Friday, 5 May 2017

3 तरीकों से सुरक्षित बनाएं अपना ऑनलाइन ट्रांजेक्शन

रोहित कुमार  
नोटबंदी के बाद भले ही कैशलेस को बढ़ावा मिल रहा हो मगर ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं है जो ऑनलाइन ट्रांजेक्शन यानी ऑनलाइन लेनदेन से घबारते हैं। अक्सर ऐसे यूजर को चिंता सताती है कि कहीं कोई उनके एटीएम कार्ड की जानकारी सेव करके बैंक खाते में सेंध न लगा दे। ध्यान रहे कि साइबर संसार में कुछ एप और सॉफ्टवेयर ऐसे हैं जो कंप्यूटर पर टाइप होने वाले सभी बटन की जानकारी का डाटा तैयार करते हैं। इससे वह आपके कार्ड की जानकारी सेव कर सकते हैं। इस समस्या से बचने के लिए यूजर ऑन स्क्रीन कीबोर्ड और इकॉग्निटो टैब का प्रयोग कर सकते हैं। आइए जानते हैं कि कैसे अपने ऑनलाइन लेनदेन को सुरक्षित बनाया जा सकता है
ऐसे करें प्रयोग करें ऑन स्क्रीन कीबोर्ड
अपने कंप्यूटर को छोड़ किसी अन्य व्यक्ति का कंप्यूटर या लैपटॉप इस्तेमाल कर रहे हैं तो बैंक अकाउंट में लॉग-इन करके बिलों का ऑनलाइन भुगतान करते वक्त ऑनस्क्रीन कीबोर्ड यानी कि वर्चुअल कीबोर्ड का प्रयोग करना चाहिए। इस कीबोर्ड को कंप्यूटर पर खोलने के लिए उसके स्टार्ट मेन्यूमें जाएं और वहां दिए प्रोग्रामपर क्लिक करें। इससे आपको वर्चुअल कीबोर्डका विकल्प मिलेगा। कीबोर्ड खोजने में दिक्कत आए तो सर्च बार में on screen keyboard टाइप करके भी देख सकते हैं। वर्चुअल कीबोर्ड पर माउस से क्लिक करके अक्षर और अंकों को टाइप किया जा सकता है। इसमें भी सेटिंग का विकल्प है जिसको यूजर अपने मनमुताबिक बदल सकते हैं।
मुफ्त वाई-फाई के लालच से बचें
मुफ्त में मिलने वाले इंटरनेट की लालच में यूजर अक्सर सार्वजनिक स्थलों, होटल-रेस्तरां, रेलवे स्टेशन, एयरपोर्ट आदि पर मिलने वाली वाई-फाई सुविधा का इस्तेमाल करते हैं। हालांकि कई मामलों में ऐसे वाई-फाई कनेक्शन असुरक्षित भी होते हैं। मिसाल के तौर पर रेलवे स्टेशन पर जो मुफ्त वाई-फाई है वह जरूरी नहीं है रेलवे मंत्रालय की ओर दिया जा रहा हो। कई बार हैकर उस यूजरनेम से जुड़ा हुआ एक नाम तैयार कर लेते हैं और उससे मुफ्त वाई-फाई देकर फोन से जरूरी जानकारी चुरा लेते हैं या लेनदेन के दौरान वह आपके बैंक खाते पर सेंध भी लगा सकते हैं। इनसे बचने के लिए मोबाइल फोन में एंटी-वायरस सॉफ्टवेयर और ऑपरेटिंग सिस्टम को समय-समय पर अपडेट करते रहें।
इनकॉग्निटो टैब भी है बेहतर विकल्प ऑनलाइन
बैंकिंग या ट्रांजेक्शन के लिए आप गूगल क्रोम ब्राउजर में इनकॉग्निटो और इंटरनेट एक्सप्लोरर में प्राइवेट ब्राउजिंग मोड का सहारा ले सकते हैं। क्रोम यूजर इनकॉग्निटो टैब को खोलने के लिए स्क्रीन पर ऊपर के हिस्से में दाईं ओर दिए तीन लाइनों वाले विकल्प पर क्लिक करें और इनकॉग्निटो टैब पर जाएं। इस टैब पर की गई ब्राउजिंग हिस्ट्री, ब्राउजर बंद करते ही डिलीट हो जाती है। सिस्टम दोबारा खोलने पर यह दिखाई नहीं देती। यानी हिस्ट्री के आधार पर कोई आपके अकाउंट में सेंध लगाने की कोशिश नहीं कर सकता। इनकॉग्निटो टैब की पहचान एक टॉपी और चश्मा लगाए एक व्यक्ति होता है जो ऊपर बाईं ओर दिखाई देता है।


अनूठे चंद्र मिशन की तैयारी में चीन

शशांक द्विवेदी
डिप्टी डायरेक्टर, मेवाड़ यूनिवर्सिटी, राजस्थान  
चंद्रमा की दूसरी ओर यान उतारने वाला पहला देश होगा चीन 
हाल में ही चीन ने अपने महत्वाकांक्षी अंतरिक्ष कार्यक्रम के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि वह वर्ष 2018 में चंद्रमा की दूसरी ओर की थाह लेने के लिए यान भेजेगा और वहां यान को सुगमता से उतारने वाला वह दुनिया का पहला देश बन जाएगा। 'चीन स्पेस एक्टिविटीज इन 2016' शीर्षक से जारी किए गए श्वेत पत्र में कहा गया है कि अगले पांच वर्षों में चीन अपनी चंद्र अन्वेषण परियोजना को जारी रखेगा। इससे पहले चीन चंद्रमा पर रोवर उतार चुका है लेकिन अब चंद्रमा की दूसरी ओर की थाह लेना चाहता है, जहां अभी तक कोई भी अन्य देश नहीं पहुंच सका है। श्वेत पत्र के मुताबिक इस अन्वेषण योजना में तीन रणनीतिक कदम उठाने हैं, वह हैं 'कक्षा में स्थापित करना, सतह पर उतारना और लौटना।' चेंज-5 चंद्र अन्वेषण वर्ष 2017 के अंत तक शुरू होगी।
आखिर क्या है चांद की दूसरी तरफ?
यह अभी तक एक अनसुलझा रहस्य है कि चाँद के दुसरी तरफ क्या है ? कुछ हॉलीवुड फिल्मों में दिखाया गया है कि चांद के अंधेरे हिस्से में परग्रही रहते हैं। कुछ का मानना है कि यहां नाजियों का सीक्रेट आर्मी बेस है। लेकिन सच तो यह है कि पृथ्वी से चंद्रमा की दूसरी तरफ का महज 18 प्रतिशत हिस्सा दिखाई देता है। वहां क्या है, कैसा वातावरण है, यह अभी तक रहस्य है, इसके बारे में वैज्ञानिक ज्यादा नहीं जानते। इसलिए इसे चंद्रमा का अंधेरा हिस्सा भी कहते हैं। चांद का एक ही हिस्सा क्यों दिखता है? इसे समझने के लिए हम एक ऐसे बच्चे का उदाहरण लेते हैं, जिसने एक रस्सी से पत्थर बांध रखा है और वह गोल घूम रहा है।   उसके साथ पत्थर भी घूमता है, लेकिन पत्थर का वही हिस्सा उसके सामने रहता है जो रस्सी से बंधा है।  धरती के ग्रैविटेशन फोर्स के कारण चंद्रमा की बंधे रहने जैसी स्थिति होती है ठीक रस्सी से बंधे पत्थर जैसी। लिहाजा, धरती से चंद्रमा का एक ही हिस्सा दिखाई देता है।

