Thursday, 22 August 2013

सिंधुरक्षक हादसा : रक्षा तैयारियों के लिए बड़ा झटका

शशांक द्विवेदी 
पिछले दिनों नौसेना की आईएनएस अरिहंत और आईएनएस विक्रांत की उपलब्धियों के साथ सिंधुरक्षक पनडुब्बी के साथ हुआ हादसा हमारी रक्षा तैयारियों के लिए बहुत बड़ा झटका है। 
मुंबई के कोलाबा में लाइन गेट नेवल डॉकयार्ड में भारतीय नौसेना की ‘पनडुब्बी सिंधुरक्षक’ में भीषण आग की घटना ने बड़े सवाल खड़े कर दिये हैं। हादसे के बाद से पनडुब्बी  पर तैनात 18 नौसैनिक लापता हो गये । अभी तक ७  नौसैनिको  की मौत की पुष्टि हुए है लेकिन  माना जा रहा है कि इन सभी की मौत हो गई है। रक्षा मंत्री एके एंटनी ने भी नौसैनिकों के शहीद होने की आशंका जताई है। ये भीषण आग १३ अगस्त की  रात करीब 12 बजे लगी। चश्मदीदों ने आग से पहले धमाके की आवाजें सुनी। आग ने एक दूसरी पनडुब्बी को भी चपेट में ले लिया। डेढ़ घंटे की मेहनत के बाद आग पर काबू पाया गया, लेकिन सबसे अहम बात ये है कि पनडुब्बीढ में आखिरकार आग कैसे लगी। 
बैटरी चार्जिंग के दौरान धमाका 
विशेषज्ञों के अनुसार  पनडुब्बी में ये धमाका बैटरी चार्जिंग के दौरान हुआ। बताया जा रहा है कि बीती रात पनडुब्बी मुंबई के डॉकयार्ड पर खड़ी थी और बैटरी चार्ज की जा रही थी, तभी किन्हीं वजहों से बैटरी में आग लग गई और देखते ही देखते आग तेजी से बढ़ी और बाद में पनडुब्बी में जोरदार धमाका हुआ। धमाके की लपटें दूर तक देखी गईं। नौसेना ने मामले की जांच के लिए बोर्ड ऑफ इनक्वायरी के आदेश दे दिए हैं।
टारपीडो से लीक हुआ ऑक्सी्जन 
सिंधुरक्षक पनडुब्बी फिलहाल इस्तेमाल में थी और इसमें  टारपीडो और मिसाइल तैनात थे। टारपीडो में ऑक्सीजन भरा होता है जो कि तेजी से आग पकड़ता है। टारपीडो रूम से सटे बैटरी कंपार्टमेंट था जिसमें हाइड्रोजन मौजूद था। आशंका जताई जा रही है कि किसी दुर्घटना के चलते ऑक्सीजन लीक हुआ और हाइड्रोजन से जा मिला। दोनों गैसों के रिएक्शन से आग लग गई, जिसने खतरनाक रुख अख्तियार कर लिया और पनडुब्बी में जोरदार धमाका हुआ। चूंकि टारपीडो और बैटरी कंपार्टमेंट पनडुब्बी के अगले हिस्से में होता है, इसलिए उसका अगला हिस्सा धमाके के बाद बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुआ है। पनडुब्बी का पिछला हिस्सा अभी भी काफी हद तक सुरक्षित बताया जा रहा है।
2010 में भी हुआ था हादसा
2010 में भी सिंधुरक्षक हादसे का शिकार हो चुकी है। उस समय इसमें लगी आग में इलेक्ट्रिकल टेक्नीशियन की मौत हो गई थी। हादसे के बाद भारतीय नौसेना की इस डीजल इलेक्ट्रिक पनडुब्बी सिंधुरक्षक को मरम्मत के लिए अगस्त 2010 में रूस भेजा गया। सिंधुरक्षक की मरम्मत रूस के ज्वेज्दोचका पोत कारखाने में हुई थी। मरम्मत के दौरान पनडुब्बी में क्लब एस क्रूज मिसाइल और 10 भारतीय और विदेश निर्मित प्रणालियां जोड़ी गई थीं। इसके अलावा जहाज की सैन्य क्षमता और सुरक्षा बढ़ाने के लिए पनडुब्बी को ठंडा रखने वाली प्रणाली को उन्नत किया गया था। इसके लिए भारत सरकार ने 490 करोड़ रुपये खर्च किए थे। करीब 2 साल तक मरम्मत का काम चला और इसी साल अप्रैल में सिंधुरक्षक वापस भारत लौटी थी। 
सिन्धुरक्षक पनडुब्बी के बारे में ?
