Tuesday, 17 April 2018

मंगल पर जाएंगी रोबोट-मक्खियां


मुकुल व्यास 
नासा के शोधकर्ता ऐसी रोबोटिक मक्खियों का डिजाइन तैयार कर रहे हैं जो मंगल पर उड़कर वहां के बारे में नई जानकारियां जुटा सकें। अमेरिकी अंतरिक्ष प्रशासन एजेंसी ने पिछले दिनों इस परियोजना के बारे में खुलासा किया। यह परियोजना अभी आरंभिक अवस्था में है, लेकिन इसका मकसद मंगल के अन्वेषण के लिए इस समय प्रयुक्त की जा रही रोवर का बेहतर विकल्प खोजना है। रोवर के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि एक यह आकार में बड़ी और भारी भरकम होती है तथा बहुत ही सुस्त चाल से मंगल की सतह पर सरकती है। इस वजह से इसके कार्यक्षेत्र का दायरा बहुत सीमित हो जाता है। इसके अलावा रोवर के निर्माण में खर्चा भी बहुत आता है। यदि रोवर की जगह मंगल पर सेंसरों से युक्त सूक्ष्म रोबोटों को भेजा जाए तो वे सतह पर तेजी के साथ दूसरे इलाकों में जाकर कारगर ढंग से सूचनाएं एकत्र कर सकेंगे। 1इस तरह के सूक्ष्म रोबोटों के निर्माण की लागत भी बहुत कम आएगी। नासा के अधिकारियों के अनुसार इन रोबोटों का आकार अमेरिका में पाई जाने वाली बंबलबीजैसा होगा। मंगल पर भेजी जाने वाली रोबोटिक मक्खी मार्सबीकहलाएगी। मंगल पर मक्खियां भेजना ज्यादा व्यावहारिक है, क्योंकि मंगल का गुरुत्वाकर्षण कम है। पृथ्वी की तुलना में मंगल का गुरुत्वाकर्षण सिर्फ एक-तिहाई है। वैज्ञानिकों का मानना है कि वहां के पतले वायुमंडल को देखते हुए रोबोट-मक्खी अन्वेषण के लिहाज से ज्यादा बेहतर स्थिति में होंगी। ये मक्खियां न सिर्फ मंगल की सतह को नापेंगी, बल्कि उसके वायुमंडल के नमूने भी एकत्र करेंगी। उनका मुख्य लक्ष्य वहां मीथेन गैस की मौजूदगी का पता लगाना होगा। मीथेन गैस की मौजूदगी जीवन की संभावना की ओर इशारा करती है। इस समय मंगल पर सक्रिय क्यूरियोसिटी रोवर को मीथेन गैस की उपस्थिति के कुछ संकेत मिले हैं, लेकिन इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिला कि यह गैस किसी जैविक गतिविधि से उत्पन्न हो रही है या इसका निर्माण किसी और वजह से हो रहा है।रोबोट मक्खियों का इस्तेमाल मंगल पर ही नहीं, बल्कि पृथ्वी पर भी होगा। हम सभी जानते हैं कि फसलों और फल-सब्जियों के परागण में मक्खियों और कीट-पतंगों की बड़ी भूमिका होती है। दुनिया में मक्खियों की आबादी घट रही है जिसका फसल उत्पादन पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। इस समस्या से निपटने के लिए शोधकर्ता ऐसी रोबोटिक मक्खियां विकसित कर रहे हैं जो पौधों का परागण कर सकें। पिछले कुछ वषों से वैज्ञानिक मधुमक्खियों की आबादी में गिरावट रोकने के उपाय खोज रहे हैं। हमारे भोजन में प्रयुक्त एक-तिहाई पेड़-पौधों का परागण मधुमक्खियों द्वारा किया जाता है, लेकिन इन मधुमक्खियों की संख्या तेजी से कम हो रही है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के शोधार्थियों ने 2013 में पहली रोबोट मक्खी बनाई थी जो बिजली के स्नोत से जुड़ने के बाद हवा में मंडरा सकती थी। इसके बाद यह टेक्नोलॉजी तेजी से विकसित हुई। आज ये रोबोट-मक्खियां सतह पर चिपक सकती हैं और पानी में भी तैर सकती हैं और अब इनका प्रयोग मंगल ग्रह पर भी किए जाने की तैयारी है।

Facebook के सही उपयोग के कुछ सूत्र:

Dr. Avyact Agrawal

Facebook पर मैं लगभग एक वर्ष से हूँ। इस बीच ज़हाँ आप सबने बहुत प्यार दिया, मेरी किताब आपकी वज़ह से आयी और बिकी। कुछ बेहद अच्छे मित्र मिले। कुछ गहरे लेखक मिले। फिर मेरे यूट्यूब चैनल को भी एक अच्छी शुरुआत आपने
दिलवाई।

वहीँ मेरा इनबॉक्स रोज़ाना लोगों की मानसिक और शारीरिक समस्याओं  से भरा रहने लगा।

कुछ समस्याएं तो लोगों की पोस्ट और बातें सुनकर मुझे फेसबुक की ही दी हुई लगने लगीं। तो सोचा मेरे एक वर्ष के अनुभव, मनोविज्ञान और व्यक्तित्वों की समझ के अनुरूप फेसबुक का खुशहाल उपयोग के कुछ सूत्र लिखूँ। शायद कुछ लोगों के काम आएं।

1. पहला सूत्र तो यही है कि इस बात को दिल की गहराइयों तक स्वीकार कर लें कि फेसबुक आपके रोज़मर्रा के जीवन में 0.1 प्रतिशत से ज़्यादा अहमियत नहीं रखता। इसे एक मनोरंजन और ज्ञान अर्जित का अच्छा साधन मानें लेकिन रिश्ते ढूँढने और बनाने का बिल्कुल नहीं।

2. हमेशा आइडियाज़, विचार, विचार धारा  की बातें करें और ज़हन में रखें किसी व्यक्ति की बातें न करें तीसरे से। खासकर नकारात्मक चर्चा से बचें। जो पसंद नहीं उसे इग्नोर कर दें, unfriend कर दें , ब्लॉक कर दें लेकिन नकारात्मक पोस्ट करना ,स्क्रीनशॉट पब्लिक करने का अर्थ यह है कि उस व्यक्ति को आप अपने खूबसूरत ज़हन में ज़रूरत से ज़्यादा महत्त्व और ज़गह दे रहे हैं।