चंद्रमा पर अभियान 

चंद्रमा पर सबसे पहले 13 सितंबर, 1959 को सोवियत संघ का अंतरिक्ष यान लूना 2 उतरा।  उसके बाद अमेरिका के अपोलो 11 के यात्री 20 जुलाई 1969 को सबसे पहले चंद्रमा पर उतरे।  1969 से 1972 तक अमेरिका ने छह बार मानव को चंद्रमा पर उतारा। अभी तक अमेरिका अकेला देश है जिसने चंद्रमा पर मनुष्य को उतारा। दिसंबर 1972 में उसने ये अभियान बंद कर दिया।
भारत का चंद्रयान

भारत की स्पेस एजेंसी इसरो ने 14 नवंबर 2008 को मून इम्पैक्ट प्रोब को चंद्रमा पर उतारा। यह चंद्रयान-1 से चंद्रमा पर छोड़ा गया था।  चीन ने चांग ई-1 को एक मार्च 2009 को चंद्रमा पर उतारा। चांग ई-3 एक दिसंबर 2013 को भेजा गया और 14 दिसंबर 2013 को चंद्रमा पर उतरा।
अंतरिक्ष में चीन की बढ़त
 चीन 2030 तक अंतरिक्ष में सबसे शक्तिशाली देश बनना चाहता है। बीजिंग ने अगले चार साल में मंगल ग्रह को छूने का भी एलान किया है। चीन अगले एक दशक में अंतरिक्ष रिसर्च के क्षेत्र में सबसे आगे निकलना चाहता है। पिछले दिनों चीन के नेशनल स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन के उपप्रमुख वु यानहुआ ने बीजिंग में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इसकी जानकारी दी थी । वु के मुताबिक 2020 में मंगल पर पहली खोजी मशीन भेजी जाएगी। यह मशीन मंगल का चक्कर काटेगी और आंकड़े जुटाएगी। इसके बाद मंगल की सतह के नमूने लेने के लिए एक और मशीन लाल ग्रह पर भेजी जाएगी। मंगल के अलावा गुरु और उसके चंद्रमा के लिए भी खोजी मिशन भेजा जाएगा।
वु ने कहा, "कुल मिलाकर हमारा लक्ष्य है कि 2030 तक चीन दुनिया की बहुत बड़ी अंतरिक्ष शक्ति बन जाए।" चीन ने अंतरिक्ष अभियान देर से शुरू किये थे ,1970 के दशक तक उसने कोई सैटेलाइट नहीं भेजी. जबकि इसी दौरान अमेरिका, रूस और भारत भी अतंरिक्ष अभियान में आगे बढ़ते गए लेकिन बीते तीन दशकों में चीन ने अंतरिक्ष अभियान में अरबों डॉलर झोंके हैं। बीजिंग ने रिसर्च और ट्रेनिंग पर भी खासा ध्यान दिया है यही वजह है कि 2003 में चीन ने चंद्रमा पर अपना रोवर भेज दिया और वहां अपनी लैब बना दी। चीन अब 20 टन भारी अंतरिक्ष स्टेशन भी बनाना चाह रहा है। अमेरिका और रूस के बाद चीन तीसरा ऐसा देश बन चुका है जिसने पांच लोगों को अंतरिक्ष में भेजा है।

सच्चाई यह है कि चीन अंतरिक्ष में अपनी ताकत बढ़ाना चाहता है। वह 2017 में पहला अंतरिक्ष कार्गो शिप थियानचोऊ अंतरिक्ष प्रयोगशाला के पास भेजना चाहता है। इससे प्रयोगशाला को ईंधन और अन्य सामान आपूर्ति की जा सकेगी। अंतरिक्ष कार्यक्रमों के मामले में चीन, भारत से आगे है,उसका बजट भी हमसे बड़ा है। चीन का अंतरिक्ष कार्यक्रम एक ओर युद्ध-तकनीक से जुड़ा है, वहीं वह असैनिक तकनीक का विकास भी कर रहा है। भारत के मुकाबले चीन के पास ज्यादा भार ले जानेवाले रॉकेट हैं और उसका अपना स्पेस स्टेशन तैयार हो रहा है। वह अंतरिक्ष में मानव-युक्त उड़ान संचालित कर चुका है और जल्दी ही चंद्रमा की सतह पर भी अपना यात्री उतार देगा। अंतरिक्ष में उपग्रहों को नष्ट करने की तकनीक का परीक्षण कर उसने सैनिक इस्तेमाल में महारत भी हासिल कर ली है।

चीन का अंतरिक्ष कार्यक्रमों पर भारी खर्च
चीन अंतरिक्ष कार्यक्रमों पर अरबों डॉलर खर्च कर रहा है ,साथ ही चीन दूसरे देशों की अंतरिक्ष एजेंसियों के साथ मिलकर काम करने की इच्छा भी बार बार जता चुका है लेकिन अमेरिकी संसद ने 2011 से अपनी अंतरिक्ष एजेंसी नासा को चीन के साथ काम करने से रोक रखा है। अमेरिका इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा मानता है। लेकिन बीते सालों में नासा को भी बड़े पैमाने पर बजट कटौती का सामना करना पड़ा है।
अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने अंतरिक्ष अभियानों में तेजी लाने के संकेत दिये हैं अंतरिक्ष विशेषज्ञ रॉबर्ट वॉकर और पीटर नैवारो के मुताबिक, "कम निवेश से अमेरिकी सरकार के अंतरिक्ष कार्यक्रमों पर असर पड़ा है, वहीं चीन और रूस सैन्य रणनीति को ध्यान में रखते हुए बहुत तेजी से आगे निकलते जा रहे हैं" दोनों अंतरिक्ष में अमेरिका के दबदबे को खत्म करना चाह रहे हैं
पिछले दिनों चीनी राष्ट्रपति ने कहा कि अंतरिक्ष कार्यक्रम को देश की राष्ट्रीय सुरक्षा में मददगार होना चाहिए। देश को अंतरिक्ष शक्ति बनाने पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि चीन नागरिक इरादों के लिए एंटी सैटेलाइट मिसाइलों का परीक्षण कर चुका है। वहीं चीनी अंतरिक्ष एजेंसी के उपप्रमुख वु यानहुआ ने अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम को शांतिपूर्ण बता रहें है लेकिन माना जा रहा है कि ट्रंप के सत्ता में आने के बाद चीन और अमेरिका तीखी होड़ छिड़ेगी और इसका असर अंतरिक्ष से लेकर समंदर तक हर जगह नजर आएगा।

