Sunday, 5 July 2020

आम पन्ना नहीं है यह!


आम पन्ना नहीं है यह!
This is special page on MANGOES

गर्मियों के मौसम में सबसे ज्यादा पसंद किया जानेवाला फल है आम। इसे आम और खास, सभी लोग बड़े शौक से खाते हैं। यह हमारी सेहत को दुरुस्त बनाए रखने में मददगार है। अगर आप बहुत ज्यादा और बेवक्त आम खाते हैं तो इससे आपकी सेहत को नुकसान भी पहुंच सकता है। आम से जुड़ी ऐसी ही कुछ जरूरी जानकारियां एक्सपर्ट्स से बात करके बता रही हैं कविता शर्मा

आम पकाने के तरीके
कच्चे आमों को सीधे किसानों से खरीदकर ट्रकों में मंडी पहुंचाया जाता है। वहां से रिटेलर कच्चे आमों की पेटियां खरीद लेता है और बाजार की मांग के हिसाब से आम को पका-पकाकर बेचता रहता है।

1. कैल्शियम कार्बाइड (Calcium Carbide)
भारत में ज्यादातर आम इसी के उपयोग से पकाए जाते हैं। कैल्शियम कार्बाइड (Calcium Carbide) से आम पकाना काफी आसान और सस्ता होता है। कार्बाइड को आम की पेटी में रखकर एक दिन के लिए छोड़ दिया जाता है और अगले ही दिन आम पककर तैयार हो जाते हैं। कार्बाइड सेहत के लिए हानिकारक है। यह फल के अंदर मौजूद नमी के साथ मिलकर एसिटीलीन (Acetylene) गैस बनाता है, जिससे फिर एसिटाइलिड (Acetylide) बनता है। इससे गंभीर बीमारियां हो सकती हैं। फिलहाल एशिया  की सबसे बड़ी मंडी आजादपुर मंडी (दिल्ली) में कार्बाइड की खुली पुड़िया का चलन दो साल से बंद है।

2. चीनी पुड़िया (Ethephon)
आम पकाने के लिए आजकल इथेफोन (Ethephon) का इस्तेमाल किया जाता है। इसे चीन से मंगाया जाता है। यह सफेद रंग का पाउडर सैशे होता है। इस पुड़िया को हल्के गुनगुने पानी में डुबोकर आम की पेटी के बीच में रखकर छोड़ दिया जाता है। इससे निकलने वाली गैस से 18 से 20 घंटे के अंदर आम पककर तैयार हो जाते हैं। हालांकि इस प्रक्रिया में समय-सीमा का ध्यान रखना बेहद जरूरी होता है क्योंकि कम समय में आम कच्चे रह जाएंगे और ज्यादा समय में ज्यादा पकने से उनके गलने की आशंका बढ़ जाती है। अभी इसके बुरे असर के बारे में पता नहीं चला है।

3. राइपनिंग चैंबर
आम को पकाने का सबसे बेहतरीन तरीका राइपनिंग चैंबर का इस्तेमाल है। ‘सफल’ इसी का इस्तेमाल करता है। इसमें आम को बड़े चैंबर में रखकर एथिलीन गैस का कसंट्रेशन पावर 80 से 100 ppm तक रखा जाता है। इस दौरान कमरे का तापमान 18 डिग्री तक होना चाहिए। गैस में आमों को 24 घंटे तक रखा जाता है, फिर गैस बाहर निकालकर 3 दिनों तक उन आमों को यूं ही चैंबर में पड़ा रहने देते हैं। इस दौरान आम पककर तैयार हो जाते हैं। ऐसे पकने वाले आम स्वास्थ्य के लिए बिल्कुल हानिकारक नहीं होते। इस तरीके से पके आमों का स्वाद बेहद लजीज होता है।

4. घर पर पकाएं आम
अगर आप फलों के राजा आम के शौकीन हैं, लेकिन कैल्शियम कार्बाइड से पके आम आपको डराते हैं तो आपके लिए मदर डेयरी हल लेकर आई है। मदर डेयरी के 'सफल' बूथों पर आजकल कच्चे आम की पेटियां मौजूद होती हैं, जिन्हें आप खुद पकाकर मीठा रसीला स्वाद ले सकते हैं। आप अपने इस पसंदीदा अखबार नवभारत टाइम्स की खबरों से कभी-कभार पक भी जाते होंगे।😀 इसी की मदद से आप आम भी पका सकते हैं। सबसे पहले आप आमों को साफ पानी में धोकर सुखा लें। फिर अखबार में एक-एक आम अलग-से अच्छी तरह से लपेटकर सामान्य तापमान पर किसी भी गत्ते के डिब्बे, बर्तन या जार में रख दें। 3 से 5 दिन में कच्चा आम पककर तैयार हो जाएगा, वह भी केमिकल का इस्तेमाल किए बिना। ध्यान रहे कि कमरे का तापमान कम-से-कम 30 डिग्री होना चाहिए। एसी वाले कमरे में इन्हें बिल्कुल न रखें। हालांकि इस प्रोसेस में पूरी पेटी में एक-दो आम खराब भी हो सकते हैं।

बाजार में जब हम आम खरीदने जाते हैं तो अक्सर हमारे मन में सवाल उठता है कि आम मीठा होगा कि नहीं, सही तरह से पका है भी कि नहीं। सवाल यह भी रहता है कि आम को पकाने के जो अलग-अलग तरीके बाजार में उपलब्ध हैं उनकी पहचान आप किस तरह से कर सकते हैं। आइए जानते हैं कि सही तरीके से पके आम की पहचान कैसे की जाए:

ऐसे खरीदें सही आम
-देखें कि आम के ऊपर अम्लीय रस के दाग-धब्बे न हो।
- आम पर किसी रसायन के अलग-अलग सफेद या नीले निशान न हों।
- कई बार आम को इस तरह के केमिकल्स से पकाया जाता है जो हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक होते हैं। अगर आम पर समान रूप से सफेद पाउडर होगा तो वह प्राकृतिक तरीके से पका होगा। हालांकि इसे बहुत बारीकी से चेक करना पड़ेगा, लेकिन आप ऐसा करें क्योंकि हेल्थ के लिए यह बहुत जरूरी है। आम पर अगर केमिकल पाउडर होगा तो वह आम पर असमान रूप से लगा हुआ दिखेगा।
- अमूमन आम को छूकर भी उसके पकने का अंदाजा लगाया जा सकता है। पका हुआ आम थोड़ा सॉफ्ट होता है। अधपका आम कहीं से सॉफ्ट और कहीं से ठोस होगा। जबकि कच्चा आम पूरा ही ठोस होगा।
- एक दूसरा तरीका यह है कि आप आम को बिल्कुल नीचे से अंगूठे से हल्का दबाकर देखें। पका हुआ आम छूने में सॉफ्ट लगेगा। इसके लिए आपको पूरे आम को दबाकर देखने की जरूरत नहीं है।
- राइपनिंग मेथड से पके आमों का रंग एक समान होगा क्योंकि यह एक समान तापमान में पकाए जाते हैं और यह खाने में काफी स्वादिष्ट और दिखने में बेहद खूबसूरत रंग के होते हैं।

पहचानें खतरनाक आम
- आम को कैल्शियम कार्बाइड से पकाया गया है, इसका पता लगाना आसान नहीं है। फिर भी हम कुछ बातों का ध्यान रख सकते हैं:
- आम की ज्यादातर किस्मों के कुदरती पकने का सीजन मई-जून ही होता है। इसलिए इससे पहले बिल्कुल पीले आम कार्बाइड से पके ही हो सकते हैं। अप्रैल महीने में मिलने वाला आम अधिकतर इसी तरह से पकाया जाता है। हो सके तो मई से पहले आम खाने से परहेज करें।
- हर किस्म का आम अपनी खुशबू लिए होता है, लेकिन जबरदस्ती पकाए आम में खुशबू या तो होती नहीं या बहुत कम होती है। आम को सूंघ कर पता लगा सकते हैं।
- प्राकृतिक तरीके से नहीं पकाए गए आम का छिलका तो पूरी तरह पीला होगा लेकिन अंदर से वह पूरी तरह से पका नहीं होगा। इस तरह से पके आम में सूखापन होगा और जूस भी कम होगा।
- अगर पीले आम पर कहीं-कहीं हरे धब्बे या झुर्रियां-सी नजर आएं या काटने पर अंदर कहीं-से लाल, कहीं-से हल्का पीला नजर आए तो समझ जाइए कि आम में घपला है।
- अगर पानी से भरी बाल्टी में डालने पर आम तैरने लगें या ऊपर आ जाएं तो समझें कि केमिकल से पकाए गए हैं।

आम खाने के सही तरीके
...तकि केमिकल से हो सेहत को कम नुकसान
- आमों को नमक मिले गुनगुने पानी में एक-दो घंटे के लिए छोड़ दें।
- किसी बड़े बर्तन में पानी भरकर उसमें 4 चम्मच बेकिंग सोडा डाल दें। 15 मिनट के लिए आम इसमें डुबो दें। अब साफ पानी से धोकर आमों को पोंछ लें।
- एक बर्तन में गर्म पानी भरकर उसमें 2-3 चम्मच हल्दी डाल दें। जब पानी ठंडा हो जाए तो उसमें आम डाल कर घंटा भर रखें। फिर साफ पानी से धोकर खाएं।
- किसी बड़े बर्तन में पानी भरकर उसमें 1 कप सफेद सिरका डाल दें। इसमें आम भिगोकर रखें और साफ पानी से धोकर इस्तेमाल करें।
-आम खाते वक्त  उसका ऊपरवाला हिस्सा मुंह से नहीं, चाकू से काटें और वहां से कुछ बूदें रस निकालने के बाद खाएं।
- छिलके को काटने के बाद आम खाएंगे तो केमिकल का असर काफी कम हो जाएगा।

...ताकि बढ़ न जाए शुगर
आमतौर पर डायबीटीज के मरीजों को मीठी चीजें खाने के लिए मना किया जाता है। आम के सीजन में आम से परहेज रखना उनके लिए थोड़ा मुश्किल हो जाता है। ऐसे में जिन पेशट्ंस का शुगर लेवल थोड़ा कंट्रोल होता है, वे हफ्ते में दो बार एक-एक आम खा सकते हैं। लेकिन इसके साथ ही वे एक्सरसाइज करना न भूलें।

