Friday, 18 October 2013

विलक्षण प्रतिभा के धनी थे डॉ. सुब्रह्मण्यम् चंद्रशेखर

नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक डॉ सुब्रह्मण्याम चंद्रशेखर की जयंती पर विशेष 
खगोल भौतिकी को नई दिशा दी 
न्यूट्रॉन तारे और ब्लैक होल के अस्तित्व बताया
देश में ब्रेन.ड्रेन के सबसे बड़े उदहारण
अपनी खोजों से न्यूट्रॉन तारे और ब्लैक होल के अस्तित्व का पता लगाकर नोबेल पुरस्कार विजेता प्रख्यात खगोल भौतिकीविद भारतीय मूल के वैज्ञानिक डॉ सुब्रह्मण्याम चंद्रशेखर ने पूरे विश्व को एक नई दिशा दी थी  । उनके शोध से ही ब्लैक होल के अस्तित्व की धारणा कायम हुई जिसे समकालीन खगोल विज्ञान की रीढ़ प्रस्थापना माना जाता है। महान वैज्ञानिक डॉ चंद्रशेखर  का जन्म 19 अक्तूबर, 1910 को लाहौर (तब के अविभाजित भारत और अब के पाकिस्तान में) में हुआ था। भौतिक शास्त्र पर उनके अध्ययन के लिए उन्हें विलियम ए. फाउलर के साथ संयुक्त रूप से सन् 1983 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला ।
उनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा मद्रास में हुई। 18 वर्ष की आयु में चंद्रशेखर का पहला शोध पत्र इंडियन जर्नल आफ फिजिक्स में प्रकाशित हुआ। मद्रास के प्रेसीडेंसी कॉलेज से स्नातक की उपाधि लेने तक उनके कई शोध पत्र प्रकाशित हो चुके थे। उनमें से एक प्रोसीडिंग्स ऑफ द रॉयल सोसाइटी में प्रकाशित हुआ था, जो इतनी कम उम्र वाले व्यक्ति के लिए गौरव की बात ।
दैनिक जागरण 
24 वर्ष की अल्पायु में सन् 1934 में ही उन्होंने तारे के गिरने और लुप्त होने की अपनी वैज्ञानिक जिज्ञासा सुलझा ली थी। कुछ ही समय बाद यानी 11 जनवरी, 1935 को लंदन की रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी की एक बैठक में उन्होंने अपना मौलिक शोध पत्र भी प्रस्तुत कर दिया था कि सफेद बौने तारे यानी व्हाइट ड्वार्फ तारे एक निश्चित द्रव्यमान यानी डेफिनेट मास प्राप्त करने के बाद अपने भार में और वृद्धि नहीं कर सकते। अंतत वे ब्लैक होल बन जाते हैं। उन्होंने बताया कि जिन तारों का द्रव्यमान आज सूर्य से 1.4 गुना होगा, वे अंतत सिकुड़ कर बहुत भारी हो जाएंगे। ऑक्सफोर्ड में उनके गुरु सर आर्थर एडिंगटन ने उनके इस शोध को प्रथम दृष्टि में स्वीकार नहीं किया और उनकी खिल्ली उड़ाई। पर वे हार मानने वाले नहीं थे। वे पुन शोध साधना में जुट गए और आखिरकार, इस दिशा में विश्व भर में किए जा रहे शोधों के फलस्वरूप उनकी खोज के ठीक पचास साल बाद 1983 में उनके सिद्धांत को मान्यता मिली। परिणामत भौतिकी के क्षेत्र में वर्ष 1983 का नोबेल पुरस्कार उन्हें तथा डॉ. विलियम फाऊलर को संयुक्त रूप से प्रदान किया गया।
27 वर्ष की आयु में ही चंद्रशेखर की खगोल भौतिकीविद के रूप में अच्छी धाक जम चुकी थी। खगोल भौतिकी के क्षेत्र में डॉ. चंद्रशेखर, चंद्रशेखर सीमा यानी चंद्रशेखर लिमिट के लिए बहुत प्रसिद्ध हैं। चंद्रशेखर ने पूर्णत गणितीय गणनाओं और समीकरणों के आधार पर चंद्रशेखर सीमा का विवेचन किया था और सभी खगोल वैज्ञानिकों ने पाया कि सभी श्वेत वामन तारों का द्रव्यमान चंद्रशेखर द्वारा निर्धारित सीमा में ही सीमित रहता है।
सन् 1935 के आरंभ में ही उन्होंने ब्लैक होल के बनने पर भी अपने मत प्रकट किए थे, लेकिन कुछ खगोल वैज्ञानिक उनके मत स्वीकारने को तैयार नहीं थे। यद्यपि अपनी खोजों के लिये डॉ. चंद्रशेखर को भारत में सम्मान तो बहुत मिला, पर 1930 में अपने अध्ययन के लिये भारत छोड़ने के बाद वे बाहर के ही होकर रह गए और लगनपूर्वक अपने अनुसंधान कार्य में जुट गए। चंद्रशेखर ने खगोल विज्ञान के क्षेत्र में तारों के वायुमंडल को समझने में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया और यह भी बताया कि एक आकाश गंगा में तारों में पदार्थ और गति का वितरण कैसे होता है। रोटेटिंग प्लूइड मास तथा आकाश के नीलेपन पर किया गया उनका शोध कार्य भी प्रसिद्ध है। डॉ. चंद्रशेखर विद्यार्थियों के प्रति भी समर्पित थे। 1957 में उनके दो विद्यार्थियों त्सुंग दाओ ली तथा चेन निंग येंग को भौतिकी के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
