Friday, 14 June 2019

पानी की ए टू जेड कहानी

...ताकि पानी न करे पानी-पानी
Water Purification: A to Z

हाल में नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने केंद्र सरकार से कहा है कि जिन इलाकों में पानी ज्यादा खारा नहीं है, वहां आरओ के इस्तेमाल पर बैन लगाया जाए क्योंकि इससे पानी की बहुत बर्बादी होती है और यह सेहत के लिए मुफीद भी नहीं है। खास बात यह है कि महानगरों में पानी सप्लाई करने वाली एजेंसियां भी इस बात पर जोर देती हैं कि उनका पानी सौ फीसदी शुद्ध है, लेकिन हकीकत यह है कि महानगरों में सबसे ज्यादा आरओ वॉटर प्योरिफायर ही बिक रहे हैं। क्या है शुद्ध पानी का फंडा और आरओ के इस्तेमाल में है समझदारी, एक्सपर्ट्स से बात करके ब्योरा रहे हैं वीरेंद्र वर्मा:

दिल्ली, मुंबई या लखनऊ समेत देश के ज्यादातर शहरों में पानी का स्रोत या तो नदियां हैं या फिर ग्राउंड वॉटर। इनके पानी को ही साफ करके वहां की सरकारी एजेंसियां लोगों के घरों में पानी की सप्लाई करती हैं। सरकारी एजेंसी कच्चे पानी को साफ करके पाइपलाइन के जरिए लोगों के घरों में पहुंचाती है। हालांकि यहां दिक्कतें पुरानी पाइपलाइनों की वजह से आती हैं या फिर फैरूल से घर तक पानी पहुंचने के दौरान पानी में अशुद्धियां मिलती हैं। अगर कहीं लीकेज होती है तो सप्लाई वाले पानी में सीवर का पानी मिलने की आशंका बढ़ जाती है क्योंकि कई जगह पीने की पाइपलाइनें और सीवर की पाइपलाइनें साथ-साथ गुजरती हैं।
पानी की पाइपलाइन पर सीधे मोटर लगाने से भी गंदा पानी आ जाता है। कई बार हमें यह पता नहीं होता कि पाइप में सप्लाई आ रहा है या नहीं। अगर नहीं आ रहा है और हम मोटर चालू कर देते हैं तो मोटर बाहर की गंदगी खींच लेता है।
सप्लाई वाले पानी में अमूमन सबसे ज्यादा अशुद्धियां फेरूल से आपके घर तक जाने वाले पाइप में मिलती हैं। ऐसे में बेहतर रहेगा कि पानी का कनेक्शन जल बोर्ड के लाइसेंसी प्लंबर से ही कराएं और अगर पानी में गड़बड़ी आ रही है तो सबसे पहले अपनी लाइन की जांच कराएं। जरूरी हो तो पाइपलाइन बदलवा लें। फैरूल वह जॉइंट होता है, जहां पर जल बोर्ड की पाइपलाइन से घरों में पानी का कनेक्शन दिया जाता है। यहां लीकेज होने पर घरों के अंदर गंदा पानी सप्लाई होने लगता है।

पानी में गड़बड़ियां
पानी में दो तरह की अशुद्धियां होती हैं: घुलनशील और अघुलनशील। ये केमिकल और बायलॉजिकल होती हैं। केमिकल अशुद्धियां कई बातों पर निर्भर करती हैं। मसलन, अगर पानी के स्रोत के पास फैक्ट्रियां हैं तो उनकी गंदगी पानी में जाएगी। इसी तरह सेनेटरी लैंडफिल की गंदगी रिसकर जमीन के नीचे के पानी को खराब कर देती है। दिल्ली में गाजीपुर और भलस्वा लैंडफिल के साथ ऐसा ही हुआ है। स्टडी के मुताबिक, इन दोनों सैनिटरी लैंडफिल के 10 किलोमीटर तक के दायरे के अंडरग्राउंड वॉटर की क्वॉलिटी काफी खराब हो चुकी है। अगर खेती में कीटनाशकों का बहुत इस्तेमाल होता है तो ये केमिकल अंडरग्राउंड वॉटर में मिलकर उसे गंदा कर देते हैं।

पीने का पानी कैसा हो?
BIS स्टैंडर्ड
TDS: 0-500 ppm
pH level: 6.5-7.5
---------
WHO स्टैंडर्ड
- पानी में 300 से कम टीडीएस है तो उसे एक्सेलेंट कैटिगरी का माना जाता है।
- 300 से 600 के बीच की टीडीएस को गुड कैटिगरी में माना जाता है।
- 600 से 900 के बीच के टीडीएस को फेयर कैटिगरी में माना जाता है।
- 1200 से ज्यादा के टीडीएस वाले पानी को खराब कैटिगरी में माना जाता है।