रूस ने 1995 में निर्मित पनडुब्बी (आईएनएस सिंधुरक्षक) को दिसंबर 1997 में भारत को सौंपा था। एक साथ 52 नौसैनिकों की क्षमता वाले सिंधुरक्षक में 19 नॉट्स (35 किलोमीटर प्रति घंटा) की रफ्तार और समुद्र में 300 मीटर की गहराई तक जाने की क्षमता है  । आईएनएस सिन्धुरक्षक, सिन्धुरक्षक श्रेणी की पनडुब्बी थी जिसका मुख्य रूप से इस्तेमाल प्रतिरक्षा या युद्धक परिस्थितियों में किया जा सकता था। सिंधुरक्षक पनडुब्बी की कई खासियतें हैं। भारत की सुरक्षा को मजबूती देने वाली सिंधुरक्षक दुश्मनों को थर्राने का दम रखती है। यह एक डीजल इलेक्ट्रिक पनडुब्बी है।  इस पनडुब्बी का वजन 23 हजार टन है और लंबाई 238 फीट।  इसमें चालक दल के 52 सदस्य सवार हो सकते हैं जो 45 दिन तक लगातार इसमें रह सकते हैं।  इसमें जमीनी हमले की क्षमता है। 300 मीटर गहराई तक गोता लगानेवाली इस  पनडुब्बियों से तारपीडो मिसाइलें दागी जा सकती हैं। रेडियो संचार प्रणाली के अलावा इसमें सभी आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल हुआ है।
हादसों से सबक 
हादसे की वजह चाहे कुछ भी हो लेकिन इतना तय है कि आईएनएस सिंधुरक्षक में सबकुछ ठीक नहीं था। पिछले हादसों से सबक नहीं सीखा गया जिसका नतीजा एक बड़े हादसे के रूप में सामने है। सवाल ये है कि क्या ये लापरवाही है, और अगर ये लापरवाही है तो जिम्मेदार कौन है?इस दुर्घटना के बाद रुस के काम की गुणवत्ता पर  भी कई सवाल खड़े हो गए हैं| जिसकी समीक्षा होना बेहद जरूरी है .
इस हादसे में अट्ठारह नौसैनिकों का बलिदान होना जितना दुखद है, उतनी ही चिंता समुद्र में सुरक्षा तैयारियों के अभियान पर लगे झटके ने भी बढ़ा दी है। पनडुब्बियों के मामले में हम काफी पीछे चल रहे हैं। सिंधुरक्षक के नुकसान के बाद हमारे पास जो पनडुब्बियां बची हैं, वे भी बहुत पुरानी हैं और वे एक के बाद एक नौसेना के बेड़े से हटती जा रही हैं। इस कारण हमारे साढ़े सात हजार किलोमीटर लंबे समुद्र तट की रक्षा सवालों के घेरे में आती जा रही है। भारत को अपने जल क्षेत्र में कम से कम 25 से 30 सबमरीन की जरूरत है, लेकिन अभी 14 से ही काम चलाया जा रहा है। बाकी बची 13 पनडुब्बियां भी पुरानी हो चुकी हैं। इसलिए उन्हें लेकर हमेशा आशंका बनी रहती है। हाल यह है कि सिंधुरक्षक को जिस कीमत पर खरीदा गया था, उसको अपग्रेड करने में उससे ज्यादा पैसा लगा।
हमारे पास एक भी एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्सन सिस्टम वाली पनडुब्बी नहीं है, जिसमें एक लंबे अरसे तक समुद्र के अंदर मौजूद बने रहने की क्षमता होती है। पुरानी तकनीक के कारण हमारी पनडुब्बियों को थोड़े-थोड़े समय के अंतराल में पानी से बाहर निकलना पड़ता है। पनडुब्बियों के निर्माण में स्वदेशीकरण का मामला भी अत्यंत पिछड़ा हुआ है। ठीक इसी प्रकार पनडुब्बियों की मरम्मत के मामले में भी हम आत्म-निर्भर नहीं बन पाए हैं और इसके लिए विदेशों से मदत लेना हमारी मजबूरी है। इस हादसे का सबक यह है कि हम नौसेना को मजबूत बनाने के लिए हमें  पनडुब्बी मामलों में पूर्ण रूप से आत्म निर्भर होना पड़ेगा ,पनडुब्बियों का निर्माण कार्य अब युद्धस्तर पर शुरू करके  इनकी डिजाइन, सुरक्षा के उपाय और रख-रखाव पर पूर्ण निगरानी रखना पड़ेगा । 

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