Monday, 28 January 2019

इसरो की कामयाबी और भविष्य की योजनायें

शशांक द्विवेदी 
डायरेक्टर, मेवाड़ यूनिवर्सिटी    
बीता साल 2018 इसरो के लिए बेहद शानदार रहा है, यह साल इसरो की तमाम कामयाबियों के लिए जाना जाएगा।  इस साल इसरो ने सात सफल लांचिंग की हैं। ये आंकड़ा अगले साल तक कई गुना बढ़ जाएगा। 12 जनवरी, 2018 को कार्टोसैट -2 भेजा गया, 14 नवंबर, 2018 को जीसैट-29 लांच किया गया। यह इसरो का सबसे भारी उपग्रह है। इसे भारत ने अपने ही रॉकेट जीएसएलवी मार्क-3 डी टू से भेजा। यह इसरो और देश के लिए बहुत बड़ी कामयाबी है। यह रॉकेट आगे चलकर चंद्रयान-2 और मैन मिशन के लिए काम में लाया जाएगा। इससे भारत को भारी उपग्रह भेजने में आत्मनिर्भरता मिली है। 29 नवंबर को पीएसएलवी सी-43 से हाइसिस लांच हुआ। 19 दिसंबर को जीएसएलवी एफ-11 से जीसैट-7ए लांच हुआ और 5 दिसंबर को फ्रेंच गुयाना (विदेशी जमीन से) से जीसैट-11 की लांचिंग हुई।  इसरो ने इस वर्ष संचार, भू-प्रक्षेपण और नौवहन के क्षेत्र में कई बड़ी और साहसिक कामयाबियां हासिल की हैं। इन सबसे भारतीय वायुसेना की ताकत भी कई गुना तक बढ़ी है। इसरो ने जीएसएलवी रॉकेट से लगातार छठी सफल लॉन्चिंग की। 
इसरो की गगनयान परियोजना  
इसके साथ ही केंद्र सरकार ने हजार करोड़ की महत्वकांक्षी गगनयान परियोजना को मंजूरी दे दी है। अगर यह मिशन कामयाब हुआ तो अंतरिक्ष पर मानव मिशन भेजने वाला भारत दुनिया का चौथा देश होगा। इस प्रोजेक्ट में मदद के लिए भारत ने पहले ही रूस और फ्रांस के साथ करार किया है। इसके तहत तीन सदस्यीय दल को सात दिनों के लिए अंतरिक्ष में भेजा जाएगा। इसरो के चेयरमैन के सिवन का कहना है कि उनकी टीम इस मिशन पर बीते चार महीने से काम कर रही है। मिशन के डिजाइन पर भी काम शुरू हो चुका है। टेस्ट फ्लाइट के तौर पर इसके फाइनल मिशन से पहले दो मानवरहित मिशन लांच किए जाएंगे।इसरो चेयरमैन का कहना है कि पहला मानवरहित मिशन यानी टेस्ट फ्लाइट दिसंबर, 2020 में लांच होगी। दूसरा मानवरहित टेस्ट जुलाई, 2021 में लांच होगा। इसके बाद आखिर में फाइन मिशन यानी ह्यूमन स्पेस फ्लाइट को दिसंबर 2021 में लांच किया जाएगा। बजट पास होने के बाद क्रू की ट्रेनिंग पर काम शुरू हो चुका है। इसमें जरूरत पड़ने पर विदेशी ट्रेनिंग को भी शामिल किया जा सकता है। क्रू मेंबर का चुनाव इसरो और आईएएफ द्वारा संयुक्त तौर पर किया जाएगा।

जिसके बाद उन्हें दो से तीन सालों तक ट्रेनिंग दी जाएगी। इस मिशन के लिए राकेश शर्मा का भी परामर्श लिया जाएगा। इसके लिए कई बड़ी टेक्नोलॉजी जैसे क्रू मॉड्यूल, क्रू एस्केप सिस्टम, एनवायरमेंट सिस्टम और लाइफ स्पोर्ट सिस्टम का इस्तेमाल किया जाएगा। अभी तक ह्यूमन स्पेस फ्लाइट प्रोजेक्ट के लिए बड़ी तकनीकों को विकसित करने में 173 करोड़ रुपये का खर्च आ चुका है।  
अंतरिक्ष में जाने वाले एस्ट्रोनॉट्स को ट्रेनिंग देने के लिए बैंगलोर में ट्रेनिंग सेंटर खोला जाएगा। पहले इसका लक्ष्य 2012 तय किया गया था। अब इसरो एक स्थायी सेंटर खोलने की योजना बना रहा है। बताया जा रहा है कि गगनयान मिशन के लिए चुने जाने वाले लोगों को विदेशी सेंटर में ट्रेनिंग दी जाएगी। इन्हें करीब दो साल तक शून्य गुरुत्वाकर्षण पर ट्रेनिंग दी जाएगी ताकि वह अंतरिक्ष में होने वाले अनुभवों से दो चार हो जाएं। ट्रेनिंग का कुछ हिस्सा बैंगलोर में वायु सेना के इंस्टीट्यूट ऑफ एयरोस्पेस मेडिसीन में पूरा कराया जाएगा। अभी तक उम्मीदवारों के चयन का काम शुरू नहीं हुआ है।
2019 में इसरो 
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने 2019 के लिए 22 से ज्यादा मिशनों का लक्ष्य रखा है। प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने एक सवाल के लिखित जवाब में राज्यसभा को यह जानकारी दी । इसरो ने अगले तीन साल में 50 से अधिक मिशनों के लक्ष्य की अपनी रूप-रेखा प्रकट की है।उन्होंने कहा कि सरकार ने अंतरिक्ष गतिविधियों के लिए बजट में वृद्धि की है।वास्तव में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान कार्यक्रम में पिछले कुछ वर्षों के दौरान अत्यधिक सफल और वाणिज्यिक मिशनों के कारण अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। फिलहाल इसरो के पास बड़ी संख्या में स्वीकृत मिशन हैं जो उद्योग के लिए भी एक बड़ा अवसर दर्शाते हैं।