कुलमिलाकर अमेरिका चांद पर इंसान को उतारने वाला अकेला देश भले ही हो, चीन ने भी इस मामले में अमेरिका को टक्कर देने की तैयारी में कमर कस ली है। चीन की अंतरिक्ष एजेंसी ने कहा है कि वे चांद पर 2018 तक अपने देश का झंडा लगाने की तैयारी कर चुका है। यही नहीं चीन ने इस परियोजना में अमेरिका को भी पीछे छोड़ने की तैयारी कर ली है।

Saturday, 27 August 2016

पृथ्वी से मिलता जुलता नया ग्रह मिला

वैज्ञानिकों ने पृथ्वी जैसे एक ग्रह का पता लगाया है। इस ग्रह का तापमान सही है इसलिए इसके सतह पर पानी भी तरल अवस्था में ठहर सकता है। इसे देखते हुए यह ग्रह हमारे सौरमंडल के बाहर यह ऐसी जगह हो सकती है जहां जीवन मुमकिन हो।
खगोलविदों के एक अंतरराष्ट्रीय दल को इस ग्रह के साफ साफ सबूत मिले हैं जो करीब चार प्रकाशवर्ष की दूरी पर स्थित है। यह ग्रह प्रॉक्सिमा सेंताउरी तारे की परिक्रमा करता है। यह तारा हमारे सोलर सिस्टम में सबसे नजदीक है। इस नए संसार को प्रॉक्सिमा बी नाम दिया गया है और यह 11 दिन में अपनी परिक्रमा पूरी करता है। साथ ही इसका तापमान इसकी सतह पर तरल अवस्था में जल के ठहरने के लिहाज से मुनासिह है। रिसर्चरों ने कहा है कि यह पर्वतों की दुनिया पृथ्वी से थोड़ी बड़ी है और हमारा सबसे नजदीक बिना गैर-सौरीय ग्रह है। इस अध्ययन का प्रकाशन नेचरनाम के जर्नल में हुआ है।


