Saturday, 17 February 2018

अंतरिक्ष में निजी क्षेत्र

अंतरिक्ष उद्योग देश में सेवाओं, निर्माण तथा रोजगार में नए सिरे से दम भरने के लिए अगली क्रांति साबित हो सकता है

धरती के अलावा किसी दूसरे ग्रहों पर इंसानों के बसने की संभावनाओं का पता लगाने के काम में छह फरवरी को उस वक्त एक नया मोड़ आया जब प्राइवेट कंपनी स्पेस एक्स के फाल्कन हैवी राकेट को सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में भेज दिया गया। स्पेस एक्स का काम यह पता लगाना है कि अंतरिक्ष के दूसरे ग्रहों पर इंसानों को बसाया जा सकता है या नहीं, खासतौर पर मंगल ग्रह पर। इसके अलावा इसका मकसद अंतरिक्ष की खोज और स्पेस ट्रेवल के कम लागत मगर प्रभावी तौर तरीकों का पता लगाना है। फाल्कन हैवी ने मनुष्यों की इस पुरानी ख्वाहिश को एक कदम और आगे ला दिया है।1जब से अंतरिक्ष के बारे में पता लगाने के काम की शुरुआत हुई है उसके बाद से, केवल संयुक्त राज्य अमेरिका की नेशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (नासा) जैसी सरकारी एजेंसियों का ही इसमें बोलबाला रहा है। फाल्कन हैवी का लांच बहुत ही अहम है, क्योंकि यह अंतरिक्ष में निजी क्षेत्र की अगुआई वाली कोशिशों के लिए भविष्य दिखाने वाले चिराग की तरह है। अंतरिक्ष ही वास्तव में वह जगह रह गई है जहां खोज के काम अभी बाकी है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) नासा के बाद ग्यारह साल बाद बना, लेकिन देश की वित्तीय सीमाओं के चलते हम नासा जैसा प्रदर्शन हासिल नहीं कर सके। फिर भी उन बहुत कम सीमाओं के कारण हम मजबूर हुए कि प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए हम कम लागत वाले तरीकों को खोजें। मार्स ऑर्बिटर मिशन से इस बात को समझा जा सकता है। तकनीकी कमियों पर काबू पाने और रिकॉर्ड कम बजट पर काम करने के लिए इसरो ने होमैन स्थानांतरण कक्षा के तरीके का इस्तेमाल किया, जिसे स्लिंगशॉट विधि के रूप में जाना जाता है। इसके लिए मंगलयान को मंगल की तरफ भेजने में जरूरी स्पीड हासिल करने के लिए पहले धरती के चारों ओर कक्षा में छह बार चक्कर लगाने पड़े। मुङो इसकी कोई वजह नहीं लगती कि भारत में स्पेस एक्स जैसी कंपनियों को खड़ा नहीं किया जा सकता। इसकी मदद से देश को रिसर्च हब के रूप में ढाला जा सकता है। स्पेस एक्स केवल शुरुआत है। हम अगले कुछ दशकों में अंतरिक्ष में खोज के लिए बड़े पैमाने पर उद्योगों को आगे आता देख सकते हैं। हम देखेंगे कि किस तरह ग्रहों को उपनिवेश बनाने से लेकर क्षुद्रग्रहों पर डिलिंग का काम होने लगा है। अब वक्त आ गया है कि भारत इन कुछ इनोवेंशस की अगुआई करके अंतरिक्ष उद्योग में अहम खिलाड़ी बन कर उभरे। हमारे एयरोनॉटिकल और एयरोस्पेस इंजीनियरों और वैज्ञानिकों की प्रतिभावान टीम में इनोवेंशस को बढ़ावा देने की क्षमता है। 1इस बढ़ते बाजार का लाभ लेने के लिए कुछ पहल भारत में हो चुकी हैं। इसरो एक बेहतरीन अंतरिक्ष कार्यक्रम चला रहा है। कई भारतीय स्टार्ट-अप इस बाजार में प्रवेश करने की कोशिश कर रहे हैं। और पहली बार निजी क्षेत्र स्पेस में खोज और स्पेस ट्रेवल के काम में आगे आने को तैयार हैं। अब कोडर्स और आइटी के लोगों की जगह धीरे-धीरे आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस ले रही है। ऐसे में अंतरिक्ष उद्योग देश में सेवाओं, निर्माण और रोजगार में नए सिरे से दम भरने के लिए अगली क्रांति साबित हो सकता है।

