Tuesday, 17 September 2019

हरक्युलिस ड्वार्फ का भयानक रास्ता

हरक्युलिस ड्वार्फ का भयानक रास्ता
चंद्रभूषण
धरती से दस लाख किलोमीटर दूर किसी कृत्रिम ग्रह की तरह सूर्य की परिक्रमा कर रहे यूरोपियन स्पेस एजेंसी के गाइया टेलीस्कोप ने पिछले तीन वर्षों में हमारी अपनी गैलेक्सी आकाशगंगा से जुड़ी कई दिलचस्प जानकारियां मुहैया कराई हैं। इन्हीं जानकारियों में एक यह भी है कि कम से कम 50 छोटी गैलेक्सियां उपग्रहों की तरह हमारी आकाशगंगा के इर्द-गिर्द घूम रही हैं। लार्ज मैगेलनिक क्लाउड जैसी बड़ी सैटेलाइट गैलेक्सियों के बारे में जानकारी हमें पहले से थी, लेकिन हरक्युलिस ड्वार्फ जैसी इस बिरादरी की छोटी गैलेक्सियों के ब्यौरे हमारे लिए नई बात हैं।

बहुत धुंधली सी गैलेक्सी हरक्युलिस ड्वार्फ अभी हमारी आकाशगंगा के केंद्र से 4 लाख 60 हजार प्रकाशवर्ष की दूरी पर है लेकिन हाल में पता चला है कि इसका परिक्रमा पथ आकाशगंगा के भीतर से होकर गुजरता है। आकाशगंगा के केंद्र से यह अधिकतम 6 लाख प्रकाशवर्ष की दूरी तक जाती है और फिर वापस लौटती है। लेकिन अब से 50 करोड़ साल पहले यह हमारी आकाशगंगा के केंद्र से महज 16 हजार प्रकाशवर्ष की दूरी पर थी। ध्यान रहे, हमारा सूरज आकाशगंगा के केंद्र की परिक्रमा 27 हजार प्रकाशवर्ष की दूरी से करता है। यानी हिसाब बताता है कि एक समय ऐसा था, जब 70 लाख सूर्यों के वजन वाली हरक्युलिस ड्वार्फ सूरज के परिक्रमा पथ के भीतर से होकर निकली होगी!

यह बात पढ़ने में जितनी आसान है, सोचने पर उतनी ही डरावनी जान पड़ती है। भूगर्भशास्त्रियों को अंतरिक्षविज्ञानियों के साथ तालमेल बिठाकर यह पता करना चाहिए कि हरक्युलिस ड्वार्फ के इस भयानक रास्ते का कोई प्रभाव सौरमंडल पर और खासकर धरती पर भी दर्ज है या नहीं। कहीं ऐसा तो नहीं कि सूरज का अपनी धुरी पर साढ़े आठ डिग्री, पृथ्वी का साढ़े 23 डिग्री और यूरेनस का लगभग 90 डिग्री झुका होना इस प्राचीन गैलेक्सी की घुसपैठ के दौरान इसके ही किसी तारे की छेड़छाड़ का नतीजा है!

बौनी, विरल सैटेलाइट गैलेक्सी हरक्युलिस ड्वार्फ इतनी पुरानी है कि इसके सभी तारों की उम्र 12 अरब साल से ज्यादा, यानी सूरज की मौजूदा उम्र की कोई ढाई गुनी है। नए तारों का बनना इसमें बहुत पहले बंद हो चुका है। वैज्ञानिकों का मानना है कि अगली परिक्रमा के बाद यह गैलेक्सी शायद नाम को ही बचे और इसके तारों का काफी बड़ा हिस्सा हमारी आकाशगंगा का ही अंग बनकर रह जाए। इससे आकाशगंगा का परिवार तो बढ़ेगा, लेकिन अभी की सेटिंग में जो उथल-पुथल मचेगी, उसकी कल्पना भी आसान नहीं है।

Saturday, 14 September 2019

शुद्ध गणित का जादू

और विज्ञानों से अलग है शुद्ध गणित का जादू
चंद्रभूषण
एक विज्ञान के रूप में गणित की छवि किसी तपस्वी की साधना जैसी ही है। इसकी क्रांतिकारी खोजें भी प्राय: अचर्चित रह जाती हैं। या चर्चित होने में उन्हें इतना वक्त लगता है कि जब-तब खोजी के लिए ही अपनी खोज बेमानी हो जाती है। इसके दो उज्ज्वल अपवाद यूनान के आर्किमिडीज और ब्रिटेन के आइजक न्यूटन हैं, जो जितने बड़े गणितज्ञ थे, उतने ही बड़े मिलिट्री साइंटिस्ट भी थे। उनका असर जितना आने वाले समय पर पड़ा, उतना ही अपने समय पर भी दर्ज किया गया। बतौर गणितज्ञ दोनों की हैसियत को उनके शाही रुतबे के चलते कभी कम करके नहीं आंका गया। लेकिन पिछली सदी में इस खेल के नियम बदल गए।

जी. एच. हार्डी ने ( भारतीय जीनियस श्रीनिवास रामानुजन को दुनिया के सामने लाने के लिए हम जिनके प्रति कृतज्ञ हैं ) अपने निबंध 'अ मैथमेटिशियंस अपॉलजी' में प्योर मैथमेटिक्स और एप्लाइड मैथमेटिक्स को बिल्कुल अलग-अलग चीजों की तरह देखा है। वे अपना जीवन एक ऐसे गणित के प्रति समर्पित बताते हैं, जिसका कोई व्यावहारिक महत्व नहीं है। इसका उन्हें कोई दुख भी नहीं है। अलबत्ता एक संतोष है कि अपनी जिंदगी उन्होंने एक सौंदर्य की खोज में लगाई है, किसी के लिए मुनाफा कमाने या युद्ध जीतने की कवायद में नहीं।

यह बात और है कि अंकगणित से जुड़ा हार्डी और रामानुजन का बहुत सारा काम द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान (यानी अपॉलजी लिखे जाते समय भी) कूट संकेतों के विज्ञान क्रिप्टॉलजी में इस्तेमाल हो रहा था और इसके बारे में उन्हें पता तक नहीं था। इंसान का लालच और उसकी खुदगर्जी संसार की हर चीज का इस्तेमाल कर सकती है। प्योर मैथमेटिक्स के पुजारी किसी भी गिरि-कंदरा में छिप जाएं, धंधेबाज लोग वहां से भी उनके काम को खोज लाएंगे और अपने धंधे में लगा लेंगे। लेकिन हार्डी के निबंध का मूल तत्व प्योर मैथमेटिक्स को महिमामंडित करने का नहीं, गणित के उस दूसरे पहलू को सामने लाने का है, जो अपने सौंदर्य में पेंटिंग, संगीत या कविता जैसा और सत्य के प्रति अपने आग्रह में दर्शन जैसा है।

