Wednesday, 7 August 2013

कितनी कारगर है राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा नीति


Hindustan
पूरे  विश्व में साइबर नियमों के उल्लंघन और लगातार बढ़ते खतरे को देखते हुए पिछले दिनों केंद्र  सरकार ने राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा नीति-2013 जारी कर दी । इसका उद्देश्य देश में ऐसा साइबर सिक्योरिटी सिस्टम तैयार करना है जो साइबर हमले से बचाव कर सके और सूचनाएं सुरक्षित रखने में सहायक हो । संचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री कपिल सिब्बल ने यह नीति जारी करते हुए कहा कि रक्षा प्रणाली, बिजली संबंधी बुनियादी ढांचा, परमाणु संयंत्र, दूरसंचार प्रणाली जैसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की सुरक्षा करनी होगी अन्यथा अर्थव्यवस्था में अस्थिरता पैदा हो सकती है। 
वास्तव में साइबर क्षेत्र में अस्थिरता का मतलब है आर्थिक अस्थिरता, कोई भी देश आर्थिक अस्थिरता का बर्दाश्त नहीं कर सकता इसलिए सिर्फ नीति ही नहीं बल्कि इसे तत्काल लागू करना भी जरूरी है। दूसरें  देशों और गैर सरकारी संस्थाओं-व्यक्तियों, कंपनियों और आतंकवादियों की ओर से होने वाले संभावित हमले के मद्देनजर साइबर नीति आवश्यक थी क्योंकि इंटरनेट दुनिया की कोई भौगोलिक सीमा नहीं है। आने वाले समय में कभी भी साइबर युद्ध हो सकता है इसलिए हमें अभी से तैयार रहना होगा । आज के समय में हमें नहीं पता कि कौन हमारी प्रणाली पर हमले करता है इसलिए हमें अपनी प्रणाली को सुरक्षित रखना है। लेकिन सबसे बड़ सवाल है कि साइबर सुरक्षा के मामले में भारत अब तक इतना पीछे क्यों रहा है ? साइबर सुरक्षा  के आकंडो के अनुसार चीन में साइबर सुरक्षा के काम में सवा लाख विशेषज्ञ तैनात हैं। अमेरिका में यह संख्या 91 हजार से ऊपर है। रूस में भी लगभग साढ़े सात हजार माहिर लोग इस काम में लगे हुए हैं। जबकि अपने यहां यह संख्या सिर्फ 556 है ।फिलहाल स्तिथि बहुत ज्यादा चिंताजनक है जिस पर तत्काल एक्शन की जरुरत है ।
Dabang Duniya
साइबर सुरक्षा की चुनौती आज दुनिया में कितनी अहम है, इसका अंदाजा इसी से लगता है कि पिछले दिनों अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की शिखरवार्ता के एजेंडे में यह सर्वप्रमुख मुद्दा था। मशहूर एंटीवायरस कंपनी कैसपेर्स्की लैब के मुताबिक वर्ष 2013 में दुनिया भर में साइबर हमलों की संख्या में बड़ी तेजगति से वृद्धि होगी। कुछ खास ठिकानों पर ऐसे हमले किए जाएंगे और सरकारी एजेंसियों पर विशाल पैमाने के हमले भी होंगे। अमरीकी खुफिया एजेंसियों ने भविष्यवाणी की है कि आनेवाले 20 वर्षों में वैश्विक साइबर युद्ध शुरू हो जाएगा। गूगल और फेसबुक जैसी बड़ी बड़ी नेटवर्क कंपनियों के पास भारी मात्रा में ऑनलाइन जानकारी हासल करने की क्षमता है इसलिए ये इनका दुरुपयोग भी कर सकती है जो कई देशों के लिए बड़ी समस्या पैदा कर सकता है । इसके अलावा, संचार प्रौद्योगिकी के विकास की तेजगति की बदौलत देशों की सरकारों का अपने नागरिकों पर असीम नियंत्रण हो जाएगा।  सूचना प्रौद्योगिकी की दुनिया की मुख्य समस्या यह है कि दुनिया की कई सरकारें साइबर-आतंकवाद  की गंभीरता से नहीं ले रही है। जबकि यह विषय उतना ही महत्वपूर्ण है जितना किसी देश की सैन्य सुरक्षा । कुछ देशों की सरकारें साइबर युद्ध के लिए सबसे प्रभावकारी मालवेयर का विकास कर रही हैं। लेकिन कोई भी सरकार यह गारंटी नहीं दे सकती हैं कि ये मालवेयर और वायरस आतंकवादियों के लिए भी उपलब्ध नहीं हो सकेंगे। यदि ऐसा हुआ तो आतंकवादी गिरोह इन मालवेयरों और वायरसों का खूब इस्तेमाल करेंगे। इसलिए कहा जा सकता है कि आज भी दुनिया के कई देशों के लिए अपने ही साइबर संजाल में फंसने का बड़ा भारी खतरा बना हुआ है। माउस से एक ही “क्लिक” करने से पूरी सभ्यता का विनाश हो सकता है
Rashtriya Sahara
इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों पर विश्व की बढ़ती निर्भरता के चलते साइबर हमलों द्वारा नुकसान पहुंचाने का गंभीर खतरा पैदा होने की संभावना बढ़ गयी है । इस समय अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के पूर्व कर्मचारी एडवर्ड स्नोडेन का मामला सुर्खियों में है जिस पर कई देशो का  सरकारी साइबर  डाटा चुराने, जासूसी और अनधिकृत लोगों तक खुफिया सूचना पहुंचाने का आरोप है। यह भी एक तरह का साइबर क्राइम है जिससे कई देश अपने दुश्मन देश की जासूसी के लिए बढ़ावा देंगे जो निश्चित रूप से चिंता का विषय है ।इसको रोकने के लिए पुख्ता तकनीकी ढाँचा होनी चाहिए जो फिलहाल भारत के पास नहीं है ।
पिछले दिनों एक अंग्रेजी अखबार ने खुलासा किया था कि चीन ने भारतीय रक्षा अनुसंधान संस्थान के कई कम्प्यूटरों को हैक कर सुरक्षा और मिसाइल कार्यक्रमों से सम्बंधित महत्वपूर्ण जानकारियों को चुरा लिया है।  सरकार के टेक्निकल इंटेलिजेंस विंग, नेशनल टेक्निकल रिसर्च ऑरगनाइजेशन ने प्राइवेट साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट के साथ मिलकर इस लीक का खुलासा किया है। हैकरों ने डीआरडीओ के वरिष्ठ अधिकारी के इमेल आईडी को हैक कर इस घटना को अंजाम दिया। हैकरों ने  रक्षा मामलों सम्बन्धी निर्णय लेने वाली सर्वोच्च समिति, कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी की हजारों फाइलों, मिसाइल विकास प्रोग्राम सहित भारतीय रक्षा अनुसंधान संस्थान के हैदराबाद स्थित लैब में भी सेंध लगाईं है। 
वेबसाइटों की हैकिंग ऐसी समस्या बन गई है, जिसके जरिये शत्रु किसी देश की सैन्य  व्यवस्था, खुफिया तंत्र, ऊर्जा, उद्योग एवं वित्तीय क्षेत्र तथा तमाम सरकारी विभागों में घुसपैठ कर अति संवेदनशील जानकारी चुरा सकते हैं या उनके सिस्टम को अस्त-व्यस्त कर सकते हैं। भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय (एनएससीएस) की लीक हुई एक रिपोर्ट के अनुसार देश में साइबर सुरक्षा के मामले में हद दर्जे की लापरवाही बरती जा रही है । 
फिर भी यह राहत की बात है कि इस मामले में अब सरकार संजीदा हो रही है  अब इस पर राष्ट्रीय साइबर नीति भी बन गयी है । इस  नीति में 14 उद्देश्य तय किए गए हैं जिनमें देश में साइबर संबंधी संतुलित माहौल तैयारना, मान सुरक्षा और प्रक्रिया अपनाने वाली कंपनियों को कर छूट, प्रभावी सार्वजनिक निजी भागीदारी विकसित करना शामिल है।
Jansandeshties
नीति में क्षमता निर्माण, कौशल विकास और प्रशिक्षण के जरिए अगले पांच साल में साइबर सुरक्षा में कुशल 500000 पेशेवरों को तैयार करने और अनुसंधान के जरिए देसी सुरक्षा प्रौद्योगिकी विकसित करने की योजना है। साइबर नीति में देश में सुरक्षित साइबर माहौल तैयार करने के लिए आठ रणनीतियों की पहचान की गई है जिसमें साइबर सुरक्षा से जुड़े सभी मुद्दों के संयोजन के लिए एक राष्ट्रीय एजेंसी बनाने की बात कही गई है।
चीन और यूरोपीय देशों की ओर से बढ़ रही हैकिंग और साइबर अपराध के खतरों पर अंकुश लगाने और उनसे निपटने के लिए एक कार्ययोजना का प्रस्ताव है । इसका प्रभार नेशनल इन्फॉरमेशन ब्यूरो (एनआईबी) के पास होगा और इसके अधीन एनआईएस, गृह मंत्रालय, डीओडी, डीआईडी, एनडीएमआर और डीआरडीओ जैसी संस्थाएं काम करेंगी। इस पर करीब पांच हजार करोड़ रुपए खर्च आने का अनुमान है। डीआरडीओ ऐसा उपकरण तैयार करेगा जो इलेक्ट्रॉनिक सामान जांच कर उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करेगा। यही नहीं, डीआरडीओ मोबाइल और इंटरनेट के चिप और डाटा कार्ड का उत्पादन भी करेगा, जिसका यूनिक आईडेंटिफिकेशन जरूरी होगा। साथ ही सरकार हर उपकरण की आईएमईआई नंबर का भारत में दिए कोड से मिलान कराएगी। डीआरडीओ के उपकरण से किसी भी वेबसाइट और उसकी बेसिक संस्था पर जब चाहे रोक लगाई जा सकेगी। 
साइबर सुरक्षा के लिए सरकार की कार्ययोजना सकारात्मक दिशा में है लेकिन लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या इस योजना पर जल्द से जल्द अमल हो पायेगा या यह अहम योजना भी सरकारी सुस्ती का शिकार  होगी । भारत सरकार को इस बात पर विशेष ध्यान देना होगा कि पहले ही हम साइबर सुरक्षा के मामले में विश्व के कई देशों से पिछड़े हुए है इसलिए अब इस नीति के क्रियान्यवन में देरी की भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है ।

1 comment:

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