणों के डेटा पर काम करते हुए पाया था कि आकाश के किसी अज्ञात स्रोत से आने वाली इन किरणों में इलेक्ट्रॉन एक निश्चित ऊंचाई के ऊपर ही मिलते हैं। लेकिन उन्होंने अधिक भेदक क्षमता और निगेटिव चार्ज वाले कुछ कण इससे नीचे भी दर्ज किए, और कहा कि इनपर अलग से काम किया जाना चाहिए। 1932-33 का वह दौर इलेक्ट्रॉन-प्रोटॉन-न्यूट्रॉन वाला था। परमाणु से बाहर के मूलकण अभी खोजे जाने बाकी थे।

इस काम की शुरुआत कॉस्मिक किरणों के ही अमेरिकी अध्येताओं, कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी के कार्ल डी एंडरसन और सेठ एंडरमेयर ने की। 1936-37 में उन्होंने इलेक्ट्रॉन जैसे ही चार्ज वाला लेकिन उससे 207 गुना भारी एक ऐसा कण खोजा, जो मात्र 2.2 माइक्रो सेकंड (एक सेकंड का दस लाखवां हिस्सा) में विघटित हो जाता था। बाद में पता चला, म्यूऑन नाम की यह छलना एक मूलभूत कण है, किन्हीं और कणों के मेल से इसकी रचना नहीं हुई है। इसके उलट वैज्ञानिकों की गुडबुक में छाए प्रोटॉन और न्यूट्रॉन जल्द ही मूलभूत कणों की सूची से बाहर हो गए, क्योंकि ताकतवर कोलाइडर मशीनों के उदय के साथ ही उन्हें क्वार्क नाम के मूलभूत कणों की निर्मिति पाया गया।

हिरोशिमा और नागासाकी पर एटम बम गिराए जाने के बाद वाले जिस दौर में पूरी दुनिया न्यूक्लियर साइंस को इसकी महाविनाशक संभावनाओं को लेकर कोसने में जुटी थी, वह समय फंडामेंटल फिजिक्स के लिए नैतिक संकट के अलावा भयानक कन्फ्यूजन का भी था। उच्च ऊर्जा स्तर पर परमाणु नाभिकों को आपस में टकरा देने से हासिल मलबे में कोई न कोई नया कण हर रोज मिल जाता था। सवाल यह था कि अगर ये सभी मूलकण हैं तो फिर क्यों न इस शब्द की परिभाषा ही बदल दी जाए- बुनियादी स्तर पर ढेरों कणों का घालमेल है, मूल जैसा कहीं कुछ है ही नहीं। फिर असाधारण मेधा वाले कई भौतिकशास्त्रियों ने 1970 के दशक के मध्य में चीजों को सुलझाया और स्टैंडर्ड मॉडल जैसा एक खाका सामने आया, जिससे सूक्ष्म स्तर पर सारी चीजों की व्याख्या हो जाती है। इन ‘सारी चीजों’ का मामला समझने के लिए हमें कुछ बातें प्राकृतिक बलों के बारे में कर लेनी चाहिए।

सबसे पहले न्यूटन के जरिये हमें गुरुत्व बल के बारे में जानकारी मिली, जो मात्रा की दृष्टि से बहुत मामूली है। दो चीजें एक-दूसरे को खींचती हैं लेकिन दो पहाड़ भी अगल-बगल रख दिए जाएं तो उनका आपसी खिंचाव नापने में बड़े-बड़ों की छुट्टी हो जाएगी। इसके कोई दो सौ साल बाद विद्युत-चुंबकीय बल खोजा गया, जो चीजों के आवेश (चार्ज) पर निर्भर करता है। फिर परमाणुओं के नाभिक के भीतर सक्रिय रहने वाले दो सूक्ष्म स्तरीय लेकिन भयानक शक्तिशाली बल पिछली सदी में लगभग एक साथ खोजे गए, जिनमें एक का नाम कमजोर नाभिकीय बल और दूसरे का मजबूत नाभिकीय बल है। इनमें गुरुत्व को छोड़कर बाकी तीनों बलों और उनके रिश्तों की समझदारी स्टैंडर्ड मॉडल में मौजूद है। 

यह मॉडल कुल सत्रह मूल कणों पर आधारित है। छह क्वार्क (टॉप, बॉटम, अप, डाउन, चार्म और स्ट्रेंज ), छह लेप्टॉन (इलेक्ट्रॉन, म्यूऑन, टाऊ और इन तीनों से संबंधित न्यूट्रिनो), चार बलवाहक बोसॉन (ग्लूऑन, फोटॉन, जेड बोसॉन और डब्लू बोसॉन) और इन तीनों वर्गों से अलग एक अनोखा कण हिग्स बोसॉन, जिसके संसर्ग में आ सकने वाले कणों में द्रव्यमान होता है, बाकियों में नहीं होता। इस मॉडल की कई समस्याएं हो सकती हैं, जिनमें सबसे बड़ी यही है कि इसमें गुरुत्व के लिए कोई जगह नहीं है। लेकिन सूक्ष्म स्तर के जितने भी प्रेक्षण हैं, चाहे वे ब्रह्मांड के आखिरी छोर पर भी क्यों न लिए गए हों, उन सबकी व्याख्या इससे हो जाती है। 

यह बात पिछले कुछ सालों से भौतिकशास्त्रियों में झल्लाहट पैदा करने लगी है, क्योंकि थिअरी के विकास में यह मॉडल एक बड़ी बाधा बन गया है। म्यूऑन से संबंधित हाल के दोनों प्रयोग स्टैंडर्ड मॉडल (एसएम) से निकली इसकी कुछ विशेषताओं पर मजबूती से सवाल खड़े कर रहे हैं। ध्यान रहे, ये सवाल पिछले एक पखवाड़े में नहीं खड़े हुए हैं। पिछले बीस वर्षों में म्यूऑन को लेकर दो पहलुओं से विवादित निष्कर्ष आते रहे हैं। 23 मार्च को एलएचसी द्वारा और 7 अप्रैल को फर्मीलैब द्वारा जारी प्रयोगों की श्रृंखला में घोषित निष्कर्ष पिछले नतीजों की पुष्टि करते हैं। इससे वैकल्पिक सिद्धांतों की आवक तेज हो जाएगी लेकिन अगले दो-तीन वर्षों में नतीजों पर और ज्यादा पुख्तगी हासिल किए बगैर एसएम  में किसी हेरफेर पर विचार नहीं किया जाएगा। 

एलएचसी का प्रयोग बॉटम क्वार्क के विघटन पर आधारित है। एसएम के मुताबिक इसमें इलेक्ट्रॉन और म्यूऑन बराबर-बराबर मिलने चाहिए, लेकिन प्रयोग में म्यूऑन 15 फीसदी कम पाए जा रहे हैं। फर्मीलैब का प्रयोग म्यूऑन्स के चुंबकीय गुण को लेकर है, जिसमें एसएम के आकलन से अलग नतीजे दर्ज किए जा रहे हैं। ये प्रयोग इतने महीन हैं और इन्हें करने वाले वैज्ञानिक अपने काम को लेकर इतने इत्मीनान में हैं कि इनके नतीजे अपने साथ भारी उथल-पुथल ही लेकर आ सकते हैं। इसे नई भौतिकी की पदचाप यूं ही नहीं माना जा रहा है। इस शास्त्र की दुनिया सूक्ष्म और विराट, दोनों स्तरों पर पिछली सदी में बीस के दशक में ही बदलनी शुरू हुई थी। क्या पता, इस बार भी इतिहास खुद को दोहरा रहा हो।


Friday, 9 April 2021

कैसे बचें समुद्री जीव

चंद्रभूषण

अगर आप अपने इर्द-गिर्द के पर्यावरण ध्वंस से परेशान हैं तो जरा समुद्री जीवों पर आई विपत्ति के बारे में सोचकर देखें। टेक्नॉलजी ने जलजीवों के शिकार की क्षमता बहुत बढ़ा दी है और गहरे समुद्रों में जारी जैविक सर्वनाश पर नजर रखने के लिए कोई सरकारी या गैर-सरकारी अथॉरिटी भी नहीं है। ऊपर से ग्लोबल वार्मिंग ने विशाल समुद्री इलाकों की ऑक्सीजन चूसकर उन्हें बंजर बना दिया है। समुद्री जीव इन इलाकों में रहना तो दूर उधर से गुजरने में भी डरते हैं। 

इन बुरी खबरों के बीच अकेली अच्छी खबर यह है कि साल दर साल घटती समुद्री पकड़ ने सरकारों को जता दिया है कि यह किस्सा यूं ही चलता रहा तो अगले दस-बीस वर्षों में ह्वेलिंग के अलावा समुद्रों से मछली, केकड़ा और झींगा पकड़ने के कारोबारों पर भी ताला पड़ जाएगा। इससे कई छोटी अर्थव्यवस्थाएं पूरी तरह तबाह हो जाएंगी और मानवजाति प्रोटीन के सबसे बड़े स्रोत से वंचित हो जाएगी। पर्यावरण पर इसका कैसा असर पड़ेगा, कोई नहीं जानता। 

इन आशंकाओं के मद्देनजर तीन वैज्ञानिक समूहों ने ग्रीनपीस, प्यू ट्रस्ट और नेशनल ज्योग्राफिक की परियोजनाओं के तहत सारे समुद्रों का सर्वे किया और दो साल पहले अपनी रिपोर्टें संयुक्त राष्ट्र के सामने पेश कीं। इन रिपोर्टों में समुद्री सतह के नीचे मौजूद सारे पर्वतों, गर्तों और गर्म पानी के स्रोतों के ब्यौरे शामिल हैं और यह जिक्र भी है कि किस जीवजाति के सर्वाइवल के लिए कौन सा इलाका ज्यादा महत्वपूर्ण है।

ऐसा सर्वे कुछ साल पहले तक संभव नहीं था क्योंकि इसके लिए जरूरी टेक्नॉलजी ही दुनिया में मौजूद नहीं थी। लेकिन अभी समुद्री जीवों की टैगिंग और जीपीएस के जरिये समुद्र के हरेक वर्ग किलोमीटर के साथ किसी जीव के रिश्ते को लेकर पूरी जानकारी हासिल की जा सकती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि एक वैश्विक संधि के जरिए अगर 40 फीसदी समुद्रों में शिकार और उत्खनन पर रोक लगाई जा सके तो 30 फीसदी समुद्री जीवजातियों की निरंतरता सुनिश्चित की जा सकती है।

न्यूटन का सेब

सुशोभित

आइज़ैक न्यूटन का जन्म लिंकनशायर के जिस वूल्सथोर्प नाम के गांव में हुआ था, वहां सेब के ख़ूब सारे बाग़ थे। 

तरतीब से तरतीब मिलाकर अगर आप सोचें तो कह सकते हैं कि वैसे में अगर किसी दरख़्त से सेब को गिरते उसने देख लिया हो, तो यह कोई अचरज की बात नहीं। ये तो रोज़मर्रा की एक आमफ़हम घटना थी। लेकिन सवाल उठता है वो कौन-सा दरख़्त था? कहते हैं कि वूल्सथोर्प मैनर में वो ‘प्रोवर्बियल एपल ट्री’ आज भी मौजूद है और आज भी उस पर सेब फलते हैं। सैलानी बड़े चाव से उसके साथ तस्वीरें खिंचवाते हैं। लेकिन क्या यही वह दरख़्त है? इतने सारे दरख़्तों में आप कैसे निश्चित हो सकते हैं कि यही वह है।

