Friday, 1 November 2019

पुराने कंप्यूटर को कैसे करें अपग्रेड ?

संत समीर
हमारे जैसे ग़रीब-ग़ुरबों के लिए, जो अपने पुराने कम्प्यूटर की रफ़्तार से आजिज़ आ चुके हैं, पर नए कम्प्यूटर में पैसा लगाने से बचना चाहते हैं। परसों मैंने अपने क़रीब आठ साल पुराने कम्प्यूटर को अपग्रेड करते समय जो अनुभव किया वह आपको बताता हूँ।

कम्प्यूटर की रफ़्तार बढ़ाने का सबसे आसान तरीक़ा यह है कि आप ऑपरेटिङ्ग सिस्टम को चलाने के लिए अब तक जो हार्ड डिस्क ड्राइव (HDD) इस्तेमाल कर रहे थे, उसकी जगह पर एसएसडी (SSD) लगाइए। यह आपके कम्प्यूटर की रफ़्तार कई गुना तेज़ कर देगी। इसका मतलब यह न समझें कि आपकी पुरानी हार्ड ड्राइव बेकार हो जाएगी। ऑपरेटिङ्ग सिस्टम के अलावा यह आपके बाक़ी सारे माल-असबाब का ज़ख़ीरा (डेटा) पूर्ववत, बल्कि पहले से कुछ ज़्यादा सुरक्षित ढङ्ग से सहेजने का काम करती रहेगी।

एचडीडी और एसएसडी में अन्तर यह है कि एचडीडी ठीक-ठाक इस्तेमाल की जा रही हो तो इसकी उम्र आठ-दस साल ही मानिए, क्योंकि यह मैकेनिकल होती है। इसके ठोस दिखने वाले डिब्बे के भीतर मोटर, घिर्री, बेल्ट का समायोजन होता है। कान लगाकर इसकी तेज़ रफ़्तार की सनसनाहट आप महसूस कर सकते हैं। एसएसडी नाम से ही है, सॉलिड स्टेट ड्राइव, यानी इसके भीतर कोई ऐसी चीज़ नहीं होती, जो चलती या घूमती हो। यह पूरी तरह सॉलिड होती है, इस नाते इसकी उम्र भी बहुत ज़्यादा होती है। यह जिस तकनीक पर काम करती है, वह दिलचस्प है, पर उसका विस्तार ज़्यादातर लोगों के शायद काम का न हो। बस इतना ध्यान देना चाहिए कि आप ऐसी एसएसडी लें, जिसमें कण्ट्रोलर बढ़िया लगा हो। डेटा संयोजित करने की ज़िम्मेदारी कण्ट्रोलर ही निभाता है। सामान्य टाइपिङ्ग वग़ैरह के ही काम निकालने हों तो बिना कण्ट्रोलर वाली सस्ती एसएसडी से भी काम चला सकते हैं, पर मेरी राय में आप एक ऐसी एसएसडी लें कि पाँच-दस साल तक भी आपको तकनीकी रूप से पिछड़ जाने का मलाल न हो।

केवल एसएसडी के फ़ायदे सुनकर ही कोई भी एसएसडी ख़रीदने का फ़ैसला मत ले लीजिए, क्योंकि अभी हाल यह काफ़ी महँगी आती है और बिना सोचे-समझे कुछ भी ख़रीद लेने पर, अगर यह आपके कम्प्यूटर में न लग पाई, तो पछताना पड़ सकता है।

एसएसडी कई तरह की होती है, पर ज़्यदातर कामों के लिए तीन तरह की एसएसडी पर निगाह डाल लेना पर्याप्त है। पुराने ज़्यादातर कम्प्यूटरों में 2.5 SATA-3 एसएसडी लगाकर काम चलाया जा सकता है। जिनके कम्प्यूटरों में सिर्फ़ SATA-2 पोर्ट है, उनमें भी यह लग जाती है। यह बात ज़रूर है कि कम्प्यूटर में अगर SATA-3 पोर्ट हो तो रफ़्तार ज़्यादा अच्छी मिलेगी। एक एसएसडी है M.2 SATA ..पर कम्प्यूटर में ठीक से ताक-झाँक करके देख लें कि उसमें M.2 पोर्ट हो तभी इसे ख़रीदने का फ़ैसला लें। लैपटॉप में यह पोर्ट होता ही है, इसलिए यह लैपटॉप के लिए बेहतर है। वैसे इन दोनों तरह की एसएसडी की रफ़्तार में ज़्यादा अन्तर नहीं है। M.2 में आप केबल लगाने की झण्झट से बच जाते हैं बस। सबसे बढ़िया रफ़्तार वाली एसएसडी है M.2 NVMe…। SATA केबल वाली एसएसडी की तुलना में इसकी रफ़्तार सात-आठ या दस गुना तक तेज़ हो सकती है। इसके लिए देखना पड़ेगा कि कम्प्यूटर के मदरबोर्ड में ZEN 3x4 पोर्ट है या नहीं। बॉयस में भी NVMe सपोर्ट होना चाहिए, अन्यथा भूलकर भी इसे न ख़रीदें। बॉयस की अनुकूलता देखने के लिए थोड़ी ज़्यादा तकनीकी जानकारी चाहिए, पर SATA  और M.2 पोर्ट आपको मदरबोर्ड पर साफ़-साफ़ लिखे दिख जाएँगे।

कम दाम में मेरे लिहाज से WD Blue SATA SSD और Seagate BARACUDA SATA एसएसडी बढ़िया हैं। ये तीन से चार हज़ार रुपये के आसपास मिल जाएँगी। मैंने BARACUDA SATA-3  अमेजॉन से दीवाली ऑफ़र में तीन हज़ार में ख़रीदी। लेनी हो तो 120 जीबी वाली मत लीजिए। कम-से-कम 240 या 250 जीबी वाली लीजिए, तो आपको यह मलाल न रहेगा कि यह जल्दी से भर गई। समझदारी इस बात में भी है कि एसएसडी में ऑपरेटिङ्ग सिस्टम के अलावा दूसरी सामग्री मत रखिए। अन्य चीज़ों के लिए आप अलग एसएसडी या एचडीडी इस्तेमाल में लाइए। 250 जीबी से बड़ी एसएसडी लें तो ही इसमें पार्टीशन करके अन्य सामग्री रखें, लेकिन 500 जीबी के आसपास की एसएसडी आठ-दस हज़ार रुपये से कम में नहीं मिलेगी। सस्ता तरीक़ा यही है कि ऑपरेटिङ्ग सिस्टम एसएसडी पर चलाइए और अन्य चीज़ों के लिए 1-2 टीबी या इससे भी बड़ी एचडीडी ख़रीद लीजिए।

