Saturday, 23 November 2019

दुरंगी सतह चांद की

चंद्रभूषण
चंद्रमा पर न हवा चलती है, न पानी बहता है, न कोई ऐसी भूगर्भीय उथल-पुथल होती है, जिससे उसकी सतह की शक्ल बदलती हो। जब-तब गिरने वाले उल्कापिंडों से पैदा हुई क्षणिक हलचलों को छोड़ दें तो वहां ऐसा कुछ भी नहीं होता जिससे चंद्रमा को लेकर वैज्ञानिकों की राय अचानक बदल जाए। लेकिन अपोलो की तर्ज पर तैयार हो रहे नासा के नए चंद्र अभियान आर्टेमिस की ताजा रिपोर्ट पर भरोसा करें तो वैज्ञानिक इस बात को लेकर चकित हैं कि चंद्रमा की सतह एकरंगी नहीं है।

उस पर गहरे और हल्के रंग वाले वैसे ही सुडौल लहरियादार पैटर्न दिखते हैं, जैसे धरती पर रेगिस्तानों में या समुद्र तटों पर नजर आते हैं। लूनर स्वर्ल (चंद्र भंवर) नाम की इन संरचनाओं के बनने का कारण क्या है, इस पर वैज्ञानिकों के बीच बहस जारी है। पृथ्वी जैसा कोई एकीकृत चुंबकीय क्षेत्र चंद्रमा का नहीं है लेकिन चुंबकीय सुई उसके अलग-अलग इलाकों में काफी कमजोर मगर अलग-अलग चुंबकीय क्षेत्र प्रदर्शित करती है।

एक वैज्ञानिक राय यह है कि जहां भी यह चुंबकीय क्षेत्र ज्यादा मजबूत है वहां सूरज से सौर वायु के रूप में आने वाले उच्च ऊर्जा वाले आवेशित कण छिटक कर परे चले जाते हैं। इससे ये इलाके कम फुंकते हैं और इनका रंग हल्का रह जाता है। इस राय का सही या गलत होना 2024 में ही पक्का होगा जब अमेरिकी चंद्रयात्री चंद्रमा का सघन चुंबकीय सर्वे करेंगे।

अगर राय सही हुई तो खेमे गाड़ने के लिए हल्के रंग वाली जगहें ज्यादा सही रहेंगी क्योंकि वहां रेडिएशन एक्सपोजर तुलनात्मक रूप से कम रहेगा। इनके बरक्स गहरे रंग वाले इलाकों में नमी होने की संभावना ज्यादा है, बशर्ते वे ध्रुवीय दायरे में हों और उन्हें कोई आड़ मिली हुई हो।

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