BIS के नियम
पीने के पानी की जांच के लिए बीआईएस (ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स) ने जो स्टैंडर्ड बनाए हैं वे बीआईएस-10500 के तहत आते हैं। इनके अनुसार पानी में टीडीएस की मात्रा 0 से 500 पीपीएम (पार्ट्स प्रति मिलियन) होनी चाहिए। साथ ही पीएच लेवल 6.5 से 7.5 के बीच होना चाहिए। इससे ज्यादा होने पर यह नुकसानदेह है। बीआईएस के मुताबिक, पानी में कुल 82 तरह की अशुद्धियों की जांच होनी चाहिए। ये फिजिकल पैरामीटर-6, कैमिकल (टॉक्सिक)-23+16, रेडियोएक्टिव-3, पेस्टिसाइड्स-18, बैक्ट्रियोलोजिकल-2, माइक्रोस्कॉपिक-13 हैं। डब्ल्यूएचओ ने पानी की जांच के लिए 300 से 400 तरह के पैरामीटरस तय किए हैं, चूंकि भारत में बीआईएस के मानक लागू होते हैं, इसलिए पानी की जांच बीआईएस के मानकों पर सही मानी जाती है।

TDS क्या है?
पानी में घुली हुई सभी चीजों को टीडीएस (टोटल डिसॉल्व्ड सॉलिड्स) कहते हैं। इसमें सॉल्ट, कैल्शियम, मैग्निशियम, पोटैशियम, सोडियम, कार्बोनेट्स, क्लोराइड्स आदि आते हैं। ड्रिंकिंग वॉटर को मापने के लिए टीडीएस (टोटल डिसॉल्व्ड सॉलवेंट), पीएच और हार्डनेस लेवल देखा जाता है। बीआईएस (ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड) के मुताबिक, मानव शरीर अधिकतम 500 पीपीएम (पार्ट्स प्रति मिलियन) टीडीएस सहन कर सकता है। अगर यह लेवल 1000 पीपीएम हो जाता है तो शरीर के लिए नुकसानदेह हैं। लेकिन फिलहाल आरओ से फिल्टर्ड पानी में 18 से 25 पीपीएम टीडीएस मिल रहा है जो काफी कम है। इसे ठीक नहीं माना जा सकता। इससे शरीर में कई तरह के मिनरल नहीं मिल पाते। यहां एक सवाल और है कि हमारे घरों में जो पीने के पानी की सप्लाई सरकारी एजेंसियां करती हैं, उनकी कितनी जांच होती है?

सरकारी प्लांट से घर तक ऐसे पहुंचता है पानी
1. सरकारी एजेंसियों के वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट में पानी नदी या नहर के जरिए आता है तो सबसे पहले पानी में मौजूद अशुद्धियों की जांच होती है। इसके बाद तय किया जाता है कि उस पानी को किस विधि से साफ किया जाना चाहिए।
2. पानी की जांच करने के बाद उसमें क्लोरीन मिलाई जाती है। उसके बाद फिटकरी, पॉली एल्युमिनियम क्लोराइड मिलाया जाता है, ताकि पानी की गंदगी साफ हो सके।
3. इसके बाद पानी क्लोरीफायर में जाता है, जहां अशुद्धियां और गाद नीचे बैठ जाती हैं। यहां पानी की दो बार टेस्टिंग होती है।
4. क्लेरीफायर से पानी फिल्टर हाउस में जाता है, जहां पानी छाना जाता है। फिर से पानी की जांच होती है। इसके बाद पानी को प्लांट में मौजूद जलाशयों में भेजा जाता है। यहां पर दोबारा से क्लोरीनेशन होता है। पानी साफ करने के बाद जितनी भी बार पानी की जांच होती है, उसमें घुलनशील और अघुलनशील अशुद्धियों की जांच की जाती है। अगर पानी में कोई भी गड़बड़ी पाई जाती है तो पानी की सप्लाई रोक दी जाती है। प्लांट से पानी साफ होने के बाद अंडर ग्राउंड रिजरवॉयरों में जाता है। यहां भी घरों में सप्लाई करने से पहले जांच की जाती है। इसके बाद भी जल बोर्ड लोगों के घरों में भी जाकर पानी के सैंपल जांच के लिए उठाता है। इसलिए आरओ कंपनियों का आरोप गलत है कि जल बोर्ड पानी की जांच सही से नहीं करता।