एसएसडी इंस्टालेशन का तरीक़ा आमतौर पर किसी से पूछेंगे या इण्टरनेट वग़ैरह पर देखेंगे तो दिमाग़ घनचक्कर हो सकता है, इसलिए मैं अपना आज़माया आसान-सा तरीक़ा बताता हूँ। लोग आपको बताएँगे कि आप सबसे पहले बॉयस में जाकर SATA पोर्ट का विकल्प पहले वाले से हटाकर उस पर कीजिए, जिस पोर्ट पर आपने एसएसडी को जोड़ा है..बूट ऑप्शन को हार्डड्राइव से बदल कर यूएसबी पर कीजिए, वग़ैरह-वग़ैरह। मेरे हिसाब से बॉयस पर आपको जाने की ज़रूरत तभी पड़ सकती है, जबकि इसके पहले आपने विण्डोज़ इंस्टॉल करते समय दूसरा तरीक़ा इस्तेमाल किया हो। अगर आपके पास बूटेबल पेनड्राइव है और पहले भी आपने पेनड्राइव से ही विण्डोज़ इंस्टॉल किया हो तो बॉयस को छेड़ने की ज़रूरत नहीं है। बॉयस के साथ दिक़्कत यह है कि अगर आपको इसकी ठीक से जानकारी नहीं हो, तो ज़रा भी ग़लती आपको बड़े झमेले में डाल सकती है। यहीं पर यह भी ध्यान रखें कि बूटेबल पेनड्राइव के लिए RUFUS वग़ैरह के झमेले में भी फ़ँसने की ज़रूरत नहीं है। बूटेबल पेनड्राइव आप माइक्रोसॉफ़्ट की वेबसाइट पर जाकर बड़ी आसानी से बना सकते हैं।

आपको करना दरअसल यह है कि जिस SATA  पोर्ट में ऑपरेटिङ्ग सिस्टम चलाने वाला आपका पहले वाला एचडीडी लगा हुआ है, उसके SATA  केबल को छोड़ी देर के लिए मदरबोर्ड के SATA  स्लाट से बाहर निकाल दीजए। पॉवर केबल भले लगा रहे, इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। अब जो स्लाट आपने ख़ाली किया है, उसी में एसएसडी से SATA केबल जोड़िए। यह ऑपरेटिङ्ग सिस्टम के बॉयस में जाने से बचा लेगा और आपके सिस्टम का डिफाल्ट डिवायस अपने आप चयनित हो जाएगा। अब मज़े में पेनड्राइव लगाइए और कम्प्यूटर ऑन करके विण्डोज़ इंस्टॉल कीजिए। ध्यान रखें कि विण्डोज़ इंस्टॉलेशन के बाद कम्प्यूटर अपने आप रिस्टार्ट होना शुरू हो तो पेनड्राइव बाहर निकाल लीजिए, वरना यह बार-बार विण्डोज़ इंस्टॉल करने को कहेगा और आप क्लिक पर क्लिक मारते रहेंगे और बात आगे न बढ़ेगी। विण्डोज़ इंस्टॉल करने के बाद पहले वाली हार्ड ड्राइव का SATA केबल मदरबोर्ड के किसी भी अन्य SATA पोर्ट से जोड़ दीजिए, इसके सारे पार्टीशन आपके कम्प्यूटर पर दिखाई देने लगेंगे। ऑपरेटिङ्ग सिस्टम वाले पार्टीशन को आप रखना चाहें तो रखें अन्यथा फार्मेट करके उपयोग में लें।

इस अपग्रेड से मुझे एक बात और पता चली कि हर तरफ़ सब कुछ नक़ली ही नहीं है। जब मैं परसों की रात विण्डोज़ इंस्टॉल कर रहा था तो एक बार डरा कि कहीं मेरे विण्डोज़-10  प्रोफेशनल की ‘एक्टिवेशन-की’ ओरिजिनल न हुई तो कम्प्यूटर ब्लाक भी हो सकता है। असल में दो साल पहले जब मैंने ईबे की वेबसाइट से विण्डोज़-10 प्रोफेशनल का डिजिटल ‘की-Key’ सिर्फ़ सात सौ रुपये में ख़रीदने का फ़ैसला लिया था तो आशङ्का भी हुई थी कि दस-बारह हज़ार रुपये की एक्टिवेशन-की भला सात सौ रुपये में कैसे मिल सकती है? मैंने बेवसाइट से बात की तो उन्होंने माइक्रोसॉफ्ट से ख़रीदी के तौर-तरीक़ों के बारे में कुछ बातें बताईं। बातें तो ख़ैर आधी-अधूरी ही समझ में आईं, पर आश्वस्त होकर मैंने ऑर्डर दे दिया। बाद में इण्टरनेट पर सर्च करने की कोशिश की तो यूट्यूब वग़ैरह पर लोगों ने यही बताया था कि इतनी सस्ती की-Key नक़ली हो सकती है। यह भी कि बेचने वाला बेचने के बाद पकड़ से ग़ायब हो जाता है। यह भी हो सकता है कि ऐसी ‘की-Key’ दो-चार महीने काम करे और फिर ब्लाक हो जाए। बहरहाल, मेरा विण्डोज़-10 प्रोफोशनल ओरिजिनल निकला। उस वक़्त इंस्टॉलेशन में कुछ परेशानी हुई तो फ़ोन करने पर बेवसाइट ने पूरी प्रक्रिया भी समझाई। दो साल बाद परसों जब मैंने इसे रिइंस्टॉल करते हुए माइक्रोसॉफ्ट की वेबसाइट पर लॉगिन किया तो मेरा नाम सिस्टम पर आटोमैटिक सर्च हुआ, मुझे दुबारा से की-Key डालने की ज़रूरत नहीं पड़ी और सारे अपडेट ओके हुए। यह ‘ओईएम की’ है, इसलिए इसका इस्तेमाल सिर्फ़ एक कम्प्यूटर पर ही मैं कर सकता हूँ (यह बात अलग है कि अवैध जुगाड़ मुझे मालूम है), लेकिन यह लाइफटाइम वाला है, तो अपडेट हमेशा मिलते रहेंगे। एसएसडी लगने के बाद कम्प्यूटर की रफ़्तार फर्राटेदार है।

