Sunday, 13 October 2019

चाँद का भी कोई चांद !!

चांद का भी कोई चांद
चंद्रभूषण
अंतरिक्षीय पिंडों में एक-दूसरे का चक्कर लगाने की सहज वृत्ति होती है। ग्रह-उपग्रह छोड़िए, धरती पर गिरने वाले ज्यादातर उल्कापिंड भी ऐसे ही जोड़ों में आते हैं। ऐसे में यह आश्चर्य की बात ही कही जाएगी कि हमारे सौरमंडल में इतने सारे (फिलहाल 200 से भी ज्यादा दर्ज) उपग्रहों की मौजूदगी के बावजूद अभी तक एक भी उपग्रह का उपग्रह नहीं खोजा जा सका है। क्या प्रकृति ऐसे पिंड बना ही नहीं सकती? या यह केवल हमारे अपने सौरमंडल की सीमा है?

सवाल की गहराई में जाएं तो उपग्रहों के गणित पर काफी सारा काम डेढ़-दो सौ साल पहले किया जा चुका है, लेकिन उससे सिर्फ दो परिभ्रमणकारी पिंडों, मसलन ग्रह और उपग्रह के बीच की अधिकतम दूरी का अंदाजा मिलता है। हिल स्फेयर नाम की यह सीमा हमारे चंद्रमा के मामले में 60 हजार किलोमीटर है। इससे ज्यादा दूरी पर घूमने वाली कोई चीज चांद के बजाय पृथ्वी के ही चक्कर लगाएगी।

स्थिर कक्षा इस 'हिल स्फेयर' की तिहाई-चौथाई दूरी पर ही बन पाती है। इससे ज्यादा दूरी पर लाखों साल तक चलने वाली कक्षाएं जरूर बन सकती हैं पर देर-सबेर पिंड अपना घाट छोड़ देगा। अगर हमारे चंद्रमा का कोई उप-उपग्रह होता तो वह 15-20 हजार किलोमीटर की कक्षा में उसका चक्कर लगाता पाया जाता। हालांकि ज्वारीय बलों के प्रभाव में उसकी कक्षा क्रमश: छोटी होती जाती और वह चंद्रमा पर गिर जाता। लेकिन यह मजबूरी हर जगह तो लागू नहीं होती होगी।

सौरमंडल से बाहर का पहला चंद्रमा खोजे जाने की बात इसी महीने सामने आई है। हमसे 8000 प्रकाशवर्ष दूर स्थित एक ग्रह केप्लर 1625बी का नेप्च्यून के आकार वाला- यानी हमारी पृथ्वी का 17 गुना वजनी- उपग्रह उसका चक्कर हमारे चंद्रमा की आठ-नौगुनी दूरी से लगा रहा है। फिलहाल जानने का कोई तरीका भले न हो, पर इतने विशाल पिंड का कोई उप-उपग्रह क्यों नहीं हो सकता? मान लीजिए अगर यह हुआ तो अंग्रेजी में इसे क्या कहेंगे? कुछ वैज्ञानिकों ने ऐसे पिंडों के लिए ‘मूनमून’ कुलनाम प्रस्तावित किया है!

Saturday, 12 October 2019

कम ऑक्सीजन का गम

कम ऑक्सिजन का गम
चंद्रभूषण
शरीर में ऑक्सिजन सप्लाई लगातार कम रहने से होने वाली बीमारी हाइपॉक्सिया आजकल चर्चा में है तो इसकी खास वजह इस बार का मेडिसिन नोबेल ऐसी बीमारियों की जड़ तक जाने वाली रिसर्च को दिया जाना है। खून में ऑक्सिजन कम होने की समस्या हाइपॉक्सीमिया और पेशियों में ऑक्सिजन के क्रॉनिक अभाव से पैदा होने वाले हाइपॉक्सिया की फौरी वजहें भी हो सकती हैं लेकिन समुद्र तल से 2500 मीटर (8200 फुट) या अधिक ऊंचाई पर रहने वालों में यह ज्यादा देखने में आता है।

गनीमत है कि भारत में ऐसी जगहें न के बराबर हैं। देसी हिल स्टेशनों में इतना ऊंचा अकेला गुलमर्ग है, जो कोई स्थायी बस्ती न होकर एक टूरिस्ट स्पॉट भर है। पारंपरिक बसावट वाले ऐसे इलाके दुनिया में तीन ही हैं। एक हमारा पड़ोसी तिब्बत, दूसरा पूर्वी अफ्रीका में केन्या, तंजानिया और युगांडा के कुछ इलाके, और तीसरा दक्षिणी अमेरिका में एंडीज पर्वतमाला के देश पेरू और बोलीविया। इवॉल्यूशन ने दसियों हजार वर्षों में इन तीनों जगहों पर हाइपॉक्सिया और इसके बृहद रूप क्रॉनिक माउंटेन सिकनेस (सीएमएस) से लड़ने के तीन तरीके ईजाद किए हैं।