अपने अंतिम साक्षात्कार में उन्होंने कहा था, यद्यपि मैं नास्तिक हिंदू हूं पर तार्किक दृष्टि से जब देखता हूं, तो यह पाता हूं कि मानव की सबसे बड़ी और अद्भुत खोज ईश्वर है। अनेक पुरस्कारों और पदकों से सम्मानित डॉ. चंद्रशेखर का जीवन उपलब्धियों से भरपूर रहा। वे लगभग 20 वर्ष तक एस्ट्रोफिजिकल जर्नल के संपादक भी रहे। डॉ. चंद्रशेखर नोबेल पुरस्कार प्राप्त प्रथम भारतीय तथा एशियाई वैज्ञानिक सुप्रसिद्ध सर चंद्रशेखर वेंकट रामन के भतीजे थे। 
सन् 1969 में जब उन्हें भारत सरकार की ओर से पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने उन्हें पुरस्कार देते हुए कहा था, यह बड़े दुख की बात है कि हम चंद्रशेखर को अपने देश में नहीं रख सके। पर मैं आज भी नहीं कह सकती कि यदि वे भारत में रहते तो इतना बड़ा काम कर पाते।
कल्पतरु एक्सप्रेस 
लेकिन सच बात तो यह है कि चंद्रशेखर को भारत में ही रह कर शोध करने के लिए वो आधारभूत सुविधाएँ ही नहीं दी गई जिसकी वजह उन्हें भारत छोड़ कर जाना पड़ा । सरकारी स्तर  पर भी इस अद्भुत व्यक्ति को कोई सहायता नहीं दी गई । वे देश में ब्रेन.ड्रेन के सबसे बड़े उदहारण है  । अक्सर भारत से जाने वाला औसत विद्वान भी अमेरिका और यूरोप में जाकर प्रसिद्धि पाने लगता है। निश्चित ही हमारी व्यवस्था में ऐसा कोई दोष है, जिस कारण यहां योग्यता का सही मूल्यांकन नहीं होता। दरअसल, हम योग्यता को नहीं, बल्कि निष्ठा को महत्व देते हैं। योग्यता की बलि देने में जाति, संप्रदाय, भाई-भतीजावाद, विश्वविद्यालयों की गुटबाजी और सरकारी हस्तक्षेप की भूमिका रहती है।  लेकिन हमने भी उनकी उपेक्षा की ये बात देश को स्वीकार करनी ही पड़ेगी । कभी हमने यह खुलकर नहीं जताया कि वह भारतीय मूल के हैं और भारत में उनका स्वागत है। इससे बड़ी हमारी बदकिस्मती क्या हो सकती है कि हमने अपने देश के अंदर एक बड़े विद्वान को जगह नहीं दी और अपने खाते का एक नोबेल सम्मान भी खो दिया। लेकिन यह डॉ. चंद्रशेखर की खुशकिस्मती थी कि उन्हें उस जगह जाने का मौका मिला, जहां शोध और प्रयोगों के लिए काफी अवसर थे। डॉ. चंद्रशेखर की प्रतिभा का अमेरिका ने जो इस्तेमाल किया, उसे हम ब्रेन ड्रेन कहते हैं।
डॉ. चंद्रशेखर सेवानिवृत्त होने के बाद भी जीवन-पर्यंत अपने अनुसंधान कार्य में जुटे रहे। बीसवीं सदी के विश्व-विख्यात वैज्ञानिक तथा महान खगोल वैज्ञानिक डॉ. सुब्रह्मण्यम् चंद्रशेखर का 22 अगस्त, 1995 को 84 वर्ष की आयु में दिल का दौरा पड़ने से शिकागो में निधन हो गया। इस घटना से खगोल जगत ने एक युगांतकारी खगोल वैज्ञानिक खो दिया। यूं तो डॉ. चंद्रशेखर ने काफी लंबा तथा पर्याप्त जीवन जिया पर उनकी मृत्यु से भारत को अवश्य धक्का लगा है क्योंकि आज जब हमारे देश में जायंट मीटर वेव रेडियो टेलिस्कोप की स्थापना हो चुकी है, तब इस क्षेत्र में नवीनतम खोजें करने वाला वह वैज्ञानिक चल बसा जिसका उद्देश्य था भारत में भी अमेरिका जैसी संस्था सेटी (पृथ्वीतर नक्षत्र लोक में बौद्धिक जीवों की खोज) का गठन। आज जब डॉ. चंद्रशेखर हमारे बीच नहीं हैं, उनकी विलक्षण उपलब्धियों की धरोहर हमारे पास है जो भावी पीढ़ियों के खगोल वैज्ञानिकों के लिए प्रेरणा स्रोत बनी रहेगी।
दैनिक जागरण में आज 19/10/2013 को प्रकाशित
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http://epaper.jagran.com/epaperimages/19102013/delhi/18ned-pg8-0.pdf
http://epaper.jagran.com/ePaperArticle/19-oct-2013-edition-National-page_8-2240-100695680-262.html
http://www.kalptaruexpress.com/Details.aspx?id=29424&boxid=15114178


2 comments:

  1. आपको यह बताते हुए हर्ष हो रहा है के आपकी यह विशेष रचना को आदर प्रदान करने हेतु हमने इसे आज के ब्लॉग बुलेटिन - हंसी के फव्वारे पर स्थान दिया है | बहुत बहुत बधाई |

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  2. बहुत बहुत धन्यवाद तुषार जी ....

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