3. रिश्तों  और मित्रता के दो अर्थ मैं देखता हूँ,  पहला यह कि
मित्र या रिश्ता आपको यह अहसास और विश्वास दिला सके कि आपकी किसी मुश्किल में वह साथ देगा अपनी सामर्थ्य अनुसार दूसरा यह कि आपको वह आगे बढ़ते देखना चाहेगा और इसके लिए आपके मिशन या प्रोजेक्ट में अपनी सामर्थ्य अनुसार मदद करेगा। फेसबुक पर आपसे जुड़े  मित्र या कथित रिश्ते का रवैया आपके प्रति उस व्यक्ति के व्यक्तित्व की भीतर तक पड़ताल कर सकता है। इन दो criteria के अलावा मित्रता या रिश्ते के दावे झूठे होते हैं। Facebook friend से ये अपेक्षाएं नहीं होतीं लेकिन कोई दावा करे मित्रता या रिश्ते का तो इन दो पहलुओं पर उसकी परीक्षा ले लेना।
उदाहरण के लिए, मेरे किसी मित्र ने मुझसे इनबॉक्स पर किताब लिखने या स्वास्थ्य सम्बंधित जानकारी पर कोई सलाह मांगी और मैं उसे ज़वाब तक न दूं लेकिन कहूँ कि मैं तो सबका हूँ।
एक जनरल रूल यह भी है कि जो सबका हो , कम ही सम्भावना है कि वो किसी का भी होगा। क्योंकि हम मनुष्य सीमित क्षमता लिए हुए होते हैं निभाने की। हर वक़्त नए रिश्तों की तलाश में लगे लोग लाज़िमी है पुराने रिश्तों की उपेक्षा कर ही ऐसा कर सकते हैं। माँ तक 5 बच्चे पैदा कर ले तो नए पर ज़्यादा ध्यान देगी, बड़ा बच्चा माँ के समय और गोद के लिए तरसेगा, कभी पिट भी जायेगा। यह तब जब वह बराबरी से प्यार करने वाली माँ है। गुणा भाग ,हैसियत देख मित्रता करने वाला कोई व्यक्ति नहीं।
पहले तो मैं कहूँगा फेसबुक पर रिश्ते मत तलाशिये असल जीवन के रिश्ते मज़बूत कीजिये और अपने खालीपन को भरिये। हाँ कोई बहुत अच्छा मिल ही जाये तो जुड़िये लेकिन रिश्तों की फ़ौज़ नहीं होती, भगवान की तक रिश्तों की फ़ौज़ नहीं होती। राधा राधा थीं और बाक़ी गोपियाँ गोपी।

प्रकृति ने आप जैसा पूरी इंसानी सभ्यता के इतिहास में दूसरा कोई नहीं बनाया। आप बेहद uniqe हैं। इसलिए स्वाभिमान का ख़याल हमेशा रखें किसी भी रिश्ते में।

3. आपकी timeline आपके मस्तिष्क का extention है।
 उद्वेलित मन की अवस्था में कुछ भी न लिखें। लोग भले वाह वाह कह दें लेकिन आपके व्यक्तित्व का कोई भीतरी कमज़ोर हिस्सा लोगों को दिख जायेगा। और आपकी इमेज से चिपक जायेगा।

4. फेसबुक जब तक मनोरंजन करे खुशी और ज्ञान दे इस पर रहें। लेकिन दुःख देने लगे, ईर्ष्या,कुंठा,जोड़ तोड़ , recognition पाने की अदम्य इक्छा जैसी बातें मन में आने लगे तो कुछ दिन के लिए इससे दूर हो जाएं।

5. आपकी पारिवारिक जिम्मेदारी, और व्यावसायिक जिम्मेदारी
को उपेक्षित कर कभी इसे समय न दें।

6. फेसबुक पर कुछ लोग ज़्यादा लोकप्रिय हो जाते हैं। यदि आप हो गए हैं तो ज़्यादा खुश मत हो जाइए। इसका प्रभाव असल जीवन में नगण्य है। कोई भी 'फेसबुक सेलिब्रिटी' असल जीवन में एक अलग जीवन जीता है।
उदाहरण के लिए मेरी पहचान असल जीवन में मेरे शहर में एक चिकत्सक के रूप में है फेसबुक पर लिखने वाले लेखक के रूप में नहीं। आपका प्रमुख काम ही आपकी पहचान है इसलिए मुगालते मत पालिए। follower की संख्या दरअसल आपसे प्रभावित लोगों का प्रतिबिम्ब बिल्कुल भी नहीं।

7. हालाँकि यह व्यक्तिगत मसला है कि कौन क्या पोस्ट करता है और सभी मुद्दों की ज़रूरत है लेकिन फ़िर भी मुझे लगता है हिन्दू मुस्लिम , जात पात के मसले इतने जटिल हैं कि फेसबुक पर नहीं सॉल्व किये जा सकते वरन् उल्टा होता है इसका, लोग और भी नफ़रत से भर जाते हैं तार्किक दृष्टि की ज़गह। लिखना भी है तो अपने विचारों और अनुभवों को एक विनम्र, तर्कपूर्ण और विस्तारित पोस्ट का रूप दें और सही मंशा से करें जैसा कि
Tabish Siddiqui करते हैं। क्योंकि ये विषय विरोध आमंत्रित करते हैं।

8. बेहद अहम् यह कि इनबॉक्स पर चैट करने से बचें। और chat की भी है तो कम से कम् उन स्क्रीन शॉट्स को औरों को न भेजें न ही पोस्ट करें। यह व्यक्तित्व का बड़ा नकारात्मक पहलू दिखाता है। और आपकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगाता है।

9. बहसीले और नकारात्मक कमेंट करने वालों से बहस में उलझने की ज़गह सीधे ब्लॉक करें।

10. स्वाभिमान अवश्य रखें। कोई भी इतना बड़ा नहीं कि आपकी किसी भी पोस्ट को 'कभी भी' लाइक तक करने में कष्ट महसूस करे , गुणा भाग करे और आप उस पर वारे वारे जाओ।
दरअसल यह व्यव्हार एक बेहद calculatIive और स्वार्थी व्यक्तित्व की निशानी होती है। साथ ही व्यक्ति के स्वयं को आपसे बहुत ऊपर समझने के दम्भ को भी यह व्यव्हार प्रदर्शित करता है। छोटे छोटे क्लू  आपको व्यक्ति की भीतरी कोशिकाओं तक का प्रतिबिम्ब बता देते हैं बशर्ते कि आपमें नज़र हो यह देख सकने की।