 2018 में इसरो के अभियान 
अपनी सैन्य क्षमताओं और निगरानी तंत्र को बेहद मजबूत बनाने के लिए जनवरी 2018 में भारत ने पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (पीएसएलवी –सी 38) की सहायता से कार्टोसैट-2 श्रंखला के तीसरे रिमोट सेंसिंग उपग्रह सहित 30 उपग्रहों को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया था । प्रक्षेपित उपग्रहों में 14 देशों के 29 विदेशी उपग्रह भी शामिल थे।  ये सैटेलाइट न सिर्फ भारत के सरहदी और पड़ोस के इलाकों पर अपनी पैनी नजर रखेगा बल्कि स्मार्ट सिटी नेटवर्क की योजनाओं में भी मददगार रहेगा। ये सैटेलाइट 500 किमी से भी ज्यादा ऊंचाई से सरहदों के करीब दुश्मन की सेना के खड़े टैंकों की गिनती कर सकता है। भारत के पास पहले से ऐसे पांच रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट मौजूद है। कार्टोसैट-2 श्रृंखला के तीसरे उपग्रह के प्रक्षेपण के साथ ही भारत की अंतरिक्ष और अधिक पैनी और व्यापक होने जा रही है। हालिया रिमोट सेंसिंग उपग्रह की विभेदन क्षमता 0.6 मीटर की है। इसका अर्थ यह है कि यह छोटी चीजों की तस्वीरें ले सकता है. कोर्टोसैट -2 श्रृंखला के उपग्रह के सफल प्रक्षेपण से भारत को कई फायदे होगें जिसमें अब भारत में किसी भी जगह को अंतरिक्ष से देखने की क्षमता भी हासिल होगी। कार्टोसैट-2 सीरीज के उपग्रहों में पैनक्रोमैटिक और मल्टीस्पेक्ट्रल इमेज सेंसर लगे हैं। इनसे रिमोट सेंसिंग में भारत की काबिलियत सुधरेगी। इन उपग्रहों से मिले डाटा का इस्तेमाल सड़क निर्माण के काम पर निगरानी रखने, बेहतर लैंड यूज और जल वितरण के लिए होगा।  
जीसैट-7ए का सफल प्रक्षेपण 
पिछले दिनों इसरो ने भूस्थैतिक संचार उपग्रह जीसैट-7ए का सफल प्रक्षेपण कर इतिहास रच दिया है। यह सैटलाइट भारतीय वायुसेना के लिए बहुत खास है।  इसके जरिये वायुसेना को भूमि पर रडार स्टेइशन, एयरबेस और एयरबॉर्न वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टपम से इंटरलिंकिंग की सुविधा मिलेगी, जिससे उसकी नेटवर्क आधारित युद्ध संबंधी क्षमताओं में विस्ताकर होगा और ग्लोधबल ऑपरेशंस में दक्षता  बढ़ेगी। 
जीसैट-7ए न सिर्फ सभी एयरबेसेज को आपस में जोड़ेगा बल्कि आईएएफ के ड्रोन ऑपरेशंस में भी इजाफा करेगा। यह सैटेलाइट आईएएफ के कंट्रोल स्टे शनों और ड्रोन के सैटेलाइट कंट्रोल सिस्टाम को अपग्रेड कर सकेगा।
जीसैट-11 की लांचिंग 
इसके साथ ही एक बड़ी कामयाबी हासिल करते हुए भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो ने अब तक के सबसे वजनी सैटेलाइट का प्रक्षेपण कर दिया। दक्षिणी अमेरिका के फ्रेंच गुयाना के एरियानेस्पेस के एरियाने-5 रॉकेट से 5,854 किलोग्राम वजन वाले ‘सबसे अधिक वजनी’ उपग्रह जीसैट-11 को लॉन्च किया गया। जीसैट-11 देशभर में ब्रॉडबैंड सेवाएं उपलब्ध कराने में अहम भूमिका निभाएगा।  इस सैटेलाइट को इंटरनेट कनेक्टिविटी के लिए गेम चेंजर कहा जा रहा है। इसके काम शुरू करने के बाद देश में इंटरनेट स्पीड में क्रांति आ जाएगी। इसके जरिए हर सेकंड 100 गीगाबाइट से ऊपर की ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी मिलेगी।
कुछ साल पहले एक समय ऐसा भी था जब अमेरिका ने भारत के उपग्रहों को लाँच करने से मना कर दिया था। आज स्तिथि ये है कि अमेरिका सहित तमाम देश खुद भारत से अपने उपग्रहों को प्रक्षेपित करवा रहें हैं ।नवंबर 2018 में इसरो ने एक बार फिर अंतरिक्ष में इतिहास रचते हुए भारत सहित 9 देशों के 31 उपग्रहों को पोलर सैटलाइट लॉन्च वीइकल (पीएसएलवी) सी-43 के जरिए लॉन्च कर दिया. इस प्रक्षेपण की खास बात यह है कि इसरो ने दो साल में चौथी बार 30 से ज्यादा सैटेलाइट लॉन्च किए। जनवरी 2017 में 104 उपग्रह लॉन्च कर इसरो ने रिकॉर्ड बनाया था।   पीएसएलवी की 45वीं उड़ान है जिसमें एक माइक्रो और 29 नैनो सैटेलाइट शामिल हैं। पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (पीएसएलवी) की इस साल में यह छठी उड़ान थी। इसमें भारत के सबसे ताकतवर इमेजिंग सैटेलाइट हाइसइस के अलावा अमेरिका (23 उपग्रह) और ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, कोलंबिया, फिनलैंड, मलयेशिया, नीदरलैंड और स्पेन (प्रत्येक का एक उपग्रह) के उपग्रहों का प्रक्षेपण किया गया । इसरो के अनुसार इन उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए उसकी वाणिज्यिक इकाई (एंट्रिक्स कारपोरेशन लिमिटेड) के साथ करार किया गया है।
मुश्किल है एक साथ ज्यादा उपग्रहों की लॉन्चिंग  
इतने सारे उपग्रहों को एक साथ अंतरिक्ष में छोड़ना आसान काम नहीं है। इन्हें कुछ वैसे ही अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया गया जैसे स्कूल बस बच्चों को क्रम से अलग-अलग ठिकानों पर छोड़ती जाती हैं।  बेहद तेज गति से चलने वाले अंतरिक्ष रॉकेट के साथ एक-एक सैटेलाइट के प्रक्षेपण का तालमेल बिठाने के लिए बेहद काबिल तकनीशियनों और इंजीनियरों की जरुरत पड़ती है। हर सेटेलाइट तकरीबन 7.5 किलोमीटर प्रति सेकेंड की रफ्तार से प्रक्षेपित होता है । अंतरिक्ष प्रक्षेपण के बेहद फायदेमंद बिजनेस में इसरो को नया खिलाड़ी माना जाता है। भरोसेमंद लॉन्चिंग में इसरो की ब्रांड वेल्यू में लगातार इजाफा हो रहा है । इससे लॉन्चिंग के कई और कॉन्ट्रेक्ट एजेंसी की झोली में गिरने की उम्मीद है।
अंतरिक्ष में भारत के बढ़ते कदम  
कम लागत और लगातार सफल लांचिंग की वजह से दुनियाँ का हमारी स्पेस टेक्नॉलाजी पर भरोसा बढ़ा है तभी अमेरिका सहित कई विकसित देश अपने सैटेलाइट की लाँचिंग भारत से करा रहें है । फ़िलहाल हम अंतरिक्ष विज्ञान ,संचार तकनीक ,परमाणु उर्जा और चिकित्सा के मामलों में न सिर्फ विकसित देशों को टक्कर दे रहें है बल्कि कई मामलों में उनसे भी आगे निकल गएँ है । अंतरिक्ष बाजार में भारत के लिए संभावनाएं बढ़ रही है ,इसने अमेरिका सहित कई बड़े देशों का एकाधिकार तोडा है ।  असल में इन देशों को हमेशा यह लगता रहा है कि भारत यदि अंतरिक्ष के क्षेत्र में इसी तरह से सफ़लता हासिल करता रहा तो उनका न सिर्फ  उपग्रह प्रक्षेपण के क़ारोबार से एकाधिकार छिन जाएगा बल्कि मिसाइलों की दुनिया में भी भारत इतनी मजबूत स्थिति में पहुंच सकता है कि बड़ी ताकतों को चुनौती देने लगे . भारत अंतरिक्ष विज्ञान में नई सफलताएं हासिल कर विकास को अधिक गति दे सकता है । 
कुलमिलाकर अंतरिक्ष के क्षेत्र में  साल 2018 भारत के लिए बेहद शानदार रहा है । देश में गरीबी दूर करने  और विकसित भारत के सपने को पूरा करने में इसरो काफ़ी मददगार साबित हो सकता है । 
(लेखक राजस्थान की मेवाड़ यूनिवर्सिटी में डायरेक्टर और  टेक्निकल टूडे पत्रिका के संपादक हैं )

