Saturday, 13 April 2019

ब्लैक होल पर विशेष

स्कंद शुक्ला
दुनिया-भर में फैले रेडियो-टेलिस्कोपों ने पहली बार हमारी सआकाश गंगा के केन्द्र में स्थित ब्लैक होल का चित्र खींचा , तो कविमित्र से उस 'मुख-नाभि' पर चर्चा होनी ही थी।

"ब्लैक होल को जानने के लिए विज्ञान-जगत् में इतनी दीवानगी क्यों है ?"

"ब्लैक होल गुरुत्व का चरम है। सिंगुलैरिटी। वहाँ जहाँ सब कुछ नष्ट हो जाता है। उसकी वह सरहद , जिसे हम ईवेंट-होराइज़न कहते हैं , उसके परे हम जानना ही नहीं बल्कि जाना चाहते हैं। किन्तु वर्तमान भौतिकी के नियमों के अन्तर्गत और वर्तमान भौतिकी से संचालित शरीर और यन्त्र लेकर जा नहीं सकते। इसलिए दीवानगी तो बनती ही है।"

"हम्म। जहाँ हम जाना चाहें और न जा सकें , वह प्राकृतिक अवयव दीवाना तो करता ही है।"

"बिलकुल। जिसे हमने आज-तक केवल कल्पनाओं व अप्रत्यक्ष विधियों के सहारे चित्रित किया हो , उसे हम आज टेलिस्कोपों से वास्तविक रूप में देख सके हैं। धुँधला ही सही , किन्तु वह चित्र सत्य तो है ! महत्त्व उस शक्तिशाली पिण्ड के दर्शन का है , जिसके एक चम्मच द्रव्यमान में करोड़ों सूर्यों की द्रव्यराशि समाहित है !"

"ब्लैक होल के बारे में जानकर भौतिकी किस तरह समृद्ध हो रही है ? दर्शन की अभिभूति के अलावा ?"

"ब्लैक होल वह स्थान है , जहाँ गुरुत्व चरम पर है। वहाँ आइंस्टाइन के नियम और क्वाण्टम भौतिकी के नियम का संगम देखने को मिलता है। बल्कि नियम वहाँ सम्मिलित होकर नष्ट हो जाते हैं। ब्रह्माण्ड के पिण्ड नष्ट , उन्हें संचालित करने वाले नियम भी नष्ट। अतिवृहत् और अतिसूक्ष्म के भौतिक नियमों को हम मिला कर एक सिद्धान्त नहीं बना पा रहे। इस तरह से यह ब्लैक होल हमारी आकाशगंगा की वह मुखनाभि है , जहाँ से हमें जीवन की उम्मीद नहीं किन्तु जीवन को स्थान देने वाले निर्जीव ब्रह्माण्ड के अनेकानेक पिण्डों के जन्म की भी जानकारियाँ प्राप्त होती हैं और होती रहेंगी। यह वह मुख भी है , जिसमें ढेरों तारे व अन्य पिण्ड विनष्ट हो जाते हैं और उनकी ऊर्जा हॉकिंग-विकिरण बनकर ब्रह्माण्ड में फैल जाती है। ब्लैक होल प्रकाश को अपना बन्धक बना लेते हैं , द्रव्यमान को भी , लेकिन हॉकिंग विकिरण उनके ईवेंट होराइज़न से बाहर फूटा करती है।"

"इस हॉकिंग-विकिरण का प्रभाव ?"

"यों समझ लें कि इससे ब्लैक होल आकार में सिकुड़ता जाता है और एक दिन समाप्त हो जाता है।"

"यानी एक दिन यह भी नष्ट !"

"ब्रह्माण्ड सतत परिवर्तनशील है। यहाँ कुछ भी सदा-सर्वदा के लिए। न तारे , न ग्रह , न उपग्रह , न आकाश गंगा , न नीहारिका , न ब्लैकहोल। सब जन्मते हैं , मरते हैं। कविता की भाषा में कहें तो आकाश की यह मुख-नाभि विनष्टि और निर्माण , दोनों की परिस्थितियाँ पैदा करती रहती है।"

"हमारी आकाशगंगा के केन्द्र में जो ब्लैकहोल है , उसका नाम सैजीटेरियस ए स्टार है  न ?"

"जी। ढेर सारी गैलेक्सियों के केन्द्रों में इस तरह के महाविशाल ब्लैकहोल मौजूद हैं। ब्रह्माण्ड के प्रयाग , जहाँ भौतिकी के नियमों का संगम-विलय होता है और जिन्हें हम ढंग से अपने गणित और जीवन के द्वारा विचरना चाहते हैं।"

ब्लैक होल की छाया

ब्लैक होल की छाया : एक प्रश्नोत्तरी
चंद्रभूषण
हॉलिवुड की साई-फाई फिल्मों में ब्लैक होल किसी जादुई चीज की तरह आते हैं। ब्रह्मांड में इधर से उधर या समय में आगे-पीछे ले जाने वाली रहस्यमय चीजें। लेकिन अभी दुनिया में भारी उत्सुकता जगाने के बाद एक ब्लैक होल की जो तस्वीर जारी हुई है, उसमें यह खास शक्ल वाले किसी आकाशीय पिंड जैसा ही लग रहा है। क्या इसे ऐंटी-क्लाइमैक्स समझा जाए?

- ब्लैक होल भौतिकी का एक चरम बिंदु है। अभी पचास साल पहले तक शीर्ष वैज्ञानिकों को भी यह सिर्फ एक खयाली चीज लगती थी। खुद आइंस्टाइन को भी इसके होने का भरोसा नहीं था। फिर बहुत सारे प्रेक्षणों से ब्लैक होल जैसी ही चीजों की मौजूदगी का अंदाजा मिलने लगा। यानी तारों से बहुत ज्यादा भारी कोई चीज, जो किसी भी सूरत में, धुंधली से धुंधली शक्ल में भी नजर नहीं आती। अभी जो तस्वीर आप देख रहे हैं, वह ब्लैक होल की नहीं उसकी छाया की तस्वीर है।
   स्थान और समय से जुड़े इसके रहस्य आज भी ज्यों के त्यों हैं और उनकी आजमाइश का कोई जरिया अभी किसी के पास नहीं है। लेकिन इतनी विचित्र चीज का कुछ भी आंखों के सामने मौजूद होना खुद में एक जिंदा चमत्कार है। ऐंटी-क्लाइमैक्स क्यों, एक लंबे क्लाइमैक्स की शुरुआत कहें इसे।

ब्लैक होल की छाया? जिस चीज की कोई शक्ल ही नहीं, उसकी छाया? यह क्या गड़बड़झाला है?