किस टाइम खाना ठीक होगा
टाइप-1 डायबीटीज पेशंट्स आम को एक स्नैक्स की तरह ले सकते हैं। आम को खाने के साथ खाने से परहेज करें। जब भी आम खाएं तो आधी चपाती कम खाएं। इससे आम और चपाती से मिलने वाली कार्बोहाइड्रेट की मात्रा का संतुलन ठीक बना रहेगा। दोपहर में खाने के बाद आप आम खा सकते हैं और ईवनिंग स्नैक्स में भी आम का सेवन किया जा सकता है।
टाइप-2 डायबीटीज के पेशंट्स को आम या मीठे फल नहीं खाने चाहिए।

आम के फायदे
आम में क्या ऐसी खासियत है कि इसे सभी फलों का राजा बना दिया गया है। दरअसल आम स्वादिष्ट होने के साथ-साथ बहुत ही गुणकारी फल है। इसमें मौजूद विटामिंस, बीटा कैरोटीन और फाइबर इसकी गुणवत्ता को और अधिक बढ़ा देते हैं। आइए जानते हैं आम खाने के फायदे:
बढ़ाता है इम्युनिटी
आम एक पोषक फल है। इससे हमारा इम्युनिटी सिस्टम ठीक बना रहता है। कई तरह के रोगों से लड़ने की क्षमता इससे बढ़ती है।
आंखों की रोशनी बढ़ाता है
आम में विटामिन ए की भरपूर मात्रा होने के कारण यह हमारी आंखों के लिए बेहद लाभकारी माना जाता है। तो आप अपने डेली रूटीन में आम को जरूर शामिल करें।
बदहजमी के लिए अच्छा
यदि आप अपच की समस्या से परेशान हैं तो ऐसे में आम आपके लिए काफी मददगार साबित हो सकता है। यह बिना पचे ही अवशोषित होने वाला फल है।
एनर्जी बढ़ाने में सहायक
मीठा खाने के लिए अक्सर मना किया जाता है लेकिन मीठे फलों को खाने से सीधे एनर्जी मिलती है। इससे आपको जल्दी थकान भी महसूस नहीं होगी।

एक दिन में कितने आम खाएं
कितने आम खाना है, यह काफी हद तक आपके रुटीन पर निर्भर करता है। अगर आप बहुत ऐक्टिव नहीं हैं और एक्सरसाइज नहीं करते हैं तो दिन भर में 2 से ज्यादा आम न खाएं। अगर आप ज्यादा आम खाना चाहते हैं तो बाकी चीजें जैसे कि कार्बोहइड्रेट (रोटी, चावल, मैदा, बेसन आदि) कम कर दें। वैसे, अगर कोई बीमारी नहीं है, वजन भी ज्यादा नहीं है और कसरत भी करते हैं तो दिन भर में 3-4 आम तक खा सकते हैं। इससे ज्यादा आम खाना सही नहीं है।

कैसे भी खा सकते हैं
आम को आप खाली पेट या खाने के बाद कैसे भी खा सकते हैं। खाते समय मात्रा का जरूर ध्यान रखें। कहा जाता है न कि अति हर चीज की बुरी होती है। इसीलिए अपनी डाइट का ख्याल रखते हुए आम खाएंगे तो यह आपके लिए फायदेमंद ही होगा।
पानी पी सकते हैं
आम खाने से पहले या बाद में पानी पी सकते हैं कि नहीं इसे लेकर लोगों में बहुत कन्फ्यूजन है। जवाब यह है कि आम खाने से पहले और बाद में, कभी भी आप पानी पी सकते हैं।

आम की प्रचलित किस्में
माना जाता है कि पूरी दुनिया में आमों की 1500 से ज्यादा किस्में हैं, जिनमें 1000 किस्में भारत में उगाई जाती हैं। हर किस्म की अपनी ही अलग पहचान, महक और स्वाद होता है लेकिन उनमें भी कुछ बेहद प्रचलित किस्म हैं, जिन्हें बड़े शौक से खाया जाता है...

अल्फांसो: इस आम को आमों का राजा भी कहा जाता है। इसे मुख्य रूप से महाराष्ट्र में उगाया जाता है। अलग-अलग राज्यों में इसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है। बादामी, गुडू, और कगड़ी हापुस आदि इसी के नाम हैं। यह मीडियम साइज का तिरछापन लिए अंडाकार और संतरी पीला रंग का होता है। इसका गूदा मुलायम और रेशारहित होता है। यह अप्रैल से जून के बीच आता है। मार्केट रेट 150 से 200 रुपये किलो है।

सिंदूरी: यह आम आंध्र प्रदेश की पैदावार है। यह मध्यम आकार का अंडाकार आम है। इस आम का ऊपरी हिस्सा लाल और बाकी हरा रंग का होता है। इसे अप्रैल-मई के महीने में खरीदा जा सकता है। मार्केट रेट 100 से 120 रुपये किलो है।

सफेदा: यह खासतौर से आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु का है। इसे बैंगनपल्ली और बेनिशान नाम से भी जाना जाता है। यह आकार में बड़ा और थोड़ा मोटा होता है। इसका रंग सुनहरा पीला होता है। यह अप्रैल और मई के महीने में आता है। इसे आमतौर से मैंगो शेक बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। मार्केट रेट 75 से 80 रुपये किलो होता है।

तोतापरी: यह मुख्य रूप से आंध्रप्रदेश का है। बाजार में यह मई में आता है। यह आकार में थोड़ा लंबा होता है। इसकी तोते की चोंच जैसी नोक निकली होती है। यह स्वाद में थोड़ा खट्टा होता है। माज़ा, स्लाइस, फ्रूटी आदि ड्रिंक्स बनाने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है। मार्केट रेट 55 रुपये किलो है।

केसर: यह गुजरात की प्रमुख किस्म है। मई के अंत में बाजारों में आसानी से यह उपलब्ध होती है। इसमें गूदा अधिक होता है और इसकी गुठली पतली होती है। खाने में बहुत मीठा और रसदार होता है। मार्केट रेट 50 से 60 रुपये किलो है।

दशहरी: यह यूपी का सबसे मशहूर आम है। यह साइज में मीडियम, लेकिन कुछ लंबा होता है। बिना कार्बाइड या मसाले से पके दशहरी आम का रंग हरा होता है। कैल्शियम कार्बाइड या अन्य किसी रसायन से पके दशहरी आम का रंग हरा और पीला मिक्स होता है। आम की यह किस्म देशभर में सबसे ज्यादा पसंद की जाने वाली किस्म है। यह जून-जुलाई महीने में उपलब्ध होता है। यह खाने में मीठा और स्वाद से भरपूर होता है। मार्केट रेट 70 रुपये किलो है।

लंगड़ा: यह किस्म यूपी-बिहार में खूब पॉपुलर है। मध्य जून से जुलाई मध्य तक यह आता है। यह मीडियम अंडाकार साइज का होता है। इसका रंग हरा होता है और इसमें रेशे कम होते हैं। इसे ज्यादा दिन तक सुरक्षित नहीं रखा जा सकता है। इसका मार्केट रेट 70 रुपये किलो है।

चौसा: यह यूपी की फसल है। मुख्य रूप से जुलाई से अगस्त महीने में आता है। साइज में मीडियम अंडाकार और थोड़ा पतला होता है। इसका रंग पीला होता है। यह बेहद रसदार और मीठा होता है। मार्केट रेट 100 रुपये किलो है।

डिंगा: यह लखनऊ की प्रसिद्ध उपज है। यह आकार में थोड़ा छोटा अंडाकार और गोल्डन सुनहरे रंग का होता है। इस आम को आमतौर पर चूसकर खाया जाता है। जुलाई से अगस्त के बीच यह आता है। खाने में स्वादिष्ट मीठा और रेशेदार होता है। मार्केट रेट 50 रुपये किलो है।

फजली: यह आम सीजन का सबसे अंतिम आम होता है। लोग अगस्त तक इसका स्वाद लेते हैं। आम का सीजन जब खत्म हो जाता है तब यह आता है। मार्केट रेट 80 से 90 रुपये किलो है।

नोट: आम की कीमतें इलाके के हिसाब से कम-ज्यादा हो सकती हैं।

ज्यादा जानकारी......
वेबसाइट
mango.org
यहां से आपको आम की क्वॉलिटी चेक करने से लेकर इससे जुड़ी तमाम जानकारियां मिल सकती हैं।
tarladalal.com
इस वेबसाइट पर आपको आम से बनी सैकड़ों रेसपी मिलेंगी, जिनमें मैंगो कुल्फी, मैंगो श्रीखंड, मैंगो बर्फी, मैंगो जैम और भी ना जाने क्या-क्या हैं।
allrecipes.com
यहां आपको मैंगो लस्सी, मैंगो शर्बत, मैंगो आइसक्रीम और भी ढेर सारी डिश बनाने के तरीके मिलेंगे। 300 से भी ज्यादा व्यंजनों में कई तरह के अचार और चटनी भी हैं।

फेसबुक पेज
Mango Lovers
आम से बनने वाले अलग-अलग तरह के व्यंजन इस फेसबुक पेज पर आपको मिल जाएंगे।

मोबाइल ऐप
Hebbar's Kitchen
इस ऐप में आपको आम से जुड़ी कई तरह की अच्छी डिश बनाने के टिप्स मिल सकते हैं। खासियत यह है कि यहां पर आपको विडियो मिलेंगे और यह ऐप एंड्रॉयड और आईओएस, दोनों के लिए हैं।

यू-ट्यूब चैनल
NishaMadhulika
इस यू-ट्यूब चैनल पर आम से जुड़े ढेर सारे व्यंजन मिलेंगे। शाकाहारी लोगों को यह चैनल खासतौर पर पसंद आएगा। इसी नाम से वेबसाइट भी है।
Sanjeev Kapoor Khazana
शेफ संजीव कपूर के इस चैनल पर आपको मिलेगीं आम की तमाम डिश, जो न सिर्फ खाने में स्वादिष्ट हैं, बल्कि बनाने में आसान भी हैं।

