Tuesday, 31 July 2018

आत्मनिर्भर बनने की ओर अग्रसर है CSIR

आमतौर पर फंड के दबाव से जूझते रहने और सरकारी अनुदानों पर आश्रित होने का तगमा झेल रही केंद्र सरकार के कई संस्थाओं से अलग विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय की महत्वपूर्ण संस्था सीएसआईआर (CSIR) ने विगत 3 सालों में कैसे अपनी कमाई को दोगुना कर लिया है और कैसे आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रही है ये एक पहेली से कम नहीं। यहां ये जानना जरूरी है कि सीएसआईआर ने बाहरी कैश-फ्लो बढ़ाकर ये चमत्कार किया है। सीएसआईआर निजी(प्राइवेट) कंपनियों के हाथों अपनी लाइसेंसिंग पेटेंटेड टेक्नोलॉजी साझा या बेचकर ही आत्मनिर्भर बना है।कैसे किया कायाकल्प?
विगत वर्ष की तुलना में सीएसआईआर ने इस वर्ष (2017-18) निजी क्षेत्र की कंपनियों को अपनी तकनीक देकर करीब 70% ज्यादा कमाई की है। सीएसआईआर के डायरेक्टर जनरल गिरीश साहनी इसे संस्था के आत्मनिर्भर बनने की दिशा में सबसे अहम करार देते हैं। चालू वित्त वर्ष में कुल कमाई लगभग 963 करोड़ रुपये रहा, जिसमें 515 करोड़ रुपये की आय निजी क्षेत्र की कंपनियों को टेक्नोलॉजी का लाइसेंसिंग हस्तांतरण करके हुई है, जबकि 448 करोड़ की आय सरकारी कंपनियों से हुई है। सीएसआईआर के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि सरकारी कंपनियों की तुलना में निजी कंपनियों से आय ज्यादा हुई है। इससे पहले सीएसआईआर ने वर्ष 2016-17 में 727 करोड़ रुपये कमाए थे मगर उसमें प्राइवेट कंपनियों से की गयी कमाई 302 करोड़ था, जबकि सरकारी संस्थाओं से हुई कमाई 424.45 करोड़ रुपए था। इससे पहले 2015-16 और 2014-15 में निजी कंपनियों से हुई कमाई 100-200 करोड़ रुपए से ज्यादा कभी नहीं रही। सीएसआईआर के डीजी गिरीश साहनी कहते हैं कि प्राइवेट कंपनियों से 500 करोड़ रुपये की कमाई ज्यादा नहीं है, बल्कि ये इस बात का संकेत है कि सीएसआईआर अपने पेटेंट के जरिए निजी कंपनियों से अब ज्यादा से ज्यादा धन कमा रहा है और आगे और भी धन कमा सकता है।
व्यावसायिक सोच और परिणाम प्राप्ति पर जोर:           
वर्ष 2015 में सीएसआईआर की देहरादून में आयोजित बैठक इसके कायाकल्प में निर्णायक साबित हुआ। जहां ये तय किया गया कि आगामी 2-3 सालों में संस्था के सभी 38 लैब को आत्मनिर्भर बनाया जायेगा। ये भी तय किया गया कि संस्था के वैज्ञानिकों द्वारा गरीब वर्ग को ध्यान में रखकर प्रतिवर्ष कम से कम 12 गेम चेंजिंग टेक्नोलॉजी का निर्माण किया जायेगा।
सीएसआईआर के सूत्र बताते हैं कि संस्था को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 26 सितम्बर 2016 को सीएसआईआर फाउंडेशन दिवस कार्यक्रम में संस्थान के वैज्ञानिकों से “पेटेंट लाइसेंसिंग की जगह टेक्नोलॉजी निर्माण पर विशेष ध्यान देने पर बल दिया। इससे संस्थान के वैज्ञानिकों को और भी जनोपयोगी शोध, निर्माण और उसका उपयोग बढ़ाने की दिशा में बल मिला। मोदी के एक सुझाव से वैज्ञानिकों में सालों से अपने शोध को पेटेंट कराकर लाइसेंस रखने की प्रवृति से अलग अब अमल में लाने योग्य तकनीक बनाने और उसके उपयोगी बनाने की प्रथा का तेजी से विकास हुआ।
विगत 4 सालों में सीएसआईआर ने 600 विभिन्न टेक्नोलॉजी का लाइसेंस किया है। इस दिशा में महज 1 मिनट में दूध में मिलावट का पता लगा लेने वाला मशीन “क्षीर टेस्टर” और “क्षीर स्कैनर” का निर्माण किया है जिसके जरिए मिलावट में प्रयुक्त यूरिया, साल्ट, डिटर्जेंट,साबुन,सोडा, बोरिक एसिड और हाइड्रोजन पेरोक्साइड आदि का पता लग जाता है।
सीएसआईआर ने “दृष्टि ट्रांसमिसोमीटर” का निर्माण पूर्णतः
देशी तकनीक के जरिए सिविल एविएशन सेक्टर को विजिबिलिटी मापने का एक पूर्ण घरेलू यंत्र मिल गया है जिससे विमानों की आवाजाही आसान हुई है। अबतक देशभर के 21 एयरपोर्ट पर इसका सफल उपयोग हो रहा है। इसी तरह डायबिटिज की बढ़ती समस्या से लड़ने के लिए जड़ी-बूटियों पर आधारित पूर्णतया घरेलू तकनीक से एंटी-डायबिटिक दवा “बीजीआर-34” बनाया है जिसे एक देशी प्राइवेट कंपनी को सस्ता दवा निर्माण के लिए दिया है,उस कंपनी ने महज 2 साल में 100 करोड़ से ज्यादा का व्यवसाय किया है। अब इस तरह के सैकड़ों जनोपयोगी पेटेंट को तकनीक का रूप देकर धनोपार्जन किया जाना संभव हो रहा है।
सीएसआईआर ने व्यावसायिक प्रवृति को ध्यान में रखते हुए अपने सभी 38 लैब्स को साफ-साफ निर्देश दिए है कि अपना खर्च स्वयं वहन करने की दिशा में काम करें और सरकारी अनुदान की बजाए स्वपोषित व्यवस्था का निर्माण किया जाना चाहिए। सीएसआईआर ने अब अपना अप्रोच पूरी तरह परिवर्तित करते हुए सिर्फ कागजी रिसर्च की बजाए अब उपयोग में लाए जाने और लाइसेंस प्राप्त करने योग्य रिसर्च पर ध्यान बढ़ा दिया है।
अपनी बदले सोच की वजह से ही सीएसआईआर की वर्ष 2017 की विश्व रैंकिंग में भारी उछाल आया है। शिमागो इंस्टिट्यूट रैंकिंग वर्ल्ड रिपोर्ट में पिछले 2 सालों में 30 पोजिशन उछाल लेकर 1207 देशी सरकारी संस्थाओं में से 9वें स्थान पर रहा, जबकि विश्वभर के 5250 संस्थानों में से सीएसआईआर 75वें स्थान पर रहा।
सीएसआईआर की बाहरी कैश फ्लो ने नई ऊंचाई को छुआ है। वर्ष 2017-18 के दौरान 235 टेक्नोलॉजी और उत्पाद को निजी कंपनियों को लाइसेंस दिया है। विगत वित्त वर्ष में बाहरी कैश-फ्लो को नीचे दिए गए चार्ट से बखूबी समझा जा सकता है।
ये सीएसआईआर की सोच में बदलाव का ही नतीजा है कि विगत 2 सालों में इसने अपनी इंडस्ट्रियल आय को लगभग तीन गुना कर एक नए इतिहास को रचने में सफल हुआ है लेकिन संस्था में ही कुछ वैज्ञानिकों द्वारा दबी जुबान से सीएसआईआर के पूर्ण व्यावसायिक सोच का विरोध भी होने लगा है। वैसे वैज्ञानिकों का मानना है कि ज्यादा प्रोडक्ट ओरिएंटेड अप्रोच संस्था के अनुसंधान को दीर्घ काल में प्रभावित कर 

