Tuesday, 29 April 2014

दुश्मन मिसाइलों को मार गिराने की क्षमता

शशांक द्विवेदी 
इंटरसेप्टर मिसाइल देश के लिए के लिए बड़ी कामयाबी
द्विस्तरीय बैलेस्टिक मिसाइल रक्षा तंत्र के विकास में बड़ी कामयाबी हासिल करते हुए दुश्मन के बैलिस्टिक मिसाइल को हवा में ही ध्वस्त करने के लिए भारत ने सुपरसोनिक इंटरसेप्टर मिसाइल का सफल परीक्षण किया। भारत ने पहली बार पृथ्वी डिफेंस व्हिकल (पीडीवी) की सहायता से इस मिसाइल द्वारा लक्ष्य को मार गिराया। इससे पृथ्वी की कक्षा से बाहर ही लक्ष्य को भेदा जा सकेगा। 
भारत के लिए यह मिसाइल रक्षा कवच बहुत  जरूरी हो गया था क्योंकि चीन और पाकिस्तान लगातार अपने मिसाइल कार्यक्रमों को बढ़ावा दे रहें है । चीन के पास बैलेस्टिक मिसाइलों का अम्बार लगा हुआ है ऐसे में अपनी सुरक्षा के लिए यह जरूरी हो गया था कि दुश्मन की मिसाइल को हवा में ही नष्ट करने का सिस्टम विकसित किया जाए । 1962 के युद्ध में हम चीन से हार चुके हैं और पाकिस्तान से तो दो बार सीधी जंग हो चुकी है। लेकिन, अब यदि जंग की आशंका बनती है तो युद्ध पहले की अपेक्षा बिल्कुल दूसरे ढंग से लड़ा जायेगा। इसमें परमाणु बमों से लैस मिसाइलों का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। जिस तरह आजकल परमाणु हथियारों और मिसाइलों के आतंकवादियों के हाथों में पड़ने की आशंका जतायी जा रही है, उससे भी चिंतित होना स्वाभाविक है। अमेरिका, रूस,इस्राइल जैसे देशों के पास ये तकनीक हैं। लेकिन यदि भारत पर इस तरह के हमले होते हैं तो ऐसी स्थिति में हमारे पास बचने का उपाय नहीं रहता । नतीजतन, इन सभी पहलुओं को देखते हुए भी भारत का एंटी मिसाइल सिस्टम से लैस होना बहुत जरूरी था ।  आज महानगरों की घनी आबादी को देखते हुए इस तरह का एंटी मिसाइल सिस्टम हमारी सख्त जरूरत बन चुका है । इस मिसाइल कवच के विकसित होने से हमारे ऊर्जा स्रोतों मसलन, तेल के कुएं और न्यूक्लियर प्रतिष्ठानों की सुरक्षा सुनिश्चिलत की जा सकेगी ।
भारत पृथ्वी डिफेंस व्हिकल  (पीडीवी) की सहायता से पृथ्वी के वायुमंडल से ऊपर करीब 120 किलोमीटर तक के लक्ष्य को भेद सकता है। इस मिशन के लिए विशेष रूप से बनाए गए पीडीवी इंटरसेप्टर व द्विस्तरीय मोटरयुक्त लक्ष्य से इसका परीक्षण किया गया। जहां बंगाल की खाड़ी में जहाज से छोड़े गए छद्म लक्ष्य को सफलतापूर्वक मार गिराया गया। इसकी मारक क्षमता करीब दो हजार किलोमीटर की दूरी तक है। रडार आधारित इस प्रणाली में लक्ष्य को खोजने का कार्य उससे मिलने वाले डाटा से किया जाता है। पृथ्वी के वातावरण से मिसाइल के बाहर जाते ही हीट शील्ड निकलती है और इंफ्रारेड सीकर खुल जाता है, जिससे लक्ष्य को निशाने पर लिया जाता है। एंटी मिसाइल सिस्टम में संवेदनशील राडार की सबसे ज्यादा अहमियत है। ऐसे राडार बहुत पहले ही वायुमंडल में आये बदलाव को भांप कर आ रही मिसाइलों की पोजिशन ट्रेस कर लेते हैं। पोजिशन लोकेट होते ही गाइडेंस सिस्टम एक्टिव हो जाता है और आ रही मिसाइल की तरफ इंटरसेप्टिव मिसाइल दाग दी जाती है। इस मिसाइल का काम दुश्मन की मिसाइल को सुरक्षित ऊंचाई पर ही हवा में नष्ट करना होता है। इसे ट्रेस कर, पलटवार करने की प्रक्रिया में महज कुछ सेकेंड का ही अंतर होता है। मिसाइल कवच के बारे में पहली बार अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के समय में अधिक जिक्र हुआ। रीगन ने शीतयुद्ध के समय में स्ट्रेटेजिक डिफेंस इनिशियेटिव (एसडीआइ) प्रस्तावित किया. यह एक अंतरिक्ष आधारित हथियार प्रणाली थी,जिसके सहारे इंटरकांटीनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (आइसीबीएम) को अंतरिक्ष में मार गिराने की बात की गयी थी। लेजर लाइट से लैस इस हथियार को मीडिया ने स्टार वार का नाम दिया था।
