Sunday, 26 May 2019

बच्चों को चाहिए स्क्रीन से आजादी

इन्हें चाहिए स्क्रीन से आजादी
How to handle Kid’s Mobile Addiction

तकनीक की दुनिया के सबसे कामयाब नामों में शुमार बिल गेट्स से लेकर स्टीव जॉब्स तक ने कम उम्र में अपने बच्चों को गैजट्स से दूर रखा। दूसरी ओर, हमारे बच्चों को स्क्रीन की लत लग गई है। डब्ल्यूएचओ की सलाह है कि छोटे बच्चों को एक घंटे से ज्यादा स्क्रीन न देखने दें। एक्सपर्ट्स से पूछकर स्क्रीन, खासकर मोबाइल की लत से निजात पाने के टिप्स दे रही हैं प्रियंका सिंह

एक्सपर्ट्स पैनल
शिव खेड़ा, मशहूर लेखक और मोटिवेशनल स्पीकर
अरुणा ब्रूटा, सीनियर साइकॉलजिस्ट
डॉ. समीर पारिख, डायरेक्टर, मेंटल हेल्थ, फोर्टिस गीतांजलि शर्मा, सीनियर काउंसलर

मोनिका ने 8 साल के बेटे ध्रुव को पिछले साल मोबाइल लाकर दिया ताकि ऑफिस में रहने के दौरान ध्रुव से संपर्क बना रहे। कुछ महीनों में ही मोनिका ने ध्रुव के बर्ताव में एक अजीब-सा बदलाव देखा। मेड ने मोनिका को बताया कि ध्रुव अक्सर मोबाइल में ही लगा रहता है। मोबाइल के लिए मना करो तो टीवी खोलकर बैठ जाता है। खाना खाने और होमवर्क के लिए भी आसानी से तैयार नहीं होता। यहां तक कि मोनिका के ऑफिस से आने के बाद भी ध्रुव ज्यादातर मोबाइल से ही चिपका रहता है। बेटे का यह हाल देख मोनिका ने फौरन एक अच्छे चाइल्ड काउंसलर की मदद ली। कुछ महीनों की काउंसलिंग और मोनिका की कोशिशों के बाद ध्रुव ने मोबाइल और टीवी पर वक्त बिताना काफी कम कर दिया है और अब वह ज्यादा खुश नजर आता है। इसके लिए मोनिका ने न सिर्फ खुद ज्यादा-से-ज्यादा वक्त ध्रुव के साथ बिताना शुरू किया बल्कि ध्रुव को ज्यादा दोस्त बनाने के लिए भी प्रेरित किया। साथ ही, उसकी पसंद के अनुसार उसे टेनिस और पेंटिंग क्लास भी जॉइन करा दी।

इसी तरह एक नामी साइकॉलजिस्ट के पास हाल ही में एक लड़की का केस आया। वह दिन भर फेसबुक और इंस्टाग्राम पर लगी रहती थी और कोई भी फोटो शेयर करने के बाद बार-बार देखती थी कि कितने लाइक मिले। सोशल मीडिया की लत की वजह से गौरी की पढ़ाई और सेहत पर बुरा असर पड़ रहा था। वह घर में किसी से बात भी नहीं करती थी। दिन भर वह अपने कमरे में मोबाइल पर सोशल मीडिया से चिपकी रहती थी। साइकॉलजिस्ट और पैरंट्स की कोशिशों से गौरी ने धीरे-धीरे मोबाइल की लत से छुटकारा पा लिया।

ये सिर्फ 2 मामले हैं, लेकिन बच्चों का मोबाइल से चिपके रहना घर-घर की समस्या बन गई है। आज बच्चे बहुत ज्यादा वक्त मोबाइल, टैबलेट, लैपटॉप, टीवी आदि पर बिता रहे हैं जोकि उनके शारीरिक और मानसिक विकास से लेकर परिवार के ताने-बाने तक के लिए खतरे की घंटी है। अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन की रिपोर्ट के अनुसार, 2 साल की उम्र तक के बच्चे भी रोजाना 3 घंटे तक मोबाइल पर बिता रहे हैं। इंग्लैंड की नैशनल हैंडराइटिंग असोसिएशन की एक रिसर्च का निष्कर्ष है कि 2 साल से कम उम्र के 58% बच्चे मोबाइल से खेलते हैं। ऐसे बच्चे पेंसिल पकड़ने, लिखने और ड्रॉइंग करने में कमजोर हो रहे हैं। इससे उनका हैंडराइटिंग का हुनर देर से विकसित हो रहा है। मोबाइल के ज्यादा इस्तेमाल से उनके हाथों की मांसपेशियां कमजोर हो रही हैं। हाल ही में डब्ल्यूएचओ ने पैरंट्स को सलाह दी है कि 2 से 5 साल तक के बच्चों को एक घंटे से ज्यादा टीवी, मोबाइल या कंप्यूटर न देखने दें। वैसे बेहतर यह है कि इस उम्र के बच्चों को मोबाइल से पूरी तरह दूर ही रखा जाए।

अब सवाल उठता है कि आखिर बच्चों को मोबाइल के जाल से कैसे बाहर निकालें? एक्सपर्ट्स की मानें तो थोड़ी कोशिशों से ऐसा करना मुमकिन है। जरूरी नहीं कि हर मामले में साइकॉलजिस्ट या काउंसलर की जरूरत पड़े, लेकिन पैरंट्स को जरूर वक्त रहते बच्चों पर ध्यान देना चाहिए ताकि वे मोबाइल की लत से बच सकें। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि मोबाइल के लत से मतलब फोन पर बातें करने से नहीं बल्कि स्क्रीन के इस्तेमाल यानी इंटरनेट सर्फिंग या सोशल मीडिया पर वक्त बिताने से है। परेशानी की बात यह भी है कि बच्चों को टीवी या मोबाइल से जो मानसिक खुराक मिल रही है, उससे वे ज्यादा हिंसक और असंवेदनशील हो रहे हैं। वे इंसानों के मुकाबले गैजट्स के साथ ज्यादा सुकून महसूस करते हैं। यह परिवार और रिश्तों के ताने-बाने के लिए सही नहीं है।

शौक से लत तक
बच्चे जब छोटे होते हैं तो अक्सर पैरंट्स खुद ही उनके हाथ में मोबाइल थमा देते हैं, कभी खाना खिलाने के लालच में तो कभी अपना काम पूरा करने के लिए तो कभी बच्चों को कविता, डांस आदि सिखाने के लिए। इस तरह धीरे-धीरे उन्हें मोबाइल देखने में मजा आने लगता है और वे इसका आदी हो जाते हैं। शुरुआती शौक कब लत या अडिक्शन में तब्दील हो जाता है, पता ही नहीं चलता। दरअसल, स्क्रीन अडिक्शन भी वैसी ही लत है जैसे किसी नशे की लत होती है। एक्सपर्ट्स इसे भी ड्रग्स, अल्कोहल, जुआ आदि की तरह ही क्लिनिकल इंपल्सिव डिसऑर्डर मानते हैं यानी किसी काम को करने से खुद को नहीं रोक पाना। जब मोबाइल या टीवी पर लगे रहना बच्चे के रुटीन कामों, मसलन नींद, भूख, होमवर्क, सेहत आदि पर असर डालने लगे और आप चाहकर भी स्थिति को बेहतर नहीं कर पाएं तो समझ जाइए कि खतरे की घंटी बज चुकी है। ऐसे में फौरन एक्सपर्ट यानी काउंसलर या साइकॉलजिस्ट की मदद लें।

रोजाना कितनी देर मोबाइल?
यह कहना बहुत मुश्किल है कि बच्चे रोजाना कितनी देर तक मोबाइल का इस्तेमाल कर सकते हैं। कोशिश करें कि 3-4 साल तक बच्चों को मोबाइल से दूर ही रखें। ऐसा करना मुमकिन न हो पा रहा हो तो भी इस उम्र के बच्चों को 30-60 मिनट से ज्यादा मोबाइल इस्तेमाल न करने दें। इसके अलावा, 5 साल से 12 साल तक के बच्चे को भी 90 मिनट से ज्यादा स्क्रीन नहीं देखना चाहिए। यह अवधि टीवी, मोबाइल, कंप्यूटर सब मिलाकर है। इससे बड़े बच्चों (12 से 17 साल) के लिए जरूरी होने पर यह वक्त थोड़ा बढ़ा सकते हैं, लेकिन यह किसी भी कीमत पर दो घंटे से ज्यादा न हो।

स्क्रीन की लत के लक्षण
बर्ताव में बदलाव
- हमेशा मोबाइल से चिपके रहना
- मोबाइल मांगने पर बहाने बनाना या गुस्सा करना
- दूसरों के घर जाकर भी मोबाइल पर ही लगे रहना
- दूसरों से कटे-कटे रहना
- टॉइलट में मोबाइल लेकर जाना
- बेड में साइड पर मोबाइल रखकर सोना
- खेल के मैदान भी मोबाइल साथ ले जाना
- पढ़ाई और खेलकूद में मन न लगना
- पढ़ाई में नंबर कम आना
- ऑनलाइन फ्रेंड्स ज्यादा होना
- नहाने, खाने में बहानेबाजी करना

शारीरिक परेशानी
- नींद पूरी न होना
- वजन बढ़ना
- सिरदर्द होना
- भूख न लगना
- साफ न दिखना
- आंखों में दर्द रहना
- उंगलियों और गर्दन में दर्द होना

मानसिक समस्याएं
- ज्यादा संवेदनशील होना
- काम की जिम्मेदारी न लेना
- हिंसक होना
- डिप्रेशन और चिड़चिड़ापन होना
नोट: ये लक्षण दूसरी बीमारियों के भी हो सकते हैं। ऐसे में बर्ताव में बदलाव के साथ यह देखना भी जरूरी है कि बच्चा कितना वक्त मोबाइल पर बिताता है और क्या वाकई उसका असर बच्चे पर नजर आ रहा है?