Friday, 6 July 2018

पर्यावरण सरंक्षण पर बातें नहीं, ठोस काम जरूरी


विश्व पर्यावरण दिवस(5 जून ) पर विशेष 
शशांक द्विवेदी  
पूरी दुनियाँ की जलवायु में तेजी से परिवर्तन हो रहा है ,बेमौसम आंधी ,तूफ़ान और बरसात से हजारों लोगों की जान जा रही है साथ ही सभी ऋतु चक्रों में तेजी से बदलाव देखने को मिल रहा है । सच्चाई यह है कि पर्यावरण सीधे सीधे हमारे अस्तित्व से जुड़ा मसला है । दुनियाँभर में पर्यावरण सरंक्षण को लेकर काफी बातें, सम्मेलन, सेमिनार आदि हो रही है परन्तु वास्तविक धरातल पर उसकी परिणिति होती दिखाई नहीं दे रही है । जिस तरह क्लामेट चेंज दुनियाँ में भोजन पैदावार और आर्थिक समृद्धि को प्रभावित कर रहा है, आने वाले समय में जिंदा रहने के लिए जरूरी चीजें इतनी महंगी हो जाएगीं कि उससे देशों के बीच युद्ध जैसे हालात पैदा हो जाएंगे । यह खतरा उन देशों में ज्यादा होगा जहाँ कृषि आधारित अर्थव्यवस्था है । पर्यावरण का सवाल जब तक तापमान में बढोत्तरी से मानवता के भविष्य पर आने वाले खतरों तक सीमित रहा, तब तक विकासशील देशों का इसकी ओर उतना ध्यान नहीं गया । परन्तु अब जलवायु चक्र का खतरा खाद्यान्न उत्पादन पर पड रहा है, किसान यह तय नहीं कर पा रहे है कब बुवाई करे और कब फसल काटें । तापमान में बढ़ोत्तरी जारी रही तो खाद्य उत्पादन 40 प्रतिशत तक घट जायेगा, इससे पूरे विश्व में खाद्यान्नों की भारी कमी हो जायेगी । ऐसी स्थिति विश्व युद्ध से कम खतरनाक नहीं होगी । एक नई अमेरिकी स्टडी में दावा किया गया है कि तापमान में एक डिग्री तक का इजाफा साल 2030 तक अफ्रीकी सिविल वार होने के रिस्क को 55 प्रतिशत तक बढा सकता है । यानी महज अगले 12  वर्षों में अफ्रीकी देशों में संकट गहरा सकता है । यह स्टडी यूनिवर्सिटी आफ कैलीफोर्निया के इकानमिस्ट मार्शल बर्क द्वारा की गई है । इसमें कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण बनी स्थितियों में अकेले अफ्रीका के उप सहारा इलाके में युद्ध भड़कने से 3 लाख 90 हजार मौतें हो सकती हैं । इन युद्धों के बहुत विनाशकारी होनें की आशंका है ।
नेचर क्लाइमेट चेंज एंड अर्थ सिस्टम साइंस डाटा जर्नल में प्रकाशित  एक रिपोर्ट के अनुसार चीन, अमेरिका और यूरोपीय संघ के वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में क्रम से 26 ,15 और 11 फीसद की हिस्सेदारी है जबकि भारत का आंकड़ा सात फीसद है। इसमें बताया गया है कि प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन के मामले में भारत की हिस्सेदारी 2.44 टन है जबकि अमेरिका, यूरोपीय संघ और चीन की प्रति व्यक्ति हिस्सेदारी क्रम से 19.86 टन, 8.77 और 8.13 टन है।यह रिपोर्ट ब्रिटेन के ईस्ट एंजलिया विश्वविद्यालय के ग्लोबल कार्बन परियोजना द्वारा किये गये एक अध्ययन पर आधारित है ।  दुनियाँ भर में कार्बन उत्सर्जन की बढती दर ने पर्यावरण और खासकर जैव विविधता को बड़े पैमानें पर नुकसान पहुँचाया है , एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले एक दशक में विलुप्त प्रजातियों की संख्या पिछले एक हजार वर्ष के दौरान विलुप्त प्रजातियों की संख्या के बराबर है। जलवायु में तीव्र गति से होने वाले परिवर्तन से देश की 50 प्रतिशत जैव विविधता पर संकट है। अगर तापमान से 1.5  से 2.5  डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होती है तो 25 प्रतिशत प्रजातियां पूरी तरह समाप्त हो जाएंगी।  अंतरराष्ट्रीय संस्था वर्ल्ड वाइल्ड फिनिशिंग ऑर्गेनाइजेशन ने अपनी रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि 2030 तक घने जंगलों का 60 प्रतिशत भाग नष्ट हो जाएगा। वनों के कटान से वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की कमी से कार्बन अधिशोषण ही वनस्पतियों व प्राकृतिक रूप से स्थापित जैव विविधता के लिए खतरा उत्पन्न करेगी। मौसम के मिजाज में होने वाला परिवर्तन ऐसा ही एक खतरा है। इसके परिणामस्वरूप हमारे देश के पश्चिमी घाट के जीव-जंतुओं की अनेक प्रजातियां तेजी से लुप्त हो रही हैं।
पिछले दिनों पर्यावरण और वायु प्रदूषण का भारतीय कृषि पर प्रभाव शीर्षक से प्रोसिडिंग्स ऑफ नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस में प्रकाशित एक शोध पत्र के नतीजों ने  सरकार ,कृषि विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों की चिंता बढ़ा दी है । शोध के अनुसार भारत के अनाज उत्पादन में वायु प्रदूषण का सीधा और नकारात्मक असर देखने को मिल रहा है। देश  में धुएं में बढ़ोतरी की वजह से अनाज के लक्षित उत्पादन में कमी देखी जा रही है। करीब 30 सालों के आंकड़े का विश्लेषण करते हुए वैज्ञानिकों ने एक ऐसा सांख्यिकीय मॉडल विकसित किया जिससे यह अंदाजा मिलता है कि घनी आबादी वाले राज्यों में वर्ष 2010 के मुकाबले वायु प्रदूषण की वजह से गेहूं की पैदावार 50 फीसदी से कम रही। कई जगहों पर खाद्य उत्पादन में करीब 90 फीसदी की कमी धुएं की वजह से देखी गई जो कोयला और दूसरे प्रदूषक  तत्वों की वजह से हुआ। भूमंडलीय तापमान वृद्धि और वर्षा के स्तर की भी 10 फीसदी बदलाव में अहम भूमिका है। कैलिफॉर्निया विश्वविद्यालय में वैज्ञानिक और शोध की लेखिका जेनिफर बर्नी के अनुसार ये आंकड़े चौंकाने वाले हैं हालांकि इसमें बदलाव संभव है। संयुक्त राष्ट्र में जलवायु परिवर्तन के लिए बने अंतर सरकारी पैनल(आइपीसीसी)  रिपोर्ट में भी इसी तरह की चेतावनी दी गई थी । जलवायु परिवर्तन - प्रभाव, अनुकूलन और जोखिमशीर्षक से जारी इस रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव पहले से ही सभी महाद्वीपों और महासागरों में विस्तृत रूप ले चुका है। रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण एशिया को बाढ़, गर्मी के कारण मृत्यु, सूखा तथा पानी से संबंधित खाद्य की कमी का सामना करना पड़ सकता है। कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाले भारत जैसे देश जो केवल मानसून पर ही निर्भर हैं, के लिए यह काफी खतरनाक हो सकता है। जलवायु परिवर्तन की वजह से दक्षिण एशिया में गेहूं की पैदावार पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है । साथ ही वैश्विक खाद्य उत्पादन भी धीरे-धीरे घट रहा है। एक खास बात यह भी है कि जलवायु परिवर्तन से न केवल फसलों की उत्पादकता प्रभावित हो रही है बल्कि उनकी पोष्टिकता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है । एशिया में तटीय और शहरी इलाकों में बाढ़ की वृद्धि से बुनियादी ढांचे, आजीविका और बस्तियों को काफी नुकसान हो सकता है। ऐसे में मुंबई, कोलकाता, ढाका जैसे शहरों पर खतरे की संभावना बढ़ सकती है। पिछले दिनों पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने भी जलवायु परिवर्तन पर इंडियन नेटवर्क फॉर क्लाइमेट चेंज असेसमेंट की रिपोर्ट जारी करते हुए चेताया था कि यदि पृथ्वी के औसत तापमान का बढ़ना इसी प्रकार जारी रहा तो अगामी वर्षों में भारत को इसके दुष्परिणाम झेलने होंगे। इसका सीधा असर देश की कृषि व्यवस्था पर भी पड़ेगा ।
पूरी दुनियाँ की जलवायु में तेजी से परिवर्तन हो रहा है ,बेमौसम आंधी ,तूफ़ान और बरसात से हजारों लोगों की जान जा रही है साथ ही सभी ऋतु चक्रों में तेजी से बदलाव देखने को मिल रहा है । सच्चाई यह है कि पर्यावरण सीधे सीधे हमारे अस्तित्व से जुड़ा मसला है । दुनियाँभर में पर्यावरण सरंक्षण को लेकर काफी बातें, सम्मेलन, सेमिनार आदि हो रही है परन्तु वास्तविक धरातल पर उसकी परिणिति होती दिखाई नहीं दे रही है । जिस तरह क्लामेट चेंज दुनियाँ में भोजन पैदावार और आर्थिक समृद्धि को प्रभावित कर रहा है, आने वाले समय में जिंदा रहने के लिए जरूरी चीजें इतनी महंगी हो जाएगीं कि उससे देशों के बीच युद्ध जैसे हालात पैदा हो जाएंगे । यह खतरा उन देशों में ज्यादा होगा जहाँ कृषि आधारित अर्थव्यवस्था है । पर्यावरण का सवाल जब तक तापमान में बढोत्तरी से मानवता के भविष्य पर आने वाले खतरों तक सीमित रहा, तब तक विकासशील देशों का इसकी ओर उतना ध्यान नहीं गया । परन्तु अब जलवायु चक्र का खतरा खाद्यान्न उत्पादन पर पड रहा है, किसान यह तय नहीं कर पा रहे है कब बुवाई करे और कब फसल काटें । तापमान में बढ़ोत्तरी जारी रही तो खाद्य उत्पादन 40 प्रतिशत तक घट जायेगा, इससे पूरे विश्व में खाद्यान्नों की भारी कमी हो जायेगी । ऐसी स्थिति विश्व युद्ध से कम खतरनाक नहीं होगी । एक नई अमेरिकी स्टडी में दावा किया गया है कि तापमान में एक डिग्री तक का इजाफा साल 2030 तक अफ्रीकी सिविल वार होने के रिस्क को 55 प्रतिशत तक बढा सकता है । यानी महज अगले 12  वर्षों में अफ्रीकी देशों में संकट गहरा सकता है । यह स्टडी यूनिवर्सिटी आफ कैलीफोर्निया के इकानमिस्ट मार्शल बर्क द्वारा की गई है । इसमें कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण बनी स्थितियों में अकेले अफ्रीका के उप सहारा इलाके में युद्ध भड़कने से 3 लाख 90 हजार मौतें हो सकती हैं । इन युद्धों के बहुत विनाशकारी होनें की आशंका है ।