पूर्वी अफ्रीकियों के खून में हीमोग्लोबिन बहुत ज्यादा पाया जाता है, जिसके चलते उनमें सीएमएस के मामले बिल्कुल नहीं देखे जाते। तिब्बत में लोग जल्दी-जल्दी सांस लेने के आदी हो चुके हैं जिससे वातावरण में ऑक्सिजन कम होने के बावजूद शरीर में इसकी आपूर्ति संतुलित रहती है। लेकिन एंडियन इलाकों में मनुष्य पहुंचा ही 15,000 साल पहले, लिहाजा वहां 15 से 20 फीसदी लोग सीएमएस के शिकार देखे गए हैं। इस साल के मेडिसिन नोबेल ने जरूर उनकी उम्मीद बढ़ाई होगी।

Wednesday, 9 October 2019

विज्ञान के तीनों नोबेल

विज्ञान के तीनों नोबेल आम दायरे में मौजूद खोजों को
चंद्रभूषण

यों तो नोबेल पुरस्कार हैं ही व्यावहारिक खोजों के लिए, लेकिन अक्सर हम इनका सेहरा ऐसे शोधों और अविष्कारों के सिर बंधते देखते हैं जिन्हें समझना आम लोगों के बूते की बात नहीं होती। यह विरला मौका है कि इस बार के तीनों साइंस नोबेल आम इस्तेमाल वाली या जन सामान्य के विमर्श में शामिल आविष्कारों या खोजों के लिए दिए गए हैं। चिकित्साशास्त्र का नोबेल फिजियॉलजी (शरीर क्रिया विज्ञान) के एक बुनियादी काम के लिए, भौतिकी का नोबेल एस्ट्रोफिजिक्स (तारा भौतिकी) के दो सीमावर्ती क्षेत्रों के लिए, और रसायनशास्त्र का नोबेल वैसे तो मटीरियल साइंस के लिए, लेकिन सीधे तौर पर कहें तो हर हाथ में थमे मोबाइल फोन की लीथियम आयन बैट्री के लिए।

चिकित्साशास्त्र का नोबेल एपॉक्सिया और एपॉक्सीमिया पर काम करने वाले वैज्ञानिकों को मिला है। एपॉक्सीमिया यानी खून में ऑक्सिजन कम होना और एपॉक्सिया यानी ऑक्सिजन की कमी से शरीर की किसी खास पेशी या कई पेशियों का दम घुट जाना। किसी चोटिल व्यक्ति का कोई अंग अगर आपको गहरा लाल और फिर काला पड़ता दिखे तो इसका सीधा मतलब है कि ऑक्सिजन की कमी से वहां की कोशिकाएं मरने की शुरुआत हो चुकी है। ऐसा अगर दिल या दिमाग जैसे किसी जीवन-मरण से जुड़े अंग के साथ हो जाए तो स्ट्रोक से तत्काल मौत हो सकती है।

नोबेल प्राप्त शोधार्थियों ने इस बात का पता लगाया कि कोशिकाओं द्वारा जरूरत पड़ने पर अधिक ऑक्सिजन ग्रहण करने और जरूरत खत्म हो जाने पर ऑक्सिजन इनटेक के पुराने संतुलन में लौट जाने का मेकेनिज्म क्या है। कैंसर का ट्यूमर अपने लिए नई रक्त वाहिकाएं कैसे बना लेता है, यह सवाल भी इस शास्त्र को छूते हुए गुजरता है। एक बड़ी बात यह कि इसी शास्त्र के आधार पर काम करने वाली और मानव शरीर के लिए कई जानलेवा स्थितियों में कारगर एक दवा पिछले साल से चीन में बिकने भी लगी है, हालांकि अमेरिका में इसके परीक्षण अभी पूरे नहीं हुए हैं। इस क्रम में कोशिकाओं के सांस लेने की प्रणाली की डीएनए स्तर पर मौजूद एक गहरी पेचीदगी जीवविज्ञान की पकड़ में आ गई तो उसे बोनस समझा जाना चाहिए।

