Monday, 28 January 2019

इसरो की कामयाबी और भविष्य की योजनायें

शशांक द्विवेदी 
डायरेक्टर, मेवाड़ यूनिवर्सिटी    
बीता साल 2018 इसरो के लिए बेहद शानदार रहा है, यह साल इसरो की तमाम कामयाबियों के लिए जाना जाएगा।  इस साल इसरो ने सात सफल लांचिंग की हैं। ये आंकड़ा अगले साल तक कई गुना बढ़ जाएगा। 12 जनवरी, 2018 को कार्टोसैट -2 भेजा गया, 14 नवंबर, 2018 को जीसैट-29 लांच किया गया। यह इसरो का सबसे भारी उपग्रह है। इसे भारत ने अपने ही रॉकेट जीएसएलवी मार्क-3 डी टू से भेजा। यह इसरो और देश के लिए बहुत बड़ी कामयाबी है। यह रॉकेट आगे चलकर चंद्रयान-2 और मैन मिशन के लिए काम में लाया जाएगा। इससे भारत को भारी उपग्रह भेजने में आत्मनिर्भरता मिली है। 29 नवंबर को पीएसएलवी सी-43 से हाइसिस लांच हुआ। 19 दिसंबर को जीएसएलवी एफ-11 से जीसैट-7ए लांच हुआ और 5 दिसंबर को फ्रेंच गुयाना (विदेशी जमीन से) से जीसैट-11 की लांचिंग हुई।  इसरो ने इस वर्ष संचार, भू-प्रक्षेपण और नौवहन के क्षेत्र में कई बड़ी और साहसिक कामयाबियां हासिल की हैं। इन सबसे भारतीय वायुसेना की ताकत भी कई गुना तक बढ़ी है। इसरो ने जीएसएलवी रॉकेट से लगातार छठी सफल लॉन्चिंग की। 
इसरो की गगनयान परियोजना  
इसके साथ ही केंद्र सरकार ने हजार करोड़ की महत्वकांक्षी गगनयान परियोजना को मंजूरी दे दी है। अगर यह मिशन कामयाब हुआ तो अंतरिक्ष पर मानव मिशन भेजने वाला भारत दुनिया का चौथा देश होगा। इस प्रोजेक्ट में मदद के लिए भारत ने पहले ही रूस और फ्रांस के साथ करार किया है। इसके तहत तीन सदस्यीय दल को सात दिनों के लिए अंतरिक्ष में भेजा जाएगा। इसरो के चेयरमैन के सिवन का कहना है कि उनकी टीम इस मिशन पर बीते चार महीने से काम कर रही है। मिशन के डिजाइन पर भी काम शुरू हो चुका है। टेस्ट फ्लाइट के तौर पर इसके फाइनल मिशन से पहले दो मानवरहित मिशन लांच किए जाएंगे।इसरो चेयरमैन का कहना है कि पहला मानवरहित मिशन यानी टेस्ट फ्लाइट दिसंबर, 2020 में लांच होगी। दूसरा मानवरहित टेस्ट जुलाई, 2021 में लांच होगा। इसके बाद आखिर में फाइन मिशन यानी ह्यूमन स्पेस फ्लाइट को दिसंबर 2021 में लांच किया जाएगा। बजट पास होने के बाद क्रू की ट्रेनिंग पर काम शुरू हो चुका है। इसमें जरूरत पड़ने पर विदेशी ट्रेनिंग को भी शामिल किया जा सकता है। क्रू मेंबर का चुनाव इसरो और आईएएफ द्वारा संयुक्त तौर पर किया जाएगा।

जिसके बाद उन्हें दो से तीन सालों तक ट्रेनिंग दी जाएगी। इस मिशन के लिए राकेश शर्मा का भी परामर्श लिया जाएगा। इसके लिए कई बड़ी टेक्नोलॉजी जैसे क्रू मॉड्यूल, क्रू एस्केप सिस्टम, एनवायरमेंट सिस्टम और लाइफ स्पोर्ट सिस्टम का इस्तेमाल किया जाएगा। अभी तक ह्यूमन स्पेस फ्लाइट प्रोजेक्ट के लिए बड़ी तकनीकों को विकसित करने में 173 करोड़ रुपये का खर्च आ चुका है।  
अंतरिक्ष में जाने वाले एस्ट्रोनॉट्स को ट्रेनिंग देने के लिए बैंगलोर में ट्रेनिंग सेंटर खोला जाएगा। पहले इसका लक्ष्य 2012 तय किया गया था। अब इसरो एक स्थायी सेंटर खोलने की योजना बना रहा है। बताया जा रहा है कि गगनयान मिशन के लिए चुने जाने वाले लोगों को विदेशी सेंटर में ट्रेनिंग दी जाएगी। इन्हें करीब दो साल तक शून्य गुरुत्वाकर्षण पर ट्रेनिंग दी जाएगी ताकि वह अंतरिक्ष में होने वाले अनुभवों से दो चार हो जाएं। ट्रेनिंग का कुछ हिस्सा बैंगलोर में वायु सेना के इंस्टीट्यूट ऑफ एयरोस्पेस मेडिसीन में पूरा कराया जाएगा। अभी तक उम्मीदवारों के चयन का काम शुरू नहीं हुआ है।
2019 में इसरो 
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने 2019 के लिए 22 से ज्यादा मिशनों का लक्ष्य रखा है। प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने एक सवाल के लिखित जवाब में राज्यसभा को यह जानकारी दी । इसरो ने अगले तीन साल में 50 से अधिक मिशनों के लक्ष्य की अपनी रूप-रेखा प्रकट की है।उन्होंने कहा कि सरकार ने अंतरिक्ष गतिविधियों के लिए बजट में वृद्धि की है।वास्तव में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान कार्यक्रम में पिछले कुछ वर्षों के दौरान अत्यधिक सफल और वाणिज्यिक मिशनों के कारण अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। फिलहाल इसरो के पास बड़ी संख्या में स्वीकृत मिशन हैं जो उद्योग के लिए भी एक बड़ा अवसर दर्शाते हैं।