कोई मिसाइल या रॉकेट अपने लक्ष्य को निशाना बनाये, उसके पहले ही उसे मार गिराने का विचार सबसे पहले द्वितीय विश्वकयुद्ध के दौरान आया। र्जमन वी-1 और र्जमन वी-2 प्रोग्राम इसी तरह के थे। हालांकि, ब्रिटिश सैनिकों के पास भी यह क्षमता थी और द्वितीय विश्व्युद्ध के दौरान उन्होंने दुश्मन देशों के कई ऐसे मिशन को नाकाम किया। बैलिस्टिक मिसाइल के इतिहास में र्जमन वी-2 को पहला वास्तविक बैलिस्टिक मिसाइल माना जाता है। इसे एयरक्राफ्ट या अन्य किसी युद्धक सामग्री से नष्ट करना असंभव था। इसे देखकर द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिकी सेना ने र्जमन तकनीक की मदद से एंटी मिसाइल तकनीक पर काम करना शुरू किया। लेकिन व्यापक सफलता 1957 में सोवियत संघ द्वारा इंटर कांटीनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल विकसित करने के बाद ही मिली। दुनिया के कई देशों द्वारा मिसाइल परीक्षण करने के कारण इनसे बचाव की जरूरत सभी को महसूस होने लगी है । यही कारण है कि विकसित देश अब मिसाइल सुरक्षा कवच विकसित करने पर अधिक ध्यान दे रहे हैं । अभी फिलहाल यह सिस्टम दुनिया के चुनिंदा देशों के पास ही है । एंटी बैलिस्टिक मिसाइल सिस्टम फिलहाल अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, यूनाइटेड किंगडम, जापान और इजराइल के पास ही है । अब भारत भी इन देशों की श्रेणी में आ गया है, जिसके पास एंटी बैलिस्टिक मिसाइल सिस्टम है. हालांकि, हर देशके पास इससे संबंधित अलग-अलग तकनीक हैं । मसलन, अमेरिका और रूस के पास इंटर कांटीनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल को भी मार गिराने की तकनीक है, जबकि अन्य देशों के पास अभी यह तकनीक नहीं है ।
भारत के एंटी मिसाइल विकास कार्यक्रम में इस्राइल का अहम योगदान है जिसके ग्रीनपाइन रेडार की बदौलत अडवांस्ड एयर डिफेंस (एएडी) मिसाइल प्रणाली के अब तक आठ परीक्षण किए गए हैं। चीन और पाकिस्तान के अलावा अब आतंकवादी संगठनों से मिसाइल हमलों के खतरों को देखते हुए मिसाइल रोधी प्रणाली की जरूरत पैदा हुई है। हाल ही में हमास और इजराइल के बीच लड़ाई के दौरान इजराइल की ऐसी ही रक्षा प्रणाली ऑयरन डोम काफी कारगर साबित हुई थी। ऑयरन डोम ने गाजा पट्टी से इजराइल पर दागे गए 300 से अधिक रॉकेटों को हवा में ही नष्ट कर दिया भविष्य में यदि भारत पर इस तरह का कोई मिसाइल या रॉकेट हमला होता है तो हमारी अपनी बनाई हुई यह प्रणाली अहम साबित होगी।
भारतीय रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन(डीआरडीओ) 2016 तक पांच हजार किमी मारक क्षमता वाली मिसाइलों से बचाने की क्षमता वाला मिसाइल रक्षा कवच (मिसाइल डिफेंस शील्ड) बना लेगा । डीआरडीओ प्रमुख के अनुसार बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा कवच अब परिपक्व है और इसका पहला चरण पूरी तरह तैयार है। इसकी खासियत है कि इसे बहुत कम समय में तैनात किया जा सकता हैं। पहले चरण के तहत यह कवच देश में दो जगहों पर तैनात किया जा सकता है, जहां आधारभूत ढांचा उपलब्ध हो।देश को दुश्मनों से सुरक्षित करने के लिए इंटरसेप्टर मिसाइल का सफल परीक्षण देश के लिए बड़ी सफलता है। 

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