Saturday, 10 February 2018

क्यों पिछड़ जाते हैं हमारे विश्वविद्यालय

हरिवंश चतुर्वेदी, निदेशक, बिमटेक
वर्ष 2018 के लिए जो एशिया यूनिवर्सिटी रैंकिंग सूची जारी हुई है, उससे भारत के लिए कुछ सुखद संकेत मिले हैं। 350 विश्वविद्यालयों की इस सूची में भारत के 42 विश्वविद्यालयों को इस बार स्थान मिला है। यह रैंकिंग जिन 13 आधार पर की गई है, उनमें 12 पर भारतीय विश्वविद्यालयों ने अपनी स्थिति बेहतर बनाई है। विश्व स्तर पर विश्वविद्यालयों की रैंकिंग ऐसा मुद्दा है, जिसके भारत जैसे विकासशील देशों को होने वाले नफा-नुकसान पर बहुत तीखी बहस होती है। विश्व स्तर पर इन रैंकिंग को चलाने वाली एजेंसियों में तीन प्रमुख हैं - टाइम्स हायर एजुकेशन, शंघाई जियोटांग यूनिवर्सिटी और क्विकरैली साइमंड्स (क्यूएस)। ये तीनों एजेंसियां विश्व के श्रेष्ठतम 500 से 1000 विश्वविद्यालयों की रैंकिंग हर साल जारी करती हैं। अक्सर इन रैंकिंग में भारतीय विश्वविद्यालयों की अनुपस्थिति से हमारी उच्च शिक्षा के बारे में निराशा का दौर शुरू हो जाता है।
टाइम्स की एशिया यूनिवर्सिटी रैंकिंग छह साल पहले शुरू की गई थी। इस रैंकिंग में पिछले दो वर्षों की तरह इस बार भी नेशनल यूनिवर्सिटी, सिंगापुर को एशिया में प्रथम स्थान मिला है। चीन की शिंहुआ यूनिवर्सिटी दूसरे नंबर पर और पीकिंग यूनिवर्सिटी तीसरे नंबर पर आई हैं। क्या कारण है कि चीन के विश्वविद्यालय, जो 1950 तक भारतीय विश्वविद्यालयों से पीछे थे, 21वीं सदी में काफी आगे निकल गए? क्या भारतीय विश्वविद्यालयों में अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग के लिए जरूरी मानकों के प्रति जागरूकता का अभाव है? क्या हमारी उच्च शिक्षा सिर्फ कक्षा और परीक्षा तक सिमटकर रह गई है, और शोध व अनुसंधान में हम फिसड्डी बनते जा रहे हैं?
रैंकिंग में भारत और चीन की तुलनात्मक स्थिति का अध्ययन करें, तो वे कारण मालूम पड़ सकते हैं, जो चीन की तुलना में भारतीय विश्वविद्यालयों की खराब स्थिति के लिए उत्तरदायी ठहराए जा सकते हैं। यह रैंकिंग सूची 13 मानकों के आधार पर तैयार की जाती है, जो मोटे तौर पर शिक्षण, रिसर्च, रिसर्च की उत्पादकता, अंतरराष्ट्रीयकरण और यूनिवर्सिटी को उद्योगों से ज्ञान के हस्तांतरण से होने वाली आय से जुड़े हैं। इस रैंकिंग में शिक्षण या सीखने के वातावरण को 25 प्रतिशत अंक दिए जाते हैं। एशिया यूनिवर्सिटी रैंकिंग, 2018 में रिसर्च को 30 प्रतिशत अंक दिए गए हैं, जो क्लास रूम टीचिंग से ज्यादा है। इसमें 15 प्रतिशत अंक इस तथ्य को दिए गए हैं कि रिसर्च की ख्याति कैसी है? रिसर्च की उत्पादकता और उससे होने वाली आय को शेष 15 प्रतिशत अंक दिए गए हैं। भारतीय विश्वविद्यालयों के पिछड़ेपन का एक मुख्य कारण प्रकाशित शोध-पत्रों का अच्छा साइटेशन न होना है। यानी प्रकाशित शोध-पत्र को विश्व स्तर पर कितनी बार दूसरे शोधकार्यों में उद्धृत किया जाता है। साइटेशन के मानक को रैंकिंग में 30 प्रतिशत अंक दिए गए हैं। इस रैंकिंग में चौथा मानक अंतरराष्ट्रीयकरण था, जिसे 7़5 प्रतिशत अंक दिए गए थे।
भारतीय विश्वविद्यालयों को यह सोचना चाहिए कि आखिरकार वे क्या कारण हैं कि शिक्षाविद्, शिक्षक और शोध-छात्र विश्वस्तरीय रिसर्च नहीं कर पा रहे हैं? क्या हमारे शिक्षक, शोध-छात्र, प्रयोगशालाएं और पुस्तकालय विश्वस्तरीय अनुसंधानों को संचालित करने के लिए सक्षम हैं? क्या विश्वस्तरीय शोध-कार्यों के लिए केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा विश्वविद्यालयों को समुचित वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराए जाते हैं? क्या हमारे विद्यार्थियों और शिक्षकों के समुदायों में देश-विदेश का समुचित प्रतिनिधित्व रहता है या हम क्षेत्रीयतावाद के शिकार हैं? क्या हम विश्वस्तरीय सम्मेलनों और कार्यशालाओं में अपने शिक्षकों व शोध-छात्रों को समुचित संख्या में भेज पाते हैं? इन सवालों के ठोस हल ढूंढ़े बिना भारतीय विश्वविद्यालयों से विश्वस्तरीय प्रतिष्ठा या रैंकिंग पाने की अपेक्षा करना बेमानी होगा।
उच्च शिक्षा पर शोध के लिए विख्यात विद्वान फिलिप एल्टबाग के अनुसार, भारत जैसे देशों को विश्वव्यापी ज्ञानाधारित अर्थव्यवस्था में अपनी हिस्सेदारी के लिए कुछ विश्वविद्यालयों को शोध-विश्वविद्यालय का दर्जा देना होगा। उनका कहना है कि अमेरिका, जर्मनी व जापान की औद्योगिक अर्थव्यवस्थाओं की सफलता का राज विश्वविद्यालयों के संचालन का हुम्बोल्ट मॉडल है। इस मॉडल के विश्वविद्यालयों में भारी आर्थिक विनियोग की जरूरत होती है, जो निजी विश्वविद्यालय नहीं कर सकते। हुम्बोल्ट मॉडल के विश्वविद्यालय नियुक्तियों में भाई-भतीजावाद की बजाय मैरिटोक्रेसी के सिद्धांत का अक्षरश: पालन करते हैं। 
पिछले दशक में भारत की उच्च शिक्षा को विश्वस्तरीय बनाने के लिए राष्ट्रीय स्तर बनी अनेक कमेटियों और राष्ट्रीय ज्ञान आयोग ने हुम्बोल्ट मॉडल पर कुछ शोध-केंद्रित विश्वविद्यालय स्थापित करने के सुझाव दिए थे। वर्ष 2016 के केंद्रीय बजट में 20 वल्र्डक्लास यूनिवर्सिटी स्थापित करने की घोषणा की गई थी। पिछले साल मानव संसाधन मंत्रालय की सिफारिश पर केंद्रीय मंत्रिमंडल से इसके नए रेग्यूलेशंस को स्वीकृति मिली है। इनका नाम अब वल्र्डक्लास यूनिवर्सिटी से बदलकर ‘इंस्टीट्यूट ऑफ ऐमीनेंस’ कर दिया गया है। आवेदनकर्ता विश्वविद्यालयों में कम से कम 15 हजार विद्यार्थी पढ़ रहे हों और शिक्षक व विद्यार्थी का अनुपात 1:15 हो। इन संस्थानों को यूजीसी के शिकंजे से मुक्त कर अधिकतम स्वायत्तता दी जाएगी। फिलहाल 100 से अधिक विश्वविद्यालय और संस्थानों ने इसके लिए मानव संसाधन मंत्रालय में आवेदन किए हैं। 
वर्ष 2016 में भारतीय विश्वविद्यालयों की ग्लोबल रैंकिंग को सुधारने के लिए ‘एनआईआरएफ’ के नाम से एक राष्ट्रीय रैंकिंग शुरू की गई थी, जिसमें शोध व अनुसंधान पर काफी जोर दिया गया था। वर्ष 2018 के केंद्रीय बजट में भी ‘प्रधानमंत्री रिसर्च फैलोज’ योजना घोषित की गई है। ये प्रयास सराहनीय हैं, पर उच्च शिक्षा को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाए बिना और उस पर सकल राष्ट्रीय आय का कम से कम दो प्रतिशत खर्च किए बिना नया भारत बनाने के सपने को देखना व्यर्थ होगा। वर्ष 2018-19 के बजट से यह उम्मीद पूरी नहीं हुई है। सकल राष्ट्रीय उत्पाद से शिक्षा के खर्चों का प्रतिशत भी 3़1 प्रतिशत से घटकर 2.7 प्रतिशत रह गया है।

Monday, 5 February 2018

दूसरी आकाशगंगा में ग्रहों के प्रमाण

साइंस पत्रिका में प्रकाशित इस खोज से ब्रrांड के इतिहास के मूल सिद्धांत की बुनियाद हिल सकती है जिसे अभी तक कोई चुनौती नहीं मिली थी