11. जो अच्छा लिखे अच्छा काम करे उसकी दिल खोल कर प्रशंसा कीजिये,शेयर करिये,लाइक करिये, छोटे छोटे साथ दीजिये। जैसे मैं विजय सिंह ठकुराय का फैन उनकी किताब का इंतज़ार कर रहा हूँ जिससे मैं उसे खूब प्रमोट कर सकूं। प्रशंसा जैसी मुफ़्त की चीज़ में क्या कंजूसी करना। किसी अच्छे की प्रशंसा हमारे भीतर के अहम्,ईर्ष्या ,कुंठा को धोने का काम करती है मन साफ़ करती है। और साफ मन सुन्दर चमकते चेहरे और अच्छे स्वास्थ्य के लिए बेहद ज़रूरी है। मतलब मुफ़्त की चीज़ और बेहतरीन कॉस्मेटिक है किसी अच्छे की प्रशंसा।

12. महिलाएं वैसे तो बेहद बुद्धिमान हैं फिर भी अज़नबी पुरुषों से चैटिंग अवॉयड करें तो ज़्यादा सुख है।

13. अंत में बाहर के सुन्दर मौसम का आनंद लीजिये, ठंडी हवा को गालों से टकराने दीजिये घर की बालकनी में बैठे।
किसी बच्चे के संग खेलिए,उसे बॉल स्पिन करना सिखाइये कभी बैट पकड़ना, किसी पपी को दुलारिये, किसी पौधे को पानी दीजिये, फूल को निहारिये, नीले आसमान को देखिये, रात को तारे गिनिये, कुछ अच्छी डिश बनाइये, डांस करिये

मोबाइल स्क्रीन के परे अपनी असल दुनिया के मुद्दे ही आपके मन में  घूमना चाहिए मोबाइल से नज़र हटते ही।

मैं या मुझसा कोई कितना भी अच्छा दिखे फेसबुक पर perfect नहीं।

Wednesday, 11 April 2018

अंतरिक्ष में आलीशान होटल

मुकुल व्यास 
अंतरिक्ष पर्यटन की दिशा में यह पहला कदम तो नहीं है, लेकिन चार करोड़ डॉलर की रूसी पेशकश से काफी किफायती है
चार साल बाद लोग अंतरिक्ष में प्रवास का आनंद उठा सकेंगे। अमेरिका में ओरियन स्पैन नामक कंपनी ने 2021 में एक आलीशान अंतरिक्ष होटल को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करने की योजना बनाई है। पांच साल के भीतर लोग इस होटल में ठहरना शुरू कर देंगे, लेकिन सिर्फ बड़े-बड़े धनकुबेर ही इस होटल में ठहरने के बारे में सोच सकते हैं। कंपनी 12 दिन के प्रवास के लिए सैलानियों से करीब एक करोड़ डॉलर वसूलेगी। इस होटल में ठहरने वाले मेहमान शून्य गुरुत्वाकर्षण का अनुभव कर सकेंगे। होटल की खिड़कियों से पृथ्वी के रोमांचकारी दृश्य कैद कर सकेंगे। इसके अलावा उन्हें दिन में औसतन 16 सूर्योदय और सूर्यास्त देखने का भी का मौका मिलेगा। होटल में ठहरने वाले सैलानी अंतरिक्ष जीवन के हर पहलू का अनुभव कर सकेंगे। अमेरिकी कंपनी ने सेन जोस शहर में स्पेस 2.0 शिखर सम्मेलन में इस प्रोजेक्ट की घोषणा की। 1अरौरा स्टेशन नामक इस अंतरिक्ष होटल में एक बारी में छह लोग ठहर सकेंगे। इनमें चार यात्री और चालक मंडल के दो सदस्य होंगे। कंपनी खुद यह होटल बनाना चाहती है। हालांकि उसने अभी तक इसके प्रक्षेपण का संपूर्ण ब्योरा नहीं दिया है। समझा जाता है कि होटल का डिजाइन मॉडुलर होगा। इससे बाद में इसका विस्तार करने में आसानी होगी। कंपनी के सीईओ फ्रेंक बंगर के अनुसार यह होटल प्रक्षेपण के तुरंत बाद काम करने लगेगा। अरौरा स्टेशन पृथ्वी के सैलानियों की मेजबानी करने के अलावा शून्य गुरुत्वाकर्षण में शोध और अंतरिक्ष में निर्माण की भी सुविधाएं भी देगा। कंपनी दूसरी अंतरिक्ष एजेंसियों को बहुत कम लागत पर अंतरिक्ष में मानव उड़ानें संचालित करने की सुविधाएं देगी। 1आगे चलकर कंपनी होटल की जगह किराये पर भी दे सकती है। बंगर ने बताया कि होटल का वास्तुशिल्प कुछ ऐसा होगा कि आवश्यकता पड़ने पर बाजार की मांग के अनुरूप उसकी क्षमता बढ़ाई जा सकेगी। अरौरा स्टेशन अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन की तुलना में बहुत छोटा होगा। इसका आकार एक बड़े प्राइवेट जेट विमान के केबिन जितना होगा। इस होटल में एक बड़े आलीशान होटल जैसी सारी व सुविधाएं होंगी, लेकिन यात्रियों को प्रवास के दौरान शून्य गुरुत्वाकर्षण में ही रहना पडेगा। होटल में ठहरने वाले लोग हाई स्पीड वायरलैस इंटरनेट के जरिये निरंतर संपर्क में रहेंगे। होटल में ठहरने वाले मेहमानों की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए कंपनी यात्रियों को तीन महीने का प्रशिक्षण देगी।1अंतरिक्ष भ्रमण को व्यावसायिक बनाने का यह पहला प्रयास नहीं है। पिछले साल रूस ने कहा था कि वह अंतरिक्ष सैलानियों को 2022 तक अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन में रुकने का मौका देना चाहता है, लेकिन रूसी पेशकश अरौरा मिशन द्वारा बताए गए खर्च की तुलना में बहुत महंगी है। रूस ने स्टेशन में एक या दो सप्ताह के प्रवास के लिए प्रति व्यक्ति चार करोड़ डॉलर का खर्च बताया था। दुनिया के अन्य अरबपतियों द्वारा संचालित कंपनियां भी अंतरिक्ष पर्यटन के लिए कुछ लुभावनी परियोजनाएं शुरू कर रही हैं। दुनिया में सबसे अमीर माने जाने वाले एमेजॉन के मुखिया जेफ बेजोस भी इसके लिए ब्लू ओरिजिन प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे हैं। 

