Saturday, 22 June 2019

विज्ञान कथाओं की विशेषताएं

विज्ञान कथाओं की विशेषताएँ -
हरीश गोयल
महाविपत्ति(catastrophe /apocalypse )  भी कई प्रकार की होती है ।
महामारी की महाविपत्ति -
महामारी से संक्रमित मानवता का विनाश –
मेरी शेली की विज्ञान कथा ‘द लास्ट मैन’ (1826 ) प्लेग की महामारी कोन्सटेंटिनोपोल से  प्रारम्भ होती है । महामारी से संक्रमित होकर सारी मानवता का नाश हो जाता है ।केवल एक व्यक्ति शेष रहता है । फ़्रेंकेंस्टीन मोंस्टर की तरह एक नौका में दक्षिण की ओर जाता है नितांत अकेला तथा क्षुब्ध ।
मानव द्वारा भी कृत्रिम रूप से जीवाणु/वाइरस का स्ट्रेन उत्पन्न महामारी फैलाई जाती है तथा मानवता का विनाश किया जाता है ।स्टीफन किंग की कथा ‘स्ट्रेंड’(1978) में जैविक युद्ध के तहत एक वैज्ञानिक हैजा के जीवाणु का एक स्ट्रेन तैयार करता है इसके संक्रमण से विश्व की 99% आबादी समाप्त हो जाती है ।
मेरी कथा  ‘जीवाणु बम में एक ‘डाउन सिंड्रोम’ से ग्रसित व्यक्ति मरीचि को ह्यूमन जीनोम प्रोजेक्ट के तहत सुपर इंटेलिजेंट बना दिया जाता है ।वह इसका प्रयोग विकासवाद की गुत्थी सुलझाने के लिए करता है ।लेकिन यह गुत्थी सुलझाते हुए कब वह हैवानियत का पुर्जा बन जाता है ,पता ही नहीं चलता ।वह जीवाणुओं के म्यूटेशन पर कार्य करने लगता है तथा जीवाणु का एक ऐसा स्ट्रेन ईजाद करता है जो पृथ्वी पर अज्ञात था ।वह  प्लेग के जीवाणु ‘येर्सिनिया पेस्टिस ‘को एक नये जीवाणु स्ट्रेन ‘मरीचि पेस्टिस’ तैयार  करता है. मरीचि उसका स्वयं का नाम है । उसका शैतानी दिमाग तेजी से काम करने लगता है ।वह इस नए स्ट्रेन का प्रयोग जीवाणु बम बनाने के लिए करता है तथा शत्रु राष्ट्र से सांठगांठ करएक राष्ट्र   के महानगरों पर बम गिरा देता है । लोग प्लेग  की महामारी से जूझते रहते हैं ।उसका कोई एंटीडोट उस समय मौजूद नहीं था ।मरीचि यहीं नहीं रुकता है ।वह एक उपग्रह से यह साजिश रचता है तथा विश्व के अमेरिका और रूस जैसे शक्तिशाली राष्ट्रों को निशाना बनाने की सोचता है लेकिन उसका भंडा फूट जाता है.

डॉ राजीव रंजन उपाध्याय की कथा ‘क्वा हेक’ में अन्तरिक्ष यात्रियों की एक टीम टेकायन प्रॉपल्शन यान में  सैर करते हुए कैसरी -55 के एक दूसरे ग्रह पर पहुँचते है ।वे वहाँ दूसरी बार पहुँचते हैं ।पहली बार जब वे वहाँ गए थे तो उन्होने उस निर्जन ग्रह पर एक मानव बस्ती बसाई थी ।उन्होने  चंद्रमा की  धरती से  ‘फेक्टो तकनीक’ द्वारा ‘पदार्थ पारण’(teleportation) कर वहाँ बस्ती बसाते हैं ।. अब वे यह जानना चाहते हैं कि उनके द्वारा बसाई गयी बस्ती कैसी होगी ?लेकिन जब वे उक्त ग्रह पर पहुँचते  हैं तो पाते हैं कि वह बस्ती उजाड़  चुकी है ।वे चहुं ओर मानव जाति के कंकाल ही कंकाल पाते हैं केवल एक क्वा हेक नाम की बच्ची जीवित बचती है.वह' मतिभ्रम'(hallucination )  का शिकार  हो जाती है .डॉ आसियां के अनुसार क्वा हेक की यह स्थिति ‘चार्ल्स बोंनेट सिंड्रोम’के कारण थी ।उसे स्वस्थ होने के लिए रिट्रो वाइरस वैक्सिन’ लगाए जाते हैं। क्वा हेक तनिक स्वस्थ होने पर ग्रह पर बसी आबादी के कंकाल में तब्दील होने का राज खोलती है ।वह बताती है कि एक वर्ष पूर्व एक धूमकेतु अपनी विशाल पूंछ को लहराते हुए आसमान से गुजरा ।उसके अदृश्य होते ही वातावरण में अंधकार छा गया।आसमान से धूमकेतु के हल्की बूंदों के   धूलिकण गिरने लगे ।इससे मानव आबादी पहले मतिभ्रम का शिकार हुई ।बाद में वह  कंकाल में परिणत हो गयी  । स्पष्ट था कि उस धूलिकण में वाइरस थे जिससे आबादी कि यह स्थिति हुई ।

Friday, 14 June 2019

पानी की ए टू जेड कहानी

...ताकि पानी न करे पानी-पानी
Water Purification: A to Z

हाल में नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने केंद्र सरकार से कहा है कि जिन इलाकों में पानी ज्यादा खारा नहीं है, वहां आरओ के इस्तेमाल पर बैन लगाया जाए क्योंकि इससे पानी की बहुत बर्बादी होती है और यह सेहत के लिए मुफीद भी नहीं है। खास बात यह है कि महानगरों में पानी सप्लाई करने वाली एजेंसियां भी इस बात पर जोर देती हैं कि उनका पानी सौ फीसदी शुद्ध है, लेकिन हकीकत यह है कि महानगरों में सबसे ज्यादा आरओ वॉटर प्योरिफायर ही बिक रहे हैं। क्या है शुद्ध पानी का फंडा और आरओ के इस्तेमाल में है समझदारी, एक्सपर्ट्स से बात करके ब्योरा रहे हैं वीरेंद्र वर्मा:

दिल्ली, मुंबई या लखनऊ समेत देश के ज्यादातर शहरों में पानी का स्रोत या तो नदियां हैं या फिर ग्राउंड वॉटर। इनके पानी को ही साफ करके वहां की सरकारी एजेंसियां लोगों के घरों में पानी की सप्लाई करती हैं। सरकारी एजेंसी कच्चे पानी को साफ करके पाइपलाइन के जरिए लोगों के घरों में पहुंचाती है। हालांकि यहां दिक्कतें पुरानी पाइपलाइनों की वजह से आती हैं या फिर फैरूल से घर तक पानी पहुंचने के दौरान पानी में अशुद्धियां मिलती हैं। अगर कहीं लीकेज होती है तो सप्लाई वाले पानी में सीवर का पानी मिलने की आशंका बढ़ जाती है क्योंकि कई जगह पीने की पाइपलाइनें और सीवर की पाइपलाइनें साथ-साथ गुजरती हैं।
पानी की पाइपलाइन पर सीधे मोटर लगाने से भी गंदा पानी आ जाता है। कई बार हमें यह पता नहीं होता कि पाइप में सप्लाई आ रहा है या नहीं। अगर नहीं आ रहा है और हम मोटर चालू कर देते हैं तो मोटर बाहर की गंदगी खींच लेता है।
सप्लाई वाले पानी में अमूमन सबसे ज्यादा अशुद्धियां फेरूल से आपके घर तक जाने वाले पाइप में मिलती हैं। ऐसे में बेहतर रहेगा कि पानी का कनेक्शन जल बोर्ड के लाइसेंसी प्लंबर से ही कराएं और अगर पानी में गड़बड़ी आ रही है तो सबसे पहले अपनी लाइन की जांच कराएं। जरूरी हो तो पाइपलाइन बदलवा लें। फैरूल वह जॉइंट होता है, जहां पर जल बोर्ड की पाइपलाइन से घरों में पानी का कनेक्शन दिया जाता है। यहां लीकेज होने पर घरों के अंदर गंदा पानी सप्लाई होने लगता है।

पानी में गड़बड़ियां
पानी में दो तरह की अशुद्धियां होती हैं: घुलनशील और अघुलनशील। ये केमिकल और बायलॉजिकल होती हैं। केमिकल अशुद्धियां कई बातों पर निर्भर करती हैं। मसलन, अगर पानी के स्रोत के पास फैक्ट्रियां हैं तो उनकी गंदगी पानी में जाएगी। इसी तरह सेनेटरी लैंडफिल की गंदगी रिसकर जमीन के नीचे के पानी को खराब कर देती है। दिल्ली में गाजीपुर और भलस्वा लैंडफिल के साथ ऐसा ही हुआ है। स्टडी के मुताबिक, इन दोनों सैनिटरी लैंडफिल के 10 किलोमीटर तक के दायरे के अंडरग्राउंड वॉटर की क्वॉलिटी काफी खराब हो चुकी है। अगर खेती में कीटनाशकों का बहुत इस्तेमाल होता है तो ये केमिकल अंडरग्राउंड वॉटर में मिलकर उसे गंदा कर देते हैं।

पीने का पानी कैसा हो?
BIS स्टैंडर्ड
TDS: 0-500 ppm
pH level: 6.5-7.5
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WHO स्टैंडर्ड
- पानी में 300 से कम टीडीएस है तो उसे एक्सेलेंट कैटिगरी का माना जाता है।
- 300 से 600 के बीच की टीडीएस को गुड कैटिगरी में माना जाता है।
- 600 से 900 के बीच के टीडीएस को फेयर कैटिगरी में माना जाता है।
- 1200 से ज्यादा के टीडीएस वाले पानी को खराब कैटिगरी में माना जाता है।

BIS के नियम
पीने के पानी की जांच के लिए बीआईएस (ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स) ने जो स्टैंडर्ड बनाए हैं वे बीआईएस-10500 के तहत आते हैं। इनके अनुसार पानी में टीडीएस की मात्रा 0 से 500 पीपीएम (पार्ट्स प्रति मिलियन) होनी चाहिए। साथ ही पीएच लेवल 6.5 से 7.5 के बीच होना चाहिए। इससे ज्यादा होने पर यह नुकसानदेह है। बीआईएस के मुताबिक, पानी में कुल 82 तरह की अशुद्धियों की जांच होनी चाहिए। ये फिजिकल पैरामीटर-6, कैमिकल (टॉक्सिक)-23+16, रेडियोएक्टिव-3, पेस्टिसाइड्स-18, बैक्ट्रियोलोजिकल-2, माइक्रोस्कॉपिक-13 हैं। डब्ल्यूएचओ ने पानी की जांच के लिए 300 से 400 तरह के पैरामीटरस तय किए हैं, चूंकि भारत में बीआईएस के मानक लागू होते हैं, इसलिए पानी की जांच बीआईएस के मानकों पर सही मानी जाती है।

TDS क्या है?
पानी में घुली हुई सभी चीजों को टीडीएस (टोटल डिसॉल्व्ड सॉलिड्स) कहते हैं। इसमें सॉल्ट, कैल्शियम, मैग्निशियम, पोटैशियम, सोडियम, कार्बोनेट्स, क्लोराइड्स आदि आते हैं। ड्रिंकिंग वॉटर को मापने के लिए टीडीएस (टोटल डिसॉल्व्ड सॉलवेंट), पीएच और हार्डनेस लेवल देखा जाता है। बीआईएस (ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड) के मुताबिक, मानव शरीर अधिकतम 500 पीपीएम (पार्ट्स प्रति मिलियन) टीडीएस सहन कर सकता है। अगर यह लेवल 1000 पीपीएम हो जाता है तो शरीर के लिए नुकसानदेह हैं। लेकिन फिलहाल आरओ से फिल्टर्ड पानी में 18 से 25 पीपीएम टीडीएस मिल रहा है जो काफी कम है। इसे ठीक नहीं माना जा सकता। इससे शरीर में कई तरह के मिनरल नहीं मिल पाते। यहां एक सवाल और है कि हमारे घरों में जो पीने के पानी की सप्लाई सरकारी एजेंसियां करती हैं, उनकी कितनी जांच होती है?

