Saturday, 17 July 2021

दुकान Online

Practical Tips for starting Online Business


पार्ट-1: ऐसे करें शुरुआत

कोरोना की वजह से काफी लोगों की जॉब चली गई है। वहीं जिनकी कोई शॉप आदि है, लॉकडाउन में वह भी बंद रही जिसका असर आमदनी पर पड़ा। हालांकि इस मुश्किल में काफी बिजनेस ऐसे भी रहे जिन पर बहुत ज्यादा असर नहीं पड़ा। ये बिजनेस ऑनलाइन चले और अब काफी ग्राहकों को पसंद आ रहे हैं। अब काफी लोग ऐसे हैं जो अपना बिजनेस ऑनलाइन करना चाहते हैं। छोटे स्तर पर ऑनलाइन बिजनेस कैसे करें या अपने ऑफलाइन बिजनेस को ऑनलाइन कैसे लाएं, इस बारे में एक्सपर्ट्स से जानकारी लेकर बता रहे हैं राजेश भारती

क्या है ऑनलाइन बिजनेस

ऑनलाइन बिजनेस का मतलब है कि इंटरनेट के जरिए लोगों को घर बैठे चीजें और सेवाएं खरीदने की सुविधा देना। मान लीजिए, अगर किसी को कोई शर्ट या जींस चाहिए, तो वह ई-कॉमर्स वेबसाइट जैसे Flipkart, Amazon आदि से ऑर्डर करता है और कुछ ही दिनों में वह शर्ट या जींस उसके घर डिलिवर हो जाती है। ठीक इसी प्रकार खाना या दूसरी चीजें भी लोगों को घर बैठे मिल जाती हैं। बिजनेस का यही मॉडल ऑनलाइन बिजनेस है। Myntra, MakeMyTrip, IndiaMART, Swiggy, Zomato, Magicbricks आदि ऑनलाइन प्लैटफॉर्म के उदाहरण हैं। इन प्लैटफॉर्म से जुड़कर भी आप अपना ऑनलाइन बिजनेस शुरू कर सकते हैं। ऑनलाइन बिजनेस के लिए किसी शॉप की भी जरूरत नहीं। घर बैठे ही ऑनलाइन बिजनेस किया जा सकता है। इसके लिए बहुत ज्यादा रकम की भी जरूरत नहीं पड़ती। इसके लिए जरूरी है तो एक कंप्यूटर, इंटरनेट और कंप्यूटर व इंटरनेट की जानकारी। ऑनलाइन बिजनेस के जरिए पूरी दुनिया में चीजों की बिक्री या सर्विस दी जा सकती है। इसका सीधा-सा मतलब होता है कि सामान ज्यादा बिकता है जिससे आमदनी भी ज्यादा होती है। अगर आपके पास अपना कोई भी प्रॉडक्ट नहीं है तो भी ऑनलाइन बिजनेस करने के बहुत से तरीके हैं। आप अपने टेलंट (टीचिंग, काउंसलिंग आदि) के जरिए भी घर बैठे ऑनलाइन बिजनेस शुरू कर सकते हैं।

कंपनी जरूरी नहीं, लेकिन...

ऑनलाइन काम शुरू करने का सोचते ही ज्यादातर लोगों के दिमाग में आता है कि उन्हें कंपनी का रजिस्ट्रेशन कराना होगा जिसके लिए बहुत सारी रकम की जरूरत पड़ेगी, जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है। कोई भी शख्स कंपनी बनाए बिना या कंपनी रजिस्टर कराए बिना छोटे स्तर पर काम शुरू कर सकता है। हालांकि अगर कोई शख्स कंपनी बनाकर ही काम करना चाहता है तो वह कर सकता है। कंपनी कई तरह की बनाई जा सकती है। ज्यादा जानकारी के लिए किसी सीए से संपर्क करें। कंपनी बनाने के कुछ फायदे इस प्रकार हैं:

- कंपनी रजिस्टर कराते समय फर्म या कंपनी का जो भी नाम होगा, उस नाम का इस्तेमाल कोई दूसरा नहीं कर सकता।

- कंपनी बनाने वाला शख्स आगे चलकर अगर अपनी कंपनी का विस्तार करना चाहे, तो उसे कोई परेशानी नहीं होगी।

- कंपनी की जरूरत के लिए लोन लेना बहुत आसान हो जाता है।

...तो GST रजिस्ट्रेशन काफी

अगर कोई शख्स ऐसा बिजनेस शुरू कर रहा है जिसका सालाना टर्नओवर (कुल बिक्री) 40 लाख रुपये से ज्यादा है तो GST रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी है। हालांकि सर्विस सेक्टर के लिए यह रकम सिर्फ 20 लाख रुपये है। मान लीजिए कि अगर आप टीचिंग या कोई काउंसलिंग शुरू कर रहे हैं और टर्नओवर 20 लाख रुपये से ज्यादा है तो GST रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी होगा। ये सेवाएं सर्विस सेक्टर में आती हैं। वहीं अगर कोई शख्स कोई सामान बेच रहा है तो यह चीजें गुड्स सेक्टर में आती हैं। अगर गुड्स सेक्टर में सालाना टर्नओवर 40 लाख रुपये से ज्यादा है, तभी GST रजिस्ट्रेशन जरूर होता है।

यहां पड़ेगी GST की जरूरत

- अगर आप थर्ड पार्टी पोर्टल जैसे Flipkart, Amazon, Swiggy, Zomato आदि के जरिए अपना सामान बेचना चाहते हैं।

- एक राज्य से दूसरे राज्य में सामान बेचने या खरीदने के लिए GST की जरूरत पड़ सकती है।

यहां नहीं पड़ेगी GST की जरूरत

- अपनी वेबसाइट बनाकर प्रॉडक्ट बेच रहे हैं या सर्विस दे रहे हैं।

- आप थर्ड पार्टी प्लैटफॉर्म पर किताबें या स्टेशनरी का सामान बेच रहे हैं।

ऐसे कराएं रजिस्ट्रेशन

GST रजिस्ट्रेशन खुद भी करा सकते हैं। इसके लिए PAN, आधार कार्ड (पते के लिए), बिजली का बिल और एक फोटो होना जरूरी है। आधार कार्ड पर छपा पता उस समय मान्य होगा जब बिजनेस घर से होगा। वहीं अगर किसी दुकान या गोदाम से बिजनेस करना चाहते हैं और दुकान या गोदाम आपके ही नाम है तो पते के रूप में दुकान या गोदाम के कागजों की फोटोकॉपी लगती है। अगर मकान या दुकान या गोदाम परिवार के किसी और सदस्य के नाम है तो उसे एक ऐफिडेविट देना होगा और उसमें लिखना होगा कि वह आपको बिजनेस करने के लिए अपने मकान या दुकान या गोदाम को इस्तेमाल करने की इजाजत दे रहा है या दे रही है। वहीं अगर किराए के मकान में रहते हैं तो रेंट एग्रीमेंट के साथ मकान मालिक के नाम का बिजली का बिल चाहिए।

अगर आपको GST से जुड़ी थोड़ी-सी भी जानकारी है तो ऑफिशल वेबसाइट gst.gov.in पर जाकर GST रजिस्ट्रेशन करा सकते हैं। वहीं अगर कोई परेशानी आए या GST से जुड़ी कोई जानकारी नहीं है तो बेहतर होगा कि GST रजिस्ट्रेशन के लिए किसी सीए की मदद लें।

GST रजिस्ट्रेशन का सबसे बड़ा फायदा: GST रजिस्ट्रेशन होने पर भी सरकार की तरफ से बिजनेस के लिए लोन, बिजनेस ट्रेनिंग आदि जैसी सुविधाएं मिल जाती हैं।

ऐसे करें ऑनलाइन बिजनेस

सारी प्रक्रिया पूरी होने के बाद अब बारी आती है बिजनेस को ऑनलाइन मार्केट में उतारने की। ऑनलाइन मार्केट में उतरने के मुख्य तरीके 2 हैं। पहला- खुद की वेबसाइट बनाकर और दूसरा बिना वेबसाइट के।


पहला तरीका: वेबसाइट बनाना

वेबसाइट बनाकर बिजनेस करना सबसे अच्छा तरीका माना जाता है। इसमें आप अपने प्रॉडक्ट की लिस्टिंग और उनकी फोटो या विडियो भी पोस्ट करनी होती है। साथ ही वेबसाइट का पूरा कंट्रोल आपके ही हाथ में होता है। खुद की वेबसाइट बनाकर बिजनेस करने से कस्टमर और प्रॉडक्ट के बीच कोई भी थर्ड पार्टी नहीं होती। पेमंट का लेन-देन भी आपके और कस्टमर के बीच में ही रहता है। साथ ही किसी थर्ड पार्टी को कोई कमीशन भी नहीं देनी होती।

...लेकिन ये हैं नुकसान

- वेबसाइट बनाकर प्रॉडक्ट या सर्विस की पहुंच टार्गेट कस्टमर तक पहुंचाने में कुछ ज्यादा समय (6 महीने तक) तक लग सकता है।

- नई वेबसाइट पर कस्टमर आने में कुछ हिचकिचाता है। दरअसल, कई ऐसे मामले सामने आए हैं जहां से नई वेबसाइट से प्रॉडक्ट खरीदने के बाद कस्टमर ने खुद को ठगा-सा महसूस किया। कस्टमर को या तो खराब क्वॉलिटी वाला प्रॉडक्ट मिला या पेमंट करने के बाद भी उसे प्रॉडक्ट नहीं मिला या प्रॉडक्ट वापस करने के बाद उसे रकम नहीं मिली।

- वेबसाइट का प्रचार करना काफी महंगा होता है और यह खर्चा खुद उठाना पड़ता है।


ऐसे बनाएं वेबसाइट

वेबसाइट बनाना बहुत ही आसान है। वेबसाइट बनाने के लिए ये मुख्य स्टेप पूरे करने होंगे:


1. डोमेन नेम लेना

किसी भी वेबसाइट को बनाने से पहले उसके लिए एक डोमेन नेम (वेबसाइट का नाम जैसे flipkart.com आदि) खरीदना पड़ता है। डोमेन नेम हमेशा बिजनेस की नेचर के अनुसार ही खरीदें। हम अपनी पसंद का वही डोमेन नेम खरीद सकते हैं जो किसी ने खरीदा न हो। डोमेन नेम GoDaddy (godaddy.com), google (domains.google), BigRock (bigrock.com) आदि के जरिए डोमेन नेम खरीदा जा सकता है। साथ ही जो नाम आपको पसंद है, वह मौजूद है या नहीं, यह भी इन्हीं वेबसाइट से पता लगा सकते हैं।

कीमत: डोमेन नेम के पहले साल की फीस करीब 400 रुपये से शुरू होती है। हालांकि कुछ वेबसाइट्स 150 रुपये और कुछ फ्री में भी बेच रही हैं हालांकि इसमें कई तरह की शर्तें शामिल हैं। इन शर्तों में डोमेन नेम को कम से कम दो साल के लिए लेना भी है, डोमेन के साथ होस्टिंग लेना आदि। इसके बाद फीस में बदलाव मुमकिन।


2. होस्टिंग

होस्टिंग से मतलब क्लाउड स्पेस है यानी आपको वेबसाइट पर कितनी जगह चाहिए। इसमें वेबसाइट का डेटा होता है। यह 1 GB से लेकर 50 GB तक या इससे ज्यादा भी होता है। आप कितने पेज की वेबसाइट बनवाना चाहते हो, यह डेटा पर ही निर्भर करता है। अगर आपकी वेबसाइट में फोटो और विडियो ज्यादा होंगे तो ज्यादा डेटा स्टोर होगा। साथ ही अगर पेमंट गेटवे भी रखेंगे तो ज्यादा सिक्योरिटी चाहिए। इसके लिए SSL सर्टिफिकेट चाहिए, जिसे डोमेन बेचने वाली कंपनियों से ही ऑनलाइन खरीदा जा सकता है। पेमंट गेटवे से मतलब है कि कोई शख्स वेबसाइट से ही डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड आदि के जरिए ऑनलाइन भुगतान कर सकता है।

होस्टिंग 2 तरह की होती है-

शेयर्ड होस्टिंग: इस होस्टिंग से मतलब होता है कि सर्वर एक ही होगा और उससे बहुत सारी वेबसाइट कनेक्ट होंगी। इसमें सीमित स्पेस होता है। कोई भी शख्स 50 GB तक के स्पेस की होस्टिंग ले सकता है। इसे ऐसे समझें। मान लीजिए कि कोई एक घर है। उसमें बहुत सारे कमरे हैं। आप उन्हीं कमरों में से किसी एक कमरे में रहते हैं यानी पूरे घर में आपका कुछ हिस्सा है।

डेडिकेटेड होस्टिंग: इसे वर्चुअल प्राइवेट सर्वर (VPS) भी कहते हैं। इसमें किसी यूजर को पूरा सर्वर दे दिया जाता है। इसमें स्पेस की कोई लिमिट नहीं होती। flipkart और amazon जैसी वेबसाइट इसी होस्टिंग का इस्तेमाल करती हैं। इसे ऐसे समझें। कोई जमीन है, जिस पर मकान बना है। वह पूरा मकान आपको दे दिया गया यानी पूरा स्पेस आपको मिल गया।

कीमत: चूंकि आप छोटे स्तर पर बिजनेस शुरू करने जा रहे हैं। इसलिए आपके लिए शेयर्ड होस्टिंग ही ठीक रहेगी। इसकी कीमत 10 GB के लिए 2500 रुपये सालाना से शुरू होती है। हालांकि कीमत इस बात पर भी निर्भर करती है कि वेबसाइट का नेचर क्या है। अगर ई-कॉमर्स टाइप की वेबसाइट है तो उसके लिए ज्यादा स्पेस की जरूरत पड़ेगी। और फिर उसका सालाना खर्चा भी ज्यादा होगा। वैसे, जितने ज्यादा साल के लिए होस्टिंग लेंगे, यह उतनी ही सस्ती पड़ती है। अगर आप 5 साल के लिए होस्टिंग लेते हैं तो इसकी कीमत आधी भी हो सकती है। वहीं SSL सर्टिफिकेट की कीमत 1 हजार रुपये से शुरू होती है, जो 50 हजार रुपये तक हो सकती है।


3. कंटेंट

होस्टिंग के बाद जरूरत होती है वेबसाइट पर कंटेंट और फोटो-विडियो अपलोड करने की। आप अपने ग्राहक को क्या दिखाना चाहते हैं और क्या पढ़ाना चाहते हैं, यह इसी स्टेप में आता है। मान लीजिए, अगर आप खाने की थाली बेचना चाहते हैं, तो खाना क्या है, थाली में क्या-क्या आइटम हैं आदि के बारे में वेबसाइट के पेज पर लिखना होगा। इस काम को अगर आप खुद करें तो बेहतर है। हालांकि यह काम किसी को सौंपा भी जा सकता है।