संडे नवभारत टाइम्स में प्रकाशित

Saturday, 23 May 2020

खतरे में वेलविट्शिया

चंद्रभूषण
ऑस्ट्रियन वनस्पतिशास्त्री और चिकित्सक फ्राइडरिख वेलविट्श उन्नीसवीं सदी के मध्य में किसी दिन अंगोला के अटलांटिक तटीय रेगिस्तान में घूम रहे थे कि नंगे सख्त पहाड़ों और तपती रेत से भरे इस निचाट इलाके में अचानक उन्हें एक पौधा दिख गया। लंबी हरी-सूखी पत्तियों के बेतरतीब ढूह के बीच लाल-बैंगनी फल जैसी चीजें। उस पौधे ने वेलविट्श को इतना चकित किया कि कुछ देर वे वहीं आंखें मूंदे बैठे रहे। यह सोचकर कि अगर यह उनका भ्रम हुआ तो आंख खोलते ही गायब हो जाएगा।

संसार की कुछ सबसे पुरानी, विचित्र और विलुप्ति के कगार पर खड़ी वनस्पतियों में आज इस वेलविट्शिया मिराबिलिस की गिनती होती है। इसे और चाहे जो भी कहें, पौधा तो नहीं कहना चाहिए क्योंकि इनकी औसत उम्र 300 साल से ज्यादा होती है और इनमें कुछ तो 2000 साल से भी ज्यादा पुराने हैं। वनस्पतिशास्त्रियों के बीच वेलविट्शिया को जिंदा जीवाश्म कहने का चलन है क्योंकि यह जुरासिक युग की वनस्पति है, जब दुनिया में फल-फूल जैसा कुछ होता ही नहीं था। चीड़ की तरह सारे पेड़-पौधे सीधे अपने बीज बनाया करते थे।

वेलविट्शिया का डेढ़ से लेकर छह फुट तक ऊंचा तना होता है, जिससे सिर्फ दो पत्तियां निकलती हैं और वे सैकड़ों, हजारों साल तक बढ़ती, सूखती, टूटती चली जाती हैं। गहरी जड़ों के बावजूद जिंदा रहने के लिए ओस और कोहरे से नमी जुटाने वाले इस रफ-टफ पेड़ का ग्लोबल वार्मिंग कुछ नहीं कर पाएगी, ऐसा वैज्ञानिक हाल तक मानते थे। लेकिन अभी उनका अध्ययन बता रहा है कि इसका यह सदी पार कर लेना भी एक चमत्कार होगा।

Saturday, 16 May 2020

भौतिकी का पांचवां बल

चंद्रभूषण
क्या भौतिकशास्त्र की बुनियाद हिलने वाली है? एक सदी से जो सिद्धांत इसे थामे हुए हैं, क्या उनमें भारी रद्दोबदल का वक्त आ गया है? एक विचित्र खीझ पिछले कई दशकों से भौतिकशास्त्रियों को लपेटे में लिए हुए है। 1920 के दशक में स्थापित दो सिद्धांतों थिअरी ऑफ रिलेटिविटी और क्वांटम मेकेनिक्स के जरिये सूक्ष्म से लेकर विराट तक लगभग हर प्रेक्षण की व्याख्या हो जाती है। हालांकि इन सौ सालों में प्रेक्षणों का स्तर दोनों पैमानों पर बहुत आगे जा चुका है।

समस्या दो जगहों से आ रही है। सिद्धांत के स्तर पर यह कि थिअरी ऑफ रिलेटिविटी जिस गुरुत्व के इर्दगिर्द घूमती है, उसकी क्वांटम मेकेनिक्स में कोई व्याख्या नहीं है। और व्यवहार के स्तर पर यह कि कुछ बड़े प्रेक्षणों की व्याख्या न क्वांटम मेकेनिक्स के पास है, न थिअरी ऑफ रिलेटिविटी के पास। मसलन, ब्रह्मांड का फैलना। प्रेक्षण बता रहे हैं कि यह 72 किलोमीटर प्रति सेकंड प्रति मेगापारसेक की रफ्तार से फैल रहा है। यानी हमसे 33 लाख प्रकाश वर्ष दूर स्थित नीहारिकाएं 72 किमी प्रति सेकंड की रफ्तार से दूर भाग रही हैं और वे 33 करोड़ प्रकाश वर्ष दूर हुईं तो उनके दूर भागने की रफ्तार 7200 किमी प्रति सेकंड है।

भौतिकी के चार मूल बलों में सभी की प्रवृत्ति पास खींचने की ही है। दूर भगाने का गुण सिर्फ विद्युत चुंबकीय बल में है, वह भी तब जब समान आवेश वाले पिंड आसपास हों। ग्रहों, तारों, नीहारिकाओं पर कोई आवेश होता नहीं, फिर यह कौन सा अज्ञात बल है जो उन्हें एक-दूसरे से दूर भगा रहा है? हंगरी के भौतिकशास्त्री अत्तिला क्रास्नाहोर्के 2015 से इस पांचवें बल की बुनियाद सूंघ लेने का दावा कर रहे हैं, हालांकि उन्हें गंभीरता से लेने की शुरुआत पिछले साल ही हुई है।

Saturday, 2 May 2020

ओजे-287 और देसी दिमाग


चंद्रभूषण
पिछले 130 वर्षों से ओजे-287 खगोलशास्त्रियों के लिए चुनौती बना हुआ है। कर्क राशि में प्लूटो जितनी चमक वाली एक चीज आकाश कुसुम की तरह अचानक उभरती है, फिर 12 साल के लिए गायब हो जाती है। बाद में गहरे प्रेक्षणों से पता चला कि दो तेज चमक के बीच मौजूद यह 12 साल का फासला भी हर बार न सिर्फ लगभग 20 घंटे कम हुआ जाता है, बल्कि हर तेज चमक के कुछ समय बाद एक हल्की चमक भी दर्ज की जाती है।

मामले का और बड़ा उलझाव इस प्रेक्षण के साथ शुरू हुआ कि ज्यादा चमक और कम चमक के बीच का समयांतराल निश्चित नहीं है। कभी यह एक साल नापा जाता है तो कभी बढ़ते-बढ़ते दस साल तक चला जाता है। 1891 में पहली बार यह चीज खगोलशास्त्रियों के सामने नमूदार हुई थी। तब से अब तक तकनीक और प्रस्थापना, दोनों दृष्टियों से उनका शास्त्र बहुत आगे जा चुका है। समझ यह बनी है कि ओजे-287 कोई चीज नहीं बल्कि साढ़े तीन अरब प्रकाश वर्ष दूर घटित होने वाली एक आवर्ती घटना है।

15 करोड़ सूर्यों जितना वजनी एक ब्लैक होल 18 अरब सूर्यों जितने वजनी, कहीं ज्यादा बड़े ब्लैक होल की परिक्रमा कर रहा है। लेकिन यह परिक्रमा ग्रहों द्वारा सूर्य की परिक्रमा जैसी न होकर आकाश की सापेक्ष वक्रता के कारण बहुत ही जटिल है। भारत की प्रतिष्ठित संस्था टीआईएफआर के दो वैज्ञानिकों प्रो. अचंवीदु गोपकुमार और उनके शोधछात्र लंकेश्वर डे ने इस परिक्रमा पथ की इतनी सटीक गणना की कि कम चमक वाला प्रेक्षण हाल में उनके बताए समय से मात्र ढाई घंटे के अंदर दर्ज कर लिया गया।

Monday, 27 April 2020

लॉकडाउन: खास लोगों के लिए खास सलाहें


Special Tips for the Patients with Specific Diseases

लॉकडाउन के दौरान परेशानी तो सभी को हो रही है, लेकिन बड़ी परेशानी उन्हें होती है जो दूसरे मोर्चों पर भी चुनौती का सामना कर रहे हैं। शुगर, बीपी,
किडनी और अस्थमा के मरीज अगर ऐहतियात बरतें तो यह दौर आसानी से गुजर जाएगा। एक्सपर्ट डॉक्टरों से बातचीत के बाद पेश हैं ऐसे मरीजों के लिए खास टिप्स:

जिन्हें शुगर है...

डायबीटीज दो तरह की होती है:
1. टाइप-1 डायबीटीज
यह शरीर के अचानक इंसुलिन हॉर्मोन बनाना बंद करने पर होती है और बचपन में ही हो जाती है। इसके मरीज बहुत कम होते हैं। इसमें शरीर के ग्लूकोज को कंट्रोल करने के लिए इंसुलिन देना पड़ता है।

2. टाइप-2 डायबीटीज
गलत लाइफस्टाइल, मोटापा और बढ़ती उम्र की वजह से टाइप-2 डायबीटीज होती है। इसमें शरीर में कम मात्रा में इंसुलिन बनता है। ज्यादातर मरीज इसी कैटिगरी में आते हैं। अमूमन ये मरीज टैब्लेट्स लेते हैं।

घर पर कैसे करें मैनेज
-फिजिकल ऐक्टिविटी पूरी तरह न छोड़ें। अभी बाहर नहीं जाना है इसलिए घर पर ही ऐक्टिव रहें।
- रोजाना करीब 10,000 कदम चलने की कोशिश करें। अगर लगातार टाइम नहीं मिल रहा तो 15-15 मिनट 3 बार वॉक कर लें।
- आप घर की बालकनी या छत पर वॉक कर सकते हैं। इन दिनों आप दोस्तों और रिश्तेदारों से मोबाइल पर खूब बात कर रहे होंगे तो बेहतर है कि बैठकर बात करने के बजाय घूम-घूम कर बात करें।
आपने 10,000 कदम चले हैं या नहीं, इस पर निगाह रखने के लिए अपने मोबाइल में स्टेप ट्रैकर ऐप डाउनलोड कर लें। एंड्रॉयड और iOS के लिए ऐसे कुछ ऐप्स हैं: Google Fit, Step Counter, Pedometer, Runtastic Steps, Fitbit, Runkeeper आदि।
- एरोबिक्स के लिए डांस या ज़ुंबा कर सकते हैं। डांस करने से मन भी खुश होता है और वजन भी कम होता है।
- योग करें। अगर वॉक कर पा रहे हैं तो आसन न भी करें तो चलेगा। लेकिन प्राणायाम और ध्यान जरूर करें। इनसे तनाव कम होता है।
- अपनी शुगर को रेग्युलर चेक करें। रेग्युलर का मतलब है, जैसा डॉक्टर ने बताया है, मसलन रोजाना या हफ्ते में। इस नियम को जरूर फॉलो करें।
- खाने को हल्का रखें। तले-भुने और हेवी खाने के बजाय फल और सब्जियों पर फोकस करें।
- अगर अचानक शुगर लो हो जाए तो फौरन टॉफी या चीनी खा लें। आराम से लेट जाएं और अपने डॉक्टर से फोन पर बात करें।