क्या कहा है NGT ने
एनजीटी के निर्देश पर नैशनल एन्वॉयरनमेंट इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टिट्यूट (Neeri), सेंट्रल पलूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB) और IIT-Delhi ने आरओ के इस्तेमाल पर एक रिपोर्ट तैयार कर एनजीटी को सौंपी है। रिपोर्ट के आधार पर एनजीटी ने 28 मई को पर्यावरण मंत्रालय को जारी निर्देश में ये बातें कही हैं:
-देश में 16 करोड़ 30 लाख लोग ऐसे हैं, जिन्हें पीने के लिए साफ पानी नहीं मिलता। यह संख्या पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा है।
-विकसित देशों में भी आरओ का इस्तेमाल कम करने पर जोर दिया जाता है। वहां समंदर के पानी को पीने लायक बनाने के लिए आरओ इस्तेमाल होता है क्योंकि इस पानी में TDS बहुत होता है। वहीं भारत में मौजूद पानी में टीडीएस की मात्रा कम होने के बावजूद आरओ की डिमांड दिन ब दिन बढ़ रही है।
-आरओ सिस्टम बनाने वाली कंपनियों ने पानी को लेकर लोगों में डर का माहौल बना दिया है।
-घरों में सप्लाई होने वाले पानी में अगर TDS 500mg/लीटर से कम है तो RO को बैन कर देना चाहिए।
-लोगों के घरों में जो पानी सप्लाई होता है, उसमें TDS कितना है, यह कैसे पता चले। इसके लिए सरकार को उस पानी के बारे में बिल के जरिए पूरी जानकारी दी जानी चाहिए। बिल पर लिखा रहे कि इस पानी का स्रोत क्या है और उसमें TDS कितना है।
-आरओ सिस्टम से पानी में मौजूद जरूरी मिनरल्स भी पूरी तरह निकल जाते हैं। विदेशों में आरओ के बुरे असर देखा जा रहा है। वहां के लोगों में कैल्शियम और मैग्निशियम की कमी होने की शिकायत आने लगी है। इसलिए भारत में आरओ सिस्टम बनाने वाली कंपनियां यह ध्यान रखें कि पानी में कम से कम 150mg/लीटर टीडीएस जरूर मौजूद रहे।
-जिन इलाकों के पानी में आर्सेनिक और फ्लोराइड जैसे खतरनाक तत्वों की मौजूदगी है, वहां के लिए भी ऐसी तकनीक लाई जाए जिससे कि इनका स्तर कम हो सके ताकि आरओ की जरूरत वहां भी नहीं पड़े।
-आरओ से पानी साफ होने की प्रक्रिया में अमूमन 80 फीसदी पानी बर्बाद हो जाता है और 20 फीसदी ही पीने लायक मिलता है। आरओ कंपनियों को ऐसी मशीन बनाने के लिए कहा जाए, जिसके द्वारा कम से कम 60 फीसदी पानी पीने लायक बने और 40 फीसदी से ज्यादा पानी बर्बाद न हो। वहीं साफ पानी प्राप्त करने की क्षमता को आगे कम से कम 75 फीसदी तक बढ़ाई जाए।

RO कंपनियों का पक्ष
'आरओ पर पाबंदी लगाना समस्या का हल नहीं है। दरअसल, पानी में टीडीएस के साथ-साथ माइक्रोप्लास्टिक, आर्सेनिक, कीटनाशक जैसी दूसरी अशुद्धियां भी होती है जिन्हें आरओ के जरिए हटाया जाना जरूरी है। जहां तक पानी की बर्बादी की बात है तो हमने ऐसी तकनीक विकसित की है कि 80% की जगह 50% पानी ही बर्बाद होता है। हम और रिसर्च करके इसे घटाने की कोशिश कर रहे हैं। BIS और WHO के मापदंडों में कहीं भी यह नहीं बताया है कि टीडीएस कम से कम कितना हो। फिर भी हम यह सुनिश्चित करते हैं कि हमारे आरओ में कम से कम 50mg/लीटर टीडीएस पानी निकले। यह पानी स्वाद और सेहत के लिए मुफीद होता है। डब्ल्यूएचओ ने कहा है कि एक दिन में 4 ग्राम से ज्सादा सॉल्ट नहीं लेना चाहिए, लेकिन भारत एक व्यक्ति 9 ग्राम सॉल्ट लेता है। अगर पानी में ज्यादा टीडीएस होता है तो और ज्यादा सॉल्ट शरीर के अंदर जाता है। उससे ब्लड प्रेशर बढ़ता है। एनजीटी ने जो सवाल उठाए हैं, उसके लिए भी सही तथ्य पेश करने पड़ेंगे ताकि आरओ को लेकर भ्रम की स्थिति ना बने।'
-महेश गुप्ता, चेयरमैन, केंट आरओ