- हां, यह काफी टेढ़ी बात है फिर भी सच के करीब है। अलबत्ता इसे ब्लैक होल की तस्वीर बताना सिरे से झूठी बात होगी। यूं समझिए कि ब्लैक होल बिना लंबाई-चौड़ाई-गहराई वाला एक ऐसा छेद है, जिसमें सारी चीजें, यहां तक कि रोशनी भी गिरती जाती है। फिर भी भरना तो दूर, वजन बढ़ने के साथ इसकी भूख और-और बढ़ती चली जाती है। इतनी खतरनाक चीज के इर्द-गिर्द एक इलाका ऐसा भी होता है, जिसके बाहर कोई चीज सुरक्षित रह सकती है और उसके बारे में हम कुछ जान भी सकते हैं, लेकिन जिसका भीतरी दायरा लांघते ही वह ब्लैक होल में गुम हो जाती है और हम नहीं जान सकते कि इसके बाद उसका क्या हुआ।
   इस दायरे को घटना क्षितिज या इवेंट होराइजन का नाम दिया गया है। तस्वीर में जो मोटा सुनहला कंगन हमें दिखाई पड़ रहा है, उससे ब्लैक होल के घटना क्षितिज के करीबी माहौल का अंदाजा मिल रहा है। खुद यह तस्वीर प्रकाश किरणों के ब्लैक होल के इर्द-गिर्द घूम जाने से बनी है, जो लेंस से किसी चीज की छाया बनने जैसा है।

इस तस्वीर और इसके ऑब्जेक्ट के बारे में कुछ और बताइए। क्या इसने ब्लैक होलों के बारे में हमारी कोई राय अंतिम तौर पर बदली है?

- हमारी आकाशगंगा के पड़ोस में इससे कई गुना ज्यादा बड़ी एक और आकाशगंगा है, जिसका नाम वर्गो-ए या मेसियर-87 है। इसके बीचोबीच, धरती से साढ़े पांच करोड़ प्रकाशवर्ष की दूरी पर हमारे सूरज का साढ़े छह अरब गुना वजनी एक ब्लैक होल मौजूद है। इसके दम का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि तस्वीर के कंगन में जो कलाई वाली खाली जगह है, उसकी चौड़ाई सूरज से धरती की दूरी की चालीस गुनी, लगभग दस अरब किलोमीटर है।
   और बाहर जो कंगन वाला सोना दमक रहा है, उसका तापमान चार से छह अरब डिग्री के बीच है। इसे समझने के लिए सूरज भी नाकाफी है क्योंकि उसके सबसे गरम हिस्से कोरोना का तापमान भी 10 लाख डिग्री से ऊपर नहीं जाता। इतने प्रचंड आकार और दमक वाला कंगन सिर्फ दूरी और बीच की धुंध के चलते अबतक हमारी नजरों से ओझल था।
   आकाश की सबसे धुंधली चीजों के प्रेक्षण का शास्त्र रेडियो एस्ट्रॉनमी लंबे समय से इसे देखने-परखने की कोशिश में जुटा था। इवेंट होराइजन टेलीस्कोप परियोजना में उसने कई ताकतवर रेडियो टेलीस्कोपों को इस तरह एक साथ आजमाया है कि पूरी धरती ही एक विराट टेलीस्कोप बन गई है! रही बात राय बदलने की तो ब्लैक होल में स्पेसशिप घुसा देना आगे अब आपको शायद ही किसी फिल्म में दिखे।

Saturday, 6 April 2019

कैसे बचें समुद्री जीव

चंद्रभूषण
अगर आप अपने इर्द-गिर्द के पर्यावरण ध्वंस से परेशान हैं तो जरा समुद्री जीवों पर आई विपत्ति के बारे में सोचकर देखें। टेक्नॉलजी ने जलजीवों के शिकार की क्षमता बहुत बढ़ा दी है और गहरे समुद्रों में जैविक सर्वनाश पर नजर रखने के लिए कोई सरकारी या गैर-सरकारी अथॉरिटी भी नहीं है। ऊपर से ग्लोबल वार्मिंग ने विशाल समुद्री इलाकों की ऑक्सीजन चूसकर उन्हें बंजर बना दिया है। समुद्री जीव वहां रहना तो दूर उधर से गुजरने में भी डरते हैं।

इन बुरी खबरों के बीच अकेली अच्छी खबर यह है कि लगातार घटती समुद्री पकड़ ने सरकारों को जता दिया है कि यह किस्सा यूं ही चलता रहा तो अगले दस-बीस वर्षों में ह्वेलिंग के अलावा समुद्रों से मछली, केकड़ा, झींगा पकड़ने के कारोबारों पर भी ताला पड़ जाएगा। इससे कई छोटी अर्थव्यवस्थाएं तबाह होंगी और मानवजाति प्रोटीन के सबसे बड़े स्रोत से वंचित हो जाएगी। पर्यावरण पर इसका क्या असर पड़ेगा, कोई नहीं जानता।

इन आशंकाओं के मद्देनजर तीन वैज्ञानिक समूहों ने ग्रीनपीस, प्यू ट्रस्ट और नेशनल ज्योग्राफिक की परियोजनाओं के तहत सारे समुद्रों का सर्वे किया और अभी अपनी रिपोर्टें संयुक्त राष्ट्र के सामने पेश करने की तैयारी में हैं। इन रिपोर्टों में समुद्री सतह के नीचे मौजूद सारे पर्वतों, गर्तों और गर्म पानी के स्रोतों के ब्यौरे शामिल हैं और यह जिक्र भी है कि किस जीवजाति के सर्वाइवल के लिए कौन सा इलाका ज्यादा महत्वपूर्ण है।