अभी के समय में रूसी गणितज्ञ ग्रिगोरी पेरेलमान हार्डी के इन मानकों पर सबसे ज्यादा खरे उतरते हैं, हालांकि अपनी ही दुनिया में मगन रहने वाले इस गणित साधक के बारे में उसके करीबी लोगों का कहना है कि गणित से उनका रिश्ता अब बीते दिनों की बात हो चुका है। काफी खटास भरे एक प्रकरण के बाद उन्होंने खुद को अपने दूसरे शौकों, जैसे पियानो बजाने और टेबल टेनिस खेलने तक सिमटा लिया है।

गणित के सामने मौजूद सहस्राब्दी की सात सबसे बड़ी चुनौतियों में एक प्वांकारे कंजेक्चर (जिसका कुछ सिर-पैर जानने के लिए आपको सतहों के उतार-चढ़ाव और घुमाव से जुड़े टोपॉलजी के कठिन शास्त्र में घुसना पड़ेगा) को उन्होंने हल किया, लेकिन इसके लिए मिले फील्ड्स मेडल और दस लाख डॉलर के मिलेनियम अवार्ड को यह कह कर ठुकरा दिया कि गणित के क्षेत्र में आ रही अनैतिकता को बर्दाश्त करने की प्रवृत्ति उन्हें इनको अपनाने से रोक रही है।

दरअसल, गणित का नोबेल कहे जाने वाले फील्ड्स मेडल से विभूषित चीन के दो गणितज्ञों ने ग्रिगोरी पेरेलमान की खोज का श्रेय अपने देश के ही दो चेलों को देने का प्रयास किया, हालांकि इस पूरे एपीसोड का अंत चीनी गणितज्ञों के माफीनामे और उनके द्वारा अपनी रिसर्च वापस लेने के रूप में हुआ। गणित की दुनिया के लिए ऐसे कथित 'राष्ट्रवादी प्रयास' बिल्कुल बेमानी माने जाते रहे हैं, लेकिन दुनिया को अपने ठेंगे पर रखने वाले गणितज्ञ भी आजकल चीनियों की आर्थिक हैसियत के सामने खड़े होने की हिम्मत नहीं जुटा पाते।

Thursday, 12 September 2019

सौरमंडल से बाहर पहला ग्रह, जहां बारिश होती है

सौरमंडल से बाहर पहला ग्रह, जहां बारिश होती है
चंद्रभूषण
धरती से बाहर जीवन की संभावनाओं की तलाश एक नए मुकाम पर पहुंच गई है। सन 2015 में केपलर टेलिस्कोप द्वारा 111 प्रकाशवर्ष दूर खोजे गए ग्रह के2-18बी पर खगोलशास्त्रियों की दो टीमों ने बरसाती बादलों की शिनाख्त की है। इसी हफ्ते घोषित की गई यह खोज इतनी दुर्लभ, इतनी असाधारण है कि इस क्षेत्र में काम करने वाले दुनिया भर के वैज्ञानिक इस पर लहालोट हुए जा रहे हैं। हालांकि साथ में उन्होंने इस ग्रह को पृथ्वी जैसा मान लिए जाने के अतिरेक को लेकर आगाह भी किया है। उनकी खोज की कठिनाई का अंदाजा लगाने के लिए इस रूपक पर विचार किया जा सकता है कि अंधेरी रात में किसी ऊंची इमारत से दसियों किलोमीटर दूर लगे एक तेज बल्ब पर मंडराता हुआ कीड़ा देखकर आप बता दें कि उसकी प्रजाति कौन सी है, और वह नर है या मादा।

सौरमंडल से बाहर ग्रहों की तलाश में हमारे सामने अभी कुछ बड़ी तकनीकी बाधाएं मौजूद हैं। एक विधि में यह काम ग्रह के खिंचाव से तारे की डगमगाहट नापने के जरिये किया जाता है, दूसरी में ग्रह की आड़ पड़ने से तारे की रोशनी में आने वाली कमी पकड़ने के जरिये। इन दोनों कामों के लिए अलग-अलग टेलिस्कोप आजमाए जाते रहे हैं और एक तरीके से मिले सुराग की पुष्टि दूसरे तरीके की आजमाइश के जरिये की जाती रही है। लेकिन दोनों विधियों की सीमा हाल तक यह रही है कि ये बड़े ग्रहों को ही पकड़ पाती हैं। वह भी, या तो तारे से बहुत दूर नेपच्यून जितने या उससे भी ज्यादा ठंडे, या फिर तारे के बहुत पास भट्ठी की तरह दहकते हुए, जिससे तुलना करने लायक का कोई ग्रह हमारे सौरमंडल में नहीं है।

केपलर टेलिस्कोप ने इन सीमाओं से काफी हद तक मुक्ति दिलाई है। इसकी मेहरबानी से खोजे गए एक्सोप्लैनेट्स (सूर्य के अलावा अन्य तारों के ग्रहों) की संख्या देखते-देखते सैकड़ों से बढ़कर हजारों में (अभी चार हजार से ज्यादा) पहुंच गई है। इससे ग्रह विज्ञान (प्लैनेटरी साइंस) बड़ी तेजी से एक स्वतंत्र विज्ञान का रूप लेता जा रहा है। लेकिन अगर इस समूची खोज यात्रा को सिर्फ एक सवाल के इर्दगिर्द समेट कर देखा जाए कि क्या हम ब्रह्मांड में अकेले हैं, या पृथ्वी से बाहर कहीं और भी बुद्धिमान प्राणी मौजूद हैं या नहीं, या फिर यह कि क्या सचमुच आकाश में कोई ऐसी जगह है जहां से रहस्यमय एलिएन उड़नतश्तरी पर सवार होकर आते हैं, तो इस नए विज्ञान के पास हमारी जिज्ञासा शांत करने वाला कोई जवाब फिलहाल मौजूद नहीं है।