इसे मैंने महज़ इसलिए लिखा है कि तकनीक से भी थोड़ी-सी मुहब्बत बुरी नहीं है।

Tuesday, 22 October 2019

टेढ़े क्यों बैठे हैं सूरज दादा

चंद्रभूषण
सोलर सिस्टम के अनसुलझे रहस्यों में एक सूरज की धुरी का झुकाव भी है। सौरमंडल के आठो ग्रह एक समतल में रहकर सूरज का चक्कर लगाते हैं। हम जानते हैं कि सोलर सिस्टम के कुल वजन के 1000 हिस्सों में 998 अकेले सूरज के हवाले हैं। बाकी 2 हिस्सों में न सिर्फ सारे ग्रह बल्कि उनके सभी उपग्रह, क्षुद्र ग्रह, उल्काएं, धूमकेतु और धूल वगैरह सब आ जाते हैं। ऐसे में भौतिकी की राय यही बनती है कि सौरमंडल की धुरी और सूरज की धुरी, दोनों बिल्कुल एक होनी चाहिए।

लेकिन खगोलविज्ञानी काफी पहले से जानते रहे हैं कि सूरज की अपनी घूर्णन धुरी सौरमंडल की घूर्णन धुरी से सवा सात डिग्री झुकी हुई है। यूं कहें कि सौरमंडल की तख्ती पर सूरज कुछ टेढ़ा सा बैठा है। यह बात इतनी बेतुकी है कि इसके कारणों पर वैज्ञानिक दायरों में बात तक नहीं होती। लेकिन सौरमंडल के कुछ बाहरी पिंडों का व्यवहार देखकर तीन साल पहले सौरमंडल के नवें ग्रह की प्रस्थापना क्या आई, कई बंद पड़े सवालों के ताले खटाखट खुलने शुरू हो गए। मौजूदा सदी ने सोलर सिस्टम के बाहरी इलाकों के बारे में हमारा समूचा नजरिया ही बदल डाला है।

कोंस्टैंटिन बैटीगिन और माइक ब्राउन ने पाया कि नेप्च्यून से काफी दूर स्थित सौरमंडल के बिल्कुल बाहरी सदस्यों की कक्षाएं इसके तल से ऊंचा कोण बना रही हैं। यह तभी संभव है, जब यूरेनस या नेप्च्यून जैसा, यानी पृथ्वी की तुलना में कम से कम दसगुना वजनी कोई ग्रह सौरमंडल के तल से 30 डिग्री या इससे ज्यादा झुकी हुई लगभग बीस हजार वर्षों की कक्षा में सूरज का चक्कर लगा रहा हो। खोजियों का हिसाब कहता है कि ऐसे किसी पिंड की मौजूदगी अरबों साल में सौरमंडल के तल को उतना झुका सकती है, जितना झुकाव उसकी और सूरज की धुरियों के बीच देखा जाता है।

Friday, 18 October 2019

सृष्टि क्या यह तारा बनाने के बाद रची गई?

चंद्रभूषण

धरती से 190 प्रकाशवर्ष दूर स्थित मेथुसेलह नाम का एक तारा खगोलविज्ञानियों के लिए बहुत बड़ी समस्या बना हुआ है। इसकी त्रिज्या सूरज की ठीक दोगुनी है। यानी इसका घनत्व अगर सूरज जितना होता तो इसका वजन सूरज के आठ गुने के आसपास होता। लेकिन इसके वजन की माप सूरज की अस्सी फीसदी ही निकलती है। दूसरे शब्दों में कहें तो इसका घनत्व सूरज के दसवें हिस्से के बराबर निकलता है। इसकी वजह यह है कि यह तारा मुख्यत: हाइड्रोजन और हीलियम से बना है। सूरज पर इफरात में मौजूद लोहे जैसी धातुएं इसमें न के बराबर हैं।

तारा भौतिकी की दृष्टि से यह अनोखी बात है और इससे पहली नजर में ही जाहिर होता है कि यह तारा बहुत पुराना है। उस वक्त की रचना, जब सृष्टि में धातुओं का कहीं नामोनिशान ही नहीं था! इस तारे का आधिकारिक नाम मेथुसेलह नहीं बल्कि एचडी 140283 है। मेथुसेलह नाम इसे बाइबल के सबसे बुजुर्ग चरित्र के आधार पर दिया गया, जिसकी उम्र वहां 969 साल बताई गई है। तारों की उम्र पता करने का एक जटिल शास्त्र है और तारा अगर बहुत ज्यादा दूर न हो तो इस काम में काफी सटीक नतीजे तक पहुंचा जा सकता है।

मेथुसेलह के मामले में यह आंकड़ा शुरू में 20 अरब साल का निकला था, जिसे जल्द ही 16 अरब साल पर ला दिया गया। समस्या यह थी कि ब्रह्मांड की जो उम्र निकाली गई है, वह किसी भी सूरत में 13 अरब 80 करोड़ (गलती की रेंज 21 करोड़ ) साल से पीछे नहीं जाती। तो क्या मेथुसेलह ब्रह्मांड बनने, दूसरे शब्दों में कहें तो समय की शुरुआत के भी 2 अरब 20 करोड़ साल पहले से हमारे पड़ोस में टिमटिमा रहा है। भौतिकीविदों के लिए यह एक पागल कर देने वाली प्रस्थापना थी लिहाजा इस सदी के गुजरे 18 वर्षों में वे मेथुसेलह की उम्र के पीछे ही पड़ गए और खींचतान कर इसे 14 अरब 27 करोड़ साल तक ले आए।

