Saturday, 2 May 2020

ओजे-287 और देसी दिमाग


चंद्रभूषण
पिछले 130 वर्षों से ओजे-287 खगोलशास्त्रियों के लिए चुनौती बना हुआ है। कर्क राशि में प्लूटो जितनी चमक वाली एक चीज आकाश कुसुम की तरह अचानक उभरती है, फिर 12 साल के लिए गायब हो जाती है। बाद में गहरे प्रेक्षणों से पता चला कि दो तेज चमक के बीच मौजूद यह 12 साल का फासला भी हर बार न सिर्फ लगभग 20 घंटे कम हुआ जाता है, बल्कि हर तेज चमक के कुछ समय बाद एक हल्की चमक भी दर्ज की जाती है।

मामले का और बड़ा उलझाव इस प्रेक्षण के साथ शुरू हुआ कि ज्यादा चमक और कम चमक के बीच का समयांतराल निश्चित नहीं है। कभी यह एक साल नापा जाता है तो कभी बढ़ते-बढ़ते दस साल तक चला जाता है। 1891 में पहली बार यह चीज खगोलशास्त्रियों के सामने नमूदार हुई थी। तब से अब तक तकनीक और प्रस्थापना, दोनों दृष्टियों से उनका शास्त्र बहुत आगे जा चुका है। समझ यह बनी है कि ओजे-287 कोई चीज नहीं बल्कि साढ़े तीन अरब प्रकाश वर्ष दूर घटित होने वाली एक आवर्ती घटना है।

15 करोड़ सूर्यों जितना वजनी एक ब्लैक होल 18 अरब सूर्यों जितने वजनी, कहीं ज्यादा बड़े ब्लैक होल की परिक्रमा कर रहा है। लेकिन यह परिक्रमा ग्रहों द्वारा सूर्य की परिक्रमा जैसी न होकर आकाश की सापेक्ष वक्रता के कारण बहुत ही जटिल है। भारत की प्रतिष्ठित संस्था टीआईएफआर के दो वैज्ञानिकों प्रो. अचंवीदु गोपकुमार और उनके शोधछात्र लंकेश्वर डे ने इस परिक्रमा पथ की इतनी सटीक गणना की कि कम चमक वाला प्रेक्षण हाल में उनके बताए समय से मात्र ढाई घंटे के अंदर दर्ज कर लिया गया।

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