Saturday, 13 April 2019

ब्लैक होल पर विशेष

स्कंद शुक्ला
दुनिया-भर में फैले रेडियो-टेलिस्कोपों ने पहली बार हमारी सआकाश गंगा के केन्द्र में स्थित ब्लैक होल का चित्र खींचा , तो कविमित्र से उस 'मुख-नाभि' पर चर्चा होनी ही थी।

"ब्लैक होल को जानने के लिए विज्ञान-जगत् में इतनी दीवानगी क्यों है ?"

"ब्लैक होल गुरुत्व का चरम है। सिंगुलैरिटी। वहाँ जहाँ सब कुछ नष्ट हो जाता है। उसकी वह सरहद , जिसे हम ईवेंट-होराइज़न कहते हैं , उसके परे हम जानना ही नहीं बल्कि जाना चाहते हैं। किन्तु वर्तमान भौतिकी के नियमों के अन्तर्गत और वर्तमान भौतिकी से संचालित शरीर और यन्त्र लेकर जा नहीं सकते। इसलिए दीवानगी तो बनती ही है।"

"हम्म। जहाँ हम जाना चाहें और न जा सकें , वह प्राकृतिक अवयव दीवाना तो करता ही है।"

"बिलकुल। जिसे हमने आज-तक केवल कल्पनाओं व अप्रत्यक्ष विधियों के सहारे चित्रित किया हो , उसे हम आज टेलिस्कोपों से वास्तविक रूप में देख सके हैं। धुँधला ही सही , किन्तु वह चित्र सत्य तो है ! महत्त्व उस शक्तिशाली पिण्ड के दर्शन का है , जिसके एक चम्मच द्रव्यमान में करोड़ों सूर्यों की द्रव्यराशि समाहित है !"

"ब्लैक होल के बारे में जानकर भौतिकी किस तरह समृद्ध हो रही है ? दर्शन की अभिभूति के अलावा ?"

"ब्लैक होल वह स्थान है , जहाँ गुरुत्व चरम पर है। वहाँ आइंस्टाइन के नियम और क्वाण्टम भौतिकी के नियम का संगम देखने को मिलता है। बल्कि नियम वहाँ सम्मिलित होकर नष्ट हो जाते हैं। ब्रह्माण्ड के पिण्ड नष्ट , उन्हें संचालित करने वाले नियम भी नष्ट। अतिवृहत् और अतिसूक्ष्म के भौतिक नियमों को हम मिला कर एक सिद्धान्त नहीं बना पा रहे। इस तरह से यह ब्लैक होल हमारी आकाशगंगा की वह मुखनाभि है , जहाँ से हमें जीवन की उम्मीद नहीं किन्तु जीवन को स्थान देने वाले निर्जीव ब्रह्माण्ड के अनेकानेक पिण्डों के जन्म की भी जानकारियाँ प्राप्त होती हैं और होती रहेंगी। यह वह मुख भी है , जिसमें ढेरों तारे व अन्य पिण्ड विनष्ट हो जाते हैं और उनकी ऊर्जा हॉकिंग-विकिरण बनकर ब्रह्माण्ड में फैल जाती है। ब्लैक होल प्रकाश को अपना बन्धक बना लेते हैं , द्रव्यमान को भी , लेकिन हॉकिंग विकिरण उनके ईवेंट होराइज़न से बाहर फूटा करती है।"

"इस हॉकिंग-विकिरण का प्रभाव ?"

"यों समझ लें कि इससे ब्लैक होल आकार में सिकुड़ता जाता है और एक दिन समाप्त हो जाता है।"

"यानी एक दिन यह भी नष्ट !"

"ब्रह्माण्ड सतत परिवर्तनशील है। यहाँ कुछ भी सदा-सर्वदा के लिए। न तारे , न ग्रह , न उपग्रह , न आकाश गंगा , न नीहारिका , न ब्लैकहोल। सब जन्मते हैं , मरते हैं। कविता की भाषा में कहें तो आकाश की यह मुख-नाभि विनष्टि और निर्माण , दोनों की परिस्थितियाँ पैदा करती रहती है।"

"हमारी आकाशगंगा के केन्द्र में जो ब्लैकहोल है , उसका नाम सैजीटेरियस ए स्टार है  न ?"

"जी। ढेर सारी गैलेक्सियों के केन्द्रों में इस तरह के महाविशाल ब्लैकहोल मौजूद हैं। ब्रह्माण्ड के प्रयाग , जहाँ भौतिकी के नियमों का संगम-विलय होता है और जिन्हें हम ढंग से अपने गणित और जीवन के द्वारा विचरना चाहते हैं।"

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