उन्नति का मूल नहीं अंग्रेजी भाषा

संक्रान्त सानु

कोई भी समृद्ध देश अपनी भाषाओं को छोड़ कर किसी गैर भाषा के प्रयोग से विकसित नहीं हुआ। आज भी विकसित देश अपनी भाषा के आधार पर ही आगे बढ़ रहे हैं 
नयें शैक्षिक सत्र से कई राज्य स्कूलों में अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई की तैयारी कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश सरकार ने भी अंग्रेजी माध्यम के पांच हजार सरकारी स्कूल चलाने का एलान किया है। तर्क है कि अभिभावक ही अंग्रेजी माध्यम स्कूलों की मांग कर रहे हैं और इसी कारण वह हिंदी माध्यम स्कूलों को अंग्रेजी माध्यम में बदल रही है।इस पर यह प्रश्न उठेगा ही कि आखिर अभिभावक अंग्रेजी की क्यों मांग कर रहे हैं? और क्या ऐसी मांग को पूरा करना राज्य और देश के हित में है? आज अंग्रेजी व्यवसाय, नौकरी और विज्ञान एवं तकनीक से जुड़ गई है। इस सबके फलस्वरूप वह समाज में सम्मान का प्रतीक बन गई है। ऐसे में अंग्रेजी की ओर रुझान स्वाभाविक ही लगता है, लेकिन हम यह नहीं पहचान रहे हैं कि अंग्रेजी के महत्व का एक भ्रम जाल सा फैलाया गया है। इसकी जड़ में सरकार की गलत नीतियां हैं।भारत में अंग्रेजी का वर्चस्व वैश्विक अनिवार्यता के कारण नहीं है। विश्व के समृद्ध देश अपनीअपनी भाषाओं का प्रयोग कर रहे हैं और निज भाषा ही उनकी उन्नति का मूल है। मुझे विश्व के करीब 35 देशों में जाने का अवसर मिला और मैंने यह पाया कि हर एक विकसित देश अपनी भाषा के आधार पर आगे बढ़ रहा है। कोई भी विकसित देश जन भाषाओं को छोड़कर किसी गैर भाषा के प्रयोग से विकसित नहीं हुआ। हर विकसित देश तकनीक-विज्ञान और व्यवसाय में जन भाषा का प्रयोग कर रहा है। अपनी ही भाषा के आधार पर इन देशों में नौकरियां भी मिलती हैं और उच्च कोटि का शोध भी होता है। आखिर इस सबके बावजूद भारत में अंग्रेजी का बोलबाला क्यों है?अंग्रेजी-माध्यम के स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने की होड़ क्यों है? यह इसलिए है, क्योंकि सरकार की नीतियों ने अंग्रेजी को ऊंचे ओहदे पर कायम रखा है।
सरकार उच्च कोटि के सभी संस्थान आइआइटी, आइआइएम, एम्स इत्यादि केवल अंग्रेजी माध्यम में चलाती है। सरकार की नीति के कारण ही अधिकतर उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय केवल अंग्रेजी में कार्य करता है। भारत सरकार अधिकतर परीक्षाओं में अंग्रेजी को माध्यम ही नहीं बनाती, अपितु अनिवार्य भी करती है। एसएससी जैसी परीक्षा के लिए भी अंग्रेजी अनिवार्य है। इसका परिणाम यह निकलता है कि विद्यार्थियों का सबसे अधिक परिश्रम विषय समझने की जगह अंग्रेजी से जूझने में निकल जाता है। यह भावुक बात नहीं है, बल्कि वैज्ञानिक सत्य है। अनेक वैज्ञानिक शोध यह साबित कर चुके हैं कि मातृभाषा में पढ़ने से बच्चे की बुद्धि का सबसे अच्छा विकास होता है। दशकों से यूनेस्को का भी यही विमर्श है।भारत में भी हाल में आइबीसी के शोध ने साबित किया कि आंध्र प्रदेश में तेलुगु माध्यम में पढ़ रहे बच्चों की विज्ञान और गणित की समझ अंग्रेजी-माध्यम में पढ़ रहे बच्चों से कहीं अच्छी थी। जापान, रूस, चीन आदि देश अपनी भाषा में उच्च शिक्षा देने के कारण ही बहुत तेजी से विज्ञान और तकनीक में प्रगति इसीलिए कर रहे हैं, क्योंकि वहां छात्रों को अपनी भाषा में विषय को समझने में आसानी होती है। इसके विपरीत देश में अंग्रेजी का वर्चस्व विकास का सबसे बड़ा अवरोधक बन गया है। हम देश की बुद्धि का हरण कर रहे हैं और अंग्रेजी लाद कर बच्चों को मानसिक विकलांग बना रहे हैं। इन गलत नीतियों के कारण ही अभिभावक अंग्रेजी के पीछे दौड़ रहे हैं।
समस्या अभिभावकों की नहीं है, समस्या गलत व्यवस्था की है। आखिर इसका समाधान क्या है? हर स्तर पर भारतीय भाषाओं का विकल्प होना चाहिए,चाहे वह प्रबंधन की पढ़ाई हो या चिकित्सा की अथवा तकनीक की। सरकार को भाषा को व्यवसाय से जोड़ना होगा। हर राज्य सरकार एलान कर सकती है कि सभी निजी उद्योग सरकार से संवाद केवल उस प्रदेश की भाषा में करें। इससे भाषा की मांग बढ़ेगी। निजी उद्योग भारतीय भाषाओं में समान अवसर प्रदान करें, इसे भी नीतिगत रूप से लागू किया जा सकता है। कुछ समय के लिए भारतीय भाषा के माध्यम में पढ़े लोगों को सरकारी नौकरी में कुछ प्रतिशत आरक्षण भी दिया जा सकता है। यह भी आवश्यक है कि भारतीय भाषाओं को तकनीक के साथ जोड़ा जाए। आज जब कोई बच्चा स्कूल में कंप्यूटर सीखता है तो केवल अंग्रेजी में। वह भारतीय भाषाओं में टाइप करना तक नहीं जानता। अपनी भाषा में तकनीक की जानकारी से सृजन शक्ति बढ़ेगी, नए-नए आविष्कार होंगे।
भाषा को केवल पुरातन संस्कृति या साहित्य ही नहीं, आधुनिकता का भी वाहक बनाना अनिवार्य है। अंग्रेजी सीखने में कोई आपत्ति नहीं है। सरकार अपने स्कूलों में भाषा के रूप में अंग्रेजी सिखाए। समस्या तब आती है जब अंग्रेजी को माध्यम बना दिया जाता है। जब बच्चे को भाषा ही नहीं आती तो वह उस भाषा में कोई अन्य विषय कैसे सीखेगा? क्या सरकार ने इस पर वैज्ञानिक रूप से कोई शोध किया है? सरकारें आठवीं कक्षा में अंग्रेजी माध्यम सरकारी स्कूलों को हिंदी माध्यम के सरकारी स्कूलों से माप लें। किन स्कूलों के बच्चे गणित को ज्यादा अच्छी तरह समझते हैं?
मैंने अनेक वर्षों तक कई देशों में कंप्यूटर के क्षेत्र में सक्रियता से काम किया है। आज इजरायल कंप्यूटर में बहुत आगे है। वहां पर तकनीक की पढ़ाई हिब्रू भाषा में होती है। मैंने माइक्रोसॉफ्ट में रूस के कंप्यूटर इंजीनियरों को नौकरी दी। उन्हें न के बराबर अंग्रेजी आती थी, लेकिन कंप्यूटर विज्ञान में अंग्रेजी नहीं, बल्कि गणित और तर्क की समझ चाहिए। आज चीन चीनी भाषा में कंप्यूटर विज्ञान की शिक्षा देकर अमेरिका से भी आगे निकल रहा है। गणित और तर्क की इस दुनिया में अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम में धकेलकर हम उन्हें पीछे ही रख रहे हैं।यदि भारत सरकार हर राजकीय भाषा में एक-एक आइआइटी और आइआइएम खोल दे तो भारतीय भाषाओं का दर्जा और समाज में उसके प्रति रुचि तत्काल बढ़ जाएगी। कल को अगर उत्तर प्रदेश सरकार एलान कर दे कि निजी उद्योगों के टेंडर केवल हिंदी में ही मान्य होंगे तो अगले दिन ही निजी उद्योगों में हिंदी की मांग बढ़ जाएगी और इसी के साथ सभी की रुचि हिंदी के प्रति बढ़ जाएगी। सबसे बड़ी जनसंख्या वाला प्रांत उत्तर प्रदेश यदि एक देश होता तो आबादी के लिहाज से विश्व का सातवां सबसे बड़ा देश होता। इससे कहीं छोटे-छोटे देश अपनी भाषाओं में सब काम कर रहे हैं। विश्व की वास्तविकता अंग्रेजी नहीं है। विश्व के तमाम बहुराष्ट्रीय उद्योग भी अंग्रेजी पर आधारित नहीं हैं। वैश्वीकरण अंग्रेजीकरण नहीं है। हमने भारतेंदु हरिश्चंद्र की इन पंक्तियों को केवल भावुक ही मान लियानिज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
यह केवल भाव नहीं, एक वैज्ञानिक तथ्य है। यह एक भ्रम समाज में व्याप्त हो गया है कि अंग्रेजी से ही हमारी उन्नति होगी। सरकार का काम इस भ्रम को दूर करना है न कि उसमें शामिल होना, लेकिन उस राष्ट्रवादी सोच की सरकार को क्या कहें जो अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार अपनी जड़ें काटने पर तुली है? सरकार को अंग्रेजी की भेड़- चाल छोड़ एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। (लेखक आइआइटी स्नातक , माइक्रोसॅाफ्ट के पूर्व अधिकारी और भारतीय भाषाओं में विज्ञान  की पुस्तकों के प्रकाशक हैं

