Tuesday, 3 February 2015

नई एंटीबायोटिक की खोज

दवा प्रतिरोध का मुकाबला
जीवाणु विकसित करने की नई विधि से उम्मीद है कि शक्तिशाली एंटीबायोटिक दवाएं विकसित की जा सकेंगी 
वैज्ञानिकों ने लगभग तीस साल बाद एंटीबायोटिक की एक नई किस्म खोजी है जो ऐसी संक्रामक बीमारियों से लड़ने में मदद कर सकती हैं जिनमें मौजूदा दवाएं बेअसर साबित हो रही हैं। टेक्सोबैक्टीन नामक यह एंटीबायोटिक कई तरह के दवा प्रतिरोधी बैक्टीरिया को नष्ट करने में सक्षम है जिनमें टीबी उत्पन्न करने वाले बैक्टीरिया शामिल हैं। इस एंटीबायोटिक के प्रयोग से जीवाणु अपनी कोशिका की दीवार नहीं बना पाते। इससे उनकी दवाओं का प्रतिरोध करने की क्षमता नष्ट हो जाती है। अमेरिका में बोस्टन स्थित नॉर्थ ईस्टर्न यूनिवर्सिटी के एंटीमाइक्रोबियल डिस्कवरी सेंटर के डायरेक्टर किम लुइस का कहना है कि टेक्सोबैक्टीन बहुत तेजी से इंफेक्शन का सफाया का देती है। गौरतलब है कि दुनिया में खतरनाक बीमारियां फैलाने वाले जीवाणुओं में दवा प्रतिरोधी क्षमता लगातार बढ़ रही है और वैज्ञानिकों ने चेताया है कि रोगाणुओं में दवा प्रतिरोध की समस्या जलवायु परिवर्तन जितनी ही गंभीर है। जनस्वास्थ्य विशेषज्ञों ने इस बात पर गहरी चिंता जताई है कि एंटीबायोटिकरोधी रोगाणु लगभग प्रत्येक देश में पहुंच चुके हैं। स्थिति इतनी हताशापूर्ण है कि डॉक्टरों के पास बची हुई सबसे शक्तिशाली एंटीबायोटिक दवाएं भी बेअसर साबित हो रही हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पिछले साल अपनी एक रिपोर्ट में दवा प्रतिरोध की गंभीरता पर सबका ध्यान खींचा था। एक अन्य रिपोर्ट में चेतावनी दी गई थी कि यदि दवा प्रतिरोध से निपटने के लिए कारगर उपाय नहीं किए गए तो दुनिया की अर्थव्यवस्था पर 2050 तक खरबों डॉलर का बोझ आ जाएगा।
चूहों पर किए गए ताजा अध्ययनों के दौरान अमेरिकी वैज्ञानिकों ने पाया कि नए एंटीबायोटिक से स्टेफाइलोकोकस और स्ट्रेप्टोकोकस नामक जीवाणु बेअसर हो जाते हैं। इन जीवाणुओं से फेफड़ों और रक्त में जानलेवा इन्फेक्शन उत्पन्न हो सकते हैं। यह दवा एंट्रोकोकस के विरुद्ध भी कारगर सिद्ध हुई है जो हृदय पेट और प्रोस्ट्रेट आदि को इंफेक्ट कर सकता है। अधिकांश एंटीबायोटिक दवाएं बैक्टीरिया या फफूंदी से निकाली जाती हैं, लेकिन वैज्ञानिक अभी बहुत कम बैक्टीरिया में एंटीबायोटिक क्षमता की जांच कर पाए हैं। इसकी वजह यह है कि 99 प्रतिशत जीवाणुओं को प्रयोगशाला में विकसित नहीं किया जा सकता। लुइस की टीम ने इस समस्या से निपटने के लिए आइचिप नामक एक उपकरण विकसित किया। यह उपकरण बैक्टीरिया को उनके कुदरती माहौल में विकसित करता है। लुइस की टीम ने मैसाचुसेट्स की एक कंपनी और यूनिवर्सिटी ऑफ बोन के रिसर्चरों के साथ मिलकर मिटटी के नमूनों में करीब 10,000 बैक्टीरिया में एंटीबायोटिक की जांच की। उन्होंने 25 रसायन खोजे जिनमें टैक्सोबैक्टीन को सबसे ज्यादा उपयोगी पाया गया। ज्यादातर एंटीबायोटिक दवाएं बैक्टीरिया के प्रोटीन को निशाना बनाती हैं, लेकिन बैक्टीरिया नए प्रोटीन उत्पन्न करके दवा प्रतिरोधी क्षमता हासिल कर लेते हैं। टैक्सोबैक्टीन सीधे बैक्टीरिया की कोशिका दीवार की निर्माण सामग्री पर प्रहार करती है। लुइस का कहना है कि इस एंटीबायोटिक को दवा के रूप में उपलब्ध कराने से पहले अभी और रिसर्च की जरूरत है। इस दवा के असर को जांचने के लिए मानवीय परीक्षण दो साल में शुरू हो सकते हैं।

इस एंटीबायोटिक के संभावनापूर्ण होने के बावजूद इसमें कुछ कमियां हैं। यह सिर्फ ऐसे बैक्टीरिया के खिलाफ काम करती है जिनमें बाहरी कोशिका दीवार नहीं होती। ऐसे बैक्टीरिया को ग्राम पॉजिटिव बैक्टीरिया कहा जाता है जिनमें टीबी और स्ट्रेप्टोकोकस शामिल है। यह ग्राम नेगिटिव बैक्टीरिया के खिलाफ बेअसर साबित हुई है जिनमें ई-कोलाई जैसे खतरनाक दवा-प्रतिरोधी जीवाणु शामिल हैं। इन सीमाओं के बावजूद नई एंटीबायोटिक की खोज और जीवाणुओं को विकसित करने के लिए खोजी गई नई विधि से उम्मीद है कि आने वाले वषों में शक्तिशाली एंटीबायोटिक दवाएं विकसित की जा सकेंगी।

No comments:

Post a comment