Sunday, 22 March 2015

एलियंस को भेजेंगे संदेश

बाहरी दुनिया से संपर्क के प्रयास पर हमें अपनी रणनीति बदल देनी चाहिए। चुपचाप रेडियो संदेशों को सुनने के बजाए हमें बाहरी दुनिया की तरफ सूचना प्रधान संदेश संप्रेषित करने चाहिए .
कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि हमें सौरमंडल से बाहर दूसरे तारों के आवास क्षेत्रों में स्थित ग्रहों की तरफ संदेश भेजना शुरू कर देना चाहिए ताकि पारलौकिक जीव हमारी बात सुन सकें। पारलौकिक जीवन की खोज से जुड़े सेटी प्रोजेक्ट के विशेषज्ञों का विचार है कि अब हमें दूसरे लोक में बुद्धिमान सभ्यताओं के संकेतों के लिए बाहरी रेडियो संदेशों को सुनना बंद कर देना चाहिए। गौरतलब है कि ब्रह्मांड से आने वाले संदेशो को सुनने के लिए सेटी का गठन किया गया था। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी और कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी जैसे संस्थानों के खगोल-भौतिकविद इस प्रोजेक्ट में शामिल हुए। सेटी इंस्टीट्यूट के एक वैज्ञानिक डगलस वकोच का कहना है कि हमें अब दूसरे सौरमंडलों के गोल्डीलॉक्स क्षेत्रों में स्थित ग्रहों को उपयुक्त संदेश भेजने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। गोल्डीलॉक्स क्षेत्र ऐसा क्षेत्र है जहां तापमान जीवन के लिए उपयुक्त होता है। उन्होंने कहा कि पिछले पचास वषों से खगोल वैज्ञानिक इरादतन रेडियो संकेतों की तलाश कर रहे हैं ताकि दूसरी सभ्यताओं के बारे में कोई सुराग हाथ लग जाए। अब दूसरी अर्धशती में प्रवेश करते हुए हमें अपनी रणनीति बदल देनी चाहिए। चुपचाप रेडियो संदेशों को सुनने के बजाए हमें बाहरी दुनिया की तरफ इरादतन सूचना प्रधान संदेश संप्रेषित करने चाहिए। दूसरे तारों के आवास योग्य क्षेत्रों में पृथ्वी जैसे ग्रह दिखने के बाद हमें संप्रेषण योजनाओं के लिए कुदरती लक्ष्य मिल गए हैं। वकोच ने कहा कि हमें कई वषों तक तारों के एक समूह विशेष लक्षित करना होगा।
नासा के केप्लर स्पेस टेलीस्कोप ने तारों के आवास योग्य क्षेत्रों में 3800 से अधिक ग्रहों का पता लगाया है। ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी के रिसर्चरों ने ताजा अध्ययन में पता लगाया है कि हमारी आकाशगंगा में अरबों ग्रहों पर परिस्थितियां पानी और जीवन के लिए अनुकूल हो सकती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि नए खोजे गए ग्रहों की तरफ संकेत भेजना नई दुनिया से संपर्क करने का सबसे अच्छा तरीका हो सकता है। पारलौकिक जीवों को किस तरह के संदेश भेजे जाएं, इस पर वैज्ञानिकों की एक राय नहीं है। लोग एलियंस से क्या कहना चाहेंगे, यह जानने के लिए सेटी ने अर्थ स्पीक्स नामक एक साइट स्थापित की है। इस साइट पर लोगों से अंतर-नक्षत्रीय संदेशों का प्रारूप भेजने को कहा गया है। साइट पर भेजे गए संदेशों में पृथ्वी के ज्ञान को थोपने के बजाय मुख्य जोर एलियंस से मदद मांगने पर दिया गया। वकोच का कहना है कि मनुष्य ब्रह्मांडीय हीन भावना का शिकार है। वह यह मान कर चलता है कि पारलौकिक जीव तकनीकी दृष्टि से हम से ज्यादा उन्नत हैं और उनके समक्ष हम से सीखने के लिए कुछ भी नहीं है। सेटी के विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारों को मिल कर परग्रही प्राणियों के लिए संदेश निर्धारित चाहिए। बुनियादी संदेश भेजने के लिए उपकरण पहले से मौजूद हैं और कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि संदेश भेजने की अनिच्छा के पीछे राजनीतिक कारण हैं। इसका तकनीक से कोई लेना देना नहीं है। वरिष्ठ खगोल वैज्ञानिक और सेटी रिसर्च सेंटर के निदेशक सेठ शोष्टक के अनुसार कुछ लोग एलियंस से संपर्क करने के विचार का विरोध कर रहे हैं। उन्हें डर है कि इससे खतरनाक पारलौकिक जातियां हमारी उपस्थिति के बारे में सचेत हो जाएंगी।
शोष्टक का कहना है कि संदेश भेजने मात्र से पृथ्वी के संकट में पड़ने की आशंका निराधार है। हम पिछले 70 सालों से अंतरिक्ष में अपने प्रसारण भेज रहे हैं। इनमे टेलीविजन, एफएम और रेडार संकेत शामिल हैं। पृथ्वी पर जीवन का अस्तित्व चार अरब साल से है और किसी ने भी अभी तक इसे नष्ट करने के बारे में नहीं सोचा। अत: हमें आशावादी होना चाहिए। दूसरी तरफ अमेरिकी वैज्ञानिक डेविड ब्रिन का मानना है कि पारलौकिक दुनिया से संपर्क करने की कोशिश एक बड़ी भूल होगी। उन्होंने कहा कि हम समस्त ब्रह्मांड की तकनीक संपन्न जातियों में सबसे युवा हैं। इसलिए हमें सजग रहना चाहिए।


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