बच्चों को कैसे बचाएं लत से
1. खुद बनें उदाहरण
बच्चे हमेशा वही सीखते हैं जो देखते हैं। ऐसे में आपको बच्चों के सामने रोल मॉडल बनना होगा। बच्चों के सामने मोबाइल, लैपटॉप या टीवी का कम-से-कम इस्तेमाल करें। अगर मां या पिता ने एक हाथ में बच्चा पकड़ा है और दूसरे में मोबाइल पर बात कर रहे हैं तो बच्चे को यही लगेगा कि मोबाइल और वह (बच्चा) बराबर अहमियत रखते हैं। ऐसा करने से बचें। अगर मदर होममेकर हैं तो कोशिश करें कि मोबाइल पर बातचीत या चैटिंग आदि तभी ज्यादा करें जब बच्चे घर पर न हों। सोशल मीडिया के लिए भी एक सीमा और वक्त तय कर लें। वर्किंग हैं तो घर पहुंचने के बाद बहुत जरूरी हो तभी मोबाइल देखें या फिर कोई कॉल आ रही हो तो उसे पिक करें। सुबह उठकर पहले बच्चों और खुद पर ध्यान दें, फिर मोबाइल देखें। अक्सर पैरंट्स अपना काम निपटाने के लिए बच्चों को मोबाइल थमा देते हैं। यह तरीका भी सही नहीं है। ऐसा कर आप अपने लिए फौरी राहत तो पा लेते हैं, लेकिन बच्चे को गैजट की ओर धकेल रहे होते हैं।

2. बनाएं गैजट-फ्री जोन
घर में एक एरिया ऐसा हो जहां गैजट लेकर जाने की इजाजत किसी को न हो। यह डाइनिंग या स्टडी एरिया हो सकता है। डिनर, लंच या ब्रेकफास्ट का वक्त पूरी तरह से फैमिली टाइम होना चाहिए। खाने के वक्त अक्सर पैरंट्स बच्चों के लिए टीवी ऑन कर देते हैं या मोबाइल दे देते हैं। यह गलत है। इससे बच्चे का ध्यान बंटता है और खाने का पोषण पूरा नहीं मिल पाता। साथ ही, उसका कंसंट्रेशन भी कमजोर होता है। इसी तरह, सोने से कम-से-कम एक घंटा पहले घर में डिजिटल कर्फ्यू लगा दें, मतलब मोबाइल और टैब्लेट जैसी चीजों से खुद भी दूर रहें और बच्चों को भी दूर रखें। बच्चा जब यह देखेगा तो वह खुद भी मोबाइल का इस्तेमाल जरूरत पड़ने पर ही करेगा।

3. बच्चों के साथी बनें
आजकल बहुत-से घरों में सिंगल चाइल्ड का चलन है। ऐसे में बच्चा अकेलापन बांटने के लिए मोबाइल या टैबलेट आदि का इस्तेमाल करने लगता है जोकि धीरे-धीरे लत बन जाती है। ऐसी स्थिति से बचने के लिए आप घर में बच्चे के साथ क्वॉलिटी टाइम बिताएं। उसके साथ कैरम, लूडो, ब्लॉक्स, अंत्याक्षरी, पजल्स जैसे खेल खेलें। बच्चे को जितना मुमकिन हो, गले लगाएं ताकि उसे फिजिकल टच की अहमियत पता हो और वह महसूस कर सके कि किसी करीबी के छूने में जो गर्माहट है वह सोशल मीडिया की दोस्ती में नहीं। जब बच्चा स्कूल से घर आए तो उससे स्कूल की बातें सुनें, उसकी पसंद-नापसंद के बारे में जानें, उसके दोस्तों के बारे में बातें करें। हो सके तो बीच-बीच में उसके दोस्तों को घर पर बुलाएं। इस तरह की चीजों से बच्चे और पैरंट्स के बीच का रिश्ता बेहतर होता है और वह मोबाइल के बजाय सकारात्मक चीजों से जुड़ता है।

4. लालच न दें
अक्सर पहली बार पैरंट्स ही बच्चे को फोन पकड़ाते हैं और यह देखकर खुश होते हैं कि हमारा बच्चा कितना स्मार्ट है। लेकिन यही छोटी-सी गलती आगे जाकर बुरी आदत बन जाती है। इसके अलावा, कई बार पैरंट्स बच्चों से कहते हैं कि फटाफट होमवर्क कर लो तो फिर मोबाइल मिल जाएगा या खाना खाओगे तो मोबाइल देखने को मिलेगा। इस तरह की शर्तें बच्चों के सामने नहीं रखनी चाहिए। इससे बच्चे लालच में फटाफट काम तो निपटा लेते हैं, लेकिन उनका सारा ध्यान मोबाइल पर ही लगा रहता है। उन्हें ब्लैकमेलिंग की आदत भी पड़ती है कि फलां काम करने पर फलां चीज मिलेगी। वे खुद भी इस ट्रिक को दूसरों पर इस्तेमाल करने लगते हैं। अगर बाद में पैरंट्स मोबाइल न दें तो बच्चे को मां-बाप पर गुस्सा आने लगता है।

5. आउटडोर गेम्स में लगाएं
बच्चों के साथ मिलकर वॉक करें, योग करें या दौड़ लगाएं। बच्चों को रोजाना कम-से-कम एक घंटे के लिए पार्क ले जाएं। वहां उन्हें दौड़ने, फुटबॉल, बैडमिंटन आदि फिजिकल गेम्स खेलने के लिए प्रेरित करें। पैरंट्स खुद भी उनके साथ गेम्स खेलें। टग ऑफ वॉर, आंख मिचौली जैसे गेम भी खेल सकते हैं, जिन्हें खेलने के लिए ज्यादा कोशिश भी नहीं करनी पड़ती। यों भी विशेषज्ञों का कहना है कि अगर बच्चे रोजाना दो घंटे सूरज की रोशनी में खेलते हैं तो उनकी आंखें कमजोर होने से बच सकती हैं। इसके अलावा, मुमकिन हो तो बच्चे को उसकी पसंद के किसी खेल (क्रिकेट, फुटबॉल, टेनिस, बैडमिंटन आदि) की कोचिंग दिलाएं। इससे वह फिजिकली ज्यादा ऐक्टिव होगा और मोबाइल से भी दूर रहेगा।

6. हॉबी का सहारा लें
बच्चों की कई हॉबीज़ होती हैं जैसे कि पेंटिंग, डांस, म्यूजिक, रोबॉटिक्स, क्ले मॉडलिंग आदि। बच्चे की पसंद को देखते हुए हॉबी क्लास जॉइन करवाएं, खासकर अगर दोनों पैरंट्स वर्किंग हैं तो यह जरूरी है। इससे बच्चा घर में ज्यादा वक्त अकेला या मेड के साथ रहने को मजबूर नहीं होगा। क्लास में वह अपनी पसंद की चीज तो सीखेगा ही दूसरे बच्चों के साथ घुलने-मिलने से उसका आत्मविश्वास भी बढ़ेगा। यह भी मुमकिन है कि आगे जाकर वह अपनी हॉबी में भी बहुत अच्छा करने लगे और वह एक करियर ऑप्शन बन जाए।

7. घर के काम में हाथ बंटवाएं
घर के कामों में बच्चों की उनकी क्षमता के अनुसार मदद लें। इससे बच्चे आत्मनिर्भर बनेंगे और खाली समय मोबाइल पर बिताने के बजाय कुछ व्यावहारिक चीजें सीखेंगे। कपड़े फोल्ड करना, पानी की बोतल भरना, कमरा सेट करना, पौधों में पानी डालना, अलमारी लगाना जैसे काम बच्चे खुशी-खुशी कर सकते हैं। इन कामों में पैरंट्स बच्चों की मदद ले सकते हैं। इससे पैरंट्स पर काम का बोझ थोड़ा कम होगा और बच्चे आत्मनिर्भर भी बनेंगे।

8. किताबों से दोस्ती कराएं
बच्चों को फोन के बजाय किताबों की ओर ज्यादा ध्यान देने के लिए प्रेरित करें। उन्हें अच्छी स्टोरी बुक लाकर दें और उनसे कहानियां सुनें। जब बच्चों को स्टोरी बुक या कोई और बुक पढ़ने के लिए दें तो खुद भी कोई किताब पढ़ें। ऐसा न हो कि आप टीवी या लैपटॉप खोलकर बैठ जाएं या मोबाइल पर बातें करने लगें। आपको किताब के साथ देखकर उसका भी मन पढ़ाई में लगेगा। बच्चों को रात में सोने से पहले कुछ पॉजिटिव पढ़ने को कहें, फिर चाहे 2 पेज ही क्यों न हों। इससे नींद भी अच्छी आएगी।