ब्लड ग्लूकोज टेस्ट
यह दो बार किया जाता है: खाली पेट (फास्टिंग) और नाश्ता या ग्लूकोज लेने के बाद (पीपी)।
फास्टिंग ब्लड शुगर (नॉर्मल): 70-100 mg/dl
पोस्ट प्रैंडियल (पीपी) शुगर: 70-140 तक mg/dl
(खाने का पहला कौर खाने के 2 घंटे बाद पीपी होना जाहिए।)

ये भूल कर भी न करें
- इंसुलिन का इंजेक्शन लगाते हुए ध्यान रखें कि मरीज ने खाना जरूर खाया हो क्योंकि इंसुलिन ब्लड शुगर लेवल को कम करता है। अगर कोई बिना खाना खाए यह इंजेक्शन लगा ले तो ब्लड शुगर लेवल लो यानी हापोग्लाइसीमिया हो सकता है।
- इंसुलिन हमेशा नाश्ता करने और डिनर करने के 15-20 मिनट बाद लेना चाहिए। दो इंजेक्शनों के बीच 10-12 घंटों का फासला होना जरूरी है। खाने के एकदम साथ न लगाएं क्योंकि ऐसा करने से ब्लड शुगर लेवल बढ़ सकता है।
- किसी वजह से मरीज सुबह या शाम को इंजेक्शन लगाना भूल जाता है तो मरीज को दो इंजेक्शन एक साथ कभी नहीं लगाने चाहिए। कभी मरीज को लगता है कि आज खाने पर कंट्रोल नहीं हो पाएगा तो वह इंसुलिन की मात्रा बढ़ा सकता है।
- इंसुलिन की क्वॉलिटी बरकरार रखने के लिए इसे 8 से 10 डिग्री तापमान पर रखना चाहिए। फ्रिज में ही इंसुलिन को रखें।
-टाइप-2 डायबीटीज के मरीज अगर किसी समय की दवाई खाना भूल जाएं तो एक साथ 2 वक्त की दवाएं न खाएं।

खा सकते हैं
कार्बोहाइड्रेट: चोकर वाला आटा, जौ, जई, रागी, दलिया, मल्टिग्रेन ब्रेड, काला चना, सोया, राजमा
फल: सेब, चेरी, जामुन, मौसमी, संतरा, स्ट्रॉबेरी, शहतूत, आलूबुखारा, नाशपाती, अंजीर
सब्जियां: ककड़ी, तोरी, टिंडा, सेम, शलजम, खीरा, चने का साग, सोया का साग, लहसुन, पालक, मेथी, आंवला, घीया
दूसरी चीजें: टोंड दूध और उससे बनी चीजें, छिलके वाली दालें, मछली (बिना ज्यादा तेल और मसाले वाली), फ्लैक्ससीड्स, छाछ आदि

कम खाएं
कार्बोहाइड्रेट: बिना चोकर का आटा, सूजी, सूजी के रस, ब्राउन ब्रेड, सफेद चना
फल: अमरूद, पपीता, तरबूज, खरबूजा
सब्जियां: अरबी, आलू, जिमीकंद, गोभी
मीठा: आर्टिफिशल स्वीटनर, खांड (बिना रिफाइन वाली शुगर)
दूसरी चीजें: टोंड दूध और उससे बनी चीजें, बिना छिलके वाली दालें, अंडा, चिकन, बादाम, अखरोट, देसी घी, अच्छे तेल (सरसों, ऑलिव, कनोला, राइसब्रैन आदि)

ना खाएं
कार्बोहाइड्रेट: सफेद चावल, मैदा, पूरी, समोसा, वाइट ब्रेड
फल: आम, चीकू, अंगूर, केला
सब्जियां: शकरकंद, आलू
मीठा: मिठाई, चीनी, गुड़, शहद, गन्ना, आइसक्रीम, जैम, केक, पेस्ट्री, कुकीज़
दूसरी चीजें: फुल क्रीम दूध और उससे बनी चीजें, रेड मीट, कोल्ड ड्रिंक्स, रिफाइंड ऑयल।

नोट: अगर शुगर के साथ-साथ कोई दूसरी बीमारी भी हो जैसे किडनी तो यह डाइट लागू नहीं होगी। बेहतर यही है कि डॉक्टर की राय से ही अपना डाइट चार्ट बनाएं। डॉक्टर से मिल नहीं सकते तो फोन पर बात लें।

होम्योपैथी के अनुसार दवाएं
Nux Vomica, Argentum Nitricum, Lycopodium
नोट: दवा होम्योपैथ की सलाह से ही लें।

आयुर्वेदिक नुस्खे
-10 बिलपत्र सुबह-शाम पानी के साथ पीसकर लें।
-सूखा आंवला और सौंफ बराबर मात्रा में लेकर बारीक पीस लें। एक-एक चम्मच सुबह-शाम पानी के साथ लें।
-लहसुन की एक कली सुबह खाली पेट लें।

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बीपी और कोलेस्ट्रॉल की परेशानी है तो...

नॉर्मल रीडिंग
-कोलेस्ट्रॉल 200 तक नॉर्मल
नॉर्मल ब्लड प्रेशरः अपर बीपी 130 से नीचे और लोअर बीपी 80 से नीचे

अगर किसी को हाई बीपी या लो बीपी की समस्या है तो नई एक्सरसाइज शुरू करने से पहले किसी डॉक्टर से फोन पर जरूर पूछ लें। वैसे अगर पहले से एक्सरसाइज करते आ रहे हैं तो उसे जारी रख सकते हैं।

जरूरी एक्सरसाइज
- दिल की बीमारी से बचने के लिए रोजाना कम-से-कम आधा घंटा कार्डियो एक्सरसाइज करना जरूरी है। इससे वजन कम होता है, बीपी कम हो जाता है और दिल की बीमारी की आशंका 25 फीसदी कम हो जाती है।
- कार्डियो एक्सरसाइज में तेज वॉक, जॉगिंग, साइकलिंग, स्विमिंग, एरोबिक्स, डांस आदि शामिल होते हैं। लेकिन अभी ये सभी एक्सरसाइज करना मुश्किल है इसलिए घर में ही वॉक करें 45 मिनट से 1 घंटा टहलें। अगर डांस करने की इच्छा हो तो यह कई एक्सरसाइज से बेहतर है। 15 से 20 मिनट डांस में दे सकते हैं।
इनके अलावा
- 5 मिनट डीप ब्रिदिंग, 10 मिनट अनुलोम-विलोम और 5 मिनट शीतली प्राणायाम करें। शीतली प्राणायाम खासतौर पर मन को शांत रखता है और बीपी को मेंटेन करता है।
- 15 मिनट के लिए मेडिटेशन करें।
- हेवी एक्सरसाइज जैसे कि वेट लिफ्टिंग आदि डॉक्टर की सलाह से ही करें।
- ऐसे आसन डॉक्टर की सलाह के बिना न करें, जिनमें सारा वजन सिर पर या हाथों पर आता है, जैसे कि मयूरासन, शीर्षासन आदि।
- शवासन करें। आंखें बंद करके पूरे शरीर के अंगों को बारी-बारी से महसूस करें। इससे मांसपेशियों का तनाव कम होता है और बीपी नॉर्मल रहता है।

ध्यान रखें 10 बातें
-स्मोकिंग न करें। इससे दिल की बीमारी की आशंका 50 फीसदी बढ़ जाती है।
-अपना लोअर बीपी 80 से कम रखें। ब्लड प्रेशर ज्यादा हो तो दिल के लिए काफी खतरा है।
-फास्टिंग शुगर 80 से कम रखें। डायबीटीज और दिल की बीमारी आपस में जुड़ी हुई हैं।
- तनाव न लें। दिल की बीमारियों की बड़ी वजह तनाव है।
-चूंकि आजकल लॉकडाउन है इसलिए जरूरी न हो तो बाहर से किसी को चेकअप के लिए न बुलाएं। शुगर और बीपी को मॉनिटर करनेवाली मशीन की मदद लें।
-डायबीटीज है तो शुगर के अलावा बीपी और कॉलेस्ट्रॉल को भी कंट्रोल में रखें।

क्या खाएं
- हाई फाइबर और लो फैट वाली डाइट जैसे कि गेहूं, ज्वार, ओट्स, बाजरा आदि का आटा या दलिया
- फ्लैक्स सीड्स (अलसी के बीज) आधा चम्मच रोजाना
- एक-दो कली लहसुन रोजाना
- 5-6 बादाम और 1-2 अखरोट रोजाना
- फल और सब्जियां खूब खाएं। दिन भर में अलग-अलग रंग के 5 तरह के फल और सब्जियां खाएं।
- जामुन, पपीता, सेब, आड़ू जैसे लो-ग्लाइसिमिक इंडेक्स वाले फल
- हरी सब्जियां, साग, शलजम, बीन्स, मटर, ओट्स, सनफ्लावर सीड्स आदि
- ऑलिव ऑयल, कनोला, तिल का तेल और सरसों का तेल, थोड़ी मात्रा में देसी घी भी अच्छा।

न खाएं
- मक्खन, मलाई, वनस्पति घी आदि सैचुरेडिट फैट
- मैदा, सूजी, सफेद चावल, चीनी, आलू यानी सफेद चीजें
- पैक्ड चीजें मसलन पैक्ड जूस, बेकरी आइटम्स, सॉस आदि
- रोजाना आधे चम्मच से ज्यादा नमक न लें
- बहुत मीठी चीजें (मिठाई, चॉकलेट) आदि

होम्योपैथी के अनुसार दवाएं

जिन्हें सिर्फ हाई बीपी की परेशानी है
Kali Phos, Aconite, Rauwolfia

दिल की बीमारियों के साथ हाई बीपी की शिकायत भी है
Crataegus, Digitalis, Strophanthus

नोट: दवा होम्योपैथ की सलाह से ही लें। अगर पहले से कोई दवा ले रहे हैं तो नियम से लेते रहें।

आयुर्वेदिक नुस्खे
कोलेस्ट्रॉल और हाई बीपी में
-सुबह खाली पेट लहसुन की 1-2 कलियां पानी के साथ लेने से कोलेस्ट्रॉल के स्तर में कमी आती है।
-आंवले का चूर्ण 1 चम्मच सुबह-शाम पानी के साथ लें। कच्चा आंवला उपलब्ध हो तो 2-3 आंवले सुबह-शाम चबाकर खाएं।
-पीपल की कोंपलों का रस 2 चम्मच और शहद 1 चम्मच मिलाकर सुबह-शाम लें।

लो बीपी में
-मौसमी, संतरे, अनार या गाजर का रस सुबह-शाम लेना चाहिए।
-शारीरिक मेहनत वाला काम नहीं करना चाहिए।
-भोजन के बाद हींग वाली छाछ लें।
-आंवलों का रस और शहद 2-2 चम्मच मिलाकर सुबह-शाम चाटें।
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किडनी की समस्या में...