सरकारी प्लांट से घर तक ऐसे पहुंचता है पानी
1. सरकारी एजेंसियों के वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट में पानी नदी या नहर के जरिए आता है तो सबसे पहले पानी में मौजूद अशुद्धियों की जांच होती है। इसके बाद तय किया जाता है कि उस पानी को किस विधि से साफ किया जाना चाहिए।
2. पानी की जांच करने के बाद उसमें क्लोरीन मिलाई जाती है। उसके बाद फिटकरी, पॉली एल्युमिनियम क्लोराइड मिलाया जाता है, ताकि पानी की गंदगी साफ हो सके।
3. इसके बाद पानी क्लोरीफायर में जाता है, जहां अशुद्धियां और गाद नीचे बैठ जाती हैं। यहां पानी की दो बार टेस्टिंग होती है।
4. क्लेरीफायर से पानी फिल्टर हाउस में जाता है, जहां पानी छाना जाता है। फिर से पानी की जांच होती है। इसके बाद पानी को प्लांट में मौजूद जलाशयों में भेजा जाता है। यहां पर दोबारा से क्लोरीनेशन होता है। पानी साफ करने के बाद जितनी भी बार पानी की जांच होती है, उसमें घुलनशील और अघुलनशील अशुद्धियों की जांच की जाती है। अगर पानी में कोई भी गड़बड़ी पाई जाती है तो पानी की सप्लाई रोक दी जाती है। प्लांट से पानी साफ होने के बाद अंडर ग्राउंड रिजरवॉयरों में जाता है। यहां भी घरों में सप्लाई करने से पहले जांच की जाती है। इसके बाद भी जल बोर्ड लोगों के घरों में भी जाकर पानी के सैंपल जांच के लिए उठाता है। इसलिए आरओ कंपनियों का आरोप गलत है कि जल बोर्ड पानी की जांच सही से नहीं करता।

क्या कहा है NGT ने
एनजीटी के निर्देश पर नैशनल एन्वॉयरनमेंट इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टिट्यूट (Neeri), सेंट्रल पलूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB) और IIT-Delhi ने आरओ के इस्तेमाल पर एक रिपोर्ट तैयार कर एनजीटी को सौंपी है। रिपोर्ट के आधार पर एनजीटी ने 28 मई को पर्यावरण मंत्रालय को जारी निर्देश में ये बातें कही हैं:
-देश में 16 करोड़ 30 लाख लोग ऐसे हैं, जिन्हें पीने के लिए साफ पानी नहीं मिलता। यह संख्या पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा है।
-विकसित देशों में भी आरओ का इस्तेमाल कम करने पर जोर दिया जाता है। वहां समंदर के पानी को पीने लायक बनाने के लिए आरओ इस्तेमाल होता है क्योंकि इस पानी में TDS बहुत होता है। वहीं भारत में मौजूद पानी में टीडीएस की मात्रा कम होने के बावजूद आरओ की डिमांड दिन ब दिन बढ़ रही है।
-आरओ सिस्टम बनाने वाली कंपनियों ने पानी को लेकर लोगों में डर का माहौल बना दिया है।
-घरों में सप्लाई होने वाले पानी में अगर TDS 500mg/लीटर से कम है तो RO को बैन कर देना चाहिए।
-लोगों के घरों में जो पानी सप्लाई होता है, उसमें TDS कितना है, यह कैसे पता चले। इसके लिए सरकार को उस पानी के बारे में बिल के जरिए पूरी जानकारी दी जानी चाहिए। बिल पर लिखा रहे कि इस पानी का स्रोत क्या है और उसमें TDS कितना है।
-आरओ सिस्टम से पानी में मौजूद जरूरी मिनरल्स भी पूरी तरह निकल जाते हैं। विदेशों में आरओ के बुरे असर देखा जा रहा है। वहां के लोगों में कैल्शियम और मैग्निशियम की कमी होने की शिकायत आने लगी है। इसलिए भारत में आरओ सिस्टम बनाने वाली कंपनियां यह ध्यान रखें कि पानी में कम से कम 150mg/लीटर टीडीएस जरूर मौजूद रहे।
-जिन इलाकों के पानी में आर्सेनिक और फ्लोराइड जैसे खतरनाक तत्वों की मौजूदगी है, वहां के लिए भी ऐसी तकनीक लाई जाए जिससे कि इनका स्तर कम हो सके ताकि आरओ की जरूरत वहां भी नहीं पड़े।
-आरओ से पानी साफ होने की प्रक्रिया में अमूमन 80 फीसदी पानी बर्बाद हो जाता है और 20 फीसदी ही पीने लायक मिलता है। आरओ कंपनियों को ऐसी मशीन बनाने के लिए कहा जाए, जिसके द्वारा कम से कम 60 फीसदी पानी पीने लायक बने और 40 फीसदी से ज्यादा पानी बर्बाद न हो। वहीं साफ पानी प्राप्त करने की क्षमता को आगे कम से कम 75 फीसदी तक बढ़ाई जाए।

RO कंपनियों का पक्ष
'आरओ पर पाबंदी लगाना समस्या का हल नहीं है। दरअसल, पानी में टीडीएस के साथ-साथ माइक्रोप्लास्टिक, आर्सेनिक, कीटनाशक जैसी दूसरी अशुद्धियां भी होती है जिन्हें आरओ के जरिए हटाया जाना जरूरी है। जहां तक पानी की बर्बादी की बात है तो हमने ऐसी तकनीक विकसित की है कि 80% की जगह 50% पानी ही बर्बाद होता है। हम और रिसर्च करके इसे घटाने की कोशिश कर रहे हैं। BIS और WHO के मापदंडों में कहीं भी यह नहीं बताया है कि टीडीएस कम से कम कितना हो। फिर भी हम यह सुनिश्चित करते हैं कि हमारे आरओ में कम से कम 50mg/लीटर टीडीएस पानी निकले। यह पानी स्वाद और सेहत के लिए मुफीद होता है। डब्ल्यूएचओ ने कहा है कि एक दिन में 4 ग्राम से ज्सादा सॉल्ट नहीं लेना चाहिए, लेकिन भारत एक व्यक्ति 9 ग्राम सॉल्ट लेता है। अगर पानी में ज्यादा टीडीएस होता है तो और ज्यादा सॉल्ट शरीर के अंदर जाता है। उससे ब्लड प्रेशर बढ़ता है। एनजीटी ने जो सवाल उठाए हैं, उसके लिए भी सही तथ्य पेश करने पड़ेंगे ताकि आरओ को लेकर भ्रम की स्थिति ना बने।'
-महेश गुप्ता, चेयरमैन, केंट आरओ

क्या कहते हैं डॉक्टर
'अगर टीडीएस 100 तक है तो वह ठीक है। हां, किडनी के मरीजों के लिए 50 से 100 के बीच टीडीएस होना चाहिए।'
-डॉ़ के. के. अग्रवाल, सीनियर कार्डियॉलजिस्ट

'सेफ वॉटर के लिए अगर बैक्टीरिया, वायरस हटाने हैं तो पानी उबालने से ये सब मर जाते हैं, लेकिन अगर उसमें हेवी मेटल्स हैं तो वे उबालने से नहीं जाएंगे। उसके लिए आरओ की जरूरत होती है।'
-डॉ़ एस. के. सरीन, डायरेक्टर, इंस्टिट्यूट ऑफ लिवर एंड बाइलरी साइंसेज

पानी साफ करने के परंपरागत तरीके
पानी को उबालना: वैसे तो पानी को साफ और पीने योग्य बनाने के लिए ढेरों तरीके मौजूद हैं, लेकिन सबसे पुराना तरीका है पानी को उबालना। दुनियाभर में इस परंपरागत तरीके को लोग अपनाते हैं। पानी को कम-से-कम 20 मिनट उबालना चाहिए और उसे ऐसे साफ कंटेनर में रखना चाहिए, जिसका मुंह छोटा हो ताकि उसमें गंदगी न जाए। उबले पानी को ढक कर रखें। हालांकि उबालने से पानी साफ तो हो जाता है, लेकिन उसमें मौजूद हेवी मेटल्स नहीं निकल पाते।

कैंडल वॉटर फिल्टर: पानी को साफ करने के लिए दूसरा मुफीद तरीका है कैंडल वॉटर फिल्टर। इसमें समय-समय पर कैंडल बदलने की जरूरत होती है ताकि पानी बेहतर तरीके से साफ हो सके। सिरैमिक से बने कैंडल्स पानी से बैक्टीरिया हटाते हैं। हालांकि यह पानी में घुले हुए केमिकल को निकाल नहीं पाता। इसके कैंडल को 6 महीने या इस्तेमाल के हिसाब से बदलते रहना चाहिए। कैंडल की कीमत करीब 550 रुपये से शुरू होती है। फिल्टर के साइज के साथ-साथ कीमत बढ़ती रहती है।

क्लोरिनेशन: पानी साफ करने के लिए क्लोरिनेशन बहुत पुरानी प्रक्रिया है। पानी को हानिकारक बैक्टीरिया से बचाने के लिए नगरपालिका, अस्पताल, रेलवे आदि की टंकियों में क्लोरीन का इस्तेमाल किया जाता है। इस प्रक्रिया से पानी साफ होने के साथ-साथ उसके रंग और गंध में भी बदलाव आ जाता है। क्लोरिनेशन से बैक्टीरिया मर जाते हैं। हालांकि इसका इस्तेमाल सही मात्रा में किया जाना चाहिए क्योंकि ज्यादा क्लोरीन से पानी के स्वाद के साथ हमारी सेहत पर भी असर पड़ता है। घरों में इसका इस्तेमाल करना हो तो एक्सपर्ट की सलाह लें।

पानी साफ करने के आधुनिक तरीके
RO (रिवर्स ऑस्मोसिस)
आरओ पानी साफ करने की ऐसी तकनीक है, जिसमें प्रेशर डालकर पानी को साफ किया जाता है। इस तकनीक में पानी में घुली अशुद्धियां, पार्टिकिल्स और मेटल खत्म हो जाते हैं। आरओ का इस्तेमाल उन इलाकों में करना चाहिए जहां पानी में टीडीएस (टोटल डिसॉल्व्ड सॉल्ट) ज्यादा हो यानी पानी खारा हो। मसलन बोरवेल के पानी के लिए या समुद्री इलाकों के लिए आरओ सही है।
खूबियां
- आरओ के पानी में कोई भी अशुद्धि नहीं रहती।
- बैक्टीरिया और वायरस को ब्लॉक कर बाहर करता है।
- क्लोरीन और आर्सेनिक जैसी अशुद्धियों को भी साफ करता है।
कमियां
- बिजली की जरूरत पड़ती है।
- यह नॉर्मल से ज्यादा टैप वॉटर प्रेशर में काम करता है।
- औसतन 20 से 50 फीसदी पानी आरओ के रिजेक्ट सिस्टम से बर्बाद होता है।
- कई आरओ हमारे पीने के पानी से जरूरी मिनरल्स को बाहर कर देते हैं।

कौन-सा RO लें?
आरओ के इतने ब्रैंड्स और फीचर्स आने के बाद सबसे ध्यान रखने वाली बात यह है कि जो भी फाइनल करें, वह आपके इलाके के सप्लाई वॉटर के हिसाब से हो। मसलन, अगर मेट्रो सिटी में रह रहे हैं तो जाहिर है कि वहां का पलूशन लेवल ज्यादा होगा। इसका असर सप्लाई हो रहे पानी पर भी पड़ेगा। ऐसे में प्योरीफायर वही लें जिसमें RO, UV, UF तीनों तकनीक हो। इसके साथ ही चूंकि जरूरी मिनरल्स की शरीर को जरूरत होती है, ऐसे में बाजार में आ चुकी TDS (टोटल डिसॉल्व्ड सॉल्ट) कंट्रोलर तकनीक से लैस प्योरिफायर ही लें, जिससे शरीर में बैलेंस बना रहे।

UV (अल्ट्रावॉयलेट)
इस तकनीक से पानी में मौजूद बैक्टीरिया और वायरस खत्म होते हैं। यह पानी में घुली क्लोरीन और आर्सेनिक को साफ नहीं कर सकता। इसका इस्तेमाल उन इलाकों में ही होना चाहिए जहां ग्राउंड वॉटर पहले से मीठा हो और सिर्फ बैक्टरिया को खत्म किए जाने की जरूरत हो। मसलन, पहाड़ी और कम प्रदूषण वाले इलाकों के लिए ठीक है। इसे समुद्री इलाकों में या प्रदूषित शहरों में इस्तेमाल करना सही नहीं होगा।
खूबियां
- सभी बैक्टीरिया और वायरस को खत्म कर देता है।
- यह नॉर्मल टैप वॉटर प्रेशर में काम कर सकता है।

अल्ट्रा फिल्ट्रेशन (UF)
यह एक फिजिकल तकनीक है। इसे ग्रैविटी तकनीक भी कहते हैं। इसमें किसी केमिकल का उपयोग किए बिना पानी साफ हो जाता है। इसमें तकनीक अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन तरीका एक ही है और वह यह कि यह ग्रैविटी की वजह से इसमें पानी विभिन्न परतों से होते हुए नीचे पहुंचती है और इस दौरान पानी साफ हो जाता है। कुछ में इसके लिए मेंब्रेन (झिल्ली) का इस्तेमाल होता है तो कुछ में सेरेमिक का जिससे पानी छनकर साफ होकर मिलता है।
खूबियां
- बिजली की जरूरत नहीं।
- बैक्टीरिया और वायरस को मार कर पानी से बाहर करता है।
- नॉर्मल टैप वॉटर प्रेशर में काम कर सकता है।
-किसी केमिकल इस्तेमाल नहीं होता।
-यह सस्ता है।
कमियां
पानी हार्ड हो और क्लोरीन और आर्सेनिक की मात्रा ज्यादा हो तो इसका कोई फायदा नहीं। यह घुली हुई अशुद्धियों को साफ नहीं कर पाता।

