Thursday, 21 February 2019

No one must die of Cancer

Dr. Gupta says,  No one must die of cancer except out of carelessness;
  (1). First step is to stop all sugar intake, without sugar in your body, cancer cell would die a natural death.
(2). Second step is to blend a whole lemon fruit with a cup of hot water and drink it for about 1-3 months first thing before food and cancer would disappear, research by Maryland College of Medicine says, it's 1000 times better than chemotherapy.
(3). Third step is to drink 3 spoonfuls of organic coconut oil, morning and night and cancer would disappear, you can choose any of the two therapies after avoiding sugar. Ignorance  is no excuse; I have been sharing this information for over 5 years. Let everyone around you know.God bless.

"Dr. Guruprasad Reddy B V, OSH STATE MEDICAL UNIVERSITY MOSCOW, RUSSIA🏖🚥🚦
Encouraged each person receiving this newsletter to  forward it to another ten people, certainly at least one life will be saved ... I've done my part, I hope you can help do your part. thanks!✍

Drinking hot lemon water can prevent cancer. Don't add sugar. Hot lemon water is more beneficial than cold lemon water.

Both yellow n purple sweet potato have good cancer prevention properties. ✍

01.✍ Often taking late night dinner can increase the chance of stomach cancer

02. ✍Never take more than 4 eggs per week

03. ✍Eating chicken backside can cause stomach cancer

04.✍ Never eat fruits after meal. Fruits should be eaten before meals

05. ✍Don't take tea during menstruation period.

06.✍ Take less soy milk, no adding sugar or egg to soy milk

07.✍ Don't eat tomato with empty stomach

08.✍ Drink a glass of plain water every morning before food to prevent gall bladder stones

09.✍ No food 3 hrs before bed time

10.✍ Drink less liquor or avoid, no nutritional properties but can cause diabetes and hypertension

11. ✍Do not eat toast bread when it is hot from oven or toaster

12.✍ Do not charge your handphone or any device next to you when you are sleeping

13.✍ Drink 10 glasses of water a day to prevent bladder cancer

14. ✍Drink more water in the day time, less at night

15.✍ Don't drink more than 2 cups of coffee a day, may cause insomnia and gastric

16.✍ Eat less oily food. It takes 5-7 hrs to digest them, makes you feel tired

17.✍ After 5pm, eat less

18.✍ Six types of food that makes you happy: banana, grapefruit,  spinach, pumpkin, peach.

19.✍ Sleeping less than 8 hrs a day may deteriorate our brain function. Taking Afternoon rest for half an hour may keep our youthful look.

20.✍ Cooked tomato has better healing properties than the raw tomato.

Hot lemon water can sustain your health and make you live longer!

Hot lemon water kills cancer cells ✍

Add hot water to 2-3 slices of lemon. Make it a daily drink

The bitterness in hot lemon water is the best substance to kill cancer cells.✍

Cold lemon water only has vitamin C, no cancer prevention.✍

Hot lemon water can control cancer tumor growth. ✍

Clinical tests have proven hot lemon water works. ✍

This type of Lemon extract treatment will only destroy the malignant cells, it does not affect healthy cells.✍

Next... citric acid and lemon polyphenol in side lemon juice, can help reduce high blood pressure,✍ effective prevention of deep vein thrombosis, improve blood circulation✍, and reduce blood clots.✍

No matter how busy you are, please find the time to read this, then tell others to spread the love!✍

♦After reading, share with others to spread the love! To take good care of their own health!✍

Wednesday, 20 February 2019

क्या है डाइटीशियन की डाइट ? हेल्दी ईटिंग

क्या है डाइटिशन की डाइट
Know the Diet details of 6 Top Dietitians

डाइटिशन की सलाह पर डाइट लेना फिट रहने की गारंटी मानी जाती है। ऐसे में एक सवाल मन में जरूर उठता है कि डाइटिशन की खुद की डाइट कैसी होती होगी? देश की नामी डाइटिशन में से 6 से उनकी रुटीन और डाइट के बारे में विस्तार से जानकारी ली लोकेश के. भारती ने:

टॉप 6 डाइटिशन की ये 6 बातें हैं कॉमन:
1. कमे से कम 7 घंटे की नींद जरूरी
2. फ्रिज का ठंडा पानी गर्मियों में भी नहीं पीना और जाड़ों में गुनगुना पानी पीना
3. मौसमी फल-सब्जियां पहली पसंद
4. सलाद खुद का काटा हुआ खाना, बाहर का नहीं
5. नीबू, आंवला रोजाना डाइट में। कोल्ड ड्रिंक्स बिलकुल नहीं।
6. कसरत और प्राणायाम रोज

टॉप 6 डाइटिशन...................................
परमीत कौर
चीफ डाइटिशन, AIIMS

रेखा शर्मा
एक्स चीफ डाइटिशन, AIIMS

अलका मोहन चुटानी
एक्स चीफ डाइटिशन, AIIMS

डॉ. शिखा शर्मा
न्यूट्री-डाइट एक्सपर्ट

इशी खोसला
न्यूट्रिशनिस्ट एंड डाइट एक्सपर्ट

नीलांजना सिंह
सीनियर डाइटिशन

Q. सुबह कितने बजे उठना और सबसे पहला काम?
A.
परमीत: सुबह 6 बजे उठना। उठने के बाद 1 गिलास (200 ml) गुनगुने पानी में एक चम्मच शहद और दालचीनी का पाउडर (एक चुटकी) आधे नीबू के रस के साथ पीती हूं। इससे दिन भर मेटाबॉलिज्म सही रहता है।

अलका: 5 से 6 के बीच उठना। उठते ही क्रश किया हुआ एक कप ताजे आंवले का जूस पीती हूं। साथ ही, एक कप गुनगुने पानी में एक चम्मच शहद मिलाकर पीती हूं। इससे वजन कंट्रोल में रहता है।

इशी: 7 से 8 के बीच उठना। तांबे के बर्तन में रात में रखा हुआ एक गिलास पानी पीती हूं। इसके फौरन बाद एक गिलास पानी में एक नीबू और एक बड़ा चम्मच शहद मिलाकर पीती हूं। इसके 5 मिनट बाद नट्स, वॉल नट्स, पिस्ता आदि के कुल 5-7 दाने खाती हूं।

शिखा: 7 बजे तक उठना। फ्रेश होने के बाद एक घंटे की एक्सरसाइज करती हूं जिसमें योग भी शामिल होता है। इसके बाद एक गिलास (150-200ml) फ्रूट जूस (चुकंदर, टमाटर, सेब आदि को मिलाकर) पीती हूं।

रेखा: 5:30 से 6 बजे के बीच उठना। फ्रेश होने के बिना चीनी की 2 कप चाय।

नीलांजना: 7 से 7:30 बजे के बीच उठना। उठते ही तांबे के बर्तन में रखा एक गिलास पानी पीती हूं।

Q. सुबह में योग और कसरत?
A.
परमीत: घर के अंदर ही 30 मिनट के लिए योग करती हूं। अमूमन प्राणायाम और सूर्य नमस्कार करती हूं। जॉगिंग नहीं करती। कार से ऑफिस नहीं जाती, मेट्रो लेती हूं। 750 मीटर दूर मेट्रो स्टेशन पैदल जाती हूं। एलिवेटर या लिफ्ट भी नहीं लेती, सीढ़ियों का उपयोग करती हूं।

अलका: सुबह 7 बजे से पहले 15 मिनट की जॉगिंग, इसके बाद सूर्य नमस्कार।

इशी: 40 से 45 मिनट तक योग और एक्सरसाइज करती हूं, जिसमें प्राणायाम और ब्रीदिंग एक्सरसाइज शामिल हैं। 15 मिनट जॉगिंग करती हूं। पहले 5 मिनट स्लो और फिर 10 मिनट फास्ट जॉगिंग करती हूं।

शिखा: मैंने भरतनाट्यम सीखा है। हफ्ते में 2-3 दिन क्लासिकल डांस का अभ्यास करती हूं। यह बेहतरीन एक्सरसाइज है। 3 दिन कार्डियो भी करती हूं। रोज 10 मिनट जॉगिंग भी।

रेखा: 30 मिनट योगासन करती हूं। 10-15 मिनट कपालभाति और अनुलोम-विलोम करती हूं। यह मैं पिछले 25 साल से रोज करती आ रही हूं। शाम में 15 मिनट जॉगिंग करती हूं।

नीलांजना: आधा घंटा के करीब योग और एक्सरसाइज करती हूं। जरूरी नहीं कि हर दिन एक ही तरह के योग या एक्सरसाइज करूं। इसके बाद किसी-किसी दिन डॉगी के साथ 20 से 25 मिनट की वॉक पर जाती हूं। शाम में भी टहलने जाती हूं।

Q. मेडिटेशन, अगर हां तो कितनी देर?
A.
अलका: 20 मिनट
परमीत: 5 मिनट
इशी: 5 मिनट
शिखा: मेडिटेशन नहीं, लेकिन भरतनाट्यम के बहाने थोड़ी देर के लिए ध्यान जैसी स्थिति में पहुंच जाती हूं।
रेखा: महीने में 3-4 दिन
नीलांजना: रेग्युलर नहीं, कभी-कभार।

Q. चाय की चाह कितनी?
A.
परमीत: दिन भर में 3 से 4 कप। पहली चाय ग्रीन टी के रूप में सुबह 11 बजे लेती हूं। सामान्य चाय बिना चीनी के 1 से 2 कप।

अलका: नॉर्मल चाय सुबह 8 बजे के आसपास। इसके अलावा, दिन भर में 2-3 कप चाय।

इशी: नीबू और शहद वाली ब्लैक टी दिनभर में 3 बार।

शिखा: लंच से कुछ समय पहले एक ग्रीन टी और दिन भर में एक नॉर्मल चाय।

रेखा: अखबार पढ़ने के दौरान डबल टोंड दूध वाली बिना चीनी की दो कप चाय पीती हूं। दिन भर में 3 कप चाय लेती हूं।

