Thursday, 17 May 2012

हताशा की ओर धकेलती तकनीकी शिक्षा



हताशा की ओर धकेलती तकनीकी शिक्षा
शशांक द्विवेदी   
14 Dec 2011,नवभारत टाइम्स 
तकनीकी शिक्षा के मौजूदा सत्र में इस बार पूरे देश में 2 लाख से ज्यादा यानी करीब 30 फीसदी सीटें खाली रह गईं। अकेले उत्तर प्रदेश में 70 हजार और राजस्थान में 17 हजार सीटें खाली रहीं। यह पहली बार हो रहा है कि एक तरफ तो सरकार उच्च शिक्षा के बाजारीकरण पर जुटी है , दूसरी तरफ लोगों का रुझान इस तरफ कम हो रहा है। आज देश में हजारों इंजीनियरिंग कॉलेज खुल गए हैं और लगातार खुल भी रहे हैं। लोगों को यह एक अच्छा व्यवसाय नजर आने लगा है। पर क्या इन संस्थानों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की गारंटी दी जा सकती है ? हालत यह है कि एक ओर देश की उच्च और तकनीकी शिक्षा पर सवाल उठ रहे हैं , दूसरी ओर सरकार इसे और ज्यादा मुनाफा कमाने का साधन बनाने में जुटी है।

मुनाफे का धंधा
पिछले दिनों योजना आयोग ने इस संबंध में अपना ताजा दृष्टिकोण पत्र जारी किया है। इसके मुताबिक 1 अप्रैल 2012 से शुरू हो रही 12 वीं पंचवर्षीय योजना में उच्च शिक्षा , खासकर तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में निजी क्षेत्र को बड़ी भूमिका देने के लिए अनुकूल स्थितियां बनाने की जरूरत है। अभी इस दृष्टिकोण पत्र पर सरकार की मुहर नहीं लगी है , लेकिन यह सुझाव पिछले वर्षों में उच्च शिक्षा के बारे में चली चर्चा के अनुरूप ही है। विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में अपनी शाखा खोलने की इजाजत के साथ भी यह बात जुड़ी है कि वे मुनाफे की संभावना दिखने पर ही यहां आएंगे।

नई जाति प्रथा
शिक्षा मंडी में क्रय - विक्रय की वस्तु बनती जा रही है। इसे बाजार में निश्चित शुल्क से अधिक धन देकर खरीदा जा सकता है। परिणामस्वरूप शिक्षा में एक भिन्न प्रकार की जाति प्रथा जन्म ले रही है। धन के आधार पर आईआईटी , एमबीए , सीए , एमबीबीएस आदि उपाधियों के लिये प्रवेश पा लेने वाले उच्च भावना और धनाभाव के कारण इससे वंचित छात्र हीनभावना से ग्रस्त रहते हैं। हम अपने ज्ञान को व्यावहारिक नहीं बना पाए हैं। नंबरों की होड़ वाली शिक्षा प्रणाली में तो बस रटे गए ज्ञान का मूल्यांकन लिखित परीक्षाओं के माध्यम से होता है। यह प्रणाली बच्चों को तनावग्रस्त करती है और वांछित सफलता न मिलने पर खुद को नुकसान पहुंचाने वाले अप्रिय कदम उठाने के लिए बाध्य करती है।

नैशनल क्राइम रेकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक 2006 से 2010 के बीच छात्रों की आत्महत्याएं 26 प्रतिशत बढ़ गईं। 2006 में 5857 का यह आंकड़ा 2010 में 7379 तक पहुंच गया। वास्तविकता में यह संख्या इससे भी ज्यादा हो सकता है। आत्महत्या करने वाले छात्रों में सबसे ज्यादा संख्या देश के प्रमुख मेट्रो शहरों बेंगलूरु , दिल्ली और मुंबई की है।