पोर्टेबल प्योरिफायर
यह छोटे आकार का होता है। इसमें अक्सर नैनो टेक्नॉलजी या फिर मेटल बेस्ट प्योरिफिकेशन होता है।
खूबियां
-इसमें बिजली की जरूरत नहीं होती।
-इसे कहीं भी साथ ले जाना आसान है।
-इसे सीधे टैप में लगाकर साफ पानी मिल जाता है।
कमियां
-ज्यादा गंदा पानी के लिए कारगर नहीं।
-हार्ड वॉटर या खारे पानी में काम नहीं करता।
-बैक्टीरिया और वायरस को निकालने की इसकी क्षमता कम होती है।

हैलोजन टैब्लेट: इमर्जेंसी या ट्रैकिंग के दौरान पानी साफ करने के लिए हैलोजन टैब्लेट का इस्तेमाल किया जाता है। ये गोलियां पानी में पूरी तरह घुल जाती हैं। बाजार में पोर्टेबल एक्वा वॉटर टैब्लेट्स की 50 टैब्लेट्स लगभग 500 रुपये में आती हैं। इसी तरह एक्वाटैब्स वॉटर प्योरिफिकेशन की 100 टैब्लेट्स लगभग 1100 रुपये में आती हैं।

चंद जल सूत्र
Q. फिल्टर होने के कितने दिनों बाद तक उस पानी को पी सकते हैं?
A. आरओ से फिल्टर होने के बाद पानी अगर सही तापमान यानी फ्रिज में रखा है तो करीब एक हफ्ते तक ठीक रहता है।

Q. फिल्टर को कितने समय पर बदल लेना चाहिए?
A. अगर आप अपने घर में हर दिन 20 लीटर पानी साफ करते हैं तो फिल्टर को 6 महीने के अंदर बदल देना चाहिए।

Q. पानी साफ होने के बाद आरओ से बर्बाद हुआ पानी पौधों में डाल सकते हैं?
A. एक अनुमान के मुताबिक दिल्ली में घरों में लगे आरओ से हर दिन काफी पानी बर्बाद हो जाता है। इतने पानी से करीब 20 लाख लोगों की प्यास बुझाई जा सकती है। चूंकि आरओ पानी से सारी अशुद्धियां निकाल देता है तो बर्बाद हुए पानी में प्रदूषण ज्यादा होता है। अगर इस पानी को पौधों में डालेंगे तो पानी के जरिए प्रदूषण पौधों में भी जाएगा। साथ ही, यह पानी जमीन के अंदर जाने पर जमीन के पानी को भी खराब करेगा। हालांकि, कुछ कंपनियों का यह दावा कि इस पानी को स्टोर करके गार्डनिंग कर सकते हैं। इस बेकार पानी को इस्तेमाल करने का बेस्ट तरीका है कि इसका इस्तेमाल कपड़ा धोने और साफ-सफाई में किया जाए।

Q. कहा जाता है कि आरओ वॉटर से बाल धोने से फायदा होता है। क्या यह सही है?
A. चूंकि आरओ वॉटर से प्रदूषण फैलाने वाले कण निकल जाते हैं। इसलिए आरओ के पानी से बाल धोने से फायदा हो सकता है।

Q. पानी की टंकी के लिए सबसे बेहतरीन मटीरियल कौन-सा है?
A. वॉटर टैंक किसी भी मैटिरियल का हो अगर उसमें पानी लगातार निकलता और भरता रहता है तो वह हानिकारक नहीं है। अगर पानी के टैंक में पानी लंबे समय तक जमा रहता है तो मटीरियल से फर्क पड़ सकता है। वैसे फूड ग्रेड प्लास्टिक का पानी टैंक सबसे अच्छा माना जाता है। इससे पानी की क्वॉलिटी खराब नहीं होती। आजकल स्टेनलेस स्टील की भी टंकियां आने लगी हैं। सीमेंट की टंकियों की परंपरा पुरानी है।

Q. तांबे या चांदी के बर्तन में पानी पीने से क्या वाकई फायदा होता है?
A. तांबे या चांदी के बर्तन में पानी पीने से तभी फायदा होता है जब पानी पहले से साफ हो। गंदा पानी इन बर्तनों में रखकर पीने से फायदे के बजाय नुकसान करेगा क्योंकि जब पानी तांबे, चांदी या सोने जैसे मेटल के संपर्क में आता है तो आयोनाइजेशन प्रक्रिया होती है। अगर पानी साफ होता है तो यह फायदा करता है, लेकिन अगर पानी गंदा हुआ तो यह नुकसानदायक साबित होता है।

Q. क्या स्टेनलेस स्टील का परंपरागत वॉटर फिल्टर शुद्ध पानी देता है?
A. स्टेनलेस स्टील का परंपरागत वॉटर फिल्टर तभी कामयाब होता है जब पानी में टीडीएस या क्लोराइड या फ्लोराइड या वायरस जैसी हानिकारक अशुद्धियां नहीं हैं। अगर ये अशुद्धियां हैं तो वह पानी शुद्ध नहीं कर पाता।

Q. घर के अंदर पानी सप्लाई के लिए किस तरह की पाइप अच्छी मानी जाती हैं?
A. फूड ग्रेड प्लास्टिक की पाइपलाइनें सबसे अच्छी मानी जाती हैं। जीआई पाइप में जंग लगने की आशंका होती है।

Q. अगर गर्मी में पानी की टंकी से बहुत गर्म पानी आ रहा है हो तो क्या आरओ को बंद कर देना चाहिए?
A. अगर पानी की टंकी का पानी 40 से 45 डिग्री सेल्सियस तक गर्म है तो आरओ चलाने में कोई दिक्कत नहीं है। अगर इससे ज्यादा गर्म होता है तो आरओ को बंद कर देना चाहिए।

Q. आजकल में गली-गली में वॉटर प्यूरिफायर यूनिटें लग गई हैं। इनसे गैलन में पानी पैककर मोहल्लों, खासकर बाजारों में बेचा जाता है। क्या उस पानी की क्वॉलिटी स्तरीय होती है?
A. कई इलाकों में पानी की सप्लाई कम होने या पानी साफ न होने की वजह से लोग पानी की 20 लीटर का गैलन खरीदते हैं। यह 40-70 रुपये में आता है। इसे सप्लायर कई बार इस्तेमाल करते हैं और अक्सर इन्हें ढंग से साफ नहीं किया जाता। हालांकि कुछ बड़ी कंपनियां साफ-सफाई का ख्याल रखती हैं। बोतल की गंदगी के अलावा पानी की क्वॉलिटी पर भी सवाल है। हां, अगर किसी ने बीआईएस से लाइसेंस लिया हो तो उसका पानी पी सकते हैं।

Q. क्या पानी फूड कैटिगरी में शामिल है?
A. भारत में पानी फूड कैटिगरी में नहीं है। दुनिया के तमाम देशों में इसे फूड कैटिगरी में रखा गया है। अगर पानी फूड की कैटिगरी में आ जाता है तो उस पर 'प्रीवेंशन ऑफ फूड अडल्ट्रेशन ऐक्ट' लागू होगा। ऐसे में अगर पानी में कोई मिलावट हुई तो यह आपराधिक श्रेणी में आ जाएगा और पानी सप्लाई करने वाली एजेंसी पर केस दर्ज हो जाएगा। भारत में अधिकतर पानी की सप्लाई सरकारी एजेंसियों के पास ही है। अगर इस दायरे में पानी आता है तो लोगों को साफ पानी देने की जिम्मेदारी इन एजेंसियों की हो जाएगी।
Q. क्या कोई प्राइवेट कंपनी भी पानी की जांच करती है? क्या इसके लिए पैसे भी लगते हैं?
A. अगर पानी गंदा आ रहा है तो इसकी जांच जल बोर्ड की लैबरेटरी से कराई जा सकती है। यह पूरी तरह से फ्री है। प्राइवेट कंपनियों से भी जांच कराई जा सकती है। मिनिस्ट्री ऑफ साइंस के तहत एनएबीएल प्रमाणित लैबरेटरी से पानी की जांच कराई जा सकती है। एनएबीएल की वेबसाइट www.nabl-india.org पर जाकर, ऊपर लिखे Laboratory Search को क्लिक करने पर Accredited Laboratories का ऑप्शन आता है, इसमें जरूरी जानकारी भरने पर आपको नजदीकी लैब के बारे में पूरी जानकारी मिल जाती है। यहां से पूरे देश की लैबरेटरीज की जानकारी और उनके नंबर लिए जा सकते हैं।

घर में क्वॉलिटी चेक
मार्केट में पानी का टीडीएस मापने की एक पेननुमा मशीन आती है। इसे डिजिटल टीडीएस मीटर कहते हैं। यह मीटर 600 से 1500 रुपये तक की आता है। हालांकि इससे सिर्फ टीडीएस का ही पता चलेगा। दिल्ली जल बोर्ड की लैब में फोन करके भी सैंपल चेक करवा सकते हैं। जल बोर्ड की टीम सैंपल उठाने आएगी और जांच के बाद आपको पूरी रिपोर्ट देगी। ऐसा ही दूसरे शहरों की पानी सप्लाई करने वाली सरकारी एजेंसी करती है।

दिल्ली में पानी की जांच के लिए इन नंबरों पर संपर्क किया जा सकता है:
टोल फ्री: 1916
011-23634469
9650291021

आखिर में निचोड़ क्या है?
Q. अगर सरकारी एजेंसी द्वारा पीने के पानी की सप्लाई की जा रही है तो क्या प्योरिफायर की जरूरत है?
A. अगर सरकारी एजेंसियों की पाइपलाइनें सही हैं, उनमें लीकेज नहीं है और पानी घर की टंकी में स्टोर भी नहीं किया जा रहा यानी पानी सीधे इस्तेमाल कर रहे हैं तो वह पानी पीने के लिए सेफ है। इसके लिए प्योरिफायर की जरूरत नहीं है, लेकिन अमूमन ऐसा कम ही होता है। पानी की पाइप्स में लीकेज भी होते हैं और हम उन्हें टंकी में स्टोर भी करते हैं। ऐसे में सेरमिक फिल्टर वाला प्योरिफायर इस्तेमाल करना चाहिए।

Q. अगर पीने के पानी का सोर्स ग्राउंड वॉटर है, तब कौन-सा प्योरिफायर इस्तेमाल करें?
A. इसके लिए जरूरी है कि सबसे पहले ग्राउंड वॉटर की जांच कराएं। अगर पानी साफ है तो सिर्फ फिल्ट्रेशन से काम चल जाएगा। सच तो यह है कि ज्यादातर जगहों पर ग्राउंड वॉटर साफ है, लेकिन फैक्ट्री या डंप एरिया के करीब के ग्राउंड वॉटर में केमिकल्स मिल जाते हैं। अगर पानी में आर्सेनिक, क्लोराइड या फ्लोराइड की मौजूदगी है, तब आरओ लगाना जरूरी हो जाता है।

Q. क्या आरओ प्यूरीफायर से मिनरल्स वाकई निकल जाते हैं?
A. आरओ पानी से सूक्ष्म पोषक तत्व भी निकाल देता है। इन तत्वों के निकलते ही पानी की पीएच वैल्यू गिर जाती है यानी पानी फिर ऐसिडिक बन जाता है। पीएच का स्केल 0-14 के बीच होता है। पीएच वेल्यू 7 से नीचे होने पर पानी ऐसिडिक होता है। 7 से ऊपर होने पर पानी अल्केलाइन होता है। हमारा शरीर 97 फीसदी तक अल्केलाइन है। पीने लायक पानी की पीएच वैल्यू 6.5 से 8.5 के बीच होना चाहिए।

Q. आजकल आरओ कंपनियां दावा करती हैं कि वे पानी में मिनरल्स भी मिलाती हैं। क्या यह दावा सही है? और इससे सेहत पर कोई बुरा असर तो नहीं पड़ता?
A. आरओ के जरिए पानी साफ करने से अशुद्धियों के साथ-साथ पानी के पोषक तत्व भी खत्म हो जाते हैं। इसलिए आजकल कई आरओ कंपनियां मिनरल्स कैंडल्स के जरिए बाहर से पोषक तत्व भी पानी में मिलाती हैं। उनका यह दावा किसी हद तक सही है। दूसरा भी तरीका है। सबसे पहले पानी से बैक्ट्रीरिया मारने के लिए यूएफ फिल्टर से पानी को साफ किया जाता है। अब 90 फीसदी पानी को आरओ तकनीक में से गुजारा जाता है। इससे घुलनशील अशुद्धियां जैसे मैग्निशियम, कैल्शियम और मिनरल्स आरओ के जरिए खत्म हो जाती हैं। यूएफ फिल्टर से साफ किए हुए बाकी 10 फीसदी पानी को अब इसमें मिला दिया जाता है ताकि मिनरल्स की कमी पूरी की जा सके। इससे सेहत पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता है।

Q. क्या आरओ का पानी पीना सेहत के लिए हानिकारक है?
A. पानी में मौजूद हर तरह की चीजों को आरओ निकाल देता है। इसमें केमिकल्स, मिनरल्स, पल्यूटेंट्स और टीडीएस भी शामिल हैं। पानी से मिनरल्स को भी पूरी तरह निकाल देने से लंबे समय तक मिनरल रहित पानी पीना सेहत के लिए समस्या पैदा कर सकता है। एक तरफ कैल्शियम के निकल जाने से हड्डियों में कमजोरी आ सकती है तो मैग्निशियम की कमी से क्रैंप्स हो सकते हैं। हालांकि, इसमें बहुत ज्यादा घबराने की जरूरत नहीं है। कारण यह है कि अब ज्यादातर आरओ कंपनियां अपने आरओ के पानी में मिनरल्स मिलाने लगी हैं।

...और आखिर में एक एक्सपर्ट की राय
घर में अगर सरकारी पानी आ रहा है तो आरओ लगवाने की कोई जरूरत नहीं है। आरओ का पानी मिनरल-रहित होता है- यह बात सामने आने पर कंपनियां अब कुछ मात्रा में मिनरल मिलाने लगी हैं। पर यह कोई समाधान नहीं है। वे एक फिक्स्ड फॉर्म्युले में मिनरल मिलाते हैं, पर यह फॉर्म्युले किसने तय किया है? किस आधार पर तय हुआ है? हर इलाके का जमीन का पानी अलग किस्म का होता है और पानी में करीब 140 किस्म के मिनरल होते हैं। आरओ हर तरह के वायरस का भी खात्मा नहीं कर पाता। मसलन: सुपरबग वायरस।
-संजय शर्मा, प्रेसिडेंट, Be Enviro Wise

संडे नवभारत टाइम्स 

Tuesday, 4 June 2019

थोड़ी सी तपिश जरूरी है शरीर को

थोड़ी तपिश किस कदर ज़रूरी है पढ़ें.