नीलांजना: सुबह में दूध वाली कॉफी बहुत पसंद है। हफ्ते में एक या दो बार ग्रीन टी लेती हूं।

Q. ब्रेकफस्ट का फंडा
A.
परमीत: अमूमन 8 बजे। इसमें कभी दलिया तो कभी पोहा लेती हूं।

अलका: सुबह में चाय के फौरन बाद 8:30 बजे। इसमें मिस्सी रोटी या दलिया या ब्रेड और 1 से 2 उबले अंडे लेती हूं।

इशी: 10 बजे के करीब एक गिलास जूस पीती हूं जिसमें गाजर, आंवला, चुकंदर, अमरूद और सेब आदि शामिल होते हैं।

शिखा: अमूमन 10 बजे के करीब। पोहा या दलिया या स्टफ्ड रोटी लेती हूं।

रेखा: 9 से 9:30 के बीच। 400ml डबल टोंड दूध में 20 से 25 ग्राम ओट्स, बारीक कटी हुई 50 ग्राम गाजर, बादाम के 7-8 टुकड़े और अदरक का एक छोटा चम्मच पाउडर मिलाकर 10 से 15 मिनट उबालती हूं, फिर खाती हूं। ब्रेकफस्ट के 30 मिनट बाद पानी पीती हूं।

नीलांजना: साबूदाना की खिचड़ी जिसमें नमक, नट्स सभी कुछ होता है। इनके अलावा पोहा और गर्मियों में चने का सत्तू भी पीती हूं।

Q. दिनभर में कितना पानी, कैसा पानी?
A.
परमीत: जाड़े में गुनगुना पानी और गर्मी में नॉर्मल। अमूमन मैं फ्रिज का पानी नहीं पीती। दिनभर में डेढ़ से 2 लीटर। गर्मियों में मात्रा कुछ बढ़ जाती है।

अलका: 8 से 10 गिलास यानी लगभग 2 लीटर नॉर्मल पानी हर दिन। खाने के बीच में पानी नहीं। हां, खाने से आधा घंटा पहले 1 गिलास जरूर पीती हूं।

इशी: 7 से 8 गिलास, नॉर्मल पानी। खाना खाने से 10 मिनट पहले 1 गिलास पानी पीती हूं।

शिखा: नॉर्मल पानी पीती हूं। फ्रिज का ठंडा पानी गर्मी में भी नहीं पीती। दिनभर में 6-7 गिलास (डेढ़ से 2 लीटर) पानी हो जता है। खाना के बीच में पानी नहीं।

रेखा: दिनभर में करीब 2 लीटर पानी। गर्मियों में नॉर्मल और सर्दियों में गुनगुना पानी। खाना खाने के 20 मिनट बाद 1 गिलास पानी पीती हूं।

नीलांजना: नॉर्मल पानी में नीबू का छिलका (तांबे के बर्तन में नहीं) डालकर रात में छोड़ देती हूं। सुबह से रात तक वही पीती रहती हूं। इससे एंटी-ऑक्सिडेंट मिलता है और कुछ मात्रा में विटामिन सी भी। पीने में नीबू की खुशबू भी आती रहती है। खाने के 15 मिनट बाद 1 गिलास पानी पीती हूं।

Q. फल के पल?
A.
परमीत: मौसमी फल खाती हूं। अमूमन ब्रेकफस्ट और लंच के बीच में सेब, संतरा, अंगूर आदि एक बार में 100 ग्राम के करीब लेती हूं।

अलका: दोपहर में कोई एक फल (100 से 150 ग्राम तक)।

इशी: दिन में कभी भी मौसमी फल 100 ग्राम के करीब।

शिखा: ऑफिस में मौसमी फल खाती हूं, जिसमें केला, संतरा, सेब अहम हैं। यह एक बड़ा कटोरा (150 से 200 ग्राम) होता है।

रेखा: सीजनल फ्रूट खाती हूं और वह भी शाम में 100 से 150 ग्राम।

नीलांजना: एक अमरूद या पपीता या बेर लगभग 100 ग्राम लेती हूं।

Q. लंच के पहले क्या-क्या और कितनी मात्रा में?
A.
परमीत: 100 से 150 ग्राम फल। इसके अलावा 20 से 30 ग्राम रोस्टेड फ्लैक्स सीड का पाउडर लेती हूं।

अलका: अभी तो मैं संतरा, सेब या अंगूर कुछ भी 100 ग्राम के करीब ले लेती हूं।

इशी: 11 और 12 बजे के बीच चीला या स्प्राउट्स या रोस्टेड सीड्स मसलन या बादाम या चना आदि 100 से 150 ग्राम के करीब।

शिखा: एक ग्रीन टी। इसके आधा घंटा पहले या बाद में फ्रूट्स 100 से 150 ग्राम।

रेखा: 11:30 बजे के करीब डबल टोंड दूध वाली एक कप कॉफी या चाय।

नीलांजना: एक गिलास (150 से 200ml) प्रोबायोटिक ड्रिंक मसलन, दही से बनी हुई लस्सी, छाछ आदि।

Q. कोल्ड ड्रिंक्स और सूप?
A.
परमीत: कोला वगैरह नहीं पीती। हां, गर्मियों में नीबू पानी एक गिलास और जाड़ों में वेज सूप या चिकन सूप एक छोटी कटोरी (100 से 150ml)।

अलका: कोल्ड ड्रिंक कभी नहीं पीती। गर्मियों में अमूमन 2 से 3 गिलास और जाड़ों में 1 गिलास नीबू पानी लेती हूं। फ्रूट जूस अगर लेना होता है तो खुद ही बनाती हूं।

इशी: कोल्ड ड्रिंक्स नहीं पीती। सूप रात में खाते समय लेती हूं। हां, वेजिटेबल जूस पीती हूं।

शिखा: कोला बचपन से ही पसंद नहीं है।

रेखा: कभी नहीं पीती।

नीलांजना: कोला बहुत ही कम मात्रा में (15 दिनों पर आधा या पौना गिलास)। जाड़ों में सूप पीती हूं और वह भी घर में बना हुआ, जिसमें पालक या दूसरे साग की मात्रा ज्यादा होती है।

Q. कितने बजे लंच और लंच में क्या?
A.
परमीत: 1 बजे के करीब मल्टिग्रेन (ज्वार, बाजरा, गेहूं आदि) आटे की 2-3 रोटी, मौसमी हरी सब्जी, सलाद और दही।

अलका: 1:30 से 2 बजे।  गेहूं की 2 रोटी, हरी सब्जी, ग्रीन सलाद, दही।

इशी: मुझे जब भूख लगती है, तभी खाती हूं। अमूमन 1-2 के बीच लंच लेती हूं। इसमें अनाज की मात्रा काफी कम होती है। एक बड़ा चम्मच चावल लेती हूं और साथ में लेती हूं एक छोटी कटोरी हरी सब्जी, हर दिन अलग-अलग दाल (मूंग और मसूर छिलके सहित, चना और अरहर) जिसमें आधा नीबू निचोड़ती हूं। ग्रीन सलाद जरूर खाती हूं।

शिखा: 2 बजे तक। मल्टिग्रेन आटे या गेहूं के आटे की दो रोटी, सब्जी एक कटोरी, राइस और कभी-कभी सलाद। दाल लंच में नहीं खाती क्योंकि इसे ऑफिस ले जाने में परेशानी होती है।

रेखा: 1 से 1:30 बजे के बीच। इसमें शामिल होते हैं अमूमन छिलकेवाली मूंग/ मसूर आदि की दाल, एक बड़ी कटोरी (200ml), मौसमी हरी सब्जी, घर का कटा सलाद बिना नमक के, 2 रोटी (मल्टिग्रेन आटे की) और दही 100 ग्राम।

नीलांजना: 1 से 2 के बीच। 2 से 3 गेहूं या ज्वार या बाजरे के आटे की रोटी खाती हूं, जिसमें रोस्टेड फ्लैक्स सीड का पाउडर (250 ग्राम आटे में 2 बड़ा चम्मच) मिला होता है। साथ में दाल (हर दिन अलग-अलग) और खीरा भी लेती हूं।

Q. शाम में क्या?
A.
परमीत: 6 बजे के करीब उबालकर या एयर फ्रायर में पकाकर शकरकंद खाती हूं। इसके अलावा सूप और रोस्टेड नट्स या ब्रोकली या फूलगोभी आदि भी लेती हूं।

अलका: नॉर्मल चाय के साथ रोस्टेड बादाम, अखरोट, कॉर्न, ब्रोकली आदि।
इशी: एक मूंग चीला या फिर 150 से 200 ग्राम के करीब भेलपूरी खाती हूं। इनके अलावा कुछ रोस्टेड मखाना भी खाती हूं। कभी कभी चने की चाट या 50 ग्राम रोस्टेड मूंगफली में नीबू निचोड़कर भी लेती हूं। घर में बनी हुई आलू टिक्की की चाट भी कभी-कभी खाती हूं।

शिखा: ग्रीन टी, रोस्टेड मूंगफली, बादाम आदि 50 ग्राम तक।

रेखा: कुछ नट्स (रोस्टेड मूंगफली और चना 50 ग्राम) और फ्रूट्स (सेब, अंगूर आदि 100 ग्राम से ज्यादा नहीं) लेती हूं।

नीलांजना: अदरक वाली चाय, रोस्टेड बादाम या चना या भेलपूरी। पॉपकॉर्न और मकई का भुट्टा भी अच्छा लगता है।