Tuesday, 23 August 2016

आसमान में बढ़ी हमारी ताकत

स्वदेशी तेजस लड़ाकू विमान वायुसेना में शामिल
शशांक द्विवेदी
डिप्टी डायरेक्टर (रिसर्च), मेवाड़ यूनिवर्सिटी,चितौड़गढ़ ,राजस्थान   
आख़िरकार लंबे इंतजार और तमाम तरह के सफ़ल परीक्षण के बाद स्वदेशी तकनीक से निर्मित हल्के लड़ाकू विमान तेजसको वायुसेना के बेड़े में शामिल कर लिया गया । तेजस को बेंगलुरु में एक भव्य समारोह में वायुसेना की 45वीं स्क्वैड्रन फ्लाइंग डैगर्समें शामिल किया गया ।इस विमान को पिछले तीन दशक से डिजाइन एवं विकसित किया जा रहा था। इन विमानों के बेड़े का नाम 'फ्लाइंग डैगर्स फोर्टीफाइव' है। वायुसेना के इतिहास में यह पहला मौका होगा जब देश में निर्मित किसी युद्धक विमान की स्क्वाड्रन का सपना साकार हुआ है । वायुसेना के दक्षिणी वायु कमान के एयर ऑफिसर कमांडिंग-इन चीफ एयर मार्शल जसबीर वालिया की मौजूदगी में एयरक्राफ्ट सिस्टम टेस्टिंग एस्टेबलिशमेंट (एएसटीई) में एलसीए स्क्वाड्रन को शामिल किया गया। तेजस 1350 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से आसमान का सीना चीर सकते हैं, जो दुनिया के सबसे बेहतरीन फाइटर प्लेन को टक्कर देने की हैसियत रखता है । सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) ने इन लड़ाकू विमान का निर्माण किया है. इसके साथ ही स्वदेशी लड़ाकू विमान का हिंदुस्तान का सपना 30 साल की मेहनत के बाद पूरा हो गया है ।तेजस की तुलना फ्रांस के 'मिराज 2000', अमेरिका के एफ-16 और स्वीडन के ग्रि‍पेन से की जा रही है।
फिलहाल तो तेजस दो साल बेंगलुरु में रहेंगे और फिर इन्हें तमिलनाडु के सुलूर भेज दिया जाएगा। बीते 17 मई को तेजस में अपनी पहली उड़ान भरने वाले एयर चीफ मार्शल अरूप राहा ने विमान को बल में शामिल करने के लिए अच्छा बताया था। वायुसेना ने कहा है कि इस वित्तीय वर्ष में कुल छह विमान और अगले वित्तीय वर्ष में करीब आठ विमान शामिल करने की योजना है। तेजस अगले साल वायुसेना की लड़ाकू योजना में नजर आएगा और इसे फ्रंटफुट वाले एयरबेस पर भी तैनात किया जाएगा । तेजस के सभी स्क्वाड्रन में कुल 20 विमान शामिल किए जाएंगे, जिसमें चार आरक्षित रहेंगे। ये हल्के लड़ाकू विमान (लाइट कॉम्बेट एयरक्राफ्ट एलसीए) पुराने पड़ चुके मिग-21 की जगह लेंगे।
यहां तक की नई 45-स्कावड्रन को वही फ्लाईंग डैगर्सनाम दिया गया है जो मिग-21 का था । अगले साल यानि 2017 तक इस स्कावड्रन में करीब 16 लड़ाकू विमान शामिल हो जायेंगे. वायुसेना एचएएल से 120 तेजस खरीदेगा। विशेषज्ञों के मुताबिक, एक तेजस की कीमत करीब ढाई सौ करोड़ रूपये है।
तेजस प्रोजेक्ट में देरी
1983 मे शुरू हुए इस प्रोजेक्ट की कीमत करीब 560 करोड़ रुपये थी, लेकिन अब इसकी कीमत 10,398 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। पिछले साल अप्रैल में सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में इस स्वदेशी विमान की देरी पर कई सवाल खड़े किए थे। रिपोर्ट में प्रोजेक्ट के 20 साल पीछे चलने, ट्रैनर एयरक्राफ्ट ना होने, प्रोजेक्ट की बढ़ती कीमत और विमान की तकनीक और फाइनल ऑपरेशनल क्लीयरंस पर भी सवाल खड़े किए थे। देश में ही लड़ाकू विमान बनाने की अवधारणा 1970 के दशक में रखी गयी थी, वहीं इस पर वास्तविक काम 80 के दशक में ही शुरू हो पाया और पहली उड़ान जनवरी 2001 में भरी गयी। देश में स्वदेशी तकनीक से एयरक्राफ्ट निर्माण की गति भी अभी बहुत धीमी है जिसे बढ़ानी पड़ेगी तभी हम रक्षा क्षेत्र में वाह्य चुनौतियों का सामना कर पायेंगे । लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एलसीए) प्रोग्राम को मैनेज करने के लिए 1984  में एलडीए (एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी) बनाई गई थी। एलसीए ने पहली उड़ान 4 जनवरी 2001 को भरी थी। अब तक यह कुल 3184 बार उड़ान भर चुका है।
एक अंतरराष्‍ट्रीय सुरक्षा और रक्षा विशेषज्ञ की रिपोर्ट के अनुसार अस्‍त व्‍यस्‍त खरीद व विकास कार्यक्रम के चलते भारतीय वायुसेना को चीन और पाकिस्‍तान से बड़ा खतरा है। विशेषज्ञ एश्‍ले टेलिस की रिपोर्ट ट्रबल्‍स, दे कम इन बटालियंस: द मेनिफेस्‍ट ट्रेवेल्‍स ऑफ द इंडियन एयर फोर्समें वायुसेना की वर्तमान स्थिति का पैना लेखा जोखा पेश किया गया है। इसमें भारतीय वायुसेना की पड़ोसी देशों का सामना करने की तैयारी का भी जायजा दिया गया है। इसके अनुसार कुछ पैमानों पर भारत की हवाई क्षमता अपर्याप्‍त है जिसे तत्काल बढानें की जरुरत है । भारत के रक्षा बजट में कई गंभीर रूकावटें हैं। इसके चलते खरीद में देरी होती है। साथ ही स्वदेशी तकनीक से एयरक्राफ्ट निर्माण की गति भी अभी बहुत धीमी है जिसे बढ़ानी पड़ेगी तभी हम रक्षा क्षेत्र में वाह्य चुनौतियों का सामना कर पायेंगे ।
क्यों खास है तेजस
तेजस एकल ईंजन वाला हल्के वजन वाला बेहद फुर्तीला और बहुत सी भूमिकाओं को निभाने में सक्षम सुपरसोनिक लड़ाकू विमान है। इसे पहले लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट के नाम से जाना जाता था जिसे पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपई ने तेजस नाम दिया था।  तेजस 4.5 जेनरेशन का विमान है, जो कि हर ऊंचाई पर सुपरसोनिक क्षमता से लैस हैं। आज किसी भी फाइटर जेट को डेवलप करने के लिए स्ट्रेंथ एक अहम प्वाइंट होता है। इसका मकसद है कोई एयरक्राफ्ट राडार क्रॉस सेक्शन यानी आरसीएस में कम से कम हो। एयरक्राफ्ट के हर वैरिएंट में यह फीचर दिया गया है। तेजस जैसे हल्के लड़ाकू विमान पर भारतीय वायुसेना के पायलटों का प्रशिक्षण पहले ही शुरू हो चुका है । तेजस का इंटीग्रेटेड तकनीक हवा में बहुत देर तक एक ही स्थान पर स्थिर रह सकता है। वहीं इसमें मल्टी मोड राडार लगा है, जबकि यह सुपरसोनिक रफ़्तार 1920 किलोमीटर प्रति घंटे की  अधिकतम रफ़्तार से उड़ने की क्षमता है। आज के दौर में तेजस दुनिया का सबसे हल्का और छोटा लड़ाकू विमान है जो अपनी रफ़्तार और सटीकता के लिए जाना जाता है। इस विमान के निर्माण में कम्पोजिट मटेरियल का इस्तेमाल किया गया है, जिसके वजह से है अपनी अधिकतम रफ़्तार तक पहुंच जाता है।तेजस का कॉकपिट शीशे का बना है, जिससे पायलट को रियल टाइम डेटा मिलता है। साथ ही इसमें सभी प्रकार की मिसाइल से हमला करने की क्षमता है। तेजस 50 हजार फीट की ऊंचाई तक उड़ान भर सकता है। तेजस के विंग्स 8.20 मीटर चौड़े , लंबाई 13.20 मीटर, ऊंचाई 4.40 मीटर और वजन 6560 किलोग्राम है। विशेषज्ञों के अनुसार तेजस पाकिस्तान और चीन द्वारा संयुक्त रूप से विकसित और निर्मित जेएफ-17 विमान की तुलना में बेहतर है क्योंकि इसका अधिकांश निर्माण ऐसे मिश्रण से हुआ है जो इसे हल्का और बहुत दक्ष बनाता है। इसके तीक्ष्ण गोला-बारूद और बम इसे सटीक तरीके से निशाना साधने में सक्षम बनाते हैं। तेजस विमान मिग-21 विमानों की जगह लेगा और इसे हवा से हवा में प्रहार और जमीनी हमले के लिए इस्तेमाल में लाया जाएगा और यह सुखोई 30 एमकेआई जैसे बड़े लड़ाकू विमानों के लिए भी सहायक हो सकता है।
दुनियाँ के बेहतरीन लड़ाकू विमानों में है तेजस
सिंगल और डबल सीटर लड़ाकू विमानों की पांचवीं पीढ़ी के विमानों में भारत द्वारा विकसित और भारत में ही निर्मित तेजस पूरी तरह से दुनिया के सर्वश्रेष्ठ लड़ाकू विमानों में शामिल हो चुका है।स्टील्थ तकनीक से लैस ये विमान भारत की हर जरूरत को पूरा करेगा, जो भारत की वायुसेना और जलसेना दोनों की ही उपयोग के लिए है। ये हल्का विमान है और बेहद कम समय में ही दुश्मन पर हमला करने में सक्षम है। तेजस की चकाचौंध से अभी से पूरी दुनिया थर्रा रही है । भारतीय वायुसेना पूरी तरह से सिर्फ तेजस के ही 3 स्वॉइड्रन बनाना चाहती है, जो दुनिया के किसी भी लक्ष्य को वेधने में सक्षम है। तेजस कम उंचाई में उड़ान भरकर महज 15 मिनट में पाकिस्तान के किसी भी शहर को तहस नहस कर सकता है। इसपर परमाणु हथियारों की तैनाती भी की जाएगी। तेजस की सबसे बड़ी खूबी उसका किसी भी मौसम और किसी भी समय उड़ान भरकर हमला करने की है, जिससे भारत पड़ोसी देशों पर किसी भी युद्ध के शुरुआती चरण में भी बढ़त बना लेगा। इसे किसी भी मिसाइल से नहीं गिराया जा सकेगा।