Monday, 24 December 2018

ग्रामीण भारत में आएगी इंटरनेट क्रांति

इंटरनेट कनेक्टिविटी के लिए गेम चेंजर है जीसैट-11

शशांक द्विवेदी 
एक बड़ी कामयाबी हासिल करते हुए भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो ने अब तक के सबसे वजनी सैटेलाइट का प्रक्षेपण कर दिया। दक्षिणी अमेरिका के फ्रेंच गुयाना के एरियानेस्पेस के एरियाने-5 रॉकेट से 5,854 किलोग्राम वजन वाले सबसे अधिक वजनीउपग्रह जीसैट-11 को लॉन्च किया गया। जीसैट-11 देशभर में ब्रॉडबैंड सेवाएं उपलब्ध कराने में अहम भूमिका निभाएगा। 
इस सैटेलाइट को इंटरनेट कनेक्टिविटी के लिए गेम चेंजर कहा जा रहा है। इसके काम शुरू करने के बाद देश में इंटरनेट स्पीड में क्रांति आ जाएगी। इसके जरिए हर सेकंड 100 गीगाबाइट से ऊपर की ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी मिलेगी। इसमें 40 ट्रांसपोर्डर कू-बैंड और का-बैंड फ्रीक्वेंसी में है जिनकी सहायता से हाई बैंडविथ कनेक्टिविटी 14 गीगाबाइट/सेकेंड डेटा ट्रांसफर स्पीड संभव है। इस सैटलाइट की खास बात है कि यह बीम्स को कई बार प्रयोग करने में सक्षम है, जिससे पूरे देश के भौगोलिक क्षेत्र को कवर किया जा सकेगा। इससे पहले के जो सैटलाइट लॉन्च किए गए थे उसमें ब्रॉड सिंगल बीम का प्रयोग किया गया था जो इतने शक्तिशाली नहीं होते थे कि बहुत बड़े क्षेत्र को कवर कर सकें। जीसैट-11 अगली पीढ़ी का हाई थ्रुपुट' संचार उपग्रह है और इसका जीवनकाल 15 साल से अधिक का है।
सैटलाइट के आपरेशनल होनें के बाद इससे देश में हर सेकंड 100 गीगाबाइट से ऊपर की ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी मिल सकेगी । ग्रामीण भारत में इंटरनेट क्रांति के लिहाज से यह प्रक्षेपण काफी महत्वपूर्ण है । इसरो प्रमुख के. सिवन के अनुसार जीसैट-11 भारत की बेहरीन अंतरिक्ष संपत्ति है।  यह भारत द्वारा निर्मित अब तक का  सबसे भारी, सबसे बड़ा  और सबसे शक्तिशाली उपग्रह है । यह अत्याधुनिक और अगली पीढ़ी का संचार उपग्रह है जिसे इसरो के आई-6के बस के साथ कंफिगर किया गया है।
फिलहाल जीसैट-11 के एरियन-5 से अलग होने के बाद कर्नाटक के हासन में स्थित इसरो की मास्टर कंट्रोल फैसिलिटी ने उपग्रह का कमांड और नियंत्रण अपने कब्जे में ले लिया गया है और इसरो के मुताबिक जीसैट-11 बिलकुल ठीक है। उपग्रह को फिलहाल जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट में स्थापित किया गया है। आगे वाले दिनों में धीरे-धीरे करके चरणबद्ध तरीके से उसे जियोस्टेशनरी (भूस्थिर) कक्षा में भेजा जाएगा। जियोस्टेशनरी कक्षा की ऊंचाई भूमध्य रेखा से करीब 36,000 किलोमीटर होती है। अभी जीसैट-11 को जियोस्टेशनरी कक्षा में 74 डिग्री पूर्वी देशांतर पर रखा जाएगा। उसके बाद उसके दो सौर एरेज और चार एंटिना रिफ्लेक्टर भी कक्षा में स्थापित किए जाएंगे। कक्षा में सभी परीक्षण पूरे होने के बाद उपग्रह काम करने लगेगा।
फ्रेंच गुयाना से क्यों हुई जीसैट-11 की लॉन्चिंग?
जीसैट-11 के प्रक्षेपण पर एक अहम सवाल और भी लोगों के दिमाग में है कि फ्रेंच गुयाना से ही क्यों हुई जीसैट-11 की लॉन्चिंग? अगर भारत अब अपने सारे उपग्रह भेजने में सक्षम है तो फिर ऐसा क्यों किया गया  ? असल में कई बार इसरो अपने सैटेलाइट्स को लांच करने के लिए यूरोपियन स्पेस एजेंसी के जरिए फ्रेंच गुयाना के कोऊरू से भेजता है। जीसैट-11 इसका सबसे हालिया उदाहरण है। यह इसरो का बनाया अब तक का सबसे भारी उपग्रह था। वहाँ से लांचिंग की कई बड़ी वजहें हैं जिसमें सबसे प्रमुख यह है कि दक्षिण अमेरिका स्थित फ्रेंच गुयाना के पास लंबी समुद्री रेखा है, जो इसे रॉकेट लांचिंग के लिए और भी मुफीद जगह बनाती है। इसके अलावा फ्रेंच गुयाना एक भूमध्यरेखा के पास स्थित देश है, जिससे रॉकेट को आसानी से पृथ्वी की कक्षा में ले जाने में और मदद मिलती है। जियोस्टेशनरी कक्षा की ऊंचाई भूमध्य रेखा से करीब 36,000 किलोमीटर होती है। ज्यादातर रॉकेट पूर्व की ओर से छोड़े जाते हैं ताकि उन्हें पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करने के लिए पृथ्वी की गति से भी थोड़ी मदद मिल सके। दरअसल पृथ्वी पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है। वैश्विक स्तर की सुविधाओं से युक्त होने, राकेट के लिए ईंधन आदि की पर्याप्तता आदि ऐसी वजहें हैं जिनके चलते भी इसरो अपने बेहद महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट्स के लांच के लिए फ्रेंच गुयाना को एक मुफीद लॉन्च साइट मानता रहा है।
हाल के वर्षों में इंटरनेट सेवा प्रदान करने के लिए जियोस्टेशनरी उपग्रह एक विकल्प के तौर पर उभरे हैं। जियोस्टेशनरी उपग्रह धरती की भूमध्यरेखा से 36,000 किलोमीटर ऊपर स्थित होते हैं यह बहुत बड़े क्षेत्र को कवर करते हैं। एक उपग्रह धरती के एक तिहाई हिस्से को कवर कर सकता है। इससे इंटरनेट सेवा प्रदाता (आईएसपी) को व्यापक भौगोलीय क्षेत्र में ग्राहक हासिल करने की छूट मिलती है । जियोस्टेशनरी उपग्रह हाई थ्रूपुट सेटेलाइट (एचटीएस) के जरिए स्पॉटबीम सेवा उच्च डेटा दर उपलब्ध करवातें हैं । आईएसपी और ग्राहक दोनों ही सेटेलाइट के जरिए एंटेना डिश लगा कर बिना तार के जुड़े होते हैं।वास्तव में ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट कनेक्टिविटी बढ़ाने की जरूरत को बहुत गंभीरता से महसूस किया जा रहा है। इसके साथ ही सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और युवा कार्यबल के साथ भारत डिजिटल डिवाइड’ को दूर करने का संघर्ष कर रहा है। अब तक देश के लगभग ५० करोड़ लोग इंटरनेट से जुड़ चुके हैं। लेकिन अभी भी देश की आधे से ज्यादा आबादी इंटरनेट से दूर है ऐसे में हमें ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट कनेक्टिविटी पर विशेष ध्यान देना होगा ।
इंटरनेट कनेक्टिविटी के साथ साथ भारत में इंटरनेट की स्पीड पर भी ध्यान देना होगा .देश की काफी बड़ी युवा आबादी आजकल मोबाईल में इंटरनेट का प्रयोग कर रही है लेकिन इंटरनेट स्पीड की समस्या यहाँ पर भी है। स्पीडटेस्ट वैश्विक सूचकांक में मोबाइल इंटरनेट की स्पीड के मामले में दुनिया में हमारा 109वां और फिक्स्ड ब्रॉडबैंड के मामले में 76वां स्थान बताता है कि अभी गुणवत्तापूर्ण इंटरनेट कनेक्टिविटी के लिए हमें लंबा रास्ता तय करना है। दुनिया की औसत मोबाइल इंटरनेट डाउनलोड स्पीड 20.28 एमबीपीएस है, जबकि हमारी 8.80 एमबीपीएस। हालांकि ब्रॉडबैंड डाउनलोड स्पीड के मामले में हमारी स्थिति थोड़ी सुधरी है। वैश्विक औसत 40.11 एमबीपीएस की तुलना में ब्रॉडबैंड में हमारी स्पीड अब 18.82 एमबीपीएस है। इस मोबाइल इंटरनेट सूचकांक में पड़ोसी देश म्यांमार 94वें, नेपाल 99वें और पाकिस्तान 89वें पायदान पर हैं। ऐसे में ब्रॉडबैंड स्पीड से कहीं अधिक भारत को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि अच्छी गुणवत्ता की मोबाइल इंटरनेट कनेक्टिविटी देश के तमाम उपभोक्ताओं को मिले, क्योंकि यह न सिर्फ एक लोकप्रिय माध्यम है, बल्कि विशेषकर गांवों में लोगों के ऑनलाइन होने का सुलभ तरीका भी। फिलहाल जीसैट-11 की सफल लांचिंग से अब यह उम्मीद जगी है कि इंटरनेट की कनेक्टिविटी के साथ साथ अब इंटरनेट की स्पीड के मामलें में भी भारत तरक्की करेगा   
फ़िलहाल हम अंतरिक्ष विज्ञान ,संचार तकनीक ,परमाणु उर्जा और चिकित्सा के मामलों में न सिर्फ विकसित देशों को टक्कर दे रहें है बल्कि कई मामलों में उनसे भी आगे निकल गएँ है । अंतरिक्ष में भारत के लिए संभावनाएं बढ़ रही है, इसने अमेरिका सहित कई बड़े देशों का एकाधिकार तोडा है। कुलमिलाकर जीसैट-11 भारत की मुख्य भूमि और द्वीपीय क्षेत्र में हाई-स्पीड डेटा सेवा मुहैया कराने में बड़ा मददगार साबित होगा। साथ ही चार संचार उपग्रहों के माध्यम से देश में 100 जीबीपीएस डेटा स्पीड मुहैया कराने का लक्ष्य रखा गया है। इस श्रेणी में जीसैट-11 तीसरा संचार उपग्रह है। संचार उपग्रह के मामले में भारी होने का मतलब है कि वो बहुत ताकतवर है और लंबे समय तक काम करने की क्षमता रखता है। साथ ही यह अब तक बने सभी सैटेलाइट में ये सबसे ज्यादा बैंडविथ साथ ले जाना वाला उपग्रह भी होगा। और इससे पूरे भारत में इंटरनेट की सुविधा मिल सकेगी खासकर ग्रामीण भारत में इसके जरिये इंटरनेट क्रांति संभव होगी जो देश के विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण है ।
(लेखक राजस्थान की मेवाड़ यूनिवर्सिटी में डायरेक्टर और टेक्निकल टूडे पत्रिका के संपादक हैं)