के2-18बी पर वापस लौटें तो केपलर टेलिस्कोप द्वारा की गई शिनाख्त के बाद दो अलग-अलग टीमों द्वारा हबल टेलिस्कोप से लिए गए के2-18 तारे के स्पेक्ट्रम के अध्ययन से पता चला कि इस ग्रह के वातावरण में हाइड्रोजन, हीलियम और पानी की भाप मौजूद है। भाप की उपस्थिति गर्म ग्रहों पर इसके पहले भी दर्ज की जा चुकी है, लेकिन के2-18बी पर मिली भाप का स्वरूप भिन्न है। यह वहां पानी के पांच अणुओं के गुच्छे के रूप में मौजूद है, जैसी धरती पर बादलों की शक्ल में हुआ करती है। 111 प्रकाशवर्ष की विराट दूरी पर इतने संश्लिष्ट रूप में पानी का दर्ज किया जाना खुद में एक चमत्कार है। बड़ी बात यह कि के2-18बी अपने तारे के2-18 के हैबिटेबल जोन में है, हालांकि बादलों के प्रेक्षण भर से इसकी सतह पर जीवनदायिनी बरसात होने का अनुमान लगाना तथ्यों से आगे बढ़कर कहानियों में जाने जैसा होगा।

ऐसा कहने की सबसे बड़ी वजह यह है कि अभी तो हम यही नहीं जानते कि उक्त ग्रह की कोई ठोस सतह है भी या नहीं। तारा के2-18 वजन में सूरज का 40 फीसदी है और इसका तापमान सूरज का लगभग आधा है। ज्यादा सटीक तौर पर कहें तो सूरज के 5778 डिग्री केल्विन के बरक्स 3503 डिग्री केल्विन। लेकिन सबसे खास बात यह कि के2-18 की धात्विकता (तारे में धातुओं की मौजूदगी) सूरज के दसवें हिस्से से भी कम है। यह बात खिंचती हुई के2-18बी तक चली आती है- इस मायने में की इसका घनत्व पृथ्वी की तुलना में काफी कम है।

पृथ्वी की 2.71 गुनी त्रिज्या को देखते हुए समान घनत्व पर इस ग्रह का वजन पृथ्वी का 20 गुना होना चाहिए था, लेकिन यह धरती के नौ गुने से भी जरा कम नापा गया है। तारे में धातुएं कम होने से ग्रह में भी धातुओं का कम होना स्वाभाविक है, लेकिन घनत्व कम होने की एक वजह यह भी हो सकती है कि ग्रह का कोर और बाकी ठोस हिस्सा छोटा हो और उसकी बनावट में पानी का हिस्सा काफी बड़ा हो। ऐसे में यह संभव है कि ग्रह की सतह पृथ्वी की तरह चट्टानी न हो। बहरहाल, इससे जुड़ी कई उत्सुकताओं का समाधान 2021 में छोड़े जाने वाले जस्टिन वेब टेलिस्कोप के प्रेक्षणों से हो जाएगा। और अगर वहां इवॉल्यूशन की संभावना मौजूद हुई तो इसके लिए समय कोई समस्या नहीं है। के2-18 जैसे लाल बौने तारों की उम्र सूरज की तुलना में बहुत ज्यादा होती है। इतनी कि कुछ वैज्ञानिक इन्हें अमर तारे कहने में भी संकोच नहीं करते।

Saturday, 17 August 2019

यह पानी हमारा नहीं है !!

यह पानी हमारा नहीं
चंद्रभूषण
पानी के बारे में हम इतना ज्यादा जानते हैं कि कुछ और जानने की किसे पड़ी है? लेकिन वैज्ञानिकों की भविष्यवाणी है कि मौजूदा सदी की ही किसी तारीख में दुनिया के लिए पानी पेट्रोलियम से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाएगा, सो दिलचस्पी मर-मर कर जिंदा भी हो जा रही है। हकीकत यह है कि दुनिया में पानी की कोई कमी नहीं है, लेकिन उसका जितना हिस्सा सीधे काम में लाया जा सकता था, वह लगभग सारा का सारा लाया जा चुका है।

धरती का 97 फीसदी पानी समुद्री है, जिसे खारे से मीठा बनाना अगर कभी सस्ता हो सका तो भी उसकी मात्रा सीमित होगी। बचे 3 फीसदी का 70 प्रतिशत ध्रुवीय इलाकों या ग्लेशियरों में है, जिसपर हाथ लगाना विनाश का एक्सीलरेटर दबाने जैसा ही होगा। ज्यादा बड़े पैमाने पर देखें तो पानी की दुर्लभता का हाल यह है कि पृथ्वी के सारे पड़ोसी पिंडों चंद्रमा, शुक्र, मंगल और बुध पर यह या तो सिरे से नदारद है, या कहीं अवशेष रूप में है भी तो मौजूदा टेक्नॉलजी से बाल्टी भर पानी जुटाने में शायद भारत के जीडीपी जितनी रकम खर्च करनी पड़ जाए।

जर्मनी की म्युंस्टर यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता हाल में मॉलिब्डेनम आइसोटोप्स पर काम करके इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि सौरमंडल के बाकी चट्टानी ग्रहों की तरह पृथ्वी के लिए भी पानी कोई प्राकृतिक वस्तु नहीं है। इसकी स्वाभाविक उपस्थिति बृहस्पति या उससे दूर के ग्रहों पर ही मानी जा सकती है। पृथ्वी बनने के 10 करोड़ साल बाद उसी तरफ से आए जिस पिंड की टक्कर से चंद्रमा की सृष्टि हुई, धरती का सारा पानी उसी की देन है। सो, बात पानी की हो तो जरा संभल के!