कीमत: कंटेंट की कीमत के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। कीमत प्रति शब्द 1 रुपये या इससे ज्यादा भी हो सकती है।


4. डिजाइन

सारी चीजें तैयार होने के बाद अब बारी आती है वेबसाइट को डिजाइन कराने की। अगर आपको तकनीक की थोड़ी-सी भी जानकारी है तो आप खुद भी वेबसाइट का डिजाइन कर सकते हैं। इसके लिए तैयार टेम्पलेट आते हैं। वहीं आप चाहते हैं कि डिजाइन बढ़िया बने, तो इसके लिए फ्रीलांसर या एजेंसी से संपर्क कर सकते हैं। सोशल मीडिया पर बहुत सारे वेब डेवेलपर हैं। इसकी भी मदद ली जा सकती है। वेबसाइट का डिजाइन यूजर फ्रेंडली होना चाहिए ताकि यूजर हर चीज को आसानी से समझ सके।

कीमत: वेबसाइट डिजाइन कराने की कीमत 5 हजार से 5 लाख रुपये तक हो सकती है। यह एक बार ही खर्च होता है, लेकिन वेबसाइट का डिजाइन जितनी बार बदलवाएंगे, उसकी बार रकम खर्च करनी पड़ सकती है।

इन स्टेप्स के बाद वेबसाइट तैयार हो जाती है।


5. मेंटिनेंस

वेबसाइट तैयार होने के बाद भी वेबसाइट के मेंटिनेंस की जरूरत पड़ती है। दरअसल, समय के साथ-साथ टेक्नॉलजी में भी बदलाव होते हैं। टेक्नॉलजी अपग्रेड भी होती रहती है। साथ ही वेबसाइट पर आए दिन साइबर हमले भी होते हैं। इन सबको संभालने के लिए मेंटिनेंस की जरूरत होती है।

कीमत: 5 हजार रुपये से 50 हजार रुपये सालाना

नोट: बहुत सारी वे कंपनियां जो डोमेन नेम बेचती हैं जैसे GoDaddy आदि, वे भी वेबसाइट तैयार करने की पूरी सुविधाएं देती हैं। इन कंपनियों से भी संपर्क कर सकते हैं। छोटे बिजनेस के लिए ये कंपनियां समय-समय पर खास पैकेज ऑफर करती रहती हैं।

ऐप है तो ऐश है

किसी भी वेबसाइट की ऐप होना भी आज बहुत जरूरी हो गया है। अगर आप अपनी ई-कॉमर्स या इस तरह की दूसरी वेबसाइट बनवा रहे हैं तो बेहतर होगा कि उसकी ऐप भी बनवाएं। इन ऐप को स्मार्टफोन में डाउनलोड करना होता है। आज का यूथ ऐप के जरिए खरीदारी करना आसान समझता है और वह मोबाइल में इंस्टॉल ऐप के जरिए कहीं से भी ऑर्डर बुक कर सकता है या किसी भी सर्विस का लाभ ले सकता है।

कीमत: ऐंड्रॉइड या iOS प्लेटफॉर्म के लिए ऐप बनाने के खर्चे की शुरुआत 1 लाख रुपये से होती है। यह कीमत कितनी भी हो सकती है। 2 लाख, 3 लाख या 5 लाख। इसकी कीमत वेबसाइट के मुकाबले इसलिए ज्यादा है कि ऐप के लिए डेडिकेटेड सपोर्ट की आवश्यकता होती है। साथ ही ऐप के लिए मेंटिनेंस टीम हर समय चाहिए। यही नहीं, अगर एेंड्रॉइड या iOS का कोई वर्जन अपग्रेड होता है तो टीम को ऐप को भी तुरंत अपग्रेड करना होता है।

कीमत: ऐप बनाने का खर्च करीब 1 लाख रुपये से शुरू होता है और इस खर्च के खत्म होने की कोई सीमा नहीं है।

दूसरा तरीका: बिना वेबसाइट बनाए

ऑनलाइन बिजनेस में बिना वेबसाइट बनाकर भी उतर सकते हैं। बिना वेबसाइट के मार्केट में उतरने के ये निम्न रास्ते हैं:


थर्ड पार्टी पोर्टल का इस्तेमाल करके

थर्ड पार्टी पोर्टल जैसे Flipkart, Amazon, Myntra, Swiggy, Zomato आदि का इस्तेमाल करके भी ऑनलाइन बिजनेस किया जा सकता है। इन प्लेटफॉर्म में सैकड़ों सेलर हैं जो कोई न कोई प्रॉडक्ट बेचते हैं। जरूरी नहीं कि इन प्लेटफॉर्म पर अपने ही प्रॉडक्ट बनाकर बेचे जाएं। आप किसी कंपनी से थोक में सामान खरीदकर उसे इन प्लेटफॉर्म के जरिए बेच सकते हैं। वहीं सर्विस सेक्टर की बात करें तो मेडिकल से जुड़े थर्ड पार्टी पोर्टल जैसे Practo, DocsApp, 1mg आदि से जुड़कर भी ऑनलाइन बिजनेस कर सकते हैं। अगर आप Flipkart और Amazon जैसी ई-कॉमर्स वेबसाइट से जुड़कर बिजनेस करना चाहते हैं तो सबसे पहले इन वेबसाइट पर अकाउंट बनाकर रजिस्ट्रेशन कराना होता है। थर्ड पार्टी पोर्टल पर बिजनेस के लिए इन चीजों की जरूरत पड़ती है:

- फोन नंबर n ई-मेल आईडी n GST रजिस्ट्रेशन नंबर

- बैंक अकाउंट नंबर और IFSC कोड (यह बैंक की पासबुक पर लिखा होता है)

ऐसे करें शुरुआत

मान लीजिए, आप Amazon के जरिए कोई प्रॉडक्ट बेचना चाहते हैं तो Amazon पर प्रॉडक्ट बेचने की प्रक्रिया इस प्रकार है:

अकाउंट बनाना

- Amzon की ऑफिशल वेबसाइट amazon.in पर जाएं।

- लगभग राइट साइड में ऊपर की तरफ लिखे Hello, sign in Account & Lists पर क्लिक करें।

- अब एक नया पेज खुलेगा। इसमें नीचे की ओर लिखे Create your Amazon account पर क्लिक करें।

- अब फिर से नया पेज खुलेगा। यहां आपको अपना नाम, फोन नंबर, ई-मेल टाइप करना होगा। ई-मेल के ठीक नीचे पासवर्ड बनाना होगा। यह पासवर्ड ई-मेल वाला नहीं होना चाहिए। इस पासवर्ड के जरिए आप ऐमजॉन के अकाउंट को खोल या बंद कर पाएंगे।

- सारी चीजें भरने के बाद इसी पेज के नीचे पीले रंग की पट्टी में लिखे Continue पर क्लिक कर दें। अब फोन नंबर पर OTP आएगा।

- अब नया पेज खुलेगा। इसमें फोन नंबर पर आए OTP को टाइप करना होगा।

- OTP टाइप करने के बाद इसके ठीक नीचे पीले रंग की पट्टी में लिखे Create your Amazon account पर क्लिक करें।

- अब आप Amazon के होम पेज पर पहुंच जाएंगे। शुरू में जहां Hello, sign in Account & Lists लिखा हुआ था, वहां अब sign in की जगह आपका नाम लिखा हुआ दिखाई देगा। इसका मतलब है कि आपका Amazon पर अकाउंट बन गया है।


सेलर अकाउंट बनाना

- अकाउंट बनने के बाद अगर आपने उसे Sign Out नहीं किया है तो जहां Hello, sign in Account & Lists लिखा हुआ था, वहां क्लिक करें।

- अब नया पेज खुलेगा। यहां आपको कुछ बॉक्स बने हुए दिखाई देंगे, जिनमें अलग-अलग पॉइंट्स लिखे होंगे। एक बॉक्स में आपको Other accounts लिखा दिखाई देगा। इसके ठीक नीचे दूसरा पॉइंट Seller account का होगा। इस पॉइंट पर क्लिक करें।

- फिर से नया पेज खुलेगा। यह पेज सेलर के लिए है। यहां ऊपर की तरफ राइट साइड में और दो जगह और पीले रंग के बॉक्स में Start selling लिखा दिखाई देगा। इस पर क्लिक करें।

- अब जो भी जानकारी मांगी जाए, उसे भरते जाएं। पूरी प्रक्रिया होने में करीब 30 मिनट लगती हैं। प्रक्रिया पूरी होने के 24 घंटे के भीतर ऐमजॉन की ओर से कॉल आता है। कॉल करके ऐमजॉन की ओर से प्रॉडक्ट वेबसाइट पर लिस्ट करना और वेयरहाउस आदि की पूरी जानकारी दी जाती है। सारी प्रक्रिया पूरी होने में 2 से 3 दिन का समय लग सकता है। इसके बाद आपके प्रॉडक्ट ऐमजॉन की वेबसाइट पर दिखने और बिकने शुरू हो जाएंगे।

थर्ड पार्टी पोर्टल के फायदे

- वेबसाइट या प्रॉडक्ट के प्रचार के लिए खुद एक भी पैसा खर्च नहीं करना पड़ता। सारा खर्च वेबसाइट कंपनी की ओर से होता है।

- समय-समय पर ऑफर आते रहते हैं जिससे बिक्री बढ़ती रहती है।

- किसी दुकान या गोदाम की जरूरत नहीं। घर से भी काम कर सकते हैं।

थर्ड पार्टी पोर्टल के नुकसान

- प्रॉडक्ट बिकने से आई रकम को ये कंपनियां तुरंत सेलर को नहीं देतीं। 15 या 1 महीने तक की बिक्री का पैसा थर्ड पार्टी पोर्टल के पास ही होता है। इसके बाद अपनी कमीशन काटकर रकम को सेलर के बैंक अकाउंट में ट्रांसफर कर देती हैं।

- कमीशन के रूप में कमाई का एक हिस्सा (30% तक) थर्ड पार्टी पोर्टल के पास चला जाता है।

सोशल मीडिया का इस्तेमाल करके

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम आदि के जरिए भी बिना वेबसाइट बनाए बिजनेस किया जा सकता है। बिजनेस के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल इस प्रकार करें:

फेसबुक: फेसबुक पेज बनाकर आप अपने बिजनेस को नई ऊंचाई पर पहुंचा सकते हैं। इसके लिए जरूरी है कि फेसबुक के कवर फोटो से लेकर प्रॉडक्ट के फोटो तक, सारी चीजें अप-टू-डेट और आकर्षित होनी चाहिए। मान लीजिए, आप घर पर बर्थडे केक बनाते हैं और अपने इस बिजनेस को फेसबुक के जरिए लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं तो इसके लिए सबसे पहले केक की अच्छी फोटो फेसबुक पेज पर लगानी जरूरी होंगी। बेहतर होगा कि केक के घर पर छोटे-छोटे (2 से 3 मिनट के) विडियो बनाएं और उन्हें भी पोस्ट करें। साथ ही फोटो या विडियो के साथ कम शब्दों में जोरदार टेक्स्ट भी जरूर लिखें। आप चाहें तो फेसबुक पेज की पोस्ट को बूस्ट भी करवा सकते हैं। बूस्ट का मतलब है कि फेसबुक आपकी उस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाता है। हालांकि इसके लिए फेसबुक कुछ पैसे लेता है। 7 दिन के लिए फेसबुक करीब 1 हजार रुपये लेता है। इस दौरान फेसबुक आपकी उस पोस्ट को रोजाना 100 से 300 लोगों तक पहुंचाएगा।

इंस्टाग्राम: अपने बिजनेस से जुड़े फोटो और विडियो को इंस्टाग्राम पर शेयर करके भी ज्यादा से ज्यादा लोगों पर प्रॉडक्ट पहुंचाया जा सकता है। आप चाहें तो इन्फ्लूएंसर की भी मदद ले सकते हैं। इंस्टाग्राम पर ऐसे काफी मॉडल (मेल/फीमेल) हैं जो इन्फ्लूएंसर हैं। इनके लाखों में फॉलोवर्स होते हैं। इनने संपर्क करके प्रॉडक्ट का एड करवाया जा सकता है। ये उस एड को अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर शेयर करते हैं, जिससे प्रॉडक्ट के बारे में ज्यादा से ज्यादा लोगों को पता चलता है। इस एड के बदले में ये इन्फ्लूएंसर कुछ रकम भी लेते हैं। ये रकम प्रति फोटो 10 हजार रुपये तक हो सकती है।

वॉट्सऐप: आज लगभग हर स्मार्टफोन यूजर वॉट्सऐप का इस्तेमाल करता है। किसी एक शहर या सीमित दायरे में बिजनेस फैलाने के लिए वॉट्सऐप सबसे अच्छा माध्यम है। मान लीजिए, अगर आप कोई डिश बनाकर बेचना चाहते हैं तो इसमें वॉट्सऐप काफी मददगार साबित होता है। आप अपने वॉट्सऐप प्रोफाइल पर डिश की फोटो लगाकर रखें। साथ ही कोई भी ऑर्डर देते समय एक पर्चा जरूर साथ में रखें जिसमें आपकी डिश और दूसरी सर्विस (अगर है तो) के बारे में लिखा हो। इस पर्चे पर बड़े-बड़े अक्षरों में वॉट्सऐप नंबर लिखवाएं और साथ में यह भी लिखें 'ऑर्डर के लिए इस नंबर XXXXXXXXXX पर वॉट्सऐप करें'। कस्टमर का नंबर सेव करके उसे नई-नई डिश और ऑफर्स के बारे में भी अपडेट करते रहें। ध्यान रखें कि वॉट्सऐप पर कभी भी कस्टमर्स का ग्रुप न बनाएं। नहीं तो लोग परेशान हो जाएंगे और ऑर्डर देना भी बंद कर सकते हैं।


यू-ट्यूब: अगर आपका ऑनलाइन बिजनेस विडियो से जुड़ा है तो बिजनेस को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने का सबसे अच्छा माध्यम यू-ट्यूब है। यहां विडियो अपलोड करके बिजनेस की ग्रोथ को काफी बढ़ा सकते है।


