Saturday, 20 April 2019

ब्लैक होल के खुलते राज

"अगले 20 साल में खुल जाएंगे ब्रह्मांड के कई बड़े राज"
खगोल विज्ञानी प्रियंवदा नटराजन से राजेश मित्तल की बातचीत

पिछले हफ्ते गुरुवार को ब्लैक होल की पहली तस्वीर जारी हुई। यह ब्लैक होल हमारी धरती से करीब 30 लाख गुना बड़ा है। इससे विराट ब्रह्मांड की अनसुलझी गुत्थियां फिर से चर्चा में आ गई हैं। आइए, पहले हम ब्रह्मांड यानी यूनिवर्स के बारे में अपनी बुनियादी समझ दोहरा लेते हैं और फिर इसके बारे में एक शीर्ष विज्ञानी से बातचीत करते हैं।

हमारी धरती सूरज के चारों ओर घूमती है। दूसरे 7 ग्रह भी सूरज के चक्कर लगाते हैं। सूरज, उसके आठों ग्रहों (प्लैनेट्स), उनके चंद्रमाओं आदि को मिलाकर हम सौरमंडल (सोलर सिस्टम) कहते हैं। हमारे सूरज जैसे ढेरों तारे हैं जो हमें रात में आसमान में दिखाई देते हैं। इन तारों के समूह को आकाशगंगा (गैलक्सी) कहते हैं। हमारी वाली आकाशगंगा का नाम मंदाकिनी (मिल्की वे) है जिसमें हमारी धरती, हमारे वाला सूरज, दूसरे कई तारे, उनके ग्रह, उपग्रह, धुएं और धूल के विशाल बादल आदि शामिल हैं। कई आकाशगगाएं मिलकर कलस्टर बनाती हैं। कई कलस्टरों से मिलकर सुपर कलस्टर बनता है। कई सुपर कलस्टर मिलकर ब्रह्मांड (यूनिवर्स) का निर्माण करते हैं।

ब्रह्मांड में जब हम बेहतरीन से बेहतरीन दूरबीन (टेलिस्कोप) से देखते हैं तो ज्यादा से ज्यादा 13.8 अरब प्रकाशवर्ष पुरानी आकाशगंगाओं के दर्शन हमें होते हैं। लेकिन इससे यह नतीजा निकालना गलत होगा कि यह ब्रह्मांड 13.8 अरब प्रकाशवर्ष बड़ा है। वजह, ब्रह्मांड लगातार फैल रहा है। इसलिए 13.8 अरब वर्ष पुरानी जो आकाशगगाएं हम देख रहे होते हैं, असल में वे आकाशगगाएं इस समय खिसक कर हमसे करीब 46.5 अरब प्रकाशवर्ष दूर जा चुकी होती हैं। यानी वर्तमान में ब्रह्मांड का फैलाव 46.5 अरब प्रकाशवर्ष (93 अरब प्रकाशवर्ष व्यास) तक हो चुका है। प्रकाशवर्ष वह पैमाना है जिसके जरिए हम लंबी दूरियां नापते हैं। प्रकाशवर्ष से इसलिए कि इस ब्रह्मांड में सबसे तेज रफ्तार रोशनी की है। रोशनी 1 सेकंड में करीब 3 लाख किलामीटर का फासला तय कर लेती है। एक साल में रोशनी जितनी दूरी तय करती है, उसे पैमाना बनाकर दूरी को प्रकाशवर्ष में नापा जाता है। तो 93 अरब प्रकाशवर्ष बड़ा ब्रह्मांड भी ब्रह्मांड की सीमा नहीं है। पूरा ब्रह्मांड हमें दिखाई देने वाले ब्रह्मांड से काफी बड़ा है। इसका कोई ओर-छोर नहीं। यह ब्रह्मांड अनंत है। ऐसा माना जाता है कि हमारे ब्रह्मांड जैसे भी ढेरों ब्रह्मांड हैं।