मुकुल व्यास 
खगोल वैज्ञानिकों ने पहली बार हमारी मिल्कीवे आकाशगंगा के बाहर ग्रहों की आबादी का पता लगाया है। उन्होंने यह खोज माइक्रोलेंसिंगके जरिये की है। माइक्रोलेंसिंग एक खगोलीय प्रक्रिया है जो पृथ्वी से बहुत दूर स्थित ग्रहों को खोजने के लिए एक कुदरती दूरबीन का काम करती है। अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ ओकलहोमा के शोधार्थियों ने माइक्रोलेंसिंग के जरिये दूसरी आकाशगंगाओं में खगोलीय पिंडों की मौजूदगी का पता लगाया है, जिनका द्रव्यमान चंद्रमा और बृहस्पति के द्रव्यमानों के बराबर है। यूनिवर्सिटी के भौतिकी और खगोल विज्ञान विभाग के प्रोफेसर शिन्यु दाई ने नासा की चंद्र एक्स-रे ऑब्जर्वेटरी से प्राप्त आंकड़ों के विश्लेषण के बाद इन ग्रहों की खोज की है। 1चंद्र एक्स-रे ऑब्जर्वेटरी अंतरिक्ष में तैनात दूरबीन है जो स्मिथसोनियन एस्ट्रोफिजिकल ऑब्जर्वेटरी द्वारा नियंत्रित की जाती है। दाई ने कहा, हम इस खोज से बेहद रोमांचित है। यह पहला अवसर है जब किसी ने हमारी आकाशगंगा के बाहर ग्रहों की उपस्थिति का पता लगाया है। इस अध्ययन से पहले दूसरी आकाशगंगाओं में ग्रहों के मौजूद होने का कोई प्रमाण नहीं मिला था। माइक्रोलेंसिंग के जरिये मिल्कीवे आकाशगंगा में अक्सर नए ग्रहों की खोज होती है। छोटे-छोटे खगोलीय पिंडों के गुरुत्वाकर्षण प्रभाव से पृष्ठभूमि की चीजें कई गुणा बड़ी दिखने लगती हैं। इस कुदरती मैग्निफाइंग ग्लास का उपयोग सुदूरवर्ती वस्तुओं के अवलोकन के लिए किया जा सकता है। जिस आकाशगंगा में नए ग्रहों की उपस्थिति का पता चला है वह पृथ्वी से 3.8 अरब वर्ष दूर है और पृथ्वी के सबसे उत्कृष्ट टेलीस्कोप से भी इन ग्रहों का प्रत्यक्ष अवलोकन नहीं किया जा सकता। अत: खगोलीय पर्ववेक्षण के लिए माइक्रोलेंसिंग से बेहतर और कोई तकनीक नहीं है। 1इस बीच, अंतरराष्ट्रीय खगोल वैज्ञानिकों के अन्य दल ने पृथ्वी से करीब 1.3 करोड़ प्रकाश वर्ष दूर सेंटारस ए आकाशगंगा के इर्दगिर्द छोटी आकाशगंगाओं का पता लगाया है जो अपनी मूल आकाशगंगा के चारों तरफ एक डिस्क की भांति व्यवस्थित ढंग से चक्कर काट रही हैं। साइंस पत्रिका में प्रकाशित इस खोज से ब्रrांड के इतिहास के मूल सिद्धांत की बुनियाद हिल सकती है जो पिछले दो दशकों से निर्विवाद था। 1विज्ञान के स्टैंडर्ड मॉडल के मुताबिक ब्रrांड का करीब एक-पांचवां हिस्सा अदृश्य पदार्थ अथवा डार्क मैटर से बना है। इस मॉडल के अनुसार अधिकांश छोटी आकाशगंगाओं को अपनी मेजबान आकाशगंगाओं की अनियमित तरीके से परिक्रमा करनी चाहिए, लेकिन कुछ वर्ष पहले खगोल वैज्ञानिकों ने पता लगाया था कि मिल्कीवे और पड़ोसी एंड्रोमेडा आकाशगंगा के इर्दगिर्द छोटी आकाशगंगाएं भी एक सीध में परिक्रमा कर रही हैं। खगोल वैज्ञानिकों की टीम के सदस्य हेल्मुट जर्जेन ने बताया कि खगोल वैज्ञानिकों ने पहले यह सोचा था कि ये दो बड़ी आकाश गंगाएं अपवाद हो सकती हैं। अब ऐसा लगता है कि हमारी मिल्कीवे आकाशगंगा और एंड्रोमेडा आकाशगंगा सामान्य आकाश गंगाएं हैं। एक बड़ी आकाशगंगा के चारों तरफ चक्कर काटने वाली आकाश गंगाएं सर्वत्र मौजूद हैं।

Wednesday, 17 January 2018

साल 2017 में इसरो ,भावी मिशन और इसरो की चुनौतियाँ


साल 2017 इसरो के लिए कैसा रहा और आगे 2018 में उसके क्या भावी मिशन है ,भविष्य में क्या
 चुनौतियाँ है उसके लिए ,इस पर एक खास रिपोर्ट 