ब्रह्मांड की उम्र से यह फिर भी 47 करोड़ साल ज्यादा निकलती थी, लेकिन तारे की उम्र के साथ लगभग 80 करोड़ साल आगे-पीछे गलती की रेंज लगाकर चलें तो इसकी उत्पत्ति को एक छोर तक ठेलकर 13 अरब 66 करोड़ साल पहले तक ले जाया जा सकता है। इस आधार पर भौतिकशास्त्री यह सोचकर राहत की सांस ले सकते हैं कि मेथुसेलह नाम के तारे का जन्म ब्रह्मांड की उत्पत्ति के 14 करोड़ साल बाद ही हो पाया था। बात यहीं निपट जाती तो ठीक था। लेकिन इसके समानांतर एक नई मुश्किल यह खड़ी होती जा रही है कि ब्रह्मांड की ही उम्र का हिसाब वक्त बीतने के साथ बिगड़ता जा रहा है और दिनोंदिन इसे नीचे सरकाना पड़ रहा है।

ब्रह्मांड के फैलाव को निरूपित करने वाले जिस हबल कांस्टैंट के मान पर इसकी उम्र निर्भर करती है, उसकी माप नवीनतम प्रेक्षणों के अनुसार अधिक दर्ज की जाने लगी है। फॉर्मूले में यह कांस्टैंट नीचे की तरफ आता है, यानी इसका मान बढ़ने पर ब्रह्मांड की उम्र कम निकलती है। 13 अरब 80 करोड़ साल इसकी उम्र हबल कांस्टैंट के 67.4 किलोमीटर प्रति मेगापारसेक मान पर निकाली गई थी, लेकिन अभी इसे 10 फीसदी ज्यादा यानी 73 या 74 किलोमीटर प्रति मेगापारसेक निकाला जा रहा है। इस आधार पर हिसाब लगाने के बाद ब्रह्मांड की उम्र 12 अरब 70 करोड़ साल ही निकलती है। यानी बुढ़ऊ स्टार अब भी ब्रह्मांड से पुराना ही जान पड़ता है!

Thursday, 17 October 2019

दुरंगा इयापीटस और उसकी ऊंची दीवार

चंद्रभूषण
टाइटन और रिया के बाद शनि के तीसरे सबसे बड़े उपग्रह इयापीटस को सौरमंडल का सबसे रहस्यमय, सबसे आश्चर्यजनक पिंड माना जाता रहा है। करीब साढ़े तीन सौ साल पहले शनि और उसके इर्दगिर्द के माहौल का बारीकी से अध्ययन करने वाले फ्रांसीसी खगोलविद जिओवानी कैसिनी ने पाया कि इयापीटस पर चाहे कितनी भी बारीकी से टेलिस्कोप की नजर गड़ाए रखी जाए, पर वह अपने आधे रास्ते भर ही दिखाई पड़ता है। बाकी वक्त वह देखते-देखते ऐसे गायब हो जाता है, जैसे गधे के सिर से सींग।

फिर अंतत: जिओवानी कैसिनी ने ही इसकी वजह खोजी कि यह पिंड आधा बर्फ की तरह सफेद और आधा कोलतार की तरह काला है । ध्यान रहे, एक ही पिंड में रंग का इतना बड़ा फर्क खगोलशास्त्र के लिए आज भी एक अनोखी बात है। बाद में टेलिस्कोप और ताकतवर हुए तो पता चला कि इयापीटस की शक्ल कुछ ऐसी है जैसे दो गोलार्धों को जोर से चिपका कर गोले की शक्ल दी गई हो और इस कोशिश में यह गोला बीच से उभर आया हो। कुछ ऐसे, जैसे फैक्टरी में बनी हुई प्लास्टिक की गेंद।

इसके भी कुछ समय बाद दर्ज किया गया कि इसकी भूमध्यरेखा के तीन चौथाई हिस्से पर बीस किलोमीटर ऊंची एक दीवार फैली है, जो तली में दो सौ किलोमीटर चौड़ी है। इससे ज्यादा आश्चर्यजनक बात तो किसी अंतरिक्षीय पिंड के बारे में सोचना भी मुश्किल है। इस तरह की विकृतियां किसी छोटी-मोटी चट्टान नुमा उल्का के साथ होतीं तो बात समझ में आती, लेकिन इयापीटस हमारे चंद्रमा के लगभग आधे आकार वाला एक ठीकठाक बड़ा उपग्रह है, लिहाजा इनकी व्याख्या को लेकर आज भी काम चल ही रहा है।

यहां ब्यौरे में जाएं तो इयापीटस शनि का चक्कर लगभग 35 लाख किलोमीटर (पृथ्वी और चंद्रमा के फासले का कोई नौ गुना) दूरी से लगाता है और अपने ग्रह का एक चक्कर लगाने में इसे लगभग ढाई महीने लगते हैं। लेकिन इसकी कक्षा शनि के बाकी उपग्रहों और छल्लों की तुलना में काफी तिरछी है, जो कि इससे जुड़ी एक और पहेली है। बहरहाल, इयापीटस की खोज से लेकर अब तक यूरोप-अमेरिका में इसे लेकर काफी किस्से गढ़े जा चुके हैं।

इन किस्सों में एक यह भी है कि यह सौरमंडल के बाहर से आई हुई कोई चीज है और इस पर पृथ्वीवासियों के लिए चीनी प्रकृति दर्शन में निर्माण और विनाश के इस्तेमाल होने वाले यिन/यांग जैसे भयानक संदेश दर्ज हैं। अभी कैसिनी यान के पर्यवेक्षणों के जरिये इयापीटस से जुड़े कुछ रहस्यों पर से पर्दा हटा है, हालांकि इस क्रम में एक ऐसी प्रस्थापना भी सामने आई है, जिसने खगोलशास्त्रियों को हैरान कर रखा है।

इसका एक हिस्सा काला दिखने की वजह शनि का एक और- लगभग अदृश्य सा उपग्रह फीब है, जो लगभग काला है और जो अपने मूलपिंड की उलटी दिशा में घूमने वाले सौरमंडल के कुछ गिने-चुने पिंडों में एक है। फीब किसी पुच्छल तारे की तरह अपने पीछे अत्यंत विरल सामग्री छोड़ता हुआ चलता है, जो इयापीटस के एक हिस्से पर गिरकर करोड़ों वर्षों से इसपर पोचारा फेरती आ रही है। इस चीज के चलते शनि का एक और छल्ला भी बन गया है, जो दिखता नहीं।