हमारे वाला ब्रह्मांड कैसे बना, इस बारे में अंतिम रूप से प्रमाणित तथ्य फिलहाल विज्ञान के पास नहीं हैं। कई थिअरी हैं। सबसे स्थापित थिअरी बिग बैंग को ब्रह्मांड का शुरुआती चरण मानती है। इसके मुताबिक, किसी वक्त ब्रह्मांड एक परमाणु से भी छोटा था। सूक्ष्म बिंदु में करीब 140 करोड़ साल पहले महाविस्फोट हुआ। इसे ही बिग बैंग कहते हैं। विस्फोट से बिंदु टुकड़े-टुकड़े होकर इधर-उधर छिटकने लगा। इसी से ब्रह्मांड की शुरुआत हुई। आकाशगंगाएं, तारे, ब्लैक होल, ग्रह आदि बने। लेकिन ब्रह्मांड के फैलने का सिलसिला अब भी लगातार जारी है। लगता था कि एक समय इसका फैलना बंद हो जाएगा और यह वापस एक बिंदु में समा जाएगा। लेकिन 1998 में हबल टेलीस्कोप की वजह से पता चला कि ब्रह्मांड जिस रफ्तार से यह फैल रहा है, वह रफ्तार भी लगातार बढ़ रही है। यानी कोई बाहरी ताकत है। वैज्ञानिकों का मानना है कि एेसा डार्क एनर्जी के कारण हो रहा है। यह डार्क एनर्जी हमारे आसपास हर जगह मौजूद है। पर यह हमें दिखाई नहीं देती। इसीलिए इसे हम डार्क कहते हैं। इसे हम न तो माप सकते हैं और न ही इसकी जांच कर सकते हैं। हां, इसका असर हमें महसूस होता है। यह खाली जगहों पर पाई जाती है।

दरअसल यह ब्रह्मांड जितना हमें दिखता है, वह समूचे ब्रह्मांड का सिर्फ 5 फीसदी हिस्सा ही है। बाकी 95 फीसदी अदृश्य है। इसमें से डार्क एनर्जी 68 फीसदी है। बाकी 27 फीसदी डार्क मैटर है जिसे सन 1933 में खोजा गया था। यह अणु-परमाणु से न बना होकर ऐसे जटिल और अनोखे कणों से बना है जिनके बारे में हमें अभी तक पता नहीं चला है। इस ब्रह्मांड में जितनी भी चीजें हमें दिखाई देती हैं, वे सब या तो खुद रोशनी फेंकती हैं या फिर रोशनी रिफ्लेक्ट करती हैं लेकिन डार्क मैटर ये दोनों ही काम नहीं करता। इसलिए इसे देखना मुमकिन नहीं। तभी यह डार्क मैटर कहलाता है। पर इसका असर दिखता है। दरअसल डार्क मैटर ही इतनी ताकतवर ग्रेविटी पैदा करता है कि हर आकाशगंगा के सभी तारे उसी आकाशगंगा में बंधे रहते हैं। वे इधर-उधर नहीं बिखरते।

कुल मिलाकर डार्क मैटर ब्रह्मांड को बांधे रखने का काम करता है जबकि डार्क एनर्जी ब्रह्मांड का लगातार विस्तार करती रहती है। इस वजह से हर आकाशगंगा का एक-दूसरे से फासला बढ़ता जाता है। इसी ब्रह्मांड में ब्लैक होल नाम की ऐसी चीज भी है जो अपने दायरे में आने वाली हर चीज को निगल जाती है। ऐसा उसकी ग्रैविटी के जबरदस्त खिंचाव के कारण होता है। इस पर भौतिकी के नियम लागू नहीं होते। ब्लैक होल के बाहरी हिस्से को इवेंट हॉराइज़न कहते हैं। ब्लैक होल की खोज सन 1964 में हुई थी। इसे हम अंतरिक्ष में बनी गहरी खाई भी कह सकते हैं। जैसे चादर में छेद, जैसे मौत का कुआं, जैसे कुप्पी की बनावट, जैसे पानी से भरी बाल्टी में हाथों से घुमाकर बनाया गया भंवर।