9. पेट से कराएं दोस्ती
बच्चों को डॉग जैसा पालतू जानवर लाकर दें। इससे बच्चे केयर करना और दूसरों की भावनाओं को बेहतर तरीके से समझने लगते हैं। अगर ममा-पापा, दोनों वर्किंग हैं तो पेट बच्चे का अच्छा साथी साबित होता है। डॉग को खाना देना, उसकी साफ-सफाई का ध्यान रखना, उसे घुमाना जैसे काम करने से बच्चा बिजी तो रहता ही है, साथ ही उसे कई चीजों की प्रैक्टिकल जानकारी भी हो जाती है।

10. प्राथमिकताएं तय करें
अपनी और अपने परिवार की प्राथमिकताएं तय करें। जितने टाइम सेविंग डिवाइस आज हैं, उतना ही टाइम कम हो गया है लोगों के पास। इसकी वजह यही है कि हमने प्राथमिकताएं तय नहीं की हैं। आजकल अत्यावश्यक (अर्जेंट) और अहम (इम्पॉर्टेंट) के बीच फर्क खत्म हो गया है। इसे ऐसे समझ सकते हैं कि सेहत अहम है, लेकिन अर्जेंट नहीं है इसलिए हम नजरअंदाज कर देते हैं। रिश्ते अहम हैं, लेकिन अर्जेंट नहीं हैं इसलिए पीछे छूट जाते हैं। ऐसे में प्राथमिकताएं तय करें और सेहत और रिश्तों को टॉप पर रखें। वैसे भी जिंदगी में बैलेंस बहुत जरूरी है। कोई भी चीज कितनी भी जरूरी क्यों न हो, अगर ज्यादा हो जाए तो वह नुकसान ही हो जाएगा। साथ ही, बच्चे के साथ मिलकर जिंदगी का लक्ष्य तय करें और वह लक्ष्य कुछ ऐसा हो जिसमें दूसरों के लिए भी कुछ करने का भाव हो। इससे बच्चा इधर-उधर वक्त बिताने के बजाय अपने लक्ष्य पर फोकस करता है।

ये ऐप्स भी कारगर
Mama Bear (Spyware)
Norton Family parental control
mSpy
Quality Time
ये ऐप एंड्रॉयड और iOs, दोनों के लिए हैं। इस तरह के ऐप इस बात पर निगरानी रखते हैं कि बच्चा किस किस वेबसाइट पर कितनी देर बिताता है तो Qustodio premier, Cracked Screen Prank जैसे ऐप एक तय टाइम पर मोबाइल की स्क्रीन में क्रैक जैसा लुक दे देता है। क्रैक्ड स्क्रीन देखकर अक्सर बच्चा मोबाइल छोड़ देता है। छोटे बच्चे पर इसे अपना सकते हैं।

डिजिटल डी-टॉक्सिफिकेशन जरूरी
अपने घर के लिए डिजिटल डी-टॉक्सिफिकेशन का नियम बनाएं। हर हफ्ते में एक दिन और महीने में कुल 4 दिन गैजट फ्री रहें। सुनने में यह मुश्किल जरूर लगता है, लेकिन ऐसा करना मुमकिन है। इस दौरान आप मोबाइल का स्विच ऑफ रखें या उसे फ्लाइट मोड पर रखें। इस दौरान साथ मिलकर ऐक्टिविटी करें। फैमिली के साथ मिलकर गेम्स खेलें। शुरुआत आप दो घंटे से कर सकते हैं। फिर धीरे-धीरे टाइम बढ़ा सकते हैं। इस दौरान जरूरी कॉल होगा तो लैंडलाइन पर आ जाएगा। अगर लैंडलाइन नहीं है तो मिस्ड कॉल का मेसेज मिल जाएगा। 2 घंटे बाद जाकर मोबाइल देखें और अगर कोई जरूरी कॉल लगे तो पलटकर फोन मिला लें। दरअसल, लोग अक्सर मन को बहलाने के लिए चैटिंग या सोशल मीडिया सर्फिंग शुरू कर देते हैं या टीवी देखने लगते हैं। इन सबमें मजा जरूर आ सकता है, लेकिन दिमाग को आराम नहीं मिलता बल्कि उसका और ज्यादा इस्तेमाल होने लगता है। आराम नहीं मिलने से दिमाग थक जाता है। इससे चिड़चिड़हाट होगी और कंसंट्रेशन नहीं होगा। गलतियां भी ज्यादा होंगी।

आजमाएं इसे
आज से आप भी अपने और अपने परिवार को हफ्ते में एक दिन डिजिटल डी-टॉक्सिफाई करना शुरू करें। आज आप इसके लिए 2 घंटे का वक्त तय कर सकते हैं। इस बीच टीवी, मोबाइल, लैपटॉप आदि गैजट के बजाय फैमिली के साथ फन टाइम बिताएं। आपने अपने परिवार के साथ कैसे वक्त बिताया, हमें लिखें
साभार संडे एनबीटी

Saturday, 4 May 2019

नए नीले की खोज

नए नीले की खोज
चंद्रभूषण
अमेरिकी केमिकल कंपनी ड्यूपॉन्ट में काम करते हुए बहुतेरे पेटेंट अपने नाम कर चुके भारतीय रसायनज्ञ मैस सुब्रह्मण्यन 2006 में कंपनी छोड़कर ओरेगॉन स्टेट यूनिवर्सिटी पहुंचे तो वहां मल्टीफेरोइक मटीरियल पर काम शुरू किया। एक ऐसा संश्लिष्ट पदार्थ, जिसमें उच्चकोटि की इलेक्ट्रॉनिक और चुंबकीय क्षमता मौजूद हो।

वहां समुद्री जीवों का अध्ययन छोड़कर केमिस्ट्री पढ़ने गए उनके चेले ऐंड्रू स्मिथ ने उन्हीं की सोच का अनुसरण करते हुए यट्रियम ऑक्साइड, इंडियम ऑक्साइड और मैंगनीज ऑक्साइड को साथ पीसकर मिश्रण को अवन में गरम किया तो उन्हें एक चटख नीला पाउडर मिला।

सुब्रह्मण्यन को लगा कि स्मिथ ने जरूर कुछ गड़बड़ की है। लेकिन फिर उन्हें अपने एक पुराने सहकर्मी की कही बात याद आई कि नीला रंग सृष्टि की दुर्लभ रचना है। फिर नए केमिकल के नमूने दुनिया भर की लैब्स में भेजे गए तो पता चला कि नीले रंग का यह शेड प्राकृतिक या संश्लिष्ट, किसी भी अवस्था में संसार में कहीं भी मौजूद नहीं है।

मैस सुब्रह्मण्यन ने तीनों ऑक्साइडों के मूल तत्वों यट्रियम, इंडियम और मैंगनीज के रासायनिक सूत्रों को जोड़कर इसे यिनमिन ब्लू का नाम दिया और इसके थोड़े ही समय बाद, सन 2009 में ऑस्ट्रेलिया की शेफर्ड कलर कंपनी ने इस रंग के इस्तेमाल का लाइसेंस ले लिया। फिलहाल वह काफी महंगे दाम पर इसे चित्रकारों को बेच रही है।

संसार के सबसे सुंदर नीले रंग के रूप में विख्यात यिनमिन ब्लू की 40 एमएल वाली ट्यूब 130 डॉलर (करीब साढ़े नौ हजार रुपये) में आती है। ऐसे में इस खास कलर की कोई कार या फ्रिज जल्दी आपको शायद ही देखने को मिले।

Saturday, 20 April 2019

ब्लैक होल के खुलते राज

"अगले 20 साल में खुल जाएंगे ब्रह्मांड के कई बड़े राज"
खगोल विज्ञानी प्रियंवदा नटराजन से राजेश मित्तल की बातचीत

पिछले हफ्ते गुरुवार को ब्लैक होल की पहली तस्वीर जारी हुई। यह ब्लैक होल हमारी धरती से करीब 30 लाख गुना बड़ा है। इससे विराट ब्रह्मांड की अनसुलझी गुत्थियां फिर से चर्चा में आ गई हैं। आइए, पहले हम ब्रह्मांड यानी यूनिवर्स के बारे में अपनी बुनियादी समझ दोहरा लेते हैं और फिर इसके बारे में एक शीर्ष विज्ञानी से बातचीत करते हैं।

हमारी धरती सूरज के चारों ओर घूमती है। दूसरे 7 ग्रह भी सूरज के चक्कर लगाते हैं। सूरज, उसके आठों ग्रहों (प्लैनेट्स), उनके चंद्रमाओं आदि को मिलाकर हम सौरमंडल (सोलर सिस्टम) कहते हैं। हमारे सूरज जैसे ढेरों तारे हैं जो हमें रात में आसमान में दिखाई देते हैं। इन तारों के समूह को आकाशगंगा (गैलक्सी) कहते हैं। हमारी वाली आकाशगंगा का नाम मंदाकिनी (मिल्की वे) है जिसमें हमारी धरती, हमारे वाला सूरज, दूसरे कई तारे, उनके ग्रह, उपग्रह, धुएं और धूल के विशाल बादल आदि शामिल हैं। कई आकाशगगाएं मिलकर कलस्टर बनाती हैं। कई कलस्टरों से मिलकर सुपर कलस्टर बनता है। कई सुपर कलस्टर मिलकर ब्रह्मांड (यूनिवर्स) का निर्माण करते हैं।