फिर प्रश्न यह भी कि भले वूल्सथोर्प में सेब के बाग़ हों, ये ज़रूरी तो नहीं कि न्यूटन ने वहीं पर वो सेब देखा हो। लिहाजा कैम्ब्रिज (ट्रिनिटी कॉलेज) वाले बड़े गर्व से कहते हैं कि वो दरख़्त तो हमारे यहां था। कैम्पस में जहां न्यूटन रहता था, उसकी खिड़की से वो दिखलाई देता था। 

लेकिन ये होड़ यहीं ख़त्म नहीं होती। ग्रैन्थम- जो कि वूल्सथोर्प का नज़दीकी रेल्वे स्टेशन है और जहाँ न्यूटन की आरम्भिक पढ़ाई हुई, उसने वहाँ ग्रामर, लातीन भाषा और गणित सीखा- का किंग्स कॉलेज कहता है कि वो पेड़ भले वूल्सथोर्प या कैम्ब्रिज में हो, लेकिन उसे हमारे स्कूल के हेडमास्टर द्वारा तभी ख़रीद लिया गया था और वो अब हमारे यहां है। वहीं केंट के नेशनल फ्रूट कलेक्शन का कहना है कि चार सौ साल बाद भला वो दरख़्त अब कहां मिलेगा? लेकिन उसके बीज से उगे पेड़ हमारे पास हैं। यानी न्यूटन वाले सेब के दरख़्त के वंशज! यूनिवर्सिटी ऑफ़ वॉशिंगटन और एमआईटी भी कमोबेश ऐसा ही दावा करते हैं।

अंग्रेज़ी में जिसे कहते हैं- "अ बाइट ऑफ़ एपल।" आप कह सकते हैं कि इतनी सदियों के बाद न्यूटन अब ख़ुद एक ऐसा सेब बन चुका है, जिसका एक टुकड़ा सभी को चाहिए!

किंतु न्यूटन ने सेब को गिरते देखा था, यह तो तय है ना? शायद हां, शायद नहीं। आप पूछ सकते हैं कि ये कहानी किसने उड़ाई थी? जवाब मिलेगा स्वयं जनाब क़िब्ला-मोहतरम न्यूटन साहब ने। अलबत्ता न्यूटन ने अपने शब्दों में कभी इसका बखान ख़ुद नहीं किया। सबसे पहले यह दावा किया था विलियम स्टुकले ने अपनी किताब ‘मेमॉयर्स ऑफ़ सर आइज़ैक न्यूटन्स लाइफ़’ में। ये किताब 1752 में छपी थी और सेब गिरा था 1666 में, जब कैम्ब्रिज में प्लेग का रोग फैला था और न्यूटन अपने गांव वूल्सथोर्प चला आया था। इसी गाँव में न्यूटन साल 1642 में जन्मा था, और जिस कमरे में वो जन्मा था, वो आज भी जस का तस है। आप यह भी कह सकते हैं, इसी कमरे में आधुनिक भौतिकी का जन्म हुआ था। 

विलियम स्टुकले ने अपनी किताब के 42वें सफ़हे पर लिखा है- 

"गर्मियों के दिन थे, हम एक बाग़ में गए और चाय पी। फिर एक सेब के दरख़्त के नीचे जाकर बैठ गए। आसपास मेरे और न्यूटन के सिवा कोई और ना था। अचानक उन्होंने कहा, ‘उस दिन भी मैं ऐसे ही बैठा था और ख़यालों में गुम था कि तभी वो सेब पेड़ से गिरा, और मैंने सोचा, ये पेड़ से टूटकर ऊपर क्यों नहीं गया, दाएं-बाएं क्यों नहीं गया, नीचे ही क्यों गिरा?’ और फिर यह कि ‘बात केवल इतनी भर नहीं कि धरती के भीतर कोई चुम्बक है, जो सेब को अपनी ओर खींच लेता है, बल्कि यह भी कि कहीं ऐसा तो नहीं कि अंतरिक्ष में चंद्रमा टंगा है तो ऐसा धरती के खिंचाव से ही सम्भव हो?’"

अगर यह स्टुकले की निरी गप्प थी तो अब इसकी तफ़्तीश करने का कोई ज़रिया नहीं, और न्यूटन को मरे भी अब कोई 300 साल होने को आए। लेकिन यह बात पूरी तरह से कपोल-कल्पना इसलिए नहीं कही जा सकती, क्योंकि इस वाक़ये के तीन और संस्करण मिलते हैं। ग़रज़ ये कि अमूमन ख़ामोश रहने वाले न्यूटन ने ये सेब वाली कहानी चार लोगों को अलग-अलग तरह से सुनाई थी। शायद, किंचित, एक दुर्लभ विनोदप्रियता के साथ।

स्टुकले की किताब छपने के कोई पचास-पचपन साल बाद वॉल्तेयर ने अपने एक निबंध में न्यूटन की उस छवि को वर्णित किया, जिसमें वो सेब के बाग़ में टहल रहा था और अचानक उसको ग्रैविटी का इलहाम हुआ। वो निबंध बहुत चर्चित हुआ। वॉल्तेयर को ये कहानी न्यूटन की भतीजी कैथरीन बार्टन ने सुनाई थी। लगभग उसी कालखण्ड में सर डेविड ब्रूस्टर की न्यूटन पर चर्चित जीवनी भी छपी और उसमें भी सेब का क़िस्सा मौजूद था। निश्चय ही वॉल्तेयर और ब्रूस्टर पर स्टुकले की किताब का प्रभाव भी रहा होगा। उस ज़माने में स्टुकले की किताब धड़ल्ले से पढ़ी जा रही थी। 

सेब की इस कहानी ने सामान्य कल्पनाशीलता को ग्रस लिया। इसमें मिथकीय तत्वों की अनुगूँजें जो थीं। लोगों को यह कहानी सुनकर ईदन के उद्यान और ज्ञान के वृक्ष की याद आई, जिस पर सेब का वर्जित फल लगा था। न्यूटन की शख़्सियत के साथ यों भी मिथकीय तारतम्य जम-सा गया था। उसका जन्म बड़े दिन पर हुआ था, उसने एकान्तवासियों जैसा निस्संग जीवन बिताया था और ज्ञान के शोध में ख़ुद को खपा दिया था। पर्सेप्टिव ज़ेहन के अनेक इलाक़ों में प्रवेश करने वाला वो दुनिया का पहला आदमी था, आदम की तरह- उसके साथ सेब की कहानी तो जुड़ना ही थी। 

न्यूटन अपने जीवनकाल में ही बहुत चर्चित हो चुका था और कैम्ब्रिज और लंदन में उसको एक दैवीय-उपस्थिति की तरह देखा जाता था। ख़ुद न्यूटन को ये गुमान था कि वो एक मामूली इंसान नहीं। वो अपने ज़माने का सबसे बड़ा और मशहूर साइंसदां था, जो रौशनी की गिरहों को सात पहलुओं में खोलकर परख चुका था। प्रिज़्म से वो प्रयोग उसने वूल्सथोर्प में ही किया था, और कम-अज़-कम इस बात को लेकर तो किसी को कोई शुब्हा नहीं है। वूल्सथोर्प जाने वाले सैलानी उस खिड़की को भी बड़ी हसरत से छूते हैं, जहां न्यूटन प्रिज़्म लेकर खड़ा रहता था, सत्रहवीं सदी की ढलान के उस जादुई साल में।

‘गॉड सेड लेट न्यूटन बी, एंड ऑल वॉज़ लाइट।’ यानी, ख़ुदा ने न्यूटन की तख़लीक़ की और उजाला हो गया। ये दोहा एलेग्ज़ेंडर पोप ने कहा था। अल्बर्ट आइंश्टाइन अपनी मेज़ पर न्यूटन की तस्वीर रखता था। स्टीफ़न हॉकिंग अपनी व्हीलचेयर चलाता हुआ न्यूटन के घर पर गया था और विज़िटर्स बुक में दस्तख़त करके आया था। अलबत्ता उसने अपनी किताब 'अ ब्रीफ़ हिस्ट्री ऑफ़ टाइम' के परिशिष्ट में न्यूटन की व्याजनिंदा की है। यह स्टीफ़न की आदत थी, ईश्वरों से उसका पुराना वैर था और न्यूटन साइंस की दुनिया का ख़ुदा था।

लेकिन साथ ही न्यूटन तनहा और पेचीदा भी बहुत था। पूरी ज़िंदगी अकेला रहने वाला। "मैं दूर तक देख पाता हूँ तो केवल इसलिए कि मैं बहुत बड़े लोगों के कंधों पर बैठा हूं", विनम्रता के एक दुर्लभ क्षण में वैसा कहने वाला, शाइस्ता। वो दीवारों पर कोयले और खड़िया से पक्षियों, जहाज़ों और पवनचक्कियों के चित्र बनाता था। वो चित्र आज भी वूल्सथोर्प की दीवारों पर मौजूद हैं। न्यूटन से जुड़ी अनेक किंवदंतियों में से एक है कि साल 1674 में जब आगज़नी से न्यूटन की अनेक पांडुलिपियाँ, उसकी बीस साल की मेहनत, जलकर ख़ाक हो गई थीं, तो उसने केवल इतना ही कहा था- "ओह डायमंड डायमंड, तुम्हें नहीं मालूम ये तुमने क्या शरारत कर डाली है!" डायमंड उसके प्रिय कुत्ते का नाम था, जिसकी भूल से मेज़ पर मोमबत्ती गिर गई थी

शाइर और साइंसदां में ज़्यादा फ़ासला नहीं होता, सिवाय इसके कि साइंसदां नियम-क़ायदों के अनुशासन में स्वयं को बांध लेता है, जबकि शाइर की आवारगी में एक दूसरे क़िस्म की तरतीब होती है। 

न्यूटन ने एक चिट्‌ठी में लिखा था- "मैं ताउम्र समंदर-किनारे ऐसे रंगीन पत्थर और शंख-सीपियां बटोरता रहा, जो शायद दुनिया की दूसरी चीज़ों से बेहतर थे, जबकि ख़ुद समुद्र मेरे समीप हहराता रहा, जिसे मैं कभी पूरा जान नहीं सकता था।"

ये बात कोई शाइर ही कह सकता है!

तब कह लीजै कि धरती की धुन में बंधे उस सेब से ख़ूबसूरत भला कौन-सी चीज़ सर आइज़ैक न्यूटन ने अपनी ज़िंदगी के समुद्र तट पर खोजी थी, जो किस पेड़ पर लगा था, लगा था भी या नहीं, आज भी इसकी तफ़्तीश में आदमज़ात अपनी नींदें हराम किए हुए है?



