Friday, 5 October 2018

ग्लोबल वार्मिंग का इलाज


चंद्रभूषण 
बढ़ती कार्बन डाइऑक्साइड अगले कुछ ही वर्षों में ग्लोबल वार्मिंग को बेकाबू बना सकती है। पेरिस सम्मेलन में सदी के अंत तक धरती का तापमान 2 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा न बढ़ने देने के लिए यह तय किया गया कि तब तक कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन बिल्कुल रोक दिया जाए और फिर इस गैस को सिस्टम से बाहर करने के प्रयास चलाए जाएं। लेकिन यह बात कहने में जितनी सटीक थी, व्यवहार में उतनी ही बोगस साबित हो रही है। दुनिया में हर जगह अंधाधुंध गाड़ियां बिक रही हैं और कार्बन का उत्सर्जन दिनोंदिन तेज ही होता जा रहा है। इसके सोख्ते के तौर पर खूब सारे पेड़ लगाने की बात और भी बोगस है क्योंकि इसके नाम पर हर जगह सिर्फ सरकारी पैसे खाए जा रहे हैं।
ऐसे में वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड हटाने का एक ही रास्ता बचता है कि किसी तरह इसे सीधे ही चूस लिया जाए। डायरेक्ट एयर कैप्चरनाम की इस मुहिम में हवा को बड़े-बड़े पंखों से खींचकर किसी ऐसे केमिकल से गुजारा जाता है, जो कार्बन डाइऑक्साइड सोख ले। फिर उससे यह गैस निकालकर केमिकल को दोबारा काम पर लगा दिया जाए। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के भौतिकशास्त्री डेविड कीथ ने कनाडा में ऐसा एक पायलट प्रॉजेक्ट शुरू किया, जिसकी लागत पिछले कुछ सालों में 600 डॉलर से घटकर 100 डॉलर प्रति टन कार्बन डाइऑक्साइड तक आ गई है। आगे इससे 1 डॉलर प्रति लीटर का ईंधन बनाया जा सकेगा। सरकारें पर्यावरण को लेकर गंभीर हों तो 2030 तक इस प्रयास से कुछ ठोस उम्मीद बांधी जा सकती है।


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