अंतरिक्ष में भारत की बढ़ती धमक


शशांक द्विवेदी 
इसरो ने एक बार फिर अंतरिक्ष में इतिहास रचते हुए भारत सहित 9 देशों के 31 उपग्रहों को पोलर सैटलाइट लॉन्च वीइकल (पीएसएलवी) सी-43 के जरिए लॉन्च कर दिया । इस प्रक्षेपण की खास बात यह है कि इसरो ने दो साल में चौथी बार 30 से ज्यादा सैटेलाइट लॉन्च किए। जनवरी 2017 में 104 उपग्रह लॉन्च कर इसरो ने रिकॉर्ड बनाया था।
ग्लोबल सैटेलाइट मार्केट में भारत की हिस्सेदारी बढ़ रही है। अभी यह इंडस्ट्री 200 अरब ड़ालर से ज्यादा की है । फ़िलहाल इसमें अमेरिका की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है जबकि भारत की हिस्सेदारी अब लगातार साल दर साल बढ़ रही है । सैटेलाइट ट्रांसपोंडर को लीज पर देने,  भारतीय और विदेशी क्लाइंटस को रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट की सेवाओं को देने के बदले में हुई कमाई से इसरो का राजस्व लगातार बढ़ रहा है । एक साथ कई उपग्रहों के प्रक्षेपण के सफल होने से दुनिया भर में छोटी सैटेलाइट लॉन्च कराने के मामले में इसरो पहली पसंद बन जाएगा, जिससे देश को आर्थिक तौर पर फायदा होगा।  पीएसएलवी की यह 45वीं उड़ान थी जिसमें एक माइक्रो और 29 नैनो सैटेलाइट शामिल हैं। पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (पीएसएलवी) की इस साल में यह छठी उड़ान थी। इसमें भारत के सबसे ताकतवर इमेजिंग सैटेलाइट हाइसइस के अलावा अमेरिका (23 उपग्रह) और ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, कोलंबिया, फिनलैंड, मलयेशिया, नीदरलैंड और स्पेन (प्रत्येक का एक उपग्रह) के उपग्रहों का प्रक्षेपण किया गया । इसरो के अनुसार इन उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए उसकी वाणिज्यिक इकाई (एंट्रिक्स कारपोरेशन लिमिटेड) के साथ करार किया गया है।
कुछ साल पहले एक समय ऐसा भी था जब अमेरिका ने भारत के उपग्रहों को लाँच करने से मना कर दिया था। आज स्तिथि ये है कि अमेरिका सहित तमाम देश खुद भारत से अपने उपग्रहों को प्रक्षेपित करवा रहें हैं ।
कम लागत और बेहतरीन टेक्नोलॉजी की वजह से आज दुनियाँ के कई देश इसरों के साथ व्यावसायिक समझौता करना चाहतें है। अब पूरी दुनिया में सैटलाइट के माध्यम से टेलीविजन प्रसारण , मौसम की भविष्यवाणी और दूरसंचार का क्षेत्र बहुत तेज गति से बढ़ रहा है और चूंकि ये सभी सुविधाएं उपग्रहों के माध्यम से संचालित होती हैं इसलिए उपग्रहों को अंतरिक्ष में स्थापित करने की मांग में तेज बढ़ोतरी हो रही है। हालांकि इस क्षेत्र में चीन, रूस, जापान आदि देश प्रतिस्पर्धा में हैं, लेकिन यह बाजार इतनी तेजी से बढ़ रहा है कि यह मांग उनके सहारे पूरी नहीं की जा सकती। ऐसे में व्यावसायिक तौर पर यहाँ भारत के लिए बहुत संभावनाएं है । कम लागत और सफलता की गारंटी इसरो की सबसे बड़ी ताकत है जिसकी वजह से स्पेस इंडस्ट्री में आने वाला समय भारत के एकाधिकार का होगा ।
हालिया प्रक्षेपित हाइपर स्पेक्ट्रल इमेजिंग उपग्रह (हाइसइस) को 44.4 मीटर लंबे और 230 टन वजनी पीएसएलवी सी-43  से रॉकेट से छोड़ा गया है । पृथ्वी की निगरानी के लिए इसरो ने हाइसइस को विशेष रूप से तैयार किया है । हाइसइस पृथ्वी की मैग्नेटिक फील्ड का भी अध्ययन करेगा, साथ ही सतह का भी अध्ययन करेगा। एक विशेष चिप की मदद से तैयार किया गया ऑप्टिकल इमेजिंग डिटेक्टर ऐरे रणनीतिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। हाइसइस की मदद से पृथ्वी धरती के चप्पे-चप्पे पर नजर रखना आसान हो जाएगा. अब धरती से 630 किमी दूर अंतरिक्ष से पृथ्वी पर मौजूद वस्तुओं के 55 विभिन्न रंगों की पहचान आसानी से की जा सकेगी। इस उपग्रह का उद्देश्य पृथ्वी की सतह के साथ इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पैक्ट्रम में इंफ्रारेड और शॉर्ट वेव इंफ्रारेड फील्ड का अध्ययन करना है। हाइपर स्पेक्ट्रल इमेजिंग या हाइस्पेक्स इमेजिंग की एक खूबी यह भी है कि यह डिजिटल इमेजिंग और स्पेक्ट्रोस्कोपी की शक्ति को जोड़ती है। हाइस्पेक्स इमेजिंग अंतरिक्ष से एक दृश्य के हर पिक्सल के स्पेक्ट्रम को पढ़ने के अलावा पृथ्वी पर वस्तुओं, सामग्री या प्रक्रियाओं की अलग पहचान भी करती है। इससे पर्यावरण सर्वेक्षण, फसलों के लिए उपयोगी जमीन का आकलन, तेल और खनिज पदार्थों की खानों की खोज आसान होगी।
असल में इतने सारे उपग्रहों को एक साथ अंतरिक्ष में छोड़ना आसान काम नहीं है। इन्हें कुछ वैसे ही अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया जाता है जैसे स्कूल बस बच्चों को क्रम से अलग-अलग ठिकानों पर छोड़ती जाती हैं।  बेहद तेज गति से चलने वाले अंतरिक्ष रॉकेट के साथ एक-एक सैटेलाइट के प्रक्षेपण का तालमेल बिठाने के लिए बेहद काबिल तकनीशियनों और इंजीनियरों की जरुरत पड़ती है। अंतरिक्ष प्रक्षेपण के बेहद फायदेमंद बिजनेस में इसरो को नया खिलाड़ी माना जाता है। इस कीर्तिमान के साथ सस्ती और भरोसेमंद लॉन्चिंग में इसरो की ब्रांड वेल्यू में इजाफा होगा। इससे लॉन्चिंग के कई और कॉन्ट्रेक्ट एजेंसी की झोली में गिरने की उम्मीद है।
कम लागत और लगातार सफल लांचिंग की वजह से दुनियाँ का हमारी स्पेस टेक्नॉलाजी पर भरोसा बढ़ा है तभी अमेरिका सहित कई विकसित देश अपने सैटेलाइट की लाँचिंग भारत से करा रहें है । फ़िलहाल हम अंतरिक्ष विज्ञान ,संचार तकनीक ,परमाणु उर्जा और चिकित्सा के मामलों में न सिर्फ विकसित देशों को टक्कर दे रहें है बल्कि कई मामलों में उनसे भी आगे निकल गएँ है । अंतरिक्ष बाजार में भारत के लिए संभावनाएं बढ़ रही है ,इसने अमेरिका सहित कई बड़े देशों का एकाधिकार तोडा है ।  असल में, इन देशों को हमेशा यह लगता रहा है कि भारत यदि अंतरिक्ष के क्षेत्र में इसी तरह से सफ़लता हासिल करता रहा तो उनका न सिर्फ  उपग्रह प्रक्षेपण के क़ारोबार से एकाधिकार छिन जाएगा बल्कि मिसाइलों की दुनिया में भी भारत इतनी मजबूत स्थिति में पहुंच सकता है कि बड़ी ताकतों को चुनौती देने लगे। पिछले दिनों दुश्मन मिसाइल को हवा में ही नष्ट करनें की क्षमता वाली इंटरसेप्टर मिसाइल का सफल प्रक्षेपण इस बात का सबूत है कि भारत  बैलेस्टिक मिसाइल रक्षा तंत्र के विकास में भी बड़ी कामयाबी हासिल कर चुका है . दुश्मन के बैलिस्टिक मिसाइल को हवा में ही ध्वस्त करने के लिए भारत ने सुपरसोनिक इंटरसेप्टर मिसाइल बना कर दुनियाँ के विकसित देशों की नींद उड़ा दी है ।
अरबों डालर का मार्केट होनें की वजह से भविष्य में अंतरिक्ष में प्रतिस्पर्धा बढेगी । इसमें और प्रगति करके इसका बड़े पैमाने पर वाणिज्यिक उपयोग भी संभव है । ऐसे में भारत अंतरिक्ष विज्ञान में नई सफलताएं हासिल कर विकास को अधिक गति दे सकता है । जोकिन देश में गरीबी दूर करने  और विकसित भारत के सपने को पूरा करने में इसरो काफ़ी मददगार साबित हो सकता है । कुलमिलाकर एक साथ कई उपग्रहों के सफलतापूर्वक प्रक्षेपण से इसरों को बहुत व्यावसायिक फायदा होगा जो भविष्य में  इसरों के लिए संभावनाओं के नयें दरवाजें खोल देगी जिससे भारत को निश्चित रूप से बहुत फ़ायदा पहुंचेगा ।
अब समय आ गया है जब इसरो व्यावसायिक सफ़लता के साथ साथ अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा की तरह अंतरिक्ष अन्वेषण पर भी ज्यादा ध्यान दे। इसरो को अंतरिक्ष अन्वेषण और शोध के लिए दीर्घकालिक रणनीति बनानी होगी ।क्योंकि जैसे जैसे अंतरिक्ष के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढेगी अंतरिक्ष अन्वेषण बेहद महत्वपूर्ण होता जाएगा। इस काम इसके लिए सरकार को इसरो का सालाना बजट भी बढ़ाना पड़ेगा जो फिलहाल नासा के मुकाबले काफ़ी कम है । भारी विदेशी उपग्रहों को अधिक संख्या में प्रक्षेपित करने के लिए अब हमें पीएसएलवी के साथ साथ जीएसएलवी रॉकेट का भी उपयोग करना होगा । पीएसएलवी अपनी सटीकता के लिए दुनियाँ भर में प्रसिद्द है लेकिन ज्यादा भारी उपग्रहों के लिए जीएसएलवी का प्रयोग करना होगा।मानवयुक्त अंतरिक्ष अभियान पर भी इसरो को जल्द काम शुरू करना होगा ।
(लेखक राजस्थान की मेवाड़ यूनिवर्सिटी में डायरेक्टर और टेक्निकल टूडे पत्रिका के संपादक हैं)