Q. डिनर कब और खाने में क्या?
A.
परमीत: 8:30 बजे। गेहूं की 1 या 2 रोटी। चिकन या पनीर, सलाद।

अलका: 8 बजे । सब्जी, दाल और 2 से 3 मल्टिग्रेन या गेहूं के आटे की रोटी। लंच हेवी हुआ तो रात में सिर्फ 1 गिलास दूध ही पीती हूं।

इशी: 7:30-8:30 बजे। सूप के साथ कम तेल वाली हरी सब्जी या चिकन या फिश। जितनी भूख, बस उतना ही भोजन।

शिखा: 8:30 बजे। 2 फुल्के, एक सूखी हरी सब्जी और एक कटोरी दाल या ग्रेवी वाली सब्जी।

रेखा: 7:30 से 8 बजे। मेरा डिनर लंच जैसा ही होता है। सोने से पहले 1 गिलास डबल टोंड दूध हल्दी मिला हुआ (200ml दूध में 1 बड़ा चम्मच हल्दी) जरूर पीती हूं।

नीलांजना: 8:30 से 9 के बीच। 1 या 2 रोटी के साथ मिक्स्ड ग्रीन वेजिटेबल। कोशिश होती है कि लंच में अगर कुछ कमी रह गई हो तो उसे डिनर में दूर कर लूं। जैसे अगर दिन में दही नहीं खा पाई तो रात में रायता खा लेती हूं। ओवर इटिंग कभी नहीं करती।

Q. खाते समय किस बात ध्यान रखना चाहिए?
A.
परमीत: एक बाइट को 10 से 12 बार चबाकर खाती हूं।

अलका: मेरे पिता जी कहते थे कि खाना के लिए 10 मिनट जरूर निकालना चाहिए। बचपन में मेरे दादाजी मुझसे शर्त लगाते थे कि कौन एक बाइट को 32 बार चबाएगा। कई बार वह जीतते थे तो कई बार मैं।

इशी: आराम से खाना। कम से कम 10 से 12 बार चबाकर खाना।

शिखा: खाने से पहले टेंशन वाली चीजें दिमाग से निकाल देती हूं। लैपटॉप या टीवी चल रहा होता है तो कोशिश करती हूं कि अच्छी और पॉजिटिव चीजें देखूं।

रेखा: कम से कम 15 मिनट में पूरा खाना खत्म करना। मोबाइल पर बात नहीं।

नीलांजना: फोन पर बात करते हुए, टीवी देखते हुए या ईमेल पढ़ते हुए नहीं खाती। यह भी कोशिश करती हूं कि खाते समय माहौल खुशनुमा हो।

Q. रोटी और चावल साथ में खाना?
A.
परमीत: कभी-कभी।
अलका: ऐसा कोई नियम नहीं है।
इशी: रोटी मैं बिलकुल नहीं खाती। चावल भी 1 से 2 चम्मच ही खाती हूं।
शिखा: कभी-कभी।
रेखा: महीने में 2 से 3 बार।
नीलांजना: कभी-कभी।

Q. तेल, देसी घी का फंडा?
A.
परमीत: सरसों तेल और कनोला का तेल उपयोग करती हूं। खाते समय देसी घी 1 से 2 बड़ा चम्मच।

अलका: बदल-बदल कर तेल उपयोग करती हूं। घर में हर शख्स के हिसाब से पूरे महीने का आधा लीटर पर्याप्त है। अगर 3 लोग हैं तो 1.5 लीटर तेल।

इशी: सरसों और नारियल तेल, मक्खन भी कभी-कभी। इसके अलावा एक्स्ट्रा वर्जिन ऑलिव ऑयल।

शिखा: तेल कम से कम उपयोग करती हूं। कच्ची घानी का सरसों तेल, देसी घी और ऑर्गेनिक तेल मुझे पसंद हैं। इन्हीं का उपयोग करती हूं। इनके अलावा राइस ब्रैन ऑयल भी यूज करती हूं।

रेखा: 2 से 3 तरह का तेल उपयोग करती हूं। कनोला या ओलिव ऑयल, कभी-कभी सरसों का तेल। राइस ब्रैन ऑयल और देसी घी कभी-कभी उपयोग करती हूं। 15 दिनों में 1 या 2 बार। वह भी 1 से 2 चम्मच।

नीलांजना: राइस ब्रैन ऑयल और मस्टर्ड ऑयल मैं उपयोग करती हूं।

Q. सलाद का स्वाद?
A.
परमीत: खुद से काटा हुआ ग्रीन सलाद (खीरा, टमाटर, गाजर आदि)।
अलका: ग्रीन सलाद खाती हूं, लेकिन ज्यादातर खुद ही बनाती हूं।
इशी: ग्रीन सलाद ही फेवरिट है।
शिखा: खुद बनाऊं, तब ही खाती हूं।
रेखा: खुद काटकर खाती हूं। मेड का काटा हुआ भी नहीं खाती।
नीलांजना: खीरा खाती हूं।

Q. बाहर का खाना कितनी बार?
A.
परमीत: कोशिश करती हूं नहीं खाऊं, लेकिन महीने में 2 से 3 बार हो ही जाता है।
अलका: 10 दिन में 1 बार।
इशी: अमूमन हफ्ते में 1 बार।
शिखा: सिर्फ ट्रैवल के दौरान।
रेखा: हफ्ते में 1 बार से ज्यादा नहीं और वह भी मजबूरी हो तो।
नीलांजना: महीने में 1 या 2 बार।

Q. पार्टी में खाने में क्या पसंद करती हैं?
A.
परमीत: पार्टी में सलाद बिलकुल नहीं खाती। कम तेल वाली सब्जी और पुलाव थोड़ी मात्रा में लेती हूं।

अलका: हरी सब्जी ही खाती हूं। चावल, रोटी नहीं खाती। सलाद बिलकुल नहीं खाती। दही या दूध से बनी चीजें नहीं खाती।

इशी: तंदूरी नॉनवेज या वेज खाती हूं। ग्लूटन वाली चीजें नहीं खाती। हरी सब्जी भी कम तेल वाली खा लेती हूं।

शिखा: पार्टियों में कम जाती हूं। अगर गई तो 1 रोटी और थोड़ी-सी सूखी हरी सब्जी ही खाती हूं।

रेखा: मुझे लगता है कि पार्टी में खाने को लेकर लोगों के बीच एक कंफ्यूजन है। पार्टी में अगर 30 तरह के आइटम्स खाने के लिए होते हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि सभी में से कुछ-न-कुछ खाना है। दरअसल, आपको 30 तरह के ऑप्शन दिए गए हैं, उनमें से 2-4 को चुनकर खाना है। मैं बर्तन में रखी सूखी सब्जी को ऊपर से उठाती हूं, क्योंकि इसमें तेल नीचे बैठा होता है और दाल नीचे से लेती हूं, क्योंकि इनमें तेल ऊपर तैरता रहता है।

नीलांजना: कम तेल वाली चीजें ही खाती हूं। फिर भी थोड़ी मात्रा में (आधा से 1 चम्मच) दूसरी चीजें भी टेस्ट करती हूं।

Q. फास्टिंग और डाइटिंग करती हैं?
A.
परमीत: नहीं।

अलका: कभी-कभी। फास्टिंग के दौरान नमक वाली चीजें नहीं खाती।
इशी: किसी रात या दिन में ज्यादा खा लिया तो अगली मील सिर्फ ग्रीन सलाद या सूप वाली होती है।

शिखा: नहीं करती। अगर किसी रात डिनर हेवी ले लिया तो दूसरे दिन सिर्फ फ्रूट खाती हूं और रात में खिचड़ी खाती हूं।

रेखा: साल में 1 या दो बार त्योहार के मौके पर ही फास्टिंग करती हूं। इस दौरान भी फ्रूट्स खाती हूं। डाइटिंग नहीं करती।

नीलांजना: नहीं करती, लेकिन ओवरइटिंग होने पर अगला खाना हल्का लेती हूं।

Q. पित्सा, बर्गर, बिस्कुट और नमकीन लेती हैं?
A.
परमीत: पित्सा और बर्गर नहीं लेती। नमकीन भी बहुत कम लेती हूं। शायद महीने में 1 बार।

अलका: न के बराबर।

इशी: न के बराबर। हां, घर का बेसन का बना पकौड़ा काफी पसंद है। पित्सा या बर्गर भी घर पर बनाकर ही खाती हूं।

शिखा: पित्सा, बर्गर पसंद नहीं। हां, नमकीन में भेलपूरी जरूर खाती हूं।

रेखा: कभी-कभी लेती हूं। अमूमन 15 दिनों में 1 या 2 बार ही बिस्किट लेती हूं। नट्स ज्यादा लेती हूं।

नीलांजना: नहीं लेती। हां, नमकीन के रूप में रोस्टेड बादाम में हरी मिर्च डालकर खाती हूं। एक बार में 50 से 100 ग्राम।

Q. दूध पीती हैं या नहीं?
A.
परमीत: कम ही पीती हूं।
अलका: अलग से अमूमन नहीं।
इशी: कभी नहीं पीती। दही खाती हूं।
शिखा: कभी-कभी सर्द रात में 1 गिलास टोंड गर्म दूध में 1 बड़ा चम्मच हल्दी डालकर पीती हूं। गर्मियों में टोंड दूध से बना दही जरूर खाती हूं।
रेखा: 1 गिलास डबल टोंड दूध लेती हूं। यह शरीर में प्रोटीन और हड्डियों के लिए अच्छा है।
नीलांजना: दिनभर में 1 गिलास टोंड दूध। अगर दूध नहीं लिया तो दही लेती हूं।

Q. खाने के बाद टहलने जाती हैं?
A.
परमीत: हां। डॉगी के साथ 15 से 20 मिनट की वॉक पर जाती हूं।
अलका: नहीं टहलती।
इशी: कुछ खास नहीं।
शिखा: आजकल टहल नहीं पाती।
रेखा: नहीं टहलती।
नीलांजना: नहीं।