पूरे ब्रह्मांड में अलग-अलग आकार के ढेरों ब्लैक होल हैं, पर हमारे सौरमंडल में कोई ब्लैकहोल नहीं है। हां, हमारी आकाशगंगा के बीचोबीच एक विराट ब्लैक होल है जो हमारे सूर्य से करीब 1 करोड़ गुना बड़ा है।

ब्लैक होल कैसे बने, इस बारे में दो थिअरी हैं। एक थिअरी यह कि जब कोई विशाल तारा खत्म होने को होता है तो वह अपने अंदर ही सिमटने लगता है। कुछ वक्त बाद वह ब्लैक होल बन जाता है। दूसरी थिअरी यह कि ब्लैक होल बिग बैंग के बाद बना पहला आकाशीय पिंड है। सबसे पहले ब्लैक होल बना। ब्लैक होल से ही विभिन्न तारे बने। तारों से ग्रह, उपग्रह आदि बने।

ब्लैक होल में गिरने के बाद चीज़ें कहां जाती हैं, इसका अभी तक पता नहीं चल पाया है। वजह यह कि ब्लैक होल रोशनी को अपने अंदर जज्ब कर लेता है। रिफ्लेक्ट नहीं करता। तभी उस पर रोशनी डालने पर भी घुप्प अंधेरे के अलावा दूसरा कुछ दिखाई नहीं देता। इसलिए ब्लैक होल का कोई फोटो सीधे-सीधे लेना मुमकिन ही नहीं। हाल में इसका पहला फोटो जिसे बताया गया है, वह दरअसल कंप्यूटर से बना एक वर्चुअल फोटो है जो 8 बड़ी रेडियो दूरबीनों से मिले डेटा के आधार पर बना है। फिर भी यह विज्ञान की बड़ी कामयाबी है। ब्लैक होल के बारे में कई जरूरी सवालों का जवाब मिलना अभी बाकी है। मसलन, ब्लैक होल में गिरी चीज़ें क्या किसी दूसरे डाइमेंशन में चली जाती हैं? क्या ब्लैक होल दूसरे डाइमेंशंस में जाने का दरवाज़ा है? कहीं हम किसी दूसरी दुनिया, किसी दूसरे ब्रह्मांड में तो नहीं पहुंच जाएंगे? जैसे ब्लैक होल हैं, वैसे ही क्या वाइट होल भी अंतरिक्ष में हैं?

इन्हीं तरह के सवालों के जवाब पाने के लिए स्विट्जरलैंड की सर्न लैब में इन दिनों कई प्रयोग हो रहे हैं। दुनिया की यह सबसे बड़ी लैब फ्रांस-स्विट्जरलैंड सीमा पर 27 किलोमीटर लंबी सुरंग में बनी हुई है। यहां अरबों डॉलर का खर्चा करके लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर नाम की महामशीन लगाई गई है। इसकी मदद से यह पता लगाया जाएगा कि ब्रह्मांड किन हालात में बना था। उन हालात को पैदा करके स्टडी करने की कोशिश की जा रही है। इस प्रयोग में भारत समेत दुनिया भर के करीब सौ देशों के हज़ारों वैज्ञानिक हिस्सा ले रहे हैं। सर्न लैब से ही गॉड पार्टिकल यानी हिग्स बोसोन होने के ठोस सबूत सन 2012 में मिले थे। आजकल यहां डार्क मैटर पर प्रयोग चल रहे हैं। उम्मीद है कि ब्रह्मांड से जुड़ी कई पहेलियां जल्दी ही सुलझ जाएंगी।

इंटरव्यू...............................