सबसे बड़ी पहेली इयापीटस के बीचोबीच खड़ी हजारों मील लंबी दीवार है, जिसकी ऊंचाई हमारे एवरेस्ट शिखर की भी ढाईगुनी है। इसके लिए प्रस्थापना यह दी गई है कि शनि से बहुत ज्यादा दूरी होने के कारण किसी समय इयापीटस का अपना एक उप-उपग्रह भी हुआ करता था, जो इसके आकर्षण के चलते धीरे-धीरे टूट-बिखर कर इस पर गिरता चला गया। अनुमान है कि कुछ समय इयापीटस के उप-उपग्रह (मूनमून) की तरह गुजार लेने के बाद इसके विघटन की प्रक्रिया शुरू हुई होगी, जो पचास करोड़ से एक अरब साल के बीच में पूरी हो गई होगी।

सौरमंडल में तो छोड़िए, अब तक प्रेक्षित ब्रह्मांड में भी मूनमून जैसी कोई चीज कहीं दर्ज नहीं की जा सकी है। अगर यह सुनिश्चित किया जा सका कि किसी मूनमून या उप-उपग्रह के अवशेष ही इयापीटस की कुछ काली-कुछ सफेद, बेहद ऊंची और चौड़ी दीवार के रूप में आज भी इयापीटस पर दर्ज हैं तो यह एस्ट्रोफिजिक्स के लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी!

Tuesday, 15 October 2019

लैपटॉप में लिखकर करें टाइप

टिप संख्या दो - लैपटॉप या पीसी पर हिंदी या किसी भी भाषा में बोल कर टाइप करना
सूरजप्रकाश
आपको जानकर आश्चर्य होगा windows 10 और उसके बाद में वर्जन में आप लैपटॉप या पीसी पर पर बिना कोई सेटिंग किए सीधे ही english, chinese, french, german, spanish, Portuguese और Italian भाषा में बोलकर टाइप कर सकते हैं और जो टाइप किया है उसे सुन भी सकते हैं। इसके लिए वर्ड फाइल के दायीं तरफ dictation के बटन को दबाना भर होता है।

लेकिन पीसी या लैपटॉप में दी गई सैकड़ों भाषाओं में बोलकर टाइप करने के लिए आपको कुछ सेटिंग्स करनी पड़ती हैं और इसके लिए कुछ बेसिक जरूरतें हैं।
1. Google chrome
2. Google Doc
3. हिंदी या जिस भाषा में आप बोल कर टाइप करना चाहते है वह आपके सिस्टम में होनी चाहिये। bhashaindia.com से windows version के हिसाब से कोई भी भारतीय भाषा डाउनलोड की जा सकती है।
4. नेट कनेक्शन

पहले आप google chrome के जरिए google docs खोलें। गूगल क्रोम खोलने पर आपको स्क्रीन पर नौ रंगीन बिंदु नजर आते हैं। इनमें से एक गूगल डाक्स का है। अगर गूगल डॉक्स इन नौ में नहीं है तो more में आपको मिल जाएगा।

google docs में blank document खोलने पर आपको टूलबार में छठे नंबबर पर tools दिखायी देगा। tools को स्क्रौल करेंगे तो नीचे नौंवें नंबर पर आपको वॉइस टाइपिंग नजर आएगा। वॉइस टाइपिंग को क्लिक करेंगे तो बाई तरफ एक माइक बना नजर आएगा। माइक जब ऑफ होता है तो काले रंग का होता है। उसके ऊपर भाषा में इंग्लिश लिखा है। इंग्लिश को क्लिक करेंगे तो भाषाओं की लंबी सूची नजर आएगी। हिंदी काफी नीचे है। हिंदी सेलेक्ट कर लें। अब माइक ऑन करें। माइक का रंग बदल कर लाल हो जाता है।
बोलकर हिंदी में टाइप करने के लिए आपका सिस्टम तैयार है।

ईयरफोन या ब्लू टूथ ईयरफोन या माइक हो तो बेहतर वरना वैसे भी काम चल जाता है।

आपकी बात कहे जाने और टाइप किए जाने में 1 सेकंड का अंतर आता है। जैसे जैसे बोलते जाएंगे और टाइप होता जाएगा। लैपटॉप या पीसी पर टाइप करने में यह सुविधा रहती है कि आप एंटर करके अगली लाइन में जा सकते हैं। थोड़े से अभ्यास से आप अपने बोलने की पिच और गति सेट कर सकते हैं। सिस्टम अगर कोई शब्द नहीं पकड़ रहा तो चिंता न करें। बाद में spell check से या खुद ही एडिट कर सकते हैं।

आप इस मैटर को कॉपी पेस्ट करके वर्ड फाइल में ले जा कर सेव कर सकते हैं या ऊपर टूलबार में दिये गये शेयर बटन बटन का इस्तेमाल करके भी एमएस वर्ड फाइल में भेज सकते हैं।

 अगर आपने अपने मोबाइल में भी गूगल डॉक्स डाउनलोड किया हुआ है तो आपकी यह फाइल अपने आप आपके मोबाइल के गूगल डाक्स में पहुंच जाएगी जिस तरह मोबाइल के गूगल डाक्स की फाइल लैपटाप में अपने आप जा जाती है। आपको ट्रांसफर करने की जरूरत नहीं है।

बस याद रखें कि गूगल डाक्स गूगल क्रोम के जरिये ही खोलना है और नेट कनेक्शन होना चाहिये।

तो आज ही शुरू करें और कोई तकलीफ हो तो बंदा हाजिर है।

Sunday, 13 October 2019

चाँद का भी कोई चांद !!

चांद का भी कोई चांद
चंद्रभूषण
अंतरिक्षीय पिंडों में एक-दूसरे का चक्कर लगाने की सहज वृत्ति होती है। ग्रह-उपग्रह छोड़िए, धरती पर गिरने वाले ज्यादातर उल्कापिंड भी ऐसे ही जोड़ों में आते हैं। ऐसे में यह आश्चर्य की बात ही कही जाएगी कि हमारे सौरमंडल में इतने सारे (फिलहाल 200 से भी ज्यादा दर्ज) उपग्रहों की मौजूदगी के बावजूद अभी तक एक भी उपग्रह का उपग्रह नहीं खोजा जा सका है। क्या प्रकृति ऐसे पिंड बना ही नहीं सकती? या यह केवल हमारे अपने सौरमंडल की सीमा है?

