Monday, 15 April 2013

आम आदमी के हित में हो जल नीति


शशांक द्विवेदी 
भारत जल सप्ताह अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन पर विशेष लेख 
जल संबंधी मुद्दों पर ध्यान केन्द्रित करने के लिए पिछले साल से जल संसाधन मंत्रालय ने भारत जल सप्ताह को वार्षिक अंतरराष्ट्रीय आयोजन के रुप में मनाने की पहल की थी । यह जल संबंधी मुद्दों को वैश्विक मंच प्रदान करेगा जो चुनौतियों, प्रौद्योगिकी प्रदर्शन, अवसरों की खोज, पेशेवरों , संगठनों की उत्कृष्टता की पहचान और उनकी उपलब्धियों को संबोधित करने के लिए नीति निर्धारकों, उद्योग प्रमुखों, विशेषज्ञों, पेशेवरों और व्यवसायिकों को एक साथ लाएगा। भारत जल सप्ताह के दूसरे अंतरराष्ट्रीय आयोजन की श्रृंखला में 8-12 अप्रैल 2013 के दौरान नई दिल्ली में  जल का दक्ष प्रबंधनः चुनौतियां और अवसर थीम पर इसका आयोजन किया जाना एक सकारात्मक संकेत है । यह  कार्यक्रम इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें  भारत सहित 64 देशों के 1,758 लोगों ने भाग लिया और सम्मेलन के दौरान 200 शोध पत्र प्रस्तुत किए गये । इस आयोजन में राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों से तालमेल बनाए रखने के लिए जल संसाधनों की योजना, विकास और प्रबंधन का बहुत महत्व है। देश में इस समय जो संस्थानिक और वैधानिक ढांचा मौजूद है वह पर्याप्त नहीं है तथा तत्काल सुधारों की आवश्यकता है।
अब यहाँ पर सवाल समस्याए बताने से ज्यादा उनके समाधान पर ध्यान केंद्रित करने का है । क्योंकि भारत में आबादी के हिसाब से पहले से ही कम जल की उपलब्धता और कम होती जा रही है जिसे देखते हुए अपने स्वामित्व वाली भूमि से जितना चाहे भू-जल निकालने की छूट को नियंत्रित करने के लिए कानून बनाए जाने की सख्त जरूरत है। पिछले साल भारत जल सप्ताह में प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह और केंद्रीय जल संसाधन मंत्री ने आम आदमी  के हितों के अनुकूल जल नीति बनाने को कहा था लेकिन वह अभी तक नहीं बन पाई । वर्तमान जल नीति का जो मसौदा है उसमे काफी शकाएँ और आशंकाएं है जिसमे जल को एक कमोडिटी के रूप में देखा जा रहा है जो भविष्य में जल के निजीकरण की दिशा में प्रयास है । इस नीति में आम आदमी की व्यवहारिक समस्यायों पर ध्यान केंदित नहीं किया गया है । पानी के बाजारीकरण ,निजीकरण या  कमोडिटी बनने के बाद अमीर और गरीबों के बीच, किसानों और उद्योगों के बीच शुरू होने वाली खींच-तान में सरकार का क्या रुख रहेगा, इसको ले कर इसमें कोई स्पष्टता नहीं है।
इस जल नीति के मसौदे के लिए किसानों से वेबसाईट पर अपने सुझाव देने के लिए कहा गया था । अब आप अंदाजा लगाइ कि  किसान तो खेत खलिहान में काम करता है ,गाँव में रहता है और वहाँ पर बिना किसी खास तकनीकी ढांचें के किसान कैसे वेबसाईट पर अपने सुझाव  दे सकेगा, यह एक बड़ा  प्रश्न है जबकि जल नीति से किसान का ही सर्वाधिक मतलब हो सकता है। क्योंकि आज भी करीब  85 प्रतिशत भूजल सिंचाई में इस्तेमाल होता है। इसी प्रकार से समाज के अन्य वर्ग के लोगों तक नीति यह कैसे पहुंचे? इसके बारे में तो सोचा ही नहीं गया ।
वास्तव में इस तरह के वैश्विक आयोजनों की सार्थकता तभी होगी जब समस्याओं के समाधान पर त्वरित क्रियान्यवन होगा । हमारे देश में सार्थक घोषणाएँ भी सरकारी लालफीताशाही का शिकार हो जाती है और उनमे बहुत ज्यादा देर हो जाती है । इसलिए घोषणाओं के क्रियान्यवन की समय सीमा तय होनी चाहिए ,सम्बंधित लोगों की जवाबदेही सुनिश्चित होनी चाहिए तभी इस तरह के आयोजनों की सार्थकता सिद्ध होगी ।
