Friday 14 January 2022

रणभूमि जैसा दिखने लगा है अंतरिक्ष

 चंद्रभूषण

शीतयुद्ध की समाप्ति के कोई पंद्रह साल बाद तक अंतरिक्ष को लेकर सारी बातें विज्ञान के संदर्भ में ही होती रहीं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से यहां सुनाई दे रहा खतरे का मुहावरा साल 2022 आते-आते रणनीतिक रूप लेने लगा है। बीते दिसंबर में चीन ने बाहरी अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग के लिए गठित संयुक्त राष्ट्र समिति के पास बाकायदा एक लिखित शिकायत भेजी कि जुलाई और अक्टूबर महीनों में अमेरिका की प्राइवेट कंपनी स्पेस एक्स के स्टारलिंक सीरीज वाले दो उपग्रह उसके निर्माणाधीन स्पेस स्टेशन थ्यानगोंग से टकराते-टकराते बचे थे। खतरा इतना बड़ा था कि स्पेस स्टेशन में उस समय मौजूद अंतरिक्षयात्रियों की प्राणरक्षा के लिए कंट्रोल रूम को उसका रास्ता बदलना पड़ा।

इसके जवाब में एक पूर्व नासा अधिकारी का बयान आया कि जो हुआ सो गलत हुआ लेकिन अतीत में कई अमेरिकी उपग्रहों को भी उस निष्क्रिय चीनी उपग्रह के टुकड़ों से खतरे का सामना करना पड़ा है, जिसे उसने 2007 में अपनी एंटी-सैटेलाइट मिसाइल के परीक्षण के लिए नष्ट कर दिया था। आगे बढ़ने से पहले याद दिलाना जरूरी है कि बेतार इंटरनेट की ग्लोबल व्यवस्था बनाने के लिए स्पेस एक्स को कुल 12 हजार सैटेलाइट अंतरिक्ष में स्थापित करने की इजाजत अमेरिकी सरकार ने दे रखी है। इनमें 1600 को वह अब तक स्थापित भी कर चुका है। स्पेस जंक खुद में दुनिया के लिए बहुत बड़ी समस्या है लेकिन एक ही कंपनी के इतने ज्यादा उपग्रह कुछ अलग लेवल की चीज होंगे। 

स्पेस में मिसाइल

धरती के नजदीकी अंतरिक्ष को लेकर इधर कुछ और तरह के तनाव भी शुरू हो गए हैं। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की पहल पर दिसंबर 2019 में स्थापित अमेरिकी स्पेस कमान से जुड़ा एक किस्सा डेढ़ साल पहले चलन में आया था। इस कमान की स्थापना के ठीक पहले, 25 नवंबर 2019 को रूस ने अपना जासूसी उपग्रह कॉस्मॉस 2542 एक स्थिर कक्षा में स्थापित किया, जिसे लेकर 11 फरवरी 2020 को अमेरिकी स्पेस कमान की ओर से एक विचित्र बयान सुनने में आया। इसमें कहा गया कि कॉस्मॉस 2542 ने अपने भीतर से एक और उपग्रह निकाल दिया, जिसको कॉस्मॉस 2543 नाम दिया गया, और ये दोनों मात्र 100 मील की दूरी से एक अमेरिकी जासूसी उपग्रह का पीछा कर रहे थे।

अमेरिकी हुकूमत ने इसके खिलाफ रूस से एतराज जताया लेकिन 15 जुलाई 2020 को पता चला कि कॉस्मॉस 2543 से निकली कोई तीसरी चीज एक अन्य रूसी उपग्रह के बगल से होकर गुजर गई! इस चीज ने लक्षित रूसी उपग्रह को नष्ट नहीं किया लेकिन अमेरिकी स्पेस कमान ने उसे एंटी-सैटेलाइट मिसाइल कहा और इसे अंतरिक्ष के सैन्यीकरण का नमूना बताया। जवाब में रूसियों ने बयान जारी किया कि वह दूसरे उपग्रह से निकला तीसरा उपग्रह भर था, कोई मिसाइल नहीं।