नेचर क्लाइमेट चेंज एंड अर्थ सिस्टम साइंस डाटा जर्नल में प्रकाशित  एक रिपोर्ट के अनुसार चीन, अमेरिका और यूरोपीय संघ के वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में क्रम से 26 ,15 और 11 फीसद की हिस्सेदारी है जबकि भारत का आंकड़ा सात फीसद है। इसमें बताया गया है कि प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन के मामले में भारत की हिस्सेदारी 2.44 टन है जबकि अमेरिका, यूरोपीय संघ और चीन की प्रति व्यक्ति हिस्सेदारी क्रम से 19.86 टन, 8.77 और 8.13 टन है।यह रिपोर्ट ब्रिटेन के ईस्ट एंजलिया विश्वविद्यालय के ग्लोबल कार्बन परियोजना द्वारा किये गये एक अध्ययन पर आधारित है ।  दुनियाँ भर में कार्बन उत्सर्जन की बढती दर ने पर्यावरण और खासकर जैव विविधता को बड़े पैमानें पर नुकसान पहुँचाया है , एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले एक दशक में विलुप्त प्रजातियों की संख्या पिछले एक हजार वर्ष के दौरान विलुप्त प्रजातियों की संख्या के बराबर है। जलवायु में तीव्र गति से होने वाले परिवर्तन से देश की 50 प्रतिशत जैव विविधता पर संकट है। अगर तापमान से 1.5  से 2.5  डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होती है तो 25 प्रतिशत प्रजातियां पूरी तरह समाप्त हो जाएंगी।  अंतरराष्ट्रीय संस्था वर्ल्ड वाइल्ड फिनिशिंग ऑर्गेनाइजेशन ने अपनी रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि 2030 तक घने जंगलों का 60 प्रतिशत भाग नष्ट हो जाएगा। वनों के कटान से वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की कमी से कार्बन अधिशोषण ही वनस्पतियों व प्राकृतिक रूप से स्थापित जैव विविधता के लिए खतरा उत्पन्न करेगी। मौसम के मिजाज में होने वाला परिवर्तन ऐसा ही एक खतरा है। इसके परिणामस्वरूप हमारे देश के पश्चिमी घाट के जीव-जंतुओं की अनेक प्रजातियां तेजी से लुप्त हो रही हैं। 
पिछले दिनों पर्यावरण और वायु प्रदूषण का भारतीय कृषि पर प्रभाव शीर्षक से प्रोसिडिंग्स ऑफ नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस में प्रकाशित एक शोध पत्र के नतीजों ने  सरकार ,कृषि विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों की चिंता बढ़ा दी है । शोध के अनुसार भारत के अनाज उत्पादन में वायु प्रदूषण का सीधा और नकारात्मक असर देखने को मिल रहा है। देश  में धुएं में बढ़ोतरी की वजह से अनाज के लक्षित उत्पादन में कमी देखी जा रही है। करीब 30 सालों के आंकड़े का विश्लेषण करते हुए वैज्ञानिकों ने एक ऐसा सांख्यिकीय मॉडल विकसित किया जिससे यह अंदाजा मिलता है कि घनी आबादी वाले राज्यों में वर्ष 2010 के मुकाबले वायु प्रदूषण की वजह से गेहूं की पैदावार 50 फीसदी से कम रही। कई जगहों पर खाद्य उत्पादन में करीब 90 फीसदी की कमी धुएं की वजह से देखी गई जो कोयला और दूसरे प्रदूषक  तत्वों की वजह से हुआ। भूमंडलीय तापमान वृद्धि और वर्षा के स्तर की भी 10 फीसदी बदलाव में अहम भूमिका है। कैलिफॉर्निया विश्वविद्यालय में वैज्ञानिक और शोध की लेखिका जेनिफर बर्नी के अनुसार ये आंकड़े चौंकाने वाले हैं हालांकि इसमें बदलाव संभव है। संयुक्त राष्ट्र में जलवायु परिवर्तन के लिए बने अंतर सरकारी पैनल(आइपीसीसी)  रिपोर्ट में भी इसी तरह की चेतावनी दी गई थी । ‘जलवायु परिवर्तन - प्रभाव, अनुकूलन और जोखिम’ शीर्षक से जारी इस रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव पहले से ही सभी महाद्वीपों और महासागरों में विस्तृत रूप ले चुका है। रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण एशिया को बाढ़, गर्मी के कारण मृत्यु, सूखा तथा पानी से संबंधित खाद्य की कमी का सामना करना पड़ सकता है। कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाले भारत जैसे देश जो केवल मानसून पर ही निर्भर हैं, के लिए यह काफी खतरनाक हो सकता है। जलवायु परिवर्तन की वजह से दक्षिण एशिया में गेहूं की पैदावार पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है । साथ ही वैश्विक खाद्य उत्पादन भी धीरे-धीरे घट रहा है। एक खास बात यह भी है कि जलवायु परिवर्तन से न केवल फसलों की उत्पादकता प्रभावित हो रही है बल्कि उनकी पोष्टिकता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है । एशिया में तटीय और शहरी इलाकों में बाढ़ की वृद्धि से बुनियादी ढांचे, आजीविका और बस्तियों को काफी नुकसान हो सकता है। ऐसे में मुंबई, कोलकाता, ढाका जैसे शहरों पर खतरे की संभावना बढ़ सकती है। पिछले दिनों पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने भी जलवायु परिवर्तन पर इंडियन नेटवर्क फॉर क्लाइमेट चेंज असेसमेंट की रिपोर्ट जारी करते हुए चेताया था कि यदि पृथ्वी के औसत तापमान का बढ़ना इसी प्रकार जारी रहा तो अगामी वर्षों में भारत को इसके दुष्परिणाम झेलने होंगे। इसका सीधा असर देश की कृषि व्यवस्था पर भी पड़ेगा ।
दुनियाँ भर के देशों की जलवायु और मौसम में परिवर्तन हो रहा है।  पिछले दो सालों में देश के कई इलाकों में बेमौसम बरसात और सूखे की वजह से किसानों की बड़ी आबादी बेहद मुश्किल दौर से गुजर रही है । पिछले साल अचानक आई बेमौसम बारिश ने कहर ढाते हुए कई राज्यों की कुल 50 लाख हेक्टेयर भूमि में खड़ी फसल बर्बाद कर दिया था । मौसम में तीव्र परिवर्तन हो रहा है ,ऋतु चक्र बिगड़ चुके है। मौसम के बिगड़े हुए मिजाज ने देश भर में समस्या पैदा कर दी है । सच्चाई यह है कि देश में कृषि क्षेत्र में मचे हाहाकार का सीधा संबंध जलवायु परिवर्तन से है । यह सब जलवायु परिवर्तन और हमारे द्वारा पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने  की वजह से हो रहा है ।
जलवायु परिवर्तन संपूर्ण मानवता के लिये एक बहुत बड़ा खतरा है ।एक अहम् बात और है कि सौर ,विंड जैसी वैकल्पिक ऊर्जा पर जोर देकर हम अपनी उर्जा जरूरतों के साथ साथ ग्लोबल वार्मिंग पर काबू कर सकतें है। बड़े पैमानें पर वैकल्पिक उर्जा  के उपयोग और उत्पादन के लिए अब पूरे विश्व को एक साथ आना होगा तभी कुछ हद तक वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में कुछ कमी आ पायेगी । 
कुलमिलाकर देश के प्राकृतिक संसाधनों का ईमानदारी से दोहन और पर्यावरण के संरक्षण के लिए सरकारी प्रयास के साथ साथ जनता की  सकारात्मक भागीदारी की जरुरत है । जनता के बीच जागरूकता फैलानी होगी, तभी इसका संरक्षण हो पायेगा । पर्यावरण संरक्षण का सवाल पृथ्वी के अस्तित्व से जुड़ा है। इसलिए हम सभी को इसके लिए संजीदा होना होगा  ।
(लेखक राजस्थान के मेवाड़ यूनिवर्सिटी में डिप्टी डायरेक्टर हैं और टेक्निकल टूडे मैगज़ीन के संपादक है )