ब्रह्मांड में जब हम बेहतरीन से बेहतरीन दूरबीन (टेलिस्कोप) से देखते हैं तो ज्यादा से ज्यादा 13.8 अरब प्रकाशवर्ष पुरानी आकाशगंगाओं के दर्शन हमें होते हैं। लेकिन इससे यह नतीजा निकालना गलत होगा कि यह ब्रह्मांड 13.8 अरब प्रकाशवर्ष बड़ा है। वजह, ब्रह्मांड लगातार फैल रहा है। इसलिए 13.8 अरब वर्ष पुरानी जो आकाशगगाएं हम देख रहे होते हैं, असल में वे आकाशगगाएं इस समय खिसक कर हमसे करीब 46.5 अरब प्रकाशवर्ष दूर जा चुकी होती हैं। यानी वर्तमान में ब्रह्मांड का फैलाव 46.5 अरब प्रकाशवर्ष (93 अरब प्रकाशवर्ष व्यास) तक हो चुका है। प्रकाशवर्ष वह पैमाना है जिसके जरिए हम लंबी दूरियां नापते हैं। प्रकाशवर्ष से इसलिए कि इस ब्रह्मांड में सबसे तेज रफ्तार रोशनी की है। रोशनी 1 सेकंड में करीब 3 लाख किलामीटर का फासला तय कर लेती है। एक साल में रोशनी जितनी दूरी तय करती है, उसे पैमाना बनाकर दूरी को प्रकाशवर्ष में नापा जाता है। तो 93 अरब प्रकाशवर्ष बड़ा ब्रह्मांड भी ब्रह्मांड की सीमा नहीं है। पूरा ब्रह्मांड हमें दिखाई देने वाले ब्रह्मांड से काफी बड़ा है। इसका कोई ओर-छोर नहीं। यह ब्रह्मांड अनंत है। ऐसा माना जाता है कि हमारे ब्रह्मांड जैसे भी ढेरों ब्रह्मांड हैं।

हमारे वाला ब्रह्मांड कैसे बना, इस बारे में अंतिम रूप से प्रमाणित तथ्य फिलहाल विज्ञान के पास नहीं हैं। कई थिअरी हैं। सबसे स्थापित थिअरी बिग बैंग को ब्रह्मांड का शुरुआती चरण मानती है। इसके मुताबिक, किसी वक्त ब्रह्मांड एक परमाणु से भी छोटा था। सूक्ष्म बिंदु में करीब 140 करोड़ साल पहले महाविस्फोट हुआ। इसे ही बिग बैंग कहते हैं। विस्फोट से बिंदु टुकड़े-टुकड़े होकर इधर-उधर छिटकने लगा। इसी से ब्रह्मांड की शुरुआत हुई। आकाशगंगाएं, तारे, ब्लैक होल, ग्रह आदि बने। लेकिन ब्रह्मांड के फैलने का सिलसिला अब भी लगातार जारी है। लगता था कि एक समय इसका फैलना बंद हो जाएगा और यह वापस एक बिंदु में समा जाएगा। लेकिन 1998 में हबल टेलीस्कोप की वजह से पता चला कि ब्रह्मांड जिस रफ्तार से यह फैल रहा है, वह रफ्तार भी लगातार बढ़ रही है। यानी कोई बाहरी ताकत है। वैज्ञानिकों का मानना है कि एेसा डार्क एनर्जी के कारण हो रहा है। यह डार्क एनर्जी हमारे आसपास हर जगह मौजूद है। पर यह हमें दिखाई नहीं देती। इसीलिए इसे हम डार्क कहते हैं। इसे हम न तो माप सकते हैं और न ही इसकी जांच कर सकते हैं। हां, इसका असर हमें महसूस होता है। यह खाली जगहों पर पाई जाती है।

दरअसल यह ब्रह्मांड जितना हमें दिखता है, वह समूचे ब्रह्मांड का सिर्फ 5 फीसदी हिस्सा ही है। बाकी 95 फीसदी अदृश्य है। इसमें से डार्क एनर्जी 68 फीसदी है। बाकी 27 फीसदी डार्क मैटर है जिसे सन 1933 में खोजा गया था। यह अणु-परमाणु से न बना होकर ऐसे जटिल और अनोखे कणों से बना है जिनके बारे में हमें अभी तक पता नहीं चला है। इस ब्रह्मांड में जितनी भी चीजें हमें दिखाई देती हैं, वे सब या तो खुद रोशनी फेंकती हैं या फिर रोशनी रिफ्लेक्ट करती हैं लेकिन डार्क मैटर ये दोनों ही काम नहीं करता। इसलिए इसे देखना मुमकिन नहीं। तभी यह डार्क मैटर कहलाता है। पर इसका असर दिखता है। दरअसल डार्क मैटर ही इतनी ताकतवर ग्रेविटी पैदा करता है कि हर आकाशगंगा के सभी तारे उसी आकाशगंगा में बंधे रहते हैं। वे इधर-उधर नहीं बिखरते।

कुल मिलाकर डार्क मैटर ब्रह्मांड को बांधे रखने का काम करता है जबकि डार्क एनर्जी ब्रह्मांड का लगातार विस्तार करती रहती है। इस वजह से हर आकाशगंगा का एक-दूसरे से फासला बढ़ता जाता है। इसी ब्रह्मांड में ब्लैक होल नाम की ऐसी चीज भी है जो अपने दायरे में आने वाली हर चीज को निगल जाती है। ऐसा उसकी ग्रैविटी के जबरदस्त खिंचाव के कारण होता है। इस पर भौतिकी के नियम लागू नहीं होते। ब्लैक होल के बाहरी हिस्से को इवेंट हॉराइज़न कहते हैं। ब्लैक होल की खोज सन 1964 में हुई थी। इसे हम अंतरिक्ष में बनी गहरी खाई भी कह सकते हैं। जैसे चादर में छेद, जैसे मौत का कुआं, जैसे कुप्पी की बनावट, जैसे पानी से भरी बाल्टी में हाथों से घुमाकर बनाया गया भंवर।

पूरे ब्रह्मांड में अलग-अलग आकार के ढेरों ब्लैक होल हैं, पर हमारे सौरमंडल में कोई ब्लैकहोल नहीं है। हां, हमारी आकाशगंगा के बीचोबीच एक विराट ब्लैक होल है जो हमारे सूर्य से करीब 1 करोड़ गुना बड़ा है।

ब्लैक होल कैसे बने, इस बारे में दो थिअरी हैं। एक थिअरी यह कि जब कोई विशाल तारा खत्म होने को होता है तो वह अपने अंदर ही सिमटने लगता है। कुछ वक्त बाद वह ब्लैक होल बन जाता है। दूसरी थिअरी यह कि ब्लैक होल बिग बैंग के बाद बना पहला आकाशीय पिंड है। सबसे पहले ब्लैक होल बना। ब्लैक होल से ही विभिन्न तारे बने। तारों से ग्रह, उपग्रह आदि बने।

ब्लैक होल में गिरने के बाद चीज़ें कहां जाती हैं, इसका अभी तक पता नहीं चल पाया है। वजह यह कि ब्लैक होल रोशनी को अपने अंदर जज्ब कर लेता है। रिफ्लेक्ट नहीं करता। तभी उस पर रोशनी डालने पर भी घुप्प अंधेरे के अलावा दूसरा कुछ दिखाई नहीं देता। इसलिए ब्लैक होल का कोई फोटो सीधे-सीधे लेना मुमकिन ही नहीं। हाल में इसका पहला फोटो जिसे बताया गया है, वह दरअसल कंप्यूटर से बना एक वर्चुअल फोटो है जो 8 बड़ी रेडियो दूरबीनों से मिले डेटा के आधार पर बना है। फिर भी यह विज्ञान की बड़ी कामयाबी है। ब्लैक होल के बारे में कई जरूरी सवालों का जवाब मिलना अभी बाकी है। मसलन, ब्लैक होल में गिरी चीज़ें क्या किसी दूसरे डाइमेंशन में चली जाती हैं? क्या ब्लैक होल दूसरे डाइमेंशंस में जाने का दरवाज़ा है? कहीं हम किसी दूसरी दुनिया, किसी दूसरे ब्रह्मांड में तो नहीं पहुंच जाएंगे? जैसे ब्लैक होल हैं, वैसे ही क्या वाइट होल भी अंतरिक्ष में हैं?

इन्हीं तरह के सवालों के जवाब पाने के लिए स्विट्जरलैंड की सर्न लैब में इन दिनों कई प्रयोग हो रहे हैं। दुनिया की यह सबसे बड़ी लैब फ्रांस-स्विट्जरलैंड सीमा पर 27 किलोमीटर लंबी सुरंग में बनी हुई है। यहां अरबों डॉलर का खर्चा करके लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर नाम की महामशीन लगाई गई है। इसकी मदद से यह पता लगाया जाएगा कि ब्रह्मांड किन हालात में बना था। उन हालात को पैदा करके स्टडी करने की कोशिश की जा रही है। इस प्रयोग में भारत समेत दुनिया भर के करीब सौ देशों के हज़ारों वैज्ञानिक हिस्सा ले रहे हैं। सर्न लैब से ही गॉड पार्टिकल यानी हिग्स बोसोन होने के ठोस सबूत सन 2012 में मिले थे। आजकल यहां डार्क मैटर पर प्रयोग चल रहे हैं। उम्मीद है कि ब्रह्मांड से जुड़ी कई पहेलियां जल्दी ही सुलझ जाएंगी।

इंटरव्यू...............................