Friday, 6 April 2018

भालू और उसका भोजन


स्कंद शुक्ला  
सबकें देह परम प्रिय स्वामी !
( हे स्वामी ! सबको अपनी देह परम प्रिय है। )
--- तुलसीकृत रामचरितमानस का सुन्दरकाण्ड , जहाँ हनुमान् रावण से कह रहे हैं।
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भारतीय उपमहाद्वीप में मिलने वाली तीन भालू-प्रजातियों में प्रमुख स्लॉथ-भालू है और यह कीड़े चाव से खाता है। दीमक-चींटियाँ , उनके अण्डे व लार्वे इस भालू का प्रिय भोजन हैं। कारण कि कीड़े पृथ्वी पर मौजूद उन कुछ भोज्य-पदार्थों में से हैं , जो प्रोटीन का सबसे समृद्ध स्रोत हैं। मांस-दालों से कहीं अधिक।
सो भालू के लिए आसान है अपने लम्बे नाखूनों से दीमक की बाँबियाँ खोदना , उनमें अपनी नाक के ज़ोर से हवा फूँकना कि वे छिन्न-भिन्न हो जाएँ और फिर किसी वैक्यूम-क्लीनर की तर्ज़ पर अपनी लम्बी जीभ व निचले होठ की सहायता से एक झटके में ही दीमकों को मुँह के भीतर खींच लेना। जो प्रोटीन बड़े श्रम के बाद शिकार से मिलता , वह प्रचुरता के साथ इस रीछ को कीड़े खाने से मिल गया।
अचम्भा मुझे इससे अधिक तब हुआ , जब मैंने जाना कि संसार की सात अरब आबादी में से दो अरब कीटभोजी है। हम मनुष्य हैं और हमारा आहार विज्ञान से अधिक संस्कृति तय करती है। जो जहाँ जिस परिवार-समाज-धर्म-जाति-देश में पैदा हो गया है, उसकी रीतियों-मान्यताओं को सही सिद्ध करने में एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा देगा और दूसरे के आहार-व्यवहार में मीनमेख निकालने लगेगा।
बहरहाल। कीड़े संसार-भर के अलग-अलग देशों में शौक़ से खाये जाते हैं। अफ़्रीकी देशों में। सुदूर पूर्व में। दक्षिण-पूर्व एशिया में। और इसके कारण कई हैं , जिनमें स्वाद सबसे महत्त्वपूर्ण नहीं।
पहला और सबसे महत्त्वपूर्ण कारण खाद्यान्न-संकट है। अकाल और गृहयुद्ध से जूझते तमाम देश मनमरज़ी से खेती पर ध्यान नहीं दे सकते। कृषि संरचनात्मक काम है , जो मानवीय शान्ति और प्राकृतिक सहयोग माँगती है। लेकिन जहाँ यह सम्भव नहीं , वहाँ क्या किया जाए !
जानवरों का मांस भी यों ही नहीं मिल जाता। जानवर यानी पालतू पशु। यानी बड़े चारागाह। अगर चरने के स्थान नहीं , तो पशुपालन नहीं। तो फिर ऐसे में मांस का विकल्प भी सीमित होने लगता है।
कीड़ों में तमाम विकल्प हैं। वे प्रोटीन का पृथ्वी पर समृद्धतम स्रोत हैं , बड़ी तादाद में आसानी से जन्म लेते हैं। नतीजन मानव-भोजन में उनका स्थान बन जाना अकारण नहीं सोचा गया। एफडीए-जैसे संस्थान ऐसे ही नहीं कह रहे कि भविष्य में हमें कीट-उत्पादन पर ज़ोर देना होगा और कीड़े हमारे आहार का महत्त्वपूर्ण अवयव होंगे।
लेकिन कीड़ों को भोजन के रूप में अपनाने में समस्याएँ भी कई हैं। कीटनाशकों के प्रयोग के कारण उनके भीतर भी इन रसायनों की मौजूदगी मनुष्य के लिए चिन्ता का विषय है। पर इसका दूसरा पक्ष यह है कि पालतू पशुओं के भोजन-रूप में प्रयोग से यह ख़तरा कहीं न्यून है। मवेशियों और परिन्दों को पालने से न जाने कितने ही मनुष्य हर साल फ़्लू और एनसेफेलाइटिस की भेंट चढ़ जाते हैं। ये बीमारियाँ आदमी को जानवर पालने के एवज़ में उपहार में मिली हैं।
एफडीए यह भी हमें बताता है कि हम अपने भोजन में बहुत कुछ ऐसा खा जाते हैं , जो हम जानते ही नहीं। अनाज में चूहों के ढेरों बाल मिलते हैं , जिन्हें कोई नहीं निकाल पाता। सब्ज़ियों में तमाम कीड़ों में अंग-उपांग हमारे भोजन में अपनी जगह अनजाने बना लेते हैं। अभी यह सब अनायास हो जाता है , आगे भविष्य की भयावहता को देखते हुए यह सब सायास करना पड़ सकता है।
सन् 2050 तक मनुष्य नौ बिलियन के क़रीब होंगे। पर्यावरण दिन-दिन प्रतिकूल हो रहा है। सबके लिए आहार एक चुनौती है , जो आगे और बड़ी होगी। ऐसे में कीड़ों को आहार-शृंखला में शामिल करना मनुष्य की आवश्यकता भी बन सकती है , चाहे आज हम इसपर लाख नाक-भौं सिकोड़ लें।
बुभुक्षितः किम् न करोति पापम् !