ऐसा सर्वे कुछ साल पहले तक संभव नहीं था क्योंकि इसके लिए जरूरी टेक्नॉलजी ही दुनिया में मौजूद नहीं थी। लेकिन अभी समुद्री जीवों की टैगिंग और जीपीएस के जरिये समुद्र के हरेक वर्ग किलोमीटर के साथ किसी जीव के रिश्ते को लेकर पूरी जानकारी हासिल की जा सकती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि एक वैश्विक संधि के जरिए अगर 40 फीसदी समुद्रों में शिकार और उत्खनन पर रोक लगाई जा सके तो 30 फीसदी समुद्री जीवजातियों की निरंतरता सुनिश्चित की जा सकेगी।

Saturday, 30 March 2019

लैंग्लैंड्स प्रोग्राम यानी गणित की ग्रैंड यूनिफिकेशन थियरी

लैंग्लैंड्स प्रोग्राम यानी गणित की ग्रैंड यूनिफिकेशन थिअरी
चंद्रभूषण
इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के प्रो. हरिश्चंद्र के शिष्य डॉ. रॉबर्ट लैंग्लैंड्स को गणित में पिछले पचास वर्षों से ‘लैंग्लैंड्स प्रोग्राम’ के लिए जाना जाता है, जिसको कुछ लोग भौतिकी की बहुप्रतीक्षित ‘ग्रैंड यूनिफिकेशन थिअरी’ की तर्ज पर गणित की जीयूटी भी कहते हैं। गणित के बारे में ज्यादातर लोगों की राय यही होती है कि दो दूनी चार अब से हजारों साल पहले भी होता रहा होगा और आज भी यह दो दूनी चार ही होता है, फिर इसमें नई खोज की गुंजाइश कहां से बनती होगी?

इससे ऊंचे स्तर वाली समझ के लोग अप्लाइड मैथमेटिक्स यानी मुख्य रूप से भौतिकी के जटिल हिसाब-किताब में काम आने वाली गणित में कुछ खोजबीन की भूमिका देख पाते हैं। लेकिन मजे की बात यह कि ऐसे दुराग्रह खुद उच्च गणित के दायरे में भी मौजूद हैं, जिसका शिकार प्रो. लैंग्लैंड्स को होना पड़ा। उन्हें गणित के क्षेत्र में अपने दौर का एकमात्र अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार फील्ड्स मेडल सिर्फ इसलिए नहीं मिल सका, क्योंकि संबंधित वर्ष के निर्णायकों की नजर में उनका काम कुछ ज्यादा ही अमूर्त था!

वैसे भी फील्ड्स मेडल हर चार साल बाद 40 साल से कम उम्र वाले किसी गणितज्ञ को ही मिलता है। एक बार आप उससे चूक गए तो फिर जीवन भर के लिए चूक गए। असाधारण प्रतिभा वाले रॉबर्ट लैंग्लैंड्स ने अपना पहला महत्वपूर्ण काम यह साबित करने के रूप में किया कि घनों के योगफल के रूप में लिखी जा सकने वाली अभाज्य संख्याएं (प्राइम नंबर्स) हार्मोनिक एनालिसिस के जरिये भी निकाली जा सकती हैं। इस वक्तव्य के अटपटेपन पर हम बाद में आएंगे, पहले इसके शुरुआती हिस्से पर बात करते हैं।

रोजमर्रे के काम आने वाली गिनतियां अपने पीछे जो शाश्वत रहस्य छिपाए हुए हैं, उनका शुरुआती दरवाजा अभाज्य संख्याओं में दिखता है। यानी ऐसी संख्याएं, जिनमें खुद उनको और 1 को छोड़कर और किसी भी संख्या का भाग नहीं जाता। इनके बारे में कई प्राथमिक सिद्धांत हैं, जैसे यह कि इन्हें किसी भी प्राकृतिक संख्या के छह गुने से एक कम या ज्यादा की शक्ल में लिखा जा सकता है (जाहिर है, यह नियम 2 और 3 पर लागू नहीं होता।) इसी तरह एक तरीका प्राइम्स को दो वर्गों के जोड़ के रूप में लिखने का भी है, जैसे 41=16 (4 का वर्ग) + 25 (5 का वर्ग)।

इसी तरीके से देखें तो प्राइम्स का एक दुर्लभ समूह ऐसा भी है, जिसे तीन घनों के जोड़ के रूप में लिखा जा सकता है। जैसे, 73=1 (1 का घन) + 8 (दो का घन) + 64 (4 का घन)। अंकगणित के लिए घनों के योगफल का आम फॉर्म्युला हमेशा से एक समस्या रहा है और प्राइम नंबर्स के साथ इसका रिश्ता दोहरी मुश्किल वाला माना जाता रहा है। लेकिन रॉबर्ट लैंग्लैंड्स ने जब कहा कि इन्हें हार्मोनिक एनालिसिस के जरिये भी निकाला जा सकता है तो साठ के दशक में कई गणितज्ञों को लगा कि यह नौजवान सटक गया है।

हार्मोनिक एनालिसिस तरंगों के जोड़-घटाव के अध्ययन का गणित है और इसके साथ अंकगणित का तो तब दूर-दूर तक कोई रिश्ता ही नहीं माना जाता था। लैंग्लैंड्स प्रोग्राम दरअसल आपस में कोई रिश्ता न रखने वाली गणित की विभिन्न शाखाओं की तह में मौजूद किसी ज्यादा गहरे गणितीय सिद्धांत की तलाश का ही कार्यक्रम है, जिसके कुछ हिस्से खुद प्रो. लैंग्लैंड्स ने खोजे और कइयों की खोज में दुनिया भर की गणितीय प्रतिभाएं लगी हुई हैं।

और तो और, उनके इस प्रस्तावित कार्यक्रम के आधार पर डॉ. ऐंड्रयू जे. वाइल्स ने तीन सौ साल से असिद्ध पड़े फर्मा के अंतिम प्रमेय को सिद्ध कर डाला, जिसके लिए उन्हें 2016 में ऐबेल प्राइज का हकदार पाया गया। यह भी दिलचस्प है कि खुद डॉ. लैंग्लैंड्स को गणित का नोबेल कहलाने वाले इस पुरस्कार से दो साल बाद, 2018 में नवाजा गया। काफी पहले से माना जाता रहा है कि लैंग्लैंड्स प्रोग्राम एक ऐसी गणितीय प्रस्थापना है, जो आने वाले दिनों में न सिर्फ गणित बल्कि भौतिकी की फ्रंटलाइन समझ का भी खाका बदल देगी।