अनंत ब्रह्मांड की जटिल गुत्थियों को बारीकी से समझने के लिए राजेश मित्तल ने प्रियंवदा नटराजन से पिछले दिनों जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के दौरान बातचीत की। प्रियंवदा अमेरिका की येल यूनिवर्सिटी में एस्ट्रॉनमी की प्रफेसर हैं। अपनी रिसर्च से उन्होंने ब्लैक होल और डार्क मैटर के बारे में दुनिया की समझ बढ़ाने में अहम योगदान किया है। पेश हैं उनसे बातचीत के खास हिस्सेः

Q. ब्रह्मांड के बारे में हमें अब तक क्या पता है और क्या नहीं पता?
A. हमें पता है कि ब्रह्मांड कैसे शुरू हुआ, वक्त बीतने के साथ किस तरह इसका विस्तार हुआ। हमें मालूम है कि इस ब्रह्मांड का सिर्फ 5 फीसदी हिस्सा ही नॉर्मल मैटर से बना है, 68 फीसदी हिस्सा डार्क एनर्जी है और 27 फीसदी डार्क मैटर। हमें यह भी पता है कि डार्क एनर्जी कार के एस्केलेटर की माफिक ब्रह्मांड फैलने की रफ्तार बढ़ा रही है। पर यह नहीं पता कि असल में यह है क्या। अगर यह पता चल जाए तो अतीत, वर्तमान और भविष्य की तमाम गुत्थियां खुल सकती हैं। आखिर में इस ब्रह्मांड का क्या होगा, यह इस बात पर तय होगा कि डार्क एनर्जी असल में क्या है । इसी तरह हमें डार्क मैटर का पता है कि यह ग्रैविटी पैदा करता है, पर यह जानकारी नहीं है कि डार्क मैटर बना किससे है।

Q. डार्क एनर्जी और डार्क मैटर की प्रकृति के अलावा और किन सवालों के जवाब कॉस्मोलजी फिलहाल खोज रही है?
A. बिग बैंग से पहले क्या था? किन हालात में बिग बैंग शुरू हुआ और क्यों? पहली आकाशगंगा कैसे बनी? पहला ब्लैक होल कैसे बना?

Q. इन सवालों का जवाब कब तक मिलने के आसार हैं?
A. उम्मीद है कि 20 बरस में। अभी हम सुनहरे दौर से गुज़र रहे हैं। आज हमारे पास सभी ज़रूरी उपकरण और डेटा हैं। हां, पूरे ब्रह्मांड की पहेली को सुलझाने में कई सदियां लग सकती हैं। सुलझेंगी या नहीं, यह भी पक्के तौर पर नहीं कह सकते।

Q. कॉस्मोलजी से जुड़ीं कौन-सी गलत धारणाएं आम प्रचलित हैं?
A. एक तो यह कि इस ब्रह्मांड का कोई केंद्र है। सचाई यह है कि ब्रह्मांड का कोई केंद्र नहीं है। दूसरी गलत धारणा यह है कि ब्रह्मांड कुछ और बनने के लिए फैल रहा है जबकि सचाई यह है कि ब्रह्मांड फैल तो रहा है लेकिन कुछ अलग बनने के लिए नहीं। अक्सर एक मिसाल दी जाती है गुब्बारे के फैलने की। ब्रह्मांड वैसे ही फैल रहा है, जैसे हवा भरने पर गुब्बारा फैलता जाता है। लेकिन यह तुलना एक सीमा तक ही सही है। गुब्बारा जैसे-जैसे फूलता है, वह बाहर हवा की जगह को घेरता है, पर ब्रह्मांड खुद में फैलता है। उसका विस्तार किसी बाहरी इलाके में नहीं होता।

Q. ब्रह्मांड लगातार फैलता ही जा रहा है लेकिन दिल्ली-मुंबई का फासला तो ज्यों का त्यों है?
A. ब्रह्मांड फैल तो रहा है, इससे आकाशगंगाओं के बीच की दूरी भी बढ़ रही है, लेकिन उनका आकार नहीं बढ़ रहा। ऐसे में हमारी वाली आकाशगंगा में स्थित दिल्ली-मुंबई में दूरी भी नहीं बदलेगी। इसे अच्छी तरह यों भी समझ सकते हैं कि आकाशगंगाएं बंद बक्सों की माफिक हैं। इन बक्सों के बीच दूरी तो बढ़ रही है, पर बक्सों का आकार उतना ही है।

Q. आजकल समानांतर ब्रह्मांड की भी बात हो रही है?
A. हां, इस थिअरी में माना जाता है कि हमारे ब्रह्मांड में जो कुछ भी है, उसका प्रतिरूप समानांतर ब्रह्मांडों में मौजूद है। हमारी ज़िंदगी में जो कुछ भी घट सकता है, वह सब दूसरे ब्रह्मांडों में घटित हो रहा है। मसलन, अभी राजेश यहां मेरा इंटरव्यू ले रहे हैं, किसी दूसरे ब्रह्मांड में मुमकिन है कि प्रियंवदा राजेश का इंटरव्यू ले रही हो और किसी तीसरे ब्रह्मांड में राजेश क्रिकेट खेल रहे हो सकते हैं। जितनी तरह की संभावनाएं हो सकती हैं, वे सब संभावनाएं दूसरे ब्रह्मांडों में वाकई हो रही हैं। लेकिन यह अभी आइडिया ही है। इसे अभी साबित नहीं किया जा सका है।

Q. क्या हम बुलबुले है - न पूर्वजन्म और न ही पुनर्जन्म?
A. मेरा पूर्वजन्म में विश्वास नहीं है, न ही अगले जन्म में।सचाई यह है कि पूरे ब्रह्मांड के सामने हम अप्रासांगिक हैं। हमारी कोई औकात नहीं है। अंतरिक्ष से जब हमारा सूरज भी धूल के कण से भी छोटा नज़र आता है तो वहां हमारा वजूद क्या होगा। हमारे चारों तरफ पृथ्वी की तरह के करीब 5000 ग्रह हैं। कहीं न कहीं ज़िंदगी होगी और यह ज़िंदगी ज़रूरी नहीं कि हमारी तरह हो। बहुत ही प्राथमिक स्तर का जीवन भी हो सकता है मछली जैसा या हमसे उन्नत प्राणी भी हो सकते हैं। लेकिन अपने ग्रह के हिसाब से हम कुछ प्रभावी हैं। और कुछ नहीं तो हमारे पास विनाश की क्षमता है। अंधाधुंध विकास की होड़ में हम अपने ग्रह को बर्बाद कर रहे हैं।

Q. आपने तो दर्शन की भी पढ़ाई की है। यह ब्रह्मांड क्यों बना है? इसके पीछे क्या मकसद है?
A. मकसद खोजने में मेरी कोई रुचि नहीं। हम यहां क्षण भर के लिए हैं। इस ब्रह्मांड को किसी प्रयोजन की ज़रूरत नहीं है। वह है तो है। प्रयोजन तो इंसानों को ढूंढना चाहिए।

Q. तो इंसानों का प्रायोजन क्या होना चाहिए?
A. यह कि हम खुद को बस अपने और अपने परिवार तक ही सीमित न रखें। दुनिया के लिए भी कुछ करके जाएं। इस दुनिया पर कोई अच्छा असर डाल कर जाएं। दूसरों की मदद करें।

Q. आपने ऐसा क्या किया है जिससे आपको संतुष्टि मिली हो, जीवन की सार्थकता मिली हो?
A. मेरे मन में बस यह है कि मेरे किसी आइडिया पर मेरे बाद में भी काम हो। ब्रह्मांड की कोई पहेली जब भी कभी सुलझे, उसमें कुछ योगदान मेरा भी हो।

Q. आपका अब तक का योगदान क्या है?
A. डार्क मैटर की मैपिंग करने में मैंने कुछ योगदान किया है। बताया है कि यह डार्क मैटर कितने टुकड़ों में बंटा हुआ है, इसकी बारीकियां क्या हैं, ब्लैक होल कैसे फैलते हैं। इस पर भी काम कर रही हूं कि पहला ब्लैक होल कैसे बना।

Q. ब्रह्मांड पर आप जो रिसर्च कर रही हैं, उसमें टेलीस्कोप के अलावा और किन-किन टूल्स का इस्तेमाल होता है?
A. हम लोग कंप्यूटरों का इस्तेमाल करते हैं।

Q. आम कम्प्यूटर या कोई सुपर कंप्यूटर?
A. अपनी रिसर्च के लिए सुपर कंप्यूटर का भी इस्तेमाल करती हूं और एक आम लैपटॉप का भी। पेंसिल-पेपर का भी इस्तेमाल होता है। इसके अलावा हबल और चंद्रा टेलीस्कोप से मिले डेटा का विश्लेषण करती हूं।

Q. क्या भारत में भी इन सब चीजों पर रिसर्च हो रही है?
A. 10 साल पहले तक भारत इस क्षेत्र में पिछड़ा हुआ था। बेसिक रिसर्च पर पैसे खर्च नहीं किए जा रहे थे। दरअसल बेसिक रिसर्च का कोई फौरी फायदा नहीं होता। मानव जिज्ञासा शांत करने के लिए यह की जाती है।
लेकिन अब भारत में भी बेसिक रिसर्च पर काफी खर्चा किया जा रहा है। सभी अहम प्रोजेक्टों में भारत भाग ले रहा है। ब्लैक होल्स की स्टडी के लिए तीसरा लीगो डिटेक्टर भारत में ही बनाया जा रहा है जो 2025 में काम करने लगेगा। आजकल जो भी रिसर्च हो रही है, उसे कोई एक देश अपने बलबूते पर नहीं करता। कई देश मिलकर करते हैं।