एक्सपर्ट पैनल

- निखिल अरोड़ा, मैनेजिंग डायरेक्टर और वाइस प्रेजिडेंट, GoDaddy India

- सुशील अग्रवाल, CA, पार्टनर, ASAP & Associates

- अंबेश तिवारी, फाउंडर & डायरेक्टर, BDA Technologies Pvt Ltd

- नीरज धवन, बिजनेस हेड, Vrozart Health

- परिमल शाह, फाउंडर और CEO, Cherise India Pvt Ltd


संडे नवभारत टाइम्स में प्रकाशित, 11.07.2021

Sunday, 27 June 2021

पर्यावरण को लेकर आर्कटिक में सबसे बड़ा प्रयोग

 पानी-पानी हो चला है सफेद भालुओं का देश

चंद्रभूषण

पृथ्वी के पर्यावरण को लेकर सबसे बड़े प्रयोग की शुरुआती रपट आ गई है। सितंबर 2019 से अक्टूबर 2020 तक कुल 389 दिन आर्कटिक महासागर में उत्तरी ध्रुव के इर्दगिर्द रहकर तैयार की गई इस रिपोर्ट का आकार इतना बड़ा है कि इसके सारे निष्कर्ष सामने आने में कई साल लगेंगे। लेकिन इसे संपन्न करने वाली 300 से ज्यादा लोगों की टीम के नेता, जर्मन वैज्ञानिक मार्कस रेक्स ने बीते 15 जून को बर्लिन में स्लाइड शो और वीडियो के साथ अपने प्रयोग का एक मोटा खाका पेश कर दिया है। उन्होंने बताया कि आर्कटिक क्षेत्र का पर्यावरण संकट बेकाबू हो गया है। 

आर्कटिक महासागर के अधिकतम जमाव का दायरा बीती एक सदी में और उसकी बर्फ की मोटाई पिछले तीन दशकों में ही आधी हो जाने का सबूत देते हुए डॉ. रेक्स ने यह भी कहा कि सन 2050 तक अगर धरती पर कार्बन उत्सर्जन को शून्य तक न लाया जा सका तो अगली पीढ़ी को बिना बर्फ का आर्कटिक देखना पड़ेगा। ध्रुवीय इलाकों से कोई वास्ता न रखने वाले हम जैसे लोगों के लिए इस बात का क्या मतलब है, इसपर आगे चर्चा होगी। फिलहाल साढ़े 16 करोड़ डॉलर लगाकर चलाई गई बीस देशों के वैज्ञानिकों की इस मुहिम पर वापस लौटें तो इसमें पोलरस्टर्न नाम के एक आइसब्रेकर जहाज का इस्तेमाल किया गया, जिसे मदद पहुंचाने के लिए बीच-बीच में कुछ रूसी जहाज आते-जाते रहे। 

लेकिन इस दौरान सबसे बुरी बात यह हुई कि प्रयोग के अधबीच में ही दुनिया कोरोना की महामारी से जूझने लगी। इसके चलते कुछ महीने ऐसे गुजरे, जब किसी भी इंसानी बस्ती से हजार किलोमीटर दूर बर्फ में फंसे इस जहाज का मानव समाज से कुछ लेना-देना नहीं रहा। यह और बात है कि पोलरस्टर्न की बाहरी जरूरतें कम थीं और बर्फ में उसे फंसाया गया था, किसी दुर्घटनावश ऐसा नहीं हुआ था। इस काम के लिए शुरू में जो जगह सोची गई थी, वहां बर्फ की तह बहुत पतली मिली। फिर जहाज को और आगे ले जाकर मोटी बर्फ में फंसाया गया ताकि जहाज के 40 किलोमीटर दायरे में स्थिर सतह मिल सके, जहां से हवा, बर्फ और नीचे मौजूद पानी में दिन-ब-दिन आ रहे बदलावों का रिकॉर्ड रखा जा सके। 

ध्यान रहे, इस अध्ययन का उद्देश्य धरती के एक कम समझे गए क्षेत्र की समझ बढ़ाने तक ही सीमित नहीं था। अबतक की जानकारी के मुताबिक पृथ्वी समूची सृष्टि का अकेला जीवधारी पिंड है। अगर हम इसे एक जिंदा चीज की तरह देखें तो आर्कटिक क्षेत्र को इसका सिर या दिमाग माना जा सकता है। दुर्भाग्यवश, पृथ्वी का पर्यावरण जिस एक इलाके में सबसे ज्यादा बिगड़ा है, वह आर्कटिक ही है। भौगोलिक रूप से  66 डिग्री 33 मिनट की अक्षांश रेखा आर्कटिक सर्कल कहलाती है, जबकि मौसमविज्ञानी इसकी परिभाषा उस समतापी रेखा के रूप में करते हैं, जहां जुलाई में तापमान 10 डिग्री सेल्सियस से ऊपर नहीं जाता। 

यह रेखा धरती की ट्री लाइन भी है, यानी इसके उत्तर में पेड़ नहीं पाए जाते। ग्लोबल वॉर्मिंग ने इस परिभाषा का इस मायने में कबाड़ा कर दिया है कि पिछले तीन दशकों में 10 डिग्री सेल्सियस अधिकतम तापमान वाली रेखा प्रति दशक 56 किलोमीटर की रफ्तार से उत्तर की ओर खिसक रही है। यानी पर्यावरण में इंसानी दखल आर्कटिक सर्कल को दिनोंदिन छोटा करता जा रहा है। भू-राजनीति के नजरिये से देखें तो आर्कटिक महासागर और इसे घेरे हुए अनेक समुद्रों (नॉर्वेजियन, बैरेंट्स, कारा, लैप्तेव, ईस्ट साइबेरियन, चुक्ची, ब्यूफोर्ट, बैफिन खाड़ी, डेविस खाड़ी, डेनमार्क खाड़ी और ग्रीनलैंड सागर) के अलावा स्वीडन, नॉर्वे, फिनलैंड, रूस, अमेरिका (अलास्का), कनाडा, ग्रीनलैंड और आइसलैंड की मुख्यभूमि का बड़ा क्षेत्र तथा इनके बहुतेरे द्वीप आर्कटिक सर्कल में आते हैं।    

आर्कटिक शब्द का भाषाई उद्गम यूनानी शब्द आर्कटोस (भालू) से है। सिकंदर के समकालीन यूनानी खोजी पाइथियास ने अपनी उत्तर की साहसिक यात्रा में दही जैसे समुद्र, आधी रात के सूरज और रहस्यमय रोशनियों (आरोरा बोरियालिस) का जिक्र किया है। इन वर्णनों से यह तो साफ है कि मसालिया के पाइथियास की पहुंच 325 साल ईसा पूर्व में आर्कटिक सर्कल तक हो चुकी थी। लेकिन भालू से इस इलाके के रिश्ते को लेकर दो बातें चलन में हैं। एक तो यह कि जिंदा चीज के नाम पर यहां केवल विशाल सफेद भालुओं के दर्शन हो पाते हैं, जो संसार में कहीं और नहीं पाए जाते। 

दूसरी शास्त्रीय थिअरी यह है कि उर्सा मेजर (सप्तर्षि) और उर्सा माइनर तारामंडल आर्कटिक सर्कल में बिल्कुल सिर पर दिखाई पड़ते हैं। ग्रीक में आर्कटोस, लैटिन में उर्सा और संस्कृत में ऋक्ष या ऋषि, तीनों का मतलब रीछ या भालू ही है। आर्कटिक को धरती के दिमाग की तरह देखने की सूझ केवल ग्लोब में इसके ऊपर दिखने के कारण नहीं बनती। समुद्र और हवाओं की जिन तरंग गतियों से इस ग्रह के हर इलाके में बारिश का चक्र संचालित होता है, उनका स्वरूप तय करने में आर्कटिक की महत्वपूर्ण भूमिका है। समस्या यह है कि ग्लोबल वॉर्मिंग का जितना असर बाकी धरती पर दिख रहा है, उससे कहीं ज्यादा इसकी मार आर्कटिक क्षेत्र पर पड़ रही है। 

बाकी दुनिया का औसत तापमान अभी सन 1900 से 1 डिग्री सेल्सियस ज्यादा दर्ज किया जा रहा है लेकिन आर्कटिक क्षेत्र में यह बढ़त 2 डिग्री की है। यहां बर्फ का दायरा घटने का मतलब है, सूरज की गर्मी को वापस लौटा देने वाले एक विशाल आईने का काला पड़ना और ग्लोबल वॉर्मिंग की रफ्तार अचानक बढ़ जाना। इसके अलावा एक दुष्चक्र बर्फ से खाली हुए समुद्रों के गर्मी सोख लेने के कारण अगले जाड़े में बर्फ और कम जमने का भी है। इस प्रयोग के दौरान दो किलोमीटर ऊपर हवा से लेकर पूरी बर्फ पार करके नीचे के पानी तक 100 पैरामीटर्स में हर क्षण होने वाले बदलावों को पूरे साल रिकॉर्ड किया गया। साथ में बर्फ के 1000 नमूने भी लिए गए, जिनपर काम जारी है। 

पानी में सबसे छोटे जंतु जूप्लैंकटन और सबसे छोटी वनस्पति फाइटो प्लैंकटन, दोनों का अध्ययन किया गया, जहां से समुद्री फूड चेन शुरू होती है। यह श्रृंखला झींगों और छोटी मछलियों से होती हुई सील-वॉलरस और आर्कटिक फूड चेन में सबसे ऊपर ध्रुवीय भालुओं तक जाती है। मार्कस रेक्स और उनकी टीम का अनुमान है कि यह खाद्य श्रृंखला 2035 के बाद कभी भी टूट सकती है। इसे ध्रुवीय भालुओं का संहार कहना होगा, जिनसे पृथ्वी के इस विशाल क्षेत्र की पहचान जुड़ी है। हमारे मौसमों पर इसका प्रभाव अभी ही दिखने लगा है। इस प्रयोग से हासिल डेटा के बल पर कंप्यूटर अल्गॉरिथ्म मॉनसून के भविष्य को लेकर ज्यादा सटीक अनुमान प्रस्तुत कर सकेंगे।

Saturday, 12 June 2021

ग्लोबल वॉर्मिंग को पीछे धकेला जा सकता है

चंद्रभूषण

पर्यावरण दिवस आकर गुजर गया और अपने पीछे यह तकलीफदेह खबर छोड़ गया कि कोरोना के प्रकोप से पृथ्वी के पर्यावरण ने पिछले साल जो चैन की सांस ली थी, वह इस साल नदारद है। हवाई में स्थित मौना-की ऑब्जर्वेट्री यूं तो ब्रह्मांड के ब्यौरे जुटाती रहती है लेकिन उसका एक काम हमारे वायुमंडल में हो रहे बदलावों का जायजा लेने का भी है। उसी ने जून के पहले हफ्ते में अपना यह प्रेक्षण जारी किया कि मई 2021 में जितनी कार्बन डायॉक्साइड हमारी हवा में मौजूद थी, उतनी बीते 41 लाख वर्षों में कभी नहीं रही। इस गैस का जितना बैर हमारे फेफड़ों से है, उससे कहीं ज्यादा धरती के भविष्य से है। एक ग्रीनहाउस गैस के रूप में ग्लोबल वॉर्मिंग के लिए सबसे बड़ी जिम्मेदारी इसी की है। 

इस सिलसिले में अकेली अच्छी बात यही है कि इस सदी के दो शुरुआती दशकों में ऐसी कई तकनीकें उभरी हैं, और दिनोंदिन सस्ती भी होती गई हैं, जिनके बल पर ग्लोबल वॉर्मिंग को पीछे धकेला जा सकता है। खासकर अमेरिका में जोसफ बाइडन की सरकार आने के बाद से इन तकनीकों को आर्थिक बल मिला है और पर्यावरण के मामले में दुनिया का नजरिया आशावादी हुआ है। ऐसी सबसे बड़ी सहायता हवा से सीधे कार्बन डायॉक्साइड सोख लेने वाली टेक्नॉलजी को मिली है। । इसमें काम कर रही कंपनियों को एक टन कार्बन डायॉक्साइड के अवशोषण पर टैक्स क्रेडिट के रूप में 50 डॉलर और इस अवशोषित गैस का कोई सकारात्मक उपयोग करने पर 35 डॉलर, यानी प्रति टन कुल 85 डॉलर मिल रहे हैं।

इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के अनुसार इस काम में 135 से 345 डॉलर तक का प्रति टन खर्चा आता है। कंपनियों की कोशिश इसे घटाकर 100 डॉलर से नीचे लाने की है, हालांकि काम वे अभी सरकारों के बुलावे पर ही कर रही हैं। एक अध्ययन के मुताबिक पूरी दुनिया में कार्बन चूसने वाले ऐसे 17 कारखाने चल रहे हैं और कुछ शुरू होने की प्रक्रिया में हैं। हवा से खींची गई कार्बन डायॉक्साइड का सकारात्मक उपयोग कुछ कंपनियां कच्चा तेल तो कुछ कंक्रीट बनाने में कर रही हैं, हालांकि ज्यादातर इसे खड़िया में बदलकर पुरानी खदानों में भर देती हैं। अनुमान है कि इस टेक्नॉलजी पर भरपूर अमल की स्थिति में 4 करोड़ टन कार्बन हर साल वायुमंडल से बाहर किया जा सकेगा। लेकिन ग्लोबल वॉर्मिंग को काबू में रखने के लिए सन 2050 तक 600 करोड़ टन कार्बन को बाहर का रास्ता दिखाना जरूरी है, जो इसकी क्षमता तो क्या कल्पना के लिए भी दूर की कौड़ी है।

बड़े बदलाव का अकेला रास्ता रीन्यूएबल एनर्जी या अक्षय ऊर्जा का ही है, जिसमें पिछले पांच-सात वर्षों में तकनीक के स्तर पर क्रांतिकारी प्रगति देखने को मिली है। जल विद्युत को अक्षय ऊर्जा माना जाए या नहीं, इसे लेकर दुनिया में दुविधा है क्योंकि बड़े बांधों को पर्यावरण के लिए हानिकर माना जाता है। इसे एक तरफ रख दें तो सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और ज्वार ऊर्जा, तीनों में लगभग हर रोज कोई न कोई नई उद्यमी प्रगति पढ़ने को मिलती है। खासकर चीनियों के इस क्षेत्र में कूद पड़ने से खोजों की रफ्तार बहुत बढ़ गई है। इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, जर्मनी और इंग्लैंड में भी महत्वपूर्ण काम हो रहा है। इन स्रोतों से बनने वाली बिजली अब थर्मल और हाइडेल पावर से भी सस्ती पड़ने लगी है, हालांकि इसमें कुछ योगदान सरकारी सहायता का भी है। 