दूध और चीन का दिलचस्प कनेक्शन

दूध पर चीनी क्यों हुए लट्टू
शशांक द्विवेदी
किसी देश के आम लोगों का दूध पीना भी क्या दुनिया के लिए चिंता का विषय हो सकता है? क्यों नहीं, बशर्ते उसकी आबादी संसार में सबसे ज्यादा हो और दूध पीने की परंपरा वहां जड़ से शुरू हो रही हो। जाहिर है, हम पड़ोसी मुल्क चीन की बात कर रहे हैं। वहां की 95 फीसदी आबादी हान जाति की है, जिसका शरीर वयस्क होने के बाद दूध नहीं हजम कर पाता। आंकड़ों में कहें तो 1950 में वहां डेरी के नाम पर कुल 1 लाख 20 हजार देसी गायें दर्ज की गई थीं, जिनमें ज्यादातर इनर मंगोलिया में और कुछ तिब्बत में थीं।

यहां यह बताना जरूरी है कि संसार में सबसे पहले दूध पिये जाने के प्रमाण तुर्की में (ईसा से 7000 साल पूर्व) मिलते हैं, लेकिन सबसे ज्यादा तरह के जानवर अभी मंगोलिया में ही दुहे जाते हैं। वहां सात जानवरों की बाकायदा अलग डेरियां चलती हैं। इसके विपरीत हमारे यहां सिर्फ गाय का दूध अलग मिल पाता है, वह भी अब जाकर। गाय के अलावा हमारे यहां भैंस और बकरी दुही जाती है, कहीं-कहीं भेड़ और ऊंट भी। लेकिन इन पांच के सिवा छठां दुधारू जानवर खोजना मुश्किल है।

इनर मंगोलिया चीन का अभिन्न अंग होने के साथ-साथ मंगोलियाई सभ्यता का हिस्सा भी है। स्वाभाविक है कि चीन का ज्यादातर दूध वहीं से सप्लाई होता है। पारंपरिक रूप से चीनी कुलीन वर्ग दूध को बर्बर मंगोल हमलावरों की बदबूदार खाद्य सामग्री मानता था। गाय वहां मुख्यतः बीफ के लिए ही पाली जाती थी। लेकिन 1984 में टीवी के फैलाव के बाद चीनियों ने पहली बार लॉस एंजिलिस ओलिंपिक लाइव देखा तो लंबे-चौड़े ताकतवर विदेशियों को देखकर दंग रह गए।

उन्हें यह जानकारी भी मिली कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जापान पर अमेरिकी कब्जे के दौरान वहां की डाइट में दूध और अंडे के प्रवेश से जापानियों की औसत लंबाई एक पीढ़ी के अंदर एक इंच बढ़ गई थी। फिर तो दूध के प्रति इस नए आकर्षण को भांपकर चीन की कम्यूनिस्ट सरकार ने दूध के प्रचार की झड़ी लगा दी और इसे घर-घर पहुंचाने की कोशिशें भी शुरू कर दीं। इस एहतियात के साथ कि बच्चों के मां का दूध छोड़ने के बाद उन्हें हर दिन गाय का दूध पिलाया जाए।

नतीजा यह रहा कि 2015 की गणना में वहां 1 करोड़ 30 लाख खूब दूध देने वाली जर्सी गाएं दर्ज की गईं। ये गायें पहले छिटपुट किसान पालते थे, लेकिन अभी ये बड़े-बड़े हाइली मैकेनाइज्ड फार्मों में पाली जाती हैं। डर इस बात का है कि चीनियों में दूध की मांग इसी रफ्तार से बढ़ती गई तो धरती का एक बड़ा इलाका बंजर हो जाएगा। कारण? पर्यावरणविदों के पास मोटा हिसाब है कि प्रकृति को 1 लीटर दूध बनाने के लिए 1022 लीटर पानी खर्च करना पड़ता है!

Sunday, 24 March 2019

करोड़ो साल पुराने जीवाश्मों का खजाना

52 करोड़ साल पुराने जीवाश्मों का खजाना
चंद्रभूषण
जीवाश्मशास्त्रियों के लिए मूसलों से ढोल बजाने का वक्त है। दक्षिण-मध्य चीन के हूपेई प्रांत में एक छोटी सी पहाड़ी नदी तानश्वी के किनारे उन्हें अतिप्राचीन जीवाश्मों का सबसे बड़ा खजाना प्राप्त हुआ है। पत्थरों में दर्ज जीवजगत के प्रारंभिक दौर का इतना सुंदर नजारा संसार भर में इससे पहले कभी देखने को नहीं मिला था।

जीवाश्मों की खोज में निकली एक यूनिवर्सिटी टीम छिंगच्यांग नाम की जगह पर नदी किनारे बैठी लंच कर रही थी कि तभी एक वैज्ञानिक की नजर एक तरफ के चट्टानी करार के पैटर्न पर गई। इसमें भूरी और काली लहरें बनी थीं, जिनसे सुदूर अतीत में किसी समुद्री भूस्खलन का अंदाजा मिलता था।

फिर उन्होंने चट्टानी परतों को एहतियात से अलगाया तो उन्हें बिल्कुल पास-पास कई हजार समुद्री जानवरों के फॉसिल मिल गए। इनमें 101 जीवजातियों की पहचान की गई, जिनमें आधी से ज्यादा ऐसी हैं, जिन्हें पहली बार देखा गया है। पहचाने गए जीवों में 4 सेंटीमीटर का एक मड ड्रैगन भी है, जिसकी समुद्री कीचड़ में पाई जाने वाली मौजूदा नस्ल कुछ मिलीमीटर से ज्यादा बड़ी नहीं होती।

51 करोड़ 80 लाख साल पुराने ये जीवाश्म इतने संरक्षित हैं कि इनकी आंखें, तमाम मुलायम मांसपेशियां और कई के तो बाल से भी पतले अंग बिल्कुल साफ नजर आ रहे हैं। दरअसल इन सारे जीवों का संबंध कैंब्रियन युग (53 करोड़ से 49 करोड़ साल पूर्व) से है और इनके इतने सुघड़ संरक्षण की वजह यह है कि किसी भूकंप में दबकर ये समुद्र की तली में पहुंचे होंगे और वहीं ज्यों के त्यों पड़े रह गए होंगे।

