Sunday, 26 August 2012

सोशल मीडिया की दुधारी तलवार

मदन जैड़ा
नब्बे के दशक में इंटरनेट का व्यावसायिक इस्तेमाल शुरू होने के कुछ ही वर्षों बाद सोशल नेटवर्किग साइट्स का उदय हुआ। पहले ऐसी साइट्स सीमित हुआ करती थीं और कंप्यूटर नेटवर्किंग के जरिये एक निश्चित दायरे में ही संचालित होती थीं, लेकिन 1995 के आसपास वर्ल्ड वाइड वेब की शुरुआत हुई तो ऑनलाइन सोशल नेटवर्किग साइट्स का मौजूदा स्वरूप सामने आया।

आज ये तेजी से बढ़ रही हैं। अनुमान है कि विश्व की करीब सात अरब आबादी में से दो अरब लोग इन साइट्स की सोशल नेटवर्किग से जुड़े हैं। इन साइट्स ने जहां उम्र, लिंग, धर्म और देश-प्रदेश की सीमाओं को तोड़ कर लोगों को एक मंच पर लाकर अपने विचार व्यक्त करने का मौका दिया है, वहीं इनके खतरे भी कम नहीं हैं। ताजा उदाहरण हिंसा की वे तस्वीरें हैं, जो इन साइट्स पर गत एक माह के दौरान खास इरादे से अपलोड की गईं। यदि  सरकार ने उचित कदम न उठाए होते तो शरारती तत्व अपने मकसद में कामयाब भी हो जाते।
कैसे हुआ बेजा इस्तेमाल
कोई भी व्यक्ति ईमेल के जरिये सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर अपना खाता खोल सकता है। देश-विदेश में कहीं भी ईमेल एड्रेस बनाने के लिए स्थाई पहचान देने की जरूरत नहीं है, इसलिए शरारती तत्व नकली पहचान से ईमेल एड्रेस बना कर इन पर सक्रिय हैं। केंद्रीय गृह मंत्रलय के अनुसार फेसबुक, ट्विटर, गूगल, माइ स्पेस, लिंक्डइन समेत दर्जनों साइट्स पर ऐसे तत्वों ने जुलाई के पहले सप्ताह में आपत्तिजनक सामग्री लोड की। तब असम के कोकराझार और आसपास के क्षेत्रों में बोडो और मुस्लिमों के बीच हिंसा हुई थी। इन साइट्स पर ऐसे चित्र एवं वीडियो लोड किए गए, जिनमें बांग्लादेश, म्यांमार में प्राकृतिक आपदाओं और अन्य हिंसक घटनाओं की तस्वीरों को असम की तस्वीरें बताया गया।

कहने की कोशिश की गई कि असम में मुस्लिमों पर बड़े पैमाने पर हिंसा की जा रही है। ऐसी करीब पांच सौ से ज्यादा तस्वीरें, वीडियो एवं लिखित सामग्री नेटवर्किग साइट्स पर एक पखवाड़े के दौरान डाली गई। खुफिया एजेंसियों को इसकी भनक न लगी। बाद में जब पिछले सप्ताह बेंगलुरु से पूर्वोतर के लोगों का पलायन शुरू हुआ, तब इस षड्यंत्र का पता चला। पूवरेत्तर के लोगों से ही पता चला कि उन्हें पहले से चेतावनी भी दी गई है। 
लोकप्रियता बनी हथियार
इंटरनेट की इस दुनिया में इन साइट्स की उपयोगिता को अनदेखा नहीं किया जा सकता, लेकिन इनकी लोकप्रियता को शरारती तत्व हथियार बना रहे हैं। देश में डेढ़ करोड़ ब्रॉडबैंड कनेक्शन हैं, जबकि इंटरनेट यूजर आबादी दस फीसदी से अधिक होने का अनुमान है, और यह तेजी से बढ़ रही है। नेटवर्किंग साइट्स के मोबाइल पर मिलने से नौजवानों में यह काफी लोकप्रिय हो रही हैं। हालांकि पहले भी कुछ चुनौतियां इनसे उत्पन्न हुई थीं। विशिष्ट व्यक्तियों के खिलाफ आपत्तिजनक एवं गुमराह करने वाली टिप्पणी हुई थी। ऐसी घटनाएं तमाम देशों में हो रही हैं। खबर यह भी है कि सोशल नेटवर्किंग साइट्स का उपयोग कई देशों में धार्मिक उन्माद फैलाने के लिए किया जा रहा है। खुफिया एजेंसियों के अनुसार आतंकी संगठन भी इनके जरिये अपने नेटवर्क के बीच कोड भाषा में संपर्क साधने का कार्य करते हैं। इसकी वजह यह है कि खुफिया एजेंसियां संदिग्ध व्यक्तियों के ईमेल को इंटरसेप्ट कर रही हैं, जबकि इन साइट्स पर फर्जी प्रोफाइल से कोड भाषा में संदेश खुफिया एजेंसियों की नजर से बच जाते हैं।
देश में साइबर सुरक्षा
देश में साइबर हमलों से सुरक्षा के इंतजाम किए जा रहे हैं, लेकिन ऐसे इंतजामों का सारा फोकस दूसरे पहलू पर है। तमाम उपाय इस दिशा में हो रहे हैं कि कैसे आतंकी या शरारती तत्वों से साइबर नेटवर्क को तहस-नहस होने से बचाया जाए। केंद्रीय गृह मंत्रलय ने नेशनल थ्रेट इंटरेलीजेंस सेंटर स्थापित करने का फैसला लिया है।