Saturday, 10 August 2019

प्रकृति का विफल प्रयोग नहीं हैं ऐडियाकारन

प्रकृति का विफल प्रयोग नहीं हैं एडियाकारन
चंद्रभूषण
स्थापित मान्यताओं की गुलामी विज्ञान में भी खूब देखी जाती है। केकड़ों के करीब दिखने वाली अति प्राचीन, लगभग 50 करोड़ साल पुरानी कैंब्रियन जीव जातियों को ही सृष्टि के सबसे प्रारंभिक जानवर मानने का रिवाज लंबे समय तक जीव विज्ञान में चलता रहा। उन्नीसवीं सदी में इसे जीवाश्म विज्ञान का चरम समझा जाता था। इस मान्यता से न हट पाने के चलते ही 1868 में कनाडा में जब इससे भी दस करोड़ साल पुराने, बहुत ही सुंदर, सुडौल जीवाश्म खोजे गए तो अगले अस्सी-नब्बे वर्षों में दक्षिणी अमेरिका, अफ्रीका और आस्ट्रेलिया तक दुनिया में बहुत दूर-दूर की जगहों पर इनके दोहराव के बावजूद कभी इन्हें गैस के सोतों के निशान तो कभी किसी किस्म का पौधा कहकर खारिज कर दिया जाता था।

1946 में दक्षिणी आस्ट्रेलिया की एडियाकारा पहाड़ियों में ऐसे विविध रूपों वाले जीवाश्मों की खोज एक साथ होने के बाद इन्हें 'एडियाकारन बायोटा' का नाम दिया गया। लेकिन हाल तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया था कि ये पौधे थे या जानवर, या कुछ और। किसी चित्रकार के बनाए हुए से लगने वाले, छह फुट तक चौड़े जीवाश्म अपने पीछे छोड़ गए इन जीवों का अभी धरती पर मौजूद किसी भी जीवधारी के साथ कोई मेल नहीं है। यही कारण है कि जीववैज्ञानिक परिवार निर्धारण में इनकी जगह कहां सुनिश्चित की जाए, यह भी तय नहीं हो पा रहा था। इनके अस्पष्ट कुल नाम में लगा ‘बायोटा’ इस दुविधा को ही दर्शाता है। एक राय इन्हें पृथ्वी पर प्रकृति का विफल प्रयोग मानने की है, क्योंकि एक जैविक प्रयोग के रूप में अगर ये सफल होते तो इनकी संततियों का कोई न कोई रूप धरती पर बाद में भी मौजूद होता।

हकीकत यह है कि कैंब्रियन युग की शुरुआत के साथ ही इनके जीवाश्मों की निरंतरता अचानक कुछ इस तरह टूट जाती है, जैसे गधे के सिर से सींग। इसकी दो-तीन वजहें हो सकती हैं। एक तो यह कि वातावरण में कोई ऐसा बदलाव हुआ हो कि इनका जीवित रह पाना संभव न रह गया हो। दूसरा यह कि ये कैंब्रियन जंतुओं की खुराक बन गए हों। और तीसरा यह कि एक जीवजाति के रूप में इनका जारी रहना अपने भीतर से ही असंभव हो गया हो और इनके गायब होने के क्रम में जीवन की निरंतरता कायम रखने के लिए सृष्टि को एककोशिकीय जीवों का ही इवॉल्यूशन नए सिरे से करके कैंब्रियन जीवों की रचना करनी पड़ी हो।

इस तीसरे तर्क के साथ समस्या यह है कि एडियाकारन जीवों का आधिपत्य धरती पर थोड़ा-बहुत नहीं, पूरे नौ करोड़ 30 लाख साल कायम रहा। पत्थरों पर उनकी शुरुआती छापें 63 करोड़ 50 लाख साल पहले से मिलनी शुरू होती हैं और 54 करोड़ 20 लाख साल पहले वाले समय के तुरंत बाद अचानक मिलनी बंद हो जाती हैं। इसकी तुलना अगर स्पीलबर्ग की बहुचर्चित फिल्म ‘जुरासिक पार्क’ से चर्चा में आए जुरासिक युग से करें तो वह पांच करोड़ साठ लाख साल लंबा ही चल पाया था। अब, अगर हम डाइनोसोरों को प्रकृति के सबसे सफल प्रयोगों में से एक मानते हैं, तो इसकी लगभग दोगुनी अवधि तक धरती पर राज करने वाली जीवजाति को प्रकृति का विफल प्रयोग बताने का कोई औचित्य नहीं बचता।

बहरहाल, असल सवाल एडियाकारन जीवों की जाति निर्धारित करने का है कि वे जानवर थे या पौधे या इन दोनों से अलग कोई अद्भुत, अनोखी चीज। अभी पिछले हफ्ते एक चीनी और एक ब्रिटिश जीव विज्ञानी ने अपनी साझा रिसर्च में दावा किया है कि एडियाकारन हकीकत में जानवर थे और उनमें सब के सब नहीं तो कुछेक चल-फिर भी सकते थे। यह निष्कर्ष उन्होंने अपेक्षाकृत बाद की एक जीवजाति स्ट्रोमैटोवेरिस साइग्मोग्लेना के जीवाश्म के अध्ययन के आधार पर निकाला है। यह जीवाश्म 51 करोड़ 80 लाख साल पुराना है, यानी एडियाकारन जीवों का दौर खत्म हो जाने के ढाई करोड़ साल बाद का। लेकिन इसके कुछ लक्षण एडियाकारन से मिलते-जुलते हैं।

ब्यौरे में जाएं तो हर जानवर में खाना पचाने की कोई सुनिश्चित व्यवस्था- आर-पार जाने वाला कोई छेद- जरूर होता है। इसका अपवाद स्पंज हैं, जिनमें यह नहीं होता। वे पूरे शरीर से पानी सोखते-निकालते रहते हैं और इसी क्रम में पोषक तत्वों को अपने भीतर जमा करने और उच्छिष्ट के उत्सर्जन का काम भी संपन्न कर लेते हैं। इस नजर से एडियाकारन स्पंज और उससे बाद के जानवरों के बीच की कोई चीज हो सकते हैं। इस तरह की कुछ संरचनाएं स्ट्रोमैटोवेरिस साइग्मोग्लेना के जीवाश्मों में नजर आ रही हैं। लेकिन इन्हें एडियाकारन की ही परंपरा वाली जीवजाति मानने की वजह सिर्फ एक है कि दोनों की बनावट थोड़ी-बहुत मिलती-जुलती है। यह और बात है कि इस मामूली मिलान के आधार पर ढाई करोड़ के फासले को नजरअंदाज कर देना ज्यादातर जीवविज्ञानियों को रास नहीं आ रहा।

सृष्टि से पहले !!