भौतिकी के नोबेल का संबंध तारा भौतिकी से है, जो रोजमर्रा जीवन का शास्त्र नहीं है। लेकिन जो वैज्ञानिक इससे पुरस्कृत हुए हैं उनमें दो का संबंध सौरमंडल से इतर अन्य तारों के ग्रहों की खोज से है, जिस पर संसार की हर भाषा में लगभग हर हफ्ते कोई न कोई लेख लोगों को पढ़ने को मिल जाता है। पिछले तीस वर्षों में उभरे इस नए शास्त्र की मूल उत्सुकता- ‘क्या ब्रह्मांड में पृथ्वी के अलावा कहीं और जीवन है’, या ‘क्या सृष्टि में कहीं मनुष्य से अधिक बुद्धिमान कोई प्राणी भी है’- जैसे सवालों से ही उपजी है। लेकिन धीरे-धीरे इसका स्वरूप जमीनी हो रहा है और इसके तहत तमाम तरह के संभावित ग्रहों का अध्ययन किया जा रहा है। इसके लिए फिलहाल 4000 से ज्यादा ऑब्जर्व्ड कैंडिडेट मौजूद हैं, जिनके ब्यौरों के लिए जेम्स वेब टेलिस्कोप छोड़े जाने का इंतजार है। अलबत्ता इस पुरस्कार का आधा हिस्सा ब्रह्मांड के उद्भव और विकास से जुड़ी स्थापित थीसिस के लिए दिया गया है, जिस तक पहुंच अपेक्षाकृत कम पाठकों की है।

सबसे ज्यादा दिलचस्प रहा रसायनशास्त्र का नोबेल, जिसमें फोन, कैमरा और कैमकॉर्डर जैसी चीजों में काम आने वाली छोटी, पावरफुल लीथियम आयन बैट्री के विविध पहलुओं पर काम करने वाले वैज्ञानिकों को पुरस्कृत किया गया। अभी कुछ साल पहले तक इतनी ताकतवर चीज की कल्पना करना भी कठिन था लेकिन इन बैटरियों का इस्तेमाल अब फोन जैसी छोटी चीजें ही नहीं, भारी ट्रक चलाने में भी होने लगा है। अलबत्ता इसके साथ एक ही तकनीकी समस्या है कि इस्तेमाल होने के दौरान यह गरम होती है और इस क्रम में बड़ी तेजी से फूलती है। फोन को एक छोटा-मोटा बम बना देने वाली इस बीमारी का हल खोजे बिना लीथियम आयन बैट्री को फूलप्रूफ आविष्कार नहीं कहा जा सकता। इसकी दूसरी समस्या लीथियम की महंगाई से जुड़ी है, जिसकी कीमत 2016 से 2018 के बीच ही दोगुनी हो गई और अगले दशक में दस गुनी हो सकती है!

Tuesday, 8 October 2019

ऑक्सीजन को महसूस करने के लिए नोबेल !!!

स्कंद शुक्ला
सन् 2015। दो अन्तरराष्ट्रीय सायक्लिस्ट एक ऐसे रसायन का सेवन करते पकड़े जाते हैं , जो मनुष्य के शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं की संख्या को बढ़ा देता है। इन कोशिकाओं का लाल रंग इनमें मौजूद हीमोग्लोबिन के कारण होता है , जो ऑक्सीजन को बाँधकर उसे ढोता है। चूँकि इन कोशिकाओं का काम शरीर के तमाम अंगों तक ऑक्सीजन पहुँचाना होता है --- इसलिए अगर लाल रक्त कोशिकाओं की संख्या बढ़ सकी , तो व्यक्ति सायकिल चलाते समय आसानी से बेहतर प्रदर्शन करने में क़ामयाब हो सकता है। एफजी 4592 / एएसपी 1517 नाम का यह रसायन अभी ( सन् 2015 तक ) दवा के रूप में बाज़ार में उतारा तक नहीं गया है। इसका रोगों में सदुपयोग आरम्भ नहीं हुआ है , किन्तु खेल की दुनिया में दो सायक्लिस्ट इसका दुरुपयोग कर चुके हैं।

खेल में छल करने पर पकड़े जाने पर प्रतिबन्ध के नियम हैं। किन्तु इस घटना ने एक बड़ी बात सामने लाकर रख दी थी। ख़ून की ऑक्सीजन ढोने की क्षमता को किसी भी तरह येन-केन-प्रकारेण बढ़ा सकना , डोपिंग का नया तरीक़ा बनकर सामने आने लगा था। यद्यपि आज यह रसायन रॉक्साडस्टैट के नाम से गुर्दा-रोगियों में इस्तेमाल किया जाने लगा है। किन्तु वैध दवा के रूप में इसका प्रयोग सन् 2018 में मान्य हुआ। अवैध डोपिंग-प्रयोग के तीन साल बाद।