Tuesday, 6 April 2021

न्यूटन पर पुस्तकें

सुशोभित

आइज़ैक न्यूटन के व्यक्तित्व, ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और, वैश्विक ज्ञान-परम्परा में उसके योगदान के प्रति मेरी रुचि जब कौतूहल की सीमा को लांघकर सम्यक-मननशीलता के लोक में प्रवेश कर गई, तब मैंने निर्णय लिया कि मुझको न्यूटन पर पुस्तकों का अध्ययन करना होगा, यत्र-तत्र प्रस्तुत फ़ौरी सामग्रियों को खंगालने से अब बात नहीं बनेगी। किंतु वही यक्षप्रश्न एक बार पुन: प्रस्तुत हुआ, जो कि किसी भी विषय पर गम्भीर गवेषणा करने वाले हर व्यक्ति के सम्मुख प्रस्तुत होता है- कौन-सी पुस्तकें? संसार में हर महत्वपूर्ण व्यक्ति, विचार और परिघटना पर बीसियों किताबें लिखी गई हैं, इनमें से क्रिटिकल टेक्स्ट्स को खोजकर उन्हीं पर स्वयम् को एकाग्र करना सरल नहीं है।

मैंने पाया कि न्यूटन पर बात करने वाले लगभग सबों ने एक स्वर से रिचर्ड एस. वेस्टफ़ॉल की किताब 'नेवर एट रेस्ट' को उस पर लिखी सर्वश्रेष्ठ पुस्तक और अधिकृत जीवनी स्वीकारा है। यह पुस्तक सबसे पहले वर्ष 1980 में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस से छपी थी। अकादमिक दृष्टि से इसका हार्डबाउंड निकाला गया था, लेकिन दो साल में दो बार री-प्रिंट होने के बाद इसका पेपरबैक निकालने का निर्णय लिया गया। यह किताब न्यूटन के अध्येताओं में इतनी लोकप्रिय सिद्ध हुई कि वर्ष 2010 तक इस पेपरबैक संस्करण के भी 20 री-प्रिंट निकल चुके थे। न्यूटन पर किसी भी तरह का अध्ययन करने की मंशा रखने वाला व्यक्ति इस पुस्तक की उपेक्षा कर आगे नहीं बढ़ सकता। यह कोई 900 पन्नों का सुदीर्घ ग्रंथ है, किंतु भारत में सहज उपलब्ध नहीं। 

जब न्यूटन के बारे में मेरी जिज्ञासा आरम्भिक कौतूहल के दौर में थी, तब मैंने उस पर अपेक्षाकृत एक छोटी जीवनी पढ़ने का निर्णय लिया था। भारत में वैसी दो जीवनियाँ सुलभ थीं- एक के लेखक जेम्स ग्लीइक थे और दूसरी के पीटर एक्रॉयड। एक्रॉयड ने अपनी पुस्तक ब्रीफ़ लाइव्ज़ सीरिज़ के तहत लिखी थी। यह कोई 154 पन्नों की बहुत ही मुख़्तसर किताब है। मैं इसे पढ़ गया, किंतु संतोष नहीं हुआ। तब निर्णय लिया कि मुझको न्यूटन पर एक कोई अधिक कॉम्प्रेहेन्सिव और एग्ज़ॉस्टिव टेक्स्ट पढ़ना होगा। मेरे निश्चय की सुई 'नेवर एट रेस्ट' के इर्द-गिर्द ही घूमती रही थी।

एक चर्चित न्यूटन-स्कॉलर हैं- विलियम आर. न्यूमैन। दो साल पहले प्रिन्सटन यूनिवर्सिटी प्रेस से उनकी किताब 'न्यूटन द अल्केमिस्ट' आई थी और कीमियागरी की ख़ुफ़िया दुनिया में न्यूटन की संगीन दिलचस्पी के ब्योरों की पड़ताल उन्होंने कुछ नए अध्ययनों की रौशनी में की थी। सनद रहे, न्यूटन-पेपर्स को आज न्यूटन की मृत्यु के तीन सौ वर्षों बाद भी खंगाला जा रहा है और नित्य-नई सूचनाएँ वहाँ से बरामद होती हैं (इस विषय पर भी एक पुस्तक है- 'द न्यूटन पेपर्स', लेखिका सारा ड्राय )। विलियम आर. न्यूमैन से इधर किसी ने पूछा कि अगर न्यूटन पर पाँच ही किताबें पढ़ी जानी चाहिए तो वो कौन-सी होंगी? इस जिज्ञासा ने मेरा ध्यान खींचा, क्योंकि यह मेरा भी प्रश्न था। मेरे इर्द-गिर्द वैसे कोई न्यूटन-स्कॉलर्स नहीं थे, जिनसे मैं मशविरा ले पाता और इसके लिए मुझे विलियम आर. न्यूमैन जैसे किसी मुखर विद्वत के परामर्शों की ही आवश्यकता थी। 

न्यूमैन ने जो किताबें बतलाईं, उनमें सबसे पहली किताब एक बार फिर रिचर्ड एस. वेस्टफ़ॉल की 'नेवर एट रेस्ट' ही थी। उन्होंने चार और किताबों के नाम लिए, जिनमें रॉब इलीफ़ की 'प्रीस्ट ऑफ़ नेचर', बुख़वाल्ड और फ़ीनगोल्ड की 'न्यूटन एंड द ओरिजिन ऑफ़ सिविलाइज़ेशन', निकोलो गुइच्चीकार्डिनी की 'आइज़ैक न्यूटन एंड नेचरल फ़िलॉस्फ़ी' और फ्रान्क ई. मान्युएल की 'अ पोर्ट्रेट ऑफ़ आइज़ैक न्यूटन' सम्मिलित है। इलीफ़, बुख़वाल्ड और फ़ीनगोल्ड की किताबें न्यूटन की थियोलॉजिकल धारणाओं पर एकाग्र हैं। गुइच्चीकार्डिनी की किताब नेचरल फ़िलॉस्फ़ी के इतिहास में न्यूटन को अवलोकती है, वहीं फ्रान्क ई. मान्युएल की किताब फ्रायडियन साइकोएनालिसिस की दृष्टि से न्यूटन पर बात करती है। वहीं, दोहराने की ज़रूरत नहीं, वेस्टफ़ॉल की किताब न्यूटन पर एक प्रॉपर और डेफ़िनेटिव बायोग्राफ़ी है। 

सौभाग्य से मैं वेस्टफ़ॉल की वह सेलेब्रेटेड किताब ('नेवर एट रेस्ट') प्राप्त करने में सफल रहा हूँ। गुइच्चीकार्डिनी और मान्युएल को छोड़कर शेष की पुस्तकें भी पा सका हूँ। न्यूमैन ने जॉन मेनार्ड कीन्स की न्यूटन-स्पीच को भी बहुत महत्व दिया था, जिसे एक बार में पढ़ गया हूँ। 'नेवर एट रेस्ट' का अध्ययन मैं आरम्भ कर चुका हूँ और ईश्वर से प्रार्थना करूँगा कि 900 पन्नों के इस ग्रंथ को पढ़ जाने का धैर्य और संकल्प मुझको दे, और इस उद्यम के बीच में कोई व्यवधान नहीं आए। फ़िलवक़्त यह सब स्वान्त:सुखाय ही है, किंतु अगर इस उपक्रम में न्यूटन के बारे में मुझे कुछ वैसी मालूमात हाथ लगती हैं, जिनका एक वृहत्तर मानवीय परिप्रेक्ष्य हो (जैसे, न्यूटन का एकान्त) और जो सामान्य पाठकों के लिए रुचिकर हो तो उस पर लिखने से चूकूँगा नहीं। सत्रहवीं सदी के यूरोपियन-ज्ञानोदय में निजी रूप से मेरी दिलचस्पी है, और रेनेसां के केंद्रीय व्यक्तित्व- सर आइज़ैक न्यूटन- की सुदीर्घ-जीवनी पढ़ जाने का अर्थ उस ज्ञानोदय के अनेक महत्तम परिप्रेक्ष्यों को उलीच आना भी है।

पाठकों से यह सूचनाएँ इसलिए साझा कर रहा हूँ कि अगर उनमें से किसी की भी रुचियों के वृत्त में यह भावलोक आता है तो उन्हें क्रिटिकल टेक्स्ट्स की खोज में वैसा परिश्रम करने की आवश्यकता नहीं, जैसा मैंने किया है। इस पोस्ट को वे इस विषय पर एक अधिकृत टिप्पणी मानें। यहाँ उल्लेखित शीर्षक न्यूटन पर लिखी श्रेष्ठ पुस्तकों के हैं, और आपमें से किसी की रुचि हो तो उस दिशा में अपनी यात्रा आरम्भ सकता है, जैसा इन पंक्तियों के लेखक ने किया है। अभी इतना ही।



Friday, 2 April 2021

न्यूटन का एकान्त

सुशोभित

आइज़ैक न्यूटन का एकान्त लगभग दुर्भेद्य था। उसमें किसी को प्रवेश करने की अनुमति नहीं थी। उसका पूरा बचपन तनहाई में बीता था (जन्म से पहले पिता की मृत्यु हो गई, तीन वर्ष की अवस्था में माँ दूसरा विवाह करके उसे त्याग गई), और अपनी पूरी किशोरावस्था और युवावस्था में वह अंतर्मुखी, संकोची, निस्संग रहा। उसका कोई संगी था ना साथी। उसने कभी किसी स्त्री से प्रेम नहीं किया। या बेहतर होगा अगर कहें किसी स्त्री ने उससे कभी प्रेम नहीं किया (इन दोनों बातों में बहुत भेद है)। इससे निजता और एकान्त में जिससे सबसे गहरी सेंध लगती है, अंतर्मन के उस कोने को न्यूटन ने बाँध की तरह अभेद बना दिया था। उसकी एकाग्रता सम्पूर्ण थी, कोई उसको अपने काम करने की मेज़ से डिगा नहीं सकता था। कालान्तर में, जब वो प्रौढ़ हुआ, तो वो अनेक सार्वजनिक भूमिकाओं में गया, जैसे- मेम्बर ऑफ़ पार्लियामेंट, रॉयल सोसायटी का प्रेसिडेंट, कैम्ब्रिज में गणित का प्राध्यापक, मिन्ट का प्रमुख- और उसने अपने समय के अनेक ख्यातनाम व्यक्तियों से ख़तो-किताबत भी की, किंतु दूसरों और अपने बीच एक बेमाप फ़ासला उसने हमेशा क़ायम रखा। सहकर्मियों से वह किंचित रूखाई से पेश आता, और अपने मातहतों के लिए वो सुदूर के किसी देवता से कम नहीं था। उसका आत्माभिमान अप्रतिहत था, जो औरों को आतंकित करता था। उसके जीवन में भावनात्मक सम्बंधों के लिए एक गहरी अरुचि थी।

एकान्त के प्रति उसके व्यक्तित्व के इस चुम्बकीय खिंचाव ने ही उससे वैसे उद्यम करवा लिए, जिन्हें अतिमानवीय कहा जाता है और ये माना जाता है कि वो किसी साधारण मनुष्य के बूते की बात नहीं थी। वर्ष 1665 में इंग्लैंड में प्लेग की महामारी फैली। तब न्यूटन कैम्ब्रिज में छात्र था। महामारी से बचाव के लिए उसे उसके गाँव वूल्सथोर्प भेज दिया गया, जहाँ वो पूरे समय अपने कमरे में सिमटा रहता। विज्ञान के इतिहास में इसे न्यूटन का मिरेकल-ईयर कहा जाता है। वैसा ही मिरेकल-ईयर फिर अल्बर्ट आइंष्टाइन के जीवन में भी आया, वर्ष 1905, जब उसने दुनिया को बदल देने वाली स्थापनाएँ सामने रखीं। वूल्सथोर्प में न्यूटन ने डिफ्रेंशियल कैलकुलस की ईजाद की। उसने प्रिज़्म की सहायता से रौशनी के रेशे-रेशे खोलकर देखे और स्पेक्ट्रम के सात रंगों को दुनिया के सामने रख दिया। उसने यूनिवर्सल ग्रैविटेशन पर अपनी थ्योरियों का सूत्रपात भी उसी कालखण्ड में किया और दृढ़ता से यह कहा कि जो चीज़ सेब को धरती पर गिराती है, वही आकाश में ग्रहों और पिण्डों को टिकाए हुए है, इस रहस्यमयी चीज़ का नाम है- ग्रैविटी- पदार्थ में एक चिरंतन महाचेतना का करस्पर्श। वर्ष 1666 तक न्यूटन दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण नेचरल फ़िलॉस्फ़र, भौतिकविद्, गणितज्ञ और वैज्ञानिक बन चुका था, अलबत्ता उसे ख़ुद ही इसकी भनक तक ना थी। भला कैसे होती, तब उसकी उम्र कुलजमा 24 साल ही तो थी!