दरअसल, प्रधानमंत्री कार्यालय, सीबीआई जैसे संस्थानों की महत्वपूर्ण वेबसाइट्स पर साइबर हमले हो चुके हैं। सिर्फ कॉमनवेल्थ खेलों के दौरान भारतीय वेबसाइट्स पर करीब आठ हजार साइबर हमले हुए थे। सरकारी एवं निजी कामकाज में इंटरनेट पर निर्भरता बढ़ रही है, इसलिए खतरा यह है कि नेटवर्क पर हमले से कामकाज ठप न हो जाए, लेकिन यह साइबर सुरक्षा का सिर्फ एक पहलू है। इस सांप्रदायिक साइबर अटैक के बाद केंद्र सरकार अब नए सिरे से इस समस्या को ले रही है। साइबर अपराधों की जांच, साइट्स की निगरानी तथा साइबर फॉरेंसिक की दिशा में कानून प्रवर्तन एजेंसियों की तैयारी अभी अधूरी है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन के अनुसार नेशनल टेक्निकल रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन (एनटीआरओ) तथा इंडियन कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पॉन्स टीम (आईसीईआरटी) को साइबर सुरक्षा से जुड़े तमाम पहलुओं को देखने का जिम्मा दिया गया है। दरअसल, भारत में कार्य कर रही वेबसाइट्स की जिम्मेदारी सुनिश्चित नहीं है। वे अक्सर सर्वर देश से बाहर होने और गोपनीयता के नाम पर सहयोग में आनाकानी करती हैं।
साइबर अपराध एवं जांच
देश में साइबर अपराध बढ़ रहे हैं। साइबर अपराधों के लिए आईटी एक्ट बना है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के मुताबिक 2010 में जहां आईटी एक्ट के तहत 966 मामले दर्ज हुए थे, वहीं 2011 में इनकी संख्या में 85 फीसदी का इजाफा हुआ और मामले बढ़ कर 1781 हो गए। इसी प्रकार साइबर अपराध के  422 मामलों में आईपीसी के तहत भी मामले दर्ज हुए। ऐसे मामलों में भी गत वर्ष की तुलना में 18 फीसदी इजाफा हुआ है। खबर यह है कि इनमें से 70-75 फीसदी मामले अनसुलझे हैं, क्योंकि जांच एजेंसियों के पास जांच के इंतजाम नहीं हैं। इतना ही नहीं, देश में खुले एकमात्र साइबर ट्रिब्यूनल में एक साल से जज नहीं है। साथ ही, नियमित अदालतों में भी साइबर अपराधों की जानकारी रखने वाले जजों एवं संबंधित स्टाफ का अभाव है, इसलिए साइबर अपराधी जल्दी छूट जाते हैं।
सोशल साइट्स की मॉनीटरिंग नहीं
देश में सोशल नेटवर्किग साइट्स की मॉनीटरिंग के इंतजाम नहीं हैं। आईसीईआरटी और खुफिया एजेंसियां आंशिक रूप से निगरानी कार्य तभी करती हैं, जब कोई शिकायत मिले या फिर कोई गोपनीय सूचना आ रही हो। यही कारण है कि 13 जुलाई से सामग्री वेबसाइट्स पर लोड होती रही और सरकारी एजेंसियों को तब पता चला, जब उसके गंभीर नतीजे सामने आ चुके थे।
कमजोर कानून
साइबर विशेषज्ञ नीरज अरोड़ा के मुताबिक आईटी एक्ट में खामियां हैं। इसमें एक तो साइबर क्राइम को जमानती अपराधों की श्रेणी में रखा गया है। दूसरे, अधिकतम सजा तीन साल रखी गई है। तीसरे, आपत्तिजनक सामग्री अपलोड होने पर संबंधित साइट को नोटिस देने के 36 घंटे के भीतर उसे हटाना होगा। यह अवधि ज्यादा है। इतनी देर तक आपत्तिजनक सामग्री साइट पर पड़ी रहेगी तो उसका जो संदेश जहां पहुंचना था, पहुंच ही जाएगा। चौथे, कानून के क्रियान्वयन के लिए पुलिस में साइबर क्राइम सेल नाममात्र के हैं। उनमें साइबर विशेषज्ञों की नियुक्ति नहीं हो रही। ट्रेनिंग भी पर्याप्त नहीं है।