Friday, 5 October 2018

ग्लोबल वार्मिंग का इलाज


चंद्रभूषण 
बढ़ती कार्बन डाइऑक्साइड अगले कुछ ही वर्षों में ग्लोबल वार्मिंग को बेकाबू बना सकती है। पेरिस सम्मेलन में सदी के अंत तक धरती का तापमान 2 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा न बढ़ने देने के लिए यह तय किया गया कि तब तक कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन बिल्कुल रोक दिया जाए और फिर इस गैस को सिस्टम से बाहर करने के प्रयास चलाए जाएं। लेकिन यह बात कहने में जितनी सटीक थी, व्यवहार में उतनी ही बोगस साबित हो रही है। दुनिया में हर जगह अंधाधुंध गाड़ियां बिक रही हैं और कार्बन का उत्सर्जन दिनोंदिन तेज ही होता जा रहा है। इसके सोख्ते के तौर पर खूब सारे पेड़ लगाने की बात और भी बोगस है क्योंकि इसके नाम पर हर जगह सिर्फ सरकारी पैसे खाए जा रहे हैं।
ऐसे में वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड हटाने का एक ही रास्ता बचता है कि किसी तरह इसे सीधे ही चूस लिया जाए। डायरेक्ट एयर कैप्चरनाम की इस मुहिम में हवा को बड़े-बड़े पंखों से खींचकर किसी ऐसे केमिकल से गुजारा जाता है, जो कार्बन डाइऑक्साइड सोख ले। फिर उससे यह गैस निकालकर केमिकल को दोबारा काम पर लगा दिया जाए। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के भौतिकशास्त्री डेविड कीथ ने कनाडा में ऐसा एक पायलट प्रॉजेक्ट शुरू किया, जिसकी लागत पिछले कुछ सालों में 600 डॉलर से घटकर 100 डॉलर प्रति टन कार्बन डाइऑक्साइड तक आ गई है। आगे इससे 1 डॉलर प्रति लीटर का ईंधन बनाया जा सकेगा। सरकारें पर्यावरण को लेकर गंभीर हों तो 2030 तक इस प्रयास से कुछ ठोस उम्मीद बांधी जा सकती है।