जो रहा सृष्टि से पहले
चंद्रभूषण
जैसे हमारे सौरमंडल में सारे ग्रह सूरज के इर्दगिर्द एक ही दिशा में घूमते हैं, उसी तरह हमारी आकाशगंगा में सारे तारे भी इसके केंद्र की एकदिश परिक्रमा करते हैं। लेकिन इस किस्से में आगे एक बड़ा झोल आता है। हम जैसे-जैसे सूरज से दूर जाते हैं, ग्रहों की रफ्तार कम होती जाती है। 14.96 करोड़ किमी दूरी से सूरज का चक्कर काट रही पृथ्वी यह काम 29.78 किमी/सेकंड की गति से करती है, जबकि सूरज से 449.50 करोड़ किमी दूर नेपच्यून सिर्फ 5.43 किमी/सेकंड की चाल से अपनी राह नापता है। लेकिन आकाशगंगा के केंद्र का चक्कर काट रहे तारों के साथ मामला पता नहीं क्यों बिल्कुल उलटा है। दूरी बढ़ने के साथ उनकी रफ्तार घटने के बजाय बढ़ती जाती है।

जैसे, केंद्र से कोई 30 हजार प्रकाशवर्ष दूर स्थित सूरज अपना रास्ता 220 किमी/सेकंड की गति से तय करता है, जबकि इससे तीन गुना से भी ज्यादा दूर (केंद्र से 1 लाख प्रकाशवर्ष दूर) के तारे 275 किमी/सेकंड की स्पीड से फर्राटा मारते हैं। और यह उलटबांसी सिर्फ आकाशगंगा तक सीमित नहीं है। ऐसी हजारों स्पाइरल गैलेक्सीज के ब्यौरे खगोलशास्त्रियों के पास हैं और उन सबमें बाहरी तारों की रफ्तार भीतर वालों से ज्यादा देखी गई है। यह तभी संभव है जब इनके बाहरी हिस्सों में कोई ऐसी चीज भरी हो, जिसके प्रेक्षण का कोई तरीका हमारे पास नहीं है। इस अज्ञात चीज ‘डार्क मैटर’को लेकर मोटा हिसाब यह है कि इसका वजन सभी ज्ञात चीजों का पांच गुना है, और हाल की एक गणना के अनुसार इसे सृष्टि के प्रस्थान बिंदु ‘बिग बैंग’ से भी पुराना होना चाहिए!

Friday, 2 August 2019

सबसे स्थिर स्थिरांक

सबसे स्थिर स्थिरांक
चंद्रभूषण
137.03599913
एक अजीब संख्या, जिस पर भौतिकशास्त्री लट्टू रहते हैं। दशमलव का निशान छोड़ दें तो कुल 11 अंकों की ऊपर लिखी संख्या में ऐसी क्या खास बात है जिसने एक जमाने से भौतिकशास्त्रियों को इसका दीवाना बना रखा है? सैद्धांतिक भौतिकशास्त्री इसे पूरे ब्रह्मांड का सबसे स्टेबल कॉन्स्टैंट मानकर चलते हैं, जबकि प्रायोगिक भौतिकशास्त्री ब्रह्मांड के सुदूरतम कोनों में इस संख्या के मान में थोड़ा बहुत भी झोल दिख जाने की जुगत में जुटे रहते हैं।

दरअसल यह भौतिकी के तीन सबसे बुनियादी स्थिरांकों- क्वांटम मेकेनिक्स में कदम-कदम पर इस्तेमाल होने वाला प्लैंक स्थिरांक h, निर्वात में प्रकाश का वेग c और इलेक्ट्रान पर मौजूद आवेश e का एक विशिष्ट मेल है। साथ में इसमें गणित के सबसे बुनियादी अनुपात पाई का तड़का भी लगा हुआ है। यह एक खास राशि hc / 2πe 2 का गणितीय मान है, जिसमें सारी इकाइयां एक-दूसरे कट जाती हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो यह सिर्फ एक संख्या है, जिसका आठ दशमलव अंकों तक मान 137.03599913 आता है।

यह भी दिलचस्प है कि इतने महत्वपूर्ण स्थिरांक को अभी तक कोई नाम नहीं दिया गया है। अलबत्ता इसकी उलट राशि (1 में इसका भाग देने पर मिलने वाली संख्या) को ग्रीक अक्षर अल्फा के रूप में लिखा जाता है और इसे फाइन स्ट्रक्चर कॉन्स्टैंट (महीन ढांचा स्थिरांक) के रूप में जाना जाता है। इसका मूल्य 0.0072973525664 के करीब आता है, और यह ऊपर बताई गई अपनी विलोम संख्या जितना सटीक नहीं है।

हाल तक ऐसा समझा जाता था कि ब्रह्मांड के किसी भी छोर पर अल्फा के मान में दशमलव के तेरहवें स्थान तक भी कोई बदलाव नहीं आ सकता। लेकिन जैसे-जैसे इंसानी प्रेक्षणों का दायरा बढ़ता जा रहा है, कई अरब प्रकाश वर्ष की दूरी पर दर्ज किए गए आंकड़े इसमें जरा-मरा बदलाव भी दिखा रहे हैं। ऐसा प्रेक्षणों की गलती से भी हो सकता है और यह भी संभव है कि भौतिकी की सबसे बुनियादी मान्यता- ‘यह सृष्टि और इसके नियम हर जगह बिल्कुल एक-से हैं’- में ही कोई झोल हो। बहरहाल, इससे 137.03599913 के दुर्निवार आकर्षण में कोई कमी नहीं आने वाली।

Wednesday, 31 July 2019

जीवन नहीं साध सकते अद्भुत तारें

जीवन नहीं साध सकते अद्भुत तारे
चंद्रभूषण
सितारों का साइज बहुत बड़ा हो सकता है। इतना बड़ा कि उनकी मोटाई सूर्य के इर्द-गिर्द शनि ग्रह की कक्षा जितनी हो जाती है, जिसका साल हमारे 12 वर्षों के बराबर है। सूरज से पृथ्वी तक की दूरी की दस गुनी चौड़ाई वाला तारा बाकायदा प्रेक्षित किया जा चुका है। इसका नाम वाईवी स्कूटी है और यह स्कूटम तारामंडल में स्थित है। इसकी त्रिज्या सूरज की 1708 गुनी है (192 कम या ज्यादा)! इस हिसाब से इसका वजन सूरज का एक अरब गुना तो होना ही चाहिए। लेकिन हकीकत में यह सूरज से महज दस-बारह गुना ज्यादा वजनी है।

इस विसंगति का कारण यह है कि वाईवी स्कूटी एक मरता हुआ तारा है। ज्यादातर तारे मरने से पहले बुरी तरह फूल जाते हैं और फिर भारी विध्वंस के साथ फट कर मर जाते हैं। पीछे एक अजर-अमर सफेद बौने तारे के रूप में अपनी दहकती हुई धुरी छोड़ते हुए। लेकिन आकार के विपरीत तारों के वजन पर भौतिकी की कुछ सख्त सीमाएं लागू होती हैं। कुछ समय पहले तक ऐसा माना जाता था कि किसी भी तारे का वजन हमारे सूरज के डेढ़ सौ गुने से ज्यादा नहीं हो सकता।

