Thursday, 9 April 2015

क्या बताएगी दुनिया की सबसे बड़ी मशीन

लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर (एलएचसी) के दोबारा चलनें पर 
चंद्रभूषण
17 मील लंबी यह मशीन हर बार सिर्फ कुछ पेचीदा खबरों से लोगों को चौंकाती भर है। कभी कुछ ऐसा करके नहीं देती, जिसका सिर-पैर समझ में आए। यूरोप की साझा न्यूक्लियर रिसर्च लैबोरेटरी सीईआरएन (सर्न) की लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर (एलएचसी) नाम वाली इस मशीन ने दो-तीन साल पहले गॉड पार्टिकल नाम की एक अजीब चीज खोजकर दुनिया को चौंकाया था। कुछ दिन हल्ला मचा। पीटर हिग्स को 1964 में दी गई उनकी प्रस्थापना सही साबित होने पर नोबेल प्राइज भी मिल गया, लेकिन फिर सब ठंडा पड़ गया। अब इतने दिन बाद वही मशीन दोबारा चल पड़ने का शोर है। जब पिछला ही समझ में नहीं आया तो इस बार क्या आएगा?

फिलहाल इतना ही कहा जा सकता है- धीरज रखें और समझने की कोशिश करते रहें। हो सके तो दुनिया के उन दस हजार सबसे जहीन भौतिकशास्त्रियों की सोचें, जो इस मशीन के पल-पल के काम पर नजर रखे हुए हैं। इससे होने वाले तजुर्बों के पीछे उनका बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है। कुछ समय पहले स्टीवन वाइनबर्ग (वही, जिन्हें बहुत पहले पाकिस्तानी भौतिकशास्त्री अब्दुस्सलाम के साथ फिजिक्स का नोबेल मिला था) ने एक बहुत ही मार्मिक (और उतना ही लंबा) लेख लिखा था कि किस तरह अमेरिका में एलएचसी जैसी ही एक मशीन बनाने की उनकी कोशिश सिरे नहीं चढ़ पाई, क्योंकि लाख सिर मारकर भी वे अपने राजनेताओं को इसका महत्व नहीं समझा पाए थे। यह यूरोपियन नेताओं का ही जिगरा है कि आर्थिक तंगी और आतंकवाद की तमाम बुरी खबरों के बावजूद उन्होंने सर्न के बजट में रत्ती भर कटौती नहीं होने दी।

नखरीली मशीन

एलएचसी दुनिया की सबसे बड़ी ही नहीं, सबसे नखरीली मशीन भी है। इसे बहुत सूक्ष्म स्तर पर 14 टेरा इलेक्ट्रॉन वोल्ट (टीईवी) तक की ऊर्जा पैदा करने के लिए तैयार किया गया है। इसकी मात्रा का अंदाजा कैसे लगाया जाए? एक टीईवी लगभग उतनी ही ऊर्जा है, जिस पर कोई मच्छर आपके कान के पास भनभनाता है? मच्छर के बराबर (चलिए, उसकी चौदह गुनी) ऊर्जा के लिए इतना तामझाम? जी हां, बशर्ते यह याद रखें कि इतनी ऊर्जा के साथ जो दो प्रोटॉन आपस में टकराए जाते हैं, उनका वजन मच्छर का करोड़ अरब-अरब (1 के बाद 25 जीरो) वां हिस्सा भर ही हुआ करता है। यह सारा इंतजाम इस टक्कर से निकलने वाले मलबे का अध्ययन करने के लिए है। मुहावरा जरा सा घुमा दें तो 'क्या प्रोटॉन और क्या प्रोटॉन का शोरबा!'

तीन साल पहले मशीन जब आधी ताकत पर चली तो इतने में ही इलेक्ट्रिकल टेंशन से उसमें लगा तांबे का एक जोड़ खुल गया। मशीन का टेंपरेचर माइनस 271 डिग्री सेल्सियस बनाए रखने के लिए वहां भरी गई लिक्विड हीलियम रिस गई और सब कुछ भरभंड हो गया। मरम्मत के बाद अभी हाल में दोबारा इसे चलाया गया तो पता चला, जोड़ाई में इस्तेमाल धातु का एक बारीक सा टुकड़ा भीतर ही रह गया है। डर था कि सारा सिलसिला फिर से न शुरू करना पड़े। गनीमत है कि मसला जल्दी हल हो गया। बहरहाल, हम-आप जैसे लोगों के लिए मसला इतना छोटा नहीं है। जैसे यह कि इस मशीन को करना क्या है? क्यों इतने पढ़े-लिखे लोग इसमें इतनी दिलचस्पी ले रहे हैं? हमारे लिए इसका मतलब क्या है?

क्वांटम मेकेनिक्स और हाई एनर्जी फिजिक्स को कुछ लोग अंधेरे में काली बिल्ली पकड़ने की कला बताते हैं। पिछले तीन सालों में एलएचसी ने काली बिल्ली को थोड़ा भूरा बना दिया है। गॉड पार्टिकल या हिग्स बोसॉन ने एक अर्से से फिजिक्स के सामने खड़ी काली दीवार में एक हल्की सी दरार पैदा कर दी है, हालांकि दीवार आज भी ज्यों की त्यों है। धरती गोल है या चपटी, इस किस्म के सवालों में आपकी जरा भी दिलचस्पी हो तो जरा इस सवाल पर सोच कर देखें- ऐसा क्यों है कि कुछ मूल कणों में वजन होता है, लेकिन कुछ में बिल्कुल नहीं होता? मसलन, परमाणु के भीतरी कणों में बिजली ढोने वाले इलेक्ट्रॉन सबसे हल्के होते हैं, फिर भी इनमें वजन होता है, लेकिन रोशनी के कण फोटॉन जरा भी वजनी नहीं होते।

डार्क मैटर
हिग्स और कई अन्य वैज्ञानिकों ने मूल कणों का जो स्टैंडर्ड मॉडल प्रस्तावित किया था, उसमें इस सवाल का जवाब है। कणों में वजन हिग्स फील्ड से आता है। जब तक हिग्स बोसॉन के होने को लेकर दुविधा थी, तब तक कुछ हलकों में यह मॉडल मजाक की चीज समझा जाता था। एलएचसी ने साबित कर दिया कि हिग्स बोसॉन होते हैं। जिस तरह इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन, न्यूट्रॉन वगैरह के ज्यादातर गुण आज आठवीं के बच्चे भी जानते हैं, वैसा अभी इनके साथ नहीं है। लेकिन मशीन चल पड़ी है (और अबकी यह दोगुनी रफ्तार और दस गुनी सघनता से चलेगी) तो उम्मीद करें कि एक-दो सालों में इनके बारे में काफी कुछ जान लिया जाएगा। फिजिक्स के अंधेरे की एक बड़ी मिसाल डार्क मैटर और डार्क एनर्जी नाम के दो अजूबे हैं, जिनके बारे में इतना पता है कि ब्रह्मांड का 95 फीसदी से भी ज्यादा वजन इन्हीं का है। लेकिन ये क्या हैं, कैसे हैं, कुछ नहीं मालूम। क्या दुनिया की सबसे बड़ी मशीन इनका कुछ खाका खींच पाएगी? देखते हैं।


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