Monday, 15 April 2013

उम्मीद के साथ इसरो की चुनौतियां भी बढ़ गई हैं


शशांक द्विवेदी॥
नवभारतटाइम्स (NBT) में 11/04/2013 को संपादकीय पेज में प्रकाशित 
पिछले दिनों समुद्र विज्ञान से जुड़े अध्ययनों के लिए भारतीय-फ्रांसीसी उपग्रह सरल के साथ इसरो ने सात उपग्रहों का सफल प्रक्षेपण किया। इनमें छह लघु और सूक्ष्म विदेशी उपग्रह भी शामिल थे। सरल के अलावा, ऑस्ट्रिया के दो सूक्ष्म-उपग्रह यूनीब्राइट और ब्राइट, डेनमार्क के आउसैट-3 और ब्रिटेन के स्ट्रैंड के अतिरिक्त कनाडा के एक सूक्ष्म-उपग्रह नियोससैट और एक लघु-उपग्रह सैफाइर को भी पीएसएलवी से प्रक्षेपित किया गया। लगातार 21 सफल प्रक्षेपण करने का रिकार्ड रखने वाले पीएसएलवी का यह 23वां मिशन है। इस दौरान इसरो ने कुल 35 विदेशी उपग्रहों को अंतरिक्ष में स्थापित किया है। पिछले दिनों ही इसरो ने अपने सौवें अंतरिक्ष मिशन में फ्रांसीसी एसपीओटी-6 और जापान के माइक्रो उपग्रह प्रोइटेरेस को उनकी कक्षा में स्थापित किया था। 712 किलोग्राम वजन वाला यह फ्रांसीसी उपग्रह भारत द्वारा किसी विदेशी ग्राहक के लिए प्रक्षेपित सर्वाधिक वजन वाला उपग्रह था।

होड़ और साझेदारी
19 अप्रैल 1975 में स्वदेश निर्मित उपग्रह 'आर्यभट्ट' के प्रक्षेपण के साथ अपने अंतरिक्ष सफर की शुरूआत करने वाले इसरो की यह सफलता अंतरिक्ष में भारत के बढ़ते वर्चस्व की तरफ इशारा करती है। इसरो ने अब तक 63 उपग्रह, एक स्पेस रिकवरी मॉड्यूल और 37 रॉकेटों का प्रक्षेपण किया है। सुदूरसंवेदी (रिमोट सेंसिंग) उपग्रहों के निर्माण व संचालन में वाणिज्यिक फायदा भी हुआ है। यह सफलता और भी खास इसलिए है क्योंकि भारतीय प्रक्षेपण राकेटों की विकास लागत विदेशी प्रक्षेपण राकेटों की तुलना में एक-तिहाई है। भारतीय कंपनी एंट्रिक्स कॉरपोरेशन और फ्रांस की एस्ट्रियम एसएएस विश्व बाजार में उपग्रहों से ली गई सुदूर संवेदी तस्वीरें भेजने के मामले में एक-दूसरे की प्रतिस्पर्धी हैं। स्पॉट और भारतीय सुदूर संवेदी उपग्रह धरती के छायाचित्र लेने वाले दो मशहूर उपग्रह हैं। इसके बाद भी एक भारतीय रॉकेट से उसके प्रतिस्पर्धी का उपग्रह स्पॉट-6 लांच किया जाना सुखद संकेत है। अमेरिका की फ्यूट्रान कॉरपोरेशन की एक शोध रिपोर्ट बताती है कि अंतरिक्ष जगत के छोटे खिलाडियों के बीच इस तरह का अंतरराष्ट्रीय सहयोग रणनीतिक तौर पर सराहनीय है।

