Monday, 21 May 2012

डिजिटल 'आकाश' छूने की अनोखी मिसाल



दूरसंचार में द लास्ट माइल नामक एक परिकल्पना है कि किसी फोन सिस्टम के उस हिस्से को कनेक्ट करना काफी मुश्किल होता है जो हिस्सा मेन लाइन से लोगों के घरों में जाता है। पर देश की इलीट एमआईटी में से एक राजस्थान स्थित नवीन इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्रॉलॉजी के डायरेक्टर प्रेम कालरा ने अपने संस्थान को एक नए किस्म की चुनौती से पार पाने को समर्पित कर दिया है।
यह चुनॉती थी द लास्ट परसन-आखिरी इंसान को तकनीक से कनेक्ट करने की। उनकी नजर में आखिरी इंसान देश का गरीबतम इंसान है। पश्चिम भारत के थार रेगिस्तान इलाके के जोधपुर स्थित उनके कैंपस में जब मैं गया तो उन्होंने मुझसे पूछा कि हम कैसे आखिरी इंसान तक पहुंचेंगे?

एक ऐसे देश में जहां की ७५ फीसदी आबादी रोजाना २ डॉलर से कम की रकम पर गुजारा करने के लिए अभिशप्त हो, जहां गरीबी, भुखमरी, कुपोषण आम बात बन गया हो, वहां पर कालरा देश के अति निर्धन व्यक्ति को सशक्त करने के अपने लक्ष्य पर अडिग थे। कैसे? उसे इतना सक्षम बना दो, उसके हाथ में ऐसी कुशलता मुहैया करा दो कि वह गरीबी से लडऩे में सक्षम हो जाए।


और इसीलिए तकरीबन एक साल पहले देश के मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा रखे गए एक खास प्रस्ताव को कालरा व उनकी तकनीकी टीम ने लेने में एक क्षण की देरी नहीं लगाई। यह चुनौती एकदम नए किस्म की थी, लिहाजा इसमें आनंद व संतोष भी दोगुना मिलेगा, कालरा व उनकी तकनीकी टीम का यही सोचना था। यह चुनौती थी आईपॉड की तरह एक इंटरनेट इनेबल्ड, वायरलेसली कनेक्टेड टैबलेट को डिजाइन करने की जिसे भारत का हर आदमी, खास तौर से आखिरी आदमी भी सरलता से अफोर्ड कर सके।


इसका उपयोग दूरस्थ शिक्षा में हो, अंग्रेजी व गणित की पढ़ाई में मददगार के तौर पर हो या फिर खने-पीने की चीजाों की कीमत जानने में किया जाए, पर शर्त यह है कि इसकी कीमत निर्माता के लाभ सहित ५० डॉलर से ज्यादा न हो। इसका अनोखा जवाब हां में दिया गया। पिछले महीने वह काम हुआ जिसे तब तक लोग असंभव मान रहे थे। पिछले महीने आकाश टैबलेट का अनावरण जब हुआ तो सचमुच में इस देश के आखिरी इंसान का सपना साकार होने की यह घड़ी थी।


यह किया कालरा की टीम ने, इस टीम का नेतृत्व आईआईटी राजस्थान के इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग के दो प्रोफेसरों ने किया। इनमें से एक प्रोफेसर का जन्म तो ऐसे गांव में हुआ था, जहां अभी तक बिजली की सुविधा नहीं पहुंच पाई है। आकाश २.२ एंड्रायड ऑपेटिंग सिस्टम पर आधारित, ७ इंच टच स्क्रीन वाला टैबलेट है। इसकी बैटरी एक बार फुल चार्ज करने में तीन घंटे तक चलती है और यह यू ट्यूब वीडियो, पीडीएफ फाइलें व वर्चुअल लैब्स सरीखे एजुकेशनल साफ्टवेयर डाउनलोड करने में सक्षम है। सरकार छात्रों को वायरलेस कनेक्शन के लिए सब्सिडी मुहैया कराएगी। 