बिना डायलिसिस के
- किडनी खराब होने पर डाइट पर बहुत तरह की पाबंदियां लग जाती हैं। ऐसे में डॉक्टर और डायटिशन की सलाह से ही डाइट लें।
-लिक्विड की मात्रा भी डॉक्टर ही तय करते हैं। उसी के अनुसार लिक्विड लें। लिक्विड का मतलब सिर्फ पानी से नहीं है। इसमें पानी के साथ दाल, जूस सबकुछ शामिल होता है।

खाने में इनसे करें परहेज
-फलों का रस, कोल्ड ड्रिंक्स, चाय-कॉफी, नीबू पानी, नारियल पानी, शर्बत आदि।
- सोडा, केक और पेस्ट्री जैसे बेकरी प्रॉडक्ट्स और खट्ट‌ी चीजें।
- केला, आम, नीबू, मौसमी, संतरा, आडू, खुमानी आदि।
- मूंगफली, बादाम, खजूर, किशमिश और काजू जैसे सूखे मेवे।
- चौड़ी सेम, कमल ककड़ी, मशरूम, अंकुरित मूंग आदि।
- अचार, पापड़, चटनी, सॉस, सत्तू, अंकुरित मूंग और चना।
- मार्केट के पनीर के सेवन से बचें। बाजार में मिलने वाले पनीर में नीबू, सिरका या टाटरी का इस्तेमाल होता है। इसमें मिलावट की भी गुंजाइश रहती है।

कैसे तैयार करें खाना-
- वेजिटेबल ऑयल और घी आदि बदल-बदल कर इस्तेमाल करें।
- घर पर ही नीबू के बजाय दही से डबल टोंड दूध फाड़कर पनीर बनाएं।
- खाना पकाने से पहले दाल को कम-से-कम 2 घंटे और सब्जियों को 1 घंटे तक गुनगुने पानी में रखें। फिर इस पानी को फेंक दें। इससे उनमें पोटेशियम की मात्रा कम हो जाएगी। इसे लीचिंग प्रोसेस कहते हैं।
-महीने में एकाध बार लीचिंग प्रक्रिया अपनाकर घर में छोले और राजमा भी खा सकते हैं, पर इसकी तरी के सेवन से बचें।
-नॉनवेज खानेवाले रेड मीट का सेवन नहीं करें। चिकन और मछली भी एक सीमित मात्रा में ही खाएं।
-रोजाना कम-से-कम दो अंडों का सफेद हिस्सा खाने से जरूरी मात्रा में प्रोटीन मिलता है।

डायलिसिस वाले बरतें ये सावधानियां
- डायलिसिस कराने वालों को लिक्विड चीजें कम लेनी चाहिए। अमूमन डायलिसिस के मरीजों को 24 घंटे में 1 लीटर लिक्विड लेने के लिए कहा जाता है।
- इस बात का जरूर ध्यान रखना चाहिए कि लिक्विड चीजों में सभी तरह के पेय शामिल होते हैं यानी इसमें पानी के अलावा दूध, दही, चाय, कॉफी, आइसक्रीम, बर्फ और दाल-सब्जियों की तरी भी शामिल हैं। यही नहीं, रोटी, चावल और ब्रेड आदि में भी पानी होता है।
- लिक्विड पर कंट्रोल रखने से दो डायलिसिस के बीच में मरीज का वजन (जिसे वेट गेन या वॉटर रिटेंशन भी कहते हैं) अधिक नहीं बढ़ता। दो डायलिसिस के बीच में ज्यादा वजन बढ़ने से डायलिसिस का प्रॉसेस पूरा होने पर कई बार कमजोरी या चक्कर आने की शिकायत भी होने लगती है।
-वैसे तो डॉक्टर हफ्ते में 3 बार डायलिसिस कराने को कहा जाता है, लेकिन लॉकडाउन की स्थिति में अगर एक या दो बार मिस भी हो जाए तो एक डायलिसिस जरूर कराना चाहिए। यह ध्यान रहे कि ऐसा बार-बार न हो।
-अगर डायलिसिस मिस हुआ है तो लिक्विड लेते समय मात्रा का ध्यान जरूर रखें।
- किडनी के जो मरीज डायलसिस पर नहीं हैं, उन्हें कम प्रोटीन और डायलसिस कराने वाले मरीजों को ज्यादा प्रोटीन की जरूरत होती है। आपने खानपान की पूरी जानकारी डायट एक्सपर्ट से ले रखी होगी। उसे ही फॉलो करें।
- डायलिसिस कराने वाले शख्स को कोई भी दवा लेने से पहले अपने किडनी एक्सपर्ट (नेफ्रॉलजिस्ट) से सलाह जरूरी है।

लिक्विड का सेवन ऐसे कम करें
डायलिसिस कराने वाला शख्स नीचे लिखे तरीकों से लिक्विड का सेवन कम कर सकता है:
- गर्मियों में 500 एमएल की कोल्ड ड्रिंक की बोतल में पानी भरके उसे फ्रीजर में रख लें। यह बर्फ बन जाएगा और फिर इसका धीरे-धीरे सेवन करें।
- फ्रिज में बर्फ जमा लें और प्यास लगने पर एक टुकड़ा मुंह में रखकर घुमाएं और फिर उसे फेंक दें।
- गर्मियों में रुमाल भिगोकर गर्दन पर रखने से भी प्यास पर काबू पाया जा सकता है।
- घर में छोटा कप रखें और उसी में पानी लेकर पिएं।
- खाना खाते समय दाल और सब्जियों की तरी का सेवन कम-से-कम करने की कोशिश करें।

होम्योपैथिक दवाएं
AAL SERIUM, Apis, Apocynum
नोट: होम्यॉपथी डायलिसिस बंद कराने में सक्षम नहीं है लेकिन यह ऐसे मरीजों की सहायक जरूर है। ऐलोपैथी दवाओं के साथ ही होम्योपैथी दवाओं के सेवन से मरीज ज्यादा सेहतमंद रह सकता है।

आयुर्वेदिक नुस्खे
बीमारी की वजह के आधार पर ही जरूरी दवा खाने की सलाह दी जाती है:
-आक के पत्तों को सुखाकर और जलाकर राख कर लें। आधा चम्मच यह राख थोड़ा-सा नमक मिलाकर 1 गिलास छाछ में मिलाकर सुबह-शाम लें।
- वरुण, पुनर्नवा, अर्जुन, वसा, कातुकी, शतावरी, निशोध, कांचनार, बाला, नागरमोथा, भूमि आमलकी, सारिवा, अश्वगंधा और पंचरत्नमूल आदि दवाओं का इस्तेमाल किडनी के इलाज में किया जाता है।
- किडनी की बीमारी का लगातार इलाज जरूरी है और यह ताउम्र चलता है। किडनी की बीमारी का इलाज से ज्यादा मैनेजमेंट होता है।

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अस्थमा है तो...

इन दिनों यों तो पलूशन काफी कम है जोकि अस्थमा के मरीजों के लिए बहुत अच्छा है। लेकिन सांस से जुड़ी बीमारी के मरीजों को कोरोना से बचाव के लिए ज्यादा ध्यान रखना है क्योंकि उनका रेस्पिरेटरी सिस्टम पहले से ही संवेदनशील है। इस बात का जरूर याद रखें कि अगर कोई अस्थमा का मरीज है तो उसे वर्तमान लॉकडाउन की स्थिति में जरूर सेल्फ आइसोलेशन में चले जाना चाहिए। परिवार के बाकी सदस्यों के साथ कम-से-कम बैठने की कोशिश करनी चाहिए। वह जितना अलग रहेंगे, उतना ही उनके लिए और बाकी लोगों के लिए सही रहेगा।

अमूमन कब बढ़ता है अस्थमा
-रात में या सुबह तड़के
-ठंडी हवा या कोहरे से
-ज्यादा कसरत करने के बाद
-बारिश या ठंड के मौसम में
-दवाएं नियमित रूप से लें
-आजकल चूंकि घर पर हैं और अस्थमा के मरीज हैं तो सूखी सफाई यानी झाड़ू से घर की साफ-सफाई से बचें। अगर ऐसा करते हैं तो ठीक से मुंह-नाक ढक कर करें। वैसे, वैक्यूम क्लीनर का इस्तेमाल करना बेहतर है। गीला पोंछा और पानी से फर्श धोना भी अच्छा विकल्प हो सकता है।
•- दिन में एक बार एकाध घंटे के लिए घर की खिड़की-दरवाजे खोल दें ताकि बाहर की ताज़ा हवा अंदर आ सके।
-बेडशीट, सोफा, गद्दे आदि की भी नियमित सफाई करें, खासकर तकिया की क्योंकि इसमें काफी सारे एलर्जीवाले तत्व मौजूद होते हैं। हफ्ते में एक बार चादर और तकिए के कवर बदल लें और दो महीने में पर्दे धो लें।
•-कम-से-कम फिलहाल कारपेट हटा दें। बाद में भी अगर इस्तेमाल करना ही चाहते हैं कम-से-कम 6 महीने में ड्राइक्लीन करवाते रहें।
-•कॉकरोच, चूहे, फफूंद आदि को घर में जमा न होने दें।
•-बहुत ठंडे से बहुत गर्म में अचानक न जाएं और न ही बहुत ठंडा या गर्म खाना खाएं।
•-रुटीन ठीक रखें। वक्त पर सोएं, भरपूर नींद लें और तनाव न लें।
-गुनगुने पानी से कुल्ला करना फायदेमंद है।
-जो मरीज लगातार नेबुलाइजर से भाप लेते हैं। अगर वह पहले दिन में 2 बार भाप लेते थे तो अब 4 बार तक ले सकते हैं।