कारोबारी छलांग

उपग्रह के प्रक्षेपण में भारत कारोबारी छलांग पहले ही लगा चुका है, 23 अप्रैल 2007 को भारत के उपग्रहीय प्रक्षेपण यान ने इटली के खगोल उपग्रह एंजिल का सफलता पूर्वक प्रक्षेपण किया। इसके साथ ही भारत व्यवसायिक रूप से विदेशी उपग्रह प्रक्षेपित करने वाले दुनिया के पांच देशों अमेरिका, रूस, फ्रांस और चीन के विशिष्ट क्लब में शामिल हो गया था। 2 अक्टूबर 2008 में मून मिशन की सफलता के बाद इसरो का लोहा पूरी दुनिया मान चुकी है। चांद पर पानी की खोज का श्रेय भी चंद्रयान-1 को ही मिला। अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में हम लगातार प्रगति कर रहे हैं, लेकिन अभी पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं हो पाए हैं। क्रायोजेनिक तकनीकी के परिपे्रक्ष्य में पूर्ण सफलता नहीं मिलने के कारण भारत इस मामले में आत्मनिर्भर नहीं हो पाया है, हालांकि प्रयोगशाला स्तर पर इसका सफलता पूर्वक परीक्षण किया जा चुका है। 2010 में क्रायोजेनिक इंजन की सहायता से लॉन्च किए गए जीएसएलवी के दो अभियान विफल हो गए थे, इसलिए इस पर काम किया जाना अभी बाकी है।
इसरो अध्यक्ष के अनुसार भारत की अंतरिक्ष योजना भविष्य में मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशन भेजने की है। लेकिनइस तरह के अभियान की सफलता सुनिश्चित करने के लिए अभी बहुत सारे परीक्षण किए जाने हैं। 2016 मेंभारत नासा के चंद्र मिशन का हिस्सा बन सकता है और इसरो चंद्रमा के आगे के अध्ययन के लिए अमेरिकी जेटप्रॉपल्शन प्रयोगशाला से साझेदारी भी कर सकता है। आगामी चंद्र मिशन चंद्रयान-2 के संबंध में कार्य प्रगति परहै। 2014 में इसके प्रक्षेपण की संभावना है। यह इसरो और रूसी अंतरिक्ष एजेंसी (रोस्कॉसमॉस) का संयुक्तअभियान है और रूस के नीतिगत निर्णय में देरी से इसमें कुछ बाधा भी पड़ सकती है। चीन के साथ साझा मिशनविफल हो जाने के बाद रूस अपने अंतरग्रही मिशनों की समीक्षा कर रहा है। भारत सरकार को जल्दी फैसले केलिए रूस पर दबाव बनाना पड़ेगा। हाल ही में अमेरिका ने मंगल ग्रह पर अपना मानव रहित यान क्यूरियॉसिटीउतारकर भारी सफलता हासिल की है। इसके बाद भारत सरकार ने भी देश के मंगल अभियान को मंजूरी दे दी।अभियान का मुख्य उद्देश्य मंगल ग्रह पर पहुंचने की भारतीय क्षमता का प्रदर्शन करना है। इससे भविष्य केअभियान का रास्ता भी साफ होगा। मार्स ऑरबिटर मिशन को श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर सेपीएसएलवी-एक्सएल द्वारा भेजने की योजना है। नवंबर 2013 में प्रस्तावित इस अभियान से भविष्य केअभियानों में अंतरराष्ट्रीय सहयोग का रास्ता साफ होगा।

चलो चांद की ओर

1969 में विक्रम साराभाई के निर्देशन में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन का गठन हुआ था। तब से अब तकहम चांद से आगे मंगल तक पहुंचने का सपना देखने लगे हैं। उपग्रहों से मिली सूचनाओं के आधार पर संचार,मौसम संबंधी जानकारी, शिक्षा, टेली मेडिसिन, आपदा प्रबंधन और फसल अनुमान, भूमिगत जलस्रोतों कीखोज, संभावित मत्स्य क्षेत्र की खोज के साथ-साथ पर्यावरण पर निगाह रखने का काम भी हो रहा है। भारत नेअंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में कम संसाधनों और कम बजट में न सिर्फ अपने को जीवित रखा है बल्कि बेहतरीनप्रदर्शन भी किया है। भविष्य में अंतरिक्ष में प्रतिस्पर्धा बढे़गी। भारत के पास कुछ बढ़त पहले से है। इसमें औरप्रगति करके इसका बड़े पैमाने पर वाणिज्यिक उपयोग संभव है। कुछ साल पहले तक फ्रांस की एरियन स्पेसकंपनी की मदद से भारत अपने उपग्रह छोड़ता था, पर अब वह ग्राहक के बजाय साझीदार की भूमिका में पहुंचगया है। यदि इसी प्रकार भारत अंतरिक्ष क्षेत्र में सफलता प्राप्त करता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब हमारे यानअंतरिक्ष यात्रियों को चांद और मंगल की सैर करा सकेंगे। 

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