शशांक द्विवेदी
डिप्टी डायरेक्टर, मेवाड़ यूनिवर्सिटी ,राजस्थान 

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के लिए 2017 एक के बाद एक कई उपलब्धियों वाला साल रहा। फरवरी में उसने एक साथ 104 उपग्रहों का प्रक्षेपण कर नया इतिहास रचा तो 24 साल में पहली बार पीएसएलवी का कोई मिशन विफल रहने से कुछ चिंताएं भी उभरीं।  साल की शुरुआत धमाकेदार रही
104 उपग्रह छोड़कर बनाया विश्व कीर्तिमान
इसरो ने 15 फरवरी को एक साथ एक मिशन में और एक ही प्रक्षेपणयान से 104 उपग्रह छोड़कर विश्व कीर्तिमान बना दिया। इससे पहले उसने पिछले साल एक साथ 20 उपग्रहों का प्रक्षेपण किया था। दुनिया के किसी अन्य देश ने अब तक एक साथ 100 उपग्रह अंतरिक्ष में नहीं भेजे हैं। इसमें कार्टोसैट-2 मुख्य उपग्रह था जबकि 101 विदेशी समेत कुल 103 छोटे एवं सूक्ष्म उपग्रह थे। इस मिशन में सबसे चुनौतीपूर्ण काम था सभी उपग्रहों को इस प्रकार उनकी कक्षा में स्थापित करना कि वे एक-दूसरे से न टकराएं। इसरो ने इस काम को बखूबी अंजाम देकर यह साबित कर दिया कि उपग्रह प्रक्षेपण में उसने महारत हासिल कर ली है। इस मिशन से वैश्विक स्तर पर वाणिज्यिक प्रक्षेपण में उसकी साख और मजबूत हुई है तथा भविष्य में इस मद से देश के विदेशी मुद्रा अर्जन में तेजी आयेगी।
जीएसएलवी एमके-3 डी-1 का किया सफल प्रक्षेपण
05 जून, 2017 को इसरो ने जीएसएलवी प्रक्षेपण यान के अगले संस्करण जीएसएलवी एमके-3 डी-1 का सफल प्रक्षेपण किया। इस यान से 3,136 टन वजन वाले जीसैट-19 उपग्रह का प्रक्षेपण किया गया। इसरो द्वारा छोड़ा गया यह अब तक का सबसे भारी उपग्रह है। इस मिशन की सफलता के साथ ही भारत ने चार टन तक के वजन वाले उपग्रह को भूस्थैतिक कक्षा में स्थापित करने की दक्षता प्राप्त कर ली है। इससे पहले दो टन या इससे ज्यादा वजन के उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए हम विदेशों पर निर्भर थे।  इसरो ने 23 जून को एक साथ 31 उपग्रहों का प्रक्षेपण कर एक बार फिर साबित कर दिया कि वह एक साथ कई उपग्रह छोडऩे में अपना कौशल तथा अनुभव बढ़ाता जा रहा है। भारत ने अंतरिक्ष विज्ञान में अपनी सफलता के जश्न में पड़ोसी देशों को भी शामिल करते हुए 05 मई को दक्षेस देशों का साझा उपग्रह साउथ एशिया सैटेलाइट जीसैट-9 लांच किया। यह जीएसएलवी की लगातार चौथी सफल उड़ान रही। इसरो का कहना है कि अब जीएसएलवी भी लगातार सफल प्रक्षेपण करते हुए विश्वसनीय प्रक्षेपण यानों की श्रेणी में शामिल हो चुका है।
पीएसएलवी के 41वें मिशन ने इसरो को दिया झटका
लगातार 24 साल तक बिना किसी विफलता के अचूक प्रक्षेपण यान के रूप में स्वयं को स्थापित कर चुके पीएसएलवी के 41वें मिशन ने इसरो के विश्वास को इस साल बड़ा झटका दिया। पीएसएलवी सी-39 ने 31 अगस्त को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से उड़ान भरी। इस मिशन के जरिए नेविगेशन उपग्रह आईआरएनएसएस-1एच को उप-भू स्थैतिक कक्षा में स्थापित किया जाना था। यह प्रक्षेपण विफल रहा। इसरो ने बताया कि शाम सात बजे प्रक्षेपण यान ने उड़ान भरी थी। प्रक्षेपण पूरी तरह योजना के अनुसार रही, लेकिन इसका हीट शील्ड प्रक्षेपण यान से अलग नहीं हो सका। इस कारण अंतरिक्ष में पहुंचकर उपग्रह हीट शील्ड के अंदर ही प्रक्षेपण यान से अलग हुआ। इसरो का कहना है कि वह हीट शील्ड के अलग नहीं होने के कारणों का विस्तृत विश्लेषण कर रहा है। इस विफलता के बाद इसरो ने साल के आखिरी चार महीने में किसी भी मिशन को अंजाम नहीं दिया है। पीएसएलवी की 20 सितंबर 1993 के बाद की यह पहली विफलता है
इसरो ने इस साल दिया सात मिशन को अंजाम
इस साल इसरो ने कुल सात मिशन को अंजाम दिया जिनमें से छह सफल रहे। इसके अलावा जीसैट-17 का प्रक्षेपण एरियन-5 वीए-238 से किया गया। साल के दौरान जीसैट-17 समेत इसरो ने उसके अपने आठ और 130 विदेशी उपग्रह छोड़े। इसमें आईआरएनएसएस-1एच का प्रक्षेपण विफल रहा।  आने वाले वर्ष में इसरो ने अपने प्रक्षेपणों की सालाना संख्या बढ़ाने का लक्ष्य रखा है। साथ ही उसने चंद्रयान-2 की भी तैयारी की है जिसका प्रक्षेपण मार्च 2018 तक होने की उम्मीद है।
इसरो के भविष्य के मिशन
मंगल यान और चंद्रयान -1 की सफलता के साथ साथ  अंतरिक्ष में प्रक्षेपण का शतक लगाने के बाद इसरो  कुछ और महत्वपूर्ण मिशनों पर कार्य तेज करने जा रहा है। इनमें पहला कदम है साल 2018 की पहली तिमाही में दुसरे चन्द्र अभियान को कार्यान्वित करते हुए चंद्रमा की सतह पर एक रोवर उतारना ,दूसरा मिशन है मानवयुक्त अंतरिक्ष अभियान यानि अंतरिक्ष में मानव मिशन भेजना । और  तीसरा  मिशन सूर्य के अध्ययन के लिए आदित्य उपग्रह का प्रक्षेपण करना है। मंगल की कक्षा में सफलतापूर्वक मंगलयान के पहुंचने के बाद इसरो के वैज्ञानिक सभी भविष्य के अभियानों की सफलता को लेकर काफी आश्वस्त हैं।
दूसरें चंद्र अभियान की तैयारी में इसरो
अंतरिक्ष तकनीक में कामयाबी की एक नई कहानी लिखने के लिए भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) साल 2018 की पहली तिमाही में बड़े मानवरहित अभियान के तहत चंद्रमा पर दूसरा मिशन 'चंद्रयान-2' भेजने जा रहा है। इसरो के चेयरमैन एस किरण कुमार के अनुसार चंद्रमा की धरती पर स्पेसक्रॉफ्ट की लैंडिंग को लेकर परीक्षण चल रहा है और अगले साल 2018 तक चंद्रयान-2 अभियान लॉन्च हो जाने की उम्मीद है। इसरो इसके लिए एक विशेष इंजन विकसित करेगा जो लैंडिंग को कंट्रोल कर सके। फिलहाल इसका अभ्यास किया जा रहा है जिसके लिए चंद्रमा की सतह जैसी आकृति और वातावरण बनाकर प्रयोग जारी है। फिलहाल इस अभियान को लेकर कई तरह के परीक्षण इसरो कर रहा है और चंद्रमा के लिए जाने वाला सैटेलाइट भी तैयार है। चंद्रयान-2 नई तकनीकी से तैयार किया गया है जो चंद्रयान-1 से काफी एंडवांस है और इसको जीएसएलवी-एमके-2 के जरिए लॉन्च किया जाएगा।  गौरतलब है कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 2003 में भारत की ओर से चंद्रयान-1 अभियान की घोषणा की थी और इसे 2008 में भेजा गया था ।  भारत की ओर से चंद्रमा के लिए यह पहला सफल अभियान था ।
भारत पिछले कई वर्षो से रूस के सहयोग से इस अभियान को अंजाम तक पहुंचाने में जुटा था, लेकिन रूस से समय सीमा के अंदर तकनीकी सहयोग नहीं मिल पाने के कारण अब इस अभियान में भारत पूरी तरह से अपनी स्वदेशी तकनीक का प्रयोग करेगा। पहले यह अभियान इसरो और रूसी अंतरिक्ष एजेंसी (रोसकोसमोस) द्वारा संयुक्त रूप से किया जाना था जिसमें तय किया गया था कि ऑर्बिटर तथा रोवर की मुख्य जिम्मेदारी इसरो की होगी तथा रोसकोसमोस लैंडर के लिए जिम्मेदार होगा। लेकिन अब यह पूरा अभियान इसरो ही संभालेगा। जिसमें आर्बिटर ,रोवर तथा लैंडर तीनों ही इसरो डिजाइन करेगा ।
इसरो का मानवयुक्त अंतरिक्ष कार्यक्रम
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) इतिहास रचने के लिए एक और कदम बढ़ाने जा रहा है। 05 जून, 2017 को इसरो ने अपने सबसे भारी रॉकेट जीएसएलवी मार्क-3 को सफ़ल प्रक्षेपण कर बड़ी कामयाबी हासिल की थी  । इसरो द्वारा निर्मित यह अब तक का सबसे वजनी सेटेलाईट है, जिसका वजन 3,136 किलो है। इस सेटेलाईट की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे और रॉकेट के मुख्य और सबसे बड़े क्रायोजेनिक इंजन को इसरो के वैज्ञानिकों ने भारत में ही विकसित किया है। खास बात यह है कि इसके सफल प्रक्षेपण से भारत मानवयुक्त अंतरिक्ष अभियान करनें में सक्षम हो गया है ।
जीएसएलवी मार्क-3 की सफलता के बाद इसरो का इंसान को अंतरिक्ष में भेजने का सपना कर पायेगा । अभी अमेरिका और रूस ही अपने दम पर स्पेस में इंसान को भेज पाए हैं। मार्क-3 के साथ भेजे गए क्रू मॉड्यूल के सफल टेस्ट से भारत को उम्मीदें बंधी हैं। चंद्रयान-1 और मंगल यान की कामयाबी के बाद भारत की निगाहें अब आउटर स्पेस पर हैं। इसरो ग्रहों की तलाश और उनके व्यापक अध्ययन के लिए मानव युक्त अंतरिक्ष मिशन भेजने की योजना बना रहा है। मानव स्पेसफ्लाइट कार्यक्रम का उद्देश्य पृथ्वी की निचली कक्षा के लिए दो में से एक चालक दल को ले जाने और पृथ्वी पर एक पूर्व निर्धारित गंतव्य के लिए सुरक्षित रूप से उन्हें वापस जाने के लिए एक मानव अंतरिक्ष मिशन शुरू करने की है कार्यक्रम इसरो द्वारा तय चरणों में लागू करने का प्रस्ताव है वर्तमान में, पूर्व परियोजना गतिविधियों क्रू मॉड्यूल ,पर्यावरण नियंत्रण और लाइफ सपोर्ट सिस्टम, क्रू एस्केप सिस्टम, आदि महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों के विकास पर इसरो काम कर रहा हैयोजना के अनुसार अंतरिक्ष में जाने वाली इसरो की पहली मानव फ्लाईट में दो यात्री होंगे। फ़िलहाल यह फ्लाईट अंतरिक्ष में सौ से नौ सौ किलोमीटर ऊपर तक ले जाने की योजना है  ।