खानपान का रखें ख्याल
अगर पिछले दिनों में खानपान में परहेज नहीं कर पाए हैं तो यह मौका परहेज के लिहाज से बेहतरीन है। इस समय मजबूरी नहीं है कि ऑफिस जाने की जल्दी है तो जो मिल जाए, वही खा लें।
-जिस चीज को खाने से सांस की तकलीफ बढ़ जाती हो, वह न खाएं। डॉक्टर सिर्फ ठंडी चीजें खाने से मना करते हैं। साथ ही जंक फूड से अस्थमा अटैक की आशंका ज्यादा होती है।
-एक बार में ज्यादा खाना नहीं खाना चाहिए। इससे छाती पर दबाव पड़ता है।
-विटामिन ए (पालक, पपीता, आम, अंडे, दूध, चीज़, बेरी आदि), सी (टमाटर, संतरा, नीबू, ब्रोकली, लाल-पीला शिमला मिर्च) और विटामिन ई (पालक, शकरकंद, बादाम, सूरजमुखी के बीज आदि ) और एंटी-ऑक्सिडेंट वाले फल और सब्जियां जैसे कि बादाम, अखरोट, राजमा, मूंगफली, शकरकंद आदि खाने से लाभ होता है।
-अदरक, लहसुन, हल्दी और काली मिर्च जैसे मसालों से फायदा होता है।
-रेशेदार चीजें जैसे कि ज्वार, बाजरा, ब्राउन राइस, दालें, राजमा, ब्रोकली, रसभरी, आडू आदि ज्यादा खाएं।
-फल और हरी सब्जियां खूब खाएं।
-रात का भोजन हल्का और सोने से दो घंटे पहले होना चाहिए।

क्या न खाएं
-प्रोट्रीन से भरपूर चीजें बहुत ज्यादा न खाएं।
-रिफाइन कार्बोहाइड्रेट (चावल, मैदा, चीनी आदि) और फैट वाली चीजें कम-से-कम खाएं।
-अचार और मसालेदार खाने से भी परहेज करें।
-ठंडी और खट्टी चीजों से परहेज करें।

ये जरूर खाएं
ओमेगा-3 फैटी एसिड: ओमेगा-3 फैटी एसिड साल्मन, टूना मछलियों में और मेवों व अलसी में पाया जाता है। ओमेगा -3 फैटी एसिड फेफड़ों के लिए लाभदायक है। यह सांस की तकलीफ एवं घरघराहट के लक्षणों से निजात दिलाता है।
फोलिक एसिड: पालक, ब्रोकली, चुकंदर, शतावरी, मसूर की दाल में फोलेट होता है। हमारा शरीर फोलेट को फोलिक एसिड में तब्दील करता है। फोलेट फेफड़ों से कैंसर पैदा करने वाले तत्वों को हटाता है।
विटमिन सी: संतरे, नींबू, टमाटर, कीवी, स्ट्रॉबरी, अंगूर और अनानास में भरपूर विटमिन सी होता है, सांस लेते वक्त शरीर को ऑक्सीजन देने और फेफड़ों से विषाक्त पदार्थों को निकालने के लिए मदद करते हैं।
लहसुन: इसमें मौजूद एलिसिन तत्व फेफड़ों से फ्री रेडिकल्स को दूर करने में मदद करते हैं। लहसुन संक्रमण से लड़ता है, फेफड़ों की सूजन कम करता है।
बेरी: बेरीज ऐंटीऑक्सिडेंट होते हैं।

होम्योपैथी में दवाएं
Bryonia, Natrium Sulphur, Sulphur, Arsenic Album
नोट: दवा होम्योपैथ की सलाह से ही लें।

आयुर्वेदिक नुस्खे
-आधा चम्मच रीठे के छिलके का चूर्ण सुबह खाली पेट एक सप्ताह तक मरीज को पानी के साथ लेना चाहिए। इस दौरान खाने में सिर्फ खिचड़ी और उसमें 1 चम्मच घी दें।
-अदरक के एक चम्मच रस में उतना ही शहद मिलाकर सुबह-शाम लेने से भी फायदा होता है।

एक्सपर्ट पैनल
डॉ. के. के. अग्रवाल
पूर्व अध्यक्ष, IMA

डॉ. अरुण गर्ग
सीनियर कंसल्टंट सर्जन, ईएनटी

डॉ. प्रशांत जैन
सीनियर यूरॉलजिस्ट

डॉ. अंशुल वार्ष्णेय
जनरल फिजिशन

डॉ. आर. पी. पाराशर
पंचकर्मा हॉस्पिटल

डॉ. सुशील वत्स
सीनियर होम्योपैथ

संडे नवभारत टाइम्स में प्रकाशित

फल-सब्जियों में लॉक करें ताजगी

Tips to keep Fruits n Vegetables fresh for longer time

लॉकडाउन में हम सबकी कोशिश यही होती है कि घर से बाहर कम ही निकले। फिर भी जरूरी चीजों के लिए बाहर जाना ही पड़ता है। ऐसे में जब भी हम सब्जी या फलों की खरीदारी के लिए बाहर जाते हैं तो ज्यादा से ज्यादा मात्रा में खरीदते हैं ताकि बार-बार हमें बाहर नहीं जाना पड़े। लेकिन एक समस्या भी इसी के साथ पैदा हो जाती है कि ज्यादा मात्रा में सब्जी और फलों को स्टोर कैसे किया जाए ताकि उसकी ताजगी बरकरार रहे और पैसा बर्बाद न हो। इसी बारे में एक्सपर्ट लोगों से बात कर पूरी जानकारी दे रहे हैं लोकेश के. भारती

खरीदारी करते समय रखें ध्यान

 1.
सूती कपड़े का बैग लेकर जाएं

इससे दो फायदे हैं। एक तो सब्जी खरीदकर एक जगह रखना आसान होता है, दूसरा जब सब्जियों को धोने की बारी आती है तो सूती बैग समेत धोना आसान रहता है।

 2.
कुछ पका, कुछ कम पका लें

सब्जियों के मामले में तो कुछ कम पका खरीदने से कोई खास फायदा नहीं होता, लेकिन कुछ फलों के मामले में कम पका खरीदने से उसकी लाइफ कुछ लंबी जरूर हो जाती है। मसलन केला और पपीता अगर कम पका खरीदेंगे तो दो-तीन दिनों तक वे आराम से चल जाएंगे। इसलिए अपनी जरूरत के अनुसार कुछ केला और पपीता पका हुआ खरीदें ताकि उसे उसी दिन से खाना शुरू कर सकें जबकि कुछ मात्रा में कम पका केले और पपीता खरीदें ताकि उन्हें तीन दिनों के बाद भी खा सकें।

खरीदकर जब घर पहुंचें

सब्जियों और फलों की लाइफ घर में उन्हें धोने के साथ ही शुरू हो जाती है। सही तरीके से धोने का फायदा यह है कि एक तो उन पर मौजूद केमिकल और बैक्टीरिया खत्म हो जाते हैं, साथ ही उनकी लाइफ भी बढ़ जाती है।

धुलाने और सुखाने का तरीका
सब्जियों और फलों को सबसे पहले 2 फीसदी नमक या 2 फीसदी इमली के पानी (5 लीटर पानी में 100 ग्राम नमक या 100 ग्राम इमली) में डुबाकर छोड़ दें। सब्जियों को 35 से 40 मिनट तक और फलों को 10 से 15 मिनट तक। यहां एक बात का ध्यान रखना जरूरी है कि साग, धनिया, पुदीना और कढ़ी पत्ता को 10 से 15 मिनट ही इस पानी में डुबाकर रखें। इसके बाद इन्हें निकालकर पंखे की हवा में सूखने दें। धूप में सूखने के लिए कतई न रखें। इसके लिए इन सभी को किसी साफ चटाई या बेडशीट पर फैला सकते हैं। 20 से 25 मिनट में अमूमन ये सूख जाते हैं। इसके बाद बारी आती है इन्हें सही तरीके से पैक करने और सही जगह रखने की।

तो ऐसे स्टोर करें इन्हें

फ्रिज में ऐसे संभालकर रखें सब्जी व फल

 1.
एक साथ नहीं

फ्रिज में सब्जी या फलों को स्टोर करते समय ज्यादातर लोग इस तरह की गलती करते हैं। एक साथ ही सभी सब्जियों या फलों को रख देते हैं। यह गलत है। दरअसल, हर फल को पकने में लगने वाला समय, उनकी श्वसन क्रिया की गति, उससे निकलने वाली गैस अलग-अलग होती है। इसलिए कभी भी इन सभी को एक साथ स्टोर नहीं करनी चाहिए।

 2.
पॉलिथीन का उपयोग

सब्जी को पॉलिथीन में बंदकर फ्रिज में रखें। भिंडी को फ्रिज में स्टोर करना है तो उसके साथ करेला और परवल स्टोर न करें। हां, एक ही तरह के दो फलों मसलन संतरा और मौसमी को एक साथ स्टोर कर सकते हैं। पॉलिथीन में रखने के बाद उसमें सुई से 20 से 30 छेद बना दें ताकि फल और सब्जियां सांस ले सकें और पॉलिथिन में इनसे निकलने वाली गैस जमा न हो। अगर फ्रिज में बिना पॉलिथीन के रखेंगे तो फल और सब्जियां जल्दी खराब हो जाएंगी और अगर पॉलिथीन में 20-30 सुराख नहीं करेंगे तो भी वे जल्दी खराब हो जाएंगे।

अगर घर में फ्रिज न हों या इस लॉकडाउन में खराब हो गया हो तो इन्हें फ्रिज के बाहर भी इसी तरह स्टोर कर सकते हैं। फर्क सिर्फ इतना ही पड़ेगा कि फ्रिज में जहां ऐसी सब्जियां 7 से 10 दिनों तक फ्रेश रहती हैं, वहीं फ्रिज के बाहर ये 3 से 4 दिन तक ही फ्रेश रह पाएंगी।

इन्हें न रखें फ्रिज में
कुछ सब्जियां ऐसी भी हैं जिन्हें फ्रिज में रखने की जरूरत नहीं होती। मसलन आलू, प्याज, लहसुन। इन सब्जियों की मियाद बाहर भी अच्छी-खासी होती है। इन्हें धोकर स्टोर न करें, नमी से ये खराब हो जाते हैं। लहसुन को बाहर किसी जूट के थैले में स्टोर करना अच्छा रहता है।

इस प्राथमिकता से फ्रिज में रखें चीजें
- सबसे नीचे के खाने में फल और सब्जी
-नीचे से दूसरे या बीच के खाने में दूध, मीट, मछली
- सबसे ऊपर के खाने में दही और बना हुआ खाना