पीपल का पेड़ और ऑक्सीजन का मिथ


स्कन्द शुक्ला 
"पीपल के पेड़ के विषय में यह भ्रामक बात कैसे फैल गयी कि वह रात में ऑक्सीजन छोड़ता है ?"

"इसका कारण ऑक्सीजन और पीपल , दोनों को ढंग से न समझना है।"
"कैसे समझा जाए ?"
"पेड़-पौधे जानवरों की ही तरह साँस चौबीस घण्टे लेते हैं। इस क्रिया में वे ऑक्सीजन वायुमण्डल से लेते हैं और कार्बनडायऑक्साइड छोड़ते हैं। लेकिन वे सूर्य के प्रकाश में एक और महत्त्वपूर्ण क्रिया करते हैं , जिसे प्रकाश-संश्लेषण कहा जाता है। इस क्रिया में वे अपना ग्लूकोज़ स्वयं बनाते हैं वायुमण्डल की कार्बनडायऑक्साइड और जलवाष्प को लेकर। इस काम में उनका हरा रंजक क्लोरोफ़िल महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है और सूर्य का प्रकाश भी। इसी प्रकाश-संश्लेषण के दौरान ग्लूकोज़ के साथ ऑक्सीजन बनती है , जिसे वायुमण्डल में वापस छोड़ दिया जाता है।"
"यानी अगर पौधा या पेड़ हरा न हो और प्रकाश न हो , तो प्रकाश-संश्लेषण होगा नहीं।"
"बिलकुल नहीं।"
"तो ग्लूकोज़ और ऑक्सीजन बनेंगे नहीं।"
"नहीं। ज़ाहिर है रात में जब प्रकाश न के बराबर रहता है , तो यह काम प्रचुरता से होने से रहा। पीपल और उस जैसे कई अन्य पेड़-पौधे कुछ और काम करते हैं , जिसे लोग ढंग से समझ नहीं पाये।"
"क्या ?"
"पीपल का पेड़ शुष्क वातावरण में पनपता है और इसके लिए उसकी देह में पर्याप्त तैयारियाँ हैं। पेड़-पौधों की सतह पर स्टोमेटा नामक नन्हें छिद्र होते हैं जिनसे गैसों और जलवाष्प का लेन-देन होता है। सूखे गर्म माहौल में पेड़ का पानी न निचुड़ जाए , इसलिए पीपल दिन में अपेक्षाकृत अपने स्टोमेटा बन्द करके रखता है।"
"इससे दिन में पानी की कमी से वह लड़ पाता है।"
"बिलकुल। लेकिन इसका नुकसान यह है कि फिर दिन में प्रकाश-संश्लेषण के लिए कार्बन-डायऑक्साइड उसकी पत्तियों में कैसे प्रवेश करे ? स्टोमेटा तो बन्द हैं। तो फिर प्रकाश-संश्लेषण कैसे हो ? ग्लूकोज़ कैसे बने ?"
"तो ?"
"तो पीपल व उसके जैसे कई पेड़-पौधे रात को अपने स्टोमेटा खोलते हैं और हवा से कार्बन-डायऑक्साइड बटोरते हैं। उससे मैलेट नामक एक रसायन बनाकर रख लेते हैं। ताकि फिर आगे दिन में जब सूरज चमके और प्रकाश मिले , तो प्रकाश-संश्लेषण में सीधे वायुमण्डलीय कार्बन-डायऑक्साइड की जगह इस मैलेट का प्रयोग कर सकें।"
"यानी पीपल का पेड़ रात को भी कार्बन-डायऑक्साइड-शोषक है।"
"बिलकुल है। और वह अकेला नहीं है। कई हैं उस जैसे। ज़्यादातर रेगिस्तानी पौधे यही करते हैं। अरीका पाम , नीम , स्नेक प्लांट , ऑर्किड , तुलसी और कई अन्य। रात को कार्बनडायऑक्साइड लेकर उसे मैलेट बनाकर आगे प्रकाश-संश्लेषण के लिए इस्तेमाल करने की यह प्रक्रिया CAM मार्ग ( क्रासुलेसियन पाथवे ) के नाम से पादप-विज्ञान में जानी जाती है।"
"तो पीपल रात को ऑक्सीजन नहीं छोड़ता , वह वायुमण्डल से कार्बनडायऑक्साइड बटोरता है ताकि दिन में अपनी जल-हानि से बच सके।"
"यही।"


