Wednesday, 29 April 2015

क्या हम प्रलय के क़रीब हैं?


मनीष गुप्ता 
प्रश्न : क्या भगवान है?
संभावित उत्तर : है / शायद है / नहीं है।

प्रश्न: क्या सृष्टि ब्रह्मा, अल्लाह या गॉड ने रची थी?
संभावित उत्तर : हो सकता है / नहीं, आंखें खोलो और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाओ।

उपरोक्त प्रश्नों के अलग अलग जवाब हो सकते हैं? परन्तु अगर आप पूछें कि, 'क्या प्रलय संभव है?' इसका एक ही जवाब होगा कि 'हां है', और आज प्रलय की सम्भावना पिछले हज़ारों वर्षों की तुलना में बहुत अधिक है। वैदर-पैटर्न पिछले दशक में बहुत तेज़ी से बदला है। हद से ज़्यादा सर्दी, गर्मी, सूखा, बाढ़, दुनिया के प्रत्येक कोने में महसूस की गई है। यह आने वाले कल की भीषणताओं के बावस्ता चेतावनी है। कहते हैं सन 2100 तक दुनिया का तापमान 3 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाएगा और इससे ग्रीनलैंड की पूरी बर्फ पिघलने पर समुद्र का लेवल 20-25 मीटर बढ़ सकता है। इससे मुंबई, कोलकता, न्यूयॉर्क, शंघाई, सिडनी, लॉस-एंजेल्स सब डूब जाएंगे।

ये कपोल कल्पना लगती है ना, एक लेख लिखने के लिए सनसनीखेज़ मनगढ़ंत बातें? राइट? तो अब यह सुनें - 2000 द्वीपों वाला मालदीव्स डूब रहा है, आप चाहें तो अपनी रिसर्च कर लें, आप दहल जाएंगे। इसी बात पर एक डाक्यूमेंट्री फिल्म बनी है, 'The Island President' (डूबते देश का रास्ट्राध्यक्ष) जो क्लाइमेट-चेंज पर बनी 'The Day After Tomorrow' से कम लोमहर्षक नहीं है। अंतर सिर्फ इतना है कि डॉक्यूमेंट्री फिल्म एक सच्चाई है।

दुनिया के कई भाग जो समुद्र तल से ज़्यादा ऊंचाई पर नहीं हैं, वे क्षेत्र अपनी भूमि को खो चुके हैं/ रहे हैं। बांग्लादेश और भारत के बीच साझा सुंदरबन धीरे-धीरे पानी की भेंट चढ़ता जा रहा है जो कि वैज्ञानिकों के अनुसार अगले 10-15 साल में ही पूरी तरह जलमग्न हो जायएगा। अभी भी बांग्लादेश का काफी इलाक़ा ज़्यादातर पानी में डूबा रहता है। ये इलाके अब रहने और खेती करने के लायक नहीं हैं। बाद में तो पता नहीं क्या होगा, अभी वर्तमान में भी लाखों बांग्लादेशी शरणार्थी आए हैं। इन शरणार्थियों से कहीं ज्यादा तादाद अवैध अप्रवासियों की है। एक तरफ तो वे बेचारे ख़ुद परेशान हैं, दूसरी तरफ भारत के सीमित संसाधनों पर भी अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है।

अब देखिए कि किस तरह क्लाइमेट-चेंज काम करता है - एक देश में जलस्तर बढ़ा, तो दूसरे देश में अवैध अप्रवासी बढे। अब विपदा का सताया हुआ आदमी किसी भी कीमत पर जीविका ढूंढेगा। आज भारत में कई जगहों पर इन लोगों के कारण लॉ-एंड-आर्डर की स्थिति बिगड़ी है। मूल निवासियों का अमन-ओ-चैन छिन जाता है, ख़ासतौर से आसाम में तो यह एक बहुत बड़ी समस्या है। इस समस्या को आप मुंबई तक में महसूस कर सकते हैं। ना ग्लोबल वार्मिंग होती, ना उपजाऊ ज़मीन डूबती ना ब्रह्मपुत्र की देवमयी वादियों को ख़ौफ़ और नाउम्मीदी का कोहरा जकड़ पाता।