Q. अल्कोहल या सिगरेट कितनी?
A.
परमीत: बिलकुल नहीं।
अलका: दोनों में से कुछ नहीं।
इशी: महीने में 1 बार, 1 या 2 पैग से ज्यादा वाइन नहीं।
शिखा: नहीं लेती।
रेखा: महीने में 1 से 2 बार। सिर्फ वाइन। सिगरेट कभी नहीं पीती।
नीलांजना: कभी नहीं।

Q. खाना खाने के कितनी देर बाद और कितने बजे सोना‌?
A.
परमीत: 2:30 घंटे बाद। रात 11 बजे।
अलका: 2 घंटे बाद। रात 10 बजे।
इशी: 3 घंटे के बाद सोती हूं। रात 11 बजे के करीब।
शिखा: 2 से ढाई घंटे बाद। रात 11 बजे के करीब।
रेखा: लगभग 3 घंटे बाद। रात 11 बजे के करीब।
नीलांजना: 3 से 3:30 घंटे बाद। रात 12 से 12:30 के बीच।

संडे नवभारत टाइम्स में प्रकाशित

Monday, 28 January 2019

इसरो की कामयाबी और भविष्य की योजनायें

शशांक द्विवेदी 
डायरेक्टर, मेवाड़ यूनिवर्सिटी    
बीता साल 2018 इसरो के लिए बेहद शानदार रहा है, यह साल इसरो की तमाम कामयाबियों के लिए जाना जाएगा।  इस साल इसरो ने सात सफल लांचिंग की हैं। ये आंकड़ा अगले साल तक कई गुना बढ़ जाएगा। 12 जनवरी, 2018 को कार्टोसैट -2 भेजा गया, 14 नवंबर, 2018 को जीसैट-29 लांच किया गया। यह इसरो का सबसे भारी उपग्रह है। इसे भारत ने अपने ही रॉकेट जीएसएलवी मार्क-3 डी टू से भेजा। यह इसरो और देश के लिए बहुत बड़ी कामयाबी है। यह रॉकेट आगे चलकर चंद्रयान-2 और मैन मिशन के लिए काम में लाया जाएगा। इससे भारत को भारी उपग्रह भेजने में आत्मनिर्भरता मिली है। 29 नवंबर को पीएसएलवी सी-43 से हाइसिस लांच हुआ। 19 दिसंबर को जीएसएलवी एफ-11 से जीसैट-7ए लांच हुआ और 5 दिसंबर को फ्रेंच गुयाना (विदेशी जमीन से) से जीसैट-11 की लांचिंग हुई।  इसरो ने इस वर्ष संचार, भू-प्रक्षेपण और नौवहन के क्षेत्र में कई बड़ी और साहसिक कामयाबियां हासिल की हैं। इन सबसे भारतीय वायुसेना की ताकत भी कई गुना तक बढ़ी है। इसरो ने जीएसएलवी रॉकेट से लगातार छठी सफल लॉन्चिंग की। 
इसरो की गगनयान परियोजना  
इसके साथ ही केंद्र सरकार ने हजार करोड़ की महत्वकांक्षी गगनयान परियोजना को मंजूरी दे दी है। अगर यह मिशन कामयाब हुआ तो अंतरिक्ष पर मानव मिशन भेजने वाला भारत दुनिया का चौथा देश होगा। इस प्रोजेक्ट में मदद के लिए भारत ने पहले ही रूस और फ्रांस के साथ करार किया है। इसके तहत तीन सदस्यीय दल को सात दिनों के लिए अंतरिक्ष में भेजा जाएगा। इसरो के चेयरमैन के सिवन का कहना है कि उनकी टीम इस मिशन पर बीते चार महीने से काम कर रही है। मिशन के डिजाइन पर भी काम शुरू हो चुका है। टेस्ट फ्लाइट के तौर पर इसके फाइनल मिशन से पहले दो मानवरहित मिशन लांच किए जाएंगे।इसरो चेयरमैन का कहना है कि पहला मानवरहित मिशन यानी टेस्ट फ्लाइट दिसंबर, 2020 में लांच होगी। दूसरा मानवरहित टेस्ट जुलाई, 2021 में लांच होगा। इसके बाद आखिर में फाइन मिशन यानी ह्यूमन स्पेस फ्लाइट को दिसंबर 2021 में लांच किया जाएगा। बजट पास होने के बाद क्रू की ट्रेनिंग पर काम शुरू हो चुका है। इसमें जरूरत पड़ने पर विदेशी ट्रेनिंग को भी शामिल किया जा सकता है। क्रू मेंबर का चुनाव इसरो और आईएएफ द्वारा संयुक्त तौर पर किया जाएगा।

जिसके बाद उन्हें दो से तीन सालों तक ट्रेनिंग दी जाएगी। इस मिशन के लिए राकेश शर्मा का भी परामर्श लिया जाएगा। इसके लिए कई बड़ी टेक्नोलॉजी जैसे क्रू मॉड्यूल, क्रू एस्केप सिस्टम, एनवायरमेंट सिस्टम और लाइफ स्पोर्ट सिस्टम का इस्तेमाल किया जाएगा। अभी तक ह्यूमन स्पेस फ्लाइट प्रोजेक्ट के लिए बड़ी तकनीकों को विकसित करने में 173 करोड़ रुपये का खर्च आ चुका है।  
अंतरिक्ष में जाने वाले एस्ट्रोनॉट्स को ट्रेनिंग देने के लिए बैंगलोर में ट्रेनिंग सेंटर खोला जाएगा। पहले इसका लक्ष्य 2012 तय किया गया था। अब इसरो एक स्थायी सेंटर खोलने की योजना बना रहा है। बताया जा रहा है कि गगनयान मिशन के लिए चुने जाने वाले लोगों को विदेशी सेंटर में ट्रेनिंग दी जाएगी। इन्हें करीब दो साल तक शून्य गुरुत्वाकर्षण पर ट्रेनिंग दी जाएगी ताकि वह अंतरिक्ष में होने वाले अनुभवों से दो चार हो जाएं। ट्रेनिंग का कुछ हिस्सा बैंगलोर में वायु सेना के इंस्टीट्यूट ऑफ एयरोस्पेस मेडिसीन में पूरा कराया जाएगा। अभी तक उम्मीदवारों के चयन का काम शुरू नहीं हुआ है।
2019 में इसरो 
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने 2019 के लिए 22 से ज्यादा मिशनों का लक्ष्य रखा है। प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने एक सवाल के लिखित जवाब में राज्यसभा को यह जानकारी दी । इसरो ने अगले तीन साल में 50 से अधिक मिशनों के लक्ष्य की अपनी रूप-रेखा प्रकट की है।उन्होंने कहा कि सरकार ने अंतरिक्ष गतिविधियों के लिए बजट में वृद्धि की है।वास्तव में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान कार्यक्रम में पिछले कुछ वर्षों के दौरान अत्यधिक सफल और वाणिज्यिक मिशनों के कारण अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। फिलहाल इसरो के पास बड़ी संख्या में स्वीकृत मिशन हैं जो उद्योग के लिए भी एक बड़ा अवसर दर्शाते हैं।