Wednesday, 4 April 2018

ऑक्सीजन के निर्माण का सच


स्कन्द शुक्ला 
"कई लोग ऐसा क्यों सोच लेते हैं कि पेड़-पौधे रात को ऑक्सीजन छोड़ सकते हैं ?"
"क्योंकि ये लोग यह नहीं जानते कि ऑक्सीजन का निर्माण बिना प्रकाश के करना लगभग किसी जीव के वश का नहीं।"
"आपने 'लगभग' क्यों लगाया ?"
"क्योंकि डच वैज्ञानिकों ने गहरे समुद्र में कुछ ऐसे जीवाणुओं का पता लगाया है , जो अन्धकार में भी ऑक्सीजन बनाते और छोड़ते हैं। ऑक्सीजन-निर्माण में ये जीवाणु नाइट्राइट रसायनों का इस्तेमाल करते हैं।"
"कैसे ?"
"नाइट्राइट की संरचना देखेंगे , तो पाएँगे कि उसमें ऑक्सीजन है। जीवाणु उसे रासायनिक अभिक्रियाओं द्वारा मुक्त कर देते हैं।"
"यह खोज कैसे महत्त्वपूर्ण हुई हमारे लिए ?"
"यह खोज दो जानकारियों के अपवाद प्रस्तुत करती है। पहली जानकारी यह कि बिना प्रकाश के ऑक्सीजन पौधे बना ही नहीं सकते। यह सत्य है कि 'पौधे' नहीं बना सकते , क्योंकि जीवाणु पौधे नहीं हैं। वे प्रोकैर्या कहलाते हैं। लेकिन कोई नहीं बना सकता , यह अतिवाद है। इन जीवाणुओं ने समुद्र के गहरे अँधेरे में ऑक्सीजन को बनाया और छोड़ा है।"
"और दूसरा अपवाद ?"
"दूसरी जानकारी यह है कि ऑक्सीजन प्रकाश में भी पेड़-पौधे तभी बना सकेंगे , जब उनमें पर्णहरित यानी क्लोरोफ़िल होगा। लेकिन इन जीवाणुओं में कोई हरियाली नहीं। फिर भी इन्होंने ऑक्सीजन बना डाली। इसका अर्थ यह कि अँधकार में हुआ यह ऑक्सीजन-निर्माण दोनों महत्त्वपूर्ण घटकों प्रकाश और क्लोरोफ़िल की अनिवार्यता को भंग करता है।"
"इसका सम्पूर्ण आशय हमारे लिए क्या हुआ ?"
"इसका अर्थ यह निकालिए कि जब इस धरती पर कोई जानवर तो जानवर , हरा पेड़-पौधा भी न था , तो ऑक्सीजन कैसे बनी होगी। जानवर-पेड़-पौधे यों ही नहीं पैदा हो गये , उनके होने के लिए हालात पहले बने। हालात किसने बनाये ? पेड़-पौधों ने ऑक्सीजन हमें दी , आज भी दे रहे हैं। लेकिन धरती पर बनी पहली ऑक्सीजन उन्होंने नहीं बनायी। कारण कि वे ऑक्सीजन छोड़ते तो हैं , लेकिन स्वयं प्रयोग में भी लाते हैं। तो वे जीव ऑक्सीजन के पहले निर्माता रहे होंगे , जिन्होंने ऑक्सीजन केवल छोड़ी , किन्तु इस्तेमाल नहीं की।"
"यानी ऑक्सीजन उनके लिए अपशिष्ट थी।"
"यही। उन जीवाणुओं ने हमारी धरती को इस लायक बनाया कि इस पर हरियाली उग सके। फिर उनका ऑक्सीजन-निर्माणक-उत्तरदायित्व हरे पेड़-पौधों ने ले लिया।"
"आज भी उन एककोशिकीय पुरखों के वंशज गहरे समुद्र में मिलते हैं।"
"हाँ। विज्ञान किसी जीव के जन्म से पहले उसके अनुकूल पर्यावरण की बात करता है। वह यह नहीं कहता कि जीव सीधे अचानक उपज गया। जन्म के पहले हवा-पानी-मिट्टी उसके अनुकूल न होते , तो क्या जीव जन्मता ? क्या मनुष्य यों ही पैदा हो गया ? या कोई पौधा ? या कोई भी जानवर या पेड़ ? नहीं। पहले इन सब के लिए माहौल बना।"
"और इन्हीं माहौल बनाने वाले जीवाणुओं के बारे में हम नहीं जानते।"
"क्योंकि हम बहुत स्थूल और आत्मकेन्द्री सोच वाले लोग हैं।"

( चित्र में गहरे समुद्र का एक गर्म गीज़र। ऐसे ही गीज़रों में ऑक्सीजन का निर्माण पहले-पहल धरती पर हुआ होगा। ) 