सन् 2019 का चिकित्सा-नोबल-पुरस्कार कोशिकाओं की 'ऑक्सीजन-अनुभूति' के लिए तीन वैज्ञानिकों ग्रेग सेमेन्ज़ा , पीटर रैटक्लिफ़ और विलयम केलिन को मिला है। कोशिकाएँ आसपास ऑक्सीजन की उपस्थिति को पहचान लेती हैं कि वह सामान्य मात्रा है में अथवा कम। ऑक्सीजन की सामान्य मात्रा जिसे नॉर्मॉक्सिया कहते हैं , उसमें उनका बर्ताव एक ख़ास मेल का होता है। यह बर्ताव ऑक्सीजन की कमी --- जिसे हायपॉक्सिया कहा जाता है --- उसके दौरान बदल जाता है।

पहाड़ों पर चढ़ना हो , मैदान में दौड़ना या फिर मग्न होकर नृत्य करना --- ऑक्सीजन की कमी हमें और हमारी कोशिकाओं को न होने का बोध कराती है। हमारा शरीर उसके लिए भीतर आवश्यक बदलाव करता है। मगर यह भी ध्यान रहे कि ऑक्सीजन की मात्रा को पहचानने का यह काम केवल सामान्य कोशिकाएँ ही नहीं करतीं। कैंसर-कोशिकाओं के लिए भी यह काम बहुत ज़रूरी है। अगर जीवित रहना है , जो स्वस्थ और कैंसर दोनों प्रकार की कोशिकाओं को ऑक्सीजन की मात्रा को आसपास लगातार 'सेन्स' करते रहना है। नॉर्मॉक्सिया में एक प्रकार का बर्ताव करना है , हायपॉक्सिया में दूसरे तरह का।

ऑक्सीजन की कमी ( यानी हायपॉक्सिया ) समूचे शरीर में भी हो सकती है और किसी एक ख़ास अंग में भी। हायपॉक्सिया के दौरान एक ख़ास प्रोटीन कोशिकाओं के भीतर जमा होने लगता है। इसका नाम एचआइएफ़ यानी हायपॉक्सिया-इंड्यूसिबल-फ़ैक्टर है। सामान्य स्वस्थ कोशिकाओं में ऑक्सीजन की प्रचुर मौजूदगी के दौरान एचआइएफ़ बनता तो है , किन्तु कोशिका के भीतर नष्ट भी कर दिया जाता है। लेकिन जब ऑक्सीजन की कमी होती है , तब यह नष्ट नहीं होता । बल्कि यह कोशिका के भीतर एकत्रित रहते हुए अनेक जीनों को ऑन-ऑफ़ करने लगता है।

जीन क्या करते हैं ? प्रोटीन का निर्माण। जीन का ऑफ़ होना यानी ? कोशिका के भीतर किसी प्रोटीन का निर्माण रुकना। जीन का ऑन होना यानी ? कोशिका के भीतर किसी प्रोटीन का निर्माण चालू हो जाना। यानी एचआइएफ की वजह से ऑक्सीजन की कमी से जूझती कोशिकाओं के भीतर प्रोटीन-स्तर पर बदलाव होने लगते हैं।

एचआइएफ तभी सक्रिय होता है , जब ऑक्सीजन की कमी होती है। सामान्य स्थिति में इसे काम नहीं करने दिया जाता। शरीर की हर कोशिका , हर ऊतक , हर अंग में एचआइएफ मौजूद है। ऑक्सीजन की कमी से किसी भी कोशिका को कभी भी जूझना पड़ सकता है। कुदरत ने इसलिए हर कोशिका को एचआइएफ से नवाज़ा है।

 जिस रसायन को सायक्लिस्टों ने अवैध रूप से इस्तेमाल किया , वह सामान्य कोशिकाओं में एचआइएफ को नष्ट होने से रोक देता है। उसे स्टेबिलाइज़ कर देता है। इसकी वजह से एचआइएफ कोशिकाओं के भीतर उन प्रोटीनों का निर्माण सामान्य स्थिति में ही शुरू कर देता है , जिनका निर्माण केवल ऑक्सीजन की कमी में होना चाहिए था। एचआइएफ के कारण ही अस्थि-मज्जा में हीमोग्लोबिन से भरी लाल रक्त कोशिकाओं का उत्पादन बढ़ने लगता है। इसी वजग से इस रसायन को इस्तेमाल करने वाले सायकिल चलाते समय बेहतर प्रदर्शन में क़ामयाब हो जाते हैं। अधिक लाल रक्त कोशिकाएँ , अधिक ऑक्सीजन-संवहन। नतीजन कम थकान और बेहतर प्रदर्शन।