नए ऊर्जा स्रोतों में सबसे बड़ा दायरा सोलर एनर्जी का है, जिसकी सबसे अच्छी बात छतों को पावरहाउस बना देने की है। इसकी अकेली बीमारी सोलर मॉड्यूल्स का वजनी होना है, जिसके इलाज की कोशिश जारी है। यहां से दो रास्ते हाइड्रोजन इकॉनमी और बैट्री ट्रैक्शन के भी निकलते हैं। अपने इर्दगिर्द हम दो तरह से ऊर्जा का इस्तेमाल देखते हैं। एक वे सारे काम, जो बिजली से संपन्न हो जाते हैं। दूसरे वे, जिनमें कोई फ्यूल टंकी में भरकर या पाइप से खींचकर जलाना पड़ता है। सोलर, विंड या टाइडल पावर किसी नेशनल पावर ग्रिड से जुड़कर वहां के स्थापित बिजली ढांचे का हिस्सा बन जाती है। इससे कल-कारखाने चलाए जा सकते हैं, बिजली की घरेलू जरूरतें पूरी की जा सकती हैं और ट्रेनें चलाई जा सकती हैं। लेकिन सड़क का धुआं नहीं घटाया जा सकता। हाइड्रोजन इकॉनमी और बैट्री ट्रैक्शन अक्षय ऊर्जा को इसी समस्या से जोड़ने का जरिया हैं।

एलन मस्क की कंपनी टेस्ला ने ऑस्ट्रेलिया में नेशनल पावर ग्रिड से दूर पड़ने वाले कुछ इलाकों में सोलर और विंड एनर्जी से  चार्ज होने वाली विशाल बैट्रियां इंस्टाल करके बाकायदा छोटी पैरलल ग्रिड खड़ी कर दी है। हम इस कंपनी की पॉश बैट्री कारों के बारे में जानते हैं लेकिन कोरोना से ठीक पहले अमेरिका में इन कारों से ज्यादा चर्चा बैट्री से चलने वाले हैवी ड्यूटी ट्रकों की थी। इस सिलसिले में अगली लहर प्रदूषण रहित ईंधन के रूप में हाइड्रोजन की चलने वाली है, हालांकि अभी इसे बनाने में बहुत ज्यादा कार्बन डायॉक्साइड निकलती है। दुनिया में सात करोड़ टन हाइड्रोजन का उत्पादन अभी होता है, जिसका ज्यादातर हिस्सा सऊदी अरब और कुछ अन्य तेल उत्पादक देशों में प्राकृतिक गैस और भाप की रासायनिक क्रिया से बनाया जाता है। लेकिन अगले कुछ सालों में हम सौर ऊर्जा के जरिये समुद्री पानी को औद्योगिक पैमाने पर हाइड्रोजन में बदलते देखेंगे। इस ग्रीन हाइड्रोजन को अपना फ्यूल बनाने वाली गाड़ियों के एग्जास्ट से सिर्फ भाप निकलेगी।

एक बात तय है कि दुनिया में कार्बन उत्सर्जन से निपटने वाली टेक्नॉलजी मौजूद है और यह इतनी महंगी भी नहीं है कि रोजी-रोजगार का हवाला देकर इससे नजरें चुराई जा सकें। सरकारों को समझ लेना चाहिए कि ग्लोबल वॉर्मिंग को नियति के रूप में पेश करने के दिन अब लद चुके हैं। अगर वे कम प्रदूषण वाला रास्ता नहीं अपनातीं तो इसे उनका फैसला समझा जाएगा और देर-सबेर इसकी जवाबदेही उनपर आएगी। घरेलू मोर्चे पर लौटें तो जैसे-जैसे दुनिया के बाकी देश अपने लिए कार्बन न्यूट्रलिटी यानी शून्य कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य घोषित कर रहे हैं, वैसे-वैसे भारत पर भी इसके लिए दबाव बढ़ रहा है। ऐसा कोई लक्ष्य अभी तक भारत सरकार की ओर से घोषित नहीं किया गया है। लेकिन कार्बन उत्सर्जन में कटौती के वादे और सन 2030 तक 450 गीगावाट बिजली अक्षय ऊर्जा स्रोतों से हासिल करने के भारतीय संकल्प की दुनिया में काफी तारीफ हुई है।

ध्यान रहे, अभी भारत की कुल बिजली उत्पादन क्षमता 382 गीगावाट है, जिससे ज्यादा का लक्ष्य इस दशक के अंतिम वर्ष में केवल अक्षय ऊर्जा के लिए रखा गया है। एक गीगावाट यानी 1000 मेगावाट और 1 मेगावाट यानी 1000 किलोवाट। हमारे घरों में आने वाली बिजली की इकाई किलोवाट-घंटा होती है। 1 यूनिट बिजली खर्च करने का अर्थ है 1 किलोवाट बिजली का एक घंटा इस्तेमाल। भारत में अक्षय ऊर्जा की मौजूदा क्षमता पर बात करें तो यह 95 गीगावाट के आसपास है। इसमें सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा की क्षमताएं लगभग बराबर, 40 फीसदी के इधर-उधर हैं जबकि थोड़ी बिजली चीनी मिलों में गन्ने की खोई और अन्य बायोमास से तथा लघु पनबिजली परियोजनाओं से बनाई जाती है।

जाहिर है, अक्षय ऊर्जा स्रोतों से इनकी क्षमता के बराबर बिजली नहीं बनती। विंडमिल से यह तभी बनती है जब तेज हवा चल रही हो, जबकि सोलर सेल उजाला रहने तक ही काम करते हैं। वास्तविक बिजली के मामले में अक्षय ऊर्जा स्रोतों की 450 गीगावाट क्षमता खड़ी करने का अर्थ वैसा ही है जैसे चार-चार सौ मेगावाट के 50 यानी कुल 200 गीगावाट के कोयले वाले ताप बिजलीघर खड़े करना। सवाल यह है कि क्या भारत 2030 तक 450 गीगावाट की अक्षय ऊर्जा क्षमता विकसित कर पाएगा? प्रधानमंत्री ने 2015 के विश्व जलवायु सम्मेलन में जब यह घोषणा की थी तब इसके पहले चरण में 2022 तक 175 गीगावाट अक्षय ऊर्जा का लक्ष्य रखा था। आंकड़ों से स्पष्ट है कि अभी, यानी 2021 के ऐन अधबीच में इस लक्ष्य से हम काफी पीछे हैं। 

कहा जा रहा है कि सब ठीक-ठाक रहा तो 2022 के अंत तक 110 गीगावाट की अक्षय ऊर्जा क्षमता हमारे पास जरूर होगी। लेकिन सब ठीक-ठाक कहां है? अक्षय ऊर्जा का असली महत्व इस बात में है कि उसका स्वरूप विकेंद्रित हो। जनहित के साथ उसका कोई टकराव न हो और प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव ज्यादा न पड़े। इसको ध्यान में रखते हुए 2022 तक 40 गीगावाट बिजली छतों पर सौर पैनल लगाकर बनाई जानी थी। यह लक्ष्य अबतक एक चौथाई भी हासिल नहीं हो सका है। भारत की कुल अक्षय ऊर्जा क्षमता में 85 फीसदी हिस्सा सोलर और विंड एनर्जी का है। दोनों के उत्पादन पर दो-तीन बड़ी कंपनियों का कब्जा है, जो आत्मनिर्भरता को ताक पर रखकर हैवी इंपोर्ट मॉडल पर काम करती हैं।

भूमध्य रेखा के पास पड़ने के कारण भारत में हवा ज्यादा नहीं चलती। लिहाजा पवन ऊर्जा के लिए यहां गुंजाइश कम है। सौर ऊर्जा के लिए हमारे यहां काफी अच्छी संभावना है लेकिन इसकी 40 मेगावाट क्षमता एक किलोमीटर लंबा और इतना ही चौड़ा जमीन का टुकड़ा मांगती है, जिसमें एक मंझोला गांव अपनी खेती-बाड़ी समेत आराम से बस जाता है। चीनियों ने अपने विशाल रेगिस्तानी इलाकों के इस्तेमाल के लिए अक्षय ऊर्जा का दामन थामा तो अपनी पूरी सप्लाई लाइन डेवलप की। सौर ऊर्जा की जान पॉलीसिलिकॉन वेफर्स हैं, जो रेत को 300 डिग्री गर्म किए गए नमक के तेजाब में धोने के बाद 1800 डिग्री सेल्सियस पर तपाकर बनाए जाते हैं।

इसे बनाने वाली दुनिया की दस शीर्ष कंपनियों में पहले, तीसरे, चौथे, पांचवें, छठें, आठवें और दसवें नंबर पर चीनी कंपनियां ही हैं जबकि दूसरे नंंबर पर जर्मन, सातवें पर कोरियाई और नवें पर एक अमेरिकी कंपनी है। भारत में तो कोई कंपनी सिलिकॉन वेफर्स बनाने का जोखिम ही नहीं उठाती। सभी या तो चीन से सोलर सेल मंगाकर भारत में उनके मॉड्यूल बांधती हैं, या बहुत किया तो उधर से वेफर्स मंगा लिए और उससे सेल और मॉड्यूल बना डाले। अगर हम अक्षय ऊर्जा को भारत के भविष्य की तरह देख रहे हैं तो हमें नीचे से ऊपर तक इसके हर रूप की पूरी सप्लाई लाइन विकसित करनी चाहिए और इनके विकेंद्रित बिजनेस मॉडल को प्रमोट करना चाहिए।

Friday, 28 May 2021

शुरू हुआ स्पेस टूरिज्म का किस्सा

चंद्रभूषण

अर्से बाद अमेरिका से एक नई इंडस्ट्री की शुरुआत होने जा रही है। स्पेस टूरिज्म खुद में दुनिया के लिए कोई अनूठी बात नहीं है। अभी तक सात लोग बाकायदा पैसे देकर अंतरिक्ष पर्यटन का आनंद भी ले चुके हैं। लेकिन फिलहाल जो किस्सा शुरू हो रहा है वह पहले से बिल्कुल अलग है। बीते रविवार रंग-रंगीले अंग्रेज व्यापारी रिचर्ड ब्रैंसन की कंपनी वर्जिन गैलेक्टिक के विशेष यान स्पेसशिप-2 ने बिना कोई गलती किए समुद्रतल से 85 किलोमीटर की ऊंचाई हासिल की। और उससे बड़ी बात यह कि दोनों पायलट स्पेसशिप को कैलिफोर्निया स्थित एक्सक्लूसिव अड्डे स्पेसपोर्ट में सुरक्षित उतार लाए। उड़ान से संबंधित सारा डेटा कंपनी ने अमेरिकी नियामक संस्था फेडरल एविएशन एडमिनिस्ट्रेशन के पास जमा कर दिया है। वहां से कारोबारी लाइसेंस मिल गया तो कुछ और परीक्षण उड़ानों के बाद अगले साल तक हमें वर्जिन गैलेक्टिक की कमर्शल अंतरिक्ष यात्राएं देखने को मिल सकती हैं।

नीचे धीरे-धीरे घूमती हुई नीली-भूरी-सुनहरी धरती, ऊपर निपट काला आसमान और कहीं बीच में बिना चौंध वाले बड़े बल्ब की तरह लटका सूरज या चंद्रमा। कुछेक मिनटों के इस अविस्मरणीय अनुभव के लिए वर्जिन गैलेक्टिक ने ढाई लाख डॉलर का टिकट लगा रखा है। पहले यह रकम दो लाख डॉलर थी, 2018 में बढ़ाकर ढाई की गई। ऐन मौके पर आई कुछ सुरक्षा अड़चनों के चलते पिछली बार कारोबार की तारीख आगे बढ़ाने से ठीक पहले तक कंपनी के पास सात सौ ग्राहकों की लिस्ट मौजूद थी। यह लिस्ट इंटरनेट पर मौजूद है और इसमें किसी ने भी पिछले तीन वर्षों में अपना नाम कटाना जरूरी नहीं समझा है। रविवार की परीक्षण उड़ान सफल होते ही वर्जिन गैलेक्टिक के शेयर 28 प्रतिशत चढ़ गए, जो बताता है कि बाजार को इसके संभावित यात्रियों की लिस्ट और बढ़ने की उम्मीद है। जब तक परिभाषा में कोई बदलाव नहीं होता तब तक हर स्पेस टूरिस्ट को ‘एस्ट्रोनॉट’ का दर्जा भी मिलेगा। यह रुतबा हासिल करने के लिए दुनिया भर के एडवेंचर प्रिय अमीर ढाई लाख डॉलर, भारतीय मुद्रा में कहें तो पौने दो करोड़ रुपये खर्च करने में कोई कोताही नहीं बरतेंगे।

ध्यान रहे, इस अंतरिक्ष पर्यटन को सब-ऑर्बिटल स्पेस टूरिज्म की श्रेणी में रखा गया है। यानी कृत्रिम उपग्रहों की कक्षा से नीचे की अंतरिक्ष यात्रा। उपग्रहों की कक्षा के लिए कोई ऊंचाई निर्धारित नहीं गई है लेकिन धरती से 76 मील यानी 122 किलोमीटर की ऊंचाई उनके लिए सुरक्षित नहीं मानी जाती। कारण यह कि हवा का थोड़ा-बहुत घर्षण वहां तक मौजूद होता है। 50 मील यानी 80 किलोमीटर की ऊंचाई तक आ जाने के बाद उनका जलकर नष्ट हो जाना तय माना जाता है और अमेरिकी प्रशासन ने इसी ऊंचाई को वह सीमा मान रखा है, जिससे ऊपर के इलाके को अंतरिक्ष कहा जाता है। अंतरिक्ष का साझा, शांतिपूर्ण उपयोग करने पर ग्लोबल सहमति है। यानी अमेरिका के आकाश में 50 मील से ज्यादा ऊंचाई पर कोई यान अगर खुलेआम उसकी जासूसी करता है तो भी कानूनन वह उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर सकता। ढाई लाख डॉलर खर्च करके आप इसी अंतरिक्ष का पाला छूकर आ सकते हैं। दुनिया को यह सुविधा इतने सस्ते में पहली बार हासिल होने जा रही है।