Thursday, 14 March 2019

अल्बर्ट आइंस्टाइन के बारें में विशेष ,उनके जन्मदिन पर खास पेशकश

प्रदीप कुमार
आज अल्बर्ट आइंस्टाइन का जन्मदिन है :
उन्नीसवी शताब्दी के अंत में गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत, विद्युत्-चुंबकीय सिद्धांत, ऊष्मागतिकी वगैरह क्षेत्रों में इतनी प्रगति हो चुकी थी कि सैद्धांतिक भौतिकी के पंडितों ने यह दावा कर दिया था कि भौतिकी में जो भी नई खोजें हो सकती थीं, वे हो चुकीं हैं और अब नया खोजने के लिए कुछ भी नहीं रह गया है। जैसे सिकंदर ने बचपन में अपने पिता से इस बात की शिकायत की थी कि जिस प्रकार से वे दुनिया को फतह कर रहे हैं उसके चलते उसके पास विजय पाने के लिए कुछ भी नहीं बचेगा, ठीक उसी प्रकार से वैज्ञानिकों को भी विज्ञान (विशेषकर भौतिकी) से शिकायत थी! मगर वास्तव में ऐसा नहीं हुआ क्योंकि वैज्ञानिकों द्वारा स्वीकृत सिद्धांतों पर नए प्रयोगों ने प्रश्नचिन्ह लगा दिए और धीरे-धीरे इन पुराने सिद्धांतों की उपयोगिता कम होने लगी तथा ब्रह्मांड की व्याख्या के लिए नए सिद्धांतों की आवश्यकता महसूस की जाने लगी। और इसके बाद तो भौतिकी में महान आविष्कारों की झड़ी-सी लग गई और एक्स-रे, रेडियोसक्रियता, इलेक्ट्रॉन, रेडियम, प्रकाश-विद्युत प्रभाव, क्वांटम सिद्धांत आदि खोजें भौतिकी के क्षितिज पर प्रकट हुईं। और, 1905 में जैसे चमत्कार ही हो गया। बर्न के पेटेंट ऑफिस में एक क्लर्क की हैसियत से काम कर रहे 26 वर्षीय अल्बर्ट आइंस्टाइन ने भौतिकी की स्थापित मान्यताओं को चुनौती देते हुए दिक्काल (यानी स्पेस-टाइम) और पदार्थ की नई धारणाओं के साथ चार शोध पत्र प्रकाशित किए जिन्होंने सैद्धांतिक भौतिकी को झकझोरकर उसका कायाकल्प ही कर दिया।
पहला शोध पत्र प्रकाश-विद्युत् प्रभाव की व्याख्या प्रस्तुत करता था, जिसने क्वांटम सिद्धांत को आधार प्रदान किया।  दूसरे शोध पत्र ने ब्राउनियन मोशन की व्याख्या की तथा परमाणु और अणु की वास्तविकता को सुनिश्चित किया। तीसरा शोध पत्र विशेष सापेक्षता सिद्धांत से संबंधित था। इसमें आइंस्टाइन ने यह बताया कि समय, स्थान और द्रव्यमान तीनों ही गति के अनुसार निर्धारित होते हैं। चौथे शोध पत्र में उन्होंने द्रव्य और ऊर्जा के बीच के संबंध को स्थापित करते हुए मशहूर E=mc² सूत्र प्रतिपादित किया था। आइंस्टाइन तत्कालीन भौतिकी में शैतानरूपी विपदा के समान आए और तब न्यूटन पर एल्कजेंडर पोप के तुक्तक (‘प्रकृति और प्रकृति के नियम अंधरे में ओझल थे / ईश्वर ने कहा,  न्यूटन को आने दो और सबकुछ पता चल गया।’) की नकल करते हुए सर कोलिंग्स स्क्वायर को कहना पड़ा : ‘यह अंतिम नहीं था और शैतानी हुंकार भरी, छी / यथास्थिति बहाल करने के लिए आइंस्टाइन को आने दो।’
यह सब उल्म शहर (जर्मनी) एक ऐसे लड़के ने आगे चलकर किया था, जिसको परिवार और विद्यालय ने मंदबुद्धि घोषित कर दिया था; जिसने पढ़ाई पूरी होने से पहले ही विद्यालय छोड़ दिया था;  पॉलिटेक्निक प्रवेश  परीक्षा में असफल हो चुका था; जिसे पढ़ाई पूरी करने के बाद विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य प्राप्त करने में भी असफल होने के बाद एक क्लर्क की नौकरी से ही संतोष करना पड़ा था।
आइंस्टाइन का जीवन इस बात का प्रमाण है कि साधारण से भी साधारण व्यक्ति भी परिश्रम, साहस और लगन से सफलता प्राप्त कर सकता है। वैसे 1905 में प्रकाशित आइंस्टाइन के शोध पत्रों से भौतिकी में तत्काल कोई परिवर्तन नहीं हुए। मगर जैसे ही आइंस्टाइन के कार्यों को सही मान्यता मिली उनके सामने पदों को स्वीकार करने के लिए विश्वविद्यालयों और अकादमियों की भीड़ लग गई। इसी बीच आइंस्टाइन ने अपने सापेक्षता सिद्धांत का विकास करते हुए सामान्य सापेक्षता सिद्धांत को प्रतिपादित किया।
सामान्य सापेक्षता सिद्धांत ने एक नए संकल्पना को जन्म दिया, जिसके अनुसार : ‘यदि प्रकाश की एक किरण अत्यंत प्रबल गुरुत्वाकर्षण के क्षेत्र से गुजरेगी, तो वह मुड़ जाएगी।’ 1919 में ब्रिटेन के खगोल वैज्ञानिकों ने पूर्ण सूर्यग्रहण के अवसर पर किये गये अवलोकनों से आइंस्टाइन के इस पूर्वानुमान की सत्यता प्रमाणित की। अगले दिन आइंस्टाइन जब सोकर उठे तो उनकी दुनिया ही बदल गयी थी। उनके इस सिद्धांत को न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत के बाद दुनिया का सबसे बड़ा आविष्कार माना गया। आम लोगों में यह धारणा बन गयी कि इस सिद्धांत का अन्वेषक अवश्य ही अलौकिक प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति होगा। आइंस्टाइन का नाम प्रतिभा का पर्याय बन गया। आइंस्टाइन के मस्तिष्क को एक चमत्कारी अति-मानवीय मस्तिष्क माना जाने लगा। दुनिया के इन सब मिथकों से दूर आइंस्टाइन सदैव सादगी की मूर्ति बने रहें और व्यक्तिपूजा के खोखलेपन को उजागर करते रहे।
हालाँकि क्वांटम यांत्रिकी का बीज बोने के बावजूद खुद आइंस्टाइन संभाविता आधारित क्वांटम यांत्रिकी को जीवन भर स्वीकार नहीं कर पाए। अलबत्ता, अपने विरोध के बावजूद आइंस्टाइन इसे सबसे सफल व्यवहारिक सिद्धांत मानते थे। इसी प्रकार से आइंस्टाइन ब्रह्मांड को स्थिर मानते रहे, परंतु जब एडविन हबल ने अपने प्रयोगों के आधार पर बताया कि ब्रह्मांड फ़ैल रहा है, तब आइंस्टाइन ने इसे अपने जीवन की सबसे बड़ी भूल माना। ‘मुझसे गलती हो गई’ यह कहना अपने आप में वैज्ञानिक मनोवृत्ति का एक महत्वपूर्ण लक्षण है। आइंस्टाइन ने हमे बता दिया कि विज्ञान में कोई भी सर्वज्ञानी नहीं होता!
आइंस्टाइन ने सिर्फ भौतिकी में ही क्रांति नहीं लायी बल्कि उन्होंने नस्लवाद, जातिवाद और युद्धवाद से भी लोहा लिया। वे जीवनभर शांति, अहिंसा, सामाजिक न्याय, मानवता और समाजवाद के पक्षधर रहे। आइंस्टाइन को जितना मीडिया प्रचार मिला, अब तक उतना प्रचार न्यूटन के अलावा किसी भी वैज्ञानिक को नहीं मिला। 14 मार्च, 1879 को  जन्में शांतिवादी और मानवतावादी वैज्ञानिक आइंस्टाइन की मृत्यु 18 अप्रैल, 1955 को हुई। टाइम पत्रिका ने आइंस्टाइन को बीसवी सदी का सबसे प्रभावशाली मनुष्य माना। दिक्, काल और ब्रह्मांड संबंधी हमारे समझ में विस्तार के साथ भौतिकी की दुनिया में अंतर्ज्ञान विरोधी अवधारणाओं को उखाड़कर प्रकृति को गहराई से समझने के प्रयास में युगांतरकारी आइंस्टाइन को सैदव याद रखा जायेगा।