इसरो का 'आदित्य'
मार्स मिशन के बाद सन मिशन
मंगल अभियान और चंद्रयान 1 की सफ़लता के बाद इसरो के वैज्ञानिको अब सन मिशन की तैयारी कर रहें है सूर्य कॅरोना का अध्ययन एवं धरती पर इलेक्ट्रॉनिक संचार में व्यवधान पैदा करने वाली सौर-लपटों की जानकारी हासिल करने के लिए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) आदित्य-1 उपग्रह छोड़ेगा। इसका प्रक्षेपण वर्ष 2012-13 में होना था मगर अब इसरो ने इसका नया प्रक्षेपण कार्यक्रम तैयार किया है।.
आदित्य-1 उपग्रह  सोलर ' कॅरोनोग्राफ’ यन्त्र की मदद से सूर्य के सबसे भारी भाग का अध्यन करेगा। इससे कॉस्मिक किरणों, सौर आंधी, और विकिरण के अध्यन में मदद मिलेगी। 
 अभी तक वैज्ञानिक सूर्य के
कॅरोना का अध्यन केवल सूर्यग्रहण के समय में ही कर पाते थे। इस मिशन की मदद से सौर वालाओं और सौर हवाओं के अध्ययन में जानकारी मिलेगी कि ये किस तरह से धरती पर इलेक्ट्रिक प्रणालियों और संचार नेटवर्क पर असर डालती है। इससे सूर्य के कॅरोना से धरती के भू चुम्बकीय क्षेत्र में होने वाले बदलावों के बारे में घटनाओं को समझा जा सकेगा। इस सोलर मिशन की मदद से तीव्र और मानव निर्मित उपग्रहों और अन्तरिक्षयानों को बचाने के उपायों के बारे में पता लगाया जा सकेगा। इस उपग्रह का वजन 200  किग्रा होगा । ये उपग्रह सूर्य कॅरोना का अध्ययन कृत्रिम ग्रहण द्वारा करेगा। इसका अध्ययन काल 10 वर्ष रहेगा। ये नासा द्वारा सन 1995 में प्रक्षेपित 'सोहो' के बाद सूर्य के अध्ययन में सबसे उन्नत उपग्रह होगा
शुक्र ग्रह पर भी है नजर 
मंगल के अलावा इसरो के वैज्ञानिकों की नजर शुक्र ग्रह पर भी टिकी है. विशेषज्ञ शुक्र ग्रह पर स्पेस मिशन को खासा अहम मानते हैं क्योंकि धरती के बेहद करीब होने के बावजूद इस ग्रह के बारे में बेहद कम जानकारी उपलब्ध है. हालांकि शुक्र ग्रह का मिशन महज ऑर्बिटर भेजने तक सीमित हो सकता है. अब तक सिर्फ अमेरिका, रूस, यूरोपीय स्पेस एजेंसी और जापान ही शुक्र ग्रह तक कामयाब मिशन लॉन्च कर पाए हैं. 
सैटेलाईट लॉन्च सिस्टम की क्रांति  
फिलहाल इसरो छोटे सैटेलाईट लॉन्च वीइकल को तैयार करने में जुटा है, जिसे सिर्फ तीन दिनों में असेंबल किया गया जा सकेगा। पीएसएलवी जैसे रॉकेट्स को तैयार करने में आमतौर पर 30 से 40 दिन लग जाते हैं, ऐसे में इसरो का यह प्रयास सैटलाइट लॉन्चिंग की दिशा में बड़ी क्रांति जैसा होगा। यही नहीं इस रॉकेट को तैयार करने में पीएसएलवी की तुलना में 10 फीसदी राशि ही खर्च होगी।
दुनिया भर में लॉन्च वीकल की मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट फिलहाल 150 से 500 करोड़ रुपये तक होती है। यह 2018 के अंत या फिर 2019 की शुरुआत तक तैयार हो सकता है। इस वीइकल की कीमत पीएसएलवी के मुकाबले 10 फीसदी ही होगा। हालांकि यह रॉकेट 500 से 700 किलो तक के सैटलाइट्स को ही लॉन्च कर सकेगा।'

ज्यादा उपग्रह प्रक्षेपित करनें का लक्ष्य
अभी भी हमारे पास संचार प्रणाली के मद्देनजर कम सैटेलाइट हैं, इसलिए इसरो सैटेलाइट लॉन्च करने की प्रकिया को दोगुना करने के प्रयास में है। अभी हम एक साल में 8 से 10 सेटेलाइट लॉन्च करते हैं। 2018 तक ये 20 के करीब होगा। हमारा टारगेट अगले 5 साल में 60 सैटेलाइट लॉन्च करने का है।
रेल दुर्घटनाओं से सुरक्षित करेगा इसरो 
मानवरहित रेल फाटकों पर हर साल कई हादसे होते हैं। इन हादसों में कई जानें भी जाती हैं लेकिन अभी तक इसके लिए रेलवे कोई ठोस कदम नहीं उठा पाया है। रेलवे अब इन फाटकों को सुरक्षित करने के लिए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो के साथ काम कर रहा है।

इसरो कि चुनौतियाँ 
अब समय आ गया है जब इसरो व्यावसायिक सफ़लता के साथ साथ अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा और चीन की तरह अंतरिक्ष अन्वेषण पर भी ज्यादा ध्यान दे । इसरो को अंतरिक्ष अन्वेषण और शोध के लिए दीर्घकालिक रणनीति बनानी होगी । क्योकि जैसे जैसे अंतरिक्ष के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढेगी अंतरिक्ष अन्वेषण बेहद महत्वपूर्ण होता जाएगा । इस काम इसके लिए सरकार को इसरो का सालाना बजट भी बढ़ाना पड़ेगा जो फिलहाल अमेरिका और चीन के मुकाबले काफ़ी कम है। भारी विदेशी उपग्रहों को अधिक संख्या में प्रक्षेपित करने के लिए अब हमें पीएसएलवी के साथ साथ जीएसएलवी रॉकेट का भी उपयोग करना होगा। पीएसएलवी अपनी सटीकता के लिए दुनियाँ भर में प्रसिद्द है लेकिन ज्यादा भारी उपग्रहों के लिए जीएसएलवी का प्रयोग करना होगा।

महत्वपूर्ण तथ्य 
इसरो का कामयाबी भरा सफ़र
Ø  आज से लगभग 42 साल पहले उपग्रहों का साइकिल और बैलगाड़ी से शुरू हुआ इसरो का सफर आज उस मक़ाम पर पहुँच गया है जहाँ भारत अंतरिक्ष के क्षेत्र में दुनियाँ के सबसे शक्तिशाली पांच देशों में से एक है .
Ø  वर्ष 1969 में प्रसिद्ध वैज्ञानिक विक्रम साराभाई के निर्देशन में राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन का गठन हुआ था. 
Ø  19 अप्रैल, 1975 को इसरो द्वारा  स्वदेश निर्मित उपग्रह आर्यभट्ट का सफल प्रक्षेपण 
Ø  15 फरवरी, 2017 को इसरो ने एक साथ 104 सैटेलाईट लाँच करके अंतरिक्ष की दुनियाँ में इतिहास रच दिया था . पीएसएलवी की 39वीं उड़ान में इसरो ने एक मिशन में सबसे ज़्यादा 104 सैटेलाइट भेजने का विश्व रिकॉर्ड बनाया  .
Ø  व्यावसायिक उपग्रह प्रक्षेपण का सारा काम इसरो की  कममर्शियल विंग ' एंट्रिक्स कॉरपोरेशन' संचालित करती है . इस सफ़लता से उसे और प्रोजेक्ट  मिलने की उम्मी‍द है.
Ø  भारत में सैटेलाइट्स की कमर्शियल लॉन्चिंग दुनियाँ में सबसे सस्ती पड़ती है। भारत के जरिए सैटेलाइट लॉन्च करना अमेरिका, चीन, जापान और यूरोप से कई गुना तक सस्ता पड़ता है।
Ø  विशेषज्ञों के अनुसार इस सफलता के बाद दुनियाँ भर में छोटी सैटेलाइट लॉन्च  कराने के मामले में इसरो पहली पसंद बन जाएगा, जिससे देश को आर्थिक तौर पर फायदा होगा. विदेशी सैटेलाइट इतनी कम कीमत में लॉन्च करने के कारण अमेरिकी प्राइवेट लॉन्च इंडस्ट्री के लिए इसरो सीधा प्रतिद्वंदी बन गया है.
Ø  लगभग 200 अरब ड़ालर का है ग्लोबल सैटेलाइट मार्केट  फ़िलहाल  इसमें अमेरिका की हिस्सेदारी 41% की है। जबकि भारत की हिस्सेदारी 4% से भी कम है। जो अब लगातार साल दर साल बढ़ रही है ।
Ø  भारत जल्द ही शुक्र और मंगल ग्रहों पर उतरने की तैयारी कर रहा है। इस मिशन को बजट-2017 में जगह दी गई है। इसरो का फंड भी 23% बढ़ाया है।
Ø  इसरो अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा की जेट प्रोपल्सन लेबोरेटरी के साथ संयुक्त रूप से दोहरी फ्रिक्वेंसी (एल एंड एस बैंड) वाली सिंथेटिक एपर्चर रडार (एसएआर) इमेजिंग सैटेलाइट 'नासा-इसरो सिंथेटिक एपर्चर सैटेलाइट' (निसार) के निर्माण पर काम कर रही है, जिसके 2021 तक पूरा होने की उम्मीद है.
Ø  इसरो ने स्वदेश निर्मित जीएसएलवी सीरीज के 2 से 2.5 टन वहन कैपेसिटी वाले एक और रॉकेट 'जीएसएलवी मार्क 2' को ग्लोबल मार्केट में बिक्री के लिए पेश किया. इसके अलावा स्वनिर्मित पीएसएलवी में खुद डेवलप किए गए मल्टीपल बर्न तकनीक का कमर्शियल इस्तेमाल किया.
Ø  इसरो ने दो नेविगेशन सैटेलाइटों की डिजाइन तैयार करने के लिए अल्फा डिजायन टेक्नोलॉजी लिमिटेड के साथ एक अनुबंध करने के साथ सेटेलाइट उत्पादन के नए फेज की शुरुआत की.