Friday, 8 June 2018

सुखी संख्याएं और सुख देने वाली संख्याएं

चंद्रभूषण 
नंबर थिअरी को गणित की रानी कहा जाता है। रीक्रिएशनल मैथमेटिक्स (मनोरंजन से जुड़ा गणित) भी इसी दायरे में आता है, हालांकि नंबर थिअरी खुद में बड़ा विशद शास्त्र है। इसकी दो दिलचस्प धारणाएं कम से कम नाम के मामले में एक-दूसरे से इतनी मिलती-जुलती हैं कि इन पर एक साथ चर्चा करने का दिल करता है। इनकी उत्पत्ति बिल्कुल अलग-अलग जगहों से है, और आपस में इनका कुछ भी लेना-देना नहीं है।
संस्कृत शब्द हर्षदका अर्थ खुश कर देने वाला/वाली है और कुछ खास प्राकृतिक संख्याओं को यह नाम देने का श्रेय महाराष्ट्र के डहानू जिले के स्कूलटीचर व शौकिया गणितज्ञ डीआर कापरेकर (1905-1986) को जाता है। ऐसी सभी संख्याएं, जिनमें अपने अंकों के योगफल का भाग चला जाता है, हर्षद संख्याएं कहलाती हैं। जैसे 12 एक हर्षद संख्या है, क्योंकि इसमें 1+2=3 का भाग चला जाता है।
कोई कह सकता है कि यह तो एक बहुत सामान्य धारणा है, इसको इतना ज्यादा वजन देने की क्या जरूरत है। लेकिन कापरेकर जी का रीक्रिएशनल मैथमेटिक्स में योगदान इतना बड़ा और मौलिक है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसी संख्याओं को उनके द्वारा दिए गए नाम हर्षद नंबर्ससे ही जाना जाता है। दूसरे, हर्षद नंबर से जुड़ी नई-नई धारणाएं भी लगातार आती जा रही हैं। जैसे, 2005 में गणितज्ञ ई. ब्लोएम द्वारा पेश की गई मल्टिपल हर्षद नंबर’ (एमएचएन) की धारणा।
उदाहरण में जाएं तो 6804 अपने अंकों के योग 18 से कट जाती है और भागफल 378 आता है। यह संख्या फिर अपने अंकों के जोड़ 18 से कट जाती है और भागफल 21 आता है। फिर 21 भी अपने अंकों के योग 3 से कट जाती है, जिससे आने वाला भागफल 7 खुद 7 से कट जाता है। इस प्रकार 6804 को चौगुनी हर्षद संख्याकहा जा सकता है, और एक गणितीय श्रेणी के रूप में इसे एमएचएन-4 कहा जाएगा।
यह तो हो गई सुख देने वाली संख्या। लेकिन हैपी नंबर्स यानी सुखी संख्याओं की अलग ही दुनिया है और इनका हर्षद नंबर्स से कुछ भी लेना-देना नहीं है। इनका खोजी कौन है, यह भी किसी को पक्का नहीं पता, लेकिन सबसे पहले इनपर चर्चा रूस में होनी शुरू हुई थी। हैपी नंबर्स वे हैं, जिनके अंकों के वर्ग का योगफल करते जाने पर अंतिम नतीजा 1 निकलता है।
जैसे 19 को लें तो पहली बार 1 का वर्ग 1 और 9 का वर्ग 81 जोड़ने पर 1+81=82 आता है। दूसरी बार 8 का वर्ग 64 और 2 का वर्ग 4 जोड़ने पर 68, तीसरी बार 6 का वर्ग 36 और 8 का वर्ग 64 जोड़ने पर 100 आता है और चौथी बार 1, 0 और 0 का वर्ग जोड़ने पर 1 आ जाता है। यानी 19 एक हैपी नंबर है। 50 से नीचे की हैपी नंबर्स का जिक्र करना हो तो ये 1, 7, 10, 13, 19, 23, 28, 31, 32, 44 और 49 हैं। इनके बड़े दिलचस्प पैटर्न बनते हैं और इस दायरे में नई-नई खोजें होती रहती हैं।


Friday, 4 May 2018

स्टीफन हॉकिंग का ‘आखिरी’ शोधपत्र


चंद्रभूषण 
स्टीफन हॉकिंग का आखिरी शोधपत्र प्रकाशित होने की चर्चा गरम है। बेल्जियन भौतिकशास्त्री टॉमस हर्टोग के साथ उनका यह काम कॉस्मॉलजी के इन्फ्लेशनमामले से संबंधित है, जिस पर हम यहां थोड़ी चर्चा करेंगे। लेकिन इससे पहले यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि 14 मार्च 2018 को दिवंगत हुए बहुचर्चित थिअरेटिकल फिजिसिस्ट स्टीफन हॉकिंग का यह अंतिम रिसर्च पेपर नहीं है।
उनके प्रिय शोध क्षेत्र ब्लैकहोलों पर केंद्रित कई और शोधपत्र आने वाले दिनों में भी प्रकाशित होते रहेंगे। यह बात और है कि ये सारे पेपर किसी न किसी के साथ मिलकर ही लिखे हुए हैं। 75 साल की उम्र पाए स्टीफन के लिए अपने अंतिम वर्षों में अकेले दम पर पर्याप्त सामग्री जुटाकर उसपर फैसलाकुन ढंग से काम करना संभव नहीं था, हालांकि इसका दूसरा पहलू यह भी था कि उनके साथ अपना नाम जोड़ना नई पीढ़ी के हर भौतिकशास्त्री का सपना हुआ करता था।
बहरहाल, बड़े फलक की विषयवस्तु इन्फ्लेशन पर टॉमस हर्टोग के साथ मिलकर किया हुआ उनका यह काम कॉस्मॉलजी से जुड़े भौतिकशास्त्रियों और उनके करीब पड़ने वाले गणितज्ञों के बीच चर्चा का विषय बनेगा। खासकर इस शोधपत्र की यह प्रस्थापना कि बिग बैंग के बाद गुजरे एक सेकंड के बहुत ही छोटे हिस्से में- जिसे इन्फ्लेशन का समय कहा जाता है- समय जैसी किसी चीज का कोई अस्तित्व नहीं था।
किसी को यह बात अटपटी लग सकती है, क्योंकि बात चाहे सेकंड के कितने भी छोटे हिस्से की क्यों न हो, समय तो समय है। उसके न होने की बात का भला क्या मतलब है? यहां आपको इस बात का मतलब समझाने का दावा इन पंक्तियों का लेखक नहीं कर सकता, क्योंकि सीमावर्ती भौतिकी की बहुत सारी बातों का कोई व्यावहारिक मतलब समझ पाना आला से आला दर्जे के भौतिकशास्त्रियों के भी बूते से बाहर की बात हुआ करती है। वहां सारा मतलब गणित की भाषा में ही समझना पड़ता है।
तो सवाल यह बचता है कि क्या हॉकिंग और हर्टोग ने सृष्टि के प्रारंभिक क्षणों का कोई ऐसा गणितीय समीकरण ढूंढ निकाला है, जो समय जैसी किसी चीज के बिना भी सफलतापूर्वक काम कर सकता हो? जवाब नहीं में है। उन्होंने एक प्रस्थापना भर दी है, जिसका खंडन-मंडन होना अभी बाकी है।
अब थोड़ी बात इन्फ्लेशन के बारे में, जिसे 1979 से ब्रह्मांड के निर्माण से जुड़ी दूसरी सर्वाधिक महत्वपूर्ण मान्यता जैसी प्रतिष्ठा प्राप्त है। पहली मान्यता 1927 में दी गई, 1929 में लगभग और 1964 में पूरी तरह पुष्ट मान ली गई बिग बैंग की प्रस्थापना की है। इस प्रस्थापना के मुताबिक बिग बैंग वह बिंदु है, जहां से देशकाल की शुरुआत होती है।
ब्रह्मांड में आकाशगंगाओं के एक-दूसरे से दूर भागने की दर का अध्ययन करके यह नतीजा निकाला गया है कि अनंत विस्तार का सारा किस्सा दरअसल 13.8 अरब साल पहले एक बिंदु से शुरू हुआ था, जिसके पहले आकाश और समय नहीं था, और अगर रहा भी हो तो उसके बारे में जाना नहीं जा सकता।
1964 में कॉस्मिक बैकग्राउंड रेडिएशन (सीआरबी) की खोज से बिग बैंग पर तो पक्की मोहर लग गई लेकिन दो नए सवाल भौतिकशास्त्रियों को परेशान करने लगे। पहला यह कि ब्रह्मांड हर तरफ एक जैसा क्यों है, और दूसरा यह कि ब्रह्मांड में कहीं द्रव्य के होने और कहीं न होने की गुंजाइश कैसे पैदा होती है। इन दोनों सवालों का जवाब 1979 में एलन गुथ ने इन्फ्लेशन की थीसिस के जरिये दिया।
इसके मुताबिक बिग बैंग के समय को शून्य समय नहीं बल्कि क्वांटम समय माना जाए, यानी 1 के बाद 36 शून्य लगाकर एक बहुत बड़ी संख्या बनाई जाए, फिर एक सेकंड समय को उससे भाग देने पर जो आए, उतना समय। क्वांटम थिअरी की अनिवार्य प्रस्थापना 'अनिश्चितता का सिद्धांत' पर बिग बैंग की खरा उतरने के लिए ऐसा करना जरूरी है।
10 की ऋण 36 घात सेकंड वाले इस क्वांटम समय से लेकर 10 की ऋण 33 घात वाले समय के बीच ब्रह्मांड अपने सूक्ष्म आकार का कम से कम साठ बार दो गुना होता चला गया- यह इन्फ्लेशन का सिद्धांत है। समय का यह इतना छोटा हिस्सा भी समय ही कहलाएगा, लेकिन हॉकिंग और हर्टोग की प्रस्थापना के मुताबिक यह समय न होकर स्पेस की तीन विमाओं में ही समाहित है। यानी शून्य समय।
अच्छा होगा कि हम इस प्रस्थापना के खंडन-मंडन का इंतजार करें। वैसे, स्टीफन हॉकिंग के ही कद के, बल्कि अपने शास्त्र में उनसे कहीं ज्यादा कद्दावर गणितज्ञ रॉजर पेनरोज शुरू से ही इन्फ्लेशन की धारणा को ही खारिज करते आए हैं। बाल की खाल निकालने वाली इन बहसों के देर-सबेर कुछ व्यावहारिक अर्थ भी निकलेंगे। तब तक चीजों और सिद्धांतों के नामों का आनंद लेते रहें।