क्या कहते हैं डॉक्टर
'अगर टीडीएस 100 तक है तो वह ठीक है। हां, किडनी के मरीजों के लिए 50 से 100 के बीच टीडीएस होना चाहिए।'
-डॉ़ के. के. अग्रवाल, सीनियर कार्डियॉलजिस्ट

'सेफ वॉटर के लिए अगर बैक्टीरिया, वायरस हटाने हैं तो पानी उबालने से ये सब मर जाते हैं, लेकिन अगर उसमें हेवी मेटल्स हैं तो वे उबालने से नहीं जाएंगे। उसके लिए आरओ की जरूरत होती है।'
-डॉ़ एस. के. सरीन, डायरेक्टर, इंस्टिट्यूट ऑफ लिवर एंड बाइलरी साइंसेज

पानी साफ करने के परंपरागत तरीके
पानी को उबालना: वैसे तो पानी को साफ और पीने योग्य बनाने के लिए ढेरों तरीके मौजूद हैं, लेकिन सबसे पुराना तरीका है पानी को उबालना। दुनियाभर में इस परंपरागत तरीके को लोग अपनाते हैं। पानी को कम-से-कम 20 मिनट उबालना चाहिए और उसे ऐसे साफ कंटेनर में रखना चाहिए, जिसका मुंह छोटा हो ताकि उसमें गंदगी न जाए। उबले पानी को ढक कर रखें। हालांकि उबालने से पानी साफ तो हो जाता है, लेकिन उसमें मौजूद हेवी मेटल्स नहीं निकल पाते।

कैंडल वॉटर फिल्टर: पानी को साफ करने के लिए दूसरा मुफीद तरीका है कैंडल वॉटर फिल्टर। इसमें समय-समय पर कैंडल बदलने की जरूरत होती है ताकि पानी बेहतर तरीके से साफ हो सके। सिरैमिक से बने कैंडल्स पानी से बैक्टीरिया हटाते हैं। हालांकि यह पानी में घुले हुए केमिकल को निकाल नहीं पाता। इसके कैंडल को 6 महीने या इस्तेमाल के हिसाब से बदलते रहना चाहिए। कैंडल की कीमत करीब 550 रुपये से शुरू होती है। फिल्टर के साइज के साथ-साथ कीमत बढ़ती रहती है।

क्लोरिनेशन: पानी साफ करने के लिए क्लोरिनेशन बहुत पुरानी प्रक्रिया है। पानी को हानिकारक बैक्टीरिया से बचाने के लिए नगरपालिका, अस्पताल, रेलवे आदि की टंकियों में क्लोरीन का इस्तेमाल किया जाता है। इस प्रक्रिया से पानी साफ होने के साथ-साथ उसके रंग और गंध में भी बदलाव आ जाता है। क्लोरिनेशन से बैक्टीरिया मर जाते हैं। हालांकि इसका इस्तेमाल सही मात्रा में किया जाना चाहिए क्योंकि ज्यादा क्लोरीन से पानी के स्वाद के साथ हमारी सेहत पर भी असर पड़ता है। घरों में इसका इस्तेमाल करना हो तो एक्सपर्ट की सलाह लें।

पानी साफ करने के आधुनिक तरीके
RO (रिवर्स ऑस्मोसिस)
आरओ पानी साफ करने की ऐसी तकनीक है, जिसमें प्रेशर डालकर पानी को साफ किया जाता है। इस तकनीक में पानी में घुली अशुद्धियां, पार्टिकिल्स और मेटल खत्म हो जाते हैं। आरओ का इस्तेमाल उन इलाकों में करना चाहिए जहां पानी में टीडीएस (टोटल डिसॉल्व्ड सॉल्ट) ज्यादा हो यानी पानी खारा हो। मसलन बोरवेल के पानी के लिए या समुद्री इलाकों के लिए आरओ सही है।
खूबियां
- आरओ के पानी में कोई भी अशुद्धि नहीं रहती।
- बैक्टीरिया और वायरस को ब्लॉक कर बाहर करता है।
- क्लोरीन और आर्सेनिक जैसी अशुद्धियों को भी साफ करता है।
कमियां
- बिजली की जरूरत पड़ती है।
- यह नॉर्मल से ज्यादा टैप वॉटर प्रेशर में काम करता है।
- औसतन 20 से 50 फीसदी पानी आरओ के रिजेक्ट सिस्टम से बर्बाद होता है।
- कई आरओ हमारे पीने के पानी से जरूरी मिनरल्स को बाहर कर देते हैं।