यह सीमा पिछले कुछ वर्षों में बुरी तरह टूटी है, हालांकि यह भी कुछ अलग ढंग से मरणशील तारों के साथ ही देखा जा रहा है। अभी तक दर्ज किया गया सबसे वजनी तारा आरएमसी 136 ए-1 है, जो हमारी आकाशगंगा की सैटेलाइट गैलेक्सी लार्ज मैगेलनिक क्लाउड में स्थित है। इसका वजन हमारे सूरज का 315 गुना नापा गया है। किसी अज्ञात कारण से इस गैलेक्सी में कई सारे तारे सूरज के डेढ़ सौ गुने से भी ज्यादा वजनी हैं। लेकिन ये सभी बेहद चमकीले तारे वुल्फ-रायेट श्रेणी में आते हैं, जिनकी खासियत यह होती है कि वे बहुत जल्दी मर जाते हैं।

हमारे सूरज की कुल उम्र लगभग 10 अरब साल मानी जाती है, जिसका आधे से जरा कम हिस्सा यह पार कर चुका है। इसके विपरीत वुल्फ-रायेट श्रेणी के तारे सिर्फ 50 लाख साल जीते हैं और फिर अपने इर्द-गिर्द भारी तत्वों का एक जखीरा बिखेरते हुए फट कर छितरा जाते हैं। सृष्टि के विकास में इन तारों की सबसे बड़ी भूमिका यह है कि ये दुनिया को सिर्फ हाइड्रोजन और हीलियम का अंबार बने रहने से आगे ले जाते हैं। इन गैसों के संलयन (फ्यूजन) को अंजाम देने वाली इन तारों की भट्ठी में ही वह कार्बन बना है, जिससे और चीजों के अलावा सभी जीवधारियों के शरीरों का भी निर्माण हुआ है, जो न सिर्फ इंसानी बल्कि हर तरह की चेतना का आधार हैं।

इन ब्यौरों से एक बात साफ है कि तारे का बहुत बड़ा या वजनी होना उसके स्थायित्व के खिलाफ जाता है। जिंदगी संभाल सकने वाले ग्रह जिन तारों के इर्द-गिर्द खोजे जाते हैं, उनकी उमर चार-पांच अरब साल या इससे ज्यादा होनी चाहिए। कारण यह कि ग्रहों की उम्र तारे से तो कम ही होगी, और कामचलाऊ इवॉल्यूशन के लिए भी तीन-चार अरब साल का वक्त तो मिलना ही चाहिए। इस काम के लिए सूरज से छोटे तारे ज्यादा मुफीद माने जाते हैं क्योंकि अक्सर उन्हें ज्यादा उम्र का वरदान मिला होता है। बहुत बड़े, बहुत चमकीले, बहुत वजनी तारे चमत्कृत करने के लिए ही ठीक हैं। जीवन रचने जैसे महीन काम उनसे नहीं हो पाएंगे।

Wednesday, 24 July 2019

उड़नतश्तरी की मिस्ट्री

Do Aliens n UFO Exist?

UFO का नाम आते ही जेहन में अजब-गजब शक्लों वाले और खास तरह के एक स्पेस क्राफ्ट की शक्ल उभरती है। शायद ही कोई ऐसा हो, जिसने शरीर में झुरझुरी मचा देनेवाले यूएफओ के किस्से सुने-सुनाएं न हों। 2 जुलाई को वर्ल्ड यूएफओ डे पर विजय सिंह ठकुराय तर्क की कसौटी पर कस रहे हैं यूएफओ के किस्सों को:

रात का अंधेरा गहरा रहा है। सोने की कोशिश करते आप बिस्तर पर करवटें बदल रहे हैं। अचानक कमरे में नाइट लैंप रहस्यमय तरीके से बंद हो जाता है। बमुश्किल 3-4 फुट लंबे, अपेक्षाकृत बड़े बाल-रहित सर और बड़ी-बड़ी आंखों वाले कुछ अजीबोगरीब जीवों को आप अचानक अपने कमरे की दीवार से आर-पार गुजरते हुए पाते हैं। वे आपको सोते हुए ही उठाकर कमरे से बाहर निकलते हैं और उड़ते हुए हवा में घूम कर रहे एक तश्तरीनुमा यान में घुस जाते हैं। यान में पहुंचकर आपको एक लैब जैसे कमरे में स्ट्रेचर पर लिटाकर बांध दिया जाता है। आप हिलने-डुलने में असमर्थ होने के कारण उन दूसरे ग्रह के निवासियों को बेबसी से खुद पर टेस्ट करते हुए देखने के अलावा कुछ नहीं कर पाते। मशीनें आपके शरीर, खास तौर पर आपके प्राइवेट पार्ट, की टेस्टिंग कर रही हैं। अगर आप पुरुष हैं तो आपके स्पर्म निकाल लिए जाएंगे। अगर आप स्त्री हैं तो संभावना है कि आपके यूटरस में स्पेशल स्पर्म प्रत्यारोपित कर दिए जाएंगे। ये एलियन अक्सर आप पर उनसे सेक्स संबंध बनाने का दबाव भी डाल सकते हैं। इसके बाद आपको वापस सोते हुए ही अपने कमरे में छोड़ दिया जाएगा। उठकर आप कन्फ्यूज रहेंगे कि जो आपके साथ हुआ, वह हकीकत था या कोई सपना?