सवाल की गहराई में जाएं तो उपग्रहों के गणित पर काफी सारा काम डेढ़-दो सौ साल पहले किया जा चुका है, लेकिन उससे सिर्फ दो परिभ्रमणकारी पिंडों, मसलन ग्रह और उपग्रह के बीच की अधिकतम दूरी का अंदाजा मिलता है। हिल स्फेयर नाम की यह सीमा हमारे चंद्रमा के मामले में 60 हजार किलोमीटर है। इससे ज्यादा दूरी पर घूमने वाली कोई चीज चांद के बजाय पृथ्वी के ही चक्कर लगाएगी।

स्थिर कक्षा इस 'हिल स्फेयर' की तिहाई-चौथाई दूरी पर ही बन पाती है। इससे ज्यादा दूरी पर लाखों साल तक चलने वाली कक्षाएं जरूर बन सकती हैं पर देर-सबेर पिंड अपना घाट छोड़ देगा। अगर हमारे चंद्रमा का कोई उप-उपग्रह होता तो वह 15-20 हजार किलोमीटर की कक्षा में उसका चक्कर लगाता पाया जाता। हालांकि ज्वारीय बलों के प्रभाव में उसकी कक्षा क्रमश: छोटी होती जाती और वह चंद्रमा पर गिर जाता। लेकिन यह मजबूरी हर जगह तो लागू नहीं होती होगी।

सौरमंडल से बाहर का पहला चंद्रमा खोजे जाने की बात इसी महीने सामने आई है। हमसे 8000 प्रकाशवर्ष दूर स्थित एक ग्रह केप्लर 1625बी का नेप्च्यून के आकार वाला- यानी हमारी पृथ्वी का 17 गुना वजनी- उपग्रह उसका चक्कर हमारे चंद्रमा की आठ-नौगुनी दूरी से लगा रहा है। फिलहाल जानने का कोई तरीका भले न हो, पर इतने विशाल पिंड का कोई उप-उपग्रह क्यों नहीं हो सकता? मान लीजिए अगर यह हुआ तो अंग्रेजी में इसे क्या कहेंगे? कुछ वैज्ञानिकों ने ऐसे पिंडों के लिए ‘मूनमून’ कुलनाम प्रस्तावित किया है!

Saturday, 12 October 2019

कम ऑक्सीजन का गम

कम ऑक्सिजन का गम
चंद्रभूषण
शरीर में ऑक्सिजन सप्लाई लगातार कम रहने से होने वाली बीमारी हाइपॉक्सिया आजकल चर्चा में है तो इसकी खास वजह इस बार का मेडिसिन नोबेल ऐसी बीमारियों की जड़ तक जाने वाली रिसर्च को दिया जाना है। खून में ऑक्सिजन कम होने की समस्या हाइपॉक्सीमिया और पेशियों में ऑक्सिजन के क्रॉनिक अभाव से पैदा होने वाले हाइपॉक्सिया की फौरी वजहें भी हो सकती हैं लेकिन समुद्र तल से 2500 मीटर (8200 फुट) या अधिक ऊंचाई पर रहने वालों में यह ज्यादा देखने में आता है।

गनीमत है कि भारत में ऐसी जगहें न के बराबर हैं। देसी हिल स्टेशनों में इतना ऊंचा अकेला गुलमर्ग है, जो कोई स्थायी बस्ती न होकर एक टूरिस्ट स्पॉट भर है। पारंपरिक बसावट वाले ऐसे इलाके दुनिया में तीन ही हैं। एक हमारा पड़ोसी तिब्बत, दूसरा पूर्वी अफ्रीका में केन्या, तंजानिया और युगांडा के कुछ इलाके, और तीसरा दक्षिणी अमेरिका में एंडीज पर्वतमाला के देश पेरू और बोलीविया। इवॉल्यूशन ने दसियों हजार वर्षों में इन तीनों जगहों पर हाइपॉक्सिया और इसके बृहद रूप क्रॉनिक माउंटेन सिकनेस (सीएमएस) से लड़ने के तीन तरीके ईजाद किए हैं।

पूर्वी अफ्रीकियों के खून में हीमोग्लोबिन बहुत ज्यादा पाया जाता है, जिसके चलते उनमें सीएमएस के मामले बिल्कुल नहीं देखे जाते। तिब्बत में लोग जल्दी-जल्दी सांस लेने के आदी हो चुके हैं जिससे वातावरण में ऑक्सिजन कम होने के बावजूद शरीर में इसकी आपूर्ति संतुलित रहती है। लेकिन एंडियन इलाकों में मनुष्य पहुंचा ही 15,000 साल पहले, लिहाजा वहां 15 से 20 फीसदी लोग सीएमएस के शिकार देखे गए हैं। इस साल के मेडिसिन नोबेल ने जरूर उनकी उम्मीद बढ़ाई होगी।

Wednesday, 9 October 2019

विज्ञान के तीनों नोबेल

विज्ञान के तीनों नोबेल आम दायरे में मौजूद खोजों को
चंद्रभूषण

यों तो नोबेल पुरस्कार हैं ही व्यावहारिक खोजों के लिए, लेकिन अक्सर हम इनका सेहरा ऐसे शोधों और अविष्कारों के सिर बंधते देखते हैं जिन्हें समझना आम लोगों के बूते की बात नहीं होती। यह विरला मौका है कि इस बार के तीनों साइंस नोबेल आम इस्तेमाल वाली या जन सामान्य के विमर्श में शामिल आविष्कारों या खोजों के लिए दिए गए हैं। चिकित्साशास्त्र का नोबेल फिजियॉलजी (शरीर क्रिया विज्ञान) के एक बुनियादी काम के लिए, भौतिकी का नोबेल एस्ट्रोफिजिक्स (तारा भौतिकी) के दो सीमावर्ती क्षेत्रों के लिए, और रसायनशास्त्र का नोबेल वैसे तो मटीरियल साइंस के लिए, लेकिन सीधे तौर पर कहें तो हर हाथ में थमे मोबाइल फोन की लीथियम आयन बैट्री के लिए।

चिकित्साशास्त्र का नोबेल एपॉक्सिया और एपॉक्सीमिया पर काम करने वाले वैज्ञानिकों को मिला है। एपॉक्सीमिया यानी खून में ऑक्सिजन कम होना और एपॉक्सिया यानी ऑक्सिजन की कमी से शरीर की किसी खास पेशी या कई पेशियों का दम घुट जाना। किसी चोटिल व्यक्ति का कोई अंग अगर आपको गहरा लाल और फिर काला पड़ता दिखे तो इसका सीधा मतलब है कि ऑक्सिजन की कमी से वहां की कोशिकाएं मरने की शुरुआत हो चुकी है। ऐसा अगर दिल या दिमाग जैसे किसी जीवन-मरण से जुड़े अंग के साथ हो जाए तो स्ट्रोक से तत्काल मौत हो सकती है।