(लेखक शशांक द्विवेदी राजस्थान के मेवाड़ विश्वविद्यालय में उपनिदेशक हैं और  टेक्निकल टूडे पत्रिका के संपादक हैं)

Wednesday, 13 December 2017

देश की सामरिक क्षमता बढ़ाएगी ब्रह्मोस

युद्द में गेम चेंजर साबित हो सकती है ब्रह्मोस
शशांक द्विवेदी
डिप्टी डायरेक्टर , मेवाड़ यूनिवर्सिटी ,राजस्थान  
एक बड़ी सामरिक कामयाबी हासिल करते हुए भारत ने सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल 'ब्रह्मोस' का सुखोई लड़ाकू विमान से सफल परीक्षण कर लिया । ब्रह्मोस को दुनिया की सबसे तेज़ सुपरसोनिक मिसाइल माना जा रहा है, जिसकी रफ़्तार 2.8 मैक यानि ध्वनि की रफ़्तार से लगभग तीन गुना ज्यादा है। दुश्मन की सीमा में घुसकर लक्ष्य भेदने में सक्षम ब्रह्मोस मिसाइल इसी गति से हमला करने में सक्षम है। भारत और रूस के संयुक्त उपक्रम से तैयार हुई इस मिसाइल का जल और थल से पहले ही सफल परीक्षण किया जा चुका था, अब इसे वायु में भी सफलतापूर्वक परीक्षण कर लिया गया। इस तरह यह तय हो गया है कि ब्रह्मोस जल, थल और वायु से छोड़ी जा सकने वाली मिसाइल बन गई है। इस क्षमता को ट्रायड कहा जाता है, ट्रायड की विश्वसनीय क्षमता इससे पहले सिर्फ़ अमरीका, रूस और सीमित रूप से फ्रांस के पास मौजूद है। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार ब्रह्मोस जैसी क्षमता वाली मिसाइल भारत के पड़ोसी देश चीन और पाकिस्तान के पास नहीं है।
वायुसेना की बढ़ी ताकत
इस सफल परीक्षण से वायुसेना की ताकत भी कई गुना बढ़ गई है। मिसाइल की स्पीड एक किलोमीटर प्रति सेकंड है यानि एक मिनट में 60 किलोमीटर, वैसे इस मिसाइल की  रेंज करीब 300 किलोमीटर है पर सुखोई से फायर करते ही इसका रेंज 400 किलोमीटर तक बढ़ जाती है. साथ ही ये 300 किलोग्राम भारी युद्धक सामग्री ले जा सकती है। दुनियाँ  मे कहीं भी इस वज़न और रेंज के मिसाइल का लड़ाकू विमान से फायर नही किया गया है। ये तकनीकी रूप से काफी जटिल प्रकिया है, जिसे सुखोई ने कर दिखाया है। ढाई टन वज़न वाली यह मिसाइल हथियार ले जाने के लिए मॉडिफाई किए गए सुखोई विमान पर ले जाया गया अब तक का सबसे वज़नी हथियार है। वैसे, अब ब्रह्मोस को ज़मीन, समुद्र तथा हवा कहीं से भी चलाया जा सकता है । फाइटर जेट से मार करने में सक्षम ब्रह्मोस मिसाइल के इस परीक्षण को 'डेडली कॉम्बिनेशन' कहा जा सकता है। हवा से जमीन पर मार करने वाले ब्रह्मोस मिसाइल का दुश्मन देश की सीमा में स्थापित आतंकी ठिकानों पर हमला बोलने के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
यह मिसाइल अंडरग्राउंड परमाणु बंकरों, कमांड ऐंड कंट्रोल सेंटर्स और समुद्र के ऊपर उड़ रहे एयरक्राफ्ट्स को दूर से ही निशाना बनाने में सक्षम है। बीते एक दशक में सेना ने 290 किलोमीटर की रेंज में जमीन पर मार करने वाली ब्रह्मोस मिसाइल को पहले ही अपने बेड़े में शामिल कर लिया है।
ब्रह्मोस मिसाइल का देशी बूस्टर
पुणे में स्थित डिफेंस रिसर्च ऐंड डिवेलपमेंट ऑर्गनाइजेशन(डीआरडीओ) की हाई एनर्जी मैटरियल्स रिसर्च लैबोरेटरी यूनिट ने ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल का देशी बूस्टर डिवेलप किया है। डीआरडीओ के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक ने  इस बूस्टर की महत्ता का जिक्र करते हुए बताया, एक ब्रह्मोस मिसाइल 2 स्टेज में फायर होता है। पहले स्टेज में एक सॉलिड प्रॉपेलेन्ट बूस्टर, मिसाइल को सुपरसोनिक स्पीड से धक्का देता है और फिर अलग हो जाता है। इसके बाद दूसरे स्टेज में लिक्विड फ्यूल इंजिन, इसको ध्वनि की गति की 3 गुना गति दे देता है। भारत अभी तक रूस से ही बूस्टर को आयात करता था। इस देशी तकनीक से देश के पैसों की भी बचत होगी। 
युद्ध में गेम चेंजर साबित हो सकती है ब्रह्मोस
ब्रह्मोस की रेंज अभी लगभग 300 किलोमीटर है, जिससे युद्द के समय पडोसी देश में हर जगह प्रहार करना संभव नहीं है। भारत के पास नई जेनरेशन की ब्रह्मोस मिसाइल से अधिक रेंज की बैलेस्टिक मिसाइल हैं, लेकिन ब्रह्मोस की खूबी यह है कि उससे खास टारगेट को तबाह किया जा सकता है। यह पाकिस्तान के साथ किसी टकराव की सूरत में गेम चेंजर साबित हो सकती है। बैलेस्टिक मिसाइल को आधी दूरी तक ही ही गाइड किया जा सकता है । इसके बाद की दूरी वे ग्रैविटी की मदद से तय करती हैं। वहीं क्रूज मिसाइल की पूरी रेंज गाइडेड होती है। ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल है। यह बिना पायलट वाले लड़ाकू विमान की तरह होगी, जिसे बीच रास्ते में भी कंट्रोल किया जा सकता है। इसे किसी भी ऐंगल से अटैक के लिए प्रोग्राम किया जा सकता है।  यह दुश्मन के मिसाइल डिफेंस सिस्टम से बचते हुए उसकी सीमा के अंदर घुसकर ठिकानों को तबाह करने का दमखम रखती है। मिसाल के लिए, ब्रह्मोस से पहाड़ी इलाकों में बने आतंकवादी कैंपों को निशाना बनाया जा सकता है, जहां पारंपरिक तरीकों से असरदार हमले नहीं किए जा सकते। इसकी खासियत यह भी है कि यह मिसाइल आम मिसाइलों के विपरित हवा को खींच कर रेमजेट तकनीक से ऊर्जा प्राप्त करती है।
अमेरिका की टॉमहॉक मिसाइल से बेहतर