Tuesday, 17 April 2018

मंगल पर जाएंगी रोबोट-मक्खियां


मुकुल व्यास 
नासा के शोधकर्ता ऐसी रोबोटिक मक्खियों का डिजाइन तैयार कर रहे हैं जो मंगल पर उड़कर वहां के बारे में नई जानकारियां जुटा सकें। अमेरिकी अंतरिक्ष प्रशासन एजेंसी ने पिछले दिनों इस परियोजना के बारे में खुलासा किया। यह परियोजना अभी आरंभिक अवस्था में है, लेकिन इसका मकसद मंगल के अन्वेषण के लिए इस समय प्रयुक्त की जा रही रोवर का बेहतर विकल्प खोजना है। रोवर के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि एक यह आकार में बड़ी और भारी भरकम होती है तथा बहुत ही सुस्त चाल से मंगल की सतह पर सरकती है। इस वजह से इसके कार्यक्षेत्र का दायरा बहुत सीमित हो जाता है। इसके अलावा रोवर के निर्माण में खर्चा भी बहुत आता है। यदि रोवर की जगह मंगल पर सेंसरों से युक्त सूक्ष्म रोबोटों को भेजा जाए तो वे सतह पर तेजी के साथ दूसरे इलाकों में जाकर कारगर ढंग से सूचनाएं एकत्र कर सकेंगे। 1इस तरह के सूक्ष्म रोबोटों के निर्माण की लागत भी बहुत कम आएगी। नासा के अधिकारियों के अनुसार इन रोबोटों का आकार अमेरिका में पाई जाने वाली बंबलबीजैसा होगा। मंगल पर भेजी जाने वाली रोबोटिक मक्खी मार्सबीकहलाएगी। मंगल पर मक्खियां भेजना ज्यादा व्यावहारिक है, क्योंकि मंगल का गुरुत्वाकर्षण कम है। पृथ्वी की तुलना में मंगल का गुरुत्वाकर्षण सिर्फ एक-तिहाई है। वैज्ञानिकों का मानना है कि वहां के पतले वायुमंडल को देखते हुए रोबोट-मक्खी अन्वेषण के लिहाज से ज्यादा बेहतर स्थिति में होंगी। ये मक्खियां न सिर्फ मंगल की सतह को नापेंगी, बल्कि उसके वायुमंडल के नमूने भी एकत्र करेंगी। उनका मुख्य लक्ष्य वहां मीथेन गैस की मौजूदगी का पता लगाना होगा। मीथेन गैस की मौजूदगी जीवन की संभावना की ओर इशारा करती है। इस समय मंगल पर सक्रिय क्यूरियोसिटी रोवर को मीथेन गैस की उपस्थिति के कुछ संकेत मिले हैं, लेकिन इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिला कि यह गैस किसी जैविक गतिविधि से उत्पन्न हो रही है या इसका निर्माण किसी और वजह से हो रहा है।रोबोट मक्खियों का इस्तेमाल मंगल पर ही नहीं, बल्कि पृथ्वी पर भी होगा। हम सभी जानते हैं कि फसलों और फल-सब्जियों के परागण में मक्खियों और कीट-पतंगों की बड़ी भूमिका होती है। दुनिया में मक्खियों की आबादी घट रही है जिसका फसल उत्पादन पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। इस समस्या से निपटने के लिए शोधकर्ता ऐसी रोबोटिक मक्खियां विकसित कर रहे हैं जो पौधों का परागण कर सकें। पिछले कुछ वषों से वैज्ञानिक मधुमक्खियों की आबादी में गिरावट रोकने के उपाय खोज रहे हैं। हमारे भोजन में प्रयुक्त एक-तिहाई पेड़-पौधों का परागण मधुमक्खियों द्वारा किया जाता है, लेकिन इन मधुमक्खियों की संख्या तेजी से कम हो रही है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के शोधार्थियों ने 2013 में पहली रोबोट मक्खी बनाई थी जो बिजली के स्नोत से जुड़ने के बाद हवा में मंडरा सकती थी। इसके बाद यह टेक्नोलॉजी तेजी से विकसित हुई। आज ये रोबोट-मक्खियां सतह पर चिपक सकती हैं और पानी में भी तैर सकती हैं और अब इनका प्रयोग मंगल ग्रह पर भी किए जाने की तैयारी है।

Facebook के सही उपयोग के कुछ सूत्र:

Dr. Avyact Agrawal

Facebook पर मैं लगभग एक वर्ष से हूँ। इस बीच ज़हाँ आप सबने बहुत प्यार दिया, मेरी किताब आपकी वज़ह से आयी और बिकी। कुछ बेहद अच्छे मित्र मिले। कुछ गहरे लेखक मिले। फिर मेरे यूट्यूब चैनल को भी एक अच्छी शुरुआत आपने
दिलवाई।

वहीँ मेरा इनबॉक्स रोज़ाना लोगों की मानसिक और शारीरिक समस्याओं  से भरा रहने लगा।

कुछ समस्याएं तो लोगों की पोस्ट और बातें सुनकर मुझे फेसबुक की ही दी हुई लगने लगीं। तो सोचा मेरे एक वर्ष के अनुभव, मनोविज्ञान और व्यक्तित्वों की समझ के अनुरूप फेसबुक का खुशहाल उपयोग के कुछ सूत्र लिखूँ। शायद कुछ लोगों के काम आएं।

1. पहला सूत्र तो यही है कि इस बात को दिल की गहराइयों तक स्वीकार कर लें कि फेसबुक आपके रोज़मर्रा के जीवन में 0.1 प्रतिशत से ज़्यादा अहमियत नहीं रखता। इसे एक मनोरंजन और ज्ञान अर्जित का अच्छा साधन मानें लेकिन रिश्ते ढूँढने और बनाने का बिल्कुल नहीं।

2. हमेशा आइडियाज़, विचार, विचार धारा  की बातें करें और ज़हन में रखें किसी व्यक्ति की बातें न करें तीसरे से। खासकर नकारात्मक चर्चा से बचें। जो पसंद नहीं उसे इग्नोर कर दें, unfriend कर दें , ब्लॉक कर दें लेकिन नकारात्मक पोस्ट करना ,स्क्रीनशॉट पब्लिक करने का अर्थ यह है कि उस व्यक्ति को आप अपने खूबसूरत ज़हन में ज़रूरत से ज़्यादा महत्त्व और ज़गह दे रहे हैं।