दावे फ्लाइंग सॉसर के
उड़़नतश्तरी या फ्लाइंग सॉसर शब्द चलन में तब आया था, जब 24 जून 1947 में अमेरिकी पायलट केनेथ अर्नाल्ड ने वॉशिंगटन में अजीबोगरीब 9 आकृतियों को हवा में अजीब तरीके से उड़ते हुए देखा था। मीडिया द्वारा पूछे गए एक सवाल के जवाब में अर्नाल्ड ने कहा कि ये रहस्यमयी आकृतियां उसी प्रकार हिल रही थीं जिस तरह समुद्र की लहरों में एक तश्तरी हिलती है। अर्नाल्ड की बात को समझे बिना अगले दिनों के अखबार ‘तश्तरीनुमा उड़नयंत्रों’ के वजूद की खबरों से पटे पड़े थे और दुनिया भर में तश्तरीनुमा आकृतियों के देखे जाने की खबर आम बात हो गई थी, बिना यह जाने-समझे कि अर्नाल्ड ने जो देखा, वह कोई तश्तरी नहीं बल्कि पंखों वाली हवाई जहाज जैसी संरचना थी। बाद में इन्हें यूएफओ यानी अनाइडेंटिफाइड फ्लाइंग ऑब्जेक्ट भी कहा जाने लगा। सन 1961 को एक शाम अमेरिकी कपल बैटी तथा बरनै हिल ने दफ्तर से लौटते वक्त पहाड़ों में एक चमकदार चीज देखी, जिससे आतंकित होकर उन्होंने मुख्य रास्ता छोड़ पहाड़ी तंग रास्तों से होते हुए घर पहुंचकर जान बचाई। इस घटना ने हिल दंपती को एलियंस से जुड़े दस्तावेज खंगालने के लिए प्रेरित किया और उनके अंदर यह धारणा मजबूत होती गई कि जो उन्होंने देखा था, वह असल में एक उड़नतश्तरी थी। इस घटना के कुछ दिन बाद बकौल हिल दंपती के, एलियंस ने उनके घर से उनका अपहरण कर लिया और अपने यान में ले गए जहां से बाद में उन्हें वापस घर छोड़ दिया गया और अगले कुछ साल हिल दंपती चर्चा का केंद्र बने रहे। उन पर किताबें लिखी गईं और वे टीवी कार्यक्रमों का हिस्सा बनते रहे। क्या हिल दंपती ने जो देखा, वह हकीकत था? या कोई सपना या मानसिक भ्रम? जो भी है, इतना पक्का है कि इस तरह के दावों के चलते उन्हें मिली प्रसिद्धि ने दुनिया में प्रसिद्ध होने की चाह रखनेवाले लोगों को एक आसान रास्ता दिखा दिया और तब से अब तक हजारों लोग उड़नतश्तरी देखने या एलियंस द्वारा किडनैप होने और खुद पर एलियंस द्वारा यौन प्रयोग करने का दावा कर चुके हैं।

इन सभी दावों पर अगर यकीन किया जाए तो पिछले कुछ दशकों में औसतन हर रोज एलियंस किसी न किसी इंसान के अपहरण को अंजाम दे रहे हैं। पृथ्वी पर सभी देशों की सरकारें, वैज्ञानिक समुदाय या जिम्मेदार संस्थाएं इन एलियंस की मौजूदगी से अनजान हैं या कुछ दावों के अनुसार जानबूझकर देशों की सरकारें आम जनता को एलियंस की हमारे बीच मौजूदगी से अनजान रखना चाहती हैं। ये सारे दावे गले उतरने वाले तो नहीं लगते।
एलियंस द्वारा यौन प्रयोगों के सहारे मानव नस्ल को संवर्धित करने की अफवाहें पिछले कुछ दशकों से पश्चिमी जगत में चर्चा में रही हैं। सवाल यह है कि एलियंस को आखिर हर कुछ रोज पर किसी इंसान के अपहरण करने की इतनी मशक्कत करने की जरूरत क्या है? क्यों नहीं वे किसी इंसान के स्पर्म लेकर जेनेटिक कोड पढ़कर जितनी चाहे, उतनी कॉपी तैयार कर लेते? अत्याधुनिक तकनीक से संपन्न एलियंस के मुकाबले हम इंसान तक कोशिकाओं की क्लोनिंग करने में कामयाब रहे हैं। एलियंस के साथ संपर्क होने का दावा करनेवाले और किसी भी सवाल का जवाब देने का दावा करनेवाले कई इंसानों के साथ वैज्ञानिकों ने घंटों गुजरे हैं ताकि पता लगाया जा सके कि ये अत्याधुनिक एलियंस ब्रह्मांड के विषय में तकनीकी रूप से कितनी जानकारी रखते हैं और नतीजा हमेशा सिर्फ एक आया है। कोई भी सवाल जिसका जवाब एक औसत तकनीकी ज्ञान से ऊपर की जानकारी रखनेवाले शख्स से अपेक्षित है, जवाब में हमेशा एक लंबा सन्नाटा ही मिला है। पर नैतिकता या इंसानी जिम्मेदारियों के सिलसिले में अगर कोई सवाल पूछा जाए जैसे कि ‘क्या हमें मिलजुलकर रहना चाहिए?’ तो तथाकथित एलियंस जवाब देने में कतई संकोच नहीं करते। साफ जाहिर है कि अक्सर ये कथित एलियंस उतना ही जानते हैं, जितना उनसे संपर्क होने का दावा करनेवाला शख्स जानता है।

दिल है कि मानता नहीं
एक बार एक रेस्तरां के बाहर अचानक लोगों की भीड़ लग गई। आसमान में चमकती हुई एक रहस्यमयी चीज को देख लोग तरह-तरह के कयास लगा रहे थे। किस्मत से भीड़ में एक खगोल वैज्ञानिक भी था, जिसने अपनी दूरबीन लाकर उस चमकती हुई चीज को देख कर घोषणा की कि किसी को घबराने की जरूरत नहीं। आसमान में चमकती चीज और कुछ नहीं बल्कि इंसानों द्वारा छोड़ा गया, पृथ्वी के चक्कर लगाता एक सैटलाइट है। इन सैटलाइट्स को अक्सर सूर्योदय या सूर्यास्त के वक्त अनुकूल हालात में चमकता हुआ देखा जा सकता है। खगोल वैज्ञानिक हैरान रह गया, जब उसने लोगों के चेहरे पर एक अजीब-सी मायूसी देखी। वजह पूछने पर जवाब मिला, ‘खाने की टेबल पर बैठकर एक चमकते हुए सैटलाइट के बारे में बात करने में क्या मजा आएगा?’ जबरन रोमांच खोजने के साथ-साथ इंसानी फितरत यह भी है कि वह अनसुलझे सवालों का अपने मन-मुताबिक जवाब खोज लेती है। अक्सर इंसान आसमान में चमकती हुई किसी चीज को देख रोमांचित होकर यूएफओ चिल्लाते हैं। जो आपको मालूम ही नहीं है, उसे किसी दूसरी गैलक्सी से आया यूएफओ समझ लेना कहां की समझदारी है? क्यों हम यह जानने की कोशिश नहीं करते कि आसमान में चमकती चीजें असल में असामान्य स्थितियों में चमकते नजदीकी ग्रह, सूरज की रोशनी के कारण चमकते गोलाकार बादल, वायुमंडल में प्रवेश करनेवाले धूमकेतु, उल्कापिंडों के टुकड़े तथा रॉकेट बूस्टर्स आदि दर्जन भर कारण हो सकते हैं।