जो अंतरिक्ष यात्रा रूसी रॉकेटों के जरिये सदी के शुरुआती वर्षों में सात सुपर-अमीरों ने कर रखी है, वह ऑर्बिटल स्पेस टूरिज्म है। उसमें आप नॉन-रीयूजेबल रॉकेट से धरती की कक्षा में जाते हैं, इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन या किसी और स्पेस होटल में कुछ दिन ठहरते हैं, इस दौरान धरती का गोला अपने सामने कई बार काला और सुनहरा होते देखते हैं, विशेष आग्रह और तैयारी के साथ स्पेस-वॉक भी करते हैं और इसके एवज में आपको लगभग ढाई करोड़ डॉलर देने पड़ते हैं। ‘लगभग’ इसलिए कि काफी समय से यह धंधा बंद है। जब चल रहा था तब इसका टिकट अलग-अलग मांग के मुताबिक दो से ढाई करोड़ डॉलर रखा गया था। तब से अगली ऑर्बिटल यात्राओं का सिलसिला शुरू होने तक यह कुछ न कुछ बढ़ेगा ही। इससे ऊंचे स्तर का एक और स्पेस टूरिज्म ऑस्ट्रेलियाई मूल के चर्चित अमेरिकी उद्यमी एलन मस्क की कोशिशों से आकार ले रहा है। उनकी कंपनी स्पेस एक्स ने चांद का चक्कर लगाकर लौटने वाले लूनर स्पेस टूरिज्म का टिकट शुरू में सात करोड़ डॉलर रखा था लेकिन काम शुरू होने तक इसके दस करोड़ पहुंचने की बात खुद स्पेस एक्स की तरफ से ही कही जाने लगी है।

इनमें ऑर्बिटल और लूनर स्पेस टूरिज्म के लिए आपका सिर्फ सुपर-डुपर अमीर होना ही काफी नहीं है। ये यात्राएं रॉकेटों से ही की जा सकती हैं, जिनका झटका बर्दाश्त करना किसी सामान्य व्यक्ति के बूते से बाहर है। इसके लिए न केवल आपका पूर्णतः स्वस्थ और जवान होना जरूरी है बल्कि एक-दो वर्षों की अनिवार्य ट्रेनिंग से भी आपको गुजरना पड़ सकता है। जिन सात लोगों को अभी तक ऑर्बिटल टूरिज्म का सौभाग्य प्राप्त हुआ है, उन्हें स्पेस टूरिस्ट कहलाने में इतनी हेठी महसूस हुई कि उनके लिए ‘अंतरिक्ष सहयात्री’ जैसा एक शब्द गढ़ना पड़ गया। सब-ऑर्बिटल टूरिज्म और इन दोनों के बीच का अंतर समझने के लिए एक छोटे से ब्यौरे पर गौर करें। वर्जिन गैलेक्टिक के यान स्पेसशिप-2 को थोड़े समय तक 4,000 किलोमीटर प्रति घंटा तक की रफ्तार से भागने के लिए तैयार किया गया है। लेकिन धरती की कक्षा में जाने के लिए बनाई गई स्पेस शटल जब अंतरिक्ष से वापस लौटते समय वायुमंडल में प्रवेश करती थी तो उसकी रफ्तार 25,000 किलोमीटर प्रति घंटा हुआ करती थी।

जाहिर है, स्पेसशिप के साथ एक नई टेक्नॉलजी जुड़ी है जो बड़ी मशक्कत और वैज्ञानिक क्षमता के साथ, काफी जोखिम उठाते हुए, कई जानें गंवा लेने के बाद एक सामान्य मनुष्य को उसके रोजमर्रा के जीवन के बीच अंतरिक्ष का सीधा नजारा दिखाने के लिए तैयार की गई है। इसका श्रेय ऐरोस्पेस इंजीनियर बर्ट रूटन और माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक स्व. पॉल ऐलन को जाता है हालांकि रिचर्ड ब्रैंसन ने इसके पीछे जितना धीरज दिखाया है, उसके लिए उद्यमी जगत में उनका अलग मुकाम बना रहेगा। सबसे पहले बर्ट रूटन ने रॉकेटों की इस कमजोरी की ओर दुनिया का ध्यान खींचा कि इनको बहुत सारा ईंधन खुद को पृथ्वी के वातावरण के पार जाने में खर्च कर देना होता है। घर्षण से जुड़ा जोखिम अलग। और इनका इस्तेमाल इंसानी यात्रा में करना उसे दगती मिसाइल में भरकर फेंकने जैसा ही है। खर्चे की बात इसके बाद आती है। शटल के रूप में रॉकेट को रीयूजेबल बनाकर खर्चा कुछ बचा लिया जाए तो भी उसके जोखिम कम नहीं होते। ये सवाल अपने सामने रखकर वे प्रक्षेपण में जहाज के उपयोग की ओर गए।

इसके लिए दो जरूरतें उनके सामने थीं। एक ऐसा हल्का रॉकेट जो ईंधन समेत दस टन से ज्यादा भारी न हो और जिसको सब-ऑर्बिटल ऊंचाइयों से अत्यंत सुरक्षित ग्लाइडर की तरह जमीन पर उतारा जा सके। और एक ऐसा ताकतवर लेकिन हल्का जहाज जो इस रॉकेट को टांगकर 15 किलोमीटर की घर्षणहीन ऊंचाई तक ले जा सके, जो किसी जहाज के लिए चरम ऊंचाई भी है। ये दोनों काम सारे ब्यौरों के साथ बर्ट रूटन ने 2004 में ही संपन्न कर लिए थे। रिचर्ड ब्रैंसन ने वर्जिन गैलेक्टिक कंपनी बनाकर रूटन/एलन की स्पेसशिप कंपनी का अधिग्रहण इस उम्मीद में किया कि 2007 तक वे इसके टिकट बेचकर दो पैसे कमाने लगेंगे। लेकिन फिर एक के बाद एक खतरे और जोखिम सामने आते गए, दुर्घटनाएं होती गईं और बात खिंचते-खिंचते यहां तक चली आई। इस बीच दुनिया एक महामंदी से गुजरी, अमेरिका ने स्पेस शटल का संचालन बंद कर दिया और इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन को एक साझा वैज्ञानिक संस्थान की सीमाओं से आजाद करके पूरी तरह स्पेस होटल में बदलने का फैसला कर लिया गया।

पिछले दस-पंद्रह वर्षों में ग्लोबल अर्थव्यवस्था का एक ट्रेंड यह भी दिखा है कि यह दिनोंदिन नीड-बेस्ड से हटकर ज्यादा से ज्यादा लग्जरी बेस्ड होती जा रही है। स्कूटर और सस्ती कारें बनाने वाले उद्योग बैठते जा रहे हैं जबकि महंगी कारों, घड़ियों और टॉप एंड मोबाइल फोनों का धंधा जोर पकड़ता जा रहा है। इसकी एक वजह यह हो सकती है कि इतनी ज्यादा आर्थिक विषमता दुनिया ने पहले कभी नहीं देखी। रिचर्ड ब्रैंसन और उनका वर्जिन ब्रांड पैसे वालों को कोई भी चीज महंगी से महंगी बेच लेने के हुनर के लिए जाना जाता है। उन्हें पता है कि सब-ऑर्बिटल स्पेस टूरिज्म जैसा महंगा कारोबार महामारी के माहौल में भी कैसे किया जा सकता है। वैसे उनकी योजना इस टेक्नॉलजी का इस्तेमाल अंतरिक्ष-दर्शन से आगे बढ़कर हाइपरसोनिक हवाई यात्राओं के लिए भी करने की है। ऑर्बिटल ऊंचाई हासिल करके लंबी यात्राओं का टाइम घटाने में धरती के घूमने का इस्तेमाल करने का कॉन्सेप्ट चर्चा में आ चुका है, हालांकि इसे धंधे-पानी के स्तर तक आने में एक दशक का समय और लग सकता है।

Wednesday, 26 May 2021

न्यूटन और एडमण्ड हैली

सुशोभित

शायद ही कोई होगा, जो यह दावा कर सकता होगा कि आइज़ैक न्यूटन उसका दोस्त था। लेकिन चंद ज़रूर ऐसे थे, जो भरोसे से कह सकते थे कि वो आइज़ैक न्यूटन के दोस्त थे। एडमण्ड हैली उन विरलों में शुमार था।

न्यूटन और एडमण्ड हैली के रिश्ते की कहानी बड़ी दिलचस्प है। इस कहानी से न्यूटन- और प्रकारान्तर से आधुनिक भौतिकी- की नियति गहरे तक जुड़ी हुई है।

एडमण्ड हैली हर लिहाज़ से ज्ञानोदय के युग की उपज था। उस युग के नौजवान नेचरल-साइंस के सवालों में उलझे रहते थे। उन्हें आकाश में टंगे ग्रह और पिंड आकृष्ट करते थे। प्रत्यक्ष-सृष्टि के रहस्य अभी पूरी तरह से जाने नहीं जा सके थे, किंतु उन्हें जानने की ललक जीवन की एक बड़ी प्रेरणा थी। यह प्रेरणा प्रबुद्धों को आपादमस्तक मथते रहती थी।

एडमण्ड हैली महज़ 22 साल की उम्र में लंदन की प्रतिष्ठित रॉयल सोसायटी में फ़ेलो बन चुका था। वह ऑक्सफ़र्ड में विख्यात खगोलविद् जॉन फ़्लैम्स्टेड के साथ काम कर चुका था और केवल 20 वर्ष की आयु में सेंट हेलेना में एक ऑब्ज़र्वेटरी स्थापित करके दक्षिणी गोलार्द्ध से दिखलाई देने वाले तारों का कैटलॉग बनाने के काम में जुट चुका था।

वर्ष 1686 : एक सवाल एडमण्ड हैली को रात-दिन परेशान किए रहता था, लेकिन उसे इसका उत्तर कहीं मिलता नहीं था। वो जानना चाहता था कि क्या प्लैनेट्स के एलिप्टिकल ओर्बिट्स और इनवर्स स्क्वेयर लॉ के बीच कोई नाता है। वो लंदन की रॉयल सोसायटी में इस पर बात कर रहा था। उस समय के चर्चित खगोलविदों रॉबर्ट हूक और क्रिस्टोफ़र वेन ने शेख़ी बघारते हुए कहा- "तुम्हें इतना भी नहीं पता, यह तो बहुत पहले ही साबित किया जा चुका है!" हैली ने कहा- "अच्छा? तो क्या मैं कैलकुलेशंस देख सकता हूँ?" इसका कोई उत्तर हूक और वेन के पास नहीं था। मैथेमैटिक्स में कोई हाइपोथिसीस तब तक हवा-हवाई ही मानी जाती है, जब तक कि उसे गणितीय-अनुशासन से सिद्ध नहीं कर दिया जाए। हूक ने कहा, मैं जल्द ही इसका साक्ष्य दूँगा, लेकिन वो वैसा नहीं कर सका। हैली समझ गया कि हूक के पास इसका उत्तर नहीं है।

किसी ने हैली से कहा- "कैम्ब्रिज में एक पागल गणितज्ञ है, जो तुम्हारे इस सवाल का जवाब दे सकता है। उसका नाम है आइज़ैक न्यूटन! अलबत्ता हो सकता है वो तुम्हारे ख़त का जवाब ना दे, तुम्हें वहाँ जाकर उससे मिलना होगा।"

हैली फ़ौरन घोड़ागाड़ी पर सवार हुआ और लंदन से कैम्ब्रिज की यात्रा पर निकल पड़ा। वो बहुत सौजन्य से- जो कि सत्रहवीं सदी के इंग्लैंड की पहचान थी- न्यूटन से मिला। इधर-उधर की बातें होती रहीं। न्यूटन ने परख लिया कि यह नौजवान प्रतिभावान होने के साथ ही सच्चे मायनों में जिज्ञासु है और इसे समय दिया जा सकता है। समय मिलते ही हैली ने न्यूटन से पूछा- "एलिप्टिकल ओर्बिट्स और इनवर्स स्क्वेयर लॉ के बारे में आप क्या सोचते हैं।" न्यूटन ने जवाब दिया- "सोचना क्या है, मैं इसे साबित कर चुका हूँ।" हैली ने कहा- "कैसे?" न्यूटन ने कहा- "कैसे का मतलब क्या? मेरे पास तमाम कैलकुलेशंस हैं!"

हैली को हर्ष के मारे रोमांच हो आया। कांपती हुई आवाज़ से उसने कहा- "क्या मैं वो कैलकुलेशंस देख सकता हूँ?" न्यूटन ने कहा- "क्यों नहीं, अभी लो!"

इस कहानी के दो संस्करण मिलते हैं। पहला संस्करण यह है कि हैली के कहने पर न्यूटन कई घंटों तक अपने पेपर्स खंगालता रहा, लेकिन उसे वो कैलकुलेशंस नहीं मिले। कारण, न्यूटन की यह प्रवृत्ति थी कि बड़ी से बड़ी खोज करने के बाद भी उसे कहीं रखकर भूल जाए। न्यूटन कहता था कि प्लेटो और एरिस्टोटल मेरे दोस्त हैं, लेकिन सबसे बड़ा दोस्त है- सत्य! वो इसी सत्य की तलाश में रात-दिन डूबा रहता था- किसी और के लिए नहीं बल्कि ख़ुद के लिए। वो कई महीनों की मेहनत के बाद किसी निष्कर्ष पर पहुँचता था, कैलकुलेशंस तैयार करता था और फिर उसे छोड़कर किसी और काम में लग जाता था। इसी के चलते कालान्तर में लाइबनीज़ से उसका मतभेद हुआ। लाइबनीज़ ने दावा किया था कि कैलकुलस की खोज उसने की है, जबकि न्यूटन 1666 में ही कैलकुलस को आविष्कृत कर चुका था। फ़र्क़ इतना ही है कि उसने इसके बारे में किसी को भी बतलाया नहीं था। यह 1666 का वही जादुई साल था, जब वूल्सथोर्प में वह सेब धरती पर गिरा था, जिसने लॉ ऑफ़ यूनिवर्सल ग्रैविटेशन की बुनियाद रखी थी, जबकि न्यूटन पहले ही अपने लॉ ऑफ़ ऑप्टिक्स को अंतिम रूप दे चुका था। तब वह कुलजमा 24 साल का ही था।

जब एडमण्ड हैली न्यूटन से मिलने पहुँचा, तब न्यूटन स्वयं को खगोल-भौतिकी और गणित से दूर कर चुका था और अल्केमी (कीमियागिरी) के अनुसंधान में डूबा हुआ था। हैली की प्रखर-जिज्ञासा ने उसे आंदोलित कर दिया। उसमें प्रेरणा जाग उठी। उस पहली न्यूटन-हैली भेंट की कहानी का दूसरा संस्करण यह है कि अपने बेतरतीब पेपर्स के बीच न्यूटन को वो काग़ज़ात मिल गए थे जिनमें हैली की दिलचस्पी थी, लेकिन न्यूटन ने पाया कि अभी इनमें थोड़ा काम बाक़ी है। उसने हैली से कहा, तुम कुछ दिन रुको, मैं तुम्हें वो पेपर्स भेजता हूँ। यह अगस्त 1686 की बात है। हैली लंदन लौट गया। नवम्बर में उसे न्यूटन की तरफ़ से एक रिसर्च-पेपर मिला। यह पेपर लातीन भाषा में लिखा गया था और इसका शीर्षक था- 'दे मोत्यू कोर्पोरम इन जाइरम' (ऑन द मोशंस ऑफ़ ऑब्जेक्ट्स इन एन ओर्बिट)। हैली ने उसे पढ़ा, और अपनी आँखों पर वह एकबारगी यक़ीन नहीं कर पाया!