न्यूटन जितना बड़ा वैज्ञानिक और गणितज्ञ था, उतना ही महान रहस्यदर्शी भी था। धर्म और विज्ञान के बीच स्वर्णिम मध्यमार्ग उसने तलाश लिया था और भौतिकी के अनुल्लंघ्य नियमों को वह एक दैवीय-उपक्रम की अभिव्यक्ति की तरह देखता था। पदार्थ में उसे विश्वचेतना की छाँह दिखलाई देती थी। उसने अल्केमी और थियोलॉजी के क्षेत्र में गणित और भौतिकी से कम काम नहीं किया। जॉन मेनार्ड कीन्स ने न्यूटन को 'द लास्ट ऑफ़ मैजिशियन एंड बेबीलोनियन' कहा था। वहीं न्यूटन की बायोग्रैफ़ी लिखने वाले पीटर एक्रॉयड ने महाकवि विलियम ब्लेक को उद्धृत करते हुए उसे 'द वर्जिन श्राउडेड इन स्नो' कहकर पुकारा था। इस पुकार में एक गहरी विडम्बना निहित थी, क्योंकि विलियम ब्लेक न्यूटन पर आरोप लगाता था कि उसने प्रकृति में कविता की भावना को क्षति पहुँचाकर गणित के नियमों को प्रतिष्ठित कर दिया था। लेकिन न्यूटन की ज़िंदगी में कविता के लिए कोई जगह नहीं थी। या अगर आप चाहें तो उसके काम में पोयट्री ऑफ़ मैथेमैटिक्स ज़रूर खोज सकते हैं। युवल हरारी के स्मरणीय शब्दों में- न्यूटन ने हम सबको यह दिखलाया था कि प्रकृति की किताब गणित की भाषा में लिखी गई है।

कैम्ब्रिज में छात्र से प्राध्यापक बनने में न्यूटन ने ज़्यादा समय नहीं लिया। वो कैम्ब्रिज के इतिहास के सबसे युवा प्राध्यापकों में शुमार है, क्योंकि वो उसके समय के दूसरे शिक्षकों से कहीं अधिक मेधावी था। लेकिन जिस घोर एकान्त में उसने बचपन से लेकर अब तक का अपना जीवन बिताया था, और उसकी देदीप्यमान प्रतिभा आगे चलकर उसके लिए जिस यशस्वी जीवन का दुशाला बुन रही थी, उससे पेश आने वाली दुविधाओं ने उसे चिंतित भी बहुत किया। 1670 के दशक में गणितज्ञ जॉन कोलिन्स को लिखे एक ख़त में उसने विनती की कि उसके द्वारा भेजे गए शोधपत्र को उसके नाम के बिना ही छाप दिया जाए, क्योंकि अगर यह उसके नाम से छपा तो लोगों का ध्यान उसकी तरफ़ खिंचेगा, जो वो हरगिज़ नहीं चाहता था। प्रसिद्धि से एकान्त में ख़लल पड़ सकता था, किंतु न्यूटन जैसी सूर्यदीप्त प्रतिभा के सामने छुपकर रहने का कोई विकल्प नहीं था। कालान्तर में 'प्रिंसिपिया मैथेमैटिका' के प्रकाशन के बाद उसे वैश्विक ख्याति मिली और उसने पहले से अधिक आत्मविश्वास और किंचित आत्ममुग्धता के साथ उसे अंगीकार किया, किंतु मृत्युशैया पर अपनी निजता पर संकट के पुराने भय ने उसे फिर से इतना ग्रस लिया था कि उसने मरने से पहले अपनी अनेक महत्वपूर्ण पाण्डुलिपियाँ और पत्र जला दिए थे।

चर्चित न्यूटन-आइंष्टाइन द्वैत का एक आयाम यह भी था कि जहाँ आइंष्टाइन के स्वभाव में बड़ी सहज विनोदप्रियता थी, वहीं न्यूटन की गम्भीरता कांसे की मूरत की तरह खरी और सुठोस थी। कह लीजिये कि जहाँ आइंष्टाइन भौतिकी की दुनिया का मोत्सार्ट था तो न्यूटन उसका बीथोवन था। बचपन में माँ के द्वारा अकेला छोड़ दिए जाने के दंश से वो कभी उबर नहीं पाया था। उसके व्यक्तित्व में रोष, ग्लानि, महत्वाकांक्षा और आत्माभिमान गहरे तक पैठ गए थे। पीटर एक्रॉयड ने न्यूटन की बायोग्रैफ़ी में उसके द्वारा किशोरावस्था में लिखी जाने वाली डायरियों का हवाला दिया है, जिसमें न्यूटन अपने पापों का ब्योरा लिखता था। ये पाप क्या थे? चेरी के फल चुराना, आज्ञा का उल्लंघन करना, ग़ुस्से में आकर किसी के टोप में कील रख देना, स्कूल में संगियों से लड़ बैठना- अपने इन 'पापों' को न्यूटन ने नोटबुक में दर्ज किया है और बहुत शिद्दत से उनका पछतावा किया है। कुछ और जगहों पर उसने नाच-गाने के प्रति गहरी अरुचि जताई है और अपने जीवन-प्रयोजन के बारे में गम्भीर चिंता प्रकट की है। वो ख़ुद से पूछता है कि मैं क्यों हूँ, किसलिए हूँ, दुनिया में क्या करने के लिए आया हूँ? वो एकान्त में बैठकर रोता रहता था। तब उसकी आयु उन्नीस वर्ष थी। महज़ पाँच-छह साल बाद ही उसने अपने मिरेकल-ईयर की बदौलत दुनिया के इतिहास को बदल देना था। आज सर आइज़ैक न्यूटन की गणना विश्व के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्तित्वों में की जाती है। संशय और ग्लानि से भरे उस उन्नीस साल के नौजवान को दूर-दूर तक इसका अंदाज़ा नहीं था।

यह कैसे हुआ था? सम्भवतया एक महान नियति ने उसे अपने माध्यम की तरह चुन लिया था। किंतु इसकी एक शर्त थी। जैसा जीवन दूसरे बिताते हैं, वैसा जीवन उसके भाग्य में नहीं था और उसे स्वयं को एक दूसरे ही प्रयोजन में झोंक देना था। अपने एकान्त की पूरी निष्ठा से रक्षा किए बिना यह सम्भव नहीं हो सकता था। न्यूटन का जीवन कइयों के लिए आज भी एक पहेली बना हुआ है। यह पहेली कभी सुलझाई नहीं जा सकेगी, क्योंकि न्यूटन अपने पीछे वो युक्तियाँ नहीं छोड़ गया है, जिनकी मदद से उस तक पहुँचा जा सके। उसने दुनिया और अपने बीच के सारे पुल जला दिए थे। और वैसे जीवन में मैत्री, प्रेम, सुख, विश्राम और संतोष के लिए भला कोई जगह कैसे हो सकती थी?



Wednesday, 24 March 2021

वायरस से वैक्सीन तक

डर है? सवाल है? 

जवाब यहां हैं

वैक्सीनेशन की प्रक्रिया को शुरू हुए 2 महीने से ज्यादा हो चुके हैं। लाखों लोगों को वैक्सीन लग चुकी है। साइड इफेक्ट्स को लेकर क्या अब भी आप आशंकित हैं? क्या मन में अब भी कई तरह के सवाल उठ रहे हैं? जाने-माने एक्सपर्ट्स से बात करके ऐसी ही शंकाओं को दूर करने की कोशिश की है लोकेश के. भारती और निशि भाट ने:


क्यों बढ़ रहे हैं मामले?

ये हैं कोरोना बढ़ने की 5 वजहें

1. लॉकडाउन खत्म तो कोरोना खत्म, इस सोच की वजह से लोगों ने कोरोना पर ध्यान देना कम कर दिया है।

2. मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग जो लॉकडाउन के शुरुआती दिनों में देखी जा रही थी, वह खत्म हो गई है।

3. लोग पार्टियां कर रहे हैं। मेट्रो, बसों, ट्रेन आदि में भीड़ बढ़ रही है।

4. वैक्सीन आने से लोगों में निश्चिंतता आ गई है जबकि अभी यह देश की 3 फीसदी आबादी को भी नहीं लगी है।

5. कोरोना नियमों में कड़ाई कम हो गई है। 


कोरोना के मामले फिर बढ़ रहे हैं, क्या पहले की तरह लॉकडाउन लगाया जा सकता है?

आजकल जो कोरोना के मामले बढ़े हैं उसे दूसरी लहर कहा जा रहा है। इसे नई लहर कहें या पुराने कोरोना की वापसी। सच तो यह है कि कोरोना के मामले पिछले 1 महीने में दोगुने से ज्यादा हो गए हैं और ये बढ़ते ही जा रहे हैं। कई शहरों में रात का लॉकडाउन है तो कई जगह धारा 144 लागू की गई है।


1.38% है देश में कोरोना इंफेक्शन से मृत्युदर

12.22 करोड़ के पार पहुंचे दुनियाभर में कोरोना केस


सबसे ज्यादा मामले महाराष्ट्र में क्यों बढ़े रहे हैं?

इसकी 2 बड़ी वजहें हैं। एक तो महाराष्ट्र खासकर मुंबई में हवाई जहाज और पानी के जहाज दोनों माध्यमों से विदेश से लोग आ रहे हैं। संक्रमण के मामले में अकेले महाराष्ट्र का हिस्सा 62 फीसदी है। मुंबई में भीड़ सबसे ज्यादा है और लोगों ने मास्क, सोशल डिस्टेंसिंग को भी नजरअंदाज करना शुरू कर दिया है। अपनी रोजी-रोटी की तलाश में भी बड़ी संख्या में लोग मुंबई और पुणे जैसे शहरों में पहुंचने लगे हैं।


वैक्सीनेशन की पूरी प्रक्रिया को ऐसे समझें


रजिस्ट्रेशन कहां कराना होगा?

अब तक की व्यवस्था के अनुसार Aarogya Setu मोबाइल ऐप पर CoWIN सेक्शन पर रजिस्ट्रेशन के बाद ही वैक्सीन के लिए नंबर आता है। यह ऐप एेंड्राॅयड और iOS दोनों प्लैटफॉर्म पर मुफ्त में उपलब्ध है। वेबसाइट cowin.gov.in पर जाकर भी वैक्सीन के लिए रजिस्ट्रेशन करा सकते हैं। यह भी मुमकिन न हो तो नजदीकी अस्पताल जहां वैक्सीनेशन की प्रक्रिया चल रही हो, वहां भी सीधे रजिस्ट्रेशन हो सकता है। ऑनलान रजिस्ट्रेशन के लिए सरकार द्वारा जारी फोटो आई कार्ड अपलोड करना होता है। वैक्सीन सेंटर एक तरह के रेलवे रिजर्वेशन सेंटर की तरह काम कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, एक सेंटर पर दिनभर में अगर 100 हेल्थ वर्कर्स को वैक्सीन दी जानी है और उसमें से 90 ही वैक्सीन लगवाने के लिए पहुंचे तो किसी दूसरे को उनकी जगह वैक्सीन लगवाने का विकल्प दिया जा सकता है।


वैक्सीन लेने से पहले और लेने के बाद की फॉर्मेलिटी क्या है?

