Monday, 4 February 2013

समुद्री परमाणु ताकत

पनडुब्बी से छोड़ी जाने वाली मिसाइल पर विशेष
भारत अब आकाश और जमीन के साथ-साथ समुद्र से भी परमाणु हथियार चलाने में सक्षम हो गया है। पनडुब्बी से छोड़ी जाने वाली देश की पहली बैलिस्टिक मिसाइल के-15 ने अपने सभी विकास-परीक्षण पूरे कर लिए हैं। अब हमें स्वदेशी परमाणु पनडुब्बी आइएनएस अरिहंत के समुद्री परीक्षणों का इंतजार है। इन परीक्षणों के सफल होने के बाद भारत को अरिहंत के रूप में समुद्र में एक शक्तिशाली परमाणु प्रहरी मिल जाएगा। इस पनडुब्बी में के-15 मिसाइलें तैनात की जाएंगी, जो परमाणु हथियार ढोने में सक्षम हैं। समुद्री परमाणु क्षमता हासिल होने के बाद भारत का परमाणु त्रिशूल सही मायने में पूरा हो जाएगा। पिछले दिनों बंगाल की खाड़ी में एक जलमग्न मंच से के-15 मिसाइल का 12वां परीक्षण किया गया। इस दो चरण वाली मिसाइल की रेंज 750 किलोमीटर है। रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) के अनुसार परीक्षण के दौरान 10 मीटर ऊंची मिसाइल ने आकाश में 20 किलोमीटर की ऊंचाई ग्रहण करने के बाद लगभग 700 किलोमीटर की दूरी तय की। डीआरडीओ अधिकारियों के मुताबिक यह के-15 मिसाइल का अंतिम विकास-परीक्षण था और इसमें लगभग सभी लक्ष्य सफलतापूर्वक हासिल किए गए। समुद्र के भीतर से परमाणु प्रहार की क्षमता हासिल करने वाला भारत पांचवां देश बन गया है। अभी तक सिर्फ अमेरिका, रूस, फ्रांस और चीन के पास ही समुद्री परमाणु क्षमता थी। समुद्र के अंदर से परमाणु हथियार चलाने की काबिलियत का असली प्रदर्शन अरिहंत के सफल संचालन के बाद ही हो पाएगा। 6000 वजनी परमाणु चालित पनडुब्बी की समुद्री स्वीकार्यता के लिए परीक्षण शीघ्र ही आरंभ होंगे। परमाणु ऊर्जा विभाग के अनुसार पनडुब्बी के लिए 83 मेगावॉट का प्रेशराज्ड लघु रिएक्टर विशाखापत्तनम में मई या जून में क्रियाशील हो जाएगा। इन दिनों उसके विविध परीक्षण चल रहे हैं। इस रिएक्टर द्वारा भाप उत्पन्न होने के बाद पनडुब्बी के बंदरगाह परीक्षण आरंभ हो जाएंगे। यह पनडुब्बी के-15 किस्म की 12 मिसाइलों को ढोने में सक्षम है। भारत के-4 समुद्री बैलेस्टिक मिसाइल का भी विकास कर रहा है। इसकी रेंज 3500 किलोमीटर की होगी। आने वाले वर्षो में भारत के पास परमाणु ऊर्जा से चलने वाली चार पनडुब्बियां होंगी। अरिहंत के अलावा विशाखापत्तनम नेवल डॉक यार्ड में एक और परमाणु पनडुब्बी विकसित की जा रही है। दो अन्य पनडुब्बियां इस समय वडोदरा में निर्माणाधीन हैं। परमाणु हथियार दागने के लिए भारतीय सशस्त्र सेनाओं के पास अभी अग्नि श्रृंखला की मिसाइलें और सुखोई 30एमकेआइ और मिराज-2000 जैसे विमान हैं। लेकिन समुद्र से परमाणु प्रहार की क्षमता विकसित नहीं होने के कारण देश का परमाणु त्रिशूल अथवा सेना के तीनों अंगों से परमाणु हथियार चलाने का साम‌र्थ्य उभर कर सामने नहीं आ रहा था। कारगर और प्रतिशोधात्मक प्रहार के लिए समुद्र में परमाणु क्षमता जरूरी है। इसे सिर्फ परमाणु हथियारों से सुसज्जित परमाणु पनडुब्बी से ही हासिल किया जा सकता है, जो लंबे समय तक समुद्र के अंदर रह सकती है। अरिहंत के समुद्र में उतरने के बाद उससे परमाणु मिसाइलों के सफल प्रक्षेपण के बाद ही भारत का परमाणु त्रिशूल पूरी तरह से सक्रिय हो पाएगा। लंबी दूरी तक मार करने वाली परमणु मिसाइलों से लैस परमाणु मिसाइलों के सामरिक महत्व का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अमेरिका और रूस शस्त्र कटौती समझौतों के तहत रखे जाने वाले हथियारों में करीब दो-तिहाई हथियार समुद्री परमाणु मिसाइलों के रूप में रखना चाहते हैं। अत: आइएनएस अरिहंत और निर्माणाधीन तीन अन्य पनडुब्बियां तथा के-15 और के-4 मिसाइलें भारत की सामरिक स्वायत्तता और प्रतिरोधक क्षमता के लिए बहुत अहमियत रखती हैं। मुकुल व्यास

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