न्यूटन ने प्लैनेट्स के एलिप्टिकल ओर्बिट्स और इनवर्स स्क्वेयर लॉ के सम्बंधों के एक-एक कोण को मापकर, बाक़ायदा उनके गणितीय-समीकरणों के साथ, उनकी व्याख्याओं को काग़ज़ पर उतार दिया था! यह कोई ग्यारह पन्नों का पेपर था। हैली ने इसे प्रकाशित कराया। न्यूटन की धाक जम गई। हूक और वेन अपना-सा मुँह लेकर रह गए।

लेकिन बात यहीं पर समाप्त नहीं हुई। न्यूटन के भीतर अब समूचे ज्ञात-ब्रह्मांड के गतिशीलता के नियमों को जानने की भूख जाग गई। हैली के उस्ताद फ़्लैमस्टेड को एक चिट्‌ठी लिखकर न्यूटन ने कहा- "अब जब मैं इसमें मसरूफ़ हो गया हूँ तो इसकी तह में जाकर ही दम लूँगा!" न्यूटन ने वैसा ही किया। उसने ढाई सालों के लिए ख़ुद को अपने घर में क़ैद कर लिया। इस अवधि में वो केवल दो बार बाहर निकला, दोनों ही बार लिंकनशायर की ज़रूरी यात्राओं के लिए, जहाँ उसका पैतृक निवास था। वो ख़ुद में खोया रहता और अकसर खाना भी भूल जाता। वो कमरे में चहलक़दमी कर रहा होता और अचानक उसे कुछ सूझता। वह मेज़ पर जाता और खड़ा-खड़ा ही लिखने लगता, उसको लगता कि अगर उसने कुर्सी पर बैठने की ज़हमत उठाई तो इतने भर से उसके कैलकुलेशंस उससे गुम जाएंगे। जब उसे याद दिलाया जाता कि उसने शाम का खाना नहीं खाया है तो वह चौंककर कहता- क्या सच? जब उसके सामने भोजन प्रस्तुत किया जाता तो वह खड़ा-खड़ा ही कुछ कौर खाता और फिर काम में जुट जाता।

इस अथक तपस्या का परिणाम था वो किताब, जिसने आधुनिक भौतिकी को हमेशा के लिए बदलकर रख दिया। इस किताब का नाम है- 'प्रिंकिपिया मैथेमैटिका!'

एडमण्ड हैली ने न्यूटन के भीतर जो चिंगारी जगाई थी, अब वह एक दावानल बन चुकी थी। बात एलिप्टिकल ओर्बिट से बहुत आगे बढ़ चुकी थी। अपनी इस किताब में न्यूटन ने यूनिवर्सल ग्रैविटेशन और सेलेस्टियल डायनेमिक्स के तमाम सूत्रों और समीकरणों को खंगालकर लिख डाला था। इसी किताब में उसने अपने थ्री लॉज़ ऑफ़ मोशंस दुनिया के सामने रखे। आज भी गणित और खगोल-भौतिकी की दुनिया इन नियमों का अनुपालन करती है- ईश्वर के अटल वाक्यों की तरह।

जब न्यूटन ने 'प्रिंकिपिया मैथेमैटिका' की पाण्डुलिपि लिखकर पूरी की तो उसने उसे सबसे पहले किसे पढ़ने के लिए भेजा? जवाब है- एडमण्ड हैली को। हैली ने पाण्डुलिपि मिलते ही न्यूटन को चिट्‌ठी लिखी और कहा- "आपकी 'डिवाइन ट्रिटी' (अलौकिक ग्रंथ) मुझे मिली, एक दिन दुनिया को इस बात पर नाज़ होगा कि उनके बीच के किसी व्यक्ति ने यह किताब रची है।!" 'प्रिंकिपिया मैथेमैटिका' के पहले संस्करण की प्रूफ़ रीडिंग एडमण्ड हैली ने ही की थी, इतना ही नहीं उसने उस किताब को अपने पैसों से छपवाया भी।

क्या आपको लगता है 'प्रिंकिपिया मैथेमैटिका' ने न्यूटन को हमेशा के लिए अमर कर दिया है? शायद हाँ, लेकिन उसने एडमण्ड हैली को भी हमेशा-हमेशा के लिए अमर कर दिया है। जानते हैं कैसे? 

न्यूटन के प्लैनेटरी मोशंस के सिद्धांत ग्रहों पर ही नहीं, कॉमेट्स पर भी लागू होते थे। इसी की मदद से एडमण्ड हैली ने वर्ष 1707 में पूर्वानुमान लगाया कि वर्ष 1531, 1607 और 1682 में ठीक 76 वर्षों के अंतराल पर जो धूमकेतु बार-बार दिखलाई दिया था, वह वर्ष 1758 में फिर से दिखलाई देगा। वैसा ही हुआ भी। वर्ष 1758 में- एडमण्ड हैली की मृत्यु के पूरे 16 साल बाद- आकाश में वही धूमकेतु फिर से दिखलाई दिया।


एडमण्ड को आदरांजलि देने की मंशा से उसे 'हैली'ज़ कॉमेट' कहकर पुकारा गया- हैली का पुच्छल तारा!


कुछ तो कारण होगा कि एडमण्ड हैली का धूमकेतुओं से इतना गहरा नाता था। एक धूमकेतु आकाश में था, और दूसरा धरती पर, जिसका नाम था- आइज़ैक न्यूटन!



Sunday, 9 May 2021

मंगल पर क्यों है इतनी गहमागहमी

 चंद्रभूषण

सौरमंडल में भीतर से बाहर की तरफ जाने के क्रम में चौथे नंबर पर पड़ने वाले ग्रह मंगल की खोजबीन के लिए यह असाधारण समय चल रहा है। इसी साल मंगल की कक्षा में पहुंचे अमेरिका, चीन और संयुक्त अरब अमीरात के अंतरिक्ष यान उसकी परिक्रमा करते हुए लगातार उसके बारे में सूचनाएं भेज रहे हैं। इस सूची में संभवतः हमारा अपना मंगलयान भी शामिल है, जिसके पूर्णतः स्वस्थ होने और लगातार डेटा भेजने की बात बीती फरवरी में इसरो द्वारा कही गई थी, हालांकि खबर जारी करने लायक कोई बात मंगलयान के हवाले से आखिरी बार 2018 में ही सुनी गई थी। अमेरिकी गाड़ी पर्सीवरेंस ढाई महीने से मंगल की सतह पर उतरी हुई है जबकि उससे निकला ताकतवर कैमरे वाला पौने दो किलो का छोटा सा हेलिकॉप्टर इनजेन्युइटी पिछले पंद्रह दिनों में इस पराये ग्रह पर पांच उड़ानें भर चुका है। चीन का रोवर भी तीन महीने से उतरने लायक जगह की तलाश में है। इसकी खबर मई के मध्य से अंत तक कभी भी आ सकती है।

मंगल को लेकर अभी इतनी मारामारी क्यों मची हुई है? मुख्य रूप से तीन वजहों से। एक तो धरती के अलावा इंसानों के रहने लायक अकेली जगह अगले हजार वर्षों में इसके सिवा कोई और नहीं होने वाली। चंद्रमा पर पानी की खबरें उत्साह जरूर जगाती रही हैं लेकिन व्यावहारिक स्थिति यही है कि यहां हवा और पानी से लेकर सारा कुछ ढोकर ले जाना पड़ेगा और सूरज से नजदीकी के चलते रेडिएशन यहां इतना भयानक है कि दो-चार दिन भी रहने की कल्पना किसी गहरी गुफा या बहुत विशेष बनावट वाली कोठरियों में ही की जा सकती है। अलबत्ता रोबॉट्स के लिए चंद्रमा ज्यादा बेहतर जगह है और इंसान का आना-जाना वहां प्लानिंग और कोऑर्डिनेशन जैसे कामों के लिए ही अच्छा रहेगा। इसके विपरीत मंगल की पतली हवा से ऑक्सिजन बनाने का काम पर्सीवरेंस ने अभी कुछ ही दिन पहले किया है और पानी वहां हर लैंडिंग साइट पर निकला नजर आ रहा है, भले ही उसे पीने लायक बनाने में काफी मशक्कत करनी पड़े

दूसरी वजह मंगल पर जीवन की तलाश है, जो अभी तो हिसाब के मुताबिक लगभग असंभव ही नजर आती है। ध्यान रहे, धरती से मंगल की दूरी हमेशा बदलती रहती है। इसकी न्यूनतम माप पांच करोड़ 46 लाख किलोमीटर दर्ज की गई है जबकि अधिकतम माप 40 करोड़ 10 लाख किलोमीटर तक जा सकती है। इतना दूर रहकर हमारे लिए मंगल पर जीवन होने या न होने के बारे में कोई पक्की बात कहना अभी दूर की कौड़ी ही है लेकिन अगर वहां जीवन है और इसका स्वरूप धरती के जीवन जैसा कोशिका आधारित ही है, तो मंगल पर मौजूद रेडिएशन को देखते हुए उसकी मौजूदगी मंगल की सतह से कम से कम 25 फुट नीचे ही होनी चाहिए। हम उम्मीद कर सकते हैं कि वहां 25-30 फुट गहरा खोदकर बिल्कुल पैक्ड अवस्था में निकाली गई मिट्टी अगर धरती पर लाई जा सके तो उसकी जांच-पड़ताल से बहुत पुराने, आर्काइया श्रेणी के डॉर्मेंट जीवाणुओं से हमारा सामना हो सकता है। इतनी गहरी खुदाई करने वाला कोई यंत्र अभी मंगल पर नहीं भेजा जा सका है, पर यहां तक की एक्स-रे स्पेक्ट्रोग्राफी जरूर की जा सकती है।

तीसरी वजह मंगल के अध्ययन के जरिये पृथ्वी के अपने विकास को समझने की है। पृथ्वी के विकास के चार युग माने जाते हैं, जिन्हें इओन कहने का चलन है। ध्यान रहे, धरती की उम्र 4 अरब 54 करोड़ साल नापी गई और इसका पहला युग अब से कोई चार अरब साल पहले यानी धरती बनने के लगभग 60 करोड़ साल बाद समाप्त होता है। हैडियन नाम के इस युग में शुरुआती 12 करोड़ साल बिना चंद्रमा के हैं और जीवन का कोई रूप अभी कल्पना के परे है। इस युग का अंत धरती पर जीवन के प्रारंभिक रूपों के उदय के साथ हुआ माना जाता है और इन जीवों के आधार पर ही लगभग एक अरब साल चले इस युग को आर्कियन युग का नाम दिया गया है। यहां तक धरती और मंगल के ग्रहीय इतिहास में कोई बड़ा फर्क नहीं है। बल्कि धरती की तुलना में सूरज से दूर होने के चलते वहां जल्दी जीवन विकसित होने की संभावना जताई जाती रही है। लेकिन आर्कियन युग के बीच में ही दोनों की दुनिया अलग हो गई। 

धरती के बारे में धारणा यह है कि जीवाणुओं की कुछ खास किस्मों ने फोटो सिंथेसिस से ऑक्सिजन पैदा करके इस ग्रह को मौजूदा शक्ल की तरफ मोड़ दिया जबकि मंगल पर बड़े उल्कापातों के चलते उसका भू-चुंबकत्व नष्ट हो गया, पानी उड़ गया और वातावरण कमजोर पड़ते-पड़ते लगभग नगण्य हो गया। मंगल के अध्ययन के पीछे वैज्ञानिकों का एक बड़ा मकसद पृथ्वी के प्रारंभिक स्वरूप को लेकर बनाई गई अपनी अवधारणाओं को जांचने का है। इसमें सबसे बड़ा पेच मंगल पर जीवन का कोई रूप या उसका पुरातात्विक अवशेष पाने से जुड़ा है। जिंदगी के लिहाज से एक ग्रह के पास या फेल होने के लिए क्या-क्या चीजें जिम्मेदार हैं? पृथ्वी के अलावा कहीं और भी जीवन पैदा हुआ या नहीं, और अगर यह कहीं और भी, मसलन मंगल पर पैदा हुआ तो इसके बचे रहने की परिघटना केवल पृथ्वी पर ही क्यों दर्ज की जा रही है?