डरिये. क्योंकि डरना जरुरी है.

बैठे बैठे अचानक पैर 'फ्रीज' हो जाना.
डॉ रिंकी सिद्धार्थ
USA की एक बड़ी कम्पनी है United Health Group. इसकी कुछ शाखायें हमारे देश में भी हैं.. मेरे छोटे बहनोई कुछ समय पहले तक इसी कम्पनी में कार्य कर रहे थे. फिलहाल भारत में इस कम्पनी को OPTUM के नाम से भी जाना जाता है.

लगभग दो ढाई वर्ष पहले की बात है. उसी कम्पनी की ग्रेटर नोएडा ब्रांच में एक युवा इंजीनियर जॉब कर रहे थे. अभी शादी हुई नहीं थी तो अकेले ही एक कमरे में रहते थे. सुबह उठकर नहा धोकर ऑफिस के समय से बहुत पहले ही ऑफिस पहुंच जाते थे.  वहां ऑफिस की कैन्टीन में ही नाश्ता करने के बाद अपने केबिन में पहुंचकर कम्प्यूटर पर शुरु हो जाते थे.  दिन में खाना ऑफिस कैन्टीन में.  शाम को ऑफिस टाइम के बाद भी रुकना.  वहीं डिनर करना और रात को 9-10 बजे के आसपास कमरे पर जाकर सो जाना.

यह सज्जन कई बार शनिवार और रविवार (वहां 5 day week चलता है) को भी ऑफिस चले जाते थे.  ज़िन्दगी आराम की गुजर रही थी.

एक दिन ऑफिस में बैठे हुये इन सज्जन को टॉयलेट जाने की आवश्यकता महसूस हुई.  लेकिन वह अपने पैरों को हिला ही नहीं सके.  खड़े होना चाह रहे थे -खड़े न हो सके.  उन्होंने अपने आसपास बैठे साथियों को आवाज देकर बताया कि मैं खड़ा नहीं हो पा रहा हूं, तो साथियों ने समझा कि वह मजाक कर रहे हैं.  यह सज्जन रूआंसा हो उठे और इनकी आवाज बहुत घबराकर निकलने लगी तब जाकर इनके मित्रों ने इनकी बात को सीरियसली लिया. उन्होंने खड़े करने की कोशिश की, पर यह तो पैरों पर खड़े हो नहीं हो पा रहे थे. तुरन्त एक बड़े अस्पताल को फोन कर एम्बुलेंस बुलाई गई. उन्हें उठाकर एम्बुलेंस में और फिर अस्पताल पहुंचाया गया.  वहां पहुंचकर कई टैस्ट किये गये तो पता चला कि शरीर में विटामिन डी लगभग समाप्त हो गया था, और इसकी वजह से उनके घुटनों में जोड़ सूखकर अकड़ गये थे.

उनको अगले दो दिनों में 6-6 लाख IU के विटामिन डी के तीन इंजेक्शन लगाये गये.  कैल्सियम व विटामिन बी 12 के भी हैवी डोज दिये गये.  4-5 दिन हॉस्पीटल रहकर घर वापस आ गये.

और इस पूरी समस्या की वजह?? धूप में बिल्कुल न निकलना.  हर समय AC में रहना.. दूध, दही, कच्चा पनीर जैसी चीजों का बहुत कम प्रयोग करना.  शारीरिक व्यायाम बहुत कम करना.

अगर आप स्वयं या आपके कोई परिचित यह समझते हैं कि आप बिल्कुल फिट हैं, आपको कैल्सियम या विटामिन डी की कोई कमी नहीं है तो इस ऊपर के उदाहरण को फिर से पढ़िये.  एक तीस वर्ष के आसपास की आयु का बिल्कुल फिट जवान आदमी अचानक ही अपने पैरों पर खड़ा भी नहीं हो सका.

मेरी 35-40 वर्ष से ऊपर के सभी स्वस्थ /अस्वस्थ महिलाओं और पुरुषों से विनम्र प्रार्थना है कि अगर आप पहले से विटामिन डी और विटामिन बी 12 नहीं ले रहे हैं तो एक बार विटामिन डी व विटामिन बी 12 का टैस्ट जरूर करा लें. अगर आपकी ये दोनों रिपोर्ट सही आयें तो इसी पोस्ट के नीचे अपनी रिपोर्ट शेयर करते हुये अपने 2000₹ बेकार करने के लिये मुझे बहुत बुरा भला कहें..

लेकिन मेरा दावा है कि 35-40 वर्ष की आयु से अधिक वाले 90% से अधिक का विटामिन डी और विटामिन बी 12 लेवल जरूर जरूर कम आयेगा, बहुत कम आयेगा.

कृपया एक बार ये दोनों टैस्ट जरूर करवा लें. और भविष्य में हो सकने वाली बीसियों बीमारियों को होने से पहले ही अपने से दूर रखिये.

Sunday, 2 June 2019

नवें ग्रह की खोज में

नवें ग्रह की खोज में
चंद्रभूषण
परंपरा से नवग्रह पूजन के आदी हम भारतीयों के लिए प्लूटो के ग्रहसूची से बाहर हो जाने के बाद ग्रहों का घट कर आठ ही रह जाना किसी पर्सनल ट्रैजडी से कम नहीं है। लेकिन सौर मंडल के बाहरी हिस्से पर काम कर रहे अंतरिक्ष विज्ञानियों की मानें तो आने वाले समय में ग्रहों की संख्या एक बार फिर आठ से बढ़कर नौ हो सकती है। हवाई के मौना-की पर्वत पर कनाडा और फ्रांस के सहयोग से बने विशाल टेलीस्कोप से 2013 और 2017 के बीच किए गए आउटर सोलर सिस्टम ओरिजिन्स सर्वे (ओसोस) ने बाहरी सौरमंडल में 840 पिंड खोजकर रहस्यों का बहुत बड़ा पिटारा खोल दिया है।

इनमें 2015 बीपी 519 समेत उन नौ पिंडों का आकर्षण सबसे ज्यादा है, जो सूरज की परिक्रमा 20 हजार साल या इससे भी ज्यादा समय में सौरमंडल के ग्रहीय तल से काफी झुकी हुई कक्षाओं में करते हैं। हमारी पृथ्वी के कुछ सहोदर ऐसे भी हैं, जिनका एक साल हमारे 20 हजार वर्षों से भी ज्यादा लंबा होता है, यह बात किसी को भी हैरत में डाल सकती है। लेकिन इनकी शिनाख्त के साथ ही यह सवाल भी उठ खड़ा हुआ है कि सूरज से इतनी दूर इनकी मौजूदगी की वजह क्या हो सकती है।

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि ऐसा इस सुदूर इलाके में किसी बड़े ग्रह की उपस्थिति में ही संभव है, जिसका वजन पृथ्वी का दस गुना हो सकता है। सूरज से इतनी दूर, इतने विराट अंधियारे दायरे में सौर परिवार के इस संभावित नवें वरिष्ठ सदस्य की उपस्थिति के संकेत कैसे खोजे जाएं, यह खगोल विज्ञान का अगला सिरदर्द साबित होने जा रहा है।

Saturday, 1 June 2019

जैवविविधता और योद्धा की देह गंध

योद्धा की देह गंध
चंद्रभूषण
अमेजन नदी के उत्तरी छोर पर मौजूद तर जलवायु वाले जंगली इलाके आज भी अपने रहस्यों के लिए जाने जाते हैं। दुनिया के आधे वर्षा-वन यहीं हैं और जंगल खत्म करने के तमाम उपायों के बावजूद जैव-विविधता की वैश्विक राजधानी होने का गौरव इसी क्षेत्र को प्राप्त है। अभी इस इलाके के प्रिप्रिओका नाम के पौधे की जड़ से निकली खुशबू धरती के हर कोने को अपनी गिरफ्त में लेती जा रही है।

इस खुशबू का स्वरूप कुछ ऐसा है कि इससे बनी परफ्यूम स्त्री-पुरुष दोनों पर फबती है और नमकीन, मीठे दोनों तरह के खानों के साथ भी इसका जबर्दस्त मेल बैठता है। भारत की पहचान इसके इत्र और मसालों से जुड़ी रही है, लिहाजा सुदूर ब्राजील से आई एक खुशबू को इतना ऊंचा मुकाम मिलना हमें अजीब लग सकता है। लेकिन प्रिप्रिओका की गंध समझने और फैलाने का काम ही बमुश्किल 50 साल पहले शुरू हुआ है, लिहाजा नई चीज मानकर हमें इसकी कद्र करनी चाहिए।

उत्तरी ब्राजील के आदिवासियों में अद्भुत देह गंध वाले पिरीपिरी नाम के एक अजेय योद्धा के किस्से कहे जाते हैं, जो कहीं भी खुद को घेर लेने वाली सुंदरियों से परेशान रहता था। एक बार सुपी नाम के ओझा की बिटिया ने अपने बाप से पिरीपिरी को वश में करने का तरीका पूछा और पूर्णिमा की रात में उसके पैर अपनी जुल्फों से बांधने लगी।

संयोगवश ठीक उसी समय योद्धा पिरीपिरी की नींद खुल गई और वह बादल बनकर सदा के लिए गायब हो गया। कथा के मुताबिक पिरिपिरिओका (अभी प्रिप्रिओका) धरती पर उसी योद्धा की आखिरी निशानी है। हालांकि इसकी खुशबू का जायजा आप करीब 2000 रुपये लगाकर ही ले पाएंगे।

Friday, 31 May 2019

कितना सुरक्षित है आरओ का पानी ?

स्कंद शुक्ला
यह किस आधार पर तय हो कि भारतीय जनता कहाँ आरओ का पानी पिये और कहाँ नहीं ? आरओ यानी रिवर्स ओस्मोसिस की पद्धति से प्राप्त पानी किन अशुद्धियों को पानी से हटाता है ? क्या पूरे भारत के हर महानगर और हर गाँव का हर व्यक्ति आरओ-जल पीने लगे ? और इस तरह से इस जलपान के दुष्प्रभाव क्या हैं ?

आपके घर में आरओ-यन्त्र लगा है ? यदि हाँ , तो आपने इसे लगवाने का निर्णय कैसे लिया ? किस आधार पर ? क्या सचिन तेन्दुलकर और हेमा मालिनी के विज्ञापनों को देखकर ? अथवा किसी वैज्ञानिक आधार पर मिली जागरूकता की वजह से ?