ऐप या वेबसाइट पर रजिस्ट्रेशन के बाद अगर आपके पास वैक्सीनेशन का एसएमएस आ गया है तो आपको सबसे पहले उन डॉक्यूमेंट्स को तैयार रखना होगा जो आपने रजिस्ट्रेशन के समय अपलोड किए हैं। फोटो पहचानपत्र के लिए आधार कार्ड या फिर सूची में बताए गए दूसरे दस्तावेज, जैसे: अगर कोई कोमोरबिड (अति गंभीर बीमारियों) की श्रेणी में आते है तो इसे साबित करने के लिए डॉक्टर का पर्चा साथ रखना होगा। पहली अप्रैल से डॉक्टर के पर्चे की जरूरत खत्म हो जाएगी। इस तारीख से 45 साल से ज्यादा वाले सीधे ही टीका लगवा सकते हैं।


अगर किसी ने पहली डोज एक शहर में ली है और दूसरी डोज दूसरे शहर में लेनी है तो उसे यह कैसे पता चलेगा कि उसने पहले किस कंपनी की वैक्सीन ली थी और क्या कंपनी बदलने से कोई फर्क पड़ता है?

जब कोई शख्स पहली डोज लेता है तो उसके फौरन बाद उसे एक टेक्स्ट मेसेज आता है जो इस तरह से होता है...

'प्रिय P. KUMAR, बधाई! आपको कोविड-19 टीके की खुराक 1st टीकाकर्मी Puspamma (9810.....) द्वारा 19-01-2021 को 12:55 PM बजे B. Hospital में सफलतापूर्वक लगा दी गई है। टीकाकरण के बाद किसी अन्य पूछताछ के लिए हमारी हेल्पलाइन 1075 से संपर्क करें।

-CoWIN'


इस मेसेज में सारी जानकारी दी गई है कि कब, किसने और किस अस्पताल में टीका लगवाया। जब किसी को वैक्सीन लगती है तो बताया जाता है कि किस कंपनी की वैक्सीन लगी है, लगाने वाले का नाम क्या है, उसका मोबाइल नंबर क्या है? आदि। इस मेसेज को अगली वैक्सीन लगने तक रखना होता है। सरकार की कोशिश यही होती है कि एक शख्स को जिस कंपनी की वैक्सीन पहली डोज में लगी है, वही 28 दिनों बाद बूस्टर डोज में भी लगे। अगर सेकंड डोज किसी दूसरी कंपनी की लग भी जाए तो परेशान होने की जरूरत नहीं है, लेकिन वैक्सीन सेंटर के अधिकारी या अपने डॉक्टर को जरूर बता दें।


Q. वैक्सीन लगवाने के लिए कितनी देर पहले पहुंचना होता है? पहुंचने के बाद पहले क्या करना है?

A. ऐप के जरिए जो मेसेज आपको दिया जाएगा, जिसमें वैक्सीन लंच से पहले या बाद में दिए जाने की सूचना होगी। सामान्य रूप से आधे घंटे से 45 मिनट के अंदर वैक्सीनेशन की प्रक्रिया पूरी हो जाती है। इसलिए आधे घंटे पहले केंद्र पर पहुंचना बेहतर रहेगा।


Q. किसी को कोरोना हो गया है या वैक्सीन की पहली डोज लेने के बाद उसे कोरोना हो जाता है तो वैक्सीन कब लेनी है?

A. अगर किसी को कोरोना हो चुका है, चाहे उसने वैक्सीन की पहली डोज ली हो या फिर नहीं, उस शख्स को पहली या दूसरी डोज जो भी लेनी है, वह कोरोना पॉजिटिव रिपोर्ट आने के 45 दिनों के बाद ही ले सकता है। उससे पहले उसे वैक्सीन नहीं लेनी चाहिए।


दोनों वैक्सीन में फर्क


कोवैक्सीन

-इसे बनाने की प्रक्रिया ज्यादा विस्तारित है।

-इसमें पूरे कोरोना वायरस का ही उपयोग किया गया है।

-इसमें वायरस की मारक क्षमता खत्म कर दी जाती है।

-इसे ऐसे समझ सकते हैं कि अगर किसी के शरीर में मांस, नसें आदि कुछ न हो सिर्फ कंकाल रह जाए। इसमें वायरस को भी ऐसा बना दिया जाता है।


कोविशील्ड

-इसमें कोरोना वायरस के पूरे शरीर का उपयोग नहीं किया गया है।

-कोरोना वायरस में मौजूद सिर्फ प्रोटीन का उपयोग किया गया है।

-दूसरे वायरस पर कोरोना वायरस की प्रोटीन चेन लगाकर वैक्सीन को तैयार किया गया है।

-वायरस के इसी प्रोटीन को याद करके हमारा शरीर ऐंटिबॉडी तैयार कर लेता है।


अगर कोवैक्सीन और कोविशील्ड दोनों वैक्सीन कोरोना से लड़ने के लिए ही तैयार की गई हैं तो टीका लगवाने के बाद दोनों के साइड इफेक्ट्स अलग-अलग क्यों होते हैं?

दोनों वैक्सीन लगवाने के बाद जो लक्षण उभरते हैं, उनमें ज्यादा फर्क नहीं होता। बुखार (वैक्सीन लगने के 2 से 3 दिनों तक 100 से 102 डिग्री फारेनहाइट तक), मांसपेशियों में हल्का दर्द (यह भी 2 से 3 दिनों तक) दोनों में होता है। इससे ज्यादा रहने पर वैक्सीन सेंटर, 1075 या फिर नजदीकी डॉक्टर से संपर्क करें। हां, कोविशील्ड को लेकर विदेशों में खून का थक्का जमने के कुछ मामले जरूर सुनने में आ रहे हैं। लेकिन इसके अभी तक कोई सबूत नहीं मिले हैं।


वैक्सीनेशन से पहले सेहत पर ध्यान

Q. वैक्सीन लेने के 7 या 10 दिन पहले क्या एस्प्रिन दवाएं लेना सुरक्षित रहेगा?

A. एस्प्रिन एक Anticoagulant (जो खून का थक्का जमने न दे या खून को पतला करने वाली दवा) है। वैक्सीन लेने से पहले किस व्यक्ति को एस्प्रिन लेनी है या नहीं, इसका निर्णय डॉक्टर ही जांच के बाद कर सकते हैं। सभी दिल के मरीजों को वैक्सीन से पहले एस्प्रिन दवा लेने की सलाह नहीं दी जा सकती क्योंकि किसी को एस्प्रिन की जरूरत न हो और उसे दे दी गई तो नाक या मुंह से खून आ सकता है।


Q. वैक्सीन लगने के बाद दिल का दौरा पड़ने के मामले अधिक देखे गए हैं। क्या एहतियात के रूप में वैक्सीन लेने से पहले डी- डायमर जांच करवाना और जोरोल्टो दवा लेना ठीक है?

A. इस तरह की शिकायत ज्यादा उम्र के मरीजों में ही देखी गई है। हां, जांच करा सकते हैं, लेकिन बिना किसी डॉक्टर से पूछे जोरोल्टो लेने की सलाह नहीं दी जा सकती।


Q. अगर शुगर कंट्रोल में होते हुए कोविन ऐप पर वैक्सीन के लिए रजिस्ट्रेशन करा लिया और नंबर आना है एक हफ्ते बाद तो इस बीच शुगर बढ़ने पर क्या दोबारा रजिस्ट्रेशन कराना होगा?

A. वैसे तो इसके लिए ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ रहा है। बावजूद इसके शुगर नियंत्रित होने के बाद ही रजिस्ट्रेशन कराना चाहिए। इस बीच डायट और इंसुलिन पर भी ध्यान दें। अगर रजिस्ट्रेशन के अगले दिन कोरोना वैक्सीन लगवाने की स्थिति बने तो शुगर सामान्य रखने कोशिश करें।


Q. किसी का HbA1c टेस्ट बताता है कि शुगर 3 महीने से सामान्य है तो क्या वह बिना शुगर जांच के कोरोना की वैक्सीन ले सकता है?

A. जरूर ले सकते हैं। शुगर के मरीजों में HbA1c सामान्य होना सही स्थिति माना जाता है। यदि स्वास्थ्य संबंधी और कोई दिक्कत नहीं है तो आप बेझिझक कोरोना वैक्सीन ले सकते हैं।


Q. अगर किसी का कलेस्टरॉल भी लगातार बढ़ा रहता है तो क्या वैक्सीन लेने से पहले HDL जांच भी करा लेनी चाहिए?

A. कोरोना की वैक्सीन लेने से पहले HDL जांच कराना स्वैच्छिक हो सकता है, लेकिन बढ़े हुए कलेस्ट्रॉल के साथ यदि कोरोना इंफेक्शन होता है तो यह घातक हो सकता है, इसलिए वैक्सीन लेना जरूरी है।


Q. डायलिसिस वाले मरीजों को कोरोना वैक्सीन लेने से पहले क्या तैयारी करनी चाहिए?

A. स्वास्थ्य संबंधी अति गंभीर बीमारियों का शिकार लोगों को भी वैक्सीन के लिए पहली सूची में शामिल किया गया है। लंबे समय से क्रिएटिनिन स्तर सामान्य है तो बेझिझक वैक्सीन ले सकते हैं। कोई चाहे तो डायलिसिस कराने के 4 से 5 दिनों के बाद कोविन से रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया पूरी कर सकता है।


Q. क्या वैक्सीन को खाली पेट लगवाना ज्यादा अच्छा है?

A. वैक्सीन कभी भी खाली पेट नहीं लगवानी चाहिए। अगर किसी को लो-शुगर की परेशानी है तो खाली पेट वैक्सीन लेने से दिक्कत हो सकती है। इसलिए वैक्सीन लगवाने के लिए जाने से पहले जरूर कुछ खा लेना चाहिए।


वैक्सीनेशन के बाद की जांच और जरूरी सावधानियां


Q. अगर वैक्सीन लगवाने के बाद भी मास्क पहनना है, सोशल डिस्टेंसिंग भी रखनी है तो वैक्सीन लगवाने का क्या फायदा?

A. फौजियों को दुश्मन की गोली से बचने के लिए बुलेटप्रूफ जैकेट दी जाती है ताकि उन पर गोली का असर न हो या कम से कम हो। इसका यह मतलब नहीं है कि फौजी बिना वजह ही दुश्मनों के सामने चले जाएं। ऐसा करने से भले ही जवान की जान न जाए, लेकिन गोली की वजह से उन्हें चोट लग सकती है और वे घायल हो सकते हैं। इसके अलावा जो अंग बुलेटप्रूफ जैकेट से नहीं ढके हैं, वहां गोली लग सकती है। यही बात वैक्सीन के साथ भी लागू होती है। यह कोरोना जैसे खतरनाक वायरस से जान बचाने के लिए है। शरीर में पहुंचने पर यह वायरस कुछ परेशानी तो पैदा कर ही सकता है। चूंकि यह वैक्सीन 70 से 80 फीसदी ही कारगर है, इसलिए बाकी के 20 से 30 फीसदी लोग कौन होंगे, यह बताना मुश्किल होता है। इसलिए वैक्सीनेशन के बाद भी मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करना जरूरी है।