अनंत ब्रह्मांड की जटिल गुत्थियों को बारीकी से समझने के लिए राजेश मित्तल ने प्रियंवदा नटराजन से पिछले दिनों जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के दौरान बातचीत की। प्रियंवदा अमेरिका की येल यूनिवर्सिटी में एस्ट्रॉनमी की प्रफेसर हैं। अपनी रिसर्च से उन्होंने ब्लैक होल और डार्क मैटर के बारे में दुनिया की समझ बढ़ाने में अहम योगदान किया है। पेश हैं उनसे बातचीत के खास हिस्सेः

Q. ब्रह्मांड के बारे में हमें अब तक क्या पता है और क्या नहीं पता?
A. हमें पता है कि ब्रह्मांड कैसे शुरू हुआ, वक्त बीतने के साथ किस तरह इसका विस्तार हुआ। हमें मालूम है कि इस ब्रह्मांड का सिर्फ 5 फीसदी हिस्सा ही नॉर्मल मैटर से बना है, 68 फीसदी हिस्सा डार्क एनर्जी है और 27 फीसदी डार्क मैटर। हमें यह भी पता है कि डार्क एनर्जी कार के एस्केलेटर की माफिक ब्रह्मांड फैलने की रफ्तार बढ़ा रही है। पर यह नहीं पता कि असल में यह है क्या। अगर यह पता चल जाए तो अतीत, वर्तमान और भविष्य की तमाम गुत्थियां खुल सकती हैं। आखिर में इस ब्रह्मांड का क्या होगा, यह इस बात पर तय होगा कि डार्क एनर्जी असल में क्या है । इसी तरह हमें डार्क मैटर का पता है कि यह ग्रैविटी पैदा करता है, पर यह जानकारी नहीं है कि डार्क मैटर बना किससे है।

Q. डार्क एनर्जी और डार्क मैटर की प्रकृति के अलावा और किन सवालों के जवाब कॉस्मोलजी फिलहाल खोज रही है?
A. बिग बैंग से पहले क्या था? किन हालात में बिग बैंग शुरू हुआ और क्यों? पहली आकाशगंगा कैसे बनी? पहला ब्लैक होल कैसे बना?

Q. इन सवालों का जवाब कब तक मिलने के आसार हैं?
A. उम्मीद है कि 20 बरस में। अभी हम सुनहरे दौर से गुज़र रहे हैं। आज हमारे पास सभी ज़रूरी उपकरण और डेटा हैं। हां, पूरे ब्रह्मांड की पहेली को सुलझाने में कई सदियां लग सकती हैं। सुलझेंगी या नहीं, यह भी पक्के तौर पर नहीं कह सकते।

Q. कॉस्मोलजी से जुड़ीं कौन-सी गलत धारणाएं आम प्रचलित हैं?
A. एक तो यह कि इस ब्रह्मांड का कोई केंद्र है। सचाई यह है कि ब्रह्मांड का कोई केंद्र नहीं है। दूसरी गलत धारणा यह है कि ब्रह्मांड कुछ और बनने के लिए फैल रहा है जबकि सचाई यह है कि ब्रह्मांड फैल तो रहा है लेकिन कुछ अलग बनने के लिए नहीं। अक्सर एक मिसाल दी जाती है गुब्बारे के फैलने की। ब्रह्मांड वैसे ही फैल रहा है, जैसे हवा भरने पर गुब्बारा फैलता जाता है। लेकिन यह तुलना एक सीमा तक ही सही है। गुब्बारा जैसे-जैसे फूलता है, वह बाहर हवा की जगह को घेरता है, पर ब्रह्मांड खुद में फैलता है। उसका विस्तार किसी बाहरी इलाके में नहीं होता।

Q. ब्रह्मांड लगातार फैलता ही जा रहा है लेकिन दिल्ली-मुंबई का फासला तो ज्यों का त्यों है?
A. ब्रह्मांड फैल तो रहा है, इससे आकाशगंगाओं के बीच की दूरी भी बढ़ रही है, लेकिन उनका आकार नहीं बढ़ रहा। ऐसे में हमारी वाली आकाशगंगा में स्थित दिल्ली-मुंबई में दूरी भी नहीं बदलेगी। इसे अच्छी तरह यों भी समझ सकते हैं कि आकाशगंगाएं बंद बक्सों की माफिक हैं। इन बक्सों के बीच दूरी तो बढ़ रही है, पर बक्सों का आकार उतना ही है।