भारत में पेयजल का संकट बढ़ रहा है और आने वाले समय में यह और भीषण रूप लेगा : ऐसे में यह जानना महत्त्वपूर्ण है कि आरओ के अन्धे प्रयोग ने पानी की बर्बादी में बड़ी भूमिका निभायी है। इसी बाबत नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने पर्यावरण-मन्त्रालय को पत्र लिखा है और कहा है कि जिन स्थानों में टोटल डिजॉल्व्ड सॉलिड्स ( टीडीएस ) की मात्रा 500 मिलीग्राम / लीटर से कम हो , वहाँ आरओ के प्रयोग पर प्रतिबन्ध लगा देना चाहिए।

पेयजल में कई प्रकार की अशुद्धियाँ हो सकती हैं। घुले हुए ठोस पदार्थ ( टीडीएस ) जिनका ऊपर ज़िक़्र किया गया है , उनमें से एक हैं। भारत में अलग-अलग स्थानों में टीडीएस की मात्रा पानी में अलग-अलग है। आरओ इन पदार्थों को पानी से अलग कर देता है। लेकिन हर स्थान पर ये पदार्थ इतने नहीं कि इन्हें निकालने की ज़रूरत पड़े। उलटा इन्हें हर जगह निकालने से पानी का जो 'अतिशुद्धीकरण' आरओ मशीनों द्वारा किया जाता है , उससे पानी की गुणवत्ता गिर जाती है।

कुछ हद तक टीडीएस हमें चाहिए, हमारे लिए ज़रूरी है। टीडीएस-मुक्त जल पीना कोई बहुत अच्छी बात नहीं। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि टीडीएस की मात्रा एक निश्चित हद में रहे , न ज़्यादा और न कम। आरओ-यन्त्र टीडीएस को पानी से अलग कर देते हैं। इस क्रम में लगभग अस्सी प्रतिशत तक पानी बरबाद होता है और केवल बीस प्रतिशत पीने योग्य पानी मिलता है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का मन्त्रालय से निवेदन है कि प्राप्त पानी कम-से-कम 60 % हो , ऐसा प्रावधान आरओ-निर्माता दें। यानी चालीस प्रतिशत से अधिक पानी बर्बाद न हो।

आरओ-यन्त्र विकसित देशों में वहाँ इस्तेमाल होते हैं , जहाँ समुद्री पानी से लवण अलग करके उसे पीने योग्य बनाना होता है। भारत में इन्हें लगाने की एक भेड़चाल चल पड़ी है। जिसे देखो , आरओ का पानी पी रहा है और आरओ-यन्त्र लगवा रहा है ? क्यों , यह जानकारी है ही नहीं। जो थोड़ा बहुत टीडीएस को जानते हैं , वे उसे एकदम मानव-शरीर का शत्रु समझे बैठे हैं।

यह आपका कर्त्तव्य और अधिकार दोनों है कि अपने जलकल-संस्थान से संवाद स्थापित करें। वहाँ अभियन्ता व अन्य अधिकारियों से मिलें। पूछें कि जो पानी आप पी रहे हैं , उसमें टीडीएस कितना है ? क्या 500 से अधिक है ? क्या आपको अपने घरों में आरओ लगवाने की ज़रूरत है ? कहीं आरओ लगवा कर आप पेयजल को दोयम दर्ज़े का नहीं बना रहे ? कहीं आपके आरओ-यन्त्र के कारण अस्सी फीसदी पानी नाली में तो नहीं ?  अगर हाँ , तो यह कितनी बड़ी नासमझी और कितनी बड़ी बर्बादी है !

आरओ-यन्त्रों की बिक्री जनता में भय फैला कर चल रही है , ऐसा नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का मानना है। यह प्रचार करो कि हर जलस्रोत एकदम प्रदूषित है। हर जगह जीवाणु हैं , हर जगह टीडीएस एकदम उच्च। हर पानी के स्रोत में फ़्लोराइड है और आर्सेनिक भी। कौन जाकर अपने अपने इलाक़े के जेई से सच्चाई जानेगा ? सब केवल टीवी पर महानायकों-महानायिकाओं को देखेंगे और 'शुद्ध पानी' के लिए उनका कहा मान लेंगे। विज्ञापन की विज्ञान पर जीत होगी।

( इस लेख के साथ नीचे नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की रिपोर्ट पर आधारित लेख का लिंक दे रहा हूँ। कुछ अख़बारों में इस ख़बर का विवरण भी। इन्हें पढ़िए। अपने स्थानीय जलकल-अभियन्ता से मिलिए। पूछिए उनसे कि क्या आपका पेयजल इतना अशुद्ध है , जितना बाज़ार बताता है ? क्या पूरे देश में हर व्यक्ति को आरओ का पानी ही पीना चाहिए ? )

Sunday, 26 May 2019

बच्चों को चाहिए स्क्रीन से आजादी

इन्हें चाहिए स्क्रीन से आजादी
How to handle Kid’s Mobile Addiction

तकनीक की दुनिया के सबसे कामयाब नामों में शुमार बिल गेट्स से लेकर स्टीव जॉब्स तक ने कम उम्र में अपने बच्चों को गैजट्स से दूर रखा। दूसरी ओर, हमारे बच्चों को स्क्रीन की लत लग गई है। डब्ल्यूएचओ की सलाह है कि छोटे बच्चों को एक घंटे से ज्यादा स्क्रीन न देखने दें। एक्सपर्ट्स से पूछकर स्क्रीन, खासकर मोबाइल की लत से निजात पाने के टिप्स दे रही हैं प्रियंका सिंह

एक्सपर्ट्स पैनल
शिव खेड़ा, मशहूर लेखक और मोटिवेशनल स्पीकर
अरुणा ब्रूटा, सीनियर साइकॉलजिस्ट
डॉ. समीर पारिख, डायरेक्टर, मेंटल हेल्थ, फोर्टिस गीतांजलि शर्मा, सीनियर काउंसलर

मोनिका ने 8 साल के बेटे ध्रुव को पिछले साल मोबाइल लाकर दिया ताकि ऑफिस में रहने के दौरान ध्रुव से संपर्क बना रहे। कुछ महीनों में ही मोनिका ने ध्रुव के बर्ताव में एक अजीब-सा बदलाव देखा। मेड ने मोनिका को बताया कि ध्रुव अक्सर मोबाइल में ही लगा रहता है। मोबाइल के लिए मना करो तो टीवी खोलकर बैठ जाता है। खाना खाने और होमवर्क के लिए भी आसानी से तैयार नहीं होता। यहां तक कि मोनिका के ऑफिस से आने के बाद भी ध्रुव ज्यादातर मोबाइल से ही चिपका रहता है। बेटे का यह हाल देख मोनिका ने फौरन एक अच्छे चाइल्ड काउंसलर की मदद ली। कुछ महीनों की काउंसलिंग और मोनिका की कोशिशों के बाद ध्रुव ने मोबाइल और टीवी पर वक्त बिताना काफी कम कर दिया है और अब वह ज्यादा खुश नजर आता है। इसके लिए मोनिका ने न सिर्फ खुद ज्यादा-से-ज्यादा वक्त ध्रुव के साथ बिताना शुरू किया बल्कि ध्रुव को ज्यादा दोस्त बनाने के लिए भी प्रेरित किया। साथ ही, उसकी पसंद के अनुसार उसे टेनिस और पेंटिंग क्लास भी जॉइन करा दी।

इसी तरह एक नामी साइकॉलजिस्ट के पास हाल ही में एक लड़की का केस आया। वह दिन भर फेसबुक और इंस्टाग्राम पर लगी रहती थी और कोई भी फोटो शेयर करने के बाद बार-बार देखती थी कि कितने लाइक मिले। सोशल मीडिया की लत की वजह से गौरी की पढ़ाई और सेहत पर बुरा असर पड़ रहा था। वह घर में किसी से बात भी नहीं करती थी। दिन भर वह अपने कमरे में मोबाइल पर सोशल मीडिया से चिपकी रहती थी। साइकॉलजिस्ट और पैरंट्स की कोशिशों से गौरी ने धीरे-धीरे मोबाइल की लत से छुटकारा पा लिया।

ये सिर्फ 2 मामले हैं, लेकिन बच्चों का मोबाइल से चिपके रहना घर-घर की समस्या बन गई है। आज बच्चे बहुत ज्यादा वक्त मोबाइल, टैबलेट, लैपटॉप, टीवी आदि पर बिता रहे हैं जोकि उनके शारीरिक और मानसिक विकास से लेकर परिवार के ताने-बाने तक के लिए खतरे की घंटी है। अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन की रिपोर्ट के अनुसार, 2 साल की उम्र तक के बच्चे भी रोजाना 3 घंटे तक मोबाइल पर बिता रहे हैं। इंग्लैंड की नैशनल हैंडराइटिंग असोसिएशन की एक रिसर्च का निष्कर्ष है कि 2 साल से कम उम्र के 58% बच्चे मोबाइल से खेलते हैं। ऐसे बच्चे पेंसिल पकड़ने, लिखने और ड्रॉइंग करने में कमजोर हो रहे हैं। इससे उनका हैंडराइटिंग का हुनर देर से विकसित हो रहा है। मोबाइल के ज्यादा इस्तेमाल से उनके हाथों की मांसपेशियां कमजोर हो रही हैं। हाल ही में डब्ल्यूएचओ ने पैरंट्स को सलाह दी है कि 2 से 5 साल तक के बच्चों को एक घंटे से ज्यादा टीवी, मोबाइल या कंप्यूटर न देखने दें। वैसे बेहतर यह है कि इस उम्र के बच्चों को मोबाइल से पूरी तरह दूर ही रखा जाए।

अब सवाल उठता है कि आखिर बच्चों को मोबाइल के जाल से कैसे बाहर निकालें? एक्सपर्ट्स की मानें तो थोड़ी कोशिशों से ऐसा करना मुमकिन है। जरूरी नहीं कि हर मामले में साइकॉलजिस्ट या काउंसलर की जरूरत पड़े, लेकिन पैरंट्स को जरूर वक्त रहते बच्चों पर ध्यान देना चाहिए ताकि वे मोबाइल की लत से बच सकें। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि मोबाइल के लत से मतलब फोन पर बातें करने से नहीं बल्कि स्क्रीन के इस्तेमाल यानी इंटरनेट सर्फिंग या सोशल मीडिया पर वक्त बिताने से है। परेशानी की बात यह भी है कि बच्चों को टीवी या मोबाइल से जो मानसिक खुराक मिल रही है, उससे वे ज्यादा हिंसक और असंवेदनशील हो रहे हैं। वे इंसानों के मुकाबले गैजट्स के साथ ज्यादा सुकून महसूस करते हैं। यह परिवार और रिश्तों के ताने-बाने के लिए सही नहीं है।

शौक से लत तक
बच्चे जब छोटे होते हैं तो अक्सर पैरंट्स खुद ही उनके हाथ में मोबाइल थमा देते हैं, कभी खाना खिलाने के लालच में तो कभी अपना काम पूरा करने के लिए तो कभी बच्चों को कविता, डांस आदि सिखाने के लिए। इस तरह धीरे-धीरे उन्हें मोबाइल देखने में मजा आने लगता है और वे इसका आदी हो जाते हैं। शुरुआती शौक कब लत या अडिक्शन में तब्दील हो जाता है, पता ही नहीं चलता। दरअसल, स्क्रीन अडिक्शन भी वैसी ही लत है जैसे किसी नशे की लत होती है। एक्सपर्ट्स इसे भी ड्रग्स, अल्कोहल, जुआ आदि की तरह ही क्लिनिकल इंपल्सिव डिसऑर्डर मानते हैं यानी किसी काम को करने से खुद को नहीं रोक पाना। जब मोबाइल या टीवी पर लगे रहना बच्चे के रुटीन कामों, मसलन नींद, भूख, होमवर्क, सेहत आदि पर असर डालने लगे और आप चाहकर भी स्थिति को बेहतर नहीं कर पाएं तो समझ जाइए कि खतरे की घंटी बज चुकी है। ऐसे में फौरन एक्सपर्ट यानी काउंसलर या साइकॉलजिस्ट की मदद लें।

रोजाना कितनी देर मोबाइल?
यह कहना बहुत मुश्किल है कि बच्चे रोजाना कितनी देर तक मोबाइल का इस्तेमाल कर सकते हैं। कोशिश करें कि 3-4 साल तक बच्चों को मोबाइल से दूर ही रखें। ऐसा करना मुमकिन न हो पा रहा हो तो भी इस उम्र के बच्चों को 30-60 मिनट से ज्यादा मोबाइल इस्तेमाल न करने दें। इसके अलावा, 5 साल से 12 साल तक के बच्चे को भी 90 मिनट से ज्यादा स्क्रीन नहीं देखना चाहिए। यह अवधि टीवी, मोबाइल, कंप्यूटर सब मिलाकर है। इससे बड़े बच्चों (12 से 17 साल) के लिए जरूरी होने पर यह वक्त थोड़ा बढ़ा सकते हैं, लेकिन यह किसी भी कीमत पर दो घंटे से ज्यादा न हो।

स्क्रीन की लत के लक्षण
बर्ताव में बदलाव
- हमेशा मोबाइल से चिपके रहना
- मोबाइल मांगने पर बहाने बनाना या गुस्सा करना
- दूसरों के घर जाकर भी मोबाइल पर ही लगे रहना
- दूसरों से कटे-कटे रहना
- टॉइलट में मोबाइल लेकर जाना
- बेड में साइड पर मोबाइल रखकर सोना
- खेल के मैदान भी मोबाइल साथ ले जाना
- पढ़ाई और खेलकूद में मन न लगना
- पढ़ाई में नंबर कम आना
- ऑनलाइन फ्रेंड्स ज्यादा होना
- नहाने, खाने में बहानेबाजी करना

शारीरिक परेशानी
- नींद पूरी न होना
- वजन बढ़ना
- सिरदर्द होना
- भूख न लगना
- साफ न दिखना
- आंखों में दर्द रहना
- उंगलियों और गर्दन में दर्द होना

मानसिक समस्याएं
- ज्यादा संवेदनशील होना
- काम की जिम्मेदारी न लेना
- हिंसक होना
- डिप्रेशन और चिड़चिड़ापन होना
नोट: ये लक्षण दूसरी बीमारियों के भी हो सकते हैं। ऐसे में बर्ताव में बदलाव के साथ यह देखना भी जरूरी है कि बच्चा कितना वक्त मोबाइल पर बिताता है और क्या वाकई उसका असर बच्चे पर नजर आ रहा है?