कुलमिलाकर स्वदेशी तकनीक से बने तेजस के भारतीय वायुसेना में शामिल होनें से उसे और मजबूती मिलेगी । साथ ही एशियाई देशों के बीच एक सैन्य शक्ति संतुलन भी स्थापित हो पायेगा
(लेखक शशांक द्विवेदी चितौड़गढ, राजस्थाइन में मेवाड़ यूनिवर्सिटी में डिप्टी डायरेक्टर (रिसर्च) है और  टेक्निकल टूडे पत्रिका के संपादक हैं। 12 सालों से विज्ञान विषय पर लिखते हुए विज्ञान और तकनीक पर केन्द्रित विज्ञानपीडिया डॉट कॉम के संचालक है  । एबीपी न्यूज द्वारा विज्ञान लेखन के लिए सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर का सम्मान हासिल कर चुके शशांक को विज्ञान संचार से जुड़ी देश की कई संस्थाओं ने भी राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया है। वे देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लगातार लिख रहे हैं।)
  

Thursday, 7 April 2016

ब्रहमांड को समझने के खुले नए रास्ते

गुरूत्वाकर्षण तरंगों की खोज बड़ी उपलब्धि 
शशांक द्विवेदी

डिप्टी डायरेक्टर (रिसर्च), मेवाड़ यूनिवर्सिटी  
इस सदी की सबसे बड़ी खोज करते हुए अन्तराष्ट्रीय वैज्ञानिकों ने पहली बार गुरूत्वाकर्षण तरंगों की झलक पाने का दावा किया है। आइंस्टीन के सापेक्षता के सिद्धांत की खोज के ठीक 100 साल बाद वैज्ञानिकों ने बेहद अहम खोज किया है. ऐसा अनुमान है कि इस खोज के बाद  इंसान को ब्रहांड के चकित कर देने वाले रहस्यों के बारे में पता चल पायेगा । वैज्ञानिकों ने गुरुत्वाकर्षण तरंगों की खोज कर लिया है।  यह तरंगे प्रकाशीय तरंगों से पूरी तरह भिन्न है।  वैज्ञानिक इन तरंगों को ग्रेविटेशनल वेव्स भी कहते हैं।
 इन तरंगों के अस्तित्व के बारे में पिछली एक सदी से अटकलें लगाई जा रही थीं। इनके अस्तित्व के बारे में सर्वप्रथम सैद्धांतिक परिकल्पना प्रख्यात वैज्ञानि‍क अल्बर्ट आइंस्टीन ने की थी। आइंस्टीन ने 1916 में अपने  सामान्य सापेक्षता सिद्धांत का प्रतिपादन करते हुए इन तरंगों के होने की बात कही थी। वैज्ञानिकों के अनुसार लगभग एक अरब 30 करोड़ साल पहले अंतरिक्ष में दो ब्लैक होल टकराए थे। इन दो ब्लैक होल के मिलन से उठी विशाल तरंग अंतरिक्ष में फैलती हुई 14 सितम्बर 2015 को पृथ्वी तक आ पहुंची । अमरीका में दो भूमिगत अति संवेदी उपकरणों ने इस तरंग को महसूस किया।  इन तरंगों के अस्तित्व की निर्णायक रूप से पुष्टि करना सहज नहीं था। वैज्ञानिक पिछले पचास वर्षो से इन्हें खोजने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन इसके लिए उनके पास सटीक उपकरण नहीं थे। अत्यंत संवेदी उपकरण तैयार करने में उन्हें करीब 25 वर्ष लगे। इन्हीं उपकरणों की मदद से अंतरिक्ष में होने वाली असंगतियों को सूक्ष्मतम पैमाने को ढूंढ पाना संभव हो सका है।
 
वैज्ञानिकों को उमीद है कि इस खोज से दूर के सितारों, आकाश गंगाओं और ब्लैक होल सहित ब्रह्मांड के रहस्यों  के बारे में अहम जानकारी जुटाने में मदद मिल सकती है। आइंस्टीन ने कहा था कि अंतरिक्ष समय एक जाल की तरह है, जो किसी पिंड के भार से झुकता है, जबकि गुरूत्वाकर्षण तरंगें किसी तालाब में कंकड़ फेंकने से उठी लहरों की तरह है। गुरूत्वाकर्षण तरंगों का पता दो भूमिगत डिटेक्टरों की मदद से लगाया गया जो बेहद सूक्ष्म तरंगों को भी भांप लेने में सक्षम हैं। इस योजना को लेजर इंटरफेरोमीटर ग्रैवीटेशनल वेव ऑब्जर्वेटरी यानी LIGO नाम दिया गया है। वैज्ञानिकों को इन तरंगों से संबंधित आंकड़ों की पुष्टि में कई महीने लग गये। गुरूत्वाकर्षण तरंगें अंतरिक्ष के फैलाव का एक मापक हैं। ये विशाल पिंडों की गति के कारण होती हैं और प्रकाश की गति से चलती हैं, इन्हें कोई चीज रोक नहीं सकती। गुरुत्व तरंगों की तलाश के लिए चलाए जा रहे प्रोजेक्ट की लागत करीब एक अरब डॉलर है। यह सफल खोज दुनिया भर के वैज्ञानिकों की कड़ी मेहनत का नतीजा है।
ब्लैक होल क्या होतें है ?
अल्बर्ट आइंस्टीन ने भविष्यवाणी की थी कि दो ब्लैक होल के टकराने पर गुरुत्व तरंगें उत्पन्न होंगी, लेकिन अभी तक किसी ने भी इनका प्रायोगिक परीक्षण नहीं किया था।  अभी तक किसी को भी दो ब्लैक होल के बारे में प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिला था। एक बड़ा प्रश्न है कि ब्लैक होल क्या होते हैं ? ब्लैक होल अंतरिक्ष का वह क्षेत्र है जहां शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण के कारण वहां से प्रकाश बाहर नहीं निकल सकता। इसमें गुरुत्वाकर्षण बहुत ज्यादा इसलिए होता है, क्योंकि पदार्थ को बहुत छोटी जगह में समाहित होना पड़ता है। ऐसा तारे के नष्ट होने की स्थिति में होता है । चूंकि यहां से प्रकाश बाहर नहीं आ सकता, इसलिए लोग इन्हें नहीं देख सकते। ये अदृश्य होते हैं। किसी तारे के नष्ट होने पर ब्लैक होल बनता है। छोटे और बड़े दो तरह के ब्लैक होल हो सकते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार सबसे छोटे ब्लैक होल एक अणु के बराबर छोटे होते हैं। ये ब्लैक होल छोटे जरुर होतें है लेकिन उनका द्रव्यमान एक पहाड़ के बराबर होता है। बड़े ब्लैक होल यानी स्टेलर का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान से 20 गुना तक ज्यादा होता है। सबसे बड़े ब्लैकहोल को सुपरमैसिव कहा जाता हैं, क्योंकि उनका द्रव्यमान 10 लाख सूर्यो से भी ज्यादा होता है। हमारी मिल्कीवे आकाशगंगा में सुपरमैसिव ब्लैक होल का नाम सैगिटेरियस है। इसका द्रव्यमान 40 लाख सूर्यो के बराबर है। बहुत बड़े यानी अत्यंत विशाल ब्लैक होल सभी आकाशगंगाओं के केंद्र में पाए जाते हैं। गुरुत्व तरंगों की खोज से पहले ब्लैक होल का पता लगाना मुश्किल था, क्योंकि ये प्रकाश उत्पन्न नहीं करते थे जबकि सभी खगोलीय भौतिकी उपकरण प्रकाश का इस्तेमाल करते हैं।  