इन सभी सवालों से जुड़ी जांच-पड़ताल में पर्सीवरेंस ने बहुत महत्वपूर्ण काम किया है और अगले दो साल तक यह काम पूरी क्षमता के साथ करने के लिए जरूरी सारे साजो-सामान और ईंधन इसके पास मौजूद है। इसने दो मीटर खुदाई करके सतह से लेकर नीचे तक काफी नमूने इकट्ठा किए हैं। पानी गायब होने के बारे में पर्सीवरेंस के भेजे आंकड़े बताते हैं कि यह काम एक झटके में नहीं हुआ। एक लंबा सूखा, फिर कुछ समय तक नम जलवायु, फिर दोबारा सूखा और फिर नमी के कई एपिसोड इसके भेजे चित्रों में जाहिर होते हैं। चुंबकत्व नष्ट होने को लेकर अभी ब्यौरे आने बाकी हैं, हालांकि चीनी रोवर में इसके अध्ययन के लिए अपेक्षाकृत ज्यादा इंतजाम हैं।           

ध्यान रहे, मंगल पर कामकाजी स्थिति में रोवर यान उतारने में अभी तक सिर्फ छह मिशन कामयाब हुए हैं, और ये सभी अमेरिका की सरकारी संस्था नासा द्वारा ही संचालित रहे हैं। यूरोपियन स्पेस एजेंसी (ईएसए) का एक यान मंगल पर उतरने के ठीक पहले क्षतिग्रस्त हो गया था। बाद में पता चला कि कैलकुलेशन की मामूली गड़बड़ी से यान की रफ्तार कम करने वाला उसका एक रेट्रो रॉकेट सटीक वक्त से सिर्फ आधा सेकंड पहले बंद कर दिया गया। नतीजा यह रहा कि ईएसए का यान महज किसी दोमंजिला इमारत जितनी ऊंचाई से गिरकर चकनाचूर हो गया। इसके पहले रूस ने अपना एक यान मंगल पर सकुशल उतार दिया था लेकिन सतह पर उतरने के सिर्फ 14 मिनट बाद धरती से उसका संपर्क टूट गया।

ये नाकामियां एक कठिन समस्या की ओर इशारा करती हैं। पांच करोड़ 46 लाख से लेकर 40 करोड़ 10 लाख किलोमीटर के लंबे गैप में लगातार बदलने वाली धरती और मंगल की दूरी और जब-तब दोनों के बीच में सूरज आ जाने के चलते संवेदनशील दूरसंचार यंत्रों की ट्यूनिंग बहुत मुश्किल हो जाती है। बीच में कोई बाधा न आए तो भी धरती से कोई निर्देश मंगल तक पहुंचने में कई मिनट लगते हैं। इतना ही वक्त निर्देश पर अमल हुआ या नहीं, यह जानने में भी लग जाता है। बीच में सूरज की आड़ आ गई, फिर तो कई दिन के लिए मंगल की सतह पर मौजूद यान का संपर्क पृथ्वी से बिल्कुल ही टूट जाता है।

कुछ बातें मंगल पर मानवयुक्त यान भेजने से जुड़ी मुश्किलों पर भी कर लेनी चाहिए, जिसपर इधर काफी चर्चा होने लगी है। पहली यह कि कोई यान वहां भेजने की खिड़की 26 महीने बाद ही खुलती है। विज्ञान चाहे जितनी भी तरक्की कर ले, इसमें कोई बदलाव नहीं आने वाला। वजह वही। दोनों ग्रहों के बीच की बदलती दूरियां। आप चाहें तो दस-पंद्रह दिन के अंदर कई सारे यान मंगल की तरफ रवाना कर दें, लेकिन अगला काफिला 26 महीने बाद ही जाएगा। और पहुंचने में लगने वाला टाइम? 115 से 180 दिन। अमेरिकी उद्यमी एलन मस्क का कहना है कि भविष्य में किसी एडवांस टेक्नॉलजी के जरिए इसे घटाकर एक महीने तक लाया जा सकता है। तब तक चार-पांच महीने की एकतरफा अंतरिक्ष यात्रा इंसानों को रेडिएशन से भी मार सकती है। इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन में इसकी तैयारी एक हद तक ही की जा सकती है, क्योंकि धरती का चुंबकीय क्षेत्र ढाल बनकर सौर तूफानों से इसको बचाए रखता है।

बहरहाल, करोड़ों रुपये का टिकट खरीदकर अगर आप मंगल पर पहुंच गए तो वहां अपना वजन आपको  एक तिहाई से भी कम महसूस होगा। यहां 75 किलो के वयस्क हैं तो वहां 25 किलो के बच्चे की तरह कुलांचें भरते फिरेंगे। सांस लेने के लिए ऑक्सीजन और पीने के लिए पानी का इंतजाम कुछ हद तक वहां हो जाएगा, लेकिन ‘मार्शियन’ फिल्म की तरह खाने भर को आलू-पालक उगा लेने का सपना छोड़ ही दें। जड़ वाले पौधों के लिए बाकी हर चीज से ज्यादा जरूरी है नाइट्रोजन, जो धरती के 78 प्रतिशत के बरक्स मंगल के वातावरण में सिर्फ दो प्रतिशत है। वहां का दिन, यानी एक सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय के बीच का समय हमारे यहां से करीब चालीस मिनट ज्यादा है, हालांकि साल हमारे साल का लगभग दोगुना, ज्यादा ठोस ढंग से कहें तो 1.88 गुना बड़ा है। मंगल-मध्य रेखा पर स्थायी मौसम पृथ्वी के ध्रुवीय इलाकों से भी ठंडा है, लेकिन खूब गर्मी पड़ती है तो लद्दाख के जाड़ों जैसा हो जाता है। बीच-बीच में रेतीले अंधड़ इतने भयंकर आते हैं कि इनसे बचने के लिए बहुत मजबूत आवास बनाने होंगे। 

एलन मस्क ने ठीक कहा है कि शुरुआती मंगलयात्रियों को सबसे पहले इस सवाल का जवाब देना होगा कि ‘क्या आप मरने के लिए तैयार हैं? करीब दो साल तक जिंदा रहने के लिए खाना, इमर्जेंसी के लिए पानी और ऑक्सीजन, साथ में ठहरने के लिए मजबूत डेरे लेकर जब आप दोपहर में तांबई और सुबह-शाम धुर काले आसमान वाले इस निचंट रेगिस्तानी ग्रह पर पहुंचेंगे तो वहां सिर्फ आपकी जिज्ञासा और जिजीविषा ही आपको जीवित रखेगी। धरती से किसी मदद की उम्मीद न रखें, क्योंकि यहां से कुछ टूटे-फूटे संदेशों के सिवा आपको कुछ नहीं मिलने वाला। बाकी खर्चे छोड़ दें, तो सिर्फ किराये का हिसाब एलन मस्क ने दो लाख डॉलर बताया है, हालांकि संयुक्त अरब अमीरात के उत्साही उद्यमियों ने सन 2117 तक इसके 20 हजार डॉलर हो जाने की उम्मीद बंधाई है। चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए मंगल यात्रा का प्रस्ताव पहली नजर में बचकाना ही लगेगा, लेकिन महामारी, धार्मिक उपद्रव और एटमी विनाश की आशंकाओं से घिरी दुनिया में अगर यह वैकल्पिक जीवन की एक उम्मीद जगा सके तो इससे बड़ी बात भला और क्या होगी?

Saturday, 10 April 2021

फिजिक्स की जमीन पर बड़ा भूचाल

चंद्रभूषण

भौतिकी की दुनिया में किसी बहुत बड़े बदलाव की सनसनी फैली हुई है। ठीक दो हफ्ते के अंतर पर- क्रमशः 23 मार्च और 7 अप्रैल को- दुनिया की दो सबसे बड़ी प्रयोगशालाओं एलएचसी और फर्मीलैब द्वारा एक ही मूलभूत कण म्यूऑन को लेकर दो बिल्कुल अलग संदर्भों में जारी रिपोर्टों ने सृष्टि रचना की मौजूदा समझ में कुछ ढांचागत बदलावों की ओर इशारा किया है। इस सनसनी की तुलना 2012 में हिग्स बोसॉन (गॉड पार्टिकल) खोजे जाने के बाद बने माहौल से ही की जा सकती है, लेकिन दोनों में एक बुनियादी फर्क है। हिग्स बोसॉन की खोज ने जहां कण भौतिकी के स्टैंडर्ड मॉडल को संपूर्ण बनाया था, वहीं हाल-फिलहाल म्यूऑन को लेकर मचा गदर इस मॉडल में बदलाव की गुंजाइश बनाते हुए अर्से बाद बुनियादी स्तर के गतिरोध भंग का संकेत दे रहा है।

यूरोपियन ऑर्गनाइजेशन फॉर न्यूक्लियर रिसर्च (सर्न) की लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर (एलएचसी) लैब और अमेरिका की फर्मीलैब में हुए प्रयोगों और उनके नतीजों पर बात करने से पहले हमें थोड़ी कोशिश म्यूऑन का सिर-पैर समझने की भी कर लेनी चाहिए। भारतीय न्यूक्लियर साइंटिस्ट होमी जहांगीर भाभा ने अपने कैंब्रिज के दिनों में गुब्बारों से लिए गए कॉस्मिक किरणों के डेटा पर काम करते हुए पाया था कि आकाश के किसी अज्ञात स्रोत से आने वाली इन किरणों में इलेक्ट्रॉन एक निश्चित ऊंचाई के ऊपर ही मिलते हैं। लेकिन उन्होंने अधिक भेदक क्षमता और निगेटिव चार्ज वाले कुछ कण इससे नीचे भी दर्ज किए, और कहा कि इनपर अलग से काम किया जाना चाहिए। 1932-33 का वह दौर इलेक्ट्रॉन-प्रोटॉन-न्यूट्रॉन वाला था। परमाणु से बाहर के मूलकण अभी खोजे जाने बाकी थे।

इस काम की शुरुआत कॉस्मिक किरणों के ही अमेरिकी अध्येताओं, कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी के कार्ल डी एंडरसन और सेठ एंडरमेयर ने की। 1936-37 में उन्होंने इलेक्ट्रॉन जैसे ही चार्ज वाला लेकिन उससे 207 गुना भारी एक ऐसा कण खोजा, जो मात्र 2.2 माइक्रो सेकंड (एक सेकंड का दस लाखवां हिस्सा) में विघटित हो जाता था। बाद में पता चला, म्यूऑन नाम की यह छलना एक मूलभूत कण है, किन्हीं और कणों के मेल से इसकी रचना नहीं हुई है। इसके उलट वैज्ञानिकों की गुडबुक में छाए प्रोटॉन और न्यूट्रॉन जल्द ही मूलभूत कणों की सूची से बाहर हो गए, क्योंकि ताकतवर कोलाइडर मशीनों के उदय के साथ ही उन्हें क्वार्क नाम के मूलभूत कणों की निर्मिति पाया गया।

हिरोशिमा और नागासाकी पर एटम बम गिराए जाने के बाद वाले जिस दौर में पूरी दुनिया न्यूक्लियर साइंस को इसकी महाविनाशक संभावनाओं को लेकर कोसने में जुटी थी, वह समय फंडामेंटल फिजिक्स के लिए नैतिक संकट के अलावा भयानक कन्फ्यूजन का भी था। उच्च ऊर्जा स्तर पर परमाणु नाभिकों को आपस में टकरा देने से हासिल मलबे में कोई न कोई नया कण हर रोज मिल जाता था। सवाल यह था कि अगर ये सभी मूलकण हैं तो फिर क्यों न इस शब्द की परिभाषा ही बदल दी जाए- बुनियादी स्तर पर ढेरों कणों का घालमेल है, मूल जैसा कहीं कुछ है ही नहीं। फिर असाधारण मेधा वाले कई भौतिकशास्त्रियों ने 1970 के दशक के मध्य में चीजों को सुलझाया और स्टैंडर्ड मॉडल जैसा एक खाका सामने आया, जिससे सूक्ष्म स्तर पर सारी चीजों की व्याख्या हो जाती है। इन ‘सारी चीजों’ का मामला समझने के लिए हमें कुछ बातें प्राकृतिक बलों के बारे में कर लेनी चाहिए।

सबसे पहले न्यूटन के जरिये हमें गुरुत्व बल के बारे में जानकारी मिली, जो मात्रा की दृष्टि से बहुत मामूली है। दो चीजें एक-दूसरे को खींचती हैं लेकिन दो पहाड़ भी अगल-बगल रख दिए जाएं तो उनका आपसी खिंचाव नापने में बड़े-बड़ों की छुट्टी हो जाएगी। इसके कोई दो सौ साल बाद विद्युत-चुंबकीय बल खोजा गया, जो चीजों के आवेश (चार्ज) पर निर्भर करता है। फिर परमाणुओं के नाभिक के भीतर सक्रिय रहने वाले दो सूक्ष्म स्तरीय लेकिन भयानक शक्तिशाली बल पिछली सदी में लगभग एक साथ खोजे गए, जिनमें एक का नाम कमजोर नाभिकीय बल और दूसरे का मजबूत नाभिकीय बल है। इनमें गुरुत्व को छोड़कर बाकी तीनों बलों और उनके रिश्तों की समझदारी स्टैंडर्ड मॉडल में मौजूद है। 

यह मॉडल कुल सत्रह मूल कणों पर आधारित है। छह क्वार्क (टॉप, बॉटम, अप, डाउन, चार्म और स्ट्रेंज ), छह लेप्टॉन (इलेक्ट्रॉन, म्यूऑन, टाऊ और इन तीनों से संबंधित न्यूट्रिनो), चार बलवाहक बोसॉन (ग्लूऑन, फोटॉन, जेड बोसॉन और डब्लू बोसॉन) और इन तीनों वर्गों से अलग एक अनोखा कण हिग्स बोसॉन, जिसके संसर्ग में आ सकने वाले कणों में द्रव्यमान होता है, बाकियों में नहीं होता। इस मॉडल की कई समस्याएं हो सकती हैं, जिनमें सबसे बड़ी यही है कि इसमें गुरुत्व के लिए कोई जगह नहीं है। लेकिन सूक्ष्म स्तर के जितने भी प्रेक्षण हैं, चाहे वे ब्रह्मांड के आखिरी छोर पर भी क्यों न लिए गए हों, उन सबकी व्याख्या इससे हो जाती है। 

यह बात पिछले कुछ सालों से भौतिकशास्त्रियों में झल्लाहट पैदा करने लगी है, क्योंकि थिअरी के विकास में यह मॉडल एक बड़ी बाधा बन गया है। म्यूऑन से संबंधित हाल के दोनों प्रयोग स्टैंडर्ड मॉडल (एसएम) से निकली इसकी कुछ विशेषताओं पर मजबूती से सवाल खड़े कर रहे हैं। ध्यान रहे, ये सवाल पिछले एक पखवाड़े में नहीं खड़े हुए हैं। पिछले बीस वर्षों में म्यूऑन को लेकर दो पहलुओं से विवादित निष्कर्ष आते रहे हैं। 23 मार्च को एलएचसी द्वारा और 7 अप्रैल को फर्मीलैब द्वारा जारी प्रयोगों की श्रृंखला में घोषित निष्कर्ष पिछले नतीजों की पुष्टि करते हैं। इससे वैकल्पिक सिद्धांतों की आवक तेज हो जाएगी लेकिन अगले दो-तीन वर्षों में नतीजों पर और ज्यादा पुख्तगी हासिल किए बगैर एसएम  में किसी हेरफेर पर विचार नहीं किया जाएगा। 

एलएचसी का प्रयोग बॉटम क्वार्क के विघटन पर आधारित है। एसएम के मुताबिक इसमें इलेक्ट्रॉन और म्यूऑन बराबर-बराबर मिलने चाहिए, लेकिन प्रयोग में म्यूऑन 15 फीसदी कम पाए जा रहे हैं। फर्मीलैब का प्रयोग म्यूऑन्स के चुंबकीय गुण को लेकर है, जिसमें एसएम के आकलन से अलग नतीजे दर्ज किए जा रहे हैं। ये प्रयोग इतने महीन हैं और इन्हें करने वाले वैज्ञानिक अपने काम को लेकर इतने इत्मीनान में हैं कि इनके नतीजे अपने साथ भारी उथल-पुथल ही लेकर आ सकते हैं। इसे नई भौतिकी की पदचाप यूं ही नहीं माना जा रहा है। इस शास्त्र की दुनिया सूक्ष्म और विराट, दोनों स्तरों पर पिछली सदी में बीस के दशक में ही बदलनी शुरू हुई थी। क्या पता, इस बार भी इतिहास खुद को दोहरा रहा हो।


