Friday, 24 April 2015

आई गर्मी शुरू हुई पानी की मुश्किल



शशांक द्विवेदी 
नवभारतटाइम्स(NBT) के संपादकीय पेज में 20/04/2015 को प्रकाशित 
नवभारतटाइम्स(NBT)
पिछले दिनों पेयजल की कमी की आशंका को लेकर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने विधानसभा में कहा कि अगर दिल्ली में पानी की कटौती करनी पड़ी तो यह पूरी दिल्ली में एक समान तरीके से की जाएगी। इसमें गरीब, वीआईपी और मंत्रियों को लेकर भेदभाव नहीं किया जाएगा। गर्मियां अपने उरूज पर पहुंचने को हैं और दिल्ली में जल संकट की आहट मिलने लगी है। उसे पड़ोसी राज्य हरियाणा से अतिरिक्त पानी लेना पड़ता है लेकिन इस बार पानी को लेकर दोनों राज्यों में ठन गई है। फिलहाल हरियाणा जितना पानी पहले से दे रहा है, उसके अलावा पानी की कोई अतिरिक्त मात्रा गर्मी में देने को तैयार नहीं है।

बीस में पांच अपने
पिछले दिनों एक वैश्विक संस्था नेचर कंजरवेंसी ने साढ़े सात लाख से अधिक आबादी वाले संसार के 500 शहरों के जल ढांचे का अध्ययन कर यह निष्कर्ष निकाला कि राजधानी दिल्ली पानी की कमी से जूझ रहे दुनिया के 20 शहरों में दूसरे नंबर पर है। जापान की राजधानी टोक्यो इस मामले में नंबर एक है। इस सूची में दिल्ली के अलावा भारत के चार शहर कोलकाता, चेन्नै, बेंगलुरू और हैदराबाद शामिल हैं। सच्चाई यह है कि अपना पूरा देश गंभीर जल संकट की स्थिति से गुजर रहा है। समय रहते प्रबंध नहीं किए गए तो आने वाले समय में यहां विकराल स्थिति उत्पन्न हो जाएगी।

देश में पानी के अधिकांश स्थानीय स्रोत सूख चुके हैं। सैकड़ों छोटी नदियां विलुप्ति के कगार पर हैं। संरक्षण के अभाव में देश के अधिकांश गांव और कस्बों में तालाब-कुएं सिरे से गायब हो गए हैं। गंगा और यमुना भी अधिकतर जगहों पर अत्यधिक प्रदूषित हैं, जिसकी वजह से इनका पानी पीने योग्य नहीं रह गया है। पिछले दिनों आई वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम की एक रिपोर्ट ने जल संकट को 10 शीर्ष वैश्विक खतरों में सबसे ऊपर रखा है। फोरम की 10वीं ग्लोबल रिस्क रिपोर्ट में जल संकट को शामिल किया गया। वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम में प्रस्तुत ग्लोबल रिस्क रिपोर्ट में पहली बार वैश्विक जल संकट को बड़ा और संवेदनशील मुद्दा माना गया है।

कुछ समय पहले तक ग्लोबल रिस्क रिपोर्ट में वित्तीय चिंताओं, चीन की प्रगति, स्टॉक और बांड्स में तेज बदलाव, तेल बाजार के उतार-चढ़ाव इत्यादि को जगह मिलती थी। इस बार फोरम ने पानी की कमी को तरजीह दी है। भारत में भी गर्मियां शुरू हो गई हैं। इस मौसम में जल के कई स्रोत सूखने या जल स्तर कम होने से पानी की किल्लत होने लगती है। लेकिन, अभी यह संकट देश के कई हिस्सों में विकराल रूप धारण करने लगा है।

'जल ही जीवन है' का मुहावरा भारत में काफी प्रचलित है लेकिन इसका वास्तविक अर्थ देश की अधिकांश जनसंख्या को नहीं पता है। पानी के बिना जिंदगी का क्या हाल हो जाता है, इसका अंदाजा पिछले दिनों मालदीव में मची अफरा-तफरी से लगा सकते हैं, जहां भीषण जल संकट की वजह से आपातकाल लगाना पड़ा था। पीने के पानी को लेकर मालदीव में कई जगह हिंसक झड़पें भी हुईं। वहां ये हालात देश के सबसे बड़े वाटर ट्रीटमेंट प्लांट में लगी आग की वजह से पैदा हुए थे। बाद में मालदीव सरकार को भारत के अलावा श्रीलंका, चीन और अमेरिका से भी मदद मांगनी पड़ी।
भारत के कई हिस्सों में पेयजल किल्लत इस कदर बढ़ गई है कि इसका लाभ उठाने के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियां आगे आ गई हैं। कुछ ने जमीन से पानी निकाल कर तो कुछ ने सामान्य जल आपूर्ति के जरिए मिलने वाले पानी को ही बोतल बंद कर के बेचना शुरू कर दिया है। देश में बोतल बंद पानी का व्यवसाय लगातार बढ़ता जा रहा है। निस्संदेह, यह कोई खुशखबरी नहीं है। शहरी इलाकों से लेकर तमाम ग्रामीण क्षेत्रों में औसत गृहणियों का अच्छा-खासा समय पेयजल एकत्र करने में बर्बाद हो जाता है।
सरकारों की यह जिम्मेदारी है कि वे हर नागरिक को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराएं। लेकिन वे इसके लिए सजग नहीं हैं। लोगों को साल भर पर्याप्त पीने का पानी मुहैया कराने के लिए जल संरक्षण और जल संवर्धन की दिशा में प्राथमिकता के साथ काम करना पड़ेगा। बरसाती पानी को संजोकर रखने तथा गंदे पानी को दोबारा प्रयोग में लाने योग्य बनाने की दिशा में गंभीरतापूर्वक काम करने की जरूरत है। इसी तरह भू-जल को प्रदूषण से बचाने पर भी प्राथमिकता के आधार पर ध्यान देना आवश्यक है। समुद्र के पानी को सिंचाई के लिए इस्तेमाल करने की विधि भी विकसित की जानी चाहिए।

बूंद-बूंद से सागर
भू-जल के भारी दुरुपयोग की सबसे बड़ी वजह हमारा मौजूदा कानून है जिसके तहत लोग जितना चाहें उतना जल जमीन से निकालते जा रहे हैं। भू-जल संसाधन के इस्तेमाल को लेकर अभी तक कोई स्पष्ट कानूनी ढांचा नहीं बना है। इस दिशा में भी काम होना चाहिए, लेकिन सबसे अहम मोर्चा है जल संरक्षण। इसके जरिए हम जल संकट से काफी हद तक निजात पा सकते हैं। कहावत है, बूंद-बूंद से सागर भरता है। यदि इस कहावत को अक्षरशः सत्य माना जाए तो छोटे-छोटे प्रयास एक दिन काफी बड़े समाधान में परिवर्तित हो सकते हैं। आकाश से बारिश के रूप में गिरे हुए पानी को बर्बाद होने से बचाना और उसका संरक्षण करना पानी बचाने का एक अच्छा उपाय हो सकता है। जल संरक्षण के लिए इस तरह के कई और प्रयास भी करने पड़ेंगे।

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