 2018 में इसरो के अभियान 
अपनी सैन्य क्षमताओं और निगरानी तंत्र को बेहद मजबूत बनाने के लिए जनवरी 2018 में भारत ने पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (पीएसएलवी –सी 38) की सहायता से कार्टोसैट-2 श्रंखला के तीसरे रिमोट सेंसिंग उपग्रह सहित 30 उपग्रहों को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया था । प्रक्षेपित उपग्रहों में 14 देशों के 29 विदेशी उपग्रह भी शामिल थे।  ये सैटेलाइट न सिर्फ भारत के सरहदी और पड़ोस के इलाकों पर अपनी पैनी नजर रखेगा बल्कि स्मार्ट सिटी नेटवर्क की योजनाओं में भी मददगार रहेगा। ये सैटेलाइट 500 किमी से भी ज्यादा ऊंचाई से सरहदों के करीब दुश्मन की सेना के खड़े टैंकों की गिनती कर सकता है। भारत के पास पहले से ऐसे पांच रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट मौजूद है। कार्टोसैट-2 श्रृंखला के तीसरे उपग्रह के प्रक्षेपण के साथ ही भारत की अंतरिक्ष और अधिक पैनी और व्यापक होने जा रही है। हालिया रिमोट सेंसिंग उपग्रह की विभेदन क्षमता 0.6 मीटर की है। इसका अर्थ यह है कि यह छोटी चीजों की तस्वीरें ले सकता है. कोर्टोसैट -2 श्रृंखला के उपग्रह के सफल प्रक्षेपण से भारत को कई फायदे होगें जिसमें अब भारत में किसी भी जगह को अंतरिक्ष से देखने की क्षमता भी हासिल होगी। कार्टोसैट-2 सीरीज के उपग्रहों में पैनक्रोमैटिक और मल्टीस्पेक्ट्रल इमेज सेंसर लगे हैं। इनसे रिमोट सेंसिंग में भारत की काबिलियत सुधरेगी। इन उपग्रहों से मिले डाटा का इस्तेमाल सड़क निर्माण के काम पर निगरानी रखने, बेहतर लैंड यूज और जल वितरण के लिए होगा।  
जीसैट-7ए का सफल प्रक्षेपण 
पिछले दिनों इसरो ने भूस्थैतिक संचार उपग्रह जीसैट-7ए का सफल प्रक्षेपण कर इतिहास रच दिया है। यह सैटलाइट भारतीय वायुसेना के लिए बहुत खास है।  इसके जरिये वायुसेना को भूमि पर रडार स्टेइशन, एयरबेस और एयरबॉर्न वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टपम से इंटरलिंकिंग की सुविधा मिलेगी, जिससे उसकी नेटवर्क आधारित युद्ध संबंधी क्षमताओं में विस्ताकर होगा और ग्लोधबल ऑपरेशंस में दक्षता  बढ़ेगी। 
जीसैट-7ए न सिर्फ सभी एयरबेसेज को आपस में जोड़ेगा बल्कि आईएएफ के ड्रोन ऑपरेशंस में भी इजाफा करेगा। यह सैटेलाइट आईएएफ के कंट्रोल स्टे शनों और ड्रोन के सैटेलाइट कंट्रोल सिस्टाम को अपग्रेड कर सकेगा।
जीसैट-11 की लांचिंग 
इसके साथ ही एक बड़ी कामयाबी हासिल करते हुए भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो ने अब तक के सबसे वजनी सैटेलाइट का प्रक्षेपण कर दिया। दक्षिणी अमेरिका के फ्रेंच गुयाना के एरियानेस्पेस के एरियाने-5 रॉकेट से 5,854 किलोग्राम वजन वाले ‘सबसे अधिक वजनी’ उपग्रह जीसैट-11 को लॉन्च किया गया। जीसैट-11 देशभर में ब्रॉडबैंड सेवाएं उपलब्ध कराने में अहम भूमिका निभाएगा।  इस सैटेलाइट को इंटरनेट कनेक्टिविटी के लिए गेम चेंजर कहा जा रहा है। इसके काम शुरू करने के बाद देश में इंटरनेट स्पीड में क्रांति आ जाएगी। इसके जरिए हर सेकंड 100 गीगाबाइट से ऊपर की ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी मिलेगी।