कालरा कहते हैं कि हमारी सबसे बड़ी कामयाबी यह है कि हमने कीमत की बाधा को कायदे से पार कर दिया। बहुत बड़े रूप में यही सबसे बड़ी उपलब्धि है। पश्चिमी देशों में बने टेबलेट इतने मंहगे हैं कि उन्हें खरीदना भारतीय छात्रों के बस की बात नहीं है। कालरा की टीम ने यह कर दिखाने के लिए आज की हाइपरकनेक्टेड दुनिया का पूरा फायदा उठाया। वह आकाश के कमोडिटी पार्ट्स मुख्यत: चीन व दक्षिण कोरिया से लाया, कोलोबरेशन टूल्स व ओपेन-सोर्स सॉफ्टवेयर का उपयोग किया और साथ ही आकाश की डिजाइनिंग, मैन्युफैक्चरिंग व असेंबली में पश्चिमी की दो कंपनियों-डाटा विंड व कनेक्सेंट सिस्टम्स तथा भारत की क्वाड का इस्तेमाल किया।


वास्तव में आकाश एक सस्ता टैबलेट ही नहीं है बल्कि यह इस बात की मिसाल भी बन गया है कि भारत तकनीक का उपयोग कर देश के 22 करोड़ छात्रों को गरीबी से पार पाने व कमजोर शिक्षा का सामना करने का तकनीकी हथियार मुहैया कराने में सक्षम है। आकाश दरअसल भारत के लिए उपलब्धि है तो यह पश्चिमी देशों के लिए चुनौती भी है कि आखिरकार भारत ने इसे कैसे संभव कर दिखाया। आकाश के बारे में कई अनुपम आशाएं भी हैं।


कालरा ने एक ऐसी ही आशा के बारे में बताया कि  पिछले साल ५ अक्टूबर को आकाश का अनावरण हुआ, उसके बाद ही कालरा की पत्नी उर्मिला से उनकी नौकरानी ने पूछा कि रात पाली के वॉचमैन ने बताया है कि साहब ने एक ऐसा कंप्यूटर बनाया है जो कि काफी सस्ता है। यह इतना सस्ता है कि वह भी इसे आसानी से खरीद सकती है। वॉचमैन ने उसे अखबार में छपी आकाश की तस्वीर भी दिखाई तो वह मिसेज कालरा से इस बात की पुष्टि करने आ गई कि क्या यह वाकई में सही बात है।


उर्मिला ने उसे बताया कि एकदम सही है। इसकी कीमत लगभग 1500 रुपए होगी। नौकरानी ने कहा कि १५००० कि १५००। उर्मिला ने बताया कि १५००। उसे इस बात का भरोसा था कि अगर सरकार गरीबों के लिए कुछ कर रही है, तो उसे भी उसका फायदा लेना चाहिए। उसने पूछा कि इसका मेरे लिए क्या उपयोग होगा। उर्मिला ने बताया कि बहुत उपयोग होगा। अगर आपकी बच्ची स्कूल जाती है तो वह क्लास लेसन के वीडियो डाउनलोड कर सकती है ठीक उसी प्रकार से जैसे मेरा बच्चा हर सप्ताह एमआईटी के ओपेन कोर्स वेयर से फिजिक्स के लेक्चर डाउनलोड करता है।


तुमने देखा होगा कि मेरा बच्चा कंप्यूटर के सामने बैठ कर किसी टीचर को सुनाता रहता है असलियत में वह टीचर अमेरिका में रहती है। यह बातचीत इस बात की गवाह है कि इतिहास बदल रहा है। और न केवल भारत के लिए ही। सोशल मीडिया, मोबाइल, वायरलेस उपकरणों व क्लाउड कंप्यूटिंग सरीखे उपकरणों के जरिए हाइपरकनेक्टिंग ऑफ द वल्र्ड संभव हो गई तो आकाश को भी जमीन पर उतरना ही था।


अब इससे फायदा यह होगा कि महा मुद्रास्फीति अब हरेक कामगार व हरेक कंपनी के लिए ऐसा अवसर व चुनौती लाएगी कि अब हमें ऐसे ज्यादा से ज्यादा प्रोडक्ट देखने को मिलेंगे जिन्होंने कीमत का बैरियर बड़े पैमाने पर तोड़ा है। और इसीलिए कालरा ने रिक्रूटर्स को अपने कैंपस से दूर रहने को कहा है। हम चाहते हैं कि हमारे छात्र अपनी कंपनी शुरू करें और उस कंपनी के सीईओ बनें, इसी तरह से हम चीन की बराबरी कर सकते हैं। 

लेखक तीन बार पुलित्जर पुरस्कार प्राप्त मशहूर अमेरिकी पत्रकार हैं। (थॉमस एल. फ्रीडमैन के ब्लॉग से साभार)

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