Wednesday, 30 September 2026

अंतरिक्ष से भारत की नई रणनीतिक “नजर”

 

अंतरिक्ष से बदलेगी धरती की तस्वीर

डॉ. शशांक द्विवेदी

परियोजना प्रबंधक, टीएसएससी

(कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय,भारत सरकार)

आसमान में उठता रॉकेट अक्सर केवल विज्ञान की उड़ान दिखाई देता है, लेकिन उसकी असली मंजिल धरती पर होती है। पिछले दिनों श्रीहरिकोटा से जब जीएसएलवी-एफ17 ने उड़ान भरी तो उसके साथ भारत की उम्मीदों का एक और मिशन अंतरिक्ष की ओर रवाना हुआ। उड़ान के लगभग 18 मिनट बाद EOS-05 उपग्रह को निर्धारित ट्रांसफर ऑर्बिट में स्थापित कर दिया गया। यह क्षण इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि भारत ने पृथ्वी-अवलोकन की अपनी क्षमता को एक ऐसे स्तर तक पहुंचाने की दिशा में कदम बढ़ाया है, जहां अंतरिक्ष से केवल तस्वीरें लेना ही उद्देश्य नहीं, बल्कि उन तस्वीरों को राष्ट्रीय सुरक्षा, आपदा प्रबंधन, कृषि, पर्यावरण और विकास की रणनीति का आधार बनाना है।

EOS-05 को यदि भारत की ‘आसमान में तैनात रणनीतिक आंख’ कहा जा रहा है तो इसके पीछे ठोस वजह है। पृथ्वी की निचली कक्षा में घूमने वाले अधिकांश इमेजिंग उपग्रह किसी स्थान के ऊपर से गुजरते हुए उसकी तस्वीर लेते हैं। इसके विपरीत जियोसिंक्रोनस क्षेत्र से काम करने वाला उपग्रह किसी बड़े भूभाग पर लंबे समय तक निगरानी बनाए रखने की क्षमता देता है। इसका अर्थ है कि बदलती परिस्थितियों को केवल अलग-अलग समय की तस्वीरों के रूप में देखने के बजाय उनके निरंतर क्रम को समझने की बेहतर संभावना।

यही वह बदलाव है, जो भारत की अंतरिक्ष शक्ति को केवल वैज्ञानिक उपलब्धि से आगे ले जाकर रणनीतिक क्षमता में बदलता है।भारत की भौगोलिक स्थिति ऐसी है जहां अंतरिक्ष आधारित निगरानी का महत्व लगातार बढ़ रहा है। उत्तर में हिमालय, पश्चिम में संवेदनशील सीमाएं, दक्षिण में विशाल समुद्री क्षेत्र और पूर्व में पहाड़ी एवं वर्षा प्रभावित क्षेत्र—इन सभी की निगरानी के लिए जमीन आधारित प्रणालियों की अपनी सीमाएं हैं। अंतरिक्ष से प्राप्त डेटा इन सीमाओं को काफी हद तक दूर कर सकता है। सीमा क्षेत्रों में सड़क, पुल, निर्माण गतिविधियों या भू-भाग में होने वाले बदलावों की निगरानी हो अथवा समुद्री क्षेत्र में गतिविधियों पर नजर, उपग्रह आधारित अवलोकन आधुनिक सुरक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।

हालांकि इसे केवल ‘जासूसी उपग्रह’ के नजरिये से देखना उचित नहीं होगा। इसरो प्रमुख वी. नारायणन ने भी EOS-05 को लेकर ऐसी अटकलों को खारिज करते हुए इसे बहु-उपयोगी इमेजिंग मिशन के रूप में रेखांकित किया है। असल बात यह है कि आज के दौर में नागरिक और रणनीतिक अंतरिक्ष तकनीक के बीच स्पष्ट दीवार खींचना कठिन है। जो तकनीक मौसम की जानकारी दे सकती है, वही राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी उपयोगी हो सकती है। जो तकनीक फसल की स्थिति बता सकती है, वही आपदा के बाद नुकसान का आकलन भी कर सकती है।