 2018 में इसरो के अभियान 
अपनी सैन्य क्षमताओं और निगरानी तंत्र को बेहद मजबूत बनाने के लिए जनवरी 2018 में भारत ने पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (पीएसएलवी –सी 38) की सहायता से कार्टोसैट-2 श्रंखला के तीसरे रिमोट सेंसिंग उपग्रह सहित 30 उपग्रहों को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया था । प्रक्षेपित उपग्रहों में 14 देशों के 29 विदेशी उपग्रह भी शामिल थे।  ये सैटेलाइट न सिर्फ भारत के सरहदी और पड़ोस के इलाकों पर अपनी पैनी नजर रखेगा बल्कि स्मार्ट सिटी नेटवर्क की योजनाओं में भी मददगार रहेगा। ये सैटेलाइट 500 किमी से भी ज्यादा ऊंचाई से सरहदों के करीब दुश्मन की सेना के खड़े टैंकों की गिनती कर सकता है। भारत के पास पहले से ऐसे पांच रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट मौजूद है। कार्टोसैट-2 श्रृंखला के तीसरे उपग्रह के प्रक्षेपण के साथ ही भारत की अंतरिक्ष और अधिक पैनी और व्यापक होने जा रही है। हालिया रिमोट सेंसिंग उपग्रह की विभेदन क्षमता 0.6 मीटर की है। इसका अर्थ यह है कि यह छोटी चीजों की तस्वीरें ले सकता है. कोर्टोसैट -2 श्रृंखला के उपग्रह के सफल प्रक्षेपण से भारत को कई फायदे होगें जिसमें अब भारत में किसी भी जगह को अंतरिक्ष से देखने की क्षमता भी हासिल होगी। कार्टोसैट-2 सीरीज के उपग्रहों में पैनक्रोमैटिक और मल्टीस्पेक्ट्रल इमेज सेंसर लगे हैं। इनसे रिमोट सेंसिंग में भारत की काबिलियत सुधरेगी। इन उपग्रहों से मिले डाटा का इस्तेमाल सड़क निर्माण के काम पर निगरानी रखने, बेहतर लैंड यूज और जल वितरण के लिए होगा।  
जीसैट-7ए का सफल प्रक्षेपण 
पिछले दिनों इसरो ने भूस्थैतिक संचार उपग्रह जीसैट-7ए का सफल प्रक्षेपण कर इतिहास रच दिया है। यह सैटलाइट भारतीय वायुसेना के लिए बहुत खास है।  इसके जरिये वायुसेना को भूमि पर रडार स्टेइशन, एयरबेस और एयरबॉर्न वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टपम से इंटरलिंकिंग की सुविधा मिलेगी, जिससे उसकी नेटवर्क आधारित युद्ध संबंधी क्षमताओं में विस्ताकर होगा और ग्लोधबल ऑपरेशंस में दक्षता  बढ़ेगी। 
जीसैट-7ए न सिर्फ सभी एयरबेसेज को आपस में जोड़ेगा बल्कि आईएएफ के ड्रोन ऑपरेशंस में भी इजाफा करेगा। यह सैटेलाइट आईएएफ के कंट्रोल स्टे शनों और ड्रोन के सैटेलाइट कंट्रोल सिस्टाम को अपग्रेड कर सकेगा।
जीसैट-11 की लांचिंग 
इसके साथ ही एक बड़ी कामयाबी हासिल करते हुए भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो ने अब तक के सबसे वजनी सैटेलाइट का प्रक्षेपण कर दिया। दक्षिणी अमेरिका के फ्रेंच गुयाना के एरियानेस्पेस के एरियाने-5 रॉकेट से 5,854 किलोग्राम वजन वाले ‘सबसे अधिक वजनी’ उपग्रह जीसैट-11 को लॉन्च किया गया। जीसैट-11 देशभर में ब्रॉडबैंड सेवाएं उपलब्ध कराने में अहम भूमिका निभाएगा।  इस सैटेलाइट को इंटरनेट कनेक्टिविटी के लिए गेम चेंजर कहा जा रहा है। इसके काम शुरू करने के बाद देश में इंटरनेट स्पीड में क्रांति आ जाएगी। इसके जरिए हर सेकंड 100 गीगाबाइट से ऊपर की ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी मिलेगी।
कुछ साल पहले एक समय ऐसा भी था जब अमेरिका ने भारत के उपग्रहों को लाँच करने से मना कर दिया था। आज स्तिथि ये है कि अमेरिका सहित तमाम देश खुद भारत से अपने उपग्रहों को प्रक्षेपित करवा रहें हैं ।नवंबर 2018 में इसरो ने एक बार फिर अंतरिक्ष में इतिहास रचते हुए भारत सहित 9 देशों के 31 उपग्रहों को पोलर सैटलाइट लॉन्च वीइकल (पीएसएलवी) सी-43 के जरिए लॉन्च कर दिया. इस प्रक्षेपण की खास बात यह है कि इसरो ने दो साल में चौथी बार 30 से ज्यादा सैटेलाइट लॉन्च किए। जनवरी 2017 में 104 उपग्रह लॉन्च कर इसरो ने रिकॉर्ड बनाया था।   पीएसएलवी की 45वीं उड़ान है जिसमें एक माइक्रो और 29 नैनो सैटेलाइट शामिल हैं। पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (पीएसएलवी) की इस साल में यह छठी उड़ान थी। इसमें भारत के सबसे ताकतवर इमेजिंग सैटेलाइट हाइसइस के अलावा अमेरिका (23 उपग्रह) और ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, कोलंबिया, फिनलैंड, मलयेशिया, नीदरलैंड और स्पेन (प्रत्येक का एक उपग्रह) के उपग्रहों का प्रक्षेपण किया गया । इसरो के अनुसार इन उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए उसकी वाणिज्यिक इकाई (एंट्रिक्स कारपोरेशन लिमिटेड) के साथ करार किया गया है।
मुश्किल है एक साथ ज्यादा उपग्रहों की लॉन्चिंग  
इतने सारे उपग्रहों को एक साथ अंतरिक्ष में छोड़ना आसान काम नहीं है। इन्हें कुछ वैसे ही अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया गया जैसे स्कूल बस बच्चों को क्रम से अलग-अलग ठिकानों पर छोड़ती जाती हैं।  बेहद तेज गति से चलने वाले अंतरिक्ष रॉकेट के साथ एक-एक सैटेलाइट के प्रक्षेपण का तालमेल बिठाने के लिए बेहद काबिल तकनीशियनों और इंजीनियरों की जरुरत पड़ती है। हर सेटेलाइट तकरीबन 7.5 किलोमीटर प्रति सेकेंड की रफ्तार से प्रक्षेपित होता है । अंतरिक्ष प्रक्षेपण के बेहद फायदेमंद बिजनेस में इसरो को नया खिलाड़ी माना जाता है। भरोसेमंद लॉन्चिंग में इसरो की ब्रांड वेल्यू में लगातार इजाफा हो रहा है । इससे लॉन्चिंग के कई और कॉन्ट्रेक्ट एजेंसी की झोली में गिरने की उम्मीद है।
अंतरिक्ष में भारत के बढ़ते कदम  
कम लागत और लगातार सफल लांचिंग की वजह से दुनियाँ का हमारी स्पेस टेक्नॉलाजी पर भरोसा बढ़ा है तभी अमेरिका सहित कई विकसित देश अपने सैटेलाइट की लाँचिंग भारत से करा रहें है । फ़िलहाल हम अंतरिक्ष विज्ञान ,संचार तकनीक ,परमाणु उर्जा और चिकित्सा के मामलों में न सिर्फ विकसित देशों को टक्कर दे रहें है बल्कि कई मामलों में उनसे भी आगे निकल गएँ है । अंतरिक्ष बाजार में भारत के लिए संभावनाएं बढ़ रही है ,इसने अमेरिका सहित कई बड़े देशों का एकाधिकार तोडा है ।  असल में इन देशों को हमेशा यह लगता रहा है कि भारत यदि अंतरिक्ष के क्षेत्र में इसी तरह से सफ़लता हासिल करता रहा तो उनका न सिर्फ  उपग्रह प्रक्षेपण के क़ारोबार से एकाधिकार छिन जाएगा बल्कि मिसाइलों की दुनिया में भी भारत इतनी मजबूत स्थिति में पहुंच सकता है कि बड़ी ताकतों को चुनौती देने लगे . भारत अंतरिक्ष विज्ञान में नई सफलताएं हासिल कर विकास को अधिक गति दे सकता है । 
कुलमिलाकर अंतरिक्ष के क्षेत्र में  साल 2018 भारत के लिए बेहद शानदार रहा है । देश में गरीबी दूर करने  और विकसित भारत के सपने को पूरा करने में इसरो काफ़ी मददगार साबित हो सकता है । 
(लेखक राजस्थान की मेवाड़ यूनिवर्सिटी में डायरेक्टर और  टेक्निकल टूडे पत्रिका के संपादक हैं )