कौन-सा RO लें?
आरओ के इतने ब्रैंड्स और फीचर्स आने के बाद सबसे ध्यान रखने वाली बात यह है कि जो भी फाइनल करें, वह आपके इलाके के सप्लाई वॉटर के हिसाब से हो। मसलन, अगर मेट्रो सिटी में रह रहे हैं तो जाहिर है कि वहां का पलूशन लेवल ज्यादा होगा। इसका असर सप्लाई हो रहे पानी पर भी पड़ेगा। ऐसे में प्योरीफायर वही लें जिसमें RO, UV, UF तीनों तकनीक हो। इसके साथ ही चूंकि जरूरी मिनरल्स की शरीर को जरूरत होती है, ऐसे में बाजार में आ चुकी TDS (टोटल डिसॉल्व्ड सॉल्ट) कंट्रोलर तकनीक से लैस प्योरिफायर ही लें, जिससे शरीर में बैलेंस बना रहे।

UV (अल्ट्रावॉयलेट)
इस तकनीक से पानी में मौजूद बैक्टीरिया और वायरस खत्म होते हैं। यह पानी में घुली क्लोरीन और आर्सेनिक को साफ नहीं कर सकता। इसका इस्तेमाल उन इलाकों में ही होना चाहिए जहां ग्राउंड वॉटर पहले से मीठा हो और सिर्फ बैक्टरिया को खत्म किए जाने की जरूरत हो। मसलन, पहाड़ी और कम प्रदूषण वाले इलाकों के लिए ठीक है। इसे समुद्री इलाकों में या प्रदूषित शहरों में इस्तेमाल करना सही नहीं होगा।
खूबियां
- सभी बैक्टीरिया और वायरस को खत्म कर देता है।
- यह नॉर्मल टैप वॉटर प्रेशर में काम कर सकता है।

अल्ट्रा फिल्ट्रेशन (UF)
यह एक फिजिकल तकनीक है। इसे ग्रैविटी तकनीक भी कहते हैं। इसमें किसी केमिकल का उपयोग किए बिना पानी साफ हो जाता है। इसमें तकनीक अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन तरीका एक ही है और वह यह कि यह ग्रैविटी की वजह से इसमें पानी विभिन्न परतों से होते हुए नीचे पहुंचती है और इस दौरान पानी साफ हो जाता है। कुछ में इसके लिए मेंब्रेन (झिल्ली) का इस्तेमाल होता है तो कुछ में सेरेमिक का जिससे पानी छनकर साफ होकर मिलता है।
खूबियां
- बिजली की जरूरत नहीं।
- बैक्टीरिया और वायरस को मार कर पानी से बाहर करता है।
- नॉर्मल टैप वॉटर प्रेशर में काम कर सकता है।
-किसी केमिकल इस्तेमाल नहीं होता।
-यह सस्ता है।
कमियां
पानी हार्ड हो और क्लोरीन और आर्सेनिक की मात्रा ज्यादा हो तो इसका कोई फायदा नहीं। यह घुली हुई अशुद्धियों को साफ नहीं कर पाता।

पोर्टेबल प्योरिफायर
यह छोटे आकार का होता है। इसमें अक्सर नैनो टेक्नॉलजी या फिर मेटल बेस्ट प्योरिफिकेशन होता है।
खूबियां
-इसमें बिजली की जरूरत नहीं होती।
-इसे कहीं भी साथ ले जाना आसान है।
-इसे सीधे टैप में लगाकर साफ पानी मिल जाता है।
कमियां
-ज्यादा गंदा पानी के लिए कारगर नहीं।
-हार्ड वॉटर या खारे पानी में काम नहीं करता।
-बैक्टीरिया और वायरस को निकालने की इसकी क्षमता कम होती है।

हैलोजन टैब्लेट: इमर्जेंसी या ट्रैकिंग के दौरान पानी साफ करने के लिए हैलोजन टैब्लेट का इस्तेमाल किया जाता है। ये गोलियां पानी में पूरी तरह घुल जाती हैं। बाजार में पोर्टेबल एक्वा वॉटर टैब्लेट्स की 50 टैब्लेट्स लगभग 500 रुपये में आती हैं। इसी तरह एक्वाटैब्स वॉटर प्योरिफिकेशन की 100 टैब्लेट्स लगभग 1100 रुपये में आती हैं।