EOS-05 की खासियत इसकी इमेजिंग क्षमता में है। यह दृश्य, इन्फ्रारेड, मल्टीस्पेक्ट्रल और हाइपरस्पेक्ट्रल तकनीकों के उपयोग से पृथ्वी की सतह के बारे में अधिक विस्तृत जानकारी जुटाने में सक्षम है। खासकर हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग अंतरिक्ष आधारित पृथ्वी-अवलोकन में एक अत्याधुनिक तकनीक है। सामान्य कैमरा किसी वस्तु को कुछ सीमित रंगों या बैंड में देखता है, जबकि हाइपरस्पेक्ट्रल सेंसर प्रकाश को सैकड़ों संकीर्ण तरंगदैर्ध्य बैंड में विभाजित कर सकता है। इससे अलग-अलग पदार्थों और सतहों के बीच सूक्ष्म अंतर पहचानने की क्षमता बढ़ जाती है।

भारत के लिए यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अंतरिक्ष क्षेत्र तेजी से बदल रहा है। अब अंतरिक्ष केवल सरकार और वैज्ञानिक संस्थानों का क्षेत्र नहीं रह गया है। निजी कंपनियां उपग्रह निर्माण, प्रक्षेपण, सेंसर, डेटा विश्लेषण और अंतरिक्ष आधारित सेवाओं में प्रवेश कर रही हैं। इसरो की तकनीकी विशेषज्ञता और निजी उद्योग की व्यावसायिक क्षमता का मेल भारत को वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में अधिक मजबूत स्थान दिला सकता है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा भी इस मिशन की सफलता को इसरो और भारतीय उद्योग के बीच बढ़ती साझेदारी से जोड़ना इसी बदलते परिदृश्य की ओर संकेत करता है। भारत को इस साझेदारी को केवल रॉकेट निर्माण तक सीमित नहीं रखना चाहिए। अगला बड़ा बाजार अंतरिक्ष से मिलने वाले डेटा और उसके अनुप्रयोगों का होगा।

इसरो की यात्रा भी इस परिवर्तन की कहानी कहती है। कभी भारत के पास उपग्रह प्रक्षेपण की सीमित क्षमता थी। आज भारत भारी उपग्रहों को जियोसिंक्रोनस क्षेत्र तक पहुंचाने वाले GSLV जैसे प्रक्षेपण यान संचालित कर रहा है। चंद्रयान-3 की सफलता ने चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग की क्षमता दिखाई, स्पेडेक्स मिशन ने अंतरिक्ष डॉकिंग जैसी जटिल तकनीक का प्रदर्शन किया और NISAR जैसे मिशनों ने पृथ्वी-अवलोकन की नई संभावनाएं खोलीं। EOS-05 इसी लंबी यात्रा की अगली कड़ी है।

यह यात्रा हमेशा सीधी नहीं रही। अंतरिक्ष विज्ञान में असफलताएं भी आती हैं। कुछ प्रक्षेपण अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाते, कुछ मिशनों में तकनीकी समस्याएं आती हैं। लेकिन वैज्ञानिक संस्थान की वास्तविक ताकत इस बात में होती है कि वह असफलता से सीखकर अगली सफलता की संभावना बढ़ाए। इस दृष्टि से EOS-05 की सफलता भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम की तकनीकी परिपक्वता का भी प्रमाण है।

भारत की अंतरिक्ष शक्ति का अगला चरण इसलिए रॉकेटों की संख्या से नहीं, बल्कि डेटा की उपयोगिता से मापा जाएगा।EOS-05 हमें यही संदेश देता है कि भविष्य का भारत केवल अंतरिक्ष में पहुंचने वाला भारत नहीं होगा, बल्कि अंतरिक्ष से अपनी धरती को समझने वाला भारत होगा। वह यह देख सकेगा कि सीमा पर क्या बदल रहा है, समुद्र में क्या हो रहा है, खेतों में फसल कैसी है, जंगल कहां सिमट रहे हैं और बाढ़ किस दिशा में फैल रही है।

श्रीहरिकोटा से उठी रॉकेट की लौ कुछ मिनटों में आसमान में विलीन हो जाती है, लेकिन उसके साथ भेजी गई तकनीक वर्षों तक भारत की सुरक्षा और विकास को दिशा दे सकती है। यही इस मिशन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

अंतरिक्ष में भारत की आंख अब और दूर तक देख रही है। जरूरत इस बात की है कि धरती पर भारत उस आंख से मिली जानकारी को उतनी ही तेजी और बुद्धिमत्ता से पढ़ना भी सीखे। यही आने वाले दशक की वास्तविक अंतरिक्ष शक्ति होगी।

 

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