कैंसर-कोशिकाएँ अलग-अलग तरीक़ों से ऑक्सीजन की कमी से बचने की जुगत लगाती हैं। घावों के भराव व तरह-तरह के रोगों में ऑक्सीजन का होना-या न होना बहुत मायने रखता है। मस्तिष्क की तमाम बीमारियों जैसे अल्ज़्हायमर्स , पार्किसंस व अन्य कई में ऑक्सीजन की कमी का योगदान अनेक शोधों में पाया गया है। ऐसे में नॉर्मॉक्सिया-हायपॉक्सिया को समझकर हम दवाओं के निर्माण में इसे भुना सकते हैं। कैंसरों व तमाम डिजनरेटिव बीमारियों की रोकथाम के लिए हायपॉक्सिया , हायपॉक्सिया-इंड्यूसिबल-फ़ैक्टर व इसके कारण होने वाले प्रोटीन-परिवर्तनों की समझ लाभकारी है।

इस वर्ष का नोबल-पुरस्कार ऑक्सीजन को 'महसूस करने' के लिए है। कैसे शरीर की बिलियनों इकाइयाँ उसके होने या न होने को बोधती हैं। वह ऑक्सीजन जो हमारे शरीर के भीतर सभी को चाहिए। अच्छों को भी , बुरों को भी। कैसे वे उसके होने-न होने के कारण बदलती हैं , कैसे उससे समझौता करती हैं। जो सभी के लिए इतनी आवश्यक है , उसकी कमी के कारण होने वाले बदलाव समझना विज्ञान के लिए ज़रूरी है। वहाँ अनेक सम्भावित दवाओं के राज़ छिपे हैं , वहीं अनेक जीवन-रक्षण की सम्भावनाएँ भी।


Saturday, 5 October 2019

ब्रह्मांड बनने की तरतीब

ब्रह्मांड बनने की तरतीब
चंद्रभूषण
ब्रह्मांड की बनावट के कुछ सुराग अब वैज्ञानिकों की पकड़ में आने लगे हैं। उनकी मुश्किल का अंदाजा कैसे लगाया जाए? हमारी आकाशगंगा एक गैलेक्सी है जिसमें सूरज जैसे ढेरों तारे भरे हुए हैं। कितने? कम से कम 10 हजार करोड़, अधिक से अधिक 40 हजार करोड़। आकाशगंगा में ये तारे किस तरतीब से चलते-फिरते हैं, इसका एक मोटा खाका हमारे पास मौजूद है, हालांकि इसमें नए-नए ब्यौरे जुड़ते रहते हैं।

और ब्रह्मांड में हमारी आकाशगंगा जैसी कुल कितनी गैलेक्सियां हैं? हबल टेलिस्कोप ने इनकी तादाद का अनुमान 10 हजार करोड़ लगाया है लेकिन वैज्ञानिकों का आकलन है कि ज्यादा बेहतर टेलिस्कोप से यह 20 हजार करोड़ के आसपास निकलेगी। खगोलविज्ञानियों की मुश्किल ब्रह्मांड में इन गैलेक्सियों के वितरण की तरतीब खोजने से जुड़ी है।

ये एक-दूसरे से दूर भाग रही हैं। जो धरती से जितनी दूर है वह उतनी ही ज्यादा तेजी से दूर भाग रही है, यह जानकारी वैज्ञानिकों को काफी पहले से है। लेकिन गैलेक्सियों के बड़े-बड़े झुंड भी हैं- एक-एक में लाखों गैलेक्सियां! और क्लस्टर या सुपरक्लस्टर नाम के ये झुंड आपस में किसी व्यवस्थित ढांचे के तहत बंधे हैं, यह जानकारी 1987 से शुरू होकर अब तक नए-नए आश्चर्यों के साथ सामने आ रही है।

यूरोपियन सदर्न ऑब्जर्वेटरी में लिए गए एक हालिया प्रेक्षण में 12 अरब प्रकाशवर्ष दूर स्थित एक क्लस्टर एसएसए-22 के प्रेक्षण से इन क्लस्टरों के हाइड्रोजन गैस के विराट रेशों (फिलामेंट्स) का अंग होने की बात सामने आई है। करोड़ों प्रकाशवर्ष लंबे ये हाइड्रोजन फिलामेंट्स जहां-जहां एक-दूसरे को काटते हैं, वहीं गैलेक्सियों के झुंड नजर आते हैं।

Tuesday, 1 October 2019

बढ़ने लगा है कोयले का ग्लोबल कारोबार

फिर से बढ़ने लगा है कोयले का ग्लोबल कारोबार
चंद्रभूषण
पूरी दुनिया में कोयले के उत्पादन में इधर तेज बढ़ोतरी देखी जा रही है। सन 2001 से 2009 की शुरुआत तक लगातार बढ़ी तेल की कीमतों ने दुनिया को वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत के रूप में कोयले का उत्पादन बढ़ाने की तरफ मोड़ा था, जो 2009 से लगातार बढ़ता हुआ 2014 तक अपने पीक पर पहुंचा था। लेकिन फिर पर्यावरण संकट को लेकर विश्व स्तर पर गंभीर बातचीत शुरू हुई, जिसका असर कोयले के उत्पादन पर पड़ा और यह साल-दर-साल नीचे जाने लगा।