बच्चों को कैसे बचाएं लत से
1. खुद बनें उदाहरण
बच्चे हमेशा वही सीखते हैं जो देखते हैं। ऐसे में आपको बच्चों के सामने रोल मॉडल बनना होगा। बच्चों के सामने मोबाइल, लैपटॉप या टीवी का कम-से-कम इस्तेमाल करें। अगर मां या पिता ने एक हाथ में बच्चा पकड़ा है और दूसरे में मोबाइल पर बात कर रहे हैं तो बच्चे को यही लगेगा कि मोबाइल और वह (बच्चा) बराबर अहमियत रखते हैं। ऐसा करने से बचें। अगर मदर होममेकर हैं तो कोशिश करें कि मोबाइल पर बातचीत या चैटिंग आदि तभी ज्यादा करें जब बच्चे घर पर न हों। सोशल मीडिया के लिए भी एक सीमा और वक्त तय कर लें। वर्किंग हैं तो घर पहुंचने के बाद बहुत जरूरी हो तभी मोबाइल देखें या फिर कोई कॉल आ रही हो तो उसे पिक करें। सुबह उठकर पहले बच्चों और खुद पर ध्यान दें, फिर मोबाइल देखें। अक्सर पैरंट्स अपना काम निपटाने के लिए बच्चों को मोबाइल थमा देते हैं। यह तरीका भी सही नहीं है। ऐसा कर आप अपने लिए फौरी राहत तो पा लेते हैं, लेकिन बच्चे को गैजट की ओर धकेल रहे होते हैं।

2. बनाएं गैजट-फ्री जोन
घर में एक एरिया ऐसा हो जहां गैजट लेकर जाने की इजाजत किसी को न हो। यह डाइनिंग या स्टडी एरिया हो सकता है। डिनर, लंच या ब्रेकफास्ट का वक्त पूरी तरह से फैमिली टाइम होना चाहिए। खाने के वक्त अक्सर पैरंट्स बच्चों के लिए टीवी ऑन कर देते हैं या मोबाइल दे देते हैं। यह गलत है। इससे बच्चे का ध्यान बंटता है और खाने का पोषण पूरा नहीं मिल पाता। साथ ही, उसका कंसंट्रेशन भी कमजोर होता है। इसी तरह, सोने से कम-से-कम एक घंटा पहले घर में डिजिटल कर्फ्यू लगा दें, मतलब मोबाइल और टैब्लेट जैसी चीजों से खुद भी दूर रहें और बच्चों को भी दूर रखें। बच्चा जब यह देखेगा तो वह खुद भी मोबाइल का इस्तेमाल जरूरत पड़ने पर ही करेगा।

3. बच्चों के साथी बनें
आजकल बहुत-से घरों में सिंगल चाइल्ड का चलन है। ऐसे में बच्चा अकेलापन बांटने के लिए मोबाइल या टैबलेट आदि का इस्तेमाल करने लगता है जोकि धीरे-धीरे लत बन जाती है। ऐसी स्थिति से बचने के लिए आप घर में बच्चे के साथ क्वॉलिटी टाइम बिताएं। उसके साथ कैरम, लूडो, ब्लॉक्स, अंत्याक्षरी, पजल्स जैसे खेल खेलें। बच्चे को जितना मुमकिन हो, गले लगाएं ताकि उसे फिजिकल टच की अहमियत पता हो और वह महसूस कर सके कि किसी करीबी के छूने में जो गर्माहट है वह सोशल मीडिया की दोस्ती में नहीं। जब बच्चा स्कूल से घर आए तो उससे स्कूल की बातें सुनें, उसकी पसंद-नापसंद के बारे में जानें, उसके दोस्तों के बारे में बातें करें। हो सके तो बीच-बीच में उसके दोस्तों को घर पर बुलाएं। इस तरह की चीजों से बच्चे और पैरंट्स के बीच का रिश्ता बेहतर होता है और वह मोबाइल के बजाय सकारात्मक चीजों से जुड़ता है।

4. लालच न दें
अक्सर पहली बार पैरंट्स ही बच्चे को फोन पकड़ाते हैं और यह देखकर खुश होते हैं कि हमारा बच्चा कितना स्मार्ट है। लेकिन यही छोटी-सी गलती आगे जाकर बुरी आदत बन जाती है। इसके अलावा, कई बार पैरंट्स बच्चों से कहते हैं कि फटाफट होमवर्क कर लो तो फिर मोबाइल मिल जाएगा या खाना खाओगे तो मोबाइल देखने को मिलेगा। इस तरह की शर्तें बच्चों के सामने नहीं रखनी चाहिए। इससे बच्चे लालच में फटाफट काम तो निपटा लेते हैं, लेकिन उनका सारा ध्यान मोबाइल पर ही लगा रहता है। उन्हें ब्लैकमेलिंग की आदत भी पड़ती है कि फलां काम करने पर फलां चीज मिलेगी। वे खुद भी इस ट्रिक को दूसरों पर इस्तेमाल करने लगते हैं। अगर बाद में पैरंट्स मोबाइल न दें तो बच्चे को मां-बाप पर गुस्सा आने लगता है।

5. आउटडोर गेम्स में लगाएं
बच्चों के साथ मिलकर वॉक करें, योग करें या दौड़ लगाएं। बच्चों को रोजाना कम-से-कम एक घंटे के लिए पार्क ले जाएं। वहां उन्हें दौड़ने, फुटबॉल, बैडमिंटन आदि फिजिकल गेम्स खेलने के लिए प्रेरित करें। पैरंट्स खुद भी उनके साथ गेम्स खेलें। टग ऑफ वॉर, आंख मिचौली जैसे गेम भी खेल सकते हैं, जिन्हें खेलने के लिए ज्यादा कोशिश भी नहीं करनी पड़ती। यों भी विशेषज्ञों का कहना है कि अगर बच्चे रोजाना दो घंटे सूरज की रोशनी में खेलते हैं तो उनकी आंखें कमजोर होने से बच सकती हैं। इसके अलावा, मुमकिन हो तो बच्चे को उसकी पसंद के किसी खेल (क्रिकेट, फुटबॉल, टेनिस, बैडमिंटन आदि) की कोचिंग दिलाएं। इससे वह फिजिकली ज्यादा ऐक्टिव होगा और मोबाइल से भी दूर रहेगा।

6. हॉबी का सहारा लें
बच्चों की कई हॉबीज़ होती हैं जैसे कि पेंटिंग, डांस, म्यूजिक, रोबॉटिक्स, क्ले मॉडलिंग आदि। बच्चे की पसंद को देखते हुए हॉबी क्लास जॉइन करवाएं, खासकर अगर दोनों पैरंट्स वर्किंग हैं तो यह जरूरी है। इससे बच्चा घर में ज्यादा वक्त अकेला या मेड के साथ रहने को मजबूर नहीं होगा। क्लास में वह अपनी पसंद की चीज तो सीखेगा ही दूसरे बच्चों के साथ घुलने-मिलने से उसका आत्मविश्वास भी बढ़ेगा। यह भी मुमकिन है कि आगे जाकर वह अपनी हॉबी में भी बहुत अच्छा करने लगे और वह एक करियर ऑप्शन बन जाए।

7. घर के काम में हाथ बंटवाएं
घर के कामों में बच्चों की उनकी क्षमता के अनुसार मदद लें। इससे बच्चे आत्मनिर्भर बनेंगे और खाली समय मोबाइल पर बिताने के बजाय कुछ व्यावहारिक चीजें सीखेंगे। कपड़े फोल्ड करना, पानी की बोतल भरना, कमरा सेट करना, पौधों में पानी डालना, अलमारी लगाना जैसे काम बच्चे खुशी-खुशी कर सकते हैं। इन कामों में पैरंट्स बच्चों की मदद ले सकते हैं। इससे पैरंट्स पर काम का बोझ थोड़ा कम होगा और बच्चे आत्मनिर्भर भी बनेंगे।

8. किताबों से दोस्ती कराएं
बच्चों को फोन के बजाय किताबों की ओर ज्यादा ध्यान देने के लिए प्रेरित करें। उन्हें अच्छी स्टोरी बुक लाकर दें और उनसे कहानियां सुनें। जब बच्चों को स्टोरी बुक या कोई और बुक पढ़ने के लिए दें तो खुद भी कोई किताब पढ़ें। ऐसा न हो कि आप टीवी या लैपटॉप खोलकर बैठ जाएं या मोबाइल पर बातें करने लगें। आपको किताब के साथ देखकर उसका भी मन पढ़ाई में लगेगा। बच्चों को रात में सोने से पहले कुछ पॉजिटिव पढ़ने को कहें, फिर चाहे 2 पेज ही क्यों न हों। इससे नींद भी अच्छी आएगी।

9. पेट से कराएं दोस्ती
बच्चों को डॉग जैसा पालतू जानवर लाकर दें। इससे बच्चे केयर करना और दूसरों की भावनाओं को बेहतर तरीके से समझने लगते हैं। अगर ममा-पापा, दोनों वर्किंग हैं तो पेट बच्चे का अच्छा साथी साबित होता है। डॉग को खाना देना, उसकी साफ-सफाई का ध्यान रखना, उसे घुमाना जैसे काम करने से बच्चा बिजी तो रहता ही है, साथ ही उसे कई चीजों की प्रैक्टिकल जानकारी भी हो जाती है।

10. प्राथमिकताएं तय करें
अपनी और अपने परिवार की प्राथमिकताएं तय करें। जितने टाइम सेविंग डिवाइस आज हैं, उतना ही टाइम कम हो गया है लोगों के पास। इसकी वजह यही है कि हमने प्राथमिकताएं तय नहीं की हैं। आजकल अत्यावश्यक (अर्जेंट) और अहम (इम्पॉर्टेंट) के बीच फर्क खत्म हो गया है। इसे ऐसे समझ सकते हैं कि सेहत अहम है, लेकिन अर्जेंट नहीं है इसलिए हम नजरअंदाज कर देते हैं। रिश्ते अहम हैं, लेकिन अर्जेंट नहीं हैं इसलिए पीछे छूट जाते हैं। ऐसे में प्राथमिकताएं तय करें और सेहत और रिश्तों को टॉप पर रखें। वैसे भी जिंदगी में बैलेंस बहुत जरूरी है। कोई भी चीज कितनी भी जरूरी क्यों न हो, अगर ज्यादा हो जाए तो वह नुकसान ही हो जाएगा। साथ ही, बच्चे के साथ मिलकर जिंदगी का लक्ष्य तय करें और वह लक्ष्य कुछ ऐसा हो जिसमें दूसरों के लिए भी कुछ करने का भाव हो। इससे बच्चा इधर-उधर वक्त बिताने के बजाय अपने लक्ष्य पर फोकस करता है।

ये ऐप्स भी कारगर
Mama Bear (Spyware)
Norton Family parental control
mSpy
Quality Time
ये ऐप एंड्रॉयड और iOs, दोनों के लिए हैं। इस तरह के ऐप इस बात पर निगरानी रखते हैं कि बच्चा किस किस वेबसाइट पर कितनी देर बिताता है तो Qustodio premier, Cracked Screen Prank जैसे ऐप एक तय टाइम पर मोबाइल की स्क्रीन में क्रैक जैसा लुक दे देता है। क्रैक्ड स्क्रीन देखकर अक्सर बच्चा मोबाइल छोड़ देता है। छोटे बच्चे पर इसे अपना सकते हैं।

डिजिटल डी-टॉक्सिफिकेशन जरूरी
अपने घर के लिए डिजिटल डी-टॉक्सिफिकेशन का नियम बनाएं। हर हफ्ते में एक दिन और महीने में कुल 4 दिन गैजट फ्री रहें। सुनने में यह मुश्किल जरूर लगता है, लेकिन ऐसा करना मुमकिन है। इस दौरान आप मोबाइल का स्विच ऑफ रखें या उसे फ्लाइट मोड पर रखें। इस दौरान साथ मिलकर ऐक्टिविटी करें। फैमिली के साथ मिलकर गेम्स खेलें। शुरुआत आप दो घंटे से कर सकते हैं। फिर धीरे-धीरे टाइम बढ़ा सकते हैं। इस दौरान जरूरी कॉल होगा तो लैंडलाइन पर आ जाएगा। अगर लैंडलाइन नहीं है तो मिस्ड कॉल का मेसेज मिल जाएगा। 2 घंटे बाद जाकर मोबाइल देखें और अगर कोई जरूरी कॉल लगे तो पलटकर फोन मिला लें। दरअसल, लोग अक्सर मन को बहलाने के लिए चैटिंग या सोशल मीडिया सर्फिंग शुरू कर देते हैं या टीवी देखने लगते हैं। इन सबमें मजा जरूर आ सकता है, लेकिन दिमाग को आराम नहीं मिलता बल्कि उसका और ज्यादा इस्तेमाल होने लगता है। आराम नहीं मिलने से दिमाग थक जाता है। इससे चिड़चिड़हाट होगी और कंसंट्रेशन नहीं होगा। गलतियां भी ज्यादा होंगी।

आजमाएं इसे
आज से आप भी अपने और अपने परिवार को हफ्ते में एक दिन डिजिटल डी-टॉक्सिफाई करना शुरू करें। आज आप इसके लिए 2 घंटे का वक्त तय कर सकते हैं। इस बीच टीवी, मोबाइल, लैपटॉप आदि गैजट के बजाय फैमिली के साथ फन टाइम बिताएं। आपने अपने परिवार के साथ कैसे वक्त बिताया, हमें लिखें
साभार संडे एनबीटी