विश्व की 18 प्रतिशत आबादी भारत में है लेकिन उपयोग करने योग्य पेय जल मात्र चार प्रतिशत है। भारत में जल की कमी है। तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और शहरीकरण ने जल की आपूर्ति और मांग के अंतर को और चैड़ा कर दिया है। जलवायु परिवर्तन से जल की उपलब्धता की कमी और बढ़ सकती है और देश के जल चक्र को खतरा पैदा हो सकता है। धरातल पर तीन चैथाई पानी होने के बाद भी पीने योग्य पानी एक सीमित मात्रा में ही है। उस सीमित मात्रा के पानी का इंसान ने अंधाधुध दोहन किया है। नदी, तालाबों और झरनों को पहले ही हम कैमिकल की भेंट चढ़ा चुके हैं, जो बचा खुचा है उसे अब हम अपनी अमानत समझ कर अंधाधुंध खर्च कर रहे हैं। जल के बिना हमारी क्या स्तिथि होगी इसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते । वर्तमान में महाराष्ट्र में सूखे की मार से हजारों लोग आत्महत्या करने को मजबूर है ,पीने के पानी की इतनी भारी किल्लत है कि वहाँ के कई क्षेत्रों में इसके लिए संघर्ष भी होते रहते है । राजस्थान के भी हालात पानी के मामले में अच्छे नहीं है । पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि विश्व के अनेक हिस्सों में पानी की भारी समस्या है और इसकी बर्बादी नहीं रोकी गई तो स्थिति और विकराल हो जाएगी क्योंकि भोजन की मांग और जलवायु परिवर्तन की समस्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है।
भू-जल के भारी दुरूपयोग की वजह हमारा मौजूदा कानून है जिसमे लोग जिनता चाहे उतना जल निकाल रहें है .भू-जल संसाधन के इस्तेमाल को लेकर अभी तक कोई स्पष्ट कानूनी ढाँचा नहीं बना है .हमारे देश में पानी का महत्व कितना है इसको बताने के लिए कई स्थानीय भाषाओँ में सैकड़ों मुहावरे है ।  अगर हम इसी तरह कथित विकास के कारण अपने जल संसाधनों को नष्ट करते रहें तो  वह दिन दूर नहीं, जब सारा पानी हमारी आँखों के सामने से बह जाएगा और हम कुछ नहीं कर पाएँगे। उद्योगों के अपशिष्ट और नालों में  बहने वाले मल से हमारे जल संसाधनों का प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। भू-जल का स्तर घटने के साथ ही उसमें फ्लोराइड, आर्सेनिक और अन्य रासायनों की मात्रा बढ़ रही है।
पिछले दशकों में औद्योगिकरण, शहरीकरण और तीव्र जनसांख्यिकी बदलावों के मद्देनजर प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता पर काफी दबाव पडा है। दक्षिण एशिया के प्राकृतिक संसाधनों और पारिस्थिक तंत्र पर भी प्रतिकूल प्रभाव पडा है। जलवायु परिवर्तन के कारण समस्या ने और अधिक गंभीर रूप लिया है जिस वजह से क्षेत्र के कुछ हिस्सों में अनपेक्षित बाढ़ और सूखे के प्रभाव की आशंका गहरा गई है। जल संकट के कारण परिवारों और समुदायों को काफी परेशानी सहनी पड़ती है । इसी वजह से कई बार वर्ग संघर्ष भी होता है । बेहतर जल प्रबंधन व्यवस्था करने के लिए देश में इसके लिए बुनियादी और कानूनी ढांचे का अभाव है  जिसमे तत्काल सुधार की जरुरत है । देश के कई हिस्सों में  पानी की विकराल समस्या के लिए बेहतर योजना, विकास और प्रबंधन की दिशा में जल्दी ही कुछ सार्थक करने की जरुरत है । देश में बाढ़ और सूखे की आवृत्तियों से निपटने के लिए जल संसाधनों के प्रबंधन में सुधार के तरीके खोजने होंगे।
जल सप्ताह सम्मेलन के एक प्रस्ताव के अनुसार जल संरक्षण और उपयोग के सामान्य सिद्धांतों को लेकर एक ऐसा व्यापक पंहुच वाला राष्ट्रीय कानूनी ढांचा बनाया जाए जो हर राज्य को जल संचालन का आवश्यक विधायी आधार उपलब्ध कराए। इससे देश के पैमाने पर एकीकृत और सुसंगत संस्थागत जल नीति को लागू करने में मदद मिलेगी। जल दुरुपयोग नियंत्रित करने के सिलसिले में राष्ट्रीय जल मिशन ने जल उपयोग दक्षता में 20 प्रतिशत सुधार का लक्ष्य रखा जाना चाहिए । जल आपूर्ति बढ़ाने की सीमाओं को देखते हुए ऐसा किया जाना आवश्यक है। इस सबसे बढ़ कर भू-जल को वर्तमान में व्यक्तिगत मिलकियत समझे जाने की स्थिति से निकाल कर उसे साझा संपत्ति संसाधनके रूप में बनाया जाना चाहिए। इस तरह के आयोजनों का होना सकारात्मक है लेकिन वास्तविक सफलता तभी है जब घोषणाओं और नीतियों का सफल क्रियान्वयन हो

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