चंद जल सूत्र
Q. फिल्टर होने के कितने दिनों बाद तक उस पानी को पी सकते हैं?
A. आरओ से फिल्टर होने के बाद पानी अगर सही तापमान यानी फ्रिज में रखा है तो करीब एक हफ्ते तक ठीक रहता है।

Q. फिल्टर को कितने समय पर बदल लेना चाहिए?
A. अगर आप अपने घर में हर दिन 20 लीटर पानी साफ करते हैं तो फिल्टर को 6 महीने के अंदर बदल देना चाहिए।

Q. पानी साफ होने के बाद आरओ से बर्बाद हुआ पानी पौधों में डाल सकते हैं?
A. एक अनुमान के मुताबिक दिल्ली में घरों में लगे आरओ से हर दिन काफी पानी बर्बाद हो जाता है। इतने पानी से करीब 20 लाख लोगों की प्यास बुझाई जा सकती है। चूंकि आरओ पानी से सारी अशुद्धियां निकाल देता है तो बर्बाद हुए पानी में प्रदूषण ज्यादा होता है। अगर इस पानी को पौधों में डालेंगे तो पानी के जरिए प्रदूषण पौधों में भी जाएगा। साथ ही, यह पानी जमीन के अंदर जाने पर जमीन के पानी को भी खराब करेगा। हालांकि, कुछ कंपनियों का यह दावा कि इस पानी को स्टोर करके गार्डनिंग कर सकते हैं। इस बेकार पानी को इस्तेमाल करने का बेस्ट तरीका है कि इसका इस्तेमाल कपड़ा धोने और साफ-सफाई में किया जाए।

Q. कहा जाता है कि आरओ वॉटर से बाल धोने से फायदा होता है। क्या यह सही है?
A. चूंकि आरओ वॉटर से प्रदूषण फैलाने वाले कण निकल जाते हैं। इसलिए आरओ के पानी से बाल धोने से फायदा हो सकता है।

Q. पानी की टंकी के लिए सबसे बेहतरीन मटीरियल कौन-सा है?
A. वॉटर टैंक किसी भी मैटिरियल का हो अगर उसमें पानी लगातार निकलता और भरता रहता है तो वह हानिकारक नहीं है। अगर पानी के टैंक में पानी लंबे समय तक जमा रहता है तो मटीरियल से फर्क पड़ सकता है। वैसे फूड ग्रेड प्लास्टिक का पानी टैंक सबसे अच्छा माना जाता है। इससे पानी की क्वॉलिटी खराब नहीं होती। आजकल स्टेनलेस स्टील की भी टंकियां आने लगी हैं। सीमेंट की टंकियों की परंपरा पुरानी है।

Q. तांबे या चांदी के बर्तन में पानी पीने से क्या वाकई फायदा होता है?
A. तांबे या चांदी के बर्तन में पानी पीने से तभी फायदा होता है जब पानी पहले से साफ हो। गंदा पानी इन बर्तनों में रखकर पीने से फायदे के बजाय नुकसान करेगा क्योंकि जब पानी तांबे, चांदी या सोने जैसे मेटल के संपर्क में आता है तो आयोनाइजेशन प्रक्रिया होती है। अगर पानी साफ होता है तो यह फायदा करता है, लेकिन अगर पानी गंदा हुआ तो यह नुकसानदायक साबित होता है।

Q. क्या स्टेनलेस स्टील का परंपरागत वॉटर फिल्टर शुद्ध पानी देता है?
A. स्टेनलेस स्टील का परंपरागत वॉटर फिल्टर तभी कामयाब होता है जब पानी में टीडीएस या क्लोराइड या फ्लोराइड या वायरस जैसी हानिकारक अशुद्धियां नहीं हैं। अगर ये अशुद्धियां हैं तो वह पानी शुद्ध नहीं कर पाता।

Q. घर के अंदर पानी सप्लाई के लिए किस तरह की पाइप अच्छी मानी जाती हैं?
A. फूड ग्रेड प्लास्टिक की पाइपलाइनें सबसे अच्छी मानी जाती हैं। जीआई पाइप में जंग लगने की आशंका होती है।

Q. अगर गर्मी में पानी की टंकी से बहुत गर्म पानी आ रहा है हो तो क्या आरओ को बंद कर देना चाहिए?
A. अगर पानी की टंकी का पानी 40 से 45 डिग्री सेल्सियस तक गर्म है तो आरओ चलाने में कोई दिक्कत नहीं है। अगर इससे ज्यादा गर्म होता है तो आरओ को बंद कर देना चाहिए।