आंकड़ों पर गौर करें तो 2014 में कोयले का ग्लोबल प्रॉडक्शन 8 अरब 165 करोड़ टन था, जो 2015 में 7 अरब 861 करोड़ टन और 2015 में 7 अरब 460 करोड़ टन रह गया। लेकिन 2019 में इसे 7 अरब 727 करोड़ टन दर्ज किया गया है और लगभग सारे बड़े कोयला उत्पादक देशों का रुझान इसे बढ़ाने का ही है।इस सिलसिले में अभी सबसे ज्यादा ग्लोबल चर्चा अफ्रीका के छोटे से दक्षिणी मुल्क बोत्स्वाना में पहली बार निजी खदानें शुरू होने को लेकर है।

बमुश्किल 22-23 लाख आबादी वाला यह लैंड-लॉक्ड देश हाल तक दुनिया के कोयला नक्शे पर कहीं भी नहीं आता था। 1966 में इसे आजादी मिलने के थोड़ा ही पहले पता चला कि यहां की जमीन के नीचे हीरा, सोना जैसे बहुमूल्य पदार्थों के अलावा भारी मात्रा में कोयला भी है। लेकिन कालाहारी रेगिस्तान से होकर किसी खनिज को समुद्र तक पहुंचाना इतना मुश्किल और कूटनीतिक रूप से इतना उलझनों भरा था कि कोयला निकालने का काम यहां हाल-हाल तक सिर्फ एक छोटी सी सरकारी कंपनी शहरी जरूरतों के लिए बिजली बनाने भर को ही किया करती थी।

ये स्थितियां इधर अचानक बदल गई हैं। बीते वर्षों में बोत्स्वाना को लेकर एक अद्भुत जानकारी यह मिली कि यहां का कोयला भंडार 200 अरब टन से भी ज्यादा है। यानी यहां से ज्यादा कोयला सिर्फ अमेरिका के पास है। दूसरी बात यह कि इस कोयले को अब समुद्र के रास्ते कहीं और ले जाकर बेचना भी जरूरी नहीं है। बड़े ताप बिजली संयंत्र लगाकर यहां के कोयले से यहीं के यहीं भारी मात्रा में बनाई हुई बिजली आस-पास के देशों को ही बेची जा सकती है।

इससे भी बड़ी बात यह कि कोयले को सीधे डीजल में बदलकर उससे रेलगाड़ियां और कारें चलाई जा सकती हैं। इतनी सारी संभावनाएं अचानक सामने आने की सबसे बड़ी वजह यह है कि खाड़ी का इलाका लगातार तनाव में है और कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। बीच में ऐसा लगने लगा था कि अमेरिका में फ्रैक्टिंग से निकाला जा रहा तेल खाड़ी इलाके को तेल के मामले में अप्रासंगिक बना देगा, लेकिन यह आकलन गलत सिद्ध हुआ।

समस्या यह है कि कोयले से बनाई जाने वाली बिजली अपने पीछे बहुत बड़ा कार्बन फुटप्रिंट छोड़ती है। दूसरे शब्दों में कहें तो ग्लोबल वार्मिंग बढ़ाने में इसका योगदान बहुत ज्यादा है। रही बात कोयले से डीजल बनाने की तो अभी इस टेक्नॉलजी में महारत दक्षिण अफ्रीका को ही हासिल है। इस काम में तो कार्बन डाइऑक्साइड इतनी ज्यादा निकलती है कि कंपनियां ग्लोबल प्रतिबंध के डर से जल्दी इसमें हाथ ही नहीं डालतीं।

दुनिया में कोयला भंडार के लिहाज से भारत का मुकाम अमेरिका, रूस, चीन और ऑस्ट्रेलिया के बाद पांचवां और उत्पादन के लिहाज से चीन के बाद दूसरा है। हाल में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सम्मेलन में भारत का स्टैंड यह था कि उसे न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप की सदस्यता न मिलना ही कोयले पर उसकी अति-निर्भरता का सबसे बड़ा कारण है। लेकिन ऐसा कोई न कोई कारण बड़े कोयला भंडार वाले हर देश के पास है। नतीजा यह कि विश्व ऊर्जा परिदृश्य में कोयले का दखल निकट भविष्य में तेजी से बढ़ने वाला है।

Saturday, 28 September 2019

चंद्रमा की गंध !!