Friday, 9 April 2021

कैसे बचें समुद्री जीव

चंद्रभूषण

अगर आप अपने इर्द-गिर्द के पर्यावरण ध्वंस से परेशान हैं तो जरा समुद्री जीवों पर आई विपत्ति के बारे में सोचकर देखें। टेक्नॉलजी ने जलजीवों के शिकार की क्षमता बहुत बढ़ा दी है और गहरे समुद्रों में जारी जैविक सर्वनाश पर नजर रखने के लिए कोई सरकारी या गैर-सरकारी अथॉरिटी भी नहीं है। ऊपर से ग्लोबल वार्मिंग ने विशाल समुद्री इलाकों की ऑक्सीजन चूसकर उन्हें बंजर बना दिया है। समुद्री जीव इन इलाकों में रहना तो दूर उधर से गुजरने में भी डरते हैं। 

इन बुरी खबरों के बीच अकेली अच्छी खबर यह है कि साल दर साल घटती समुद्री पकड़ ने सरकारों को जता दिया है कि यह किस्सा यूं ही चलता रहा तो अगले दस-बीस वर्षों में ह्वेलिंग के अलावा समुद्रों से मछली, केकड़ा और झींगा पकड़ने के कारोबारों पर भी ताला पड़ जाएगा। इससे कई छोटी अर्थव्यवस्थाएं पूरी तरह तबाह हो जाएंगी और मानवजाति प्रोटीन के सबसे बड़े स्रोत से वंचित हो जाएगी। पर्यावरण पर इसका कैसा असर पड़ेगा, कोई नहीं जानता। 

इन आशंकाओं के मद्देनजर तीन वैज्ञानिक समूहों ने ग्रीनपीस, प्यू ट्रस्ट और नेशनल ज्योग्राफिक की परियोजनाओं के तहत सारे समुद्रों का सर्वे किया और दो साल पहले अपनी रिपोर्टें संयुक्त राष्ट्र के सामने पेश कीं। इन रिपोर्टों में समुद्री सतह के नीचे मौजूद सारे पर्वतों, गर्तों और गर्म पानी के स्रोतों के ब्यौरे शामिल हैं और यह जिक्र भी है कि किस जीवजाति के सर्वाइवल के लिए कौन सा इलाका ज्यादा महत्वपूर्ण है।

ऐसा सर्वे कुछ साल पहले तक संभव नहीं था क्योंकि इसके लिए जरूरी टेक्नॉलजी ही दुनिया में मौजूद नहीं थी। लेकिन अभी समुद्री जीवों की टैगिंग और जीपीएस के जरिये समुद्र के हरेक वर्ग किलोमीटर के साथ किसी जीव के रिश्ते को लेकर पूरी जानकारी हासिल की जा सकती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि एक वैश्विक संधि के जरिए अगर 40 फीसदी समुद्रों में शिकार और उत्खनन पर रोक लगाई जा सके तो 30 फीसदी समुद्री जीवजातियों की निरंतरता सुनिश्चित की जा सकती है।

न्यूटन का सेब

सुशोभित

आइज़ैक न्यूटन का जन्म लिंकनशायर के जिस वूल्सथोर्प नाम के गांव में हुआ था, वहां सेब के ख़ूब सारे बाग़ थे। 

तरतीब से तरतीब मिलाकर अगर आप सोचें तो कह सकते हैं कि वैसे में अगर किसी दरख़्त से सेब को गिरते उसने देख लिया हो, तो यह कोई अचरज की बात नहीं। ये तो रोज़मर्रा की एक आमफ़हम घटना थी। लेकिन सवाल उठता है वो कौन-सा दरख़्त था? कहते हैं कि वूल्सथोर्प मैनर में वो ‘प्रोवर्बियल एपल ट्री’ आज भी मौजूद है और आज भी उस पर सेब फलते हैं। सैलानी बड़े चाव से उसके साथ तस्वीरें खिंचवाते हैं। लेकिन क्या यही वह दरख़्त है? इतने सारे दरख़्तों में आप कैसे निश्चित हो सकते हैं कि यही वह है।

फिर प्रश्न यह भी कि भले वूल्सथोर्प में सेब के बाग़ हों, ये ज़रूरी तो नहीं कि न्यूटन ने वहीं पर वो सेब देखा हो। लिहाजा कैम्ब्रिज (ट्रिनिटी कॉलेज) वाले बड़े गर्व से कहते हैं कि वो दरख़्त तो हमारे यहां था। कैम्पस में जहां न्यूटन रहता था, उसकी खिड़की से वो दिखलाई देता था। 

लेकिन ये होड़ यहीं ख़त्म नहीं होती। ग्रैन्थम- जो कि वूल्सथोर्प का नज़दीकी रेल्वे स्टेशन है और जहाँ न्यूटन की आरम्भिक पढ़ाई हुई, उसने वहाँ ग्रामर, लातीन भाषा और गणित सीखा- का किंग्स कॉलेज कहता है कि वो पेड़ भले वूल्सथोर्प या कैम्ब्रिज में हो, लेकिन उसे हमारे स्कूल के हेडमास्टर द्वारा तभी ख़रीद लिया गया था और वो अब हमारे यहां है। वहीं केंट के नेशनल फ्रूट कलेक्शन का कहना है कि चार सौ साल बाद भला वो दरख़्त अब कहां मिलेगा? लेकिन उसके बीज से उगे पेड़ हमारे पास हैं। यानी न्यूटन वाले सेब के दरख़्त के वंशज! यूनिवर्सिटी ऑफ़ वॉशिंगटन और एमआईटी भी कमोबेश ऐसा ही दावा करते हैं।

अंग्रेज़ी में जिसे कहते हैं- "अ बाइट ऑफ़ एपल।" आप कह सकते हैं कि इतनी सदियों के बाद न्यूटन अब ख़ुद एक ऐसा सेब बन चुका है, जिसका एक टुकड़ा सभी को चाहिए!

किंतु न्यूटन ने सेब को गिरते देखा था, यह तो तय है ना? शायद हां, शायद नहीं। आप पूछ सकते हैं कि ये कहानी किसने उड़ाई थी? जवाब मिलेगा स्वयं जनाब क़िब्ला-मोहतरम न्यूटन साहब ने। अलबत्ता न्यूटन ने अपने शब्दों में कभी इसका बखान ख़ुद नहीं किया। सबसे पहले यह दावा किया था विलियम स्टुकले ने अपनी किताब ‘मेमॉयर्स ऑफ़ सर आइज़ैक न्यूटन्स लाइफ़’ में। ये किताब 1752 में छपी थी और सेब गिरा था 1666 में, जब कैम्ब्रिज में प्लेग का रोग फैला था और न्यूटन अपने गांव वूल्सथोर्प चला आया था। इसी गाँव में न्यूटन साल 1642 में जन्मा था, और जिस कमरे में वो जन्मा था, वो आज भी जस का तस है। आप यह भी कह सकते हैं, इसी कमरे में आधुनिक भौतिकी का जन्म हुआ था। 

विलियम स्टुकले ने अपनी किताब के 42वें सफ़हे पर लिखा है- 

"गर्मियों के दिन थे, हम एक बाग़ में गए और चाय पी। फिर एक सेब के दरख़्त के नीचे जाकर बैठ गए। आसपास मेरे और न्यूटन के सिवा कोई और ना था। अचानक उन्होंने कहा, ‘उस दिन भी मैं ऐसे ही बैठा था और ख़यालों में गुम था कि तभी वो सेब पेड़ से गिरा, और मैंने सोचा, ये पेड़ से टूटकर ऊपर क्यों नहीं गया, दाएं-बाएं क्यों नहीं गया, नीचे ही क्यों गिरा?’ और फिर यह कि ‘बात केवल इतनी भर नहीं कि धरती के भीतर कोई चुम्बक है, जो सेब को अपनी ओर खींच लेता है, बल्कि यह भी कि कहीं ऐसा तो नहीं कि अंतरिक्ष में चंद्रमा टंगा है तो ऐसा धरती के खिंचाव से ही सम्भव हो?’"

अगर यह स्टुकले की निरी गप्प थी तो अब इसकी तफ़्तीश करने का कोई ज़रिया नहीं, और न्यूटन को मरे भी अब कोई 300 साल होने को आए। लेकिन यह बात पूरी तरह से कपोल-कल्पना इसलिए नहीं कही जा सकती, क्योंकि इस वाक़ये के तीन और संस्करण मिलते हैं। ग़रज़ ये कि अमूमन ख़ामोश रहने वाले न्यूटन ने ये सेब वाली कहानी चार लोगों को अलग-अलग तरह से सुनाई थी। शायद, किंचित, एक दुर्लभ विनोदप्रियता के साथ।

स्टुकले की किताब छपने के कोई पचास-पचपन साल बाद वॉल्तेयर ने अपने एक निबंध में न्यूटन की उस छवि को वर्णित किया, जिसमें वो सेब के बाग़ में टहल रहा था और अचानक उसको ग्रैविटी का इलहाम हुआ। वो निबंध बहुत चर्चित हुआ। वॉल्तेयर को ये कहानी न्यूटन की भतीजी कैथरीन बार्टन ने सुनाई थी। लगभग उसी कालखण्ड में सर डेविड ब्रूस्टर की न्यूटन पर चर्चित जीवनी भी छपी और उसमें भी सेब का क़िस्सा मौजूद था। निश्चय ही वॉल्तेयर और ब्रूस्टर पर स्टुकले की किताब का प्रभाव भी रहा होगा। उस ज़माने में स्टुकले की किताब धड़ल्ले से पढ़ी जा रही थी। 

सेब की इस कहानी ने सामान्य कल्पनाशीलता को ग्रस लिया। इसमें मिथकीय तत्वों की अनुगूँजें जो थीं। लोगों को यह कहानी सुनकर ईदन के उद्यान और ज्ञान के वृक्ष की याद आई, जिस पर सेब का वर्जित फल लगा था। न्यूटन की शख़्सियत के साथ यों भी मिथकीय तारतम्य जम-सा गया था। उसका जन्म बड़े दिन पर हुआ था, उसने एकान्तवासियों जैसा निस्संग जीवन बिताया था और ज्ञान के शोध में ख़ुद को खपा दिया था। पर्सेप्टिव ज़ेहन के अनेक इलाक़ों में प्रवेश करने वाला वो दुनिया का पहला आदमी था, आदम की तरह- उसके साथ सेब की कहानी तो जुड़ना ही थी। 

न्यूटन अपने जीवनकाल में ही बहुत चर्चित हो चुका था और कैम्ब्रिज और लंदन में उसको एक दैवीय-उपस्थिति की तरह देखा जाता था। ख़ुद न्यूटन को ये गुमान था कि वो एक मामूली इंसान नहीं। वो अपने ज़माने का सबसे बड़ा और मशहूर साइंसदां था, जो रौशनी की गिरहों को सात पहलुओं में खोलकर परख चुका था। प्रिज़्म से वो प्रयोग उसने वूल्सथोर्प में ही किया था, और कम-अज़-कम इस बात को लेकर तो किसी को कोई शुब्हा नहीं है। वूल्सथोर्प जाने वाले सैलानी उस खिड़की को भी बड़ी हसरत से छूते हैं, जहां न्यूटन प्रिज़्म लेकर खड़ा रहता था, सत्रहवीं सदी की ढलान के उस जादुई साल में।

‘गॉड सेड लेट न्यूटन बी, एंड ऑल वॉज़ लाइट।’ यानी, ख़ुदा ने न्यूटन की तख़लीक़ की और उजाला हो गया। ये दोहा एलेग्ज़ेंडर पोप ने कहा था। अल्बर्ट आइंश्टाइन अपनी मेज़ पर न्यूटन की तस्वीर रखता था। स्टीफ़न हॉकिंग अपनी व्हीलचेयर चलाता हुआ न्यूटन के घर पर गया था और विज़िटर्स बुक में दस्तख़त करके आया था। अलबत्ता उसने अपनी किताब 'अ ब्रीफ़ हिस्ट्री ऑफ़ टाइम' के परिशिष्ट में न्यूटन की व्याजनिंदा की है। यह स्टीफ़न की आदत थी, ईश्वरों से उसका पुराना वैर था और न्यूटन साइंस की दुनिया का ख़ुदा था।

लेकिन साथ ही न्यूटन तनहा और पेचीदा भी बहुत था। पूरी ज़िंदगी अकेला रहने वाला। "मैं दूर तक देख पाता हूँ तो केवल इसलिए कि मैं बहुत बड़े लोगों के कंधों पर बैठा हूं", विनम्रता के एक दुर्लभ क्षण में वैसा कहने वाला, शाइस्ता। वो दीवारों पर कोयले और खड़िया से पक्षियों, जहाज़ों और पवनचक्कियों के चित्र बनाता था। वो चित्र आज भी वूल्सथोर्प की दीवारों पर मौजूद हैं। न्यूटन से जुड़ी अनेक किंवदंतियों में से एक है कि साल 1674 में जब आगज़नी से न्यूटन की अनेक पांडुलिपियाँ, उसकी बीस साल की मेहनत, जलकर ख़ाक हो गई थीं, तो उसने केवल इतना ही कहा था- "ओह डायमंड डायमंड, तुम्हें नहीं मालूम ये तुमने क्या शरारत कर डाली है!" डायमंड उसके प्रिय कुत्ते का नाम था, जिसकी भूल से मेज़ पर मोमबत्ती गिर गई थी

शाइर और साइंसदां में ज़्यादा फ़ासला नहीं होता, सिवाय इसके कि साइंसदां नियम-क़ायदों के अनुशासन में स्वयं को बांध लेता है, जबकि शाइर की आवारगी में एक दूसरे क़िस्म की तरतीब होती है। 

न्यूटन ने एक चिट्‌ठी में लिखा था- "मैं ताउम्र समंदर-किनारे ऐसे रंगीन पत्थर और शंख-सीपियां बटोरता रहा, जो शायद दुनिया की दूसरी चीज़ों से बेहतर थे, जबकि ख़ुद समुद्र मेरे समीप हहराता रहा, जिसे मैं कभी पूरा जान नहीं सकता था।"

ये बात कोई शाइर ही कह सकता है!

तब कह लीजै कि धरती की धुन में बंधे उस सेब से ख़ूबसूरत भला कौन-सी चीज़ सर आइज़ैक न्यूटन ने अपनी ज़िंदगी के समुद्र तट पर खोजी थी, जो किस पेड़ पर लगा था, लगा था भी या नहीं, आज भी इसकी तफ़्तीश में आदमज़ात अपनी नींदें हराम किए हुए है?