3. रिश्तों  और मित्रता के दो अर्थ मैं देखता हूँ,  पहला यह कि
मित्र या रिश्ता आपको यह अहसास और विश्वास दिला सके कि आपकी किसी मुश्किल में वह साथ देगा अपनी सामर्थ्य अनुसार दूसरा यह कि आपको वह आगे बढ़ते देखना चाहेगा और इसके लिए आपके मिशन या प्रोजेक्ट में अपनी सामर्थ्य अनुसार मदद करेगा। फेसबुक पर आपसे जुड़े  मित्र या कथित रिश्ते का रवैया आपके प्रति उस व्यक्ति के व्यक्तित्व की भीतर तक पड़ताल कर सकता है। इन दो criteria के अलावा मित्रता या रिश्ते के दावे झूठे होते हैं। Facebook friend से ये अपेक्षाएं नहीं होतीं लेकिन कोई दावा करे मित्रता या रिश्ते का तो इन दो पहलुओं पर उसकी परीक्षा ले लेना।
उदाहरण के लिए, मेरे किसी मित्र ने मुझसे इनबॉक्स पर किताब लिखने या स्वास्थ्य सम्बंधित जानकारी पर कोई सलाह मांगी और मैं उसे ज़वाब तक न दूं लेकिन कहूँ कि मैं तो सबका हूँ।
एक जनरल रूल यह भी है कि जो सबका हो , कम ही सम्भावना है कि वो किसी का भी होगा। क्योंकि हम मनुष्य सीमित क्षमता लिए हुए होते हैं निभाने की। हर वक़्त नए रिश्तों की तलाश में लगे लोग लाज़िमी है पुराने रिश्तों की उपेक्षा कर ही ऐसा कर सकते हैं। माँ तक 5 बच्चे पैदा कर ले तो नए पर ज़्यादा ध्यान देगी, बड़ा बच्चा माँ के समय और गोद के लिए तरसेगा, कभी पिट भी जायेगा। यह तब जब वह बराबरी से प्यार करने वाली माँ है। गुणा भाग ,हैसियत देख मित्रता करने वाला कोई व्यक्ति नहीं।
पहले तो मैं कहूँगा फेसबुक पर रिश्ते मत तलाशिये असल जीवन के रिश्ते मज़बूत कीजिये और अपने खालीपन को भरिये। हाँ कोई बहुत अच्छा मिल ही जाये तो जुड़िये लेकिन रिश्तों की फ़ौज़ नहीं होती, भगवान की तक रिश्तों की फ़ौज़ नहीं होती। राधा राधा थीं और बाक़ी गोपियाँ गोपी।

प्रकृति ने आप जैसा पूरी इंसानी सभ्यता के इतिहास में दूसरा कोई नहीं बनाया। आप बेहद uniqe हैं। इसलिए स्वाभिमान का ख़याल हमेशा रखें किसी भी रिश्ते में।

3. आपकी timeline आपके मस्तिष्क का extention है।
 उद्वेलित मन की अवस्था में कुछ भी न लिखें। लोग भले वाह वाह कह दें लेकिन आपके व्यक्तित्व का कोई भीतरी कमज़ोर हिस्सा लोगों को दिख जायेगा। और आपकी इमेज से चिपक जायेगा।

4. फेसबुक जब तक मनोरंजन करे खुशी और ज्ञान दे इस पर रहें। लेकिन दुःख देने लगे, ईर्ष्या,कुंठा,जोड़ तोड़ , recognition पाने की अदम्य इक्छा जैसी बातें मन में आने लगे तो कुछ दिन के लिए इससे दूर हो जाएं।

5. आपकी पारिवारिक जिम्मेदारी, और व्यावसायिक जिम्मेदारी
को उपेक्षित कर कभी इसे समय न दें।

6. फेसबुक पर कुछ लोग ज़्यादा लोकप्रिय हो जाते हैं। यदि आप हो गए हैं तो ज़्यादा खुश मत हो जाइए। इसका प्रभाव असल जीवन में नगण्य है। कोई भी 'फेसबुक सेलिब्रिटी' असल जीवन में एक अलग जीवन जीता है।
उदाहरण के लिए मेरी पहचान असल जीवन में मेरे शहर में एक चिकत्सक के रूप में है फेसबुक पर लिखने वाले लेखक के रूप में नहीं। आपका प्रमुख काम ही आपकी पहचान है इसलिए मुगालते मत पालिए। follower की संख्या दरअसल आपसे प्रभावित लोगों का प्रतिबिम्ब बिल्कुल भी नहीं।

7. हालाँकि यह व्यक्तिगत मसला है कि कौन क्या पोस्ट करता है और सभी मुद्दों की ज़रूरत है लेकिन फ़िर भी मुझे लगता है हिन्दू मुस्लिम , जात पात के मसले इतने जटिल हैं कि फेसबुक पर नहीं सॉल्व किये जा सकते वरन् उल्टा होता है इसका, लोग और भी नफ़रत से भर जाते हैं तार्किक दृष्टि की ज़गह। लिखना भी है तो अपने विचारों और अनुभवों को एक विनम्र, तर्कपूर्ण और विस्तारित पोस्ट का रूप दें और सही मंशा से करें जैसा कि
Tabish Siddiqui करते हैं। क्योंकि ये विषय विरोध आमंत्रित करते हैं।

8. बेहद अहम् यह कि इनबॉक्स पर चैट करने से बचें। और chat की भी है तो कम से कम् उन स्क्रीन शॉट्स को औरों को न भेजें न ही पोस्ट करें। यह व्यक्तित्व का बड़ा नकारात्मक पहलू दिखाता है। और आपकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगाता है।

9. बहसीले और नकारात्मक कमेंट करने वालों से बहस में उलझने की ज़गह सीधे ब्लॉक करें।

10. स्वाभिमान अवश्य रखें। कोई भी इतना बड़ा नहीं कि आपकी किसी भी पोस्ट को 'कभी भी' लाइक तक करने में कष्ट महसूस करे , गुणा भाग करे और आप उस पर वारे वारे जाओ।
दरअसल यह व्यव्हार एक बेहद calculatIive और स्वार्थी व्यक्तित्व की निशानी होती है। साथ ही व्यक्ति के स्वयं को आपसे बहुत ऊपर समझने के दम्भ को भी यह व्यव्हार प्रदर्शित करता है। छोटे छोटे क्लू  आपको व्यक्ति की भीतरी कोशिकाओं तक का प्रतिबिम्ब बता देते हैं बशर्ते कि आपमें नज़र हो यह देख सकने की।

11. जो अच्छा लिखे अच्छा काम करे उसकी दिल खोल कर प्रशंसा कीजिये,शेयर करिये,लाइक करिये, छोटे छोटे साथ दीजिये। जैसे मैं विजय सिंह ठकुराय का फैन उनकी किताब का इंतज़ार कर रहा हूँ जिससे मैं उसे खूब प्रमोट कर सकूं। प्रशंसा जैसी मुफ़्त की चीज़ में क्या कंजूसी करना। किसी अच्छे की प्रशंसा हमारे भीतर के अहम्,ईर्ष्या ,कुंठा को धोने का काम करती है मन साफ़ करती है। और साफ मन सुन्दर चमकते चेहरे और अच्छे स्वास्थ्य के लिए बेहद ज़रूरी है। मतलब मुफ़्त की चीज़ और बेहतरीन कॉस्मेटिक है किसी अच्छे की प्रशंसा।

12. महिलाएं वैसे तो बेहद बुद्धिमान हैं फिर भी अज़नबी पुरुषों से चैटिंग अवॉयड करें तो ज़्यादा सुख है।

13. अंत में बाहर के सुन्दर मौसम का आनंद लीजिये, ठंडी हवा को गालों से टकराने दीजिये घर की बालकनी में बैठे।
किसी बच्चे के संग खेलिए,उसे बॉल स्पिन करना सिखाइये कभी बैट पकड़ना, किसी पपी को दुलारिये, किसी पौधे को पानी दीजिये, फूल को निहारिये, नीले आसमान को देखिये, रात को तारे गिनिये, कुछ अच्छी डिश बनाइये, डांस करिये

मोबाइल स्क्रीन के परे अपनी असल दुनिया के मुद्दे ही आपके मन में  घूमना चाहिए मोबाइल से नज़र हटते ही।