पिछलें कुछ सालों से आत्महत्या की सर्वाधिक घटनाएं आईआईटी कॉलेजों में सामने आई हैं। मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने लोकसभा में वरुण गांधी के सवाल के लिखित जवाब में बताया कि 2008 से 2010 देश के सभी आईआईटी तथा उच्च तकनीकी संस्थानों में कुल 24 छात्रों ने इस प्रकार का आत्मघाती कदम उठाया। इन सभी मामलों की जांच करने वाली समितियों ने पाया कि अवसाद , पढ़ाई के बोझ और सहपाठियों के प्रदर्शन के दबाव में आकर छात्रों ने यह कदम उठाया। आईआईटी कानपुर में पिछले 5 सालों के भीतर हुई 9 छात्रों की आत्महत्या के मामले ने यहां की ग्रेडिंग प्रणाली और शिकायत निवारण तंत्र पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।

आत्महत्याओं के कारण तलाशते हुए कभी इनकी बुनियादी वजहों पर बात नहीं की जाती। ज्यादा से ज्यादा वेतन वाली नौकरियों को ही सफलता के आदर्श के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया गया है। जबकि हकीकत यह है कि यही प्रतिष्ठा छात्रों को अवसाद की ओर धकेल रही है। आईआईटी में आने से पहले छात्रों की पृष्ठभूमि पर गौर करें तो इसे बेहतर तरीके से समझा जा सकता है। शहरी मध्यवर्गीय परिवार मीडिया में आईआईटी से निकलने वाले छात्रों का ऊंचा पैकेज देखकर कर अपने बच्चे को इंजीनियर बनाने का सपना पालने लगते हैं। बच्चा दसवीं कक्षा से ही अपने माता - पिता के सपनों का बोझ ढोने लगता है। स्कूल से कोचिंग , कोचिंग से स्टडी रूम का चक्र उसके स्वाभाविक विकास को एक खास दिशा में मोड़ देता है।

प्रवेश परीक्षाओं से लेकर सिलेबस तक में जो भी बदलाव किए जा रहे हैं , उन सबका एक ही मकसद है। दुनिया के बाजार के लिए भारत में पेशेवर लोगों की फौज कैसे तैयार की जाए। सरकार को इस बात से कोई लेना - देना नहीं है कि उसके कदमों से देश का या देश की जनता का क्या फायदा होने वाला है। इस कदम से होगा क्या ? इससे तकनीकी ज्ञान की सस्ती फौज ही हम तैयार कर पाएंगे , तकनीकी क्षेत्र में नया कुछ नहीं कर पाएंगे।

कॉरपोरेट की फिक्र
पिछले दिनों इनफोसिस के मानद चेयरमैन एनआर नारायण मूर्ति तथा उद्योग एवं व्यापार जगत की सर्वोच्च संस्था फिक्की ने देश में उच्च एवं तकनीकी शिक्षा के गिरते स्तर पर चिंता जताई थी। इनका कहना है कि उद्योग जगत के 65 फीसदी हिस्से को इससे सही स्नातक नहीं मिल रहे हैं , न ही यहां से निकलने वाले छात्र उद्योगपतियों की कसौटी पर खरे उतर पा रहे हैं। असल में उनकी पूरी चिंता कॉरपोरेट से जुड़ी हुई है। तकनीकी शिक्षा के बुनियादी और व्यावहारिक पक्ष से उनका कोई लेन - देना नहीं है। वे कह रहे है कि हमें तकनीकी स्नातकों को कार्यकुशल करना पड़ता है , यानी उन्हें कुछ महीनों की ट्रेनिंग देनी पड़ती है , जो इंडस्ट्री के लोग नहीं चाहते। उनका सीधा सा मतलब है कि आईआईटी ऐसे स्नातक पैदा करे जिनका कॉरपोरेट के लोग पूरा दोहन कर सके। आज जरूरत है ऐसे तकनीकी ज्ञान की जो वास्तविकता के धरातल पर टिका हो और जिसे हम अपने देश की परिस्थितियों के हिसाब से प्रयोग कर सके। इसके लिए कॉरपोरेट निर्धारित मापदंडों के पीछे न भागकर हमें राष्ट्र की समस्याओं के अनुकूल मापदंड बनाने होंगे। 
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/11095820.cms 

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