नोबेल प्राप्त शोधार्थियों ने इस बात का पता लगाया कि कोशिकाओं द्वारा जरूरत पड़ने पर अधिक ऑक्सिजन ग्रहण करने और जरूरत खत्म हो जाने पर ऑक्सिजन इनटेक के पुराने संतुलन में लौट जाने का मेकेनिज्म क्या है। कैंसर का ट्यूमर अपने लिए नई रक्त वाहिकाएं कैसे बना लेता है, यह सवाल भी इस शास्त्र को छूते हुए गुजरता है। एक बड़ी बात यह कि इसी शास्त्र के आधार पर काम करने वाली और मानव शरीर के लिए कई जानलेवा स्थितियों में कारगर एक दवा पिछले साल से चीन में बिकने भी लगी है, हालांकि अमेरिका में इसके परीक्षण अभी पूरे नहीं हुए हैं। इस क्रम में कोशिकाओं के सांस लेने की प्रणाली की डीएनए स्तर पर मौजूद एक गहरी पेचीदगी जीवविज्ञान की पकड़ में आ गई तो उसे बोनस समझा जाना चाहिए।

भौतिकी के नोबेल का संबंध तारा भौतिकी से है, जो रोजमर्रा जीवन का शास्त्र नहीं है। लेकिन जो वैज्ञानिक इससे पुरस्कृत हुए हैं उनमें दो का संबंध सौरमंडल से इतर अन्य तारों के ग्रहों की खोज से है, जिस पर संसार की हर भाषा में लगभग हर हफ्ते कोई न कोई लेख लोगों को पढ़ने को मिल जाता है। पिछले तीस वर्षों में उभरे इस नए शास्त्र की मूल उत्सुकता- ‘क्या ब्रह्मांड में पृथ्वी के अलावा कहीं और जीवन है’, या ‘क्या सृष्टि में कहीं मनुष्य से अधिक बुद्धिमान कोई प्राणी भी है’- जैसे सवालों से ही उपजी है। लेकिन धीरे-धीरे इसका स्वरूप जमीनी हो रहा है और इसके तहत तमाम तरह के संभावित ग्रहों का अध्ययन किया जा रहा है। इसके लिए फिलहाल 4000 से ज्यादा ऑब्जर्व्ड कैंडिडेट मौजूद हैं, जिनके ब्यौरों के लिए जेम्स वेब टेलिस्कोप छोड़े जाने का इंतजार है। अलबत्ता इस पुरस्कार का आधा हिस्सा ब्रह्मांड के उद्भव और विकास से जुड़ी स्थापित थीसिस के लिए दिया गया है, जिस तक पहुंच अपेक्षाकृत कम पाठकों की है।

सबसे ज्यादा दिलचस्प रहा रसायनशास्त्र का नोबेल, जिसमें फोन, कैमरा और कैमकॉर्डर जैसी चीजों में काम आने वाली छोटी, पावरफुल लीथियम आयन बैट्री के विविध पहलुओं पर काम करने वाले वैज्ञानिकों को पुरस्कृत किया गया। अभी कुछ साल पहले तक इतनी ताकतवर चीज की कल्पना करना भी कठिन था लेकिन इन बैटरियों का इस्तेमाल अब फोन जैसी छोटी चीजें ही नहीं, भारी ट्रक चलाने में भी होने लगा है। अलबत्ता इसके साथ एक ही तकनीकी समस्या है कि इस्तेमाल होने के दौरान यह गरम होती है और इस क्रम में बड़ी तेजी से फूलती है। फोन को एक छोटा-मोटा बम बना देने वाली इस बीमारी का हल खोजे बिना लीथियम आयन बैट्री को फूलप्रूफ आविष्कार नहीं कहा जा सकता। इसकी दूसरी समस्या लीथियम की महंगाई से जुड़ी है, जिसकी कीमत 2016 से 2018 के बीच ही दोगुनी हो गई और अगले दशक में दस गुनी हो सकती है!

Tuesday, 8 October 2019

ऑक्सीजन को महसूस करने के लिए नोबेल !!!

स्कंद शुक्ला
सन् 2015। दो अन्तरराष्ट्रीय सायक्लिस्ट एक ऐसे रसायन का सेवन करते पकड़े जाते हैं , जो मनुष्य के शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं की संख्या को बढ़ा देता है। इन कोशिकाओं का लाल रंग इनमें मौजूद हीमोग्लोबिन के कारण होता है , जो ऑक्सीजन को बाँधकर उसे ढोता है। चूँकि इन कोशिकाओं का काम शरीर के तमाम अंगों तक ऑक्सीजन पहुँचाना होता है --- इसलिए अगर लाल रक्त कोशिकाओं की संख्या बढ़ सकी , तो व्यक्ति सायकिल चलाते समय आसानी से बेहतर प्रदर्शन करने में क़ामयाब हो सकता है। एफजी 4592 / एएसपी 1517 नाम का यह रसायन अभी ( सन् 2015 तक ) दवा के रूप में बाज़ार में उतारा तक नहीं गया है। इसका रोगों में सदुपयोग आरम्भ नहीं हुआ है , किन्तु खेल की दुनिया में दो सायक्लिस्ट इसका दुरुपयोग कर चुके हैं।

खेल में छल करने पर पकड़े जाने पर प्रतिबन्ध के नियम हैं। किन्तु इस घटना ने एक बड़ी बात सामने लाकर रख दी थी। ख़ून की ऑक्सीजन ढोने की क्षमता को किसी भी तरह येन-केन-प्रकारेण बढ़ा सकना , डोपिंग का नया तरीक़ा बनकर सामने आने लगा था। यद्यपि आज यह रसायन रॉक्साडस्टैट के नाम से गुर्दा-रोगियों में इस्तेमाल किया जाने लगा है। किन्तु वैध दवा के रूप में इसका प्रयोग सन् 2018 में मान्य हुआ। अवैध डोपिंग-प्रयोग के तीन साल बाद।