Wednesday, 13 March 2019

न्यूटन के तीसरे नियम के संशोधन पर इंटरव्यू

*न्यूटन के तीसरे नियम के संशोधन पर अजय शर्मा जी का  इंटरव्यू*

*प्र.1*: न्यूटन की गति का तीसरा नियम क्या है? इसे कैसे समझा जा सकता है?
*अजय शर्माः* न्यूटन ने तीसरा नियम अपनी पुस्तक प्रिसीपिया मे 1686 में दिया था इसके अनुसार क्रिया (Action ) प्रतिक्रिया (Reaction)  हमेशा बराबर और विपरीत होते हैं। जो नियम मैंने सुझाया हे उसके अनुसार क्रिया प्रतिक्रिया के बराबर, कम या ज्यादा भी हो सकती है।

*प्र.2:* इस संबंध में आपने कौन से नये प्रयोग सुझाये है
*अजय शर्माः* मान लो एक 100 ग्राम भार की विशेष रबड़ की गेंद 1 मीटर ऊंचाई से फर्श पर गिरती है यह फर्श से टकराकर 1 मीटर ऊंचाई तक ऊपर उछलती है मान लो हम इस गेंद के आकार को बदल देते है और यह गोल से अर्धगोलाकार, त्रिभुज या शंकु के आकार की बना देते है है। वास्तव में आकार के बदलाव की वजह से अब 100 ग्राम की वस्तु 1 मीटर तक नही उछलती है। न्यूटन के नियम के अनुसार हर वस्तु को 1 मीटर की ऊंचाई तक उछलना चाहिए। अलग अलग संरचना ( लकड़ी, रबड़ ) और आकार के वस्तुएं भी ली जा सकती हैं।

*प्र.3:* क्या न्यूटन ने वस्तु के आकार के बारे में कुछ नही कहा?
*अजय शर्माः* बिल्कुल नहीं। न्यूटन का नियम सिर्फ भार (क्रिया) के बारे में ही कहता हैं आकार के बारे में कुछ नहीं। इस तरह न्यूटन के अनुसार आकार और कम्पोजिशन  पूरी तरह बेमानी है। संवेदनशील प्रयोगों से नियम की खामी जग जाहिर हो जाएगी।
*प्र.4:* आपने इसकी व्याख्या कैसे की है?
*अजय शर्माः* मैंने न्यूटन के नियम को बदला है। संशोधित नियम में एक नया घटक या फैटर आ जाता हे जो वस्तु आकार और सरंचना की व्याख्या करता है।

*प्र०5:* क्या वैज्ञानिक जगत आपसे सहमत
*अजय शर्माः* हां अमेरिकन एसोसिएशन आफ फिजिक्स टीचर्ज के प्रेजीडैंट प्रोफेसर गारडन रामसे ने 22 अगस्त, 2018 को लिखित रिपोर्ट में कहा है कि अजय शर्मा के प्रयोगों से न्यूटन का तीसरा नियम गलत सिद्ध हो सकता है। 105वीं वी इंडियन सांइस कांग्रेस ने भी अपनी प्रोसीडिग्ज (फिजिकल साइसिज) में मेरा शोध पत्र प्रकाशित किया  है।
(i) अमेरिकन एसोसियेसन आफ फिजिक्स टीचरज के प्रैजीटैड प्रोफैसर गौरडन रामसे ने अपनी 22 अगस्त 2018 की रिपोर्ट में लिखा है कि अजय के सुझाये प्रयोगों से न्यूटन की गति का तीसरा नियम गलत साबित हो सकता है।