Q. वैक्सीन लगवाने के तुरंत बाद किस बात का ध्यान रखना है?

वैक्सीन की पहली डोज लगी हो या दूसरी डोज। अगर किसी को 3 दिन से ज्यादा समय तक बुखार और मांसपेशियों में दर्द रहे तो डॉक्टर से जरूर संपर्क करें।


CRP: यह शरीर में मौजूद इंफेक्शन को समझने के लिए बेहतरीन टेस्ट है। यह उन लोगों को जरूर कराना चाहिए जिन्हें लगातार खांसी, सिरदर्द आदि की शिकायत रहती है।

खर्च: लगभग 500 रुपये, कैसे: खून से, रिपोर्ट: उसी दिन


D-Dimer: खून में थक्का जमने की स्थिति को समझने के लिए। इस टेस्ट को जरूर कराना चाहिए।

खर्च: करीब 1000 रुपये, कैसे: खून से, रिपोर्ट: उसी दिन


LDH: इस टेस्ट से शरीर में टिशू लॉस का पता चलता है।

खर्च: 350 रुपये, कैसे: खून से, रिपोर्ट: उसी दिन


Q. फिलहाल जो वैक्सीन लगाई जा रही है, क्या यह कोरोना के नए स्ट्रेन पर भी काम करेगी?

A. यह पूरी तरह से कहना अभी मुश्किल है। एक तो स्ट्रेन नया है और वैक्सीन भी नई है। लेकिन इतना तो कहा ही जा सकता है कि जिसने वैक्सीन नहीं लगवाई है, उसकी तुलना में जिन लोगों ने वैक्सीन लगवा ली है, उनके शरीर में कोरोना वायरस के खिलाफ ऐंटिबॉडी बन जाती है। इससे नया स्ट्रेन भी शायद उस तरह संक्रमित नहीं कर पाएगा जितना उन लोगों को करेगा जिन्होंने वैक्सीन नहीं लगवाई है।


Q. यह कैसे पता चले कि वैक्सीन का साइड इफेक्ट हो रहा है या कोई नई परेशानी है?

A. अगर वैक्सीन लगने के 3 दिनों के बाद भी कोई परेशानी जारी रहे तो डॉक्टर से मिलना चाहिए। जांच के बाद पता चलेगा कि यह वैक्सीन की वजह से है या फिर कोई नई परेशानी।


Q. वैक्सीन लगने के बाद भी कोरोना हो सकता है?

A. जरूर हो सकता है, लेकिन यह ज्यादा खतरनाक नहीं होता। वैक्सीन लगने के बाद जब कोरोना वायरस शरीर के अंदर पहुंचता है तो उसकी लड़ाई शरीर में पहले से मौजूद ऐंटिबॉडी से होती है, इसलिए हल्के लक्षण जैसे बुखार या मांसपेशियों में दर्द आदि हो सकता है। सांस फूलने जैसी परेशानी, स्वाद या गंध का जाना आदि नहीं देखा जाता।


Q. सुपर सीनियर्स को वैक्सीन लगवाने से पहले क्या ध्यान रखें और बाद में क्या?

A. 75 साल से ज्यादा उम्र वाले लोगों को भी वैक्सीन जरूर लगवानी चाहिए, बशर्ते उन्हें शुगर, बीपी, किडनी, दिल से संबंधित बीमारी और कैंसर आदि न हों। अगर ये परेशानियां नहीं हैं तो बेफिक्र होकर वैक्सीन लगवा सकते हैं। वैक्सीनेशन के बाद कोई भी परेशानी हो तो डॉक्टर से मिलें।


Q. ऐंटिबॉडी कितने दिनों में तैयार होती है?

A. वैक्सीनेशन की पहली डोज के 3 से 4 दिनों के बाद ही ऐंटिबॉडी बनने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है, लेकिन कई लोगों में ऐंटिबॉडी कम संख्या में बनती है या हो सकता है न बने। इसलिए दूसरी यानी बूस्टर डोज लगवाना जरूरी हो जाता है। जब बूस्टर डोज लगवा लेते हैं तो 10 से 15 दिनों के बाद उनके शरीर में ऐंटिबॉडी तैयार हो जाती है।


Q. क्या वैक्सीन 100 फीसदी सफल है?

A. पूरी दुनिया में आज तक कोई भी वैक्सीन 100 फीसदी सफल नहीं है। इन दोनों वैक्सीन के साथ भी ऐसा ही है। इन्हें 70 से 80 फीसदी तक सफल कहा जा रहा है। इसलिए वैक्सीनेशन के बाद भी मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग रखने की बात पर जोर दिया गया है।


वैक्सीन के खतरे और नए टीके


Q. हाल में कोरोना वैक्सीन लेने के बाद कर्नाटक में 71 साल की महिला की मृत्यु हो गई। क्या वैक्सीन के साइड इफेक्ट्स महिलाओं में अलग और पुरुषों में अलग देखे जा रहे हैं?

A. कोरोना वायरस इंफेक्शन के इस पहलू पर अभी ज्यादा अध्ययन नहीं किया गया है। लंबे समय से वायरस को नियंत्रित करने और इससे बचाव के उपायों पर ही काम हो रहा है। अब वैक्सीन आने के बाद इस बात की जरूरत महसूस की जा रही है कि वायरस का असर किस वर्ग या शरीर के किस अंग पर कितना अधिक गंभीर होता है, यह भी देखा जाए। यही नहीं, महिलाओं पर या पुरुषों पर वैक्सीन और वायरस के प्रभाव को अलग से जांचने के साथ ही इस बात पर भी विशेषज्ञों की नजर है कि कई तरह की गंभीर बीमारियों पर इंफेक्शन का क्या असर होता है। इस पर रिसर्च के लिए अगले दो से तीन साल का समय चाहिए।


Q. कोरोना टीकाकरण के बाद देशभर में कई लोगों की मौत हो चुकी है और कई लोग अस्पताल में भर्ती हुए हैं, इनमें से किसी का भी पोस्टमॉर्टम नहीं किया गया, ऐसा क्यों?

A. दुनियाभर में कोरोना की एस्ट्राजेनेका वैक्सीन पर उठे विवाद के बाद देश में भी वैक्सीन के साइड इफेक्ट्स के मामलों पर सरकार गंभीर हो गई है। अब सभी तरह के मामूली और गंभीर साइड इफेक्ट्स पर ध्यान दिया जाएगा। अगर जरूरी हुआ तो ऐसे मामलों में पोस्टमॉर्टम भी कराया जाएगा।


Q. कोरोना वैक्सीन सेंटर पर बहुत कम लोग पहुंच रहे हैं। कहीं टीकाकरण की गति बहुत तेज है तो कहीं बिल्कुल धीमी। क्या वैक्सीन को लेकर लोगों में भरोसा नहीं बना है?

A. कुछ केंद्रों पर भले ही वैक्सीनेशन के लिए कम लोग पहुंच रहे हों, लेकिन 30 लाख से ज्यादा लोगों को कोरोना वैक्सीन दी जा चुकी है। वैक्सीन के लिए ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ रहा। रजिस्ट्रेशन के एक या दो दिन के भीतर नंबर आ रहा है। इसलिए लोग अपनी सहूलियत को ध्यान में रखकर वैक्सीनेशन केंद्र पर पहुंच रहे हैं।


Q. क्या मुमकिन है कि वैक्सीन लेने से पहले बुजुर्गों की सेहत की जांच वैक्सीन केंद्र पर ही हो जाए?

A. व्यावहारिक रूप से यह संभव नहीं। ऐसी व्यवस्था के लिए बड़ी संख्या में संसाधनों की जरूरत होगी। जिन लोगों को वैक्सीन पात्रता की सूची में शामिल किया गया है, वे पहले से ही किसी डॉक्टर से इलाज करा रहे हैं या उनका इलाज चल रहा है। ऐसे में सेंटर पर स्वास्थ्य जांच का कोई औचित्य नहीं।


Q. युवाओं का वैक्सीनेशन करना सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण होगा और यही वर्ग सबसे अधिक समय तक घर से बाहर रहता है। उनके लिए टीकाकरण शुरू होगा तो उन्हें सेंटर तक लाने की क्या योजना होगी?

A. जब हम युवाओं को कोरोना वैक्सीन देने की बात करते हैं तो निश्चित रूप से हम उस समय की बात करते हैं जबकि एक बड़ी आबादी को वैक्सीन दी जा चुकी होगी। इसलिए वैक्सीन की सेफ्टी पर अधिक सवाल नहीं होगा। यह संभव है कि युवाओं को 100 रुपये से लेकर 1000 रुपये तक की वैक्सीन लगवाने का विकल्प मिल जाए।


Q. वैक्सीन पासपोर्ट सिस्टम भी लागू हो सकता है?

अभी भारत ने इसे लागू नहीं किया है, लेकिन यह मुमकिन है कि छोटे देशों में यह शुरू हो जाए जहां कोरोना के मामले शून्य पर पहुंच गए हों। कई बड़े देश भी इसे लागू कर सकते हैं जैसा कि येलो फीवर को लेकर नियम है। जब आप अफ्रीका के किसी देश में जाते हैं तो जाने से पहले येलो फीवर से बचाव के लिए वैक्सीनेशन करवाना पड़ता है। इसके बाद एक येलो कार्ड दिया जाता है। अगर यह कार्ड आपके पास नहीं है तो जाने से रोक दिया जाता है। इसलिए इसे हमेशा साथ रखना होता है।


Q. सरकार ने कुछ दिन पहले ही कहा था कि कई नई वैक्सीन भी आने वाली हैं। क्या उनको बाजार में उतारने के बाद सभी के लिए कोरोना वैक्सीनेशन शुरू हो जाएगा? अगर ऐसा किया जा सकता है तो यह कब तक संभव है?

A. कोवैक्सिन और कोविशील्ड के अलावा दो अन्य वैक्सीन, जॉनसन एंड जॉनसन की जेनवैक्स और रूस की स्पूतनिक वी को मजबूत प्रतिभागी माना जा रहा है। निजी वैक्सीन को अनुमति देने के बाद वैक्सीनेशन का दायरा बढ़ाया जाएगा। इसके लिए उतने ही स्तर के संसाधनों की जरूरत होगी। फिलहाल पूरा ध्यान जुलाई तक 30 करोड़ लोगों को कोरोना वैक्सीन देने पर है।


Q. नेजल यानी नाक से दी जाने वाली वैक्सीन कब तक आएगी और यह कितनी कारगर होगी?

नाक से दी जाने वाली वैक्सीन पर भी रिसर्च चल रही है। लोगों पर इसके प्रयोग किए जा रहे हैं, लेकिन इसे लॉन्च नहीं किया गया है। कुछ महीनों में उपलब्ध होने की उम्मीद की जा रही है। जहां तक सफल होने की बात है तो यह आने के बाद ही पता चलेगा। कोरोना वायरस के शरीर में पहुंचने के माध्यम भी नाक और मुंह ही हैं। जब नेजल वैक्सीन नाक और फेफड़ों से गुजरते हुए खून में मिल जाएगी, तब ऐंटिबॉडी तैयार हो जाएगा।


एक्सपर्ट पैनल

डॉ. के. के. अग्रवाल, प्रेसिडेंट, हार्ट केयर फाउंडेशन

डॉ. राजकुमार, डायरेक्टर, पटेल चेस्ट इंस्टिट्यूट

डॉ. अनुराग अग्रवाल, डायरेक्टर, जिनोमिक्स एंड इंटिग्रेटिव बायॉलजी

डॉ. राकेश मिश्रा, डायरेक्टर, सेल्यूलर एंड मॉलिक्यूलर बायॉलजी

(साभार एनबीटी)

डॉ. अंशुमान कुमार, डायरेक्टर, धर्मशिला अस्पताल

डॉ. एन. के. अरोड़ा, मेंबर, ICMR EFI

डॉ. जतिन आहूजा, सीनियर वायरॉलजिस्ट, संत परमानंद अस्पताल

डॉ. अंशुल वार्ष्णेय, सीनियर कंसल्टेंट, फिजिशन


संडे नवभारत टाइम्स में प्रकाशित, 21.03.2021

Tuesday, 16 March 2021

सृष्टि से बाहर कुछ नहीं, स्रष्टा कैसे होगा?