मैं या मुझसा कोई कितना भी अच्छा दिखे फेसबुक पर perfect नहीं।

Wednesday, 11 April 2018

अंतरिक्ष में आलीशान होटल

मुकुल व्यास 
अंतरिक्ष पर्यटन की दिशा में यह पहला कदम तो नहीं है, लेकिन चार करोड़ डॉलर की रूसी पेशकश से काफी किफायती है
चार साल बाद लोग अंतरिक्ष में प्रवास का आनंद उठा सकेंगे। अमेरिका में ओरियन स्पैन नामक कंपनी ने 2021 में एक आलीशान अंतरिक्ष होटल को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करने की योजना बनाई है। पांच साल के भीतर लोग इस होटल में ठहरना शुरू कर देंगे, लेकिन सिर्फ बड़े-बड़े धनकुबेर ही इस होटल में ठहरने के बारे में सोच सकते हैं। कंपनी 12 दिन के प्रवास के लिए सैलानियों से करीब एक करोड़ डॉलर वसूलेगी। इस होटल में ठहरने वाले मेहमान शून्य गुरुत्वाकर्षण का अनुभव कर सकेंगे। होटल की खिड़कियों से पृथ्वी के रोमांचकारी दृश्य कैद कर सकेंगे। इसके अलावा उन्हें दिन में औसतन 16 सूर्योदय और सूर्यास्त देखने का भी का मौका मिलेगा। होटल में ठहरने वाले सैलानी अंतरिक्ष जीवन के हर पहलू का अनुभव कर सकेंगे। अमेरिकी कंपनी ने सेन जोस शहर में स्पेस 2.0 शिखर सम्मेलन में इस प्रोजेक्ट की घोषणा की। 1अरौरा स्टेशन नामक इस अंतरिक्ष होटल में एक बारी में छह लोग ठहर सकेंगे। इनमें चार यात्री और चालक मंडल के दो सदस्य होंगे। कंपनी खुद यह होटल बनाना चाहती है। हालांकि उसने अभी तक इसके प्रक्षेपण का संपूर्ण ब्योरा नहीं दिया है। समझा जाता है कि होटल का डिजाइन मॉडुलर होगा। इससे बाद में इसका विस्तार करने में आसानी होगी। कंपनी के सीईओ फ्रेंक बंगर के अनुसार यह होटल प्रक्षेपण के तुरंत बाद काम करने लगेगा। अरौरा स्टेशन पृथ्वी के सैलानियों की मेजबानी करने के अलावा शून्य गुरुत्वाकर्षण में शोध और अंतरिक्ष में निर्माण की भी सुविधाएं भी देगा। कंपनी दूसरी अंतरिक्ष एजेंसियों को बहुत कम लागत पर अंतरिक्ष में मानव उड़ानें संचालित करने की सुविधाएं देगी। 1आगे चलकर कंपनी होटल की जगह किराये पर भी दे सकती है। बंगर ने बताया कि होटल का वास्तुशिल्प कुछ ऐसा होगा कि आवश्यकता पड़ने पर बाजार की मांग के अनुरूप उसकी क्षमता बढ़ाई जा सकेगी। अरौरा स्टेशन अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन की तुलना में बहुत छोटा होगा। इसका आकार एक बड़े प्राइवेट जेट विमान के केबिन जितना होगा। इस होटल में एक बड़े आलीशान होटल जैसी सारी व सुविधाएं होंगी, लेकिन यात्रियों को प्रवास के दौरान शून्य गुरुत्वाकर्षण में ही रहना पडेगा। होटल में ठहरने वाले लोग हाई स्पीड वायरलैस इंटरनेट के जरिये निरंतर संपर्क में रहेंगे। होटल में ठहरने वाले मेहमानों की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए कंपनी यात्रियों को तीन महीने का प्रशिक्षण देगी।1अंतरिक्ष भ्रमण को व्यावसायिक बनाने का यह पहला प्रयास नहीं है। पिछले साल रूस ने कहा था कि वह अंतरिक्ष सैलानियों को 2022 तक अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन में रुकने का मौका देना चाहता है, लेकिन रूसी पेशकश अरौरा मिशन द्वारा बताए गए खर्च की तुलना में बहुत महंगी है। रूस ने स्टेशन में एक या दो सप्ताह के प्रवास के लिए प्रति व्यक्ति चार करोड़ डॉलर का खर्च बताया था। दुनिया के अन्य अरबपतियों द्वारा संचालित कंपनियां भी अंतरिक्ष पर्यटन के लिए कुछ लुभावनी परियोजनाएं शुरू कर रही हैं। दुनिया में सबसे अमीर माने जाने वाले एमेजॉन के मुखिया जेफ बेजोस भी इसके लिए ब्लू ओरिजिन प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे हैं। 

उन्नति का मूल नहीं अंग्रेजी भाषा

संक्रान्त सानु

कोई भी समृद्ध देश अपनी भाषाओं को छोड़ कर किसी गैर भाषा के प्रयोग से विकसित नहीं हुआ। आज भी विकसित देश अपनी भाषा के आधार पर ही आगे बढ़ रहे हैं 
नयें शैक्षिक सत्र से कई राज्य स्कूलों में अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई की तैयारी कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश सरकार ने भी अंग्रेजी माध्यम के पांच हजार सरकारी स्कूल चलाने का एलान किया है। तर्क है कि अभिभावक ही अंग्रेजी माध्यम स्कूलों की मांग कर रहे हैं और इसी कारण वह हिंदी माध्यम स्कूलों को अंग्रेजी माध्यम में बदल रही है।इस पर यह प्रश्न उठेगा ही कि आखिर अभिभावक अंग्रेजी की क्यों मांग कर रहे हैं? और क्या ऐसी मांग को पूरा करना राज्य और देश के हित में है? आज अंग्रेजी व्यवसाय, नौकरी और विज्ञान एवं तकनीक से जुड़ गई है। इस सबके फलस्वरूप वह समाज में सम्मान का प्रतीक बन गई है। ऐसे में अंग्रेजी की ओर रुझान स्वाभाविक ही लगता है, लेकिन हम यह नहीं पहचान रहे हैं कि अंग्रेजी के महत्व का एक भ्रम जाल सा फैलाया गया है। इसकी जड़ में सरकार की गलत नीतियां हैं।भारत में अंग्रेजी का वर्चस्व वैश्विक अनिवार्यता के कारण नहीं है। विश्व के समृद्ध देश अपनीअपनी भाषाओं का प्रयोग कर रहे हैं और निज भाषा ही उनकी उन्नति का मूल है। मुझे विश्व के करीब 35 देशों में जाने का अवसर मिला और मैंने यह पाया कि हर एक विकसित देश अपनी भाषा के आधार पर आगे बढ़ रहा है। कोई भी विकसित देश जन भाषाओं को छोड़कर किसी गैर भाषा के प्रयोग से विकसित नहीं हुआ। हर विकसित देश तकनीक-विज्ञान और व्यवसाय में जन भाषा का प्रयोग कर रहा है। अपनी ही भाषा के आधार पर इन देशों में नौकरियां भी मिलती हैं और उच्च कोटि का शोध भी होता है। आखिर इस सबके बावजूद भारत में अंग्रेजी का बोलबाला क्यों है?अंग्रेजी-माध्यम के स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने की होड़ क्यों है? यह इसलिए है, क्योंकि सरकार की नीतियों ने अंग्रेजी को ऊंचे ओहदे पर कायम रखा है।
सरकार उच्च कोटि के सभी संस्थान आइआइटी, आइआइएम, एम्स इत्यादि केवल अंग्रेजी माध्यम में चलाती है। सरकार की नीति के कारण ही अधिकतर उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय केवल अंग्रेजी में कार्य करता है। भारत सरकार अधिकतर परीक्षाओं में अंग्रेजी को माध्यम ही नहीं बनाती, अपितु अनिवार्य भी करती है। एसएससी जैसी परीक्षा के लिए भी अंग्रेजी अनिवार्य है। इसका परिणाम यह निकलता है कि विद्यार्थियों का सबसे अधिक परिश्रम विषय समझने की जगह अंग्रेजी से जूझने में निकल जाता है। यह भावुक बात नहीं है, बल्कि वैज्ञानिक सत्य है। अनेक वैज्ञानिक शोध यह साबित कर चुके हैं कि मातृभाषा में पढ़ने से बच्चे की बुद्धि का सबसे अच्छा विकास होता है। दशकों से यूनेस्को का भी यही विमर्श है।भारत में भी हाल में आइबीसी के शोध ने साबित किया कि आंध्र प्रदेश में तेलुगु माध्यम में पढ़ रहे बच्चों की विज्ञान और गणित की समझ अंग्रेजी-माध्यम में पढ़ रहे बच्चों से कहीं अच्छी थी। जापान, रूस, चीन आदि देश अपनी भाषा में उच्च शिक्षा देने के कारण ही बहुत तेजी से विज्ञान और तकनीक में प्रगति इसीलिए कर रहे हैं, क्योंकि वहां छात्रों को अपनी भाषा में विषय को समझने में आसानी होती है। इसके विपरीत देश में अंग्रेजी का वर्चस्व विकास का सबसे बड़ा अवरोधक बन गया है। हम देश की बुद्धि का हरण कर रहे हैं और अंग्रेजी लाद कर बच्चों को मानसिक विकलांग बना रहे हैं। इन गलत नीतियों के कारण ही अभिभावक अंग्रेजी के पीछे दौड़ रहे हैं।
समस्या अभिभावकों की नहीं है, समस्या गलत व्यवस्था की है। आखिर इसका समाधान क्या है? हर स्तर पर भारतीय भाषाओं का विकल्प होना चाहिए,चाहे वह प्रबंधन की पढ़ाई हो या चिकित्सा की अथवा तकनीक की। सरकार को भाषा को व्यवसाय से जोड़ना होगा। हर राज्य सरकार एलान कर सकती है कि सभी निजी उद्योग सरकार से संवाद केवल उस प्रदेश की भाषा में करें। इससे भाषा की मांग बढ़ेगी। निजी उद्योग भारतीय भाषाओं में समान अवसर प्रदान करें, इसे भी नीतिगत रूप से लागू किया जा सकता है। कुछ समय के लिए भारतीय भाषा के माध्यम में पढ़े लोगों को सरकारी नौकरी में कुछ प्रतिशत आरक्षण भी दिया जा सकता है। यह भी आवश्यक है कि भारतीय भाषाओं को तकनीक के साथ जोड़ा जाए। आज जब कोई बच्चा स्कूल में कंप्यूटर सीखता है तो केवल अंग्रेजी में। वह भारतीय भाषाओं में टाइप करना तक नहीं जानता। अपनी भाषा में तकनीक की जानकारी से सृजन शक्ति बढ़ेगी, नए-नए आविष्कार होंगे।
भाषा को केवल पुरातन संस्कृति या साहित्य ही नहीं, आधुनिकता का भी वाहक बनाना अनिवार्य है। अंग्रेजी सीखने में कोई आपत्ति नहीं है। सरकार अपने स्कूलों में भाषा के रूप में अंग्रेजी सिखाए। समस्या तब आती है जब अंग्रेजी को माध्यम बना दिया जाता है। जब बच्चे को भाषा ही नहीं आती तो वह उस भाषा में कोई अन्य विषय कैसे सीखेगा? क्या सरकार ने इस पर वैज्ञानिक रूप से कोई शोध किया है? सरकारें आठवीं कक्षा में अंग्रेजी माध्यम सरकारी स्कूलों को हिंदी माध्यम के सरकारी स्कूलों से माप लें। किन स्कूलों के बच्चे गणित को ज्यादा अच्छी तरह समझते हैं?
मैंने अनेक वर्षों तक कई देशों में कंप्यूटर के क्षेत्र में सक्रियता से काम किया है। आज इजरायल कंप्यूटर में बहुत आगे है। वहां पर तकनीक की पढ़ाई हिब्रू भाषा में होती है। मैंने माइक्रोसॉफ्ट में रूस के कंप्यूटर इंजीनियरों को नौकरी दी। उन्हें न के बराबर अंग्रेजी आती थी, लेकिन कंप्यूटर विज्ञान में अंग्रेजी नहीं, बल्कि गणित और तर्क की समझ चाहिए। आज चीन चीनी भाषा में कंप्यूटर विज्ञान की शिक्षा देकर अमेरिका से भी आगे निकल रहा है। गणित और तर्क की इस दुनिया में अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम में धकेलकर हम उन्हें पीछे ही रख रहे हैं।यदि भारत सरकार हर राजकीय भाषा में एक-एक आइआइटी और आइआइएम खोल दे तो भारतीय भाषाओं का दर्जा और समाज में उसके प्रति रुचि तत्काल बढ़ जाएगी। कल को अगर उत्तर प्रदेश सरकार एलान कर दे कि निजी उद्योगों के टेंडर केवल हिंदी में ही मान्य होंगे तो अगले दिन ही निजी उद्योगों में हिंदी की मांग बढ़ जाएगी और इसी के साथ सभी की रुचि हिंदी के प्रति बढ़ जाएगी। सबसे बड़ी जनसंख्या वाला प्रांत उत्तर प्रदेश यदि एक देश होता तो आबादी के लिहाज से विश्व का सातवां सबसे बड़ा देश होता। इससे कहीं छोटे-छोटे देश अपनी भाषाओं में सब काम कर रहे हैं। विश्व की वास्तविकता अंग्रेजी नहीं है। विश्व के तमाम बहुराष्ट्रीय उद्योग भी अंग्रेजी पर आधारित नहीं हैं। वैश्वीकरण अंग्रेजीकरण नहीं है। हमने भारतेंदु हरिश्चंद्र की इन पंक्तियों को केवल भावुक ही मान लियानिज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
यह केवल भाव नहीं, एक वैज्ञानिक तथ्य है। यह एक भ्रम समाज में व्याप्त हो गया है कि अंग्रेजी से ही हमारी उन्नति होगी। सरकार का काम इस भ्रम को दूर करना है न कि उसमें शामिल होना, लेकिन उस राष्ट्रवादी सोच की सरकार को क्या कहें जो अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार अपनी जड़ें काटने पर तुली है? सरकार को अंग्रेजी की भेड़- चाल छोड़ एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। (लेखक आइआइटी स्नातक , माइक्रोसॅाफ्ट के पूर्व अधिकारी और भारतीय भाषाओं में विज्ञान  की पुस्तकों के प्रकाशक हैं