अब समुद्र को गर्म करनें में जुटी दुनियाँ


स्कन्द शुक्ला 
"मान लीजिए कि आप किसी सौ-मंज़िला अट्टालिका की सबसे ऊँची मंज़िल पर रहते हैं। लेकिन आपके राशन का स्टोर-रूम बेसमेंट में है , जबकि रसोईं वहीं आपके पास सौवीं मंज़िल पर। तो ऐसे में क्या होगा आपके साथ ?"
"मुश्किल होगी।"
"कितनी मुश्किल होगी ?"
"बहुत।"
"आप कैसे व्यवस्था करेंगे ?"
"ऊपर-नीचे बहुत दौड़भाग करनी होगी।"
"और दौड़भाग न हो पायी या न कर पाये तो ? याद रखिए कि इस बिल्डिंग में भोजन की कोई और व्यवस्था नहीं।"
मित्र अब चुप हैं और सोच में पड़ गये हैं। 
"मैं बताता हूँ। आप मर भी सकते हैं। भूख से। चोट से।"
"आपने यह उदाहरण क्यों दिया ?"
"क्योंकि पृथ्वी के समुद्रों में यही बुरा खेल चल रहा है। रोज़। और इसके ज़िम्मेदार हम हैं।"
"कौन सा खेल ? कैसी ज़िम्मेदारी ?"
"पृथ्वी पर जानवरों के लिए ऑक्सीजन कौन पैदा करता है ?"
"पेड़-पौधे।"
"कौन से पेड़-पौधे सबसे ज़्यादा ऑक्सीजन पैदा करने में योगदान दे रहे हैं ?"
"यही जो हमारे आसपास हैं।"
"नहीं। न पीपल , न बरगद , न नीम , न आम , न जामुन। वे हैं समुद्री नन्हें एककोशिकीय जीव जिन्हें फ़ाइटोप्लैंक्टन कहा जाता है। उनमें पर्णहरित या क्लोरोफ़िल होता है। और वे समुद्र की सबसे ऊपरी सतहों पर रहते हैं , जहाँ सूरज के प्रकाश को पाकर वे प्रकाश-संश्लेषण करते हैं। पृथ्वी की आधी ऑक्सीजन इन्हीं नन्हें जीवों की पैदावार है।"
"तो फिर इनके लिए समस्या क्या हो रही है ?"
"समस्या यह है कि इन प्लैंक्टनों के पोषक तत्त्व नीचे समुद्री तलहटी पर मिलते हैं। और इनका निवास समुद्री सतह पर है। समुद्र के तल का पानी ठण्डा होता है समुद्र की सतह के पानी से। लेकिन यह अन्तर थोड़ा होता है। इस कारण समुद्री जल ऊपर-नीचे होता रहता है। ताकि इन जीवों को पोषक तत्त्व भी मिलते रहें और इनका प्रकाश-संश्लेषण भी चलता रहे।"
"तो मनुष्य ने क्या बुरा किया इनके साथ ?"
"मनुष्य ने समुद्रों को गर्म करना शुरू कर दिया और अम्लीय भी। उसने फैक्ट्रियाँ चलायीं , डीज़ल-पेट्रोल फूँके। नतीजन वायुमण्डल में गर्माहट बढ़ी , जिसे सागरों-महासागरों से सोख लिया। इस कारण वे गर्म हो उठे और वायुमण्डल की गैसों ने उन्हें अम्लीय कर दिया।"
"तो ?"
"तो यह कि सतह का गर्म पानी इतना अधिक गर्म है कि अब वह नीचे नहीं जाता। और नीचे का ठण्डा पानी ऊपर नहीं उठ पाता। नतीजन प्लैंक्टनों को एक-साथ पोषक तत्त्व पाने और प्रकाश-संश्लेषण करने में समस्या आ रही है। वे ऊपर रहें कि नीचे जाएँ ? कैसे जिएँ ? कैसे ऑक्सीजन बनाएँ ?"
"वे कैसे जी रहे हैं ?"
"वे नीचे जा रहे हैं। नष्ट भी हो रहे हैं बड़ी मात्रा में। लगभग एक-तिहाई से अधिक नष्ट हो चुके हैं। लेकिन फिर वे ऊपर रहकर ऑक्सीजन नहीं बना पा रहे।"
"तो इसमें तो हमारी ही हानि है।"
"हाँ। पर क्या मनुष्य अपनी हानि समझने योग्य प्रजाति है ? आपको लगता है कि लोग सचमुच वयस्क हैं कि वे अपनी वास्तविक हानियों पर बात कर सकें ?"
"अगर हम फ़ैक्ट्रियों के प्रदूषण पर नियन्त्रण कर लें ? डीज़ल-पेट्रोल का प्रयोग सीमित करने की कोशिश करें ? तब तो प्लैंक्टनों की मौत थमेगी न ? समुद्र फिर ठण्डे होंगे पहले जैसे ?"
"समुद्रों को अपने पूर्व के सामान्य ताप पर पहुँचने में हज़ार साल तब भी लग जाएँगे , ऐसा वैज्ञानिक मानते हैं। पापों का प्रायश्चित्त इतनी जल्दी नहीं होता।"

---- ये जब्र भी देखा है , तारीख़ की नज़रों ने
लम्हों ने ख़ता की थी , सदियों से सज़ा पायी।

( मुज़फ़्फ़र रज़्मी )


चक्कर आने का क्या मतलब है ?


स्कन्द शुक्ला 
जब आप कहते हैं कि मुझे चक्कर आ रहा है , तो डॉक्टर जानना चाहते हैं कि चक्कर आने से आपका मतलब क्या है।
चक्कर आना , जिसे अँगरेज़ी में वर्टाइगो कहा गया है , कई बार स्पष्ट रूप से रोगी समझकर बता नहीं पाते। ऐसे में रोग को ठीक से पकड़ने में और उसके उपचार में समस्या आती है। कुछ बातों को ध्यान में रखकर वर्टाइगो को बेहतर समझा जा सकता है।
चक्कर आने का अर्थ अगर आँखों के आगे अँधेरा छाना और गिर पड़ने की स्थिति है , तो अमूमन यह हृदय के पम्प-कार्य या ख़ून के संचार से सम्बन्धित मामला है। इसे अँगरेज़ी में सिनकपी या नियर सिनकपी कहा गया है। बहुधा ऐसा खड़े होने पर ही अधिक होता है। ठीक से ख़ून मस्तिष्क में नहीं पहुँच पा रहा। ऐसा कई बीमारियों में हो सकता है , जिन्हें हृदयरोग विशेषज्ञ जाँचों के द्वारा पहचान सकते हैं। 
चक्कर की दूसरी स्थिति रोगी का असन्तुलित होने लगना है। इसे डिसइक्विलिब्रियम कहा गया है। ऐसा होने से उसके गिरने और चोटिल होने की आशंका रहती है। असन्तुलन पैदा करने वाले रोग अमूमन मस्तिष्क के होते हैं और उन्हें न्यूरोलॉजिस्ट देखते हैं।
चक्कर की तीसरी बिरादरी शुद्ध वर्टाइगो है , जिसमें रोगी को लगता है कि उसके आसपास की चीज़ें घूम रही हैं और ऐसा होने से वह गिर पड़ेगा। यह लक्षण जिन रोगों में मिलता है , उन्हें नाक-कान-गला-रोगों के विशेषज्ञ देखते हैं।
चक्कर का चौथा प्रकार जो इन तीनों से अलग है , वह मानसिक है। वह इन सभी से भिन्न है और उसे मनोचिकित्सक द्वारा ठीक किया जाता है।
प्रयास करें कि अपने लक्षणों को और बेहतर समझें और डॉक्टर को उनसे और बेहतर अवगत कराएँ , ताकि आपके रोग की सही पहचान हो सके। लक्षणों की विस्तृत समझ बीमारी को जानने में बड़ी भूमिका निभाती है।
चक्कर आने की स्थिति में डॉक्टर रोगियों से कई बार आहार में कुछ बदलाव करने को कहते हैं। साथ ही उन्हें कुछ व्यायाम भी बताते हैं। नशे व तनाव से मुक्ति और अच्छी नींद की भी इसमें बड़ी भूमिका होती है। चक्कर की स्थिति में रोगियों को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि उन्हें किसी भी तरह चोट न लगे। वाहन चलाते समय ऐसा कई बार हो जाता है ; ऐसे में बेहतर है कि ड्राविंग से परहेज़ किया जाए।