 चंद्रभूषण

क्या स्टीफन हॉकिंग (जन्म 8 जनवरी 1942, मृत्यु 14 मार्च 2018) हमारे दौर के आइंस्टाइन थे? जी नहीं। अच्छा होगा कि उनके फर्क को हम उनके व्यक्तित्वों से ज्यादा उनके समय, उनके दौरों के बीच सीमित करके देखें। आइंस्टाइन का दौर प्रयोगों के दौरान हुए ब्रेकथ्रू को समझने के क्रम में सृष्टि को देखने का नया नजरिया विकसित करने का था, जबकि स्टीफन हॉकिंग का दौर प्रयोगों के ठहराव से उपजे भौतिकी के सबसे बड़े और लंबे कन्फ्यूजन का था। हालांकि यह स्थिति पिछले कुछ वर्षों में बदलनी शुरू हो गई है।

खासकर यूरोपीय संघ के साझा वैज्ञानिक प्रयासों से अभी सूक्ष्म और विराट, दोनों स्तरों के निश्चयात्मक प्रेक्षण आने शुरू हो गए हैं। जिन वैज्ञानिकों के पास इन प्रेक्षणों की व्याख्या करते हुए सृष्टि के ज्यादा गहरे नियम खोजने का दम होगा, उन्हें ही अगले दौर के आइंस्टाइन जैसा दर्जा हासिल हो सकेगा। लेकिन स्टीफन हॉकिंग का अपना अलग क्लास है और सैद्धांतिक भौतिकशास्त्रियों की नई पीढ़ी में ज्यादातर लोग अल्बर्ट आइंस्टाइन बनने का सपना देखेंगे तो कुछेक निश्चित रूप से स्टीफन हॉकिंग भी बनना चाहेंगे।

एक धारणा स्टीफन हॉकिंग को वैज्ञानिक के बजाय विज्ञान प्रचारक के रूप में देखने की भी है, जो बिल्कुल गलत है। 1966 में गणितज्ञ रॉजर पेनरोज के साथ मिलकर ब्लैक होलों पर अपने गणितीय काम की शुरुआत करने से लेकर 1990 दशक के मध्य तक स्टीफन हॉकिंग गणित और मूलभूत भौतिकी की संधि पर गंभीरतम काम में जुटे रहे। इसके बीच में उनकी ऑल-टाइम बेस्टसेलर ‘द ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम’ भी आई, जिसकी कुछ धारणाओं पर वे हाल तक आगे-पीछे होते रहे। लेकिन उन्हें ब्लैक होलों को लेकर खोजे गए उनके चार नियमों के लिए जाना जाएगा, जिनके कुछ सीमावर्ती अपवाद भी बाद में उन्होंने ही खोजे। 

उनके काम के साथ एक बहुत अच्छी और एक बहुत बुरी बात जुड़ी है। अच्छी बात यह कि ब्लैक होल ऐसी चीज है, जहां भौतिकी के दोनों मूलभूत सिद्धांत थिअरी ऑफ रिलेटिविटी (सापेक्षिकता सिद्धांत) और क्वांटम मेकेनिक्स एक ही दायरे में काम करते हैं। बाकी दुनिया के लिए पहले का रिश्ता विराट से और दूसरे का सूक्ष्म से है। बुरी बात यह कि ब्लैक होलों का सीधा प्रेक्षण अभी शुरू ही हुआ है, लिहाजा उनसे जुड़े किसी सिद्धांत को सही या गलत साबित करने का कोई अचूक तरीका फिलहाल नहीं है। अलबत्ता सूक्ष्म और विराट, दोनों ही स्तरों के प्रेक्षणों की रफ्तार इक्कीसवीं सदी में इतनी तेज हो गई है कि अटकलबाजी अब ज्यादा देर टिकती नहीं। 

स्टीफन हॉकिंग का दावा था कि हिग्स बोसॉन (गॉड पार्टिकल) कभी खोजा नहीं जा सकेगा। पीटर हिग्स ने कण भौतिकी के अपने मॉडल के साथ इस पार्टिकल की प्रस्थापना 1964 में दी थी, जब स्टीफन हॉकिंग अपनी असाध्य बीमारी की शिनाख्त के बाद एक गंभीर अध्येता के रूप में फंडामेंटल फिजिक्स के दायरे में घुसे ही थे। हिग्स ने 1990 के दशक में किए गए हॉकिंग के इस दावे के खिलाफ अपनी तीखी प्रतिक्रिया में कहा था कि इस वैज्ञानिक को इसके काम की तुलना में कुछ ज्यादा ही तवज्जो मिल जाती है।

बाद में लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर के एक प्रयोग में हिग्स बोसॉन को खोज लिया गया तो हॉकिंग की काफी किरकिरी हुई। हालांकि हॉकिंग ने इस खोज के लिए हिग्स को बधाई दी और कहा कि उन्हें तत्काल नोबेल प्राइज दिया जाना चाहिए, जो अगले साल 2013 में उन्हें मिल भी गया। आइंस्टाइन के साथ हॉकिंग की तुलना पर वापस लौटें तो हॉकिंग आजीवन आइंस्टाइन के फील्ड इक्वेशंस को ही नई-नई शर्तों के साथ हल करते रहे, जो कि अभी के ज्यादातर सैद्धांतिक भौतिकशास्त्रियों का स्थायी काम है। 

दोनों की मान्यताओं के बीच टकराव सृष्टि के प्रारंभ बिंदु को लेकर निकाले गए निष्कर्षों को लेकर था। आइंस्टाइन की समझ में इस मुकाम पर किसी स्रष्टा की गुंजाइश बनी रह जाती थी, जबकि हॉकिंग के यहां वह सिरे से खारिज हो जाती थी। हॉकिंग ने साबित किया कि जिस सिंगुलरिटी से सृष्टि का प्रारंभ होता है, उसके गणित में कोई बाहरी बिंदु होता ही नहीं। ऐसे में स्रष्टा के होने की न कोई जगह बचती है, न जरूरत।

इसके अलावा अपनी किताबों में हॉकिंग ने आइंस्टाइन की सामाजिक-राजनीतिक धारणाओं की तीखी आलोचना भी की है, जिसका बतौर वैज्ञानिक उतना ज्यादा मायने नहीं है। आइंस्टाइन जब विज्ञान से दर्शन के दायरे में निकलते थे तो वहां उनकी मुलाकात घोर धार्मिक लोगों से भी होती थी। हॉकिंग के लिए दर्शन विज्ञान के भीतर की ही चीज था। सो बाहर निकल कर अवैज्ञानिक सोच के साथ बिरादराना कायम करने की कोई इच्छा या प्रेरणा उनमें कभी नहीं देखी गई।

Saturday, 13 March 2021

अंतरिक्ष में नई खेमेबंदी

 चंद्रभूषण

अमेरिका और सोवियत संघ के बीच शीतयुद्ध चल रहा था तो साथ में इन दोनों खेमों के बीच चांद पर पहुंचने की होड़ भी चल रही थी। अमेरिका ने 1969 में आसमानी लड़ाई जीती, फिर बीस साल बाद जमीनी शीतयुद्ध भी जीत लिया। जल्द ही सोवियत संघ बिखर गया और उसकी गुठली की तरह जो रूस बचा उसने दोनों खेमों के बीच सहयोग के सबूत की तरह सन 2000 में अमेरिका से मिलकर अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन (आईएसएस) चला दिया। लेकिन दुनिया की बड़ी ताकतों में रूस का नाम अब कभी भूले-भटके ही लिया जाता है।

रूस पर अपनी रही-सही निर्भरता भी अमेरिका ने पिछले साल प्राइवेट कंपनी स्पेस एक्स के जरिये आईएसएस तक सप्लाई पहुंचाकर खत्म कर ली। 2024 में आईएसएस अपनी वैज्ञानिक जिम्मेदारियों से रिटायर हो जाएगा और सुपर रिच टूरिस्टों के लिए आसमानी होटल का काम करने लगेगा। अगला स्पेस स्टेशन बना भी तो धरती के इर्दगिर्द नहीं बनेगा, इतना तय है। काफी संभावना है कि वह चांद पर या उसकी कक्षा में बनेगा और उसका उपयोग चंद्रमा से खनिज लाने या वहां से हासिल सूचनाओं के कारोबार में किया जाएगा। 

इसके लिए अमेरिका ने ब्रिटेन, कनाडा, इटली, जापान, संयुक्त अरब अमीरात और लग्जेमबर्ग के साथ मिलकर 2017 में आर्टेमिस प्रोग्राम शुरू किया था और अभी जवाबी तौर पर चीन और रूस ने मिलकर चंद्रमा के उपयोग की लगभग वैसी ही योजना बनाई है। ध्यान रहे, आर्टेमिस प्रोग्राम पर डॉनल्ड ट्रंप की गहरी छाप मौजूद है, जिसकी प्रतिक्रिया का लाभ लेने के लिए चीन-रूस की योजना दुनिया के लिए खुली रखी गई है। तीसरी बड़ी अंतरिक्षीय शक्ति यूरोपियन स्पेस एजेंसी इन दोनों खेमों में से एक में शामिल होती है या चंद्रमा पर अपना कोई अलग कार्यक्रम प्रस्तुत करती है, यही देखना है।

Monday, 15 February 2021

आर्टिफ़िशियल इंटेलीजेंस की निगरानी के शिकार!!