Friday, 14 September 2018

आइए, हिंदी दिवस पर अंग्रेजी से सीखें


हरजिंदर, वरिष्ठ पत्रकार 
इस महीने की शुरुआत हिंदी के लिए एक अच्छी खबर के साथ हुई थी। ऑनलाइन कारोबार की अगुवा कंपनी अमेजनने अपना हिंदी साइट शुरू किया है। यानी हिंदी अब ऑनलाइन खरीदारी की भाषा भी बन गई है। बेशक, इस बहुराष्ट्रीय कंपनी ने ऐसा हिंदी की सेवा के लिए नहीं किया, बल्कि हिंदीभाषी समुदाय के बीच अपनी कारोबारी संभावनाओं के विस्तार के लिए किया है। संचार सुविधाओं के प्रसार ने स्मार्टफोन को अब देश के उन कोनों तक पहंुचा दिया है, जहां अंग्रेजी अपनी पकड़ खो बैठती है। ऐसे लोगों की क्रय-क्षमता के दोहन के लिए भारतीय भाषाओं का सहारा लेना तकरीबन सभी ऑनलाइन कंपनियों की मजबूरी बनता जा रहा है। अमेजन ने तो हिंदी के साथ ही तमाम दूसरी भारतीय भाषाओं की मदद लेने की घोषणा भी कर दी है। लेकिन हिंदी की शुरुआत सबसे पहले हुई है, क्योंकि हिंदी ही ऐसी भाषा है, जिससे देश के बड़े भौगोलिक विस्तार तक पहंुच बनाई जा सकती है।  
मानक हिंदी के तौर पर आज जिस खड़ी बोली का इस्तेमाल किया जाता है, उसे लेकर एक धारणा यह भी है कि यह भाषा हाट और बाजार में पैदा हुई, वहीं पली-बढ़ी है। तमाम तरह के समाजवादी रुझानों के चलते हिंदी क्षेत्र की राजनीति भले ही लंबे समय तक बाजार की संभावनाओं के खिलाफ खड़ी दिखाई देती रही हो, लेकिन सच यही है कि जैसे-जैसे बाजार का विस्तार हुआ है, हिंदी का आधार मजबूत होता गया है। चाहे वह फिल्मों के रूप में मनोरंजन का बाजार हो या फिर उपभोक्ता उत्पादों का। उत्पाद के ऊपर के सारे लेबल भले ही अंग्रेजी में हों, लेकिन अगर उसे बेचना है, तो विज्ञापन हिंदी में ही देने होंगे। यह बात देसी-विदेशी कंपनियों ने बहुत पहले ही समझ ली थी कि उत्पादन प्रक्रिया की भाषा          भले ही कोई भी हो, पर उपभोक्ताओं से संवाद की          भाषा स्थानीय ही रखनी होगी। हालांकि इसमें एक विडंबना भी छिपी है कि हिंदी के जो विज्ञापन दिन-रात हमारे दिल-दिमाग पर छाए रहते हैं, उनके खुद के उत्पादन की भाषा अंग्रेजी है।
वैसे यह विडंबना कोई नई नहीं है। यह ऐसी समस्या नहीं है, जो अंग्रेजों या अंग्रेजी के साथ आई हो। ज्ञान-विज्ञान व प्रशासन की भाषा और लोक भाषा के बीच का अंतर भारत में काफी समय से रहा है, शायद सदियों से। और जहां ज्ञान-विज्ञान व प्रशासन की भाषा हिंदी बनाने की कोशिश हुई है, वहां एक ऐसी हिंदी सामने आई है, जो कुछ भी हो, लोकभाषा नहीं है। इसे अच्छी तरह समझना हो, तो उत्तर प्रदेश के किसी कल-कारखाने में चले जाइए। वहां नियम यह है कि मजदूरों व कर्मचारियों से संबंधित कानूनों को हिंदी में लिखकर दीवार पर चिपकाना होगा, ताकि कर्मचारी उन्हें आसानी से पढ़ सकें। लेकिन पढ़ सकने का सच यह है कि मजदूर या कर्मचारी तो दूर, हिंदी भाषा में पीएचडी करने वाला भी उस भाषा को पढ़कर समझ नहीं सकता। एक दूसरा उदाहरण दिल्ली मेट्रो है, जहां हर कुछ देर के बाद यह उद्घोषणा होती है- दृष्टिबाधित व्यक्तियों हेतु बने स्पर्शणीय पथ पर न चलें।शासन-प्रशासन के लिए हिंदी के इस्तेमाल पर जोर देने वालों ने हमें जो अनुवाद की भाषा दी है, उसने दरअसल अंग्रेजी की सत्ता को ही मजबूत करने का काम किया है। 
लेकिन हिंदी लोकभाषा बनी रहने के साथ ही ज्ञान-विज्ञान और शासन-प्रशासन की भाषा भी बने, यह हिंदी क्षेत्र का पुराना सपना है। हर साल हिंदी दिवस दरअसल इसी सपने को दोहराने व संकल्प बनाने की सोच के साथ आता और चला जाता है। इस दिन हम हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की बात तो करते ही हैं, उसे विश्व भाषा बनाने के लिए जुट जाने की भी सोचते हैं। वैसे हिंदी एक अर्थ में विश्व भाषा तो है ही, यह दुनिया की चौथी सबसे          ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है और इस मामले में अंग्रेजी से थोड़ा ही नीचे है। लेकिन जब यह तर्क दिया जाता          है, तो बात दरअसल इसे अंग्रेजी की तरह प्रभावी भाषा बनाने की होती है, वरना अंग्रेजी भी तीसरे नंबर की           बोली जाने वाली भाषा ही है। उससे ऊपर चीन की मंदारिन और स्पेनिश है, हिंदी दिवस पर हम इन भाषाओं की बात कभी  नहीं करते। 
यहां यह जान लेना जरूरी है कि पिछले तकरीबन दो सौ साल में अंग्रेजी दुनिया की इतनी प्रभावी भाषा कैसे बन गई? इसका एक श्रेय अंग्रेजी साम्राज्यवाद को दिया जाता है, हालांकि यह आधा ही सच है। सही-गलत जो भी तरीका अपनाया गया हो, पर एक दौर में अंग्रेजी समाज इतना ताकतवर हो गया कि दुनिया के एक बहुत बड़े हिस्से में अपना सिक्का चलाने की स्थिति में आ गया। अंग्रेजों ने दुनिया के तमाम देशों पर न सिर्फ अपने देश की आबोहवा में पनपे नियम-कानूनों, तौर-तरीकों, भोजन-पहनावों, पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों, यहां तक कि मछलियों को थोपा, बल्कि उन्हें अपनी भाषा के साथ चलने चलाने की मजबूरी भी दी। इसी के साथ दूसरा आधा सच यह है कि अंग्रेजी दरअसल औद्योगिक क्रांति की भी भाषा थी। औद्योगिक क्रांति और उसके उत्पादों के साथ यह दुनिया के उन कोनों में भी पहंुच गई, जहां अंग्रेजों का साम्राज्यवाद भी नहीं पहुंच पाया था। 
अंग्रेजी के इस इतिहास का सबक सिर्फ इतना है कि कोई भाषा जब किसी बड़े बदलाव की भाषा या उसका जरिया बनती है, तो जहां-जहां वह बदलाव पहंुचता है, वहां-वहां वह भाषा भी अपनी जड़ें जमाने लगती है। इसे इस तरह भी देखें कि आज हम जिस हिंदी का इस्तेमाल करते हैं, उसे विस्तार मिलना तब शुरू हुआ, जब देश के एक बड़े हिस्से में स्वतंत्रता संग्राम की भाषा बनी। यह स्वतंत्रता संग्राम ही था, जिसने पंजाबी, गुजराती और मराठीभाषी क्षेत्रों में हिंदी को सहज स्वीकार्य बनाया।
एक दूसरी तरह से देखें, तो भाषा की जमीन और उसके आसमान का मामला सेवा, सपने और संकल्प का मामला नहीं है, बल्कि यह उस भाषा-भाषी समाज की समृद्धि, ताकत और उसके किसी मंजिल विशेष की ओर बढ़ने का मामला है। आइए, इस हिंदी दिवस पर हिंदीभाषी समाज को समृद्ध और ताकतवर बनाने का संकल्प लें। फिर हिंदी अपने आप ताकतवर हो जाएगी- एक के साधे सब सधे।


विज्ञान-तकनीक की भी भाषा बने हिंदी

सूर्यकांत मिश्र

जब रूस, चीन, जर्मनी, फ्रांस आदि अपनी भाषा का प्रयोग कर समर्थ बन सकते हैं तो हम क्यों नहीं बन सकते?