Q. आजकल में गली-गली में वॉटर प्यूरिफायर यूनिटें लग गई हैं। इनसे गैलन में पानी पैककर मोहल्लों, खासकर बाजारों में बेचा जाता है। क्या उस पानी की क्वॉलिटी स्तरीय होती है?
A. कई इलाकों में पानी की सप्लाई कम होने या पानी साफ न होने की वजह से लोग पानी की 20 लीटर का गैलन खरीदते हैं। यह 40-70 रुपये में आता है। इसे सप्लायर कई बार इस्तेमाल करते हैं और अक्सर इन्हें ढंग से साफ नहीं किया जाता। हालांकि कुछ बड़ी कंपनियां साफ-सफाई का ख्याल रखती हैं। बोतल की गंदगी के अलावा पानी की क्वॉलिटी पर भी सवाल है। हां, अगर किसी ने बीआईएस से लाइसेंस लिया हो तो उसका पानी पी सकते हैं।

Q. क्या पानी फूड कैटिगरी में शामिल है?
A. भारत में पानी फूड कैटिगरी में नहीं है। दुनिया के तमाम देशों में इसे फूड कैटिगरी में रखा गया है। अगर पानी फूड की कैटिगरी में आ जाता है तो उस पर 'प्रीवेंशन ऑफ फूड अडल्ट्रेशन ऐक्ट' लागू होगा। ऐसे में अगर पानी में कोई मिलावट हुई तो यह आपराधिक श्रेणी में आ जाएगा और पानी सप्लाई करने वाली एजेंसी पर केस दर्ज हो जाएगा। भारत में अधिकतर पानी की सप्लाई सरकारी एजेंसियों के पास ही है। अगर इस दायरे में पानी आता है तो लोगों को साफ पानी देने की जिम्मेदारी इन एजेंसियों की हो जाएगी।
Q. क्या कोई प्राइवेट कंपनी भी पानी की जांच करती है? क्या इसके लिए पैसे भी लगते हैं?
A. अगर पानी गंदा आ रहा है तो इसकी जांच जल बोर्ड की लैबरेटरी से कराई जा सकती है। यह पूरी तरह से फ्री है। प्राइवेट कंपनियों से भी जांच कराई जा सकती है। मिनिस्ट्री ऑफ साइंस के तहत एनएबीएल प्रमाणित लैबरेटरी से पानी की जांच कराई जा सकती है। एनएबीएल की वेबसाइट www.nabl-india.org पर जाकर, ऊपर लिखे Laboratory Search को क्लिक करने पर Accredited Laboratories का ऑप्शन आता है, इसमें जरूरी जानकारी भरने पर आपको नजदीकी लैब के बारे में पूरी जानकारी मिल जाती है। यहां से पूरे देश की लैबरेटरीज की जानकारी और उनके नंबर लिए जा सकते हैं।

घर में क्वॉलिटी चेक
मार्केट में पानी का टीडीएस मापने की एक पेननुमा मशीन आती है। इसे डिजिटल टीडीएस मीटर कहते हैं। यह मीटर 600 से 1500 रुपये तक की आता है। हालांकि इससे सिर्फ टीडीएस का ही पता चलेगा। दिल्ली जल बोर्ड की लैब में फोन करके भी सैंपल चेक करवा सकते हैं। जल बोर्ड की टीम सैंपल उठाने आएगी और जांच के बाद आपको पूरी रिपोर्ट देगी। ऐसा ही दूसरे शहरों की पानी सप्लाई करने वाली सरकारी एजेंसी करती है।

दिल्ली में पानी की जांच के लिए इन नंबरों पर संपर्क किया जा सकता है:
टोल फ्री: 1916
011-23634469
9650291021

आखिर में निचोड़ क्या है?
Q. अगर सरकारी एजेंसी द्वारा पीने के पानी की सप्लाई की जा रही है तो क्या प्योरिफायर की जरूरत है?
A. अगर सरकारी एजेंसियों की पाइपलाइनें सही हैं, उनमें लीकेज नहीं है और पानी घर की टंकी में स्टोर भी नहीं किया जा रहा यानी पानी सीधे इस्तेमाल कर रहे हैं तो वह पानी पीने के लिए सेफ है। इसके लिए प्योरिफायर की जरूरत नहीं है, लेकिन अमूमन ऐसा कम ही होता है। पानी की पाइप्स में लीकेज भी होते हैं और हम उन्हें टंकी में स्टोर भी करते हैं। ऐसे में सेरमिक फिल्टर वाला प्योरिफायर इस्तेमाल करना चाहिए।