दो ब्लैक होल की टक्कर
दो ब्लैक होल में से प्रत्येक ब्लैक होल का द्रव्यमान करीब 30 सूर्यो के बराबर था।  जैसे ही गुरुत्वाकर्षण की वजह से दोनों ब्लैक होल एक दूसरे के करीब आए, उन्होंने तेजी से एक दूसरे की परिक्रमा आरंभ कर दी। आपस में टकराने से पहले उन्होंने प्रकाश की गति हासिल कर ली थी। उनके उग्र विलय से गुरुत्व तरंगों के रूप में प्रचंड ऊर्जा निकली जो सितंबर में पृथ्वी पर पहुंची। एक अरब साल पहले निकली ऊर्जा पिछले साल सितंबर में पृथ्वी पर पहुंची है। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि  अंतरिक्ष में यह टक्कर कितनी दूर हुई होगी . वैज्ञानिकों के अनुसार सितंबर में पृथ्वी पर पहुंचने वाली तरंग दो ब्लैक होल के विलय से पूर्व अंतिम क्षण में उत्पन्न हुई थी।  
भारतीय वैज्ञानिक भी इस अनुसंधान में शामिल रहें
भारतीय वैज्ञानिकों ने गुरूत्वाकर्षी तरंगों की खोज के लिए महत्वपूर्ण परियोजना में डाटा विश्लेषण सहित अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है । इंस्टिटयूट ऑफ प्लाजमा रिसर्च गांधीनगर, इंटर यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर एस्ट्रोनामी एंड एस्ट्रोफिजिक्स पुणे और राजारमन सेंटर फॉर एडवांस्ड टेक्नोलाजी इंदौर सहित कई संस्थान इस परियोजना से जुड़े थे। गुरूत्वाकर्षी तरंगों की खोज की घोषणा आईयूसीएए पुणे और वाशिंगटन डीसी, अमेरिका में वैज्ञानिकों ने समानांतर रूप से की। भारत उन देशों में से भी एक है जहां गुरूत्वाकर्षण प्रयोगशाला स्थापित की जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और परमाणु उर्जा आयोग के अध्यक्ष अनिल काकोदकर ने गुरूत्वाकर्षी तरंगों की खोज में महत्वपूर्ण योगदान के लिए आज भारतीय वैज्ञानिकों की टीम को बधाई दी है।
खगोल विज्ञान के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि  
यह सफल खोज दुनिया भर के वैज्ञानिकों की कड़ी मेहनत का नतीजा है जिनमें भारतीय वैज्ञानिक भी शामिल हैं। ब्रह्मांड को अभी तक हमने सिर्फ प्रकाश में देखा है, लेकिन वहां जो घटित हो रहा है उसका हम सिर्फ एक हिस्सा ही देख पा रहे हैं। यह खोज ब्रह्मांडीय  भौतिकी और खगोल विज्ञान के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। और इससे ब्रहमांड को समझने के खुले नए रास्ते खुलेंगे ।

(लेखक शशांक द्विवेदी चितौड़गढ, राजस्थाइन में मेवाड़ यूनिवर्सिटी में डिप्टी डायरेक्टर (रिसर्च) हैं और  टेक्निकल टूडे पत्रिका के संपादक हैं। 12 सालों से विज्ञान विषय पर लिखते हुए विज्ञान और तकनीक पर केन्द्रित विज्ञानपीडिया डॉट कॉम के संचालक है  । एबीपी न्यूज द्वारा विज्ञान लेखन के लिए सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर का सम्मान हासिल कर चुके शशांक को विज्ञान संचार से जुड़ी देश की कई संस्थाओं ने भी राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया है। वे देश के प्रतिष्िंचात समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लगातार लिख रहे हैं।)


Wednesday, 21 October 2015

मंगल पर पानी होने के मायनें

नासा की बड़ी कामयाबी
मंगल ग्रह पर खारे पानी की ख़ोज
शशांक द्विवेदी
डिप्टी डायरेक्टर (रिसर्च), मेवाड़ यूनिवर्सिटी
अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में एक बड़ी कामयाबी हासिल करते हुए अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने मंगल ग्रह पर खारे पानी के मौसमी प्रवाह के पुख्ता सबूत इकट्ठा किए हैं नासा के वैज्ञानिकों ने बकायदा प्रेस कांफ्रेंस करके यह जानकारी दी पत्रिका 'नेचर जियोसाइंस' में प्रकाशित एक अध्ययन में वैज्ञानिकों ने कुछ ढलानों पर गर्मी के मौसम में बनी धारियों का अध्ययन किया, जिसके बारे में पहले माना जाता था कि वे खारे पानी के बहने से बनी होंगी नासा ने दावा किया है कि मंगल ग्रह पर नमकीन पानी के तरल रूप में होने की पुष्टि की है, पहले पानी के जमे हुए रूप में होने का अनुमान था नासा के मुताबिक काली धारी की शक्ल में पानी के होने का पता चला धारियां अप्रैल-मई में बनीं, गर्मी में ये धारियां अच्छे से दिखने लगीं और अगस्त के अंत तक गायब हो गईं  अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में मंगल ग्रह पर पानी होने की ख़ोज कई मायनों में बहुत महत्वपूर्ण है इससे मंगल पर जीवन होने की संभावनाओं के बारें में वैज्ञानिक ठीक से पता लगा सकेंगें एरिजोना यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान स्कॉलर लुजेंद्र ओझा को पहली बार इस बात के सबूत मिले थे कि मंगल पर लिक्विड फॉर्म में पानी मौजूद है