(ii) स्प्रिंगर के जनरल ‘फाउडेशन आॅफ फिजिक्स’ के जनरल के फ्रांसीसी एडिटर-इन-चीफ प्रौफैसर कारलो रोबैली ने 10 जून 2018 की रिपोर्ट में लिखा है। कि अजय के प्रयोगों से न्यूटन के नियम की सम्भावित खामी दर्शायी जा सकती है।

(iii) 105वी इंडियन सांइस कांग्रेस 2018 के फिजिक्स सांइसिस के एडिटर ने भी अजय की शोध को प्रोसीडिग्ज में प्रकाषित किया है।
(vi) 4 दिसम्बर 2018 को इंडियन अकादमी आफ सांइसिज के जरनल ‘रेजोनेंस’ के एडिटर ने लिखा है कि अजय का कथन सही है कि न्यूटन के नियम को प्रयोग द्वारा परिमाणात्मक तौर सिद्ध करना आवष्यक हैं।
इस तरह विज्ञान जगत अजय के प्रयोगों की पुष्टि कर चुका है।

*प्र॰ 6:* तो इतने महत्वपूर्ण प्रयोग अब तक रूके क्यों है ?
*अजय शर्माः* इन प्रयोगों पर लगभग 8-10 लाख रुपये खर्च होगें ये प्रयोग इजनीयरिग रिसर्च की प्रयोगशाला में ही हो सकते हैं। मैं माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, साइस एंड टैक्नोलोजी मंत्री डाॅ हर्ष वर्धन, मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर और शिक्षा मंत्री सुरेश भारद्धाज से प्रयोगों की सुविधाओं की मांग कर रहा हूँ।

*प्र॰7:*- लेकिन अन्तरिक्ष में जाने वाले राकेट भी न्यूटन के तीसरे नियम पर आधारित हैं।
*अजय शर्माः* रॉकेटों की खेज न्यूटन से लगभग 400 वर्ष पहले चीन में हो चुकी थी। अब वैज्ञानिक कहते है कि जो धुंआ, चिंगारिया, गैस आदि पीछे निकलती है, उसी से राकेट को आगे जाने के लिए धक्का लगता है। पर इस बात की परिमाणात्मक पुष्टि अभी तक इसरो, नासा ने नहीं की है। इस तरह न्यूटन का नियम यहां मोटे तौर पर ही सही है
दूसरी तरफ जब जहाज, हैलीकौप्टर उड़ते है तो उन्हें राकेट की तरह धुंआ, चिंगारिया, गैस आदि से कोई भी धक्का नहीं लगता है। तो खुद वैज्ञानिक न्यूटन के नियम को गलत साबित कर रहे हैं।

प्र॰8  इससे तो विज्ञान का आधारभूत ढांचा  ही बदल जाएगा ।
अजय शर्माः  अगस्त 2018 में एक अमरीकी वैज्ञानिक ने वाशिगटन कान्फरैस में कहा कि इन प्रयोगों की सफलता से भारत को नोबेल प्राइज मिल सकता है। इससे भारत का नाम दुनिया के हर स्कूल में जाएगा।
*Ajay Sharma*   Email   ajoy.plus@gmail.com, Mobile: *94184-50899*

Sunday, 10 March 2019

जूनो ने बदली बृहस्पति की समझ

चंद्र भूषण
सूर्यदेव के ज्येष्ठ पुत्र के बारे में हालिया समझ के लिए पढ़ें पिछले साल की यह पोस्ट, इस जोड़ के साथ कि कई और बुनियादी जानकारियाँ हमें सौंपकर जूनो यान पिछली जुलाई में बृहस्पति में ही विलीन हो चुका है।

जूनो ने बदली बृहस्पति की समझ                                                                                                                                                      

करीब 20 महीने से नासा का अंतरिक्ष यान जूनो बृहस्पति ग्रह के चक्कर लगा रहा है। इसके भेजे धुआंधार आंकड़ों के विश्लेषण से निकाले गए नतीजे पिछले आठ-नौ महीनों से शोध पत्रिकाओं में छप रहे हैं। इसे सूचना क्रांति का कमाल कहना चाहिए कि इतने कम समय में इसने हमारे सौरमंडल के सबसे विशाल ग्रह के बारे में विशेषज्ञों की राय को कई पहलुओं से बदल दिया है। इतना ही नहीं, इसने गैसीय ग्रहों की हमारी समझ को भी काफी महीन बनाया है, जो अन्य तारों के इर्द-गिर्द पाए जाने वाले इस बिरादरी के और ग्रहों को समझने में भी हमारे काम आएगी।

संदर्भ के लिए बता दें कि अमेरिकी अंतरिक्ष संस्था नासा ने 5 अगस्त 2011 को यह स्पेसक्राफ्ट बृहस्पति के लंबे सफर के लिए रवाना किया था। प्रेक्षण के लिए इस पर सिर्फ दो तरह के उपकरण लगे हैं। तस्वीरें लेने के लिए कैमरे और गुरुत्वाकर्षण में बारीक बदलावों का अध्ययन करने के लिए बेहद संवेदनशील गुरुत्वमापी। शोध पत्रिका ‘नेचर’ में हाल में छपी चार अध्ययन रिपोर्टों और पिछले साल बृहस्पति पर एक जमाने से जारी तूफान को लेकर आई एक रिपोर्ट पर बात करने से पहले हम थोड़ी चर्चा इस ग्रह के बारे में अब तक की कुछ जानकारियों पर भी कर लेते हैं।

सौरमंडल में सूरज से दूर जाने के क्रम में पांचवें नंबर पर पड़ने वाला बृहस्पति वैज्ञानिक दायरे में एक असफल तारा (फेल्ड स्टार) भी कहलाता है। यानी इसका वजन अगर तीन-चार गुना और होता तो शायद यह सबसे निचले स्तर का तारा (ब्राउन ड्वॉर्फ) बन गया होता। अपने ग्रह से तुलना करें तो इसका आकार 1321 पृथ्वियों के बराबर है, जबकि इसकी तोल 317.8 पृथ्वियों जितनी है। जाहिर है, बृहस्पति का घनत्व पृथ्वी से काफी कम है। और तुलना अगर अपने तारे से करनी हो तो इतना ही कहना काफी होगा कि तराजू एक पलड़े पर सूरज को रख दिया जाए तो डंडी सीधी रखने के लिए दूसरे पलड़े पर 1047 बृहस्पति रखने पड़ जाएंगे।