Saturday, 4 May 2019

नए नीले की खोज

नए नीले की खोज
चंद्रभूषण
अमेरिकी केमिकल कंपनी ड्यूपॉन्ट में काम करते हुए बहुतेरे पेटेंट अपने नाम कर चुके भारतीय रसायनज्ञ मैस सुब्रह्मण्यन 2006 में कंपनी छोड़कर ओरेगॉन स्टेट यूनिवर्सिटी पहुंचे तो वहां मल्टीफेरोइक मटीरियल पर काम शुरू किया। एक ऐसा संश्लिष्ट पदार्थ, जिसमें उच्चकोटि की इलेक्ट्रॉनिक और चुंबकीय क्षमता मौजूद हो।

वहां समुद्री जीवों का अध्ययन छोड़कर केमिस्ट्री पढ़ने गए उनके चेले ऐंड्रू स्मिथ ने उन्हीं की सोच का अनुसरण करते हुए यट्रियम ऑक्साइड, इंडियम ऑक्साइड और मैंगनीज ऑक्साइड को साथ पीसकर मिश्रण को अवन में गरम किया तो उन्हें एक चटख नीला पाउडर मिला।

सुब्रह्मण्यन को लगा कि स्मिथ ने जरूर कुछ गड़बड़ की है। लेकिन फिर उन्हें अपने एक पुराने सहकर्मी की कही बात याद आई कि नीला रंग सृष्टि की दुर्लभ रचना है। फिर नए केमिकल के नमूने दुनिया भर की लैब्स में भेजे गए तो पता चला कि नीले रंग का यह शेड प्राकृतिक या संश्लिष्ट, किसी भी अवस्था में संसार में कहीं भी मौजूद नहीं है।

मैस सुब्रह्मण्यन ने तीनों ऑक्साइडों के मूल तत्वों यट्रियम, इंडियम और मैंगनीज के रासायनिक सूत्रों को जोड़कर इसे यिनमिन ब्लू का नाम दिया और इसके थोड़े ही समय बाद, सन 2009 में ऑस्ट्रेलिया की शेफर्ड कलर कंपनी ने इस रंग के इस्तेमाल का लाइसेंस ले लिया। फिलहाल वह काफी महंगे दाम पर इसे चित्रकारों को बेच रही है।

संसार के सबसे सुंदर नीले रंग के रूप में विख्यात यिनमिन ब्लू की 40 एमएल वाली ट्यूब 130 डॉलर (करीब साढ़े नौ हजार रुपये) में आती है। ऐसे में इस खास कलर की कोई कार या फ्रिज जल्दी आपको शायद ही देखने को मिले।

Saturday, 20 April 2019

ब्लैक होल के खुलते राज

"अगले 20 साल में खुल जाएंगे ब्रह्मांड के कई बड़े राज"
खगोल विज्ञानी प्रियंवदा नटराजन से राजेश मित्तल की बातचीत

पिछले हफ्ते गुरुवार को ब्लैक होल की पहली तस्वीर जारी हुई। यह ब्लैक होल हमारी धरती से करीब 30 लाख गुना बड़ा है। इससे विराट ब्रह्मांड की अनसुलझी गुत्थियां फिर से चर्चा में आ गई हैं। आइए, पहले हम ब्रह्मांड यानी यूनिवर्स के बारे में अपनी बुनियादी समझ दोहरा लेते हैं और फिर इसके बारे में एक शीर्ष विज्ञानी से बातचीत करते हैं।

हमारी धरती सूरज के चारों ओर घूमती है। दूसरे 7 ग्रह भी सूरज के चक्कर लगाते हैं। सूरज, उसके आठों ग्रहों (प्लैनेट्स), उनके चंद्रमाओं आदि को मिलाकर हम सौरमंडल (सोलर सिस्टम) कहते हैं। हमारे सूरज जैसे ढेरों तारे हैं जो हमें रात में आसमान में दिखाई देते हैं। इन तारों के समूह को आकाशगंगा (गैलक्सी) कहते हैं। हमारी वाली आकाशगंगा का नाम मंदाकिनी (मिल्की वे) है जिसमें हमारी धरती, हमारे वाला सूरज, दूसरे कई तारे, उनके ग्रह, उपग्रह, धुएं और धूल के विशाल बादल आदि शामिल हैं। कई आकाशगगाएं मिलकर कलस्टर बनाती हैं। कई कलस्टरों से मिलकर सुपर कलस्टर बनता है। कई सुपर कलस्टर मिलकर ब्रह्मांड (यूनिवर्स) का निर्माण करते हैं।

ब्रह्मांड में जब हम बेहतरीन से बेहतरीन दूरबीन (टेलिस्कोप) से देखते हैं तो ज्यादा से ज्यादा 13.8 अरब प्रकाशवर्ष पुरानी आकाशगंगाओं के दर्शन हमें होते हैं। लेकिन इससे यह नतीजा निकालना गलत होगा कि यह ब्रह्मांड 13.8 अरब प्रकाशवर्ष बड़ा है। वजह, ब्रह्मांड लगातार फैल रहा है। इसलिए 13.8 अरब वर्ष पुरानी जो आकाशगगाएं हम देख रहे होते हैं, असल में वे आकाशगगाएं इस समय खिसक कर हमसे करीब 46.5 अरब प्रकाशवर्ष दूर जा चुकी होती हैं। यानी वर्तमान में ब्रह्मांड का फैलाव 46.5 अरब प्रकाशवर्ष (93 अरब प्रकाशवर्ष व्यास) तक हो चुका है। प्रकाशवर्ष वह पैमाना है जिसके जरिए हम लंबी दूरियां नापते हैं। प्रकाशवर्ष से इसलिए कि इस ब्रह्मांड में सबसे तेज रफ्तार रोशनी की है। रोशनी 1 सेकंड में करीब 3 लाख किलामीटर का फासला तय कर लेती है। एक साल में रोशनी जितनी दूरी तय करती है, उसे पैमाना बनाकर दूरी को प्रकाशवर्ष में नापा जाता है। तो 93 अरब प्रकाशवर्ष बड़ा ब्रह्मांड भी ब्रह्मांड की सीमा नहीं है। पूरा ब्रह्मांड हमें दिखाई देने वाले ब्रह्मांड से काफी बड़ा है। इसका कोई ओर-छोर नहीं। यह ब्रह्मांड अनंत है। ऐसा माना जाता है कि हमारे ब्रह्मांड जैसे भी ढेरों ब्रह्मांड हैं।

हमारे वाला ब्रह्मांड कैसे बना, इस बारे में अंतिम रूप से प्रमाणित तथ्य फिलहाल विज्ञान के पास नहीं हैं। कई थिअरी हैं। सबसे स्थापित थिअरी बिग बैंग को ब्रह्मांड का शुरुआती चरण मानती है। इसके मुताबिक, किसी वक्त ब्रह्मांड एक परमाणु से भी छोटा था। सूक्ष्म बिंदु में करीब 140 करोड़ साल पहले महाविस्फोट हुआ। इसे ही बिग बैंग कहते हैं। विस्फोट से बिंदु टुकड़े-टुकड़े होकर इधर-उधर छिटकने लगा। इसी से ब्रह्मांड की शुरुआत हुई। आकाशगंगाएं, तारे, ब्लैक होल, ग्रह आदि बने। लेकिन ब्रह्मांड के फैलने का सिलसिला अब भी लगातार जारी है। लगता था कि एक समय इसका फैलना बंद हो जाएगा और यह वापस एक बिंदु में समा जाएगा। लेकिन 1998 में हबल टेलीस्कोप की वजह से पता चला कि ब्रह्मांड जिस रफ्तार से यह फैल रहा है, वह रफ्तार भी लगातार बढ़ रही है। यानी कोई बाहरी ताकत है। वैज्ञानिकों का मानना है कि एेसा डार्क एनर्जी के कारण हो रहा है। यह डार्क एनर्जी हमारे आसपास हर जगह मौजूद है। पर यह हमें दिखाई नहीं देती। इसीलिए इसे हम डार्क कहते हैं। इसे हम न तो माप सकते हैं और न ही इसकी जांच कर सकते हैं। हां, इसका असर हमें महसूस होता है। यह खाली जगहों पर पाई जाती है।

दरअसल यह ब्रह्मांड जितना हमें दिखता है, वह समूचे ब्रह्मांड का सिर्फ 5 फीसदी हिस्सा ही है। बाकी 95 फीसदी अदृश्य है। इसमें से डार्क एनर्जी 68 फीसदी है। बाकी 27 फीसदी डार्क मैटर है जिसे सन 1933 में खोजा गया था। यह अणु-परमाणु से न बना होकर ऐसे जटिल और अनोखे कणों से बना है जिनके बारे में हमें अभी तक पता नहीं चला है। इस ब्रह्मांड में जितनी भी चीजें हमें दिखाई देती हैं, वे सब या तो खुद रोशनी फेंकती हैं या फिर रोशनी रिफ्लेक्ट करती हैं लेकिन डार्क मैटर ये दोनों ही काम नहीं करता। इसलिए इसे देखना मुमकिन नहीं। तभी यह डार्क मैटर कहलाता है। पर इसका असर दिखता है। दरअसल डार्क मैटर ही इतनी ताकतवर ग्रेविटी पैदा करता है कि हर आकाशगंगा के सभी तारे उसी आकाशगंगा में बंधे रहते हैं। वे इधर-उधर नहीं बिखरते।

कुल मिलाकर डार्क मैटर ब्रह्मांड को बांधे रखने का काम करता है जबकि डार्क एनर्जी ब्रह्मांड का लगातार विस्तार करती रहती है। इस वजह से हर आकाशगंगा का एक-दूसरे से फासला बढ़ता जाता है। इसी ब्रह्मांड में ब्लैक होल नाम की ऐसी चीज भी है जो अपने दायरे में आने वाली हर चीज को निगल जाती है। ऐसा उसकी ग्रैविटी के जबरदस्त खिंचाव के कारण होता है। इस पर भौतिकी के नियम लागू नहीं होते। ब्लैक होल के बाहरी हिस्से को इवेंट हॉराइज़न कहते हैं। ब्लैक होल की खोज सन 1964 में हुई थी। इसे हम अंतरिक्ष में बनी गहरी खाई भी कह सकते हैं। जैसे चादर में छेद, जैसे मौत का कुआं, जैसे कुप्पी की बनावट, जैसे पानी से भरी बाल्टी में हाथों से घुमाकर बनाया गया भंवर।

पूरे ब्रह्मांड में अलग-अलग आकार के ढेरों ब्लैक होल हैं, पर हमारे सौरमंडल में कोई ब्लैकहोल नहीं है। हां, हमारी आकाशगंगा के बीचोबीच एक विराट ब्लैक होल है जो हमारे सूर्य से करीब 1 करोड़ गुना बड़ा है।

ब्लैक होल कैसे बने, इस बारे में दो थिअरी हैं। एक थिअरी यह कि जब कोई विशाल तारा खत्म होने को होता है तो वह अपने अंदर ही सिमटने लगता है। कुछ वक्त बाद वह ब्लैक होल बन जाता है। दूसरी थिअरी यह कि ब्लैक होल बिग बैंग के बाद बना पहला आकाशीय पिंड है। सबसे पहले ब्लैक होल बना। ब्लैक होल से ही विभिन्न तारे बने। तारों से ग्रह, उपग्रह आदि बने।

ब्लैक होल में गिरने के बाद चीज़ें कहां जाती हैं, इसका अभी तक पता नहीं चल पाया है। वजह यह कि ब्लैक होल रोशनी को अपने अंदर जज्ब कर लेता है। रिफ्लेक्ट नहीं करता। तभी उस पर रोशनी डालने पर भी घुप्प अंधेरे के अलावा दूसरा कुछ दिखाई नहीं देता। इसलिए ब्लैक होल का कोई फोटो सीधे-सीधे लेना मुमकिन ही नहीं। हाल में इसका पहला फोटो जिसे बताया गया है, वह दरअसल कंप्यूटर से बना एक वर्चुअल फोटो है जो 8 बड़ी रेडियो दूरबीनों से मिले डेटा के आधार पर बना है। फिर भी यह विज्ञान की बड़ी कामयाबी है। ब्लैक होल के बारे में कई जरूरी सवालों का जवाब मिलना अभी बाकी है। मसलन, ब्लैक होल में गिरी चीज़ें क्या किसी दूसरे डाइमेंशन में चली जाती हैं? क्या ब्लैक होल दूसरे डाइमेंशंस में जाने का दरवाज़ा है? कहीं हम किसी दूसरी दुनिया, किसी दूसरे ब्रह्मांड में तो नहीं पहुंच जाएंगे? जैसे ब्लैक होल हैं, वैसे ही क्या वाइट होल भी अंतरिक्ष में हैं?