 एल्गोरिद्म्स

सुशोभित 

क्या आपने ग़ौर किया कि अकसर आप यूट्यूब पर कुछ सर्च करने जाते हैं, लेकिन आपकी नज़र किसी और कंटेंट पर पड़ती है और- क्या ही संयोग है कि वह आपकी दिलचस्पी का होता है- और आप उसे देखने बैठ जाते हैं। वह वीडियो ख़त्म होता है तो स्क्रीन के राइट-कॉलम में उससे मिलते-जुलते वीडियोज़ की एक लड़ी दिखाई देती है। अब आप एक-एक कर उन्हें भी देखने लगते हैं। कोई एक या डेढ़ घंटे बाद आपको ख़याल आता है कि आप जो देखने आए थे, वह तो आपने देखा नहीं, कुछ और देखने लगे।

फिर आप सोचते हैं कि वह दिलचस्प वीडियो मुझको क्यों दिखा? क्या वह मुझी को दिखा था या सभी को यूट्यूब पर जाने पर ऐसा ही दिखलाई देता है? आप याद करते हैं कि कुछ दिनों पूर्व आपने उससे मिलता-जुलता कोई कंटेंट यूट्यूब पर सर्च किया था। यूट्यूब की एल्गोरिद्म्स ने उसे याद रखा। अगली बार जब आप यहाँ पर आए तो उसने आपको आपकी पसंद की चीज़ें सुझा दीं। यह वैसे ही है, जैसे पुराने दिनों में किताबों की दुकान पर जाने पर- अगर दुकान-मालिक आपको पहिचानता है तो- आपकी रुचि की किताब निकालकर आपके सामने रख दी जाती थी, या किसी जाने-पहचाने रेस्तरां में आपको देखते ही आपकी पसंद की चीज़ें आपके सामने पेश कर दी जाती थीं। लेकिन उन लोगों के इरादों और इंटरनेट के मनसूबों में बुनियादी फ़र्क़ है।

सच यही है कि हम आर्टिफ़िशियल इंटेलीजेंस की निगरानी के शिकार हो चुके हैं। हमें लगता है कि हम देख रहे हैं, जबकि होता यह है कि हमें दिखाया जा रहा होता है। हम सोचते हैं कि यह हमारी रुचि है, जबकि होता यह है कि हमारी रुचियों को चैनलाइज़ करके उससे एक प्रोडक्टिविटी रची जाती है, क्योंकि सोशल मीडिया एल्गोरिद्म्स का एक ही मक़सद है- हमारे अटेंशन को जितना समय तक हो सके बांधकर रखना, स्क्रीन-टाइम में लगातार इज़ाफ़ा करना, डिजिटल एडिक्शन को एक दूसरे आयाम पर ले जाना, और हमारे निर्णयों को उस तरह से नियंत्रित करना कि परिप्रेक्ष्यों की हमारी समझ भोथरी होती चली जावे।

मैं अपने दो निजी अनुभवों को साझा करता हूँ। इवोल्यूशन की भाषा में इसे नेचरल सिलेक्शन और आर्टिफ़िशियल सिलेक्शन कहेंगे। पहला अनुभव यह कि बीती गर्मियों में एक दिन अचानक मैंने पाया कि मेरे यूट्यूब रेकमेंडेशन में एक वीडियो है, जिसमें एक स्थूलकाय व्यक्ति अफ्रीका के समुद्रतटीय इलाक़े में एक ज़हरीले साँप का पीछा कर रहा है। वीडियो दिलचस्प था। मैं उसे देख गया। उस यूट्यूबर का नाम डिन्गो डिन्कलमैन था, मैंने उसे सब्स्क्राइब कर लिया। कुछ दिनों बाद मेरे यूट्यूब रेकमेंडेशन्स में स्नैक-हैंडलर्स के वीडियोज़ अवतरित होने लगे- चैण्डलर और टायलर, टिम फ्रीड और कोयोटे पीटरसन, बाद उसके क्लासिकल स्टीव इर्विन, फिर लिविंग ज़ूलॉजी और नेशनल जैग्रफ़िक। मैं इन वीडियोज़ को देखता रहा और रैप्टाइल्स के बारे में मालूमात जुटाता रहा। ना उन वीडियोज़ में कुछ ग़लत था, ना रेंगने वाले सरीसृपों के बारे में मेरी दिलचस्पी बुरी थी, किंतु सवाल यह है कि यह सब कैसे शुरू हुआ था? क्या यह मैंने चुना था, या क्या यह मुझे परोसा गया था? मैंने ख़ुद से सवाल पूछा कि क्या मैं एक अचेत यूज़र की तरह उस सब कंटेंट को कंज़्यूम करता चला जा रहा था, जो एक रैंडम रेकमेंडेशन ने मेरे सामने रख दिया था? और यह तो फिर भी वाइल्डलाइफ़ वीडियोज़ थे, लेकिन अगर मैंने किसी टॉक्सिक पोलिटिकल कंटेंट वाली स्ट्रिंग को फ़ॉलो करना शुरू कर दिया होता तो?

यह जो ऑर्गेनिक एल्गोरिद्म्स हैं, जो एक रीयल-टाइम फ़ीडबैक लूप के आधार पर संचालित होती हैं और व्यूअर को ज़्यादा से ज़्यादा समय तक स्क्रीन से चिपकाए रखना चाहती हैं, इन्हें मैं- चार्ल्स डार्विन से क्षमायाचना करते हुए- नेचरल सिलेक्शन कहता हूँ। इसके सामने एक आर्टिफ़िशियल सिलेक्शन भी है। इसका अनुभव मुझको तीन साल पहले तब हुआ, जब फ़ेसबुक ने मेरा अकाउंट एक महीने के लिए बंद कर दिया और मुझको दूसरा अकाउंट बनाना पड़ा। उन दिनों मैं राजनीतिक विषयों पर लिखता था, तो उस तरह के कंटेंट में दिलचस्पी रखने वालों की रिक्वेस्ट्स मुझको नई प्रोफ़ाइल पर मिलीं, और मैं उनको एक्सेप्ट करता चला गया। फिर न्यूज़-फ़ीड में उनके अपडेट्स नुमायां होने लगे। एक महीने बाद मेरा पुराना अकाउंट बहाल हुआ तो मैं उस पर लौटा। मुझको लगा, जैसे मैं एक प्लैनेट से दूसरे प्लैनेट पर चला गया था। इस अकाउंट की न्यूज़फ़ीड दूसरे वाले से निहायत ही फ़र्क़ थी। पुरानी न्यूज़फ़ीड पर रचनात्मक लेखन, साहित्य और कला, फ़लस्फ़ाई ख़यालात और प्रमुदित मैत्रियों की पोस्ट्स दिखलाई देती थीं, नई वाली न्यूज़फ़ीड में निहायत तल्ख़ और आक्रामक लहज़े वाले राजनैतिक अपडेट्स। एक आईडी से दूसरी में लॉग-इन करके जाना तब एक देह से दूसरी देह में जाने जैसा लगता था, जो हमें दो भिन्न तरह की दुनियाओं से साक्षात कराती थीं। तब जाकर मुझको यह महसूस हुआ कि फ़ेसबुक की हमारी न्यूज़फ़ीड भी कमोबेश हमारा ख़ुद का कन्स्ट्रक्ट है।

इसको मैं आर्टिफ़िशियल सिलेक्शन इन मायनों में कहता हूँ कि सोशल मीडिया एल्गोरिद्म्स के उलट यहाँ पर हम स्वयं अपने फ्रेंड्स चुनते हैं और हमें किस तरह का कंटेंट चाहिए, उस तरह के पेजेस को हम फ़ॉलो करते हैं। जब हम फ़ेसबुक पर आते हैं तो हम किसी वैसे धरातल पर नहीं आते, जो सबके लिए एक जैसा है। यक़ीन मानिए, भिन्न-भिन्न लोगों के लिए फ़ेसबुक अलग-अलग दुनियाओं का दरवाज़ा खोलता है। बहुत कुछ इस पर निर्भर करता है कि हम किस तरह के लोगों से राब्ता रखना चाहते हैं और किस तरह का कंटेंट कंज़्यूम करना चाहते हैं। 

वॉल स्ट्रीट जर्नल में पिछले दिनों जोआना स्टर्न का एक लेख छपा, जिसमें इस बारे में गहरी चिंता जतलाई गई है। वह लेख पठनीय है। जोआना का कहना है कि सोशल मीडिया एल्गोरिद्म्स का वर्चस्व वर्ष 2016 में तब शुरू हुआ, जब ट्विटर और इंस्टाग्राम ने फ़ेसबुक और यूट्यूब के साथ मिलकर काम करना शुरू किया। एल्गोरिद्म्स की एक ऐसी व्यवस्था बनाई गई कि हर व्यक्ति अपनी धारणाओं का बंधक बनकर रह गया और- अगर नोम चोम्स्की से शब्द उधार लें तो- मैन्युफ़ेक्चरिंग ऑफ़ कंसेंट (सहमतियों के निर्माण) के एक अंतहीन चक्रव्यूह में फंस गया। चीज़ें दिन-ब-दिन ध्रुवीकृत होने लगीं, क्योंकि इन एल्गोरिद्म्स ने ऐसे क्लोज़्ड सर्किल्स का निर्माण किया, जिन्होंने एक जैसी सोच और वृत्ति वाले लोगों को एक जगह पर ना केवल साथ ला दिया, बल्कि उन्हें अपनी धारणाओं को यथावत रखने और उन्हें बलवती बनाने के लिए निरंतर फ़ीडबैक भी मुहैया कराया। जब इसमें पोस्ट-ट्रुथ (कह लीजिये, आधी हक़ीक़त आधा फ़साना) की मिलावट हुई तो यथास्थिति से हमारा जीवंत सम्पर्क ही कट गया। हम तमाशा देखते-देखते यह भूल ही गए कि हम यह देख नहीं रहे हैं, हमें यह दिखलाया जा रहा है।

आज समाज में जितनी कटुता, अधीरता, आक्रामकता और दुर्भावना है, उसके मूल में अनेक कारणों के साथ ही ये सोशल मीडिया एल्गोरिद्म्स भी हैं। इन्होंने रुचियों और धारणाओं और पूर्वग्रहों के ऐसे एकालापों का निर्माण किया है, जिसमें ऐतिहासिक और मनोगत परिप्रेक्ष्य धुंधला चुके हैं। मेरा निजी मत यह है कि इंटरनेट पर जो कुछ भी दिखलाया जाता है और सोशल मीडिया पर जो कुछ भी लिखा जाता है, उस पर एकबारगी विश्वास कभी नहीं करना चाहिए। दूसरे, उस प्रक्रिया (यानी एल्गोरिद्म्स) के प्रति सचेत रहना चाहिए, जिसने हमारे सामने एक प्रोडक्ट की तरह इस कंटेंट को परोस दिया है और भरसक वस्तुनिष्ठ तरीक़े से किनारे पर खड़े होकर उसका मुआयना करना चाहिए, उसमें कूद नहीं पड़ना चाहिए। किसी भी वाक़िये पर फ़ौरन कोई बयान देने से भरसक बचना चाहिए, क्योंकि भले हमें ऐसा भ्रमवश लगता हो, लेकिन राष्ट्र हर घटना पर हमारी त्वरित टिप्पणी की प्रतीक्षा नहीं कर रहा होता है। तीसरे, और सबसे बेहतर, डिजिटल डिटॉक्स को अपनाना चाहिए और अपने मोबाइल फ़ोन को समय-समय पर स्विच-ऑफ़ करके 'एम्प्टी टाइम' बिताना चाहिए, या अपने द्वारा कंज़्यूम किए जाने वाले कंटेंट (किताबें, फ़िल्में, संगीत) के चयन की कुंजी अपने हाथों में रखनी चाहिए।

क्योंकि यक़ीन मानिये, कोलाहल के इस कालखण्ड में आप संसार का कोई भला नहीं करेंगे, अगर चीख़-पुकार, फ़रेब, अपशब्दों और आधे सच के कारवां में अपनी ओर से और इज़ाफ़ा ही कर बैठेंगे, और वह भी यह जाने बिना कि वैसा क्यूँ कर होता जा रहा है, और उसके पीछे के कारख़ाने की सूरत और सीरत भला कैसी