Q. आजकल समानांतर ब्रह्मांड की भी बात हो रही है?
A. हां, इस थिअरी में माना जाता है कि हमारे ब्रह्मांड में जो कुछ भी है, उसका प्रतिरूप समानांतर ब्रह्मांडों में मौजूद है। हमारी ज़िंदगी में जो कुछ भी घट सकता है, वह सब दूसरे ब्रह्मांडों में घटित हो रहा है। मसलन, अभी राजेश यहां मेरा इंटरव्यू ले रहे हैं, किसी दूसरे ब्रह्मांड में मुमकिन है कि प्रियंवदा राजेश का इंटरव्यू ले रही हो और किसी तीसरे ब्रह्मांड में राजेश क्रिकेट खेल रहे हो सकते हैं। जितनी तरह की संभावनाएं हो सकती हैं, वे सब संभावनाएं दूसरे ब्रह्मांडों में वाकई हो रही हैं। लेकिन यह अभी आइडिया ही है। इसे अभी साबित नहीं किया जा सका है।

Q. क्या हम बुलबुले है - न पूर्वजन्म और न ही पुनर्जन्म?
A. मेरा पूर्वजन्म में विश्वास नहीं है, न ही अगले जन्म में।सचाई यह है कि पूरे ब्रह्मांड के सामने हम अप्रासांगिक हैं। हमारी कोई औकात नहीं है। अंतरिक्ष से जब हमारा सूरज भी धूल के कण से भी छोटा नज़र आता है तो वहां हमारा वजूद क्या होगा। हमारे चारों तरफ पृथ्वी की तरह के करीब 5000 ग्रह हैं। कहीं न कहीं ज़िंदगी होगी और यह ज़िंदगी ज़रूरी नहीं कि हमारी तरह हो। बहुत ही प्राथमिक स्तर का जीवन भी हो सकता है मछली जैसा या हमसे उन्नत प्राणी भी हो सकते हैं। लेकिन अपने ग्रह के हिसाब से हम कुछ प्रभावी हैं। और कुछ नहीं तो हमारे पास विनाश की क्षमता है। अंधाधुंध विकास की होड़ में हम अपने ग्रह को बर्बाद कर रहे हैं।

Q. आपने तो दर्शन की भी पढ़ाई की है। यह ब्रह्मांड क्यों बना है? इसके पीछे क्या मकसद है?
A. मकसद खोजने में मेरी कोई रुचि नहीं। हम यहां क्षण भर के लिए हैं। इस ब्रह्मांड को किसी प्रयोजन की ज़रूरत नहीं है। वह है तो है। प्रयोजन तो इंसानों को ढूंढना चाहिए।

Q. तो इंसानों का प्रायोजन क्या होना चाहिए?
A. यह कि हम खुद को बस अपने और अपने परिवार तक ही सीमित न रखें। दुनिया के लिए भी कुछ करके जाएं। इस दुनिया पर कोई अच्छा असर डाल कर जाएं। दूसरों की मदद करें।

Q. आपने ऐसा क्या किया है जिससे आपको संतुष्टि मिली हो, जीवन की सार्थकता मिली हो?
A. मेरे मन में बस यह है कि मेरे किसी आइडिया पर मेरे बाद में भी काम हो। ब्रह्मांड की कोई पहेली जब भी कभी सुलझे, उसमें कुछ योगदान मेरा भी हो।

Q. आपका अब तक का योगदान क्या है?
A. डार्क मैटर की मैपिंग करने में मैंने कुछ योगदान किया है। बताया है कि यह डार्क मैटर कितने टुकड़ों में बंटा हुआ है, इसकी बारीकियां क्या हैं, ब्लैक होल कैसे फैलते हैं। इस पर भी काम कर रही हूं कि पहला ब्लैक होल कैसे बना।

Q. ब्रह्मांड पर आप जो रिसर्च कर रही हैं, उसमें टेलीस्कोप के अलावा और किन-किन टूल्स का इस्तेमाल होता है?
A. हम लोग कंप्यूटरों का इस्तेमाल करते हैं।

Q. आम कम्प्यूटर या कोई सुपर कंप्यूटर?
A. अपनी रिसर्च के लिए सुपर कंप्यूटर का भी इस्तेमाल करती हूं और एक आम लैपटॉप का भी। पेंसिल-पेपर का भी इस्तेमाल होता है। इसके अलावा हबल और चंद्रा टेलीस्कोप से मिले डेटा का विश्लेषण करती हूं।