बहरहाल, रूसियों द्वारा अपने एक उपग्रह से दूसरे उपग्रह पर निशाना साधने और चीनियों द्वारा अपने अंतरिक्ष स्टेशन का रास्ता बदलने के बयानों से एक बात तो तय हो गई है कि अभी अंतरिक्ष में स्थापित की जा रही मानव निर्मित मशीनें सिर्फ तयशुदा रास्ते पर चलते हुए कुछ वैज्ञानिक प्रयोग करने और विरोधियों की जासूसी करने के लिए नहीं बनाई जा रही हैं। हथियारों की तैनाती और धरती की किसी और ताकत द्वारा जमीन या अंतरिक्ष से चलाए गए हथियारों से बचने के उपाय भी इनमें मौजूद हैं। हां, आगे चलकर हमले का औजार अगर मिसाइल के बजाय लेजर को बनाया गया तो बचाव के लिए रास्ता बदलना नाकाफी होगा। लेकिन फिर लेजर वेपन की तैनाती भी आम हो गई तो इसे दोतरफा सर्वनाश के हिस्से की तरह ही इस्तेमाल किया जा सकेगा।

स्टेशनों की मारामारी

सन 2022 को इस मामले में यादगार माना जाएगा कि इसकी शुरुआत से ही अंतरिक्ष स्टेशनों की राजनीति चर्चा में आ गई। जैसे ही यह बात पक्की हुई कि चीन का स्पेस स्टेशन थ्यानगोंग इस साल पूरी क्षमता के साथ काम करने लगेगा, अमेरिका ने इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (आईएसएस) की फंडिंग 2030 तक जारी रखने की घोषणा कर दी। अभी तक अमेरिकी हुकूमत इस नतीजे पर पहुंची हुई थी कि 2024 के बाद वह इसपर एक पैसा खर्च नहीं करेगी। इसके बजाय इसको किसी प्राइवेट स्पेस टूरिज्म कंपनी को लीज पर दे दिया जाएगा, जो इसका इस्तेमाल अपने ग्राहकों के लिए एक सुरक्षित लग्जरी स्पेस होटल की तरह किया करेगी। 

जो काम अभी आईएसएस से लिया जा रहा है, उसके लिए प्राइवेट कंपनियां अपने स्पेस स्टेशन स्थापित करेंगी और संस्थाओं से वैज्ञानिक प्रयोग के पैसे लेंगी। लेकिन अभी अमेरिकी सरकार को लग रहा है कि यह काम 2028 से पहले नहीं हो पाएगा। यानी 2024 से 2028 तक स्पेस स्टेशन के नाम पर चीनी थ्यानगोंग के अलावा कुछ नहीं होगा, जो अमेरिकी हितों के लिए ठीक नहीं है।

याद रहे, आईएसएस बनने की शुरुआत 1998 में हुई थी, जब रूस में बोरिस येल्त्सिन राज करते थे। शीतयुद्ध की समाप्ति और सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस को अमेरिकी वर्चस्व वाली दुनिया का ही एक हिस्सा बना देने को लेकर उनकी पूर्ण सहमति थी। चीन को उस समय स्पेस साइंस के मामले में नौसिखिया माना जाता था जबकि भारत को अमेरिकी संदेह की नजर से देखते थे। ऐसे में वैश्विक सर्वसम्मति के एक नमूने की तरह अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा के अलावा चार ताकतवर स्पेस एजेंसियों- रूस की रॉसकॉस्मॉस, यूरोपियन यूनियन की ईएसए, जापान की जाक्सा और कनाडा की सीएसए ने मिलकर अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन बनाने का भगीरथ कार्य प्रारंभ किया। 

लगभग 400 टन वजनी इस विशाल ढांचे ने पृथ्वी, अंतरिक्ष और जीवन की समझ बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान किया है लेकिन वैश्विक सहयोग की जिस भावना से इसे रचा गया था, वह अब हवा हो चुकी है। इसे बंद करने का फैसला अमेरिका का था, जिसपर बाकी चारों सहयोगियों की सहमति थी। चलाते रहने के फैसले पर भी यह सहमति बन पाती है या नहीं, इसका पता अगले कुछ महीनों में चल जाएगा।