कुछ साल पहले एक समय ऐसा भी था जब अमेरिका ने भारत के उपग्रहों को लाँच करने से मना कर दिया था। आज स्तिथि ये है कि अमेरिका सहित तमाम देश खुद भारत से अपने उपग्रहों को प्रक्षेपित करवा रहें हैं ।नवंबर 2018 में इसरो ने एक बार फिर अंतरिक्ष में इतिहास रचते हुए भारत सहित 9 देशों के 31 उपग्रहों को पोलर सैटलाइट लॉन्च वीइकल (पीएसएलवी) सी-43 के जरिए लॉन्च कर दिया. इस प्रक्षेपण की खास बात यह है कि इसरो ने दो साल में चौथी बार 30 से ज्यादा सैटेलाइट लॉन्च किए। जनवरी 2017 में 104 उपग्रह लॉन्च कर इसरो ने रिकॉर्ड बनाया था।   पीएसएलवी की 45वीं उड़ान है जिसमें एक माइक्रो और 29 नैनो सैटेलाइट शामिल हैं। पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (पीएसएलवी) की इस साल में यह छठी उड़ान थी। इसमें भारत के सबसे ताकतवर इमेजिंग सैटेलाइट हाइसइस के अलावा अमेरिका (23 उपग्रह) और ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, कोलंबिया, फिनलैंड, मलयेशिया, नीदरलैंड और स्पेन (प्रत्येक का एक उपग्रह) के उपग्रहों का प्रक्षेपण किया गया । इसरो के अनुसार इन उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए उसकी वाणिज्यिक इकाई (एंट्रिक्स कारपोरेशन लिमिटेड) के साथ करार किया गया है।
मुश्किल है एक साथ ज्यादा उपग्रहों की लॉन्चिंग  
इतने सारे उपग्रहों को एक साथ अंतरिक्ष में छोड़ना आसान काम नहीं है। इन्हें कुछ वैसे ही अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया गया जैसे स्कूल बस बच्चों को क्रम से अलग-अलग ठिकानों पर छोड़ती जाती हैं।  बेहद तेज गति से चलने वाले अंतरिक्ष रॉकेट के साथ एक-एक सैटेलाइट के प्रक्षेपण का तालमेल बिठाने के लिए बेहद काबिल तकनीशियनों और इंजीनियरों की जरुरत पड़ती है। हर सेटेलाइट तकरीबन 7.5 किलोमीटर प्रति सेकेंड की रफ्तार से प्रक्षेपित होता है । अंतरिक्ष प्रक्षेपण के बेहद फायदेमंद बिजनेस में इसरो को नया खिलाड़ी माना जाता है। भरोसेमंद लॉन्चिंग में इसरो की ब्रांड वेल्यू में लगातार इजाफा हो रहा है । इससे लॉन्चिंग के कई और कॉन्ट्रेक्ट एजेंसी की झोली में गिरने की उम्मीद है।
अंतरिक्ष में भारत के बढ़ते कदम  
कम लागत और लगातार सफल लांचिंग की वजह से दुनियाँ का हमारी स्पेस टेक्नॉलाजी पर भरोसा बढ़ा है तभी अमेरिका सहित कई विकसित देश अपने सैटेलाइट की लाँचिंग भारत से करा रहें है । फ़िलहाल हम अंतरिक्ष विज्ञान ,संचार तकनीक ,परमाणु उर्जा और चिकित्सा के मामलों में न सिर्फ विकसित देशों को टक्कर दे रहें है बल्कि कई मामलों में उनसे भी आगे निकल गएँ है । अंतरिक्ष बाजार में भारत के लिए संभावनाएं बढ़ रही है ,इसने अमेरिका सहित कई बड़े देशों का एकाधिकार तोडा है ।  असल में इन देशों को हमेशा यह लगता रहा है कि भारत यदि अंतरिक्ष के क्षेत्र में इसी तरह से सफ़लता हासिल करता रहा तो उनका न सिर्फ  उपग्रह प्रक्षेपण के क़ारोबार से एकाधिकार छिन जाएगा बल्कि मिसाइलों की दुनिया में भी भारत इतनी मजबूत स्थिति में पहुंच सकता है कि बड़ी ताकतों को चुनौती देने लगे . भारत अंतरिक्ष विज्ञान में नई सफलताएं हासिल कर विकास को अधिक गति दे सकता है । 
कुलमिलाकर अंतरिक्ष के क्षेत्र में  साल 2018 भारत के लिए बेहद शानदार रहा है । देश में गरीबी दूर करने  और विकसित भारत के सपने को पूरा करने में इसरो काफ़ी मददगार साबित हो सकता है । 
(लेखक राजस्थान की मेवाड़ यूनिवर्सिटी में डायरेक्टर और  टेक्निकल टूडे पत्रिका के संपादक हैं )

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