Monday, 24 December 2018

ग्रामीण भारत में आएगी इंटरनेट क्रांति

इंटरनेट कनेक्टिविटी के लिए गेम चेंजर है जीसैट-11

शशांक द्विवेदी 
एक बड़ी कामयाबी हासिल करते हुए भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो ने अब तक के सबसे वजनी सैटेलाइट का प्रक्षेपण कर दिया। दक्षिणी अमेरिका के फ्रेंच गुयाना के एरियानेस्पेस के एरियाने-5 रॉकेट से 5,854 किलोग्राम वजन वाले सबसे अधिक वजनीउपग्रह जीसैट-11 को लॉन्च किया गया। जीसैट-11 देशभर में ब्रॉडबैंड सेवाएं उपलब्ध कराने में अहम भूमिका निभाएगा। 
इस सैटेलाइट को इंटरनेट कनेक्टिविटी के लिए गेम चेंजर कहा जा रहा है। इसके काम शुरू करने के बाद देश में इंटरनेट स्पीड में क्रांति आ जाएगी। इसके जरिए हर सेकंड 100 गीगाबाइट से ऊपर की ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी मिलेगी। इसमें 40 ट्रांसपोर्डर कू-बैंड और का-बैंड फ्रीक्वेंसी में है जिनकी सहायता से हाई बैंडविथ कनेक्टिविटी 14 गीगाबाइट/सेकेंड डेटा ट्रांसफर स्पीड संभव है। इस सैटलाइट की खास बात है कि यह बीम्स को कई बार प्रयोग करने में सक्षम है, जिससे पूरे देश के भौगोलिक क्षेत्र को कवर किया जा सकेगा। इससे पहले के जो सैटलाइट लॉन्च किए गए थे उसमें ब्रॉड सिंगल बीम का प्रयोग किया गया था जो इतने शक्तिशाली नहीं होते थे कि बहुत बड़े क्षेत्र को कवर कर सकें। जीसैट-11 अगली पीढ़ी का हाई थ्रुपुट' संचार उपग्रह है और इसका जीवनकाल 15 साल से अधिक का है।
सैटलाइट के आपरेशनल होनें के बाद इससे देश में हर सेकंड 100 गीगाबाइट से ऊपर की ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी मिल सकेगी । ग्रामीण भारत में इंटरनेट क्रांति के लिहाज से यह प्रक्षेपण काफी महत्वपूर्ण है । इसरो प्रमुख के. सिवन के अनुसार जीसैट-11 भारत की बेहरीन अंतरिक्ष संपत्ति है।  यह भारत द्वारा निर्मित अब तक का  सबसे भारी, सबसे बड़ा  और सबसे शक्तिशाली उपग्रह है । यह अत्याधुनिक और अगली पीढ़ी का संचार उपग्रह है जिसे इसरो के आई-6के बस के साथ कंफिगर किया गया है।
फिलहाल जीसैट-11 के एरियन-5 से अलग होने के बाद कर्नाटक के हासन में स्थित इसरो की मास्टर कंट्रोल फैसिलिटी ने उपग्रह का कमांड और नियंत्रण अपने कब्जे में ले लिया गया है और इसरो के मुताबिक जीसैट-11 बिलकुल ठीक है। उपग्रह को फिलहाल जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट में स्थापित किया गया है। आगे वाले दिनों में धीरे-धीरे करके चरणबद्ध तरीके से उसे जियोस्टेशनरी (भूस्थिर) कक्षा में भेजा जाएगा। जियोस्टेशनरी कक्षा की ऊंचाई भूमध्य रेखा से करीब 36,000 किलोमीटर होती है। अभी जीसैट-11 को जियोस्टेशनरी कक्षा में 74 डिग्री पूर्वी देशांतर पर रखा जाएगा। उसके बाद उसके दो सौर एरेज और चार एंटिना रिफ्लेक्टर भी कक्षा में स्थापित किए जाएंगे। कक्षा में सभी परीक्षण पूरे होने के बाद उपग्रह काम करने लगेगा।
फ्रेंच गुयाना से क्यों हुई जीसैट-11 की लॉन्चिंग?
जीसैट-11 के प्रक्षेपण पर एक अहम सवाल और भी लोगों के दिमाग में है कि फ्रेंच गुयाना से ही क्यों हुई जीसैट-11 की लॉन्चिंग? अगर भारत अब अपने सारे उपग्रह भेजने में सक्षम है तो फिर ऐसा क्यों किया गया  ? असल में कई बार इसरो अपने सैटेलाइट्स को लांच करने के लिए यूरोपियन स्पेस एजेंसी के जरिए फ्रेंच गुयाना के कोऊरू से भेजता है। जीसैट-11 इसका सबसे हालिया उदाहरण है। यह इसरो का बनाया अब तक का सबसे भारी उपग्रह था। वहाँ से लांचिंग की कई बड़ी वजहें हैं जिसमें सबसे प्रमुख यह है कि दक्षिण अमेरिका स्थित फ्रेंच गुयाना के पास लंबी समुद्री रेखा है, जो इसे रॉकेट लांचिंग के लिए और भी मुफीद जगह बनाती है। इसके अलावा फ्रेंच गुयाना एक भूमध्यरेखा के पास स्थित देश है, जिससे रॉकेट को आसानी से पृथ्वी की कक्षा में ले जाने में और मदद मिलती है। जियोस्टेशनरी कक्षा की ऊंचाई भूमध्य रेखा से करीब 36,000 किलोमीटर होती है। ज्यादातर रॉकेट पूर्व की ओर से छोड़े जाते हैं ताकि उन्हें पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करने के लिए पृथ्वी की गति से भी थोड़ी मदद मिल सके। दरअसल पृथ्वी पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है। वैश्विक स्तर की सुविधाओं से युक्त होने, राकेट के लिए ईंधन आदि की पर्याप्तता आदि ऐसी वजहें हैं जिनके चलते भी इसरो अपने बेहद महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट्स के लांच के लिए फ्रेंच गुयाना को एक मुफीद लॉन्च साइट मानता रहा है।
हाल के वर्षों में इंटरनेट सेवा प्रदान करने के लिए जियोस्टेशनरी उपग्रह एक विकल्प के तौर पर उभरे हैं। जियोस्टेशनरी उपग्रह धरती की भूमध्यरेखा से 36,000 किलोमीटर ऊपर स्थित होते हैं यह बहुत बड़े क्षेत्र को कवर करते हैं। एक उपग्रह धरती के एक तिहाई हिस्से को कवर कर सकता है। इससे इंटरनेट सेवा प्रदाता (आईएसपी) को व्यापक भौगोलीय क्षेत्र में ग्राहक हासिल करने की छूट मिलती है । जियोस्टेशनरी उपग्रह हाई थ्रूपुट सेटेलाइट (एचटीएस) के जरिए स्पॉटबीम सेवा उच्च डेटा दर उपलब्ध करवातें हैं । आईएसपी और ग्राहक दोनों ही सेटेलाइट के जरिए एंटेना डिश लगा कर बिना तार के जुड़े होते हैं।वास्तव में ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट कनेक्टिविटी बढ़ाने की जरूरत को बहुत गंभीरता से महसूस किया जा रहा है। इसके साथ ही सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और युवा कार्यबल के साथ भारत डिजिटल डिवाइड’ को दूर करने का संघर्ष कर रहा है। अब तक देश के लगभग ५० करोड़ लोग इंटरनेट से जुड़ चुके हैं। लेकिन अभी भी देश की आधे से ज्यादा आबादी इंटरनेट से दूर है ऐसे में हमें ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट कनेक्टिविटी पर विशेष ध्यान देना होगा ।
इंटरनेट कनेक्टिविटी के साथ साथ भारत में इंटरनेट की स्पीड पर भी ध्यान देना होगा .देश की काफी बड़ी युवा आबादी आजकल मोबाईल में इंटरनेट का प्रयोग कर रही है लेकिन इंटरनेट स्पीड की समस्या यहाँ पर भी है। स्पीडटेस्ट वैश्विक सूचकांक में मोबाइल इंटरनेट की स्पीड के मामले में दुनिया में हमारा 109वां और फिक्स्ड ब्रॉडबैंड के मामले में 76वां स्थान बताता है कि अभी गुणवत्तापूर्ण इंटरनेट कनेक्टिविटी के लिए हमें लंबा रास्ता तय करना है। दुनिया की औसत मोबाइल इंटरनेट डाउनलोड स्पीड 20.28 एमबीपीएस है, जबकि हमारी 8.80 एमबीपीएस। हालांकि ब्रॉडबैंड डाउनलोड स्पीड के मामले में हमारी स्थिति थोड़ी सुधरी है। वैश्विक औसत 40.11 एमबीपीएस की तुलना में ब्रॉडबैंड में हमारी स्पीड अब 18.82 एमबीपीएस है। इस मोबाइल इंटरनेट सूचकांक में पड़ोसी देश म्यांमार 94वें, नेपाल 99वें और पाकिस्तान 89वें पायदान पर हैं। ऐसे में ब्रॉडबैंड स्पीड से कहीं अधिक भारत को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि अच्छी गुणवत्ता की मोबाइल इंटरनेट कनेक्टिविटी देश के तमाम उपभोक्ताओं को मिले, क्योंकि यह न सिर्फ एक लोकप्रिय माध्यम है, बल्कि विशेषकर गांवों में लोगों के ऑनलाइन होने का सुलभ तरीका भी। फिलहाल जीसैट-11 की सफल लांचिंग से अब यह उम्मीद जगी है कि इंटरनेट की कनेक्टिविटी के साथ साथ अब इंटरनेट की स्पीड के मामलें में भी भारत तरक्की करेगा   
फ़िलहाल हम अंतरिक्ष विज्ञान ,संचार तकनीक ,परमाणु उर्जा और चिकित्सा के मामलों में न सिर्फ विकसित देशों को टक्कर दे रहें है बल्कि कई मामलों में उनसे भी आगे निकल गएँ है । अंतरिक्ष में भारत के लिए संभावनाएं बढ़ रही है, इसने अमेरिका सहित कई बड़े देशों का एकाधिकार तोडा है। कुलमिलाकर जीसैट-11 भारत की मुख्य भूमि और द्वीपीय क्षेत्र में हाई-स्पीड डेटा सेवा मुहैया कराने में बड़ा मददगार साबित होगा। साथ ही चार संचार उपग्रहों के माध्यम से देश में 100 जीबीपीएस डेटा स्पीड मुहैया कराने का लक्ष्य रखा गया है। इस श्रेणी में जीसैट-11 तीसरा संचार उपग्रह है। संचार उपग्रह के मामले में भारी होने का मतलब है कि वो बहुत ताकतवर है और लंबे समय तक काम करने की क्षमता रखता है। साथ ही यह अब तक बने सभी सैटेलाइट में ये सबसे ज्यादा बैंडविथ साथ ले जाना वाला उपग्रह भी होगा। और इससे पूरे भारत में इंटरनेट की सुविधा मिल सकेगी खासकर ग्रामीण भारत में इसके जरिये इंटरनेट क्रांति संभव होगी जो देश के विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण है ।
(लेखक राजस्थान की मेवाड़ यूनिवर्सिटी में डायरेक्टर और टेक्निकल टूडे पत्रिका के संपादक हैं)