प्राइवेट कंपनियों का गेम

स्पेस टेक्नॉलजी में प्राइवेट कंपनियों को आगे रखने की पहल पूरी दुनिया में अभी सिर्फ अमेरिका ने ले रखी है। इसके कुछ फायदे हैं तो कुछ नुकसान भी हैं। रूसियों के लिए अंतरिक्ष की आवाजाही- चाहे वह धरती के पास की हो या दूर की- पूरी तरह सरकारी और रॉकेट आधारित उपक्रम ही रही है। अमेरिकियों ने इसमें पहले स्पेस शटल के रूप में एक बड़ा बदलाव किया, जिसे कुल तीस वर्षों (1981-2011) के बीच बहुत खर्चीला और खतरनाक मानकर बंद कर दिया गया। नतीजा यह कि लगभग एक दशक तक इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन तक रसद-पानी, ईंधन और अंतरिक्षयात्री पहुंचाने का काम पूरी तरह रूसियों के ही जिम्मे रहा। 

इस बीच अमेरिका की प्राइवेट कंपनियों ने अंतरिक्ष यातायात से जुड़ी टेक्नॉलजी और मटीरियल साइंस के मामले में काफी तरक्की की और जमीन से कक्षा तक का ढुलाई खर्च 20 हजार डॉलर प्रति किलोग्राम से घटाकर 1700 डॉलर प्रति किलोग्राम तक लेती आईं। लेकिन उनकी यह खोजी वृत्ति (इनोवेशन) उस तरह से चौतरफा नहीं है, जैसी राष्ट्रीय हितों का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्थाओं की हुआ करती है।

जैसे, रूसी अपनी स्पेस टेक्नॉलजी से जुड़े खर्चे सार्वजनिक करते थे। मिखाइल गोर्बाचेव एक समय गर्व से कहते थे कि उनके रॉकेट अमेरिकियों के दसवें हिस्से जितने खर्चे में ही उनके बराबर काम कर डालते हैं। संभव है, इस बात में अतिरेक रहा हो, लेकिन रूसी सोयुज रॉकेटों को स्पेस शटल से कहीं ज्यादा सस्ता और सुरक्षित अमेरिकी भी मानते रहे हैं। अमेरिकी प्राइवेट कंपनियों के रीयूजेबल रॉकेट कक्षा तक के यातायात के लिए यकीनन काफी सस्ते हैं। चीनी इस मामले में अपनी लागत नहीं बताते लेकिन उनके स्पेस स्टेशन का मेंटेनेंस खर्चा बेहतर सोलर बैटरियों के चलते आईएसएस से काफी कम पड़ेगा, ऐसा बयान चीनी स्पेस एजेंसी ने जरूर जारी किया था। 

युद्ध की तैयारी

इस मद में अमेरिकी प्राइवेट कंपनियों के खर्चे तभी उजागर होंगे, जब वे अपने स्पेस स्टेशन खड़े कर लेंगी। ऐसे तीन प्रस्तावों पर अभी काम चल रहा है और दिसंबर 2021 में अमेरिकी सरकार ने इनपर काम करने वाली कंपनियों को 41.5 करोड़ डॉलर की ग्रांट भी दी है। इसके फायदे शायद बाद में दिखें लेकिन नुकसान अभी दिख रहा है कि फ्रंटलाइन टेक्नॉलजी के मामले में एक ही काम तीन तरह से तीन जगह लगभग तिगुने खर्च पर करना पड़ रहा है।

अमेरिका आईएसएस की फंडिंग भले ही 2030 तक करता रहे, लेकिन उसने यह तो जाहिर कर ही दिया है कि धरती के करीब वाले अंतरिक्ष में अपनी निजी कंपनियों के बल पर वह अकेले ही आगे बढ़ना चाहता है। यहां नासा की सहयोगी रही कनाडा, यूरोप और जापान की स्पेस एजेंसियों को उसने चंद्रमा पर अड्डा बनाने के अपने कार्यक्रम आर्टेमिस प्रोगाम में साथ लिया है, हालांकि रूस जैसी बराबरी वाली ताकत की गैरमौजूदगी में इस सहयोग का स्वरूप आईएसएस की तरह भाईचारे वाला शायद न रह पाए। 

उसके सामने असल मुश्किल है चीन और रूस के एक साथ मिलकर प्रतिद्वंद्वी खेमे की तरह खड़े होने की, जो अंतरिक्ष की खेमेबंदी को अपने आप 1950 और 1960 के दशकों की तरह बराबरी के मुकाबले वाली बना देगी। धरती पर जारी अमेरिका बनाम चीन वाले सैन्य और आर्थिक तनाव को इसके साथ जोड़ दें तो अंतरिक्ष की छवि खुद में एक संभावित रणभूमि जैसी उभरने लगती है।

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