कैलिफोर्निया में सूखा, टेक्सास में बर्फ़बारी, काश्मीर में बाढ़-बेमौसम बारिश, उत्तराखंड में प्रकृति का प्रकोप; यह सब ग्लोबल वार्मिंग का ही परिणाम है। यह असल में हमारी सभ्यता के अंधे व अनियोजित, अंधाधुंध विकास की लोलुपता का नतीज़ा है। इतनी तरक़्क़ी करने के बाद भी इंसान पहले से ज़्यादा खिन्नचित्त, तनावग्रस्त और थका हुआ है। कमोबेश यह हर देश, हर शहर, हर गांव की कहानी है।

पृथ्वी-दिवस पर कई तरह की बातें सुनने पढ़ने को मिलीं - किसी ने कहा कचरा सबसे बड़ा दुश्मन है प्रकृति का; किसी ने कहा अमेरिका; किसी ने लिखा CFC के बारे में; कइयों ने सरकारी नीतियों, या उनके आभाव को दोष दिया। ये सारी बातें सही हैं। समस्या से लड़ने की उनकी योजना भी शायद सही हो। मगर किसी ने ज़ोर से यह बात नहीं उठाई कि इसका सबसे बड़ा कारण है जनसंख्या-विस्फ़ोट। हमने जंगल साफ़ किए हैं, हमने बांध बनाए हैं, और हम लगातार दीमक की तरह प्रकृति को चाट रहे हैं। जो भी उपाय हैं वो तो काम के हैं ही, लेकिन जनसंख्या कैसे नियंत्रण में रख सकें यह सबसे बड़ा मुद्दा है।

ऐसे समय में जब जनसंख्या के बोझ से अधिकांश देश कराह रहे हैं, चीन जनसंख्या कम करने के कोशिश कर रहा है। बुरे समय की पदचाप सुनाई देनी शुरू हो गई है। इसका सबसे बड़ा कारण जनसंख्या है। हमारे पास अभी भी सबको देने के लिए पानी, अन्न, बिजली, रोड, शिक्षा, सुश्रुषा, टॉयलेट्स नहीं हैं। कितने ही लोग इतनी निम्नस्तरीय ज़िंदगी जी रहे हैं कि उनकी दिक्कतों के बारे में पढ़ने पर आप शायद चैन से नहीं सो पाएंगे। शर्मनाक बात है कि विश्व की जनसंख्या बढ़ाने में हम भारतियों का भी खासा योगदान रहा है। बहुत कोफ़्त होती है जब ऐसे समय में कोई पंडित या मुल्ला ज़्यादा बच्चे पैदा करने की बात करता है। ऐसे लोग न केवल जड़ हैं बल्कि देश के दुश्मन भी हैं। न केवल देश, बल्कि ऐसे लोग पूरी मानवता के ही दुश्मन हैं।

फ़ुटनोट :

हर इतवार की तरह सुबह मैं अख़बार का, अपने लेख के मुंबई नवभारत में छपने का, इंतज़ार कर रहा था। लेख तो आया, लेकिन नेपाल की विषादग्रस्त ख़बर के साथ। अगर हम अभी भी नहीं चेतते हैं, और कोई क्रांतिकारी कदम नहीं उठाते हैं तो विध्वंस-नृत्य देखने के लिए तैयार रहें। वैसे वही ठीक होगा क्योंकि इस देश में जनसंख्या कम करने की बात करना जुर्म समझा जाता है। और वैसे भी हम-आप कर क्या सकते हैं - common sense की भला उस देश में क्या औकात जहां मंदिरों-मस्जिदों से सत्ता चलती हो?

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