Wednesday, 29 April 2015

हिमालय को छेड़ेंगे तो विनाश होगा ही

अरुण तिवारी ।।
नेपाल को केंद्र बनाकर आया भूकंप हिमालयी क्षेत्र के लिए न तो पहला है न आखिरी। भूकंप पहले भी आते रहे हैं, आगे भी आते रहेंगे। हिमालय की उत्तरी ढलान यानी चीन के हिस्से में कोई न कोई आपदा महीने में एक-दो बार हाजिरी लगाने जरूर आती है। कभी यह ऊपर से बरसती है तो कभी नीचे सब कुछ हिला के चली जाती है। अभी ऐसी आपदाओं की आवृत्ति हिमालय की दक्षिणी ढलान यानी भारत, नेपाल और भूटान के हिस्से में भी बढ़ गई है। हिमालयी क्षेत्र में भूकंप तो आएंगे ही। इनके आने के स्थान और समय की घोषणा सटीक होगी, इसका दावा नहीं किया जा सकता। दुष्प्रभाव कम होगा, इसका दावा भी तभी किया जा सकता है, जब हिमालय को लेकर हमारी समझ अधूरी न हो और आपदा प्रबंधन को लेकर संवेदना, सावधानी, सतर्कता और तैयारी पूरी हो।
बच्चा पहाड़, कच्चा पहाड़
सबसे पहले तो समझना होगा कि हिमालय बच्चा पहाड़ है, कच्चा पहाड़ है। वह बढ़ रहा है, इसलिए हिल रहा है, इसीलिए झड़ भी रहा है। इसे और छेड़ेंगें तो यह और झड़ेगा, और विनाश होगा। भूकंप का खतरा हिमालय में इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि भारतीय भू-भाग हिमालय को पांच सेंटीमीटर प्रति वर्ष की रफ्तार से उत्तर की तरफ धकेल रहा है। यह स्वाभाविक प्रक्रिया है। इसलिए हिमालयी क्षेत्र में भूस्खलन भी एक स्वाभाविक घटना है। ग्रेट हिमालय और मध्य हिमालय की मिलान पट्टी के नीचे गहरी दरारें हैं। इन दरारों वाले इलाकों में निर्माण करेंगे, तो विनाश होगा ही। मलबा या सड़कों में पानी रिसेगा, तो भी विभीषिका तय है।

दरअसल हमने हिमालयी इलाकों में आधुनिक निर्माण करते वक्त कई गलतियां की हैं। ध्यान से देखें तो हमें पहाड़ियों पर कई 'टैरेस' दिखाई देंगे। स्थानीय बोली में इन्हें 'बगड़' कहते हैं। ये उपजाऊ मलबे के ढेर जैसे होते हैं। पानी रिसने पर ये बैठ सकते हैं। हमारे पूर्वज बगड़ का उपयोग खेती के लिए करते थे। हम बगड़ पर होटेल-मकान बना रहे हैं। हमने नहीं सोचा कि नदी नीचे है, रास्ता नीचे, फिर भी हमारे पूर्वजों ने मकान ऊंचाई पर क्यों बसाये? वह भी उचित चट्टान देखकर। वह सारा गांव एक साथ भी तो बसा सकते थे। लेकिन नहीं। चट्टान जितनी इजाजत देती थी, उतने मकान उन्होंने एक साथ बनाए, बाकी अगली सुरक्षित चट्टान पर। हमारे पूर्वज बुद्धिमान थे। उन्होंने नदी किनारे कभी मकान नहीं बनाए। सिर्फ पगडंडियां बनाईं। लेकिन हमने सड़कें बनाईं। नदी के बीच बांध बनाए। नदी किनारे मलवा फैलाया। नदी के रास्ते और दरारों पर निर्माण किए। कंक्रीट के मकान बनाए, वह भी बहुमंजिले। तीर्थयात्रा को पिकनिक समझ लिया गया है। हम 'हिल व्यू' से संतुष्ट नहीं। पर्यटकों और आवासीय ग्राहकों को सपने भी 'रिवर व्यू' के बेचना चाहते हैं। यह गलत है।

हमारे पूर्वजों ने 20-25 किमी से अधिक गति में वाहन नहीं चलाए। हमने धड़धड़ाती वोल्वो बसों और जेसीबी जैसी मशीनों के लिए पहाड़ के रास्ते खोल दिए। पगडंडियों को राजमार्ग बनाने की गलती की। अब पहाड़ों में और ऊपर रेल ले जाने का सपना देख रहे हैं। पूर्वजों ने तो चौड़े पत्ते वाले बांज, बुरांस और देवदार लगाए। इमारती लकड़ी के लालच में हमारे वन विभाग ने चीड़ ही चीड़ लगाया। चीड़ ज्यादा पानी पीने और एसिड छोड़ने वाला पेड़ है। दरारों से दूर रहना हिमालयी निर्माण की पहली शर्त होनी चाहिए। दूसरी है, जल निकासी वाले मार्गों की सुदृढ़ व्यवस्था। हमें चाहिए कि मिट्टी-पत्थर की संरचना और धरती के पेट को समझकर निर्माण स्थल का चयन करें।
जलनिकासी के मार्ग में निर्माण न करें। नदियों को रोके नहीं, बहने दें। हिमालय को भीड़ और शीशे की चमक पसंद नहीं। इसलिए वहां जाकर मॉल बनाने का सपना न पालें। हिमालयी लोक आस्था, अभी भी हिमालय को एक तीर्थ ही मानती है। हम भी यही मानें। तीर्थ आस्था का विषय है। वह तीर्थयात्री से त्याग, संयम और समर्पण की मांग करता है। हम इसका पालन करें। बड़ी वोल्वो में नहीं, छोटे से छोटे वाहन में जाएं। पैदल तीर्थ करें, तो अति उत्तम। एक तेज हॉर्न से हिमालयी पहाड़ के कंकड़ तक सरक आते हैं। सोचिए, गाड़ियों का लगातार गुजर रहा काफिला हिमालय पर क्या असर डालता होगा। इसलिए अपने वाहन की रफ्तार और हॉर्न की आवाज न्यूनतम रखें। अपने साथ कम से कम सामान ले जाएं और ज्यादा से ज्यादा कचरा वापस लाएं।
कंकर-कंकर में शंकर
राज्य सरकारें आपदा प्रबंधन के लिए जरूरी तंत्र, तकनीक, तैयारी व सतर्कता सुनिश्चित करें। हिमालयवासी अपने लिए एक अलग विकास नीति और मंत्रालय की मांग कर रहे हैं। क्या इस पर ध्यान दिया जाएगा? आखिर ग्रेट हिमालय को संस्कृत में 'हिमाद्रि' यानी आर्द्र हिमालय क्यों कहते है? हरिद्वार को 'हरि का द्वार' और उत्तराखंड-हिमाचल को देवभूमि क्यों कहा गया? पूरे हिमक्षेत्र को 'शैवक्षेत्र' घोषित करने के क्या मायने हैं? शिव द्वारा गंगा को अपने केशों में बांधकर मात्र इसकी एक धारा को धरती पर भेजने का क्या मतलब है? 'कंकर-कंकर में शंकर' का विज्ञान क्या है? इन अवधारणाओं को समझेंगे तो देर-सबेर हम हिमालय के संकट का हल भी निकाल लेंगे।

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