क्या आपको चंद्रमा की गंध का कुछ अंदाजा है?
चंद्रभूषण
आपसे अगर कोई धरती की गंध के बारे में पूछे तो शायद कुछ भी ठोस बताते न बने। यहां हर चीज की ही नहीं, हर जगह की भी अपनी एक अलग खास गंध है। बाकी चीजों को छोड़कर बात अगर सिर्फ हवा की गंध की करनी हो तो भी काम बहुत आसान नहीं होगा। आप गन्ध को लेकर सचेत हों तो जानते होंगे कि देश-दुनिया के हर इलाके की गंध हर मौसम में, यहां तक कि एक ही दिन के अलग-अलग वक्तों में भी बदलती रहती है। लेकिन हमारे पड़ोसी पिंड चंद्रमा को कम से कम गंध के मामले में तो इतना वैविध्य बिल्कुल ही हासिल नहीं है।

चंद्रमा के पास अपना एक बहुत बड़ा इलाका है- क्षेत्रफल के लिहाज से लगभग अपने एशिया महाद्वीप जितना बड़ा। चंद्रमा का क्षेत्रफल 3 करोड़ 79 लाख 30 हजार वर्ग किलोमीटर है जबकि तुर्की से लेकर जापान तक और साइबेरिया से लेकर इंडोनेशिया के ठेठ दक्षिणी छोर तक एशिया का इससे थोड़ा ही ज्यादा- 4 करोड़ 38 लाख 10 हजार वर्ग किलोमीटर। उतार-चढ़ाव (टोपोग्राफी) की विविधता चंद्रमा पर जबर्दस्त है- धरती से ज्यादा ऊंचे पहाड़ और यहां से ज्यादा गहरे गड्ढे। गर्मी-सर्दी की ऊंचाई और नीचाई में भी पृथ्वी चांद के मुकाबले में कहीं नहीं ठहरती । लेकिन मोटे आकलन के मुताबिक गंध के मामले में चंद्रमा हर जगह लगभग एक सा ही है।

लेकिन जरा ठहरिए। इसमें एक छोटी सी समस्या भी है। गंध का अंदाजा सांस खींचकर ही लगाया जा सकता है लेकिन चंद्रमा पर तो सांस लेने के लिए हवा ही नहीं है। वहां अभी तक पहुंचे कुल 19 इन्सानों (सब के सब अमेरिकी श्वेत पुरुष) में से एकमात्र वैज्ञानिक (भूगर्भशास्त्री) हैरिसन श्मिट (अपोलो-17) ने प्रत्यक्ष प्रेक्षण के जरिए दर्ज किए जा सकने वाले जो सामान्य वैज्ञानिक तथ्य चंद्रमा के बारे में इकट्ठा किए थे, उनमें से फोटो और दस्तावेजों के रूप में मौजूद लगभग हरेक की मूल प्रतियां नासा की एक लाइब्रेरियन को कबाड़ में फेंकी हुई मिलीं (संदर्भ, न्यू साइंटिस्ट, 26 जून 1993)। अमेरिका के सबसे चर्चित, सबसे प्रतिष्ठित वैज्ञानिक संस्थान की नजर में दुर्लभ वैज्ञानिक प्रेक्षणों की अहमियत इतनी ही है!

बहरहाल, श्मिट के प्रेक्षणों में चंद्रमा की गंध भी शामिल थी, जो उनके मुताबिक जंग लगे लोहे को करीब से सूंघने पर आने वाली गंध जैसी है। चंद्रमा में किसी किस्म की ज्वालामुखीय हलचल अभी बची है या नहीं, यह बहस अभी खत्म नही हुई है। जब-तब सतह पर नजर आ जाने वाली चमक अगर ऐसी ही हलचलों की निशानी हुई तो शायद कहीं-कहीं गंधक की महक वाली गैसों की गंध भी सूंघने को मिल जाए। लेकिन गंध के बारे में पक्की सूचना आज भी उतनी ही है जो अब से 47 साल पहले अपोलो-17 की सवारी करके लौटे हैरिसन श्मिट ने दी थी। जंग की बहुत हल्की गंध से गंधाता हुआ चांद।

छा रहे हैं विदेश के कारोबारी खेतिहर

छा रहे हैं विदेश के कारोबारी खेतिहर
चंद्रभूषण
पिछली मंदी से पहले दुनिया भर में दिखे ईंधन और खाद्य संकट ने इन दोनों क्षेत्रों में आपूर्ति को लेकर जो अफरा-तफरी पैदा की थी, उसका एक पहलू बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा दूसरे देशों में जाकर खेती की विशाल जमीनें हथियाने का भी था। जमीनों के सबसे ज्यादा विदेशी सौदे 2008-09 में ही हुए। फिर मंदी के नरम पड़ने के साथ ही माहौल पलटता गया और उस दौरान वाम दायरों के बीच ग्लोबल चर्चा में आया ‘लैंड ग्रैब’ का हल्ला देखते-देखते चर्चा से बाहर हो गया।