Friday, 6 April 2018

भालू और उसका भोजन


स्कंद शुक्ला  
सबकें देह परम प्रिय स्वामी !
( हे स्वामी ! सबको अपनी देह परम प्रिय है। )
--- तुलसीकृत रामचरितमानस का सुन्दरकाण्ड , जहाँ हनुमान् रावण से कह रहे हैं।
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भारतीय उपमहाद्वीप में मिलने वाली तीन भालू-प्रजातियों में प्रमुख स्लॉथ-भालू है और यह कीड़े चाव से खाता है। दीमक-चींटियाँ , उनके अण्डे व लार्वे इस भालू का प्रिय भोजन हैं। कारण कि कीड़े पृथ्वी पर मौजूद उन कुछ भोज्य-पदार्थों में से हैं , जो प्रोटीन का सबसे समृद्ध स्रोत हैं। मांस-दालों से कहीं अधिक।
सो भालू के लिए आसान है अपने लम्बे नाखूनों से दीमक की बाँबियाँ खोदना , उनमें अपनी नाक के ज़ोर से हवा फूँकना कि वे छिन्न-भिन्न हो जाएँ और फिर किसी वैक्यूम-क्लीनर की तर्ज़ पर अपनी लम्बी जीभ व निचले होठ की सहायता से एक झटके में ही दीमकों को मुँह के भीतर खींच लेना। जो प्रोटीन बड़े श्रम के बाद शिकार से मिलता , वह प्रचुरता के साथ इस रीछ को कीड़े खाने से मिल गया।
अचम्भा मुझे इससे अधिक तब हुआ , जब मैंने जाना कि संसार की सात अरब आबादी में से दो अरब कीटभोजी है। हम मनुष्य हैं और हमारा आहार विज्ञान से अधिक संस्कृति तय करती है। जो जहाँ जिस परिवार-समाज-धर्म-जाति-देश में पैदा हो गया है, उसकी रीतियों-मान्यताओं को सही सिद्ध करने में एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा देगा और दूसरे के आहार-व्यवहार में मीनमेख निकालने लगेगा।
बहरहाल। कीड़े संसार-भर के अलग-अलग देशों में शौक़ से खाये जाते हैं। अफ़्रीकी देशों में। सुदूर पूर्व में। दक्षिण-पूर्व एशिया में। और इसके कारण कई हैं , जिनमें स्वाद सबसे महत्त्वपूर्ण नहीं।
पहला और सबसे महत्त्वपूर्ण कारण खाद्यान्न-संकट है। अकाल और गृहयुद्ध से जूझते तमाम देश मनमरज़ी से खेती पर ध्यान नहीं दे सकते। कृषि संरचनात्मक काम है , जो मानवीय शान्ति और प्राकृतिक सहयोग माँगती है। लेकिन जहाँ यह सम्भव नहीं , वहाँ क्या किया जाए !
जानवरों का मांस भी यों ही नहीं मिल जाता। जानवर यानी पालतू पशु। यानी बड़े चारागाह। अगर चरने के स्थान नहीं , तो पशुपालन नहीं। तो फिर ऐसे में मांस का विकल्प भी सीमित होने लगता है।
कीड़ों में तमाम विकल्प हैं। वे प्रोटीन का पृथ्वी पर समृद्धतम स्रोत हैं , बड़ी तादाद में आसानी से जन्म लेते हैं। नतीजन मानव-भोजन में उनका स्थान बन जाना अकारण नहीं सोचा गया। एफडीए-जैसे संस्थान ऐसे ही नहीं कह रहे कि भविष्य में हमें कीट-उत्पादन पर ज़ोर देना होगा और कीड़े हमारे आहार का महत्त्वपूर्ण अवयव होंगे।
लेकिन कीड़ों को भोजन के रूप में अपनाने में समस्याएँ भी कई हैं। कीटनाशकों के प्रयोग के कारण उनके भीतर भी इन रसायनों की मौजूदगी मनुष्य के लिए चिन्ता का विषय है। पर इसका दूसरा पक्ष यह है कि पालतू पशुओं के भोजन-रूप में प्रयोग से यह ख़तरा कहीं न्यून है। मवेशियों और परिन्दों को पालने से न जाने कितने ही मनुष्य हर साल फ़्लू और एनसेफेलाइटिस की भेंट चढ़ जाते हैं। ये बीमारियाँ आदमी को जानवर पालने के एवज़ में उपहार में मिली हैं।
एफडीए यह भी हमें बताता है कि हम अपने भोजन में बहुत कुछ ऐसा खा जाते हैं , जो हम जानते ही नहीं। अनाज में चूहों के ढेरों बाल मिलते हैं , जिन्हें कोई नहीं निकाल पाता। सब्ज़ियों में तमाम कीड़ों में अंग-उपांग हमारे भोजन में अपनी जगह अनजाने बना लेते हैं। अभी यह सब अनायास हो जाता है , आगे भविष्य की भयावहता को देखते हुए यह सब सायास करना पड़ सकता है।
सन् 2050 तक मनुष्य नौ बिलियन के क़रीब होंगे। पर्यावरण दिन-दिन प्रतिकूल हो रहा है। सबके लिए आहार एक चुनौती है , जो आगे और बड़ी होगी। ऐसे में कीड़ों को आहार-शृंखला में शामिल करना मनुष्य की आवश्यकता भी बन सकती है , चाहे आज हम इसपर लाख नाक-भौं सिकोड़ लें।
बुभुक्षितः किम् न करोति पापम् !