जरूरी टिप्स
-बास्केट में टमाटर को सबसे ऊपर रखें। इसके ऊपर सब्जियों को न रखें क्योंकि टमाटर पर दबाव पड़ने से ये जल्दी खराब होते हैं।
-केले को सड़ने से बचाने के लिए उसके डाल से काटे गए ऊपरी भाग को प्लास्टिक से लपेट कर रख दें।
-कच्चे टमाटर को कमरे के तापमान पर रखें और पके हुए टमाटर को पॉलिथीन में लपेटकर फ्रिज में रखें।
-नीबू को खुले में फ्रिज में न रखें। पॉलिथीन में ही सुराख करके रखें। बाहर किसी शीशे के बाउल में पानी डालकर भी इन्हें रख सकते हैं।
-गाजर को लंबे समय तक ताजा रखने के लिए ऊपरी हिस्से को, जहां से पत्ते निकलते हैं, काटकर हटा दें और किसी एयर टाइट कंटेनर में डालकर फ्रिज में रख दें।
-इमली को सही रखने के लिए इसकी बाहरी सतह पर नमक लगा दें। फिर फ्रिज में रख दें
-जामुन एक के ऊपर एक दबाकर किसी छोटे बर्तन में न रखें। इन्हें छेद वाले खुले बर्तन में फैलाकर रखें, जिससे उनमें हवा लगती रहे।

हफ्ते भर की प्लानिंग
सब्जी की खरीदारी करने से पहले पूरे हफ्ते की प्लानिंग कर लें। संडे से लेकर शनिवार तक किस दिन क्या खाना है, इसकी प्लानिंग कर लेंगे तो अच्छा रहेगा। यह प्लानिंग किसी सब्जी की कितनी लाइफ होती है, उसके अनुसार होनी चाहिए। यानी अगर पालक साग, धनिया या पुदीना आदि ला रहे हैं तो उसे शुरुआत के दो दिनों में ही खाना होगा। यही तरीका फलों के मामले में भी अपना सकते हैं। मसलन केला या अंगूर को जल्दी खा लेना। अगर आप बाजार जाकर सब्जी और फल ला रहे हैं तो ऐसी प्लानिंग कर सकते हैं:

रविवार और सोमवार को खाएं
सब्जी: पालक या दूसरे साग बनाएं। धनिया या पुदीने की चटनी बना सकते हैं। चटनी बनाने के बाद ये 10 दिनों तक चल जाते हैं।
फल: शहतूत, केला, अंगूर

मंगलवार और बुधवार को खाएं
सब्जी: तोरई, घीया (लौकी), कच्चा केला
फल: पपीता, केला, अंगूर

गुरुवार और शुक्रवार को खाएं
सब्जी: भिंडी, परवल, गोभी, गाजर, बैंगन
फल: संतरा, सेब

शनिवार को खाएं
सब्जी: इस दिन हरी सब्जियों के बजाय छोले, राजमा बना सकते हैं।
फल: सेब

नोट: अपनी जरूरत और स्वाद के अनुसार इसमें बदलाव कर सकते हैं।

इन्हें पकाकर भी कर सकते हैं स्टोर

टमाटर
इनसे टमाटर का पेस्ट तैयार किया जा सकता है जिसे 10 से 15 दिनों तक फ्रिज में रखकर उपयोग कर सकते हैं। इसके लिए टमाटर को पानी में 10 से 15 मिनट उबाल लें। इसके बाद ठंडा होने पर टमाटर के छिलके को हटा दें। फिर बचे हुए भाग को ऐसे भी रख सकते हैं या फिर मिक्सी में चलाकर पेस्ट बना लें। फिर इसे स्टोर कर दें। खास बात यह है कि इस तरह टमाटर को स्टोर करने से इसमें मौजूद एंटी-ऑक्सिडेंट लाइकोपिन (इसी वजह से टमाटर लाल रंग का और स्वादिष्ट होता है) की मात्रा बढ़ जाती है जो हमारे शरीर के लिए फायदेमंद है।

कढ़ी पत्ता
कढ़ी पत्ता का उपयोग अमूमन कढ़ी या फिर दक्षिण भारतीय व्यंजन मसलन: डोसा मसाला, सांभर, इडली आदि बनाने में किया जाता है। इसे स्टोर करने का सबसे बेहतरीन उपाय है कि इसे तेल में फ्राई कर लें। फ्राई करने के बाद इसे फ्रीज में रख दें और जब जरूरी पड़े उपयोग कर लें। यह 1 महीने तक भी खराब नहीं होगा।

धनिया और पुदीना
इन दोनों की चटनी लजीज होती है। जब इन्हें स्टोर करना हो तो पॉलिथीन में सुराख करके करें, ये 7 दिनों तक चल जाते हैं। अगर किसी को इससे भी ज्यादा लंबे समय तक स्टोर करना है तो इनका पेस्ट तैयार कर लें। इसके लिए इन्हें सीधे मिक्सी में चला लें।

एक्सपर्ट पैनल
रेखा शर्मा, पूर्व चीफ डाइटिशन, एम्स
परमीत कौर, चीफ डाइटिशन, एम्स
डॉ. शिखा शर्मा, न्यूट्री-डायट एक्सपर्ट
ईशी खोसला, सीनियर डायट एक्सपर्ट
प्रेरणा कोहली, सीनियर क्लिनिकल साइकॉलजिस्ट
रामरोशन शर्मा, प्रिंसिपल साइंटिस्ट, पूसा इंस्टिट्यूट

संडे नवभारत टाइम्स में प्रकाशित 19.04.2020

बढ़ रही है दुष्ट लहरों की ऊंचाई

चंद्रभूषण
समुद्री सचाइयों और जहाजी गप्पों के बीच फर्क करना सदा से एक कठिन काम रहा है। गहरे समुद्र में कई-कई दिन थपेड़े खाने के बाद बचाए गए नाविकों ने ऐसे किस्से पहले भी सुनाए हैं कि समुंदर एकदम शांत था, तभी अचानक एक बहुत ऊंची लहर उठी और उनकी नाव को निगल गई। लेकिन ऐसे किस्सों को सच मानने या न मानने की दुविधा पहली बार 1826 में बनी, जब फ्रांसीसी नौसेना के कप्तान जूल ड्यूमां द’उर्विल ने हिंद महासागर में अपने तीन साथियों के साथ 33 मीटर (108 फुट) ऊंची एक लहर दर्ज करने की बात सार्वजनिक की और वैज्ञानिक फ्रांस्वा अरागो ने इसके लिए उनका मजाक उड़ाया।

फिर महान जर्मन गणितज्ञ कार्ल फ्रेडरिक गॉस ने अपने सांख्यिकी सिद्धांतों से हिसाब लगाकर बताया कि किसी तूफानी समुद्र में अगर 12 मीटर यानी चौमंजिला इमारत जितनी ऊंची लहरें उठ रही हों तो भी वहां कोई लहर 15 मीटर से ज्यादा ऊंची नहीं आ सकती। यह भी कि 30 मीटर ऊंची लहर का नंबर अगर कभी आएगा भी तो 10 हजार साल में एक बार से ज्यादा नहीं। लेकिन 1984 में शांत समुद्र में 11 मीटर ऊंची लहर दर्ज किए जाने से लेकर अब तक के हजारों प्रेक्षणों ने गॉस के इस गणित को गलत साबित किया है।

आधुनिक समुद्री जहाजों में लहरों की ऊंचाई लगातार दर्ज करते रहने का इंतजाम होता है। कुल लहरों में दो-तिहाई ऊंची लहरों की औसत ऊंचाई को ‘सिग्नीफिकेंट वेव हाइट’ (एसडब्लूएच) और इसकी दोगुनी से भी ऊंची लहर को 'रोग वेव' (दुष्ट लहर) का नाम दिया गया है। पिछले महीने छपी साउथंपटन यूनिवर्सिटी की उत्तरी अटलांटिक में 22 वर्ष (1994-2016) के जहाजी आंकड़ों पर आधारित एक रिसर्च  बता रही है कि समय बीतने के साथ दुष्ट लहरों की संख्या कम हो रही है लेकिन इनकी ऊंचाई ज्यादा होती जा रही है। यह भी कि ठंडे, शांत समुद्रों में इनका खतरा बहुत बढ़ गया है।

Saturday, 25 April 2020

विषाणु-विज्ञानी डेविड बाल्टीमोर से कुछ सवाल और उनके जवाब

प्रश्नकर्ता विषाणु-विज्ञानी डेविड बाल्टीमोर से  ( जिन्होंने एचआईवी के उस एन्ज़ाइम की खोज की जिससे यह विषाणु अपने आरएनए से डीएनए बनाता है और जिसके लिए उन्हें नोबेल-पुरस्कार दिया गया।  ) :
 "साधारण ज़ुकाम भी कई बार कोरोनावायरसों से हो सकता है। इस ज़ुकाम को हम वैश्विक महामारी यानी पैंडेमिक क्यों नहीं मानते ?"

उत्तर : "साधारण ज़ुकाम यानी कॉमन कोल्ड भी एक वैश्विक महामारी है। पर यह मारक नहीं है। सैकड़ों क़िस्म के विषाणु ज़ुकाम पैदा कर सकते हैं , इनमें अनेक कोरोनाविषाणु भी हैं। पर हम इनकी बहुत चिन्ता नहीं करते , क्योंकि हम अपना ध्यान रख लेते हैं। लोगों ( विशेषकर बच्चों ) में ज़ुकाम होता है , कुछ दिनों में ठीक हो जाता है। ये अधिकांश कोरोनाविषाणु गम्भीर बीमारी नहीं पैदा करते , इसलिए हम इनकी चिन्ता भी नहीं करते। ज़ुकाम की वैश्विक महामारी यानी ढेर सारे लोगों में नाक बहना-हरारत-बुख़ार-खाँसी जैसे लक्षण होना और फिर प्रतिरक्षा-तन्त्र के प्रयासों से ठीक हो जाना।"

"ज़ुकाम की उपेक्षा करना भी ठीक नहीं है। सार्वजनिक स्वास्थ्य-अधिकारी सामान्य ज़ुकाम ( कॉमन कोल्ड ) के विषाणुओं का अध्ययन करते हैं और उसके प्राकृतिक विकास , संक्रामकता ,फैलाव व अन्य बातों का भी। पर एक सीमा से अधिक हम ज़ुकाम पर संसाधन व्यय नहीं करते।"

"कोविड-19 विषाणु 1-5 % में मारक है। सामान्य ज़ुकाम लगभग कभी मारक नहीं। कोविड-19 के खिलाफ़ हमारे भीतर कोई विशिष्ट प्रतिरक्षा अभी विकसित नहीं। यह रोग नया है , इसका विषाणु भी। हम इसके फैलाव को रोकने का प्रयास कर रहे हैं क्योंकि इससे मृत्यु हो रही हैं और सामाजिक जीवन की अस्तव्यस्त करने की क्षमता सामान्य से कहीं अधिक है। हमने ऐसा कुछ सन् 1918 की एच1 एन 1 इन्फ़्लुएन्ज़ा-महामारी से समय से नहीं देखा है।"

प्रश्न : "क्या आप हमें एचआईवी-महामारी ( एपिडेमिक ) के बारे में कुछ बता सकते हैं ?"