लेकिन बड़ी पूंजी के दायरे में आज भी इस बात को लेकर पूर्ण सहमति बनी हुई है कि अगले 50 वर्षों तक दुनिया की आबादी जिस हिसाब से बढ़ने वाली है, उस हिसाब से खाद्यान्नों, सब्जियों, फलों और मांस-मछली-अंडे की पैदावार नहीं बढ़ने वाली। शहरी दायरे और इन्फ्रास्ट्रक्चर का विस्तार तथा भूजल का खात्मा सघन आबादी वाली उपजाऊ जमीनों को दिनोंदिन सिमटाता जा रहा है। इस अघोषित बंजरीकरण से भी खान-पान की मुश्किलें आगे चलकर और बढ़ेंगी।

बुनियादी उत्पादन से जुड़ी इस तल्ख हकीकत को ध्यान में रखते हुए अगले दस सालों में विरल आबादी वाले देशों में बाहरी कंपनियों द्वारा विशाल फार्मों पर हाइली मेकेनाइज्ड खेती का चलन बढ़ने वाला है। ब्राजील की 11%, सूडान की 10%, मेडागास्कर, फिलीपीन्स और इथियोपिया की 8-8%, मोजांबीक की 7% और इंडोनेशिया की 6% जमीन इसके लिए प्रस्तुत है, जबकि रूस जैसे अपेक्षाकृत अमीर मुल्क ने भी अपने पूर्वी इलाकों की दसियों लाख एकड़ जमीनें चीनी कंपनियों को खेती के लिए भाड़े पर देने का फैसला किया है।

पूरी दुनिया में करीब 10 अरब एकड़ खेती की और इतनी ही जंगलात की जमीनें नापी गई हैं। खेतिहर जमीनों का एक फीसदी यानी 10 करोड़ एकड़ या तो विदेशी हाथों में जा चुका है या जाने वाला है। इस आपाधापी में काफी सारे जंगलों का भी बंटाधार होने की आशंका जताई जा रही है। और इन जमीनों पर जो लोग खेती करके पहले से गुजारा कर रहे होंगे, स्थानीय सरकार और अरबों डॉलर की हैसियत वाली फूड प्रोसेसिंग कम्पनियां आपसी समझदारी से उन्हें कुछ मुआवजा देकर या यूं ही वहां से उनका नामोनिशान मिटा देंगी।

तारों के बीच से दूसरा मेहमान

तारों के बीच से दूसरा मेहमान
चंद्रभूषण
1आई/औमुआमुआ के बाद 2आई/बोरिसोव। आई यानी इंटरस्टेलर, तारों के बीच वाली जगह से आई हुई चीज। दो साल में ही सौरमंडल के बाहर, सितारों की दुनिया से दूसरे मेहमान का अपने इलाके में आना एक मायने में खुशी की बात है तो दूसरे मायने में चिंता का सबब भी है। क्या ये पहले भी आते थे और बिना दर्ज हुए चुपचाप निकल जाते थे? या हमारा सूरज अभी आकाशगंगा के किसी ऐसे इलाके में है, जहां इधर-उधर भटक रहे छोटे पिंडों की भरमार है?

इनमें दूसरी वाली आशंका काफी समय से जताई जा रही है। जो उल्कापिंड और पुच्छल तारे सौरमंडल के भीतर से आते हैं- फिर चाहे उनके आने की जगह कितनी भी अजीब क्यों न हो- उनसे निपटने का कुछ न कुछ उपाय किया जा सकता है। लेकिन इस तरह झपटकर कहीं से भी आ जाने वाले पिंडों का पता ही इतनी देर में लगता है कि उनका निशाना सीधे धरती की तरफ हो तो महाविनाश से बचने के लिए हम कुछ कर नहीं सकते।

2आई/बोरिसोव को ही लें तो इसकी शक्ल-सूरत किसी पुच्छल तारे जैसी है, लेकिन इसका रास्ता इतना अजीब है कि ऐसी कोई भी चीज खगोलशास्त्र के पूरे इतिहास में कभी दर्ज नहीं की गई थी। इसकी रफ्तार 32 किलोमीटर प्रति सेकंड (सबसे तेज रॉकेट की मैक्सिमम स्पीड की कोई तीन गुनी) है और एक्सेंट्रिसिटी 3.5 है जबकि औमुआमुआ की स्पीड कोई 26 किलोमीटर प्रति सेकंड और एक्सेंट्रिसिटी 1.2 थी। सूरज से धरती की दोगुनी दूरी से यह तीर की तरह अपने रास्ते पर बढ़ जाएगा, लेकिन इसका कोई भाई-बंधु अगर धरती की तरफ लपक पड़ा तो?