Q. हाल में किसी संस्था ने दुनिया के सौ शीर्ष वैज्ञानिकों की सूची तैयार की है। उसमें बहुत कम महिला वैज्ञानिक हैं। विशुद्ध विज्ञान की रिसर्च में महिलाएं काफी कम हैं। ऐसा क्यों?
A. बाहर भी ऐसा ही है। सभी संस्थाएं पुरुषों ने बनाई हैं। उन्होंने दूसरों को आने नहीं दिया। लेकिन अब स्थिति बदल रही है। सचाई यह है कि प्रतिभा सबके पास है, सब लोग एक प्रतिभा, किसी तोहफे के साथ पैदा होते हैं।लेकिन कुछ लोग किस्मत वाले होते हैं जिन्हें अपने इस तोहफे का इस्तेमाल करने का पूरा मौका मिलता है।ज़्यादातर लोगों को यह मौका नहीं मिलता है। यह स्थिति बदलनी चाहिए। हर बच्चे में जो जन्मजात प्रतिभा है, उसे पहचान कर उसे बढ़ावा देना होगा, उसे विकसित करना होगा और उसे ऐसे मौके देने होंगे कि वह प्रतिभा का इस्तेमाल कर सके। तभी सारे समाज को लाभ होगा। प्रतिभा महिलाओं में ही नहीं, डिफरेंटली एबल्ड लोगों में भी है। इस दुनिया की समस्याओं को दूर करने के लिए हमें सबकी प्रतिभाओं की जरूरत है।

Q. कहा जाता है कि हमारे धर्मग्रंथों में, वेदों में सारा ज्ञान है?
A. हमारे धार्मिक ग्रंथों में जो कुछ लिखा है और जो विज्ञान कर रहा है, इन दोनों में कोई तुलना नहीं की जा सकती। मिसाल के तौर पर, कोई सवाल करे कि नीले रंग में कितना नमक है तो इसका कोई जवाब नहीं दिया जा सकता। रंग और स्वाद को मिक्स नहीं कर सकते। तमाम धर्मों में जो कहानियां हैं, वे सब कल्पना पर आधारित हैं।

Q. ऐसे कहा जाता है कि हमारी जो पुराने ऋषि-मुनि थे, वे धरती पर बैठे-बैठे दूसरे लोकों की सैर कर लिया करते थे, पूरा ब्रह्मांड वे यहीं बैठे-बैठे देख लेते थे?
A. ऐसा कुछ नहीं है। कोई विज्ञानी इसे नहीं मानता। पर दोनों की बात हम एक साथ करते हैं तो अपने पूर्वजों के ज्ञान की गरिमा घटाते हैं। हम इससे प्रेरणा लेनी चाहिए कि हमारे पूर्वजों के पास ऐसी गज़ब की कल्पनाशीलता थी।कल्पनाशीलता के इस्तेमाल से ही हम विज्ञान की गुत्थियां सुलझाते हैं।

संडे नवभारत टाइम्स से साभार

Saturday, 13 April 2019

ब्लैक होल पर विशेष

स्कंद शुक्ला
दुनिया-भर में फैले रेडियो-टेलिस्कोपों ने पहली बार हमारी सआकाश गंगा के केन्द्र में स्थित ब्लैक होल का चित्र खींचा , तो कविमित्र से उस 'मुख-नाभि' पर चर्चा होनी ही थी।

"ब्लैक होल को जानने के लिए विज्ञान-जगत् में इतनी दीवानगी क्यों है ?"

"ब्लैक होल गुरुत्व का चरम है। सिंगुलैरिटी। वहाँ जहाँ सब कुछ नष्ट हो जाता है। उसकी वह सरहद , जिसे हम ईवेंट-होराइज़न कहते हैं , उसके परे हम जानना ही नहीं बल्कि जाना चाहते हैं। किन्तु वर्तमान भौतिकी के नियमों के अन्तर्गत और वर्तमान भौतिकी से संचालित शरीर और यन्त्र लेकर जा नहीं सकते। इसलिए दीवानगी तो बनती ही है।"

"हम्म। जहाँ हम जाना चाहें और न जा सकें , वह प्राकृतिक अवयव दीवाना तो करता ही है।"

"बिलकुल। जिसे हमने आज-तक केवल कल्पनाओं व अप्रत्यक्ष विधियों के सहारे चित्रित किया हो , उसे हम आज टेलिस्कोपों से वास्तविक रूप में देख सके हैं। धुँधला ही सही , किन्तु वह चित्र सत्य तो है ! महत्त्व उस शक्तिशाली पिण्ड के दर्शन का है , जिसके एक चम्मच द्रव्यमान में करोड़ों सूर्यों की द्रव्यराशि समाहित है !"

"ब्लैक होल के बारे में जानकर भौतिकी किस तरह समृद्ध हो रही है ? दर्शन की अभिभूति के अलावा ?"

"ब्लैक होल वह स्थान है , जहाँ गुरुत्व चरम पर है। वहाँ आइंस्टाइन के नियम और क्वाण्टम भौतिकी के नियम का संगम देखने को मिलता है। बल्कि नियम वहाँ सम्मिलित होकर नष्ट हो जाते हैं। ब्रह्माण्ड के पिण्ड नष्ट , उन्हें संचालित करने वाले नियम भी नष्ट। अतिवृहत् और अतिसूक्ष्म के भौतिक नियमों को हम मिला कर एक सिद्धान्त नहीं बना पा रहे। इस तरह से यह ब्लैक होल हमारी आकाशगंगा की वह मुखनाभि है , जहाँ से हमें जीवन की उम्मीद नहीं किन्तु जीवन को स्थान देने वाले निर्जीव ब्रह्माण्ड के अनेकानेक पिण्डों के जन्म की भी जानकारियाँ प्राप्त होती हैं और होती रहेंगी। यह वह मुख भी है , जिसमें ढेरों तारे व अन्य पिण्ड विनष्ट हो जाते हैं और उनकी ऊर्जा हॉकिंग-विकिरण बनकर ब्रह्माण्ड में फैल जाती है। ब्लैक होल प्रकाश को अपना बन्धक बना लेते हैं , द्रव्यमान को भी , लेकिन हॉकिंग विकिरण उनके ईवेंट होराइज़न से बाहर फूटा करती है।"

"इस हॉकिंग-विकिरण का प्रभाव ?"

"यों समझ लें कि इससे ब्लैक होल आकार में सिकुड़ता जाता है और एक दिन समाप्त हो जाता है।"

"यानी एक दिन यह भी नष्ट !"

"ब्रह्माण्ड सतत परिवर्तनशील है। यहाँ कुछ भी सदा-सर्वदा के लिए। न तारे , न ग्रह , न उपग्रह , न आकाश गंगा , न नीहारिका , न ब्लैकहोल। सब जन्मते हैं , मरते हैं। कविता की भाषा में कहें तो आकाश की यह मुख-नाभि विनष्टि और निर्माण , दोनों की परिस्थितियाँ पैदा करती रहती है।"

"हमारी आकाशगंगा के केन्द्र में जो ब्लैकहोल है , उसका नाम सैजीटेरियस ए स्टार है  न ?"

"जी। ढेर सारी गैलेक्सियों के केन्द्रों में इस तरह के महाविशाल ब्लैकहोल मौजूद हैं। ब्रह्माण्ड के प्रयाग , जहाँ भौतिकी के नियमों का संगम-विलय होता है और जिन्हें हम ढंग से अपने गणित और जीवन के द्वारा विचरना चाहते हैं।"

ब्लैक होल की छाया

ब्लैक होल की छाया : एक प्रश्नोत्तरी
चंद्रभूषण
हॉलिवुड की साई-फाई फिल्मों में ब्लैक होल किसी जादुई चीज की तरह आते हैं। ब्रह्मांड में इधर से उधर या समय में आगे-पीछे ले जाने वाली रहस्यमय चीजें। लेकिन अभी दुनिया में भारी उत्सुकता जगाने के बाद एक ब्लैक होल की जो तस्वीर जारी हुई है, उसमें यह खास शक्ल वाले किसी आकाशीय पिंड जैसा ही लग रहा है। क्या इसे ऐंटी-क्लाइमैक्स समझा जाए?

- ब्लैक होल भौतिकी का एक चरम बिंदु है। अभी पचास साल पहले तक शीर्ष वैज्ञानिकों को भी यह सिर्फ एक खयाली चीज लगती थी। खुद आइंस्टाइन को भी इसके होने का भरोसा नहीं था। फिर बहुत सारे प्रेक्षणों से ब्लैक होल जैसी ही चीजों की मौजूदगी का अंदाजा मिलने लगा। यानी तारों से बहुत ज्यादा भारी कोई चीज, जो किसी भी सूरत में, धुंधली से धुंधली शक्ल में भी नजर नहीं आती। अभी जो तस्वीर आप देख रहे हैं, वह ब्लैक होल की नहीं उसकी छाया की तस्वीर है।
   स्थान और समय से जुड़े इसके रहस्य आज भी ज्यों के त्यों हैं और उनकी आजमाइश का कोई जरिया अभी किसी के पास नहीं है। लेकिन इतनी विचित्र चीज का कुछ भी आंखों के सामने मौजूद होना खुद में एक जिंदा चमत्कार है। ऐंटी-क्लाइमैक्स क्यों, एक लंबे क्लाइमैक्स की शुरुआत कहें इसे।

ब्लैक होल की छाया? जिस चीज की कोई शक्ल ही नहीं, उसकी छाया? यह क्या गड़बड़झाला है?