स्थिति यह है कि साइबर क्राइम के नाम पर साल में जो थोड़े बहुत मामले दर्ज हो भी रहे हैं, वे इंटरनेट के जरिए ठगी एवं धोखाधड़ी या अश्लीलता फैलाने के हैं। उन्माद फैलाने, भ्रामक जानकारी, लोगों में नफरत फैलाने, चरित्र पर आपत्तिजनक टिप्पणी, अफवाह फैलाने जैसे मामलों में साइबर सेल मामला ही दर्ज नहीं करते।
जब सीमा के बाहर हों शरारती
यहां एक समस्या यह भी आती है कि जब आपत्तिजनक सामग्री दूसरे देश से अपलोड की जाए तो जांच एजेंसियों के हाथ बंध जाते हैं। नीरज अरोड़ा के मुताबिक ऐसे मामलों में थोड़ी मुश्किल होती है, लेकिन यह असंभव नहीं है। नेटवर्किग साइट ऐसी सामग्री लोड करने वाले वाले इंटरनेट सेवा प्रदाता का आईपी एड्रेस मुहैया करा सकती है, लेकिन सरकार को इसके लिए कड़े कानूनी प्रावधान करने होंगे व तय करना होगा कि सामग्री लोड होने पर न सिर्फ संबंधित नेटवर्किग साइट उसे बिना देर किए हटा दे, बल्कि आईपी एड्रेस मुहैया कराने की जिम्मेदारी उसकी हो। दूसरे, अन्य देशों के साथ ऐसे मामलों से निपटने के लिए द्विपक्षीय समझौते करने होंगे।  
पहचान अनिवार्य बनाई जाए
सूचना एवं प्रौद्यौगिकी मंत्रलय के एक विशेषज्ञ के अनुसार सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर पहचान पुष्टि के बिना एक्सेस का अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए। ऐसा करना मुश्किल नहीं है। इस घटना के बाद इस दिशा में विचार-विमर्श शुरू हो गया है, लेकिन यह ऐसा मुद्दा है, जिसमें विश्व स्तर पर पहल करनी होगी। सोशल नेटवर्किग साइट्स चाहें तो खाता खोलने वाले की पहचान के सुबूत के तौर पर वे उसके मोबाइल या फोन नंबर को आधार बना सकती हैं, क्योंकि फोन नंबर बिना पहचान के नहीं मिलता।

जिस प्रकार इंटरनेट बैंकिंग के लिए पासवर्ड ग्राहक को मोबाइल फोन के जरिये नेटबैंकिंग शाखा से भेजा जा सकता है, उसी प्रकार की व्यवस्था सोशल नेटवर्किंग साइट भी कर सकती है।  इससे 99 फीसदी मामलों में व्यक्ति की सही पहचान की जा सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में सोशल नेटवर्किंग साइट्स के लिए यह प्रावधान अनिवार्य कर देना चाहिए।(ref-livehindustan.com)

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