Q. क्या भारत में भी इन सब चीजों पर रिसर्च हो रही है?
A. 10 साल पहले तक भारत इस क्षेत्र में पिछड़ा हुआ था। बेसिक रिसर्च पर पैसे खर्च नहीं किए जा रहे थे। दरअसल बेसिक रिसर्च का कोई फौरी फायदा नहीं होता। मानव जिज्ञासा शांत करने के लिए यह की जाती है।
लेकिन अब भारत में भी बेसिक रिसर्च पर काफी खर्चा किया जा रहा है। सभी अहम प्रोजेक्टों में भारत भाग ले रहा है। ब्लैक होल्स की स्टडी के लिए तीसरा लीगो डिटेक्टर भारत में ही बनाया जा रहा है जो 2025 में काम करने लगेगा। आजकल जो भी रिसर्च हो रही है, उसे कोई एक देश अपने बलबूते पर नहीं करता। कई देश मिलकर करते हैं।

Q. हाल में किसी संस्था ने दुनिया के सौ शीर्ष वैज्ञानिकों की सूची तैयार की है। उसमें बहुत कम महिला वैज्ञानिक हैं। विशुद्ध विज्ञान की रिसर्च में महिलाएं काफी कम हैं। ऐसा क्यों?
A. बाहर भी ऐसा ही है। सभी संस्थाएं पुरुषों ने बनाई हैं। उन्होंने दूसरों को आने नहीं दिया। लेकिन अब स्थिति बदल रही है। सचाई यह है कि प्रतिभा सबके पास है, सब लोग एक प्रतिभा, किसी तोहफे के साथ पैदा होते हैं।लेकिन कुछ लोग किस्मत वाले होते हैं जिन्हें अपने इस तोहफे का इस्तेमाल करने का पूरा मौका मिलता है।ज़्यादातर लोगों को यह मौका नहीं मिलता है। यह स्थिति बदलनी चाहिए। हर बच्चे में जो जन्मजात प्रतिभा है, उसे पहचान कर उसे बढ़ावा देना होगा, उसे विकसित करना होगा और उसे ऐसे मौके देने होंगे कि वह प्रतिभा का इस्तेमाल कर सके। तभी सारे समाज को लाभ होगा। प्रतिभा महिलाओं में ही नहीं, डिफरेंटली एबल्ड लोगों में भी है। इस दुनिया की समस्याओं को दूर करने के लिए हमें सबकी प्रतिभाओं की जरूरत है।

Q. कहा जाता है कि हमारे धर्मग्रंथों में, वेदों में सारा ज्ञान है?
A. हमारे धार्मिक ग्रंथों में जो कुछ लिखा है और जो विज्ञान कर रहा है, इन दोनों में कोई तुलना नहीं की जा सकती। मिसाल के तौर पर, कोई सवाल करे कि नीले रंग में कितना नमक है तो इसका कोई जवाब नहीं दिया जा सकता। रंग और स्वाद को मिक्स नहीं कर सकते। तमाम धर्मों में जो कहानियां हैं, वे सब कल्पना पर आधारित हैं।

Q. ऐसे कहा जाता है कि हमारी जो पुराने ऋषि-मुनि थे, वे धरती पर बैठे-बैठे दूसरे लोकों की सैर कर लिया करते थे, पूरा ब्रह्मांड वे यहीं बैठे-बैठे देख लेते थे?
A. ऐसा कुछ नहीं है। कोई विज्ञानी इसे नहीं मानता। पर दोनों की बात हम एक साथ करते हैं तो अपने पूर्वजों के ज्ञान की गरिमा घटाते हैं। हम इससे प्रेरणा लेनी चाहिए कि हमारे पूर्वजों के पास ऐसी गज़ब की कल्पनाशीलता थी।कल्पनाशीलता के इस्तेमाल से ही हम विज्ञान की गुत्थियां सुलझाते हैं।

संडे नवभारत टाइम्स से साभार

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