इन्हीं तरह के सवालों के जवाब पाने के लिए स्विट्जरलैंड की सर्न लैब में इन दिनों कई प्रयोग हो रहे हैं। दुनिया की यह सबसे बड़ी लैब फ्रांस-स्विट्जरलैंड सीमा पर 27 किलोमीटर लंबी सुरंग में बनी हुई है। यहां अरबों डॉलर का खर्चा करके लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर नाम की महामशीन लगाई गई है। इसकी मदद से यह पता लगाया जाएगा कि ब्रह्मांड किन हालात में बना था। उन हालात को पैदा करके स्टडी करने की कोशिश की जा रही है। इस प्रयोग में भारत समेत दुनिया भर के करीब सौ देशों के हज़ारों वैज्ञानिक हिस्सा ले रहे हैं। सर्न लैब से ही गॉड पार्टिकल यानी हिग्स बोसोन होने के ठोस सबूत सन 2012 में मिले थे। आजकल यहां डार्क मैटर पर प्रयोग चल रहे हैं। उम्मीद है कि ब्रह्मांड से जुड़ी कई पहेलियां जल्दी ही सुलझ जाएंगी।

इंटरव्यू...............................

अनंत ब्रह्मांड की जटिल गुत्थियों को बारीकी से समझने के लिए राजेश मित्तल ने प्रियंवदा नटराजन से पिछले दिनों जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के दौरान बातचीत की। प्रियंवदा अमेरिका की येल यूनिवर्सिटी में एस्ट्रॉनमी की प्रफेसर हैं। अपनी रिसर्च से उन्होंने ब्लैक होल और डार्क मैटर के बारे में दुनिया की समझ बढ़ाने में अहम योगदान किया है। पेश हैं उनसे बातचीत के खास हिस्सेः

Q. ब्रह्मांड के बारे में हमें अब तक क्या पता है और क्या नहीं पता?
A. हमें पता है कि ब्रह्मांड कैसे शुरू हुआ, वक्त बीतने के साथ किस तरह इसका विस्तार हुआ। हमें मालूम है कि इस ब्रह्मांड का सिर्फ 5 फीसदी हिस्सा ही नॉर्मल मैटर से बना है, 68 फीसदी हिस्सा डार्क एनर्जी है और 27 फीसदी डार्क मैटर। हमें यह भी पता है कि डार्क एनर्जी कार के एस्केलेटर की माफिक ब्रह्मांड फैलने की रफ्तार बढ़ा रही है। पर यह नहीं पता कि असल में यह है क्या। अगर यह पता चल जाए तो अतीत, वर्तमान और भविष्य की तमाम गुत्थियां खुल सकती हैं। आखिर में इस ब्रह्मांड का क्या होगा, यह इस बात पर तय होगा कि डार्क एनर्जी असल में क्या है । इसी तरह हमें डार्क मैटर का पता है कि यह ग्रैविटी पैदा करता है, पर यह जानकारी नहीं है कि डार्क मैटर बना किससे है।

Q. डार्क एनर्जी और डार्क मैटर की प्रकृति के अलावा और किन सवालों के जवाब कॉस्मोलजी फिलहाल खोज रही है?
A. बिग बैंग से पहले क्या था? किन हालात में बिग बैंग शुरू हुआ और क्यों? पहली आकाशगंगा कैसे बनी? पहला ब्लैक होल कैसे बना?

Q. इन सवालों का जवाब कब तक मिलने के आसार हैं?
A. उम्मीद है कि 20 बरस में। अभी हम सुनहरे दौर से गुज़र रहे हैं। आज हमारे पास सभी ज़रूरी उपकरण और डेटा हैं। हां, पूरे ब्रह्मांड की पहेली को सुलझाने में कई सदियां लग सकती हैं। सुलझेंगी या नहीं, यह भी पक्के तौर पर नहीं कह सकते।

Q. कॉस्मोलजी से जुड़ीं कौन-सी गलत धारणाएं आम प्रचलित हैं?
A. एक तो यह कि इस ब्रह्मांड का कोई केंद्र है। सचाई यह है कि ब्रह्मांड का कोई केंद्र नहीं है। दूसरी गलत धारणा यह है कि ब्रह्मांड कुछ और बनने के लिए फैल रहा है जबकि सचाई यह है कि ब्रह्मांड फैल तो रहा है लेकिन कुछ अलग बनने के लिए नहीं। अक्सर एक मिसाल दी जाती है गुब्बारे के फैलने की। ब्रह्मांड वैसे ही फैल रहा है, जैसे हवा भरने पर गुब्बारा फैलता जाता है। लेकिन यह तुलना एक सीमा तक ही सही है। गुब्बारा जैसे-जैसे फूलता है, वह बाहर हवा की जगह को घेरता है, पर ब्रह्मांड खुद में फैलता है। उसका विस्तार किसी बाहरी इलाके में नहीं होता।

Q. ब्रह्मांड लगातार फैलता ही जा रहा है लेकिन दिल्ली-मुंबई का फासला तो ज्यों का त्यों है?
A. ब्रह्मांड फैल तो रहा है, इससे आकाशगंगाओं के बीच की दूरी भी बढ़ रही है, लेकिन उनका आकार नहीं बढ़ रहा। ऐसे में हमारी वाली आकाशगंगा में स्थित दिल्ली-मुंबई में दूरी भी नहीं बदलेगी। इसे अच्छी तरह यों भी समझ सकते हैं कि आकाशगंगाएं बंद बक्सों की माफिक हैं। इन बक्सों के बीच दूरी तो बढ़ रही है, पर बक्सों का आकार उतना ही है।

Q. आजकल समानांतर ब्रह्मांड की भी बात हो रही है?
A. हां, इस थिअरी में माना जाता है कि हमारे ब्रह्मांड में जो कुछ भी है, उसका प्रतिरूप समानांतर ब्रह्मांडों में मौजूद है। हमारी ज़िंदगी में जो कुछ भी घट सकता है, वह सब दूसरे ब्रह्मांडों में घटित हो रहा है। मसलन, अभी राजेश यहां मेरा इंटरव्यू ले रहे हैं, किसी दूसरे ब्रह्मांड में मुमकिन है कि प्रियंवदा राजेश का इंटरव्यू ले रही हो और किसी तीसरे ब्रह्मांड में राजेश क्रिकेट खेल रहे हो सकते हैं। जितनी तरह की संभावनाएं हो सकती हैं, वे सब संभावनाएं दूसरे ब्रह्मांडों में वाकई हो रही हैं। लेकिन यह अभी आइडिया ही है। इसे अभी साबित नहीं किया जा सका है।

Q. क्या हम बुलबुले है - न पूर्वजन्म और न ही पुनर्जन्म?
A. मेरा पूर्वजन्म में विश्वास नहीं है, न ही अगले जन्म में।सचाई यह है कि पूरे ब्रह्मांड के सामने हम अप्रासांगिक हैं। हमारी कोई औकात नहीं है। अंतरिक्ष से जब हमारा सूरज भी धूल के कण से भी छोटा नज़र आता है तो वहां हमारा वजूद क्या होगा। हमारे चारों तरफ पृथ्वी की तरह के करीब 5000 ग्रह हैं। कहीं न कहीं ज़िंदगी होगी और यह ज़िंदगी ज़रूरी नहीं कि हमारी तरह हो। बहुत ही प्राथमिक स्तर का जीवन भी हो सकता है मछली जैसा या हमसे उन्नत प्राणी भी हो सकते हैं। लेकिन अपने ग्रह के हिसाब से हम कुछ प्रभावी हैं। और कुछ नहीं तो हमारे पास विनाश की क्षमता है। अंधाधुंध विकास की होड़ में हम अपने ग्रह को बर्बाद कर रहे हैं।

Q. आपने तो दर्शन की भी पढ़ाई की है। यह ब्रह्मांड क्यों बना है? इसके पीछे क्या मकसद है?
A. मकसद खोजने में मेरी कोई रुचि नहीं। हम यहां क्षण भर के लिए हैं। इस ब्रह्मांड को किसी प्रयोजन की ज़रूरत नहीं है। वह है तो है। प्रयोजन तो इंसानों को ढूंढना चाहिए।

Q. तो इंसानों का प्रायोजन क्या होना चाहिए?
A. यह कि हम खुद को बस अपने और अपने परिवार तक ही सीमित न रखें। दुनिया के लिए भी कुछ करके जाएं। इस दुनिया पर कोई अच्छा असर डाल कर जाएं। दूसरों की मदद करें।

Q. आपने ऐसा क्या किया है जिससे आपको संतुष्टि मिली हो, जीवन की सार्थकता मिली हो?
A. मेरे मन में बस यह है कि मेरे किसी आइडिया पर मेरे बाद में भी काम हो। ब्रह्मांड की कोई पहेली जब भी कभी सुलझे, उसमें कुछ योगदान मेरा भी हो।

Q. आपका अब तक का योगदान क्या है?
A. डार्क मैटर की मैपिंग करने में मैंने कुछ योगदान किया है। बताया है कि यह डार्क मैटर कितने टुकड़ों में बंटा हुआ है, इसकी बारीकियां क्या हैं, ब्लैक होल कैसे फैलते हैं। इस पर भी काम कर रही हूं कि पहला ब्लैक होल कैसे बना।

Q. ब्रह्मांड पर आप जो रिसर्च कर रही हैं, उसमें टेलीस्कोप के अलावा और किन-किन टूल्स का इस्तेमाल होता है?
A. हम लोग कंप्यूटरों का इस्तेमाल करते हैं।

Q. आम कम्प्यूटर या कोई सुपर कंप्यूटर?
A. अपनी रिसर्च के लिए सुपर कंप्यूटर का भी इस्तेमाल करती हूं और एक आम लैपटॉप का भी। पेंसिल-पेपर का भी इस्तेमाल होता है। इसके अलावा हबल और चंद्रा टेलीस्कोप से मिले डेटा का विश्लेषण करती हूं।

Q. क्या भारत में भी इन सब चीजों पर रिसर्च हो रही है?
A. 10 साल पहले तक भारत इस क्षेत्र में पिछड़ा हुआ था। बेसिक रिसर्च पर पैसे खर्च नहीं किए जा रहे थे। दरअसल बेसिक रिसर्च का कोई फौरी फायदा नहीं होता। मानव जिज्ञासा शांत करने के लिए यह की जाती है।
लेकिन अब भारत में भी बेसिक रिसर्च पर काफी खर्चा किया जा रहा है। सभी अहम प्रोजेक्टों में भारत भाग ले रहा है। ब्लैक होल्स की स्टडी के लिए तीसरा लीगो डिटेक्टर भारत में ही बनाया जा रहा है जो 2025 में काम करने लगेगा। आजकल जो भी रिसर्च हो रही है, उसे कोई एक देश अपने बलबूते पर नहीं करता। कई देश मिलकर करते हैं।

Q. हाल में किसी संस्था ने दुनिया के सौ शीर्ष वैज्ञानिकों की सूची तैयार की है। उसमें बहुत कम महिला वैज्ञानिक हैं। विशुद्ध विज्ञान की रिसर्च में महिलाएं काफी कम हैं। ऐसा क्यों?
A. बाहर भी ऐसा ही है। सभी संस्थाएं पुरुषों ने बनाई हैं। उन्होंने दूसरों को आने नहीं दिया। लेकिन अब स्थिति बदल रही है। सचाई यह है कि प्रतिभा सबके पास है, सब लोग एक प्रतिभा, किसी तोहफे के साथ पैदा होते हैं।लेकिन कुछ लोग किस्मत वाले होते हैं जिन्हें अपने इस तोहफे का इस्तेमाल करने का पूरा मौका मिलता है।ज़्यादातर लोगों को यह मौका नहीं मिलता है। यह स्थिति बदलनी चाहिए। हर बच्चे में जो जन्मजात प्रतिभा है, उसे पहचान कर उसे बढ़ावा देना होगा, उसे विकसित करना होगा और उसे ऐसे मौके देने होंगे कि वह प्रतिभा का इस्तेमाल कर सके। तभी सारे समाज को लाभ होगा। प्रतिभा महिलाओं में ही नहीं, डिफरेंटली एबल्ड लोगों में भी है। इस दुनिया की समस्याओं को दूर करने के लिए हमें सबकी प्रतिभाओं की जरूरत है।

Q. कहा जाता है कि हमारे धर्मग्रंथों में, वेदों में सारा ज्ञान है?
A. हमारे धार्मिक ग्रंथों में जो कुछ लिखा है और जो विज्ञान कर रहा है, इन दोनों में कोई तुलना नहीं की जा सकती। मिसाल के तौर पर, कोई सवाल करे कि नीले रंग में कितना नमक है तो इसका कोई जवाब नहीं दिया जा सकता। रंग और स्वाद को मिक्स नहीं कर सकते। तमाम धर्मों में जो कहानियां हैं, वे सब कल्पना पर आधारित हैं।

Q. ऐसे कहा जाता है कि हमारी जो पुराने ऋषि-मुनि थे, वे धरती पर बैठे-बैठे दूसरे लोकों की सैर कर लिया करते थे, पूरा ब्रह्मांड वे यहीं बैठे-बैठे देख लेते थे?
A. ऐसा कुछ नहीं है। कोई विज्ञानी इसे नहीं मानता। पर दोनों की बात हम एक साथ करते हैं तो अपने पूर्वजों के ज्ञान की गरिमा घटाते हैं। हम इससे प्रेरणा लेनी चाहिए कि हमारे पूर्वजों के पास ऐसी गज़ब की कल्पनाशीलता थी।कल्पनाशीलता के इस्तेमाल से ही हम विज्ञान की गुत्थियां सुलझाते हैं।

संडे नवभारत टाइम्स से साभार