अंतरिक्ष में भारत की बढ़ती धमक


शशांक द्विवेदी 
इसरो ने एक बार फिर अंतरिक्ष में इतिहास रचते हुए भारत सहित 9 देशों के 31 उपग्रहों को पोलर सैटलाइट लॉन्च वीइकल (पीएसएलवी) सी-43 के जरिए लॉन्च कर दिया । इस प्रक्षेपण की खास बात यह है कि इसरो ने दो साल में चौथी बार 30 से ज्यादा सैटेलाइट लॉन्च किए। जनवरी 2017 में 104 उपग्रह लॉन्च कर इसरो ने रिकॉर्ड बनाया था।
ग्लोबल सैटेलाइट मार्केट में भारत की हिस्सेदारी बढ़ रही है। अभी यह इंडस्ट्री 200 अरब ड़ालर से ज्यादा की है । फ़िलहाल इसमें अमेरिका की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है जबकि भारत की हिस्सेदारी अब लगातार साल दर साल बढ़ रही है । सैटेलाइट ट्रांसपोंडर को लीज पर देने,  भारतीय और विदेशी क्लाइंटस को रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट की सेवाओं को देने के बदले में हुई कमाई से इसरो का राजस्व लगातार बढ़ रहा है । एक साथ कई उपग्रहों के प्रक्षेपण के सफल होने से दुनिया भर में छोटी सैटेलाइट लॉन्च कराने के मामले में इसरो पहली पसंद बन जाएगा, जिससे देश को आर्थिक तौर पर फायदा होगा।  पीएसएलवी की यह 45वीं उड़ान थी जिसमें एक माइक्रो और 29 नैनो सैटेलाइट शामिल हैं। पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (पीएसएलवी) की इस साल में यह छठी उड़ान थी। इसमें भारत के सबसे ताकतवर इमेजिंग सैटेलाइट हाइसइस के अलावा अमेरिका (23 उपग्रह) और ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, कोलंबिया, फिनलैंड, मलयेशिया, नीदरलैंड और स्पेन (प्रत्येक का एक उपग्रह) के उपग्रहों का प्रक्षेपण किया गया । इसरो के अनुसार इन उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए उसकी वाणिज्यिक इकाई (एंट्रिक्स कारपोरेशन लिमिटेड) के साथ करार किया गया है।
कुछ साल पहले एक समय ऐसा भी था जब अमेरिका ने भारत के उपग्रहों को लाँच करने से मना कर दिया था। आज स्तिथि ये है कि अमेरिका सहित तमाम देश खुद भारत से अपने उपग्रहों को प्रक्षेपित करवा रहें हैं ।
कम लागत और बेहतरीन टेक्नोलॉजी की वजह से आज दुनियाँ के कई देश इसरों के साथ व्यावसायिक समझौता करना चाहतें है। अब पूरी दुनिया में सैटलाइट के माध्यम से टेलीविजन प्रसारण , मौसम की भविष्यवाणी और दूरसंचार का क्षेत्र बहुत तेज गति से बढ़ रहा है और चूंकि ये सभी सुविधाएं उपग्रहों के माध्यम से संचालित होती हैं इसलिए उपग्रहों को अंतरिक्ष में स्थापित करने की मांग में तेज बढ़ोतरी हो रही है। हालांकि इस क्षेत्र में चीन, रूस, जापान आदि देश प्रतिस्पर्धा में हैं, लेकिन यह बाजार इतनी तेजी से बढ़ रहा है कि यह मांग उनके सहारे पूरी नहीं की जा सकती। ऐसे में व्यावसायिक तौर पर यहाँ भारत के लिए बहुत संभावनाएं है । कम लागत और सफलता की गारंटी इसरो की सबसे बड़ी ताकत है जिसकी वजह से स्पेस इंडस्ट्री में आने वाला समय भारत के एकाधिकार का होगा ।
हालिया प्रक्षेपित हाइपर स्पेक्ट्रल इमेजिंग उपग्रह (हाइसइस) को 44.4 मीटर लंबे और 230 टन वजनी पीएसएलवी सी-43  से रॉकेट से छोड़ा गया है । पृथ्वी की निगरानी के लिए इसरो ने हाइसइस को विशेष रूप से तैयार किया है । हाइसइस पृथ्वी की मैग्नेटिक फील्ड का भी अध्ययन करेगा, साथ ही सतह का भी अध्ययन करेगा। एक विशेष चिप की मदद से तैयार किया गया ऑप्टिकल इमेजिंग डिटेक्टर ऐरे रणनीतिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। हाइसइस की मदद से पृथ्वी धरती के चप्पे-चप्पे पर नजर रखना आसान हो जाएगा. अब धरती से 630 किमी दूर अंतरिक्ष से पृथ्वी पर मौजूद वस्तुओं के 55 विभिन्न रंगों की पहचान आसानी से की जा सकेगी। इस उपग्रह का उद्देश्य पृथ्वी की सतह के साथ इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पैक्ट्रम में इंफ्रारेड और शॉर्ट वेव इंफ्रारेड फील्ड का अध्ययन करना है। हाइपर स्पेक्ट्रल इमेजिंग या हाइस्पेक्स इमेजिंग की एक खूबी यह भी है कि यह डिजिटल इमेजिंग और स्पेक्ट्रोस्कोपी की शक्ति को जोड़ती है। हाइस्पेक्स इमेजिंग अंतरिक्ष से एक दृश्य के हर पिक्सल के स्पेक्ट्रम को पढ़ने के अलावा पृथ्वी पर वस्तुओं, सामग्री या प्रक्रियाओं की अलग पहचान भी करती है। इससे पर्यावरण सर्वेक्षण, फसलों के लिए उपयोगी जमीन का आकलन, तेल और खनिज पदार्थों की खानों की खोज आसान होगी।
असल में इतने सारे उपग्रहों को एक साथ अंतरिक्ष में छोड़ना आसान काम नहीं है। इन्हें कुछ वैसे ही अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया जाता है जैसे स्कूल बस बच्चों को क्रम से अलग-अलग ठिकानों पर छोड़ती जाती हैं।  बेहद तेज गति से चलने वाले अंतरिक्ष रॉकेट के साथ एक-एक सैटेलाइट के प्रक्षेपण का तालमेल बिठाने के लिए बेहद काबिल तकनीशियनों और इंजीनियरों की जरुरत पड़ती है। अंतरिक्ष प्रक्षेपण के बेहद फायदेमंद बिजनेस में इसरो को नया खिलाड़ी माना जाता है। इस कीर्तिमान के साथ सस्ती और भरोसेमंद लॉन्चिंग में इसरो की ब्रांड वेल्यू में इजाफा होगा। इससे लॉन्चिंग के कई और कॉन्ट्रेक्ट एजेंसी की झोली में गिरने की उम्मीद है।
कम लागत और लगातार सफल लांचिंग की वजह से दुनियाँ का हमारी स्पेस टेक्नॉलाजी पर भरोसा बढ़ा है तभी अमेरिका सहित कई विकसित देश अपने सैटेलाइट की लाँचिंग भारत से करा रहें है । फ़िलहाल हम अंतरिक्ष विज्ञान ,संचार तकनीक ,परमाणु उर्जा और चिकित्सा के मामलों में न सिर्फ विकसित देशों को टक्कर दे रहें है बल्कि कई मामलों में उनसे भी आगे निकल गएँ है । अंतरिक्ष बाजार में भारत के लिए संभावनाएं बढ़ रही है ,इसने अमेरिका सहित कई बड़े देशों का एकाधिकार तोडा है ।  असल में, इन देशों को हमेशा यह लगता रहा है कि भारत यदि अंतरिक्ष के क्षेत्र में इसी तरह से सफ़लता हासिल करता रहा तो उनका न सिर्फ  उपग्रह प्रक्षेपण के क़ारोबार से एकाधिकार छिन जाएगा बल्कि मिसाइलों की दुनिया में भी भारत इतनी मजबूत स्थिति में पहुंच सकता है कि बड़ी ताकतों को चुनौती देने लगे। पिछले दिनों दुश्मन मिसाइल को हवा में ही नष्ट करनें की क्षमता वाली इंटरसेप्टर मिसाइल का सफल प्रक्षेपण इस बात का सबूत है कि भारत  बैलेस्टिक मिसाइल रक्षा तंत्र के विकास में भी बड़ी कामयाबी हासिल कर चुका है . दुश्मन के बैलिस्टिक मिसाइल को हवा में ही ध्वस्त करने के लिए भारत ने सुपरसोनिक इंटरसेप्टर मिसाइल बना कर दुनियाँ के विकसित देशों की नींद उड़ा दी है ।
अरबों डालर का मार्केट होनें की वजह से भविष्य में अंतरिक्ष में प्रतिस्पर्धा बढेगी । इसमें और प्रगति करके इसका बड़े पैमाने पर वाणिज्यिक उपयोग भी संभव है । ऐसे में भारत अंतरिक्ष विज्ञान में नई सफलताएं हासिल कर विकास को अधिक गति दे सकता है । जोकिन देश में गरीबी दूर करने  और विकसित भारत के सपने को पूरा करने में इसरो काफ़ी मददगार साबित हो सकता है । कुलमिलाकर एक साथ कई उपग्रहों के सफलतापूर्वक प्रक्षेपण से इसरों को बहुत व्यावसायिक फायदा होगा जो भविष्य में  इसरों के लिए संभावनाओं के नयें दरवाजें खोल देगी जिससे भारत को निश्चित रूप से बहुत फ़ायदा पहुंचेगा ।
अब समय आ गया है जब इसरो व्यावसायिक सफ़लता के साथ साथ अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा की तरह अंतरिक्ष अन्वेषण पर भी ज्यादा ध्यान दे। इसरो को अंतरिक्ष अन्वेषण और शोध के लिए दीर्घकालिक रणनीति बनानी होगी ।क्योंकि जैसे जैसे अंतरिक्ष के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढेगी अंतरिक्ष अन्वेषण बेहद महत्वपूर्ण होता जाएगा। इस काम इसके लिए सरकार को इसरो का सालाना बजट भी बढ़ाना पड़ेगा जो फिलहाल नासा के मुकाबले काफ़ी कम है । भारी विदेशी उपग्रहों को अधिक संख्या में प्रक्षेपित करने के लिए अब हमें पीएसएलवी के साथ साथ जीएसएलवी रॉकेट का भी उपयोग करना होगा । पीएसएलवी अपनी सटीकता के लिए दुनियाँ भर में प्रसिद्द है लेकिन ज्यादा भारी उपग्रहों के लिए जीएसएलवी का प्रयोग करना होगा।मानवयुक्त अंतरिक्ष अभियान पर भी इसरो को जल्द काम शुरू करना होगा ।
(लेखक राजस्थान की मेवाड़ यूनिवर्सिटी में डायरेक्टर और टेक्निकल टूडे पत्रिका के संपादक हैं)