इस ग्रह के आकार का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि 12 पृथ्वियां एक सीध में रख दें तो बृहस्पति की चौड़ाई मिल जाएगी। लेकिन इतना बड़ा ग्रह सिर्फ 10 घंटे में अपनी धुरी पर पूरा घूम जाता है। यानी इसके घूमने की रफ्तार पृथ्वी की तकरीबन सवा सौ गुनी है। सौरमंडल के चारों ठोस भीतरी सदस्यों बुध, शुक्र, पृथ्वी और मंगल के विपरीत बृहस्पति एक गैस जायंट है। 90 फीसद हाइड्रोजन और 10 फीसद हीलियम से बनी बेहद हल्की चीज, जिसमें थोड़ी-थोड़ी मीथेन और अमोनिया की मौजूदगी इसकी गंध को गंदी, दलदली जगहों जैसी बनाती है। लेकिन इस ग्रह की सबसे बड़ी खासियत है इस पर चलने वाले तूफान, जो सैकड़ों वर्षों से इसे रहस्यों की खान बनाए हुए हैं।

गैलीलियो ने अपनी ही बनाई दूरबीन के जरिये लंबे प्रेक्षणों के बाद सन 1610 में इस ग्रह पर लाल, पीली, सफेद पट्टियों की मौजूदगी दर्ज की थी। बाद में इस पर एक बड़ा लाल धब्बा भी दर्ज किया गया, जिसे द ग्रेट रेड स्पॉट कहते हैं। टेलिस्कोपों के ताकतवर होने के साथ पता चला कि इसकी पट्टियां पूरब से पश्चिम और पश्चिम से पूरब की ओर चलने वाली तेज हवाएं (जेट स्ट्रीम्स) हैं, जबकि ग्रेट रेड स्पॉट संभवत: 300 वर्षों से चल रहा 16,350 किमी दायरे वाला एक तूफान। पिछले साल के मध्य में जूनो के प्रेक्षणों पर ही आधारित एक रिपोर्ट में बताया गया कि इस तूफान का आकार घट रहा है। 1979 में ज्यादा लंबे सफर पर निकले दोनों वॉएजर यानों ने इसका क्षेत्रफल जितना बताया था, फिलहाल यह उसका एक तिहाई ही रह गया है।

खगोलशास्त्रियों में बृहस्पति से जुड़ी सबसे बड़ी उत्सुकता यह चली आ रही है कि इसकी कोई सतह भी है या नहीं, और अगर है तो यह बाहर से नजर आने वाली बादलनुमा संरचना से कितने नीचे है। जूनो ने इस सवाल का पुख्ता जवाब दे दिया है। इजरायल के योहाई कैस्पी की टीम ने जूनो के भेजे गुरुत्व के आंकड़ों में मौजूद विसंगतियों (एनॉमलीज) का अध्ययन किया, जबकि फ्रांस के त्रिस्तान गुइलो की टीम ने इनकी सुसंगति (कॉन्सिस्टेंसी) का। उपमा में इन दोनों अध्ययनों को एक विशाल कागज की सफेदी और उस पर मौजूद धब्बों के अध्ययन जैसा माना जा सकता है। हालांकि ये अध्ययन कागज जैसी टू-डाइमेंशनल (सिर्फ लंबाई-चौड़ाई तक सीमित) सतह के बजाय थ्री-डाइमेंशनल (लंबी-चौड़ी के साथ-साथ गहरी भी) सतह के ब्यौरे सामने लाते हैं।

दोनों ही अध्ययनों का निष्कर्ष यह है कि बादलों जैसी दिखने वाली ऊपरी सतह के तीन हजार किलोमीटर नीचे तक इस ग्रह की गैसें तेज-रफ्तार पट्टियों की शक्ल में घूमती हैं, लेकिन वहां पहुंचकर ये स्थिर हो जाती हैं। यानी बृहस्पति की सतह बाहर से दिखने वाले बादलों के तीन हजार किलोमीटर नीचे पड़ती है, हालांकि यह चट्टानी ग्रहों की तरह ठोस न होकर एक द्रव सतह है। जूनो के भेजे आंकड़ों के आधार पर की गई दो और बड़ी खोजों का संबंध इसके उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवीय इलाकों के बीच मौजूद अंतर से है।

पृथ्वी के सबसे ताकतवर टेलिस्कोप भी बृहस्पति की खास स्थिति के चलते इसके ध्रुवीय इलाकों का अध्ययन करने में अक्षम सिद्ध हुए हैं। लेकिन इटली के अल्बर्टो ऐड्रियानी की टीम ने पाया कि इसके उत्तरी ध्रुव पर जारी एक विशाल चक्रवात के इर्दगिर्द एक समबाहु अष्टभुज के आठों कोनों पर एक-एक चक्रवात स्थित हैं, जबकि दक्षिणी ध्रुव पर ऐसे ही ध्रुवीय चक्रवात के इर्दगिर्द एक समबाहु पंचभुज के पांचों कोनों पर एक-एक चक्रवात डेरा जमाए हुए हैं। दोनों ध्रुवों के बीच इस फर्क की कोई वजह अब तक नहीं खोजी जा सकी है।

हां, इटली के ही लूसियानो आएस की टीम ने बृहस्पति के दोनों ध्रुवों के गुरुत्वाकर्षण में जो फर्क दर्ज किया है (यानी आप उत्तर में खड़े हों तो तराजू आपका वजन ज्यादा और दक्षिण में खड़े हों तो कम बताएगा), उसकी वजह उन्होंने इस ग्रह पर गैसीय बहाव के पैटर्न में खोजी है। सूरज के बाद सौरमंडल के इस सबसे बड़े सदस्य के बारे में ढेरों अनसुलझे सवालों के जवाब अभी मिलने बाकी हैं। मसलन यह कि इसकी द्रव सतह के नीचे कहीं अचानक आने वाली धात्विक हाइड्रोजन की कोई ठोस कोर भी है या नहीं। उम्मीद करें कि इस साल जुलाई में बृहस्पति पर ही सद्गति पाने से पहले जूनो इनमें से कई उलझनें अंतिम तौर पर सुलझा देगा।