मिसाइल तकनीक में दुनियाँ की कोई भी दूसरी मिसाइल तेज गति से आक्रमण के मामले में ब्रह्मोस की बराबरी नहीं कर सकती है। इसकी खूबियां इसे दुनिया की सबसे तेज़ मारक मिसाइल बनाती है। यहां तक की अमरीका की टॉम हॉक मिसाइल भी इसके आगे फेल साबित होती है। ब्रह्मोस की सफलता का आंकलन इस बात से भी लगाया जा सकता है कि भारत अब दूसरे देशों को बेचने की दिशा में काम कर रहा है। ब्रह्मोस बनाने वाली कंपनी  ब्रह्मोस एयर प्रोग्राम कंपनी को करीब सात अरब डॉलर के घरेलू ऑर्डर मिल चुके हैं। यहां पर ध्यान देने वाली बात यह भी है कि अंतरराष्ट्रीय समझौतों के चलते 2016 से पहले इनका निर्यात नहीं किया जा सकता था, लेकिन एमसीटीआर (मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजाइम) में शामिल होने के बाद भारत को इनकी खरीद-फरोख्त का अधिकार मिल चुका है। इंडो-रसियन संयुक्त उपक्रम के तहत इसकी शुरुआत 1998 में हुई थी।
क्या होती है क्रूज मिसाइल
ब्रह्मोस एक सुपरसॉनिक क्रूज मिसाइल है। क्रूज मिसाइल उसे कहते हैं जो कम ऊँचाई पर तेजी से उड़ान भरती है और इस तरह से रडार से बची रहती है। ब्रह्मोस की विशेषता यह है कि इसे जमीन से, हवा से, पनडुब्बी से, युद्धपोत से यानी कि कहीं से भी दागा जा सकता है। यही नहीं इस मिसाइल को पारम्परिक प्रक्षेपक के अलावा उर्ध्वगामी यानी कि वर्टिकल प्रक्षेपक से भी दागा जा सकता है। ब्रह्मोस के मेनुवरेबल संस्करण का हाल ही में सफल परीक्षण किया गया। जिससे इस मिसाइल की मारक क्षमता में और भी बढोत्तरी हुई है। ब्रह्मोस मिसाइल आवाज की गति से लगभग 3 गुना ज्यादा यानि 2.8 मैक की गति से उड़ सकती है। जमीन के साथ-साथ अब ब्रह्मोस मिसाइल को हवा से भी दुश्म न के ठिकाने को बर्बाद करने के लिए इस्तेतमाल किया जा सकता है।
भारत और रूस का संयुक्त उपक्रम
ब्रह्मोस का विकास ब्रह्मोस कॉरपोरेशन द्वारा किया जा रहा है। यह कंपनी भारत के डीआरडीओ और रूस के एनपीओ मशीनोस्त्रोयेनिशिया का सयुंक्त उपक्रम है। ब्रह्मोस नाम भारत की ब्रह्मपुत्र और रूस की मस्कवा नदी पर रखा गया है। रूस इस परियोजना में मिसाइल तकनीक उपलब्ध करवा रहा है और उड़ान के दौरान मार्गदर्शन करने की क्षमता भारत के द्वारा विकसित की गई है। यह मिसाइल रूस की पी-800 ओंकिस क्रूज मिसाइल की प्रौद्योगिकी पर आधारित है। ब्रह्मोस भारत और रूस के द्वारा विकसित की गई अब तक की सबसे आधुनिक मिसाइल प्रणाली है और इसने भारत को मिसाइल तकनीक में अग्रणी देश बना दिया है।
ब्रह्मोस के निर्यात की भी तैयारी 
ब्रह्मोस खास तरह की अत्याधुनिक क्रूज मिसाइल है जिसमें अब वायु सेना दृश्यता सीमा से बाहर के लक्ष्यों पर भी हमला कर सकेगी। लगभग 40 विमानों में यह प्रणाली लगाए जाने की योजना है। इस कामयाबी के बाद भारत दुनिया में स्वयं को एक महाशक्ति के रूप में स्थापित करने में भी सफल हुआ है। भारत इस मिसाइल के निर्यात की दिशा में आगे बढ़ने की तैयारी में लग गया है। एमटीसीआर का सदस्य बनने के बाद यह कार्य और आसान हो गया है। वियतनाम 2011 से इस तेज गति की मिसाइल को खरीदने की कोशिश में लगा हुआ है। वह चीन से बचाव के लिए ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल लेना चाहता है। इस अत्याधुनिक मिसाइल को बेचने के लिए भारत की नजर में वियतनाम के अतिरिक्त 15 अन्य देश भी हैं। वियतनाम के बाद फिलहाल जिन चार देशों से बिक्री की बातचीत चल रही है उनमें इंडोनेशिया, दक्षिण अफ्रीका, चिली व ब्राजील हैं। शेष 11 देशों की सूची में फिलीपींस, मलेशिया, थाईलैंड व संयुक्त अरब अमीरात आदि शामिल हैं। इन सभी देशों के साथ दक्षिण चीन सागर मसले पर चीन के साथ तनातनी चल रही है। दुनिया की सबसे तेज गति वाली मिसाइलों में शामिल ब्रह्मोस मिसाइल सर्वाधिक खतरनाक एवं प्रभावी शस्त्र प्रणाली है। यह न तो राडार की पकड़ में आती है और न ही दुश्मन इसे बीच में भेद सकता है। एक बार दागने के बाद लक्ष्य की तरफ बढ़ती इस मिसाइल को किसी भी अन्य मिसाइल या हथियार प्रणाली से रोक पाना असंभव है।

रास्ता बदलने में माहिर है ब्रह्मोस
मेनुवरेबल तकनीक का अर्थ लॉन्चर करने के बाद लक्ष्य तक पहुंचने के लिए मार्ग बदलना होता है। इस बात को साधारण तरीके से कुछ यूं समझा जा सकता है कि टैंक से छोड़े जाने वाले गोलों तथा अन्य मिसाइलों का लक्ष्य पहले से निश्चित होता है और वे वहीं जाकर गिरते हैं। इसके अलावा लेजर गाइडेड बम या मिसाइल वे होते हैं जो लेजर किरणों के आधार पर लक्ष्य को साधते हैं। परंतु यदि कोई लक्ष्य इन सब से दूर हो और लगातार गतिशील हो तो उसे निशाना बनाना कठिन हो सकता है। यहीं यह तकनीक काम आती है जिसमें ब्रह्मोस माहिर है। ब्रह्मोस मेनुवरेबल मिसाइल है। दागे जाने के बाद लक्ष्य तक पहुंचते यदि उसका लक्ष्य मार्ग बदल ले तो यह मिसाइल भी अपना मार्ग बदल लेती है और उसे निशाना बना लेती है।
कुलमिलाकर भारत ने सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस का सुखोई लड़ाकू विमान से सफल परीक्षण कर बड़ी कामयाबी हासिल की है इस कामयाबी से भारत की सामरिक क्षमता में बड़े पैमाने पर वृद्धि होगी