पानी के पुख्ता सबूत –जीवन की संभावना !!
नासा ने अपने मुख्यालय में जेम्स वेब ऑडिटोरियम में एक प्रेस कांफ्रेस के दौरान इस खोज का पूरा विवरण भी दिया इस प्रेस कांफ्रेंस में अटलांटा के जॉर्जिया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से जुड़े लुजेंद्र ओझा भी मौजूद थे  युनिवर्सिटी ऑफ एरिजोना में प्लैनेटरी जियोलॉजी के प्रोफेसर अल्फ्रेड एस.मैकएवेन के मुताबिक, अध्ययन दल ने मंगल ग्रह पर पानीयुक्त अणुओं (परक्लोरेट) की पहचान की है मैकएवेन  के अनुसार "मंगल ग्रह पर खारे पानी का स्पष्ट तौर पर पता चला है."
लगभग 4.5 अरब साल पहले मंगल ग्रह पर अभी की तुलना में साढ़े छह गुना अधिक पानी और एक स्थूल वायुमंडल था अधिकांश पानी अंतरिक्ष में गायब हो गया और इसका कारण मंगल ग्रह पर पृथ्वी की तरह लंबे समय तक चुंबकीय क्षेत्र नहीं होना रहा नासा को प्राप्त मंगल की ताज़ा तस्वीरों में लाल ग्रह पर पानी के सबूत मिले हैं। ये तस्वीरें नासा ने अपने वेबसाइट पर सबके देखने के लिए जारी करीं। तस्वीर के विश्लेषण में सामने आया कि मंगल ग्रह की सतह पर पानी के बहने के निशान हैं और यह पानी अत्यंत खारा है। तरल पानी की मौजूदगी बताती है कि मंगल ग्रह पर जीवन खोजने की संभावना को और पुख़्ता करती हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि तस्वीरों के ज़रिए मंगल ग्रह पर देखी गई गहरी लकीरों को अब तरल पानी के सामयिक बहाव से जोड़कर देखा जा सकता है। उपग्रहों से मिला डाटा दर्शाता है कि चोटियों पर दिखने वाले ये लक्षण नमक की मौजूदगी से जुड़े हैं। मंगल ग्रह पर ऐसा नमक, पानी के जमने और वाष्प बनने के तापमान को भी बदल सकते हैं जिससे पानी ज़्यादा समय तक बह सकता है। मंगल पर पानी जमता तो पृथ्वी के समान ज़ीरो डिग्री सेल्सियस पर ही है, लेकिन कम दबाव के चलते 10 डिग्री सेल्सियस पर ही वाष्पित हो जाता है। पृथ्वी पर पानी 100 डिग्री सेल्सियस पर भाप बनता है। अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा को सैटेलाइट से मिले डाटा से पता चलता है कि चोटियों पर दिखने वाली ये डार्क लाइन्स पानी और नमक के कारण बने हैं। नासा के इस खुलासे से मंगल ग्रह पर जीवन होने की नई उम्मीद जगी है।
सॉल्ट पेरोक्लोरेट की वजह
मार्स रिकानाससेंस ऑर्बिटर स्पेसक्राफ्ट को मंगल पर लिक्विड फॉर्म में सॉल्ट पेरोक्लोट होने के सबूत मिले हैं। इनकी वजह से मंगल ग्रह की सतह और ढलानों पर लकीरें बनी हुई हैं। सॉल्ट पेरोक्लोरेट मंगल पर लिक्विड फॉर्म में मौजूद है। इसकी वजह से मंगल ग्रह की सतह और ढलानों पर लकीरें बनी हुई हैं। पेरोक्लोरेट नाम का यह नमक -70 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी पानी को जमने से बचाता है।
लुजेंद्र की बात पर लगी मुहर
मंगल पर पानी मिलने की संभावना इसलिए जोर पकड़ी थी, क्योंकि नासा ने इस अनाउंसमेंट में लुजेंद्र ओझा नाम के पीएचडी स्टूडेंट के शामिल होने की बात कही थी। 2011 में ग्रैजुएट कर चुके 21 वर्षीय लुजेंद्र ने मंगल पर पानी के संभावित लक्षण खोजे हैं। बता दें कि वैज्ञानिकों को मंगल के ध्रुवों पर जमे हुए पानी की जानकारी पहले से है।
ओझा ने बताया था, भाग्यशाली दुर्घटना
एरिजोना यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान ओझा को 'संयोगवश' पहली बार इस बात के सबूत मिले थे कि मंगल पर लिक्विड फॉर्म में पानी मौजूद है। प्लैनेट की सतह की तस्वीरों की स्टडी के बाद उन्हें इस बात के सबूत मिले थे। ओझा ने इस खोज को 'भाग्यशाली संयोग' बताते हुए कहा कि शुरुआत में उन्हें इसके बारे में समझ में नहीं आया। मंगल की सतह पर बने गड्ढों की कई साल तक स्टडी के बाद पता चला कि ये बहते पानी के कारण बने हैं।

40
साल पहले मिले थे पोल पर बर्फ के सबूत
मंगल पर पानी के सबूत मिलना कोई नई बात नहीं है। करीब चार दशक पहले इस प्लैनेट के पोल पर बर्फ की खोज की गई थी। इसके अलावा, ग्रह की सतह पर रगड़ के निशान इस ओर इशारा करते हैं कि लाखों साल पहले यहां समुद्र और नदियां रही होंगी। हालांकि, इस ग्रह पर कम ग्रैविटी और वहां के वायुमंडल के आधार पर माना जाता है कि ग्रह पर मौजूद पानी स्पेस में इवैपेरेट (वाष्पित) हो गया होगा। प्लैनेट पर लिक्विड पानी की यह पहली खोज है।

भौगोलिक रूप से सक्रिय है मंगल ग्रह
नासा का नया डाटा दर्शाता है कि मंगल ग्रह अभी भी भौगोलिक रूप से सक्रिय है वैज्ञानिकों का मानना है कि मंगल ग्रह पर देखी गई ग़हरी लकीरों को अब तरल पानी के सामयिक बहाव से जोड़कर देखा जा सकता हैअब मंगल ग्रह पर भविष्य में बस्तियां बसाने की कल्पना अब केवल कथा कहानियों तक सिमट कर नहीं रहेगी क्योंकि मंगल ग्रह की सतह पर पानी तरल अवस्था में देखा गया है जो जीवन के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके साथ ही ऐसी संभावनाएं बढ़ गयी हैं कि मंगल पर जीवन मिल सकता है।