उत्तर : "एड्स महामारी तब शुरू हुई , जब लॉस एंजल्स में कुछ लोग डॉक्टरों के पास विचित्र लक्षणों के साथ पहुँचने लगे। इन लक्षणों के मूल में क्षीण होता प्रतिरक्षा-तन्त्र था। यह सिंड्रोम पहले कभी नहीं देखा गया था : अनेक ऐसे लक्षण जो त्वचा व मुँह में उभरते थे। इनमें से अधिकांश लोग समलैंगिक पुरुष थे और इन्हें उन डॉक्टरों ने देखा , जो समलैंगिक पुरुषों के उपचार में कुछ विशेषज्ञता रखते थे।"

"डॉक्टरों ने इन मरीज़ों को सीडीसी , एटलांटा रिपोर्ट किया वहाँ उन्होंने इन्हें अलग पाया। फिर अनेक अन्य डॉक्टरों ने कहा कि उन्हें भी ऐसे मरीज़ मिल रहे हैं। तब इसे एक अज्ञात कारण वाले सिंड्रोम का नाम दिया गया और इसे एचआईवी के नाम से पहचाने जाने में समय लगा। एक बार यह स्पष्ट हो गया कि इसका कारण एक विषाणु है , तब यह सोचा जाने लगा कि यह एक-व्यक्ति-से-दूसरे में फैलता है। इससे इस समस्या को समझने में कुछ बेहतरी हुई , यह एक ऐसा कीटाणु था जो पहले हमें कभी नहीं मिला था। बाद में हमने जाना कि एचआईवी एक रेट्रोवायरस है : अनेक उन रेट्रोवायरसों की तरह जिनपर हम दसियों साल से काम कर रहे हैं। ये रेट्रोवायरस अपने भीतर आरएनए रखते हैं और कोशिकाओं के भीतर पहुँच कर एक ख़ास एन्ज़ाइम द्वारा डीएनए का निर्माण करते हैं। इसी एन्ज़ाइम की खोज के लिए मुझे सन् 1975 में नोबेल पुरस्कार दिया गया। अस्सी के दशक में इन रेट्रोविषाणुओं की क़िस्म बेहतर समझ में आ गयी थी , पर इस तरह की ( रेट्रोविषाणु से होने वाली ) किसी बीमारी को लोग पहली बार देख रहे थे।"

"एचआईवी को जब ट्रेस किया गया तब इसका सम्बन्ध बन्दरों से निकला , जो अफ़्रीका में मिलते हैं। उनसे चिम्पैंजियों में और फिर मनुष्यों में। यह प्रसार बहुत सफल तो नहीं था, लेकिन फिर भी हो गया था। बहुत सफल इसलिए नहीं, क्योंकि एचआईवी बहुत संक्रामक विषाणु नहीं है। अस्सी व नब्बे के दशकों में यह और स्पष्ट हो गया।"

"इस बीच एचआईवी संसार-भर में फैला। इसके कारण लोग ख़ूब बीमार हुए और अनेक मृत्यु हुईं। इन विषाणुओं को रोकने वाली इन्हिबिटर-दवाएँ बनायी गयी , कुछ पर तुरन्त टेस्ट हुए। इनमें से एक एजेडटी बहुत असरदार सिद्ध हुई , हालांकि इसका असर कम देर तक रहता था क्योंकि विषाणु म्यूटेट करके अपने स्वरूप को बदल लेता था और दवा से बच निकलता था। लेकिन इससे दवाएँ कैसे विकसित करनी हैं --- इसका रास्ता खुल गया। फिर अनेक कम्पनियों ने अनेक दवाएँ बना डालीं और इनमें से कई बेहतरीन थीं।"

"वैज्ञानिकों ने विषाणु को समझा और उसकी कमज़ोरियों को भी। उन्हीं कमज़ोरियों को समझकर टारगेट किया गया दवाओं को बनाने के लिए। ढेरों दवाएँ तैयार हो गयीं। आज एड्स एक दीर्घकालिक रोग है किन्तु अब मारक नहीं रहा। कम-से-कम विकसित देशों में तो यह थम गया क्योंकि यहाँ दवाएँ उपलब्ध रहीं।  अब हम एचआईवी-युक्त एक संसार में रहते हैं। एड्स नहीं गया , पर अब यह हमें उस तरह से मार नहीं पा रहा।"

प्रश्न : "यानी एड्स-महामारी दवाओं के कारण धीमी पड़ी , पर बिना टीके के। एचआईवी का टीका क्यों नहीं बना ?"

उत्तर : "यह दिलचस्प कहानी है। हम अक्सर सोचते हैं कि जब कोई नया विषाणु खोजा जाएगा , तब सबसे पहले उसके खिलाफ़ टीका बनेगा , न कि दवा। हमने अनेक विषाणुओं चेचक ( स्मॉलपॉक्स ) , पोलियो , खसरा ( मीज़ल्स ) , मम्प्स , रूबेला के खिलाफ़ टीके ही बनाये हैं। जब अस्सी के दशक में मैं जब इस विषाणु पर शोध कर रहा था , तब मुझे लगा था कि इस विषाणु के खिलाफ़ टीका बना पाना शायद सम्भव न हो। कारण कि विषाणु म्यूटेट कर सकता है : अपना जेनेटिक स्वरूप बदल सकता है। जो नित्य प्रतिरक्षा-तन्त्र को भरमा रहा है , उससे कैसे लड़ा जाएगा ? यही कारण है कि सफल टीका न बन सका। किसी विषाणु की रोकथाम इतनी मुश्किल नहीं रही , हालांकि आज भी मेरे कुछ साथी एचआईवी का टीका बनाने में लगे हुए हैं।"

प्रश्न : "तो अब एचआईवी और सार्स-सीओवी 2 में अन्तर बताइए। एचआईवी-पैंडेमिक और कोविड-19-पैंडेमिक में आप अन्तर क्या पाते हैं ?"

उत्तर : "सबसे बड़ा अन्तर तो व्यक्ति-से-व्यक्ति में फैलाव का है। एचआईवी मुश्किल से फैलता है , सार्स-सीओवी 2 अत्यधिक संक्रामक है। फिर ये दोनों विषाणु अलग-अलग विषाणु-परिवारों के हैं। सार्स-सीओवी 2 कोरोनाविषाणु है , एचआईवी एक रेट्रोविषाणु है। एकदम भिन्न विकास , एकदम अलग कार्यप्रणाली। ( हाँ , दोनों विषाणु हैं यह अलग बात है ! )"

"ये दोनों विषाणु मनुष्य में जानवरों से आये। एचआईवी बन्दरों से , सार्स-सीओवी 2 सम्भवतः चमगादड़ों से। दोनों मानवों के लिए नये हैं। कोरोनाविषाणुओं के खिलाफ़ कोई दवा नहीं है क्योंकि कोरोनाविषाणु अब तक बड़ी समस्या नहीं रहे। सार्स और मर्स जैसे रोग जब सामने आये , तब कुछ हलचल हुई किन्तु इन्हें भी अपेक्षाकृत तेज़ी से नियन्त्रित कर लिया गया।"

साभार - स्कन्द शुक्ला

#skandshukla22

अभी नहीं कीड़ा कयामत

चंद्रभूषण
कीट-पतंगों को लेकर दुनिया की राय मिली-जुली है। पौधों के परागण में अहम भूमिका के चलते मधुमक्खियां, भौंरे और कुछ अन्य कीड़े खेती-बागवानी की जरूरी शर्त हैं। जुगनू और तितली जैसे कीड़ों का रिश्ता हमारे सौंदर्यबोध से है लिहाजा इनका कम दिखना तुरंत खटकता है। दूसरी तरफ टिड्डी और स्टेमबोरर जैसे कीड़े फसलों को भयंकर नुकसान पहुंचाते हैं। उनके प्रकोप का जिक्र भी लोगों में सिहरन पैदा करता है, जैसा अभी पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान, पश्चिमी अफ्रीका और खाड़ी क्षेत्र के कई देशों में कर रहा है।

जाहिर है, हम चाहते हैं कि मच्छर और टिड्डियां दुनिया में कम दिखें जबकि तितली, मधुमक्खियां और जुगनू ज्यों के त्यों बने रहें। लेकिन दुनिया हमारे चाहने से नहीं चलती। संसार की सभी जीवजातियों में सबसे बड़ी तादाद कीड़ों की है, पर उनके लिए वक्त बहुत बुरा जा रहा है। 2017 में जर्मनी से प्रकाशित एक सैंपल बेस्ड रिपोर्ट में बताया गया था कि बीते 27 वर्षों में वहां उड़ने वाले कीड़ों की तौल घटकर एक चौथाई रह गई है। इससे पहले कैलिफोर्निया में बादाम के बागानों की उपज तेजी से गिरी तो खोजबीन से पता चला कि उनका परागण करने वाली मधुमक्खियां कम बची हैं।

यूरोप-अमेरिका की कुछ और रिपोर्टों का साझा नतीजा ‘इंसेक्ट अपोकलिप्स’ (कीड़ा कयामत) जैसे लेखों में जाहिर हुआ और इसे स्थायी खाद्यान्न संकट की आहट की तरह देखा जाने लगा। अभी बृहस्पतिवार को ‘साइंस’ मैगजीन में छपे एक विश्वव्यापी अध्ययन में बताया गया है कि मामला उतना विकट नहीं है, हालांकि प्रति दशक 9.2 फीसदी कीड़ों की कमी वाली बात इसमें भी स्वीकार की गई है।