दुनिया में चीन की भाषा मंदरिन के बाद हिंदी बोलने वाले दूसरे स्थान पर हैं। अंतरराष्ठीय संपर्क भाषा अंग्रेजी होने के बावजूद हिंदी भी धीरे-धीरे अपना अंतरराष्ट्रीय स्थान ग्रहण कर रही है। भारत की बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था, बढ़ता हुआ बाजार, हिंदी भाषी उपभोक्ता, हिंदी सिनेमा, प्रवासी भारतीय, हिंदी का विश्व बंधुत्व भाव हिंदी को बढ़ाने में सहायक सिद्ध हो रहे हैं। यही कारण है कि अब अंग्रेजी माध्यम के कई टीवी चैनलों को हिंदी भाषा में प्रस्तुतीकरण करना पड़ रहा है। हिंदी भाषा को विश्व पटल पर स्थापित करने के लिए एक बड़ी चुनौती संयुक्त राष्ट्र में हिंदी भाषा को सातवीं भाषा के रूप में स्थान दिलाना है। इसके लिए भारत के विदेश मंत्रलय की ओर से प्रयास किए जा रहे हैं। इसी के तहत विश्व हिंदी सचिवालय की मॉरीशस में स्थापना हुई, जिसका उद्घाटन इसी वर्ष मार्च में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा किया गया। हाल में विश्व हिंदी सम्मेलन भी मारीशस में ही संपन्न हुआ। यह भी अच्छा है कि संयुक्त राष्ट्र की ओर से सप्ताह में एक दिन-शुक्रवार को हिंदी भाषा में एक समाचार बुलेटिन का प्रसारण शुरू किया गया है। इससे दुनिया भर में फैले हिंदी भाषियों को अपनी भाषा में संयुक्त राष्ट्र द्वारा विश्व के समाचार प्राप्त होने शुरू हो गए हैं। विश्व पटल पर हिंदी को स्थापित करने में सबसे बड़ा कदम पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा तब उठाया गया था, जब उन्होंने 1977 में भारत के विदेश मंत्री के रूप में संयुक्त राष्ट्र महासभा को पहली बार हिंदी में संबोधित किया था। कुछ समय पहले संपन्न वल्र्ड इकोनॉमिक फोरम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा भी हिंदी में संबोधन देना उसी कड़ी को आगे बढ़ाने वाला रहा। भाषा को आगे बढ़ाने के लिए राजनीतिक प्रतिबद्धता बहुत आवश्यक होती है। यह प्रतिबद्धता अंतरराष्ट्रीय स्तर के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर भी मजबूती से प्रदर्शित की जाए, इसकी प्रबल आवश्यकता है। आज हिंदी पूरी दुनिया में सिर्फ बोल चाल और संपर्क भाषा के रूप में ही नहीं बढ़ रही है, बल्कि आधुनिक भी होती जा रही है। हिंदी भाषा के आधुनिक बाजार को देखते हुए गूगल, याहू इत्यादि भी हिंदी भाषा को बढ़ावा दे रहे हैं। आज हिंदी केवल भारत, भारतवासियों, प्रवासी भारतीयों की भाषा ही नहीं है, बल्कि कई विकसित और विकासशील देशों में हिंदी अपना स्थान बना रखी है। अमेरिका जैसे सबसे समर्थ राष्ट्र में हिंदी भाषा के प्रचार प्रसार के लिए 150 संस्थान हिंदी को सिखा रहे हैं। अन्य पश्चिमी देशों में भी हिंदी पढ़ाई जा रही है। इसके चलते हिंदी समर्थ हो रही है। उसमें नए-नए शब्द समाहित हो रहे हैं। हिंदी भाषा में 25 लाख से ज्यादा अपने शब्द हैं। दुनिया में समाचार पत्रों में सबसे ज्यादा हिंदी के समाचार पत्र हैं। इसे देखते हुए हम कह सकते हैं कि विश्व पटल पर हिंदी अपना प्रमुख स्थान बना रही है, लेकिन उसके समक्ष अनेक चुनौतियां भी हैं। ये चुनौतियां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं, राष्ट्रीय स्तर पर भी हैं। हिंदी की स्वीकार्यता बढ़ाना अभी भी एक अधूरा लक्ष्य बना हुआ है। हिंदी को जीवन के विविध क्षेत्रों जैसे विज्ञान, चिकित्सा विज्ञान, तकनीक, विधि, अर्थशास्त्र, संचार विज्ञान और अन्य अनेक क्षेत्रों में समृद्ध करना अभी भी शेष है। विज्ञान, तकनीक, विधि और चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में हंिदूी भाषा को समृद्ध करने के प्रयास और संघर्ष होते रहे हैं। कुछ संघर्ष तो खासे लंबे खिंचे। बतौर उदाहरण आइआइटी दिल्ली के छात्र श्यामरुद्र पाठक का संघर्ष। 1985 में जब उन्होंने आइआइटी दिल्ली के छात्र के तौर पर बीटेक की प्रोजेक्ट रिपोर्ट हिंदी में लिखी तो उसे अस्वीकार कर दिया गया। जब वह अपनी प्रोजेक्ट रिपोर्ट हिंदी में ही पेश करने को लेकर अडिग बने रहे तो उनका मामला संसद में गूंजा। आखिरकार आइआइटी दिल्ली के प्रशासन को झुकना पड़ा। इसके बाद पाठक ने अन्य क्षेत्रों में हिंदी के हक के लिए लड़ना शुरू किया। ऐसे कुछ और लोग हैं जो इसके लिए संघर्षरत हैं कि सुप्रीम कोर्ट में न्याय अपनी भाषा में मिले और संसद में कानून के निर्माण की भाषा हंिदूी हो। क्या यह विडंबना नहीं कि देश की सबसे बड़ी अदालत में न्याय की भाषा हमारी अपनी नहीं? इसी तरह संसद में विधि निर्माण की भाषा भी मूलत: अंग्रेजी है। श्यामरुद्र पाठक के संघर्ष का स्मरण करते हुए मैं यह उल्लेख करना चाहूंगा कि 1991 में जब मैंने अपने एमडी पाठ्यक्रम की थीसिस हिंदी में प्रस्तुत करने का निर्णय किया तो किंग जार्ज मेडिकल कालेज, लखनऊ के तत्कालीन प्रशासन के विरोध के फलस्वरूप लगभग एक वर्ष तक संघर्ष करना पड़ा। अंतत: जब उत्तर प्रदेश विधानसभा से सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित हुआ तब मुङो हंिदूी में शोध प्रबंध जमा करने की अनुमति मिली। हम इसकी अनदेखी नहीं कर सकते कि दुनिया के लगभग सभी विकसित देशों ने अपनी भाषा में ही विज्ञान, तकनीक और चिकित्सा विज्ञान में पढ़ाई को महत्व दिया है। रूस, चीन , जर्मनी, जापान, फ्रांस जैसे सक्षम देशों में प्रारंभिक से लेकर उच्च शिक्षा की पढ़ाई उनकी अपनी भाषा में होती है। आखिर जब ये देश अपनी-अपनी भाषा का प्रयोग कर समर्थ बन सकते हैं तो हम क्यों नहीं बन सकते? माना कि अंग्रेजी अंतरराष्ट्रीय भाषा है, लेकिन यह कहना सही कैसे है कि वह प्रगति की भी भाषा है? भारतीय भाषा सर्वेक्षण की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में केवल 7-8 प्रतिशत लोग ही अंग्रेजी भाषा में पारंगत है, बाकी हिंदी अथवा अन्य भारतीय भाषाओं का प्रयोग करते हैं। हमारे देश में लगभग 500 मेडिकल कॉलेज हैं और सभी में चिकित्सा शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी है। अधिकतर मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस प्रथम वर्ष में चिकित्सकीय पाठ्यक्रम के अतिरिक्त अंग्रेजी भाषा की भी पढ़ाई होती है ताकि छात्र एमबीबीएस की पढ़ाई समझने के लिए अंग्रेजी भाषा में पारंगत हो सकें। इस समस्या को दूर करने का एक मात्र उपाय यही है कि उच्च शिक्षा का माध्यम भी हंिदूी एवं अन्य भारतीय भाषाओं में हो ताकि विद्यार्थियों को अपनी सरल भाषा में शिक्षा मिले और उन्हें अंग्रेजी सीखने का अतिरिक्त मानसिक बोझ न पड़े। यह एक तथ्य है कि छात्रों का अच्छा-खासा समय अंग्रेजी सीखने में खप जाता है। यह समय के साथ ऊर्जा की बर्बादी है। यह बर्बादी इसलिए हो रही है कि अच्छी उच्च शिक्षा अंग्रेजी में ही उपलब्ध है। (लेखक किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय, लखनऊ में रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग के विभागाध्यक्ष हैं)