सुखोई और ब्रह्मोस की घातक जुगलबंदी
ब्रह्मोस
रफ्तार: 2.8 मैक या 3,400 किलोमीटर प्रतिघंटा
मारक क्षमता : 290 किमी से 300 किमी

दुनिया क्यों है हैरान
रफ्तार में अमेरिकी सेना की टॉमहॉक मिसाइल से चार गुना तेज।
युद्धपोत और जमीन से दागने पर 200 किलो वारॅहेड्स ले जा सकती है।
विमान से दागे पर 300 किलो वॉरहेड ले जाने में सक्षम।
मेनुवरेबल तकनीक से लैस। लक्ष्य का रास्ता बदला तो मिसाइल भी बदल लेगी रास्ता

सुखोई-30एमकेआई
डबल इंजन वाला सुखोई-30 2,100 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ान भर सकता है।
रूस की मदद से सुखोई-30 भारत का सबसे तेज गति से उड़ने वाला लड़ाकू विमान है।
यह दुश्मन के इलाके में घुसने और उसके हवाई क्षेत्र पर कब्जा करने में सेना की मदद करता है।
सुखोई करीब चार घंटे में 3,000 किमी तक की दूरी के मिशन को सफलतापूर्वक अंजाम दे सकता है।
उड़ान के दौरान ही आकाश में इसमें किसी विमान से ईंधन भरा जा सकता है।
यह लगातार 10 घंटे तक हवा में रह सकता है।

भारत के मिसाइल कार्यक्रम का संक्षिप्त जानकारी
सुखोई से ब्रह्मोस को दागने के बाद दुनियाँभर में खासकर पड़ोसी मुल्कों में उथलपुथल मच गई हैब्रह्मोस मिसाइल के अलावा भी भारत की कई अन्य घातक मिसाइलें हैं जिनका लोहा पूरी दुनियाँ मानती है ..
अग्नि-I : इस मिसाइल का पहला सफल परीक्षण 25 जनवरी 2002 को किया गया था. इस मिसाइल का वजन 12 टन है और इसकी लंबाई 15 मीटर है. इसकी मारक क्षमता 700-1200 किलोमीटर है  अग्नि-1 में विशेष नौवहन प्रणाली लगी है जो सुनिश्चत करती है कि मिसाइल अत्यंत सटीक निशाने के साथ अपने लक्ष्य पर पहुंचे इस मिसाइल के संचालन अधिकार स्ट्रेटजिक फोर्स कमांड के पास है

अग्नि-II : 11 अप्रैल 1999 में इसका पहला परीक्षण किया गया इस मिसाइल का वजन 16,000 किलो है और इसकी मारक क्षमता 2000-3500 किलोमीटर है  इस मिसाइल के सफल परीक्षण ने चीन और पाकिस्तान की नींदें उड़ा दी थीं. क्योंकि इसकी मारक क्षमता में दोनों देशों के कई बड़े शहर आते हैं
अग्नि-III : जुलाई 2006 में इसका पहला परीक्षण किया गया. इस मिसाइल का वजन 48,000 किग्रा है और इसकी लंबाई 17 मीटर  इस मिसाइल की मारक क्षमता 3500 किलोमीटर है यह अपने तरह का विश्व के सबसे घातक हथियारों में से एक है यह मिसाइल न्यूक्लीयर क्षमता से भी संपन्न है
अग्नि-IV : 15 नवंबर 2011 को इस मिसाइल का पहला परीक्षण किया गया. इसका वजन 17,000-किलोग्राम है और इसकी लंबाई 20 मीटर इस मिसाइल का निर्माण अग्नि-II और अग्नि-III के बीच की कड़ी को पूरा करने के लिए किया गया था
अग्नि-V : 19 अप्रैल 2012 को इस शक्तिशाली मिसाइल का पहला सफल परीक्षण किया गया इसका वजन 50,000 किलो है और इसकी लंबाई 17.5 मीटर है 5000 किलोमीटर तक मार करने वाली अग्नि-5 भारत की पहली इंटर-कॉन्टिनेन्टल बैलिस्टिक मिसाइल है
शौर्य मिसाइल : यह सतह से सतह पर मार करने वाला सामरिक मिसाइल है 2008 में इसका पहला सफल परीक्षण किया गया शौर्य मिसाइल का वजन 42 किलोग्राम है और इसकी लंबाई 1.90 मीटर इस मिसाइल की मारक क्षमता है 750 से 1900 किलोमीटर है. यह भारत का पहला हाइपर सुपर सॉनिक मिसाइल भी है
पृथ्वी : भारत के मिसाइल प्रोग्राम के अंतर्गत निर्माण किया जाने वाली पहला मिसाइल थी  पृथ्वी परमाणु संपन्न तथा 150-350 किमी की रेंज तक सतह से सतह पर मार करने वाली  यह मिसाइल सेना के तीनों अंगों का अभिन्न हिस्सा है
नाग मिसाइल : 1990 में इसका सफल परीक्षण किया गया इस मिसाइल का वजन 42 किलोग्राम है और इसकी लंबाई 1.90 मीटर. इसे टैंक भेदी मिसाइल भी कहा जाता है पृथ्वी एवं अग्नि जैसे स्वदेशी मिसाइलों की श्रृंखला में नागपांचवी मिसाइल है यह मिसाइल अपनी विशेषताओं में 'टॉपअटेक- फायर एण्ड फोरगेट' तथा सभी मौसम में फायर करने की खास क्षमता रखती है
धनुष : धनुष मिसाइल स्वदेशी तकनीक से निर्मित पृथ्वी मिसाइल का नौसैनिक संस्करण है  यह मिसाइल परमाणु हथियारों को ले जाने की क्षमता रखती  है प्रक्षेपण के समय इसका वजन 4600 किलोग्राम होता है
ब्रह्मोस मिसाइल : इसका विकास रूस की एनपीओ मशीनोस्ट्रोयेनिया तथा भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन ने संयुक्त रूप से इसका किया है यह रूस की पी-800 ओंकिस क्रूज मिसाइल की टैकनोलजी पर आधारित मिसाइल है सबसे पहले 2001 में इसका सफल परीक्षण किया गया ब्रह्मोस मिसाइल का वजन 3000 किलोग्राम है और इसकी लंबाई 8.4 मीटर है ब्रह्मोस की मारक क्षमता 290 किलोमीटर है इसकी रफ्तार अमेरिका के सबसोनिक टॉमहॉक क्रूज मिसाइल से तीन गुनी अधिक है
आकाश मिसाइल : इसका परीक्षण 1990 में किया गया था इसका वजन 720 किलोग्राम है और इसकी लंबाई 5.78 मीटर जमीन से हवा में मार करने वाली मिसाइल आकाश की तुलना अमेरिका के पेट्रियोट मिसाइल सिस्टम से की जाती है एक समय में यह मिसाइल 8 भिन्न लक्ष्य पर निशाना साध सकती है
(लेखक राजस्थान की मेवाड़ यूनिवर्सिटी में डिप्टी डायरेक्टर हैं और  टेक्निकल टूडे पत्रिका के संपादक हैं )

पिछले 12 सालों से विज्ञान विषय पर लिखते हुए विज्ञान और तकनीक पर केन्द्रित विज्ञानपीडिया डॉट कॉम के संचालक है  । एबीपी न्यूज द्वारा विज्ञान लेखन के लिए सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर का सम्मान हासिल कर चुके शशांक को विज्ञान संचार से जुड़ी देश की कई संस्थाओं ने भी राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया है। वे देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लगातार लिख रहे हैं । )