सन् 2019 का चिकित्सा-नोबल-पुरस्कार कोशिकाओं की 'ऑक्सीजन-अनुभूति' के लिए तीन वैज्ञानिकों ग्रेग सेमेन्ज़ा , पीटर रैटक्लिफ़ और विलयम केलिन को मिला है। कोशिकाएँ आसपास ऑक्सीजन की उपस्थिति को पहचान लेती हैं कि वह सामान्य मात्रा है में अथवा कम। ऑक्सीजन की सामान्य मात्रा जिसे नॉर्मॉक्सिया कहते हैं , उसमें उनका बर्ताव एक ख़ास मेल का होता है। यह बर्ताव ऑक्सीजन की कमी --- जिसे हायपॉक्सिया कहा जाता है --- उसके दौरान बदल जाता है।

पहाड़ों पर चढ़ना हो , मैदान में दौड़ना या फिर मग्न होकर नृत्य करना --- ऑक्सीजन की कमी हमें और हमारी कोशिकाओं को न होने का बोध कराती है। हमारा शरीर उसके लिए भीतर आवश्यक बदलाव करता है। मगर यह भी ध्यान रहे कि ऑक्सीजन की मात्रा को पहचानने का यह काम केवल सामान्य कोशिकाएँ ही नहीं करतीं। कैंसर-कोशिकाओं के लिए भी यह काम बहुत ज़रूरी है। अगर जीवित रहना है , जो स्वस्थ और कैंसर दोनों प्रकार की कोशिकाओं को ऑक्सीजन की मात्रा को आसपास लगातार 'सेन्स' करते रहना है। नॉर्मॉक्सिया में एक प्रकार का बर्ताव करना है , हायपॉक्सिया में दूसरे तरह का।

ऑक्सीजन की कमी ( यानी हायपॉक्सिया ) समूचे शरीर में भी हो सकती है और किसी एक ख़ास अंग में भी। हायपॉक्सिया के दौरान एक ख़ास प्रोटीन कोशिकाओं के भीतर जमा होने लगता है। इसका नाम एचआइएफ़ यानी हायपॉक्सिया-इंड्यूसिबल-फ़ैक्टर है। सामान्य स्वस्थ कोशिकाओं में ऑक्सीजन की प्रचुर मौजूदगी के दौरान एचआइएफ़ बनता तो है , किन्तु कोशिका के भीतर नष्ट भी कर दिया जाता है। लेकिन जब ऑक्सीजन की कमी होती है , तब यह नष्ट नहीं होता । बल्कि यह कोशिका के भीतर एकत्रित रहते हुए अनेक जीनों को ऑन-ऑफ़ करने लगता है।

जीन क्या करते हैं ? प्रोटीन का निर्माण। जीन का ऑफ़ होना यानी ? कोशिका के भीतर किसी प्रोटीन का निर्माण रुकना। जीन का ऑन होना यानी ? कोशिका के भीतर किसी प्रोटीन का निर्माण चालू हो जाना। यानी एचआइएफ की वजह से ऑक्सीजन की कमी से जूझती कोशिकाओं के भीतर प्रोटीन-स्तर पर बदलाव होने लगते हैं।

एचआइएफ तभी सक्रिय होता है , जब ऑक्सीजन की कमी होती है। सामान्य स्थिति में इसे काम नहीं करने दिया जाता। शरीर की हर कोशिका , हर ऊतक , हर अंग में एचआइएफ मौजूद है। ऑक्सीजन की कमी से किसी भी कोशिका को कभी भी जूझना पड़ सकता है। कुदरत ने इसलिए हर कोशिका को एचआइएफ से नवाज़ा है।

 जिस रसायन को सायक्लिस्टों ने अवैध रूप से इस्तेमाल किया , वह सामान्य कोशिकाओं में एचआइएफ को नष्ट होने से रोक देता है। उसे स्टेबिलाइज़ कर देता है। इसकी वजह से एचआइएफ कोशिकाओं के भीतर उन प्रोटीनों का निर्माण सामान्य स्थिति में ही शुरू कर देता है , जिनका निर्माण केवल ऑक्सीजन की कमी में होना चाहिए था। एचआइएफ के कारण ही अस्थि-मज्जा में हीमोग्लोबिन से भरी लाल रक्त कोशिकाओं का उत्पादन बढ़ने लगता है। इसी वजग से इस रसायन को इस्तेमाल करने वाले सायकिल चलाते समय बेहतर प्रदर्शन में क़ामयाब हो जाते हैं। अधिक लाल रक्त कोशिकाएँ , अधिक ऑक्सीजन-संवहन। नतीजन कम थकान और बेहतर प्रदर्शन।

कैंसर-कोशिकाएँ अलग-अलग तरीक़ों से ऑक्सीजन की कमी से बचने की जुगत लगाती हैं। घावों के भराव व तरह-तरह के रोगों में ऑक्सीजन का होना-या न होना बहुत मायने रखता है। मस्तिष्क की तमाम बीमारियों जैसे अल्ज़्हायमर्स , पार्किसंस व अन्य कई में ऑक्सीजन की कमी का योगदान अनेक शोधों में पाया गया है। ऐसे में नॉर्मॉक्सिया-हायपॉक्सिया को समझकर हम दवाओं के निर्माण में इसे भुना सकते हैं। कैंसरों व तमाम डिजनरेटिव बीमारियों की रोकथाम के लिए हायपॉक्सिया , हायपॉक्सिया-इंड्यूसिबल-फ़ैक्टर व इसके कारण होने वाले प्रोटीन-परिवर्तनों की समझ लाभकारी है।

इस वर्ष का नोबल-पुरस्कार ऑक्सीजन को 'महसूस करने' के लिए है। कैसे शरीर की बिलियनों इकाइयाँ उसके होने या न होने को बोधती हैं। वह ऑक्सीजन जो हमारे शरीर के भीतर सभी को चाहिए। अच्छों को भी , बुरों को भी। कैसे वे उसके होने-न होने के कारण बदलती हैं , कैसे उससे समझौता करती हैं। जो सभी के लिए इतनी आवश्यक है , उसकी कमी के कारण होने वाले बदलाव समझना विज्ञान के लिए ज़रूरी है। वहाँ अनेक सम्भावित दवाओं के राज़ छिपे हैं , वहीं अनेक जीवन-रक्षण की सम्भावनाएँ भी।