- हां, यह काफी टेढ़ी बात है फिर भी सच के करीब है। अलबत्ता इसे ब्लैक होल की तस्वीर बताना सिरे से झूठी बात होगी। यूं समझिए कि ब्लैक होल बिना लंबाई-चौड़ाई-गहराई वाला एक ऐसा छेद है, जिसमें सारी चीजें, यहां तक कि रोशनी भी गिरती जाती है। फिर भी भरना तो दूर, वजन बढ़ने के साथ इसकी भूख और-और बढ़ती चली जाती है। इतनी खतरनाक चीज के इर्द-गिर्द एक इलाका ऐसा भी होता है, जिसके बाहर कोई चीज सुरक्षित रह सकती है और उसके बारे में हम कुछ जान भी सकते हैं, लेकिन जिसका भीतरी दायरा लांघते ही वह ब्लैक होल में गुम हो जाती है और हम नहीं जान सकते कि इसके बाद उसका क्या हुआ।
   इस दायरे को घटना क्षितिज या इवेंट होराइजन का नाम दिया गया है। तस्वीर में जो मोटा सुनहला कंगन हमें दिखाई पड़ रहा है, उससे ब्लैक होल के घटना क्षितिज के करीबी माहौल का अंदाजा मिल रहा है। खुद यह तस्वीर प्रकाश किरणों के ब्लैक होल के इर्द-गिर्द घूम जाने से बनी है, जो लेंस से किसी चीज की छाया बनने जैसा है।

इस तस्वीर और इसके ऑब्जेक्ट के बारे में कुछ और बताइए। क्या इसने ब्लैक होलों के बारे में हमारी कोई राय अंतिम तौर पर बदली है?

- हमारी आकाशगंगा के पड़ोस में इससे कई गुना ज्यादा बड़ी एक और आकाशगंगा है, जिसका नाम वर्गो-ए या मेसियर-87 है। इसके बीचोबीच, धरती से साढ़े पांच करोड़ प्रकाशवर्ष की दूरी पर हमारे सूरज का साढ़े छह अरब गुना वजनी एक ब्लैक होल मौजूद है। इसके दम का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि तस्वीर के कंगन में जो कलाई वाली खाली जगह है, उसकी चौड़ाई सूरज से धरती की दूरी की चालीस गुनी, लगभग दस अरब किलोमीटर है।
   और बाहर जो कंगन वाला सोना दमक रहा है, उसका तापमान चार से छह अरब डिग्री के बीच है। इसे समझने के लिए सूरज भी नाकाफी है क्योंकि उसके सबसे गरम हिस्से कोरोना का तापमान भी 10 लाख डिग्री से ऊपर नहीं जाता। इतने प्रचंड आकार और दमक वाला कंगन सिर्फ दूरी और बीच की धुंध के चलते अबतक हमारी नजरों से ओझल था।
   आकाश की सबसे धुंधली चीजों के प्रेक्षण का शास्त्र रेडियो एस्ट्रॉनमी लंबे समय से इसे देखने-परखने की कोशिश में जुटा था। इवेंट होराइजन टेलीस्कोप परियोजना में उसने कई ताकतवर रेडियो टेलीस्कोपों को इस तरह एक साथ आजमाया है कि पूरी धरती ही एक विराट टेलीस्कोप बन गई है! रही बात राय बदलने की तो ब्लैक होल में स्पेसशिप घुसा देना आगे अब आपको शायद ही किसी फिल्म में दिखे।

Saturday, 6 April 2019

कैसे बचें समुद्री जीव

चंद्रभूषण
अगर आप अपने इर्द-गिर्द के पर्यावरण ध्वंस से परेशान हैं तो जरा समुद्री जीवों पर आई विपत्ति के बारे में सोचकर देखें। टेक्नॉलजी ने जलजीवों के शिकार की क्षमता बहुत बढ़ा दी है और गहरे समुद्रों में जैविक सर्वनाश पर नजर रखने के लिए कोई सरकारी या गैर-सरकारी अथॉरिटी भी नहीं है। ऊपर से ग्लोबल वार्मिंग ने विशाल समुद्री इलाकों की ऑक्सीजन चूसकर उन्हें बंजर बना दिया है। समुद्री जीव वहां रहना तो दूर उधर से गुजरने में भी डरते हैं।

इन बुरी खबरों के बीच अकेली अच्छी खबर यह है कि लगातार घटती समुद्री पकड़ ने सरकारों को जता दिया है कि यह किस्सा यूं ही चलता रहा तो अगले दस-बीस वर्षों में ह्वेलिंग के अलावा समुद्रों से मछली, केकड़ा, झींगा पकड़ने के कारोबारों पर भी ताला पड़ जाएगा। इससे कई छोटी अर्थव्यवस्थाएं तबाह होंगी और मानवजाति प्रोटीन के सबसे बड़े स्रोत से वंचित हो जाएगी। पर्यावरण पर इसका क्या असर पड़ेगा, कोई नहीं जानता।

इन आशंकाओं के मद्देनजर तीन वैज्ञानिक समूहों ने ग्रीनपीस, प्यू ट्रस्ट और नेशनल ज्योग्राफिक की परियोजनाओं के तहत सारे समुद्रों का सर्वे किया और अभी अपनी रिपोर्टें संयुक्त राष्ट्र के सामने पेश करने की तैयारी में हैं। इन रिपोर्टों में समुद्री सतह के नीचे मौजूद सारे पर्वतों, गर्तों और गर्म पानी के स्रोतों के ब्यौरे शामिल हैं और यह जिक्र भी है कि किस जीवजाति के सर्वाइवल के लिए कौन सा इलाका ज्यादा महत्वपूर्ण है।

ऐसा सर्वे कुछ साल पहले तक संभव नहीं था क्योंकि इसके लिए जरूरी टेक्नॉलजी ही दुनिया में मौजूद नहीं थी। लेकिन अभी समुद्री जीवों की टैगिंग और जीपीएस के जरिये समुद्र के हरेक वर्ग किलोमीटर के साथ किसी जीव के रिश्ते को लेकर पूरी जानकारी हासिल की जा सकती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि एक वैश्विक संधि के जरिए अगर 40 फीसदी समुद्रों में शिकार और उत्खनन पर रोक लगाई जा सके तो 30 फीसदी समुद्री जीवजातियों की निरंतरता सुनिश्चित की जा सकेगी।

Saturday, 30 March 2019

लैंग्लैंड्स प्रोग्राम यानी गणित की ग्रैंड यूनिफिकेशन थियरी

लैंग्लैंड्स प्रोग्राम यानी गणित की ग्रैंड यूनिफिकेशन थिअरी
चंद्रभूषण
इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के प्रो. हरिश्चंद्र के शिष्य डॉ. रॉबर्ट लैंग्लैंड्स को गणित में पिछले पचास वर्षों से ‘लैंग्लैंड्स प्रोग्राम’ के लिए जाना जाता है, जिसको कुछ लोग भौतिकी की बहुप्रतीक्षित ‘ग्रैंड यूनिफिकेशन थिअरी’ की तर्ज पर गणित की जीयूटी भी कहते हैं। गणित के बारे में ज्यादातर लोगों की राय यही होती है कि दो दूनी चार अब से हजारों साल पहले भी होता रहा होगा और आज भी यह दो दूनी चार ही होता है, फिर इसमें नई खोज की गुंजाइश कहां से बनती होगी?

इससे ऊंचे स्तर वाली समझ के लोग अप्लाइड मैथमेटिक्स यानी मुख्य रूप से भौतिकी के जटिल हिसाब-किताब में काम आने वाली गणित में कुछ खोजबीन की भूमिका देख पाते हैं। लेकिन मजे की बात यह कि ऐसे दुराग्रह खुद उच्च गणित के दायरे में भी मौजूद हैं, जिसका शिकार प्रो. लैंग्लैंड्स को होना पड़ा। उन्हें गणित के क्षेत्र में अपने दौर का एकमात्र अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार फील्ड्स मेडल सिर्फ इसलिए नहीं मिल सका, क्योंकि संबंधित वर्ष के निर्णायकों की नजर में उनका काम कुछ ज्यादा ही अमूर्त था!