Q. अगर पीने के पानी का सोर्स ग्राउंड वॉटर है, तब कौन-सा प्योरिफायर इस्तेमाल करें?
A. इसके लिए जरूरी है कि सबसे पहले ग्राउंड वॉटर की जांच कराएं। अगर पानी साफ है तो सिर्फ फिल्ट्रेशन से काम चल जाएगा। सच तो यह है कि ज्यादातर जगहों पर ग्राउंड वॉटर साफ है, लेकिन फैक्ट्री या डंप एरिया के करीब के ग्राउंड वॉटर में केमिकल्स मिल जाते हैं। अगर पानी में आर्सेनिक, क्लोराइड या फ्लोराइड की मौजूदगी है, तब आरओ लगाना जरूरी हो जाता है।

Q. क्या आरओ प्यूरीफायर से मिनरल्स वाकई निकल जाते हैं?
A. आरओ पानी से सूक्ष्म पोषक तत्व भी निकाल देता है। इन तत्वों के निकलते ही पानी की पीएच वैल्यू गिर जाती है यानी पानी फिर ऐसिडिक बन जाता है। पीएच का स्केल 0-14 के बीच होता है। पीएच वेल्यू 7 से नीचे होने पर पानी ऐसिडिक होता है। 7 से ऊपर होने पर पानी अल्केलाइन होता है। हमारा शरीर 97 फीसदी तक अल्केलाइन है। पीने लायक पानी की पीएच वैल्यू 6.5 से 8.5 के बीच होना चाहिए।

Q. आजकल आरओ कंपनियां दावा करती हैं कि वे पानी में मिनरल्स भी मिलाती हैं। क्या यह दावा सही है? और इससे सेहत पर कोई बुरा असर तो नहीं पड़ता?
A. आरओ के जरिए पानी साफ करने से अशुद्धियों के साथ-साथ पानी के पोषक तत्व भी खत्म हो जाते हैं। इसलिए आजकल कई आरओ कंपनियां मिनरल्स कैंडल्स के जरिए बाहर से पोषक तत्व भी पानी में मिलाती हैं। उनका यह दावा किसी हद तक सही है। दूसरा भी तरीका है। सबसे पहले पानी से बैक्ट्रीरिया मारने के लिए यूएफ फिल्टर से पानी को साफ किया जाता है। अब 90 फीसदी पानी को आरओ तकनीक में से गुजारा जाता है। इससे घुलनशील अशुद्धियां जैसे मैग्निशियम, कैल्शियम और मिनरल्स आरओ के जरिए खत्म हो जाती हैं। यूएफ फिल्टर से साफ किए हुए बाकी 10 फीसदी पानी को अब इसमें मिला दिया जाता है ताकि मिनरल्स की कमी पूरी की जा सके। इससे सेहत पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता है।

Q. क्या आरओ का पानी पीना सेहत के लिए हानिकारक है?
A. पानी में मौजूद हर तरह की चीजों को आरओ निकाल देता है। इसमें केमिकल्स, मिनरल्स, पल्यूटेंट्स और टीडीएस भी शामिल हैं। पानी से मिनरल्स को भी पूरी तरह निकाल देने से लंबे समय तक मिनरल रहित पानी पीना सेहत के लिए समस्या पैदा कर सकता है। एक तरफ कैल्शियम के निकल जाने से हड्डियों में कमजोरी आ सकती है तो मैग्निशियम की कमी से क्रैंप्स हो सकते हैं। हालांकि, इसमें बहुत ज्यादा घबराने की जरूरत नहीं है। कारण यह है कि अब ज्यादातर आरओ कंपनियां अपने आरओ के पानी में मिनरल्स मिलाने लगी हैं।

...और आखिर में एक एक्सपर्ट की राय
घर में अगर सरकारी पानी आ रहा है तो आरओ लगवाने की कोई जरूरत नहीं है। आरओ का पानी मिनरल-रहित होता है- यह बात सामने आने पर कंपनियां अब कुछ मात्रा में मिनरल मिलाने लगी हैं। पर यह कोई समाधान नहीं है। वे एक फिक्स्ड फॉर्म्युले में मिनरल मिलाते हैं, पर यह फॉर्म्युले किसने तय किया है? किस आधार पर तय हुआ है? हर इलाके का जमीन का पानी अलग किस्म का होता है और पानी में करीब 140 किस्म के मिनरल होते हैं। आरओ हर तरह के वायरस का भी खात्मा नहीं कर पाता। मसलन: सुपरबग वायरस।
-संजय शर्मा, प्रेसिडेंट, Be Enviro Wise

संडे नवभारत टाइम्स 

No comments:

Post a comment