कहीं यह दिमागी लोचा तो नहीं
भूख, प्यास, नींद, डिप्रेशन, ब्रेन डिसऑर्डर और लोकप्रियता की भूख के कारण अक्सर लोगों को मानसिक भ्रम हो जाता है। क्या कारण है कि एलियंस द्वारा मानवों को अक्सर उनकी नींद से उठाकर ही किडनैप किया जाता है? मानसिक भ्रम समय और काल की सीमाओं से परे हर समाज के अनिवार्य अंग रहे हैं। लोगों की अपेक्षाओं के अनुरूप ये मानसिक भ्रम किसी को भूत-प्रेतों का दर्शन कराते हैं तो किसी को ईश्वर के फरिश्तों का तो किसी को एलियंस का। अगर आपने किसी रहस्याकृति, रोशनी, एलियन आदि किसी चीज का साक्षात्कार किया है तो यह फैसला कैसे हो कि जो आपने देखा, वह आपका मानसिक भ्रम नहीं है? विज्ञान आपके निजी अनुभवों पर यकीन नहीं करता। वह ठोस सबूत मांगता है और आजकल दुनिया में जब दर्जनों फोटोशॉप सॉफ्टवेयर ‘Add UFO’ बटन की सुविधा देते हैं तो बेशक आपका सबूत एक फोटोग्राफ से बढ़कर होना चाहिए। एलियंस के वजूद का सवाल हमारे जमाने का सबसे असाधारण सवाल है और गौरतलब है कि असाधारण सवालों के जवाब देते वक्त पेश सबूत भी असाधारण ही होने चाहिए।

एरिया 51 की पहेली
अक्सर इंटरनेट पर नासा या दूसरी संस्थाओं के हवाले से एलियंस के अस्तित्व की पुष्टि की जाती रही है। अमेरिका द्वारा एरिया 51 में एलियंस को रखने की खबरों को हम अक्सर गॉसिपिंग साइट्स पर पढ़ते रहते हैं। देखा जाए तो ये सभी हवाई खबरें हैं। हकीकत से इनका कोई नाता नहीं है। विज्ञान एलियंस की मौजूदगी की संभावना से इनकार नहीं करता और खुद एलियन सभ्यताओं को खोज निकालने के लिए जुटा है। 16 नवंबर 1974 में नासा साइंटिस्ट कार्ल सगन और उनकी टीम ने M13 स्टार क्लस्टर की तरफ रेडियो वेव्स के रूप में मानव डीएनए, सौरमंडल का नक्शा, गणित में कुछ अंक यानी मानवता से जुड़ी कुछ बेसिक जानकारियां भेजी थीं। इस रेडियो वेव्स रूपी मेसेज को M13 तक प्रकाश गति से चलने के बावजूद पहुंचने में 25 हजार साल का समय लगेगा। अगर कोई एलियन सभ्यता वहां है और हमारे संदेशों को पकड़कर हमें जवाब भेजती है तो उनके जवाब अगले 25 हजार साल में हम तक पहुंच पाएंगे। तब तक क्या हम अपना अस्तित्व सुरक्षित रख पाएंगे? असल में ब्रह्मांड की अद्भुत विराटता दूसरी आकाशगंगाओं में कथित रूप से मौजूद एलियन सभ्यताओं से हमारे संपर्क में सबसे बड़ी चुनौती है। आज हमारे सबसे तेज चलनेवाले स्पेसशिप द्वारा भी अगर हम अपने सबसे नजदीक मौजूद तारे प्रोक्सिमा सेंचुरी पर जाने की सोचें तो यह एकतरफा यात्रा 19 हजार साल लंबी होगी। लाइट की स्पीड से संदेश भेजना भी ब्रह्मांड की विशालता के सामने नाकाफी है और गैलक्सीज के बीच संदेश के लेन-देन में भी इतनी वक्त लगेगा, जितने वक्त में न जाने कितनी सभ्यताएं पैदा होकर काल के ग्रास में समा जाती हैं।

स्पेस में धरती से संदेश
इस समय मानवता द्वारा प्रक्षेपित 5 स्पेसशिप (Pioneer 10-11, Voyager 1-2, New Horizons) सौरमंडल की सीमाओं को पार कर बाहरी ब्रह्मांड में कदम रख चुके हैं। इन सभी स्पेसशिप में हमने मानवता से संबंधित कई रेकॉर्ड्स रखे हैं। इनमें 5 सितम्बर 1977 को प्रक्षेपित और 40 साल से लगातार यात्रा कर रहा और वर्तमान में हमसे लगभग 21 अरब किलोमीटर दूर पहुच चुके यान वॉयेजर-प्रथम पर वैज्ञानिकों ने एक गोल्डन डिस्क छोड़ी है, जिसमें मानव सभ्यता से संबंधित 115 फोटोज, संगीत, हमसे जुड़ी कुछ बेसिक जानकारी और हमारी गैलक्सी का ज्ञात नक्शा भी अटैच है। कुछ और साल तक वॉयेजर में लगे प्लूटोनियम आधारित एनर्जी प्लांट कम्युनिकेशन के लिए उसे जरूरी ऊर्जा देता रहेगा। कुछ साल बाद वॉयेजर से हमारा संपर्क टूट जाएगा और वॉयेजर लगभग 40,000 किलोमीटर/घंटा की चाल से ब्रह्मांड में अपना सफर लगातार जारी रखेगा, जब तक कि कोई चीज टकरा कर इसे रोक नही देती। अगले कुछ लाख या करोड़ों सालो में वॉयेजर की यह यात्रा उसे ना जाने कितने सितारों के करीब ले जाएगी। उम्मीद है, एक दिन सुदूर ब्रह्मांड में मौजूद कोई एलियन सभ्यता वॉयेजर को ढूंढकर उसमें मौजूद रेकॉर्ड्स को देख और समझ पाए और एक दिन जान पाए कि सुदूर ब्रह्मांड के किसी कोने में हम इंसान रहते हैं या रहते थे।
साभार नवभारत टाइम्स