नासा के खगोलीय विज्ञान विभाग के निदेशक जिम ग्रीन के अनुसार मंगल एक सूखा और बंजर ग्रह नहीं है जैसा कि पहले सोचा जाता था।उन्होंने कहा, ‘कुछ निश्चित परिस्थितियों में पानी तरल अवस्था में मंगल पर पाया गया है।वैज्ञानिक लंबे समय से यह अनुमान लगाते आ रहे थे कि कभी लाल ग्रह पर जीवन था। नासा ने कहा है कि तरल अवस्था में जल मिलने से यह संभव है कि वहां इस समय जीवन हो.   इसके बारे में सर्वाधिक रोमांचित करने वाली बात यह है कि मंगल के बारे में हमारा प्राचीन नजरिया और मंगल पर जीवन की संभावना, मंगल पर पूर्व में जीवन के बारे में रसायनिक जीवाश्म की खोज के बारे में रही है। सच्चाई यह भी है कि मंगल पर तरल अवस्था में जल की मौजूदगी, भले ही यह बेहद खारा पानी हो,यह इस बात की संभावना पैदा करता है कि , यदि मंगल पर जीवन है तो हमें यह बताने के लिए एक रास्ता मिला है कि यह जीवन वहां कैसे बना रहा। अब इस नयी खोज ने इस सवाल को ठोस आकार दे दिया है कि क्या इस ग्रह पर जीवन है और अब हम इस सवाल का जवाब दे सकते हैं।  नासा के विज्ञान अभियान निदेशालय के सहायक प्रशासक और अंतरिक्ष वैज्ञानिक जॉन ग्रुंसफेल्ड के अनुसार मंगल पर जल की मौजूदगी से मंगल पर मानव अभियान भेजना आसान हो जाएगा जिसे वर्ष 2030 तक भेजने की नासा की योजना है। ग्रुंसफेल्ड ने कहा, ‘सतह पर जिंदा रहने के लिए वहां संसाधन हैं।उन्होंने कहा कि पानी महत्वपूर्ण है लेकिन ग्रह पर अन्य महत्वपूर्ण तत्व भी हैं जैसे कि नाइट्रोजन जिसका इस्तेमाल ग्रीनहाउस में पौधो को उगाने के लिए किया जा सकता है।
मंगल पर पानी की मौजूदगी की यह घोषणा ब्लॉकबस्टर फिल्म द मार्सियनके रिलीज होने से पूर्व हुई है। इस फिल्म में मैट डेमोन मंगल ग्रह पर करीब एक महीने बिना भोजन के मरने के लिए छोड़ दिए जाने के बाद खुद को जिंदा रखते हैं। वैज्ञानिकों का लंबे समय से मानना रहा है कि कभी लाल ग्रह पर पानी बहता था और इसी से वहां घाटियां और गहरे दर्रे बने लेकिन तीन अरब साल पहले जलवायु में आए बड़े बदलावों के चलते मंगल का सारा रूप बदल गया।
फिलहाल वैज्ञानिक समूह मंगल के बारे में अपनी समझ को क्रांतिकारी आकार दे रहे हैं। इस ग्रह की सतह की खोज में जुटे रोवर्स ने यह भी पाया है कि इसकी मिट्टी पहले लगाए गए अनुमानों से कहीं अधिक नम है। मंगल की सतह पर चार साल पहले ढलानों पर गहरे रंग की रेखाएं देखी गयी थीं। वैज्ञानिकों के पास इसके सबूत नहीं थे लेकिन बाद में पाया गया कि ये रेखाएं गर्मियों में बढ़ जाती थीं और उसके बाद सर्दियां आते आते गायब हो जाती थीं। अब पता चला है कि ये असल में पानी की धाराएं हैं। लेकिन अब इसके सावधानीपूर्वक अध्ययन और विश्लेषण के बाद वैज्ञानिक यह कहने को तैयार हैं कि ये रेखाएं वास्तव में जल धाराएं हैं।कुलमिलाकर नासा द्वारा मंगल पर खारे पानी का पता लगाने की घोषणा कई मायनों में बहुत महत्वपूर्ण है और इससे मंगल ग्रह के विषय में कई तरह की जानकारी इकट्टा करने में मदत मिलेगी
मंगल पर मानव युक्त अंतरिक्ष अभियान की संभावना बढ़ी
मंगल पर पानी की मौजूदगी की पुष्टि होने के बाद अब वहां मानव अभियान भेजने की संभावना बढ़ गई है और अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने इस पर तेजी से काम शुरू कर दिया है। मंगल पर मानव मिशन भेजने के लिए नासा ओरियनअंतरिक्ष यान बना रहा है जिसका पिछले साल परीक्षण किया गया था। यह यान अंतरिक्षयात्रियों को मंगल पर ले जाएगा और फिर सुरक्षित पृथ्वी पर लाएगा। ओरियन को दुनिया के सबसे शक्तिशाली रॉकेट स्पेस लांच सिस्टम के जरिये प्रक्षेपित किया जाएगा। पृथ्वी से मंगल तक की बेहद लंबी यात्रा के दौरान अंतरिक्ष यात्रियों को भजदा रहने के लिए पानी, हवा और अनुकूल तापमान की जरूरत होगी।
नासा के इंजीनियर इसके लिए विश्वसनीय तकनीक विकसित कर रहे हैं जो अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष में स्वस्थ रख सके। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) पर एनवायरमेंट कंट्रोल एंड लाइफ सपोर्ट सिस्टम विकसित किया गया है और ओरियन के लिए भी ऐसी ही प्रणाली बनायी जा रही है। यह प्रणाली कार्बन डाई ऑक्साइड को रिसाइकिल करके ऑक्सीजन में और मूत्र को पेयजल में बदल सकती है। आईएसएस में इंजीनियर और अंतरिक्ष यात्री लंबे अंतरिक्ष मिशनों के लिए एक फिल्टर प्रणाली का परीक्षण कर रहे हैं। इसमें अमीन आधारित एक रासायनिक यौगिक अंतरिक्ष के निर्वात के साथ मिलकर केबिन की हवा को सांस लेने लायक बनाने का प्रयोग चल रहा है।
मंगल की तरफ बढ़ रहे अंतरिक्ष यात्री और उनका यान पृथ्वी के वातावरण और चुम्बकीय क्षेत्र से बाहर होगा। ऐसे में उन्हें अंतरिक्ष में होने वाले विकिरण से बचाना भी एक बड़ी चुनौती होगी। नासा इस दिशा में काम कर रहा है। विकिरण से चालक दल की रक्षा के लिए हीट शील्ड यानी ऊष्मारोधी कवच के करीब एक अस्थायी शेल्टर होगा। पृथ्वी पर वापस लौटने के लिए ओरियन को ऊर्जा और प्रणोदक की जरूरत पड़ेगी। इस यान पर एक सर्विस मोड्यूल भी होगा ताकि जरूरत पडऩे पर इसकी दिशा ठीक की जा सके। यह मोड्यूल चालक दल को जरूरी ऊर्जा, ऊष्मा, पानी और हवा मुहैया कराएगा। नासा इसके लिए यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी ईएसए के साथ मिलकर काम कर रहा है।
पिछले साल जब मानवरहित ओरियनका परीक्षण किया गया था तो इसकी हीट शील्ड करीब 4000 डिग्री फारेनहाइट के तापमान पर बेअसर रही थी। यह ऊष्मा उस समय पैदा हुई थी जब यान 20 हजार मील प्रति घंटे की रफ्तार से पृथ्वी की तरफ बढ़ा था। ओरियन का ऊष्मारोधी कवच टाइटेनियम से बना है जिस पर कार्बन फाइबर की परत चढ़ी है।

इसकी मोटाई 1.6 इंच है जो ओरियन के पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश करने के समय इसे जलने से बचाने का काम करेगी। ओरियन के पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश करने के बाद इसकी रफ्तार को कम करना बहुत बड़ी चुनौती है। पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश करने के बाद इसकी रफ्तार घटकर 325 मील प्रति घंटे रह जाएगी। इसे और कम करने के लिए 11 पैराशूटों का इस्तेमाल किया जाएगा। इनमें से तीन मुख्य पैराशूट तो इतने बड़े हैं कि इनसे फुटबाल का एक पूरा मैदान ढक जाएगा।