वैसे भी फील्ड्स मेडल हर चार साल बाद 40 साल से कम उम्र वाले किसी गणितज्ञ को ही मिलता है। एक बार आप उससे चूक गए तो फिर जीवन भर के लिए चूक गए। असाधारण प्रतिभा वाले रॉबर्ट लैंग्लैंड्स ने अपना पहला महत्वपूर्ण काम यह साबित करने के रूप में किया कि घनों के योगफल के रूप में लिखी जा सकने वाली अभाज्य संख्याएं (प्राइम नंबर्स) हार्मोनिक एनालिसिस के जरिये भी निकाली जा सकती हैं। इस वक्तव्य के अटपटेपन पर हम बाद में आएंगे, पहले इसके शुरुआती हिस्से पर बात करते हैं।

रोजमर्रे के काम आने वाली गिनतियां अपने पीछे जो शाश्वत रहस्य छिपाए हुए हैं, उनका शुरुआती दरवाजा अभाज्य संख्याओं में दिखता है। यानी ऐसी संख्याएं, जिनमें खुद उनको और 1 को छोड़कर और किसी भी संख्या का भाग नहीं जाता। इनके बारे में कई प्राथमिक सिद्धांत हैं, जैसे यह कि इन्हें किसी भी प्राकृतिक संख्या के छह गुने से एक कम या ज्यादा की शक्ल में लिखा जा सकता है (जाहिर है, यह नियम 2 और 3 पर लागू नहीं होता।) इसी तरह एक तरीका प्राइम्स को दो वर्गों के जोड़ के रूप में लिखने का भी है, जैसे 41=16 (4 का वर्ग) + 25 (5 का वर्ग)।

इसी तरीके से देखें तो प्राइम्स का एक दुर्लभ समूह ऐसा भी है, जिसे तीन घनों के जोड़ के रूप में लिखा जा सकता है। जैसे, 73=1 (1 का घन) + 8 (दो का घन) + 64 (4 का घन)। अंकगणित के लिए घनों के योगफल का आम फॉर्म्युला हमेशा से एक समस्या रहा है और प्राइम नंबर्स के साथ इसका रिश्ता दोहरी मुश्किल वाला माना जाता रहा है। लेकिन रॉबर्ट लैंग्लैंड्स ने जब कहा कि इन्हें हार्मोनिक एनालिसिस के जरिये भी निकाला जा सकता है तो साठ के दशक में कई गणितज्ञों को लगा कि यह नौजवान सटक गया है।

हार्मोनिक एनालिसिस तरंगों के जोड़-घटाव के अध्ययन का गणित है और इसके साथ अंकगणित का तो तब दूर-दूर तक कोई रिश्ता ही नहीं माना जाता था। लैंग्लैंड्स प्रोग्राम दरअसल आपस में कोई रिश्ता न रखने वाली गणित की विभिन्न शाखाओं की तह में मौजूद किसी ज्यादा गहरे गणितीय सिद्धांत की तलाश का ही कार्यक्रम है, जिसके कुछ हिस्से खुद प्रो. लैंग्लैंड्स ने खोजे और कइयों की खोज में दुनिया भर की गणितीय प्रतिभाएं लगी हुई हैं।

और तो और, उनके इस प्रस्तावित कार्यक्रम के आधार पर डॉ. ऐंड्रयू जे. वाइल्स ने तीन सौ साल से असिद्ध पड़े फर्मा के अंतिम प्रमेय को सिद्ध कर डाला, जिसके लिए उन्हें 2016 में ऐबेल प्राइज का हकदार पाया गया। यह भी दिलचस्प है कि खुद डॉ. लैंग्लैंड्स को गणित का नोबेल कहलाने वाले इस पुरस्कार से दो साल बाद, 2018 में नवाजा गया। काफी पहले से माना जाता रहा है कि लैंग्लैंड्स प्रोग्राम एक ऐसी गणितीय प्रस्थापना है, जो आने वाले दिनों में न सिर्फ गणित बल्कि भौतिकी की फ्रंटलाइन समझ का भी खाका बदल देगी।

दूध और चीन का दिलचस्प कनेक्शन

दूध पर चीनी क्यों हुए लट्टू
शशांक द्विवेदी
किसी देश के आम लोगों का दूध पीना भी क्या दुनिया के लिए चिंता का विषय हो सकता है? क्यों नहीं, बशर्ते उसकी आबादी संसार में सबसे ज्यादा हो और दूध पीने की परंपरा वहां जड़ से शुरू हो रही हो। जाहिर है, हम पड़ोसी मुल्क चीन की बात कर रहे हैं। वहां की 95 फीसदी आबादी हान जाति की है, जिसका शरीर वयस्क होने के बाद दूध नहीं हजम कर पाता। आंकड़ों में कहें तो 1950 में वहां डेरी के नाम पर कुल 1 लाख 20 हजार देसी गायें दर्ज की गई थीं, जिनमें ज्यादातर इनर मंगोलिया में और कुछ तिब्बत में थीं।

यहां यह बताना जरूरी है कि संसार में सबसे पहले दूध पिये जाने के प्रमाण तुर्की में (ईसा से 7000 साल पूर्व) मिलते हैं, लेकिन सबसे ज्यादा तरह के जानवर अभी मंगोलिया में ही दुहे जाते हैं। वहां सात जानवरों की बाकायदा अलग डेरियां चलती हैं। इसके विपरीत हमारे यहां सिर्फ गाय का दूध अलग मिल पाता है, वह भी अब जाकर। गाय के अलावा हमारे यहां भैंस और बकरी दुही जाती है, कहीं-कहीं भेड़ और ऊंट भी। लेकिन इन पांच के सिवा छठां दुधारू जानवर खोजना मुश्किल है।

इनर मंगोलिया चीन का अभिन्न अंग होने के साथ-साथ मंगोलियाई सभ्यता का हिस्सा भी है। स्वाभाविक है कि चीन का ज्यादातर दूध वहीं से सप्लाई होता है। पारंपरिक रूप से चीनी कुलीन वर्ग दूध को बर्बर मंगोल हमलावरों की बदबूदार खाद्य सामग्री मानता था। गाय वहां मुख्यतः बीफ के लिए ही पाली जाती थी। लेकिन 1984 में टीवी के फैलाव के बाद चीनियों ने पहली बार लॉस एंजिलिस ओलिंपिक लाइव देखा तो लंबे-चौड़े ताकतवर विदेशियों को देखकर दंग रह गए।

उन्हें यह जानकारी भी मिली कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जापान पर अमेरिकी कब्जे के दौरान वहां की डाइट में दूध और अंडे के प्रवेश से जापानियों की औसत लंबाई एक पीढ़ी के अंदर एक इंच बढ़ गई थी। फिर तो दूध के प्रति इस नए आकर्षण को भांपकर चीन की कम्यूनिस्ट सरकार ने दूध के प्रचार की झड़ी लगा दी और इसे घर-घर पहुंचाने की कोशिशें भी शुरू कर दीं। इस एहतियात के साथ कि बच्चों के मां का दूध छोड़ने के बाद उन्हें हर दिन गाय का दूध पिलाया जाए।

नतीजा यह रहा कि 2015 की गणना में वहां 1 करोड़ 30 लाख खूब दूध देने वाली जर्सी गाएं दर्ज की गईं। ये गायें पहले छिटपुट किसान पालते थे, लेकिन अभी ये बड़े-बड़े हाइली मैकेनाइज्ड फार्मों में पाली जाती हैं। डर इस बात का है कि चीनियों में दूध की मांग इसी रफ्तार से बढ़ती गई तो धरती का एक बड़ा इलाका बंजर हो जाएगा। कारण? पर्यावरणविदों के पास मोटा हिसाब है कि प्रकृति को 1 लीटर दूध बनाने के लिए 1022 लीटर पानी खर्च करना पड़ता है!

Sunday, 24 March 2019

करोड़ो साल पुराने जीवाश्मों का खजाना

52 करोड़ साल पुराने जीवाश्मों का खजाना
चंद्रभूषण
जीवाश्मशास्त्रियों के लिए मूसलों से ढोल बजाने का वक्त है। दक्षिण-मध्य चीन के हूपेई प्रांत में एक छोटी सी पहाड़ी नदी तानश्वी के किनारे उन्हें अतिप्राचीन जीवाश्मों का सबसे बड़ा खजाना प्राप्त हुआ है। पत्थरों में दर्ज जीवजगत के प्रारंभिक दौर का इतना सुंदर नजारा संसार भर में इससे पहले कभी देखने को नहीं मिला था।

जीवाश्मों की खोज में निकली एक यूनिवर्सिटी टीम छिंगच्यांग नाम की जगह पर नदी किनारे बैठी लंच कर रही थी कि तभी एक वैज्ञानिक की नजर एक तरफ के चट्टानी करार के पैटर्न पर गई। इसमें भूरी और काली लहरें बनी थीं, जिनसे सुदूर अतीत में किसी समुद्री भूस्खलन का अंदाजा मिलता था।

फिर उन्होंने चट्टानी परतों को एहतियात से अलगाया तो उन्हें बिल्कुल पास-पास कई हजार समुद्री जानवरों के फॉसिल मिल गए। इनमें 101 जीवजातियों की पहचान की गई, जिनमें आधी से ज्यादा ऐसी हैं, जिन्हें पहली बार देखा गया है। पहचाने गए जीवों में 4 सेंटीमीटर का एक मड ड्रैगन भी है, जिसकी समुद्री कीचड़ में पाई जाने वाली मौजूदा नस्ल कुछ मिलीमीटर से ज्यादा बड़ी नहीं होती।

51 करोड़ 80 लाख साल पुराने ये जीवाश्म इतने संरक्षित हैं कि इनकी आंखें, तमाम मुलायम मांसपेशियां और कई के तो बाल से भी पतले अंग बिल्कुल साफ नजर आ रहे हैं। दरअसल इन सारे जीवों का संबंध कैंब्रियन युग (53 करोड़ से 49 करोड़ साल पूर्व) से है और इनके इतने सुघड़ संरक्षण की वजह यह है कि किसी भूकंप में दबकर ये समुद्र की तली में पहुंचे होंगे और वहीं ज्यों के त्यों पड़े रह गए होंगे।