Tuesday, 31 July 2018

आत्मनिर्भर बनने की ओर अग्रसर है CSIR

आमतौर पर फंड के दबाव से जूझते रहने और सरकारी अनुदानों पर आश्रित होने का तगमा झेल रही केंद्र सरकार के कई संस्थाओं से अलग विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय की महत्वपूर्ण संस्था सीएसआईआर (CSIR) ने विगत 3 सालों में कैसे अपनी कमाई को दोगुना कर लिया है और कैसे आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रही है ये एक पहेली से कम नहीं। यहां ये जानना जरूरी है कि सीएसआईआर ने बाहरी कैश-फ्लो बढ़ाकर ये चमत्कार किया है। सीएसआईआर निजी(प्राइवेट) कंपनियों के हाथों अपनी लाइसेंसिंग पेटेंटेड टेक्नोलॉजी साझा या बेचकर ही आत्मनिर्भर बना है।कैसे किया कायाकल्प?
विगत वर्ष की तुलना में सीएसआईआर ने इस वर्ष (2017-18) निजी क्षेत्र की कंपनियों को अपनी तकनीक देकर करीब 70% ज्यादा कमाई की है। सीएसआईआर के डायरेक्टर जनरल गिरीश साहनी इसे संस्था के आत्मनिर्भर बनने की दिशा में सबसे अहम करार देते हैं। चालू वित्त वर्ष में कुल कमाई लगभग 963 करोड़ रुपये रहा, जिसमें 515 करोड़ रुपये की आय निजी क्षेत्र की कंपनियों को टेक्नोलॉजी का लाइसेंसिंग हस्तांतरण करके हुई है, जबकि 448 करोड़ की आय सरकारी कंपनियों से हुई है। सीएसआईआर के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि सरकारी कंपनियों की तुलना में निजी कंपनियों से आय ज्यादा हुई है। इससे पहले सीएसआईआर ने वर्ष 2016-17 में 727 करोड़ रुपये कमाए थे मगर उसमें प्राइवेट कंपनियों से की गयी कमाई 302 करोड़ था, जबकि सरकारी संस्थाओं से हुई कमाई 424.45 करोड़ रुपए था। इससे पहले 2015-16 और 2014-15 में निजी कंपनियों से हुई कमाई 100-200 करोड़ रुपए से ज्यादा कभी नहीं रही। सीएसआईआर के डीजी गिरीश साहनी कहते हैं कि प्राइवेट कंपनियों से 500 करोड़ रुपये की कमाई ज्यादा नहीं है, बल्कि ये इस बात का संकेत है कि सीएसआईआर अपने पेटेंट के जरिए निजी कंपनियों से अब ज्यादा से ज्यादा धन कमा रहा है और आगे और भी धन कमा सकता है।
व्यावसायिक सोच और परिणाम प्राप्ति पर जोर:           
वर्ष 2015 में सीएसआईआर की देहरादून में आयोजित बैठक इसके कायाकल्प में निर्णायक साबित हुआ। जहां ये तय किया गया कि आगामी 2-3 सालों में संस्था के सभी 38 लैब को आत्मनिर्भर बनाया जायेगा। ये भी तय किया गया कि संस्था के वैज्ञानिकों द्वारा गरीब वर्ग को ध्यान में रखकर प्रतिवर्ष कम से कम 12 गेम चेंजिंग टेक्नोलॉजी का निर्माण किया जायेगा।
सीएसआईआर के सूत्र बताते हैं कि संस्था को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 26 सितम्बर 2016 को सीएसआईआर फाउंडेशन दिवस कार्यक्रम में संस्थान के वैज्ञानिकों से “पेटेंट लाइसेंसिंग की जगह टेक्नोलॉजी निर्माण पर विशेष ध्यान देने पर बल दिया। इससे संस्थान के वैज्ञानिकों को और भी जनोपयोगी शोध, निर्माण और उसका उपयोग बढ़ाने की दिशा में बल मिला। मोदी के एक सुझाव से वैज्ञानिकों में सालों से अपने शोध को पेटेंट कराकर लाइसेंस रखने की प्रवृति से अलग अब अमल में लाने योग्य तकनीक बनाने और उसके उपयोगी बनाने की प्रथा का तेजी से विकास हुआ।
विगत 4 सालों में सीएसआईआर ने 600 विभिन्न टेक्नोलॉजी का लाइसेंस किया है। इस दिशा में महज 1 मिनट में दूध में मिलावट का पता लगा लेने वाला मशीन “क्षीर टेस्टर” और “क्षीर स्कैनर” का निर्माण किया है जिसके जरिए मिलावट में प्रयुक्त यूरिया, साल्ट, डिटर्जेंट,साबुन,सोडा, बोरिक एसिड और हाइड्रोजन पेरोक्साइड आदि का पता लग जाता है।
सीएसआईआर ने “दृष्टि ट्रांसमिसोमीटर” का निर्माण पूर्णतः
देशी तकनीक के जरिए सिविल एविएशन सेक्टर को विजिबिलिटी मापने का एक पूर्ण घरेलू यंत्र मिल गया है जिससे विमानों की आवाजाही आसान हुई है। अबतक देशभर के 21 एयरपोर्ट पर इसका सफल उपयोग हो रहा है। इसी तरह डायबिटिज की बढ़ती समस्या से लड़ने के लिए जड़ी-बूटियों पर आधारित पूर्णतया घरेलू तकनीक से एंटी-डायबिटिक दवा “बीजीआर-34” बनाया है जिसे एक देशी प्राइवेट कंपनी को सस्ता दवा निर्माण के लिए दिया है,उस कंपनी ने महज 2 साल में 100 करोड़ से ज्यादा का व्यवसाय किया है। अब इस तरह के सैकड़ों जनोपयोगी पेटेंट को तकनीक का रूप देकर धनोपार्जन किया जाना संभव हो रहा है।
सीएसआईआर ने व्यावसायिक प्रवृति को ध्यान में रखते हुए अपने सभी 38 लैब्स को साफ-साफ निर्देश दिए है कि अपना खर्च स्वयं वहन करने की दिशा में काम करें और सरकारी अनुदान की बजाए स्वपोषित व्यवस्था का निर्माण किया जाना चाहिए। सीएसआईआर ने अब अपना अप्रोच पूरी तरह परिवर्तित करते हुए सिर्फ कागजी रिसर्च की बजाए अब उपयोग में लाए जाने और लाइसेंस प्राप्त करने योग्य रिसर्च पर ध्यान बढ़ा दिया है।
अपनी बदले सोच की वजह से ही सीएसआईआर की वर्ष 2017 की विश्व रैंकिंग में भारी उछाल आया है। शिमागो इंस्टिट्यूट रैंकिंग वर्ल्ड रिपोर्ट में पिछले 2 सालों में 30 पोजिशन उछाल लेकर 1207 देशी सरकारी संस्थाओं में से 9वें स्थान पर रहा, जबकि विश्वभर के 5250 संस्थानों में से सीएसआईआर 75वें स्थान पर रहा।
सीएसआईआर की बाहरी कैश फ्लो ने नई ऊंचाई को छुआ है। वर्ष 2017-18 के दौरान 235 टेक्नोलॉजी और उत्पाद को निजी कंपनियों को लाइसेंस दिया है। विगत वित्त वर्ष में बाहरी कैश-फ्लो को नीचे दिए गए चार्ट से बखूबी समझा जा सकता है।
ये सीएसआईआर की सोच में बदलाव का ही नतीजा है कि विगत 2 सालों में इसने अपनी इंडस्ट्रियल आय को लगभग तीन गुना कर एक नए इतिहास को रचने में सफल हुआ है लेकिन संस्था में ही कुछ वैज्ञानिकों द्वारा दबी जुबान से सीएसआईआर के पूर्ण व्यावसायिक सोच का विरोध भी होने लगा है। वैसे वैज्ञानिकों का मानना है कि ज्यादा प्रोडक्ट ओरिएंटेड अप्रोच संस्था के अनुसंधान को दीर्घ काल में प्रभावित कर