Monday, 4 February 2013

सहेजें डिजिटल विरासत

पीयूष पांडेय
 आपने कभी अपनी डिजिटल संपत्ति के भविष्य के बारे में सोचा है? बहुत से लोगों को यह सवाल हैरान करने वाला लग सकता है, लेकिन अब इसके बारे में सोचने का समय आ गया है। कारण साफ है कि इंटरनेट पर लोग सिर्फ सर्रि्फग नहीं कर रहे, मेल के जरिये कई महत्वपूर्ण जानकारियों का लेन-देन कर रहे हैं। फेसबुक-ट्विटर जैसे मंचों पर जानकारियां साझा कर रहे हैं, किताबों से लेकर मोबाइल तक खरीद रहे हैं। पैसा खर्च कर संगीत-फिल्में डाउनलोड कर रहे हैं, बैंकिंग कर रहे हैं और तमाम दूसरी गतिविधियों में व्यस्त हैं। क्या इन डिजिटल गतिविधियों की कोई कीमत नहीं है? बिल्कुल है। विशेषज्ञों की मानें तो भारत में अभी डिजिटल विरासत को सहेजने के बारे में सोच विकसित नहीं हुई है, क्योंकि यहां लोगों को लगता ही नहीं है कि उनके पास उपलब्ध डिजिटल विरासत की कोई कीमत भी है। शायद भारतीय बहुत आशावादी हैं और यहां कोई व्यक्ति अपनी उम्र 70-75 साल से कम सोच ही नहीं सकता। सॉफ्टवेयर की दुनिया में बीते 20 वर्ष से सक्रिय पुनीत मोहन कहते हैं, डिजिटल विरासत जरूरी नहीं कि सिर्फ फिल्म-संगीत या किताबों के रूप में हो। आज मेरे पास ही 150 से ज्यादा डोमेन नाम हैं, जिनकी कीमत लाखों में हो सकती है, लेकिन यदि मेरे निधन के बाद इनकी सुध नहीं ली गई तो ये कीमती नाम किसी दूसरे की झोली में चले जाएंगे। भारत में तो नहीं, लेकिन विकसित देशों में इस बाबत गंभीरता दिखने लगी है। पिछले साल लंदन की गोल्डस्मिथ यूनवर्सिटी ने एक रिपोर्ट जारी की थी। इसके मुताबिक 10 में से एक ब्रिटिश नागरिक अब अपनी वसीयत में फेसबुक और फ्लिकर समेत तमाम वेबसाइट के पासवर्ड का भी जिक्र कर रहा है, ताकि निधन के बाद परिजन या खास मित्र संचित डिजिटल सामग्री का इस्तेमाल कर सकें और कंटेंट का दुरुपयोग न हो। मौत के बाद डिजिटल सामग्री के इस्तेमाल के निर्देशों की आवश्यकता को अमेरिका में भी समझा जा रहा है। एक अनुमान के मुताबिक अमेरिका में हर साल 3,70,000 फेसबुक उपयोक्ताओं का निधन होता है। इस आंकड़े के इर्दगिर्द डिजिटल विरासत को सहेजने की आवश्यकता को वहां खूब महसूस किया जा रहा है। फेसबुक के दुनियाभर में 90 करोड़ से अधिक सदस्य हैं। इनमें सबसे अधिक करीब 20 करोड़ सदस्य अमेरिका में हैं। निधन के बाद करीबी लोगों को आपके तमाम पासवर्ड प्राप्त कराने की सुविधा देने वाली कई वेबसाइट वहां खासी लोकप्रिय हो रही हैं। इनमें लीगेसी लॉकर डॉट कॉम, पास माई विल डॉट कॉम और आफ्टर स्टेप्स डॉट कॉम जैसी साइट प्रमुख हैं। भारत में 13 करोड़ से ज्यादा इंटरनेट उपयोक्ता हैं और करीब बीस फीसद के पास अलग-अलग रूपों में अच्छी-खासी डिजिटल सामग्री है। हालांकि, ऐसा नहीं है कि आप बैंक या दूसरी सोशल नेटवर्रि्कग साइट से मृत व्यक्ति का पासवर्ड आदि हासिल नहीं कर सकते, पर यह आसान नहीं है। डिजिटल विरासत को लेकर कानूनी नियम अभी साफ नहीं हैं। उदाहरण के लिए जी मेल नीति कहती है, मृतक के ईमेल कंटेंट को किसी को सौंपने से जुड़ा कोई भी फैसला गहन समीक्षा के बाद किया जाएगा और यह लंबी प्रक्रिया है। ट्विटर के मामले में आपको मृतक के साथ अपने संबंध का प्रमाण देने के साथ कई औपचारिकताएं पूरी करनी होंगी। सोशल साइट की मृत्यु संबंधी नीति से जुड़े दिशानिर्देशों का पालन कर पासवर्ड जुटाना लंबी प्रक्रिया है। कई तकनीकी झंझट अलग। फिर इस समस्या की एक कड़ी डिजिटल अज्ञानता से जुड़ती है। डिजिटल सामग्री की चिंता इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि भविष्य में मृत व्यक्तियों की ऑनलाइन पहचान ऑनलाइन ठगों के लिए काम का माल हो सकती है। डिजिटल विरासत को सहेजने के बारे में अब विचार करना जरूरी है।

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