Friday, 5 October 2018

ग्लोबल वार्मिंग का इलाज


चंद्रभूषण 
बढ़ती कार्बन डाइऑक्साइड अगले कुछ ही वर्षों में ग्लोबल वार्मिंग को बेकाबू बना सकती है। पेरिस सम्मेलन में सदी के अंत तक धरती का तापमान 2 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा न बढ़ने देने के लिए यह तय किया गया कि तब तक कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन बिल्कुल रोक दिया जाए और फिर इस गैस को सिस्टम से बाहर करने के प्रयास चलाए जाएं। लेकिन यह बात कहने में जितनी सटीक थी, व्यवहार में उतनी ही बोगस साबित हो रही है। दुनिया में हर जगह अंधाधुंध गाड़ियां बिक रही हैं और कार्बन का उत्सर्जन दिनोंदिन तेज ही होता जा रहा है। इसके सोख्ते के तौर पर खूब सारे पेड़ लगाने की बात और भी बोगस है क्योंकि इसके नाम पर हर जगह सिर्फ सरकारी पैसे खाए जा रहे हैं।
ऐसे में वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड हटाने का एक ही रास्ता बचता है कि किसी तरह इसे सीधे ही चूस लिया जाए। डायरेक्ट एयर कैप्चरनाम की इस मुहिम में हवा को बड़े-बड़े पंखों से खींचकर किसी ऐसे केमिकल से गुजारा जाता है, जो कार्बन डाइऑक्साइड सोख ले। फिर उससे यह गैस निकालकर केमिकल को दोबारा काम पर लगा दिया जाए। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के भौतिकशास्त्री डेविड कीथ ने कनाडा में ऐसा एक पायलट प्रॉजेक्ट शुरू किया, जिसकी लागत पिछले कुछ सालों में 600 डॉलर से घटकर 100 डॉलर प्रति टन कार्बन डाइऑक्साइड तक आ गई है। आगे इससे 1 डॉलर प्रति लीटर का ईंधन बनाया जा सकेगा। सरकारें पर्यावरण को लेकर गंभीर हों तो 2030 तक इस प्रयास से कुछ ठोस उम्मीद बांधी जा सकती है।


Friday, 14 September 2018

आइए, हिंदी दिवस पर अंग्रेजी से सीखें


हरजिंदर, वरिष्ठ पत्रकार 
इस महीने की शुरुआत हिंदी के लिए एक अच्छी खबर के साथ हुई थी। ऑनलाइन कारोबार की अगुवा कंपनी अमेजनने अपना हिंदी साइट शुरू किया है। यानी हिंदी अब ऑनलाइन खरीदारी की भाषा भी बन गई है। बेशक, इस बहुराष्ट्रीय कंपनी ने ऐसा हिंदी की सेवा के लिए नहीं किया, बल्कि हिंदीभाषी समुदाय के बीच अपनी कारोबारी संभावनाओं के विस्तार के लिए किया है। संचार सुविधाओं के प्रसार ने स्मार्टफोन को अब देश के उन कोनों तक पहंुचा दिया है, जहां अंग्रेजी अपनी पकड़ खो बैठती है। ऐसे लोगों की क्रय-क्षमता के दोहन के लिए भारतीय भाषाओं का सहारा लेना तकरीबन सभी ऑनलाइन कंपनियों की मजबूरी बनता जा रहा है। अमेजन ने तो हिंदी के साथ ही तमाम दूसरी भारतीय भाषाओं की मदद लेने की घोषणा भी कर दी है। लेकिन हिंदी की शुरुआत सबसे पहले हुई है, क्योंकि हिंदी ही ऐसी भाषा है, जिससे देश के बड़े भौगोलिक विस्तार तक पहंुच बनाई जा सकती है।  
मानक हिंदी के तौर पर आज जिस खड़ी बोली का इस्तेमाल किया जाता है, उसे लेकर एक धारणा यह भी है कि यह भाषा हाट और बाजार में पैदा हुई, वहीं पली-बढ़ी है। तमाम तरह के समाजवादी रुझानों के चलते हिंदी क्षेत्र की राजनीति भले ही लंबे समय तक बाजार की संभावनाओं के खिलाफ खड़ी दिखाई देती रही हो, लेकिन सच यही है कि जैसे-जैसे बाजार का विस्तार हुआ है, हिंदी का आधार मजबूत होता गया है। चाहे वह फिल्मों के रूप में मनोरंजन का बाजार हो या फिर उपभोक्ता उत्पादों का। उत्पाद के ऊपर के सारे लेबल भले ही अंग्रेजी में हों, लेकिन अगर उसे बेचना है, तो विज्ञापन हिंदी में ही देने होंगे। यह बात देसी-विदेशी कंपनियों ने बहुत पहले ही समझ ली थी कि उत्पादन प्रक्रिया की भाषा          भले ही कोई भी हो, पर उपभोक्ताओं से संवाद की          भाषा स्थानीय ही रखनी होगी। हालांकि इसमें एक विडंबना भी छिपी है कि हिंदी के जो विज्ञापन दिन-रात हमारे दिल-दिमाग पर छाए रहते हैं, उनके खुद के उत्पादन की भाषा अंग्रेजी है।
वैसे यह विडंबना कोई नई नहीं है। यह ऐसी समस्या नहीं है, जो अंग्रेजों या अंग्रेजी के साथ आई हो। ज्ञान-विज्ञान व प्रशासन की भाषा और लोक भाषा के बीच का अंतर भारत में काफी समय से रहा है, शायद सदियों से। और जहां ज्ञान-विज्ञान व प्रशासन की भाषा हिंदी बनाने की कोशिश हुई है, वहां एक ऐसी हिंदी सामने आई है, जो कुछ भी हो, लोकभाषा नहीं है। इसे अच्छी तरह समझना हो, तो उत्तर प्रदेश के किसी कल-कारखाने में चले जाइए। वहां नियम यह है कि मजदूरों व कर्मचारियों से संबंधित कानूनों को हिंदी में लिखकर दीवार पर चिपकाना होगा, ताकि कर्मचारी उन्हें आसानी से पढ़ सकें। लेकिन पढ़ सकने का सच यह है कि मजदूर या कर्मचारी तो दूर, हिंदी भाषा में पीएचडी करने वाला भी उस भाषा को पढ़कर समझ नहीं सकता। एक दूसरा उदाहरण दिल्ली मेट्रो है, जहां हर कुछ देर के बाद यह उद्घोषणा होती है- दृष्टिबाधित व्यक्तियों हेतु बने स्पर्शणीय पथ पर न चलें।शासन-प्रशासन के लिए हिंदी के इस्तेमाल पर जोर देने वालों ने हमें जो अनुवाद की भाषा दी है, उसने दरअसल अंग्रेजी की सत्ता को ही मजबूत करने का काम किया है। 
लेकिन हिंदी लोकभाषा बनी रहने के साथ ही ज्ञान-विज्ञान और शासन-प्रशासन की भाषा भी बने, यह हिंदी क्षेत्र का पुराना सपना है। हर साल हिंदी दिवस दरअसल इसी सपने को दोहराने व संकल्प बनाने की सोच के साथ आता और चला जाता है। इस दिन हम हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की बात तो करते ही हैं, उसे विश्व भाषा बनाने के लिए जुट जाने की भी सोचते हैं। वैसे हिंदी एक अर्थ में विश्व भाषा तो है ही, यह दुनिया की चौथी सबसे          ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है और इस मामले में अंग्रेजी से थोड़ा ही नीचे है। लेकिन जब यह तर्क दिया जाता          है, तो बात दरअसल इसे अंग्रेजी की तरह प्रभावी भाषा बनाने की होती है, वरना अंग्रेजी भी तीसरे नंबर की           बोली जाने वाली भाषा ही है। उससे ऊपर चीन की मंदारिन और स्पेनिश है, हिंदी दिवस पर हम इन भाषाओं की बात कभी  नहीं करते। 
यहां यह जान लेना जरूरी है कि पिछले तकरीबन दो सौ साल में अंग्रेजी दुनिया की इतनी प्रभावी भाषा कैसे बन गई? इसका एक श्रेय अंग्रेजी साम्राज्यवाद को दिया जाता है, हालांकि यह आधा ही सच है। सही-गलत जो भी तरीका अपनाया गया हो, पर एक दौर में अंग्रेजी समाज इतना ताकतवर हो गया कि दुनिया के एक बहुत बड़े हिस्से में अपना सिक्का चलाने की स्थिति में आ गया। अंग्रेजों ने दुनिया के तमाम देशों पर न सिर्फ अपने देश की आबोहवा में पनपे नियम-कानूनों, तौर-तरीकों, भोजन-पहनावों, पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों, यहां तक कि मछलियों को थोपा, बल्कि उन्हें अपनी भाषा के साथ चलने चलाने की मजबूरी भी दी। इसी के साथ दूसरा आधा सच यह है कि अंग्रेजी दरअसल औद्योगिक क्रांति की भी भाषा थी। औद्योगिक क्रांति और उसके उत्पादों के साथ यह दुनिया के उन कोनों में भी पहंुच गई, जहां अंग्रेजों का साम्राज्यवाद भी नहीं पहुंच पाया था। 
अंग्रेजी के इस इतिहास का सबक सिर्फ इतना है कि कोई भाषा जब किसी बड़े बदलाव की भाषा या उसका जरिया बनती है, तो जहां-जहां वह बदलाव पहंुचता है, वहां-वहां वह भाषा भी अपनी जड़ें जमाने लगती है। इसे इस तरह भी देखें कि आज हम जिस हिंदी का इस्तेमाल करते हैं, उसे विस्तार मिलना तब शुरू हुआ, जब देश के एक बड़े हिस्से में स्वतंत्रता संग्राम की भाषा बनी। यह स्वतंत्रता संग्राम ही था, जिसने पंजाबी, गुजराती और मराठीभाषी क्षेत्रों में हिंदी को सहज स्वीकार्य बनाया।
एक दूसरी तरह से देखें, तो भाषा की जमीन और उसके आसमान का मामला सेवा, सपने और संकल्प का मामला नहीं है, बल्कि यह उस भाषा-भाषी समाज की समृद्धि, ताकत और उसके किसी मंजिल विशेष की ओर बढ़ने का मामला है। आइए, इस हिंदी दिवस पर हिंदीभाषी समाज को समृद्ध और ताकतवर बनाने का संकल्प लें। फिर हिंदी अपने आप ताकतवर हो जाएगी- एक के साधे सब सधे।