Thursday, 18 December 2014

जीएसएलवी-मार्क3 का सफल परीक्षण-ऐतिहासिक उपलब्धि

शशांक द्विवेदी (Shashank Dwivedi)
अंतरिक्ष के क्षेत्र में ऐतिहासिक उपलब्धि 
अंतरिक्ष के क्षेत्र में आज भारत ने एक बार फिर इतिहास रच दिया .इसरो और कामयाबी एक दूसरे के पर्यायवाची बन गयें है .भारत के लिए आज दोहरी खुशी का मौका है। एक तो देश के सबसे बड़े रॉकेट का लॉन्च कामयाब रहा है और दूसरी अच्छी खबर यह है कि भारत भी अंतरिक्ष में इंसान भेजने की काबिलियत हासिल करने में कामयाब रहा है, यानी साफतौर पर आज भारत के लिए बहुत बड़ा दिन है।

भारत के सबसे बड़े रॉकेट जीएसएलवी मार्क-3 का श्रीहरिकोटा से सफल लॉन्च हुआ। इस कामयाबी के साथ ही भारत उन देशों की सूची में शामिल हो गया, जो अंतरिक्ष में बड़े सेटेलाइट भेज सकते हैं। इस लॉन्च से दूसरी बड़ी सफलता जो भारत को मिली वो ये है कि अब भारत भी अंतरिक्ष में इंसान भेज सकेगा, हालांकि इसमें अभी और वक़्त लगेगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को जीएसएलवी-मार्क3 के सफल परीक्षण पर भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (इसरो) के वैज्ञानिकों को बधाई दी। मोदी ने अपने संदेश में कहा, जीएसएलवी का सफल परीक्षण हमारे वैज्ञानिकों के परिश्रम और प्रतिभा का एक और उदाहरण है। आप सभी के प्रयासों के लिए बधाइयां।
अंतरिक्ष में इंसान को भेजने की काबिलियत फिलहाल सिर्फ रूस, अमेरिका और चीन के पास है। सुबह 9.30 बजे सतीश धवन स्पेस सेंटर से जीएसएलवी मार्क-3 रॉकेट को लॉन्च किया गया। करीबन 20 मिनट बाद लॉन्च के सफल होने का ऐलान किया गया। भारत के अंतरिक्ष यान ने करीब 125 किलोमीटर की ऊंचाई तय की, फिर पैराशूट के सहारे धरती पर लौटा। अंडमान निकोबार द्वीप समूह के पास बंगाल की खाड़ी में अंतरिक्ष यान ने लैंड किया, जहां मौजूद कोस्ट गार्ड के जहाज़ ने अतंरिक्ष यान को बाहर निकाला।इसरो के एक अधिकारी ने बताया कि इस क्रू मॉड्यूल का आकार एक छोटे से शयनकक्ष के बराबर है, जिसमें दो से तीन व्यक्ति आ सकते हैं।
जीएसएलवी-मार्क3 के सफल परीक्षण के बाद यहां मिशन के नियंत्रण कक्ष में इसरो के वैज्ञानिकों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। इसरो के अध्यक्ष के. राधाकृष्णन ने बताया, भारत ने इस रॉकेट का निर्माण एक दशक पहले ही शुरू कर दिया था और आज प्रयोग के तौर पर इसका पहला परीक्षण किया गया। ठोस और तरल इंजनों का प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक ही रहा। मानवरहित क्रू मॉड्यूल बंगाल की खाड़ी में गिरा, जैसी कि उम्मीद थी।वहीं, जीएसएलवी-मार्क3 के परियोजना निदेशक एस. सोमनाथ ने कहा, भारत के पास अब एक नया प्रक्षेपण यान है। भरतीय रॉकेट की वहन क्षमता में महत्वपूर्ण वृद्धि हुई है।मंगल अभियान की कामयाबी के बाद अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भारत की यह दूसरी बड़ी सफलता है। जीएसएलवी मार्क 3 (जिओ सिंक्रोनस लॉन्च व्हीकल) की ये पहली टेस्ट फ्लाइट थी। इस रॉकेट का वजन 630 टन है। इसकी ऊंचाई करीब 42 मीटर है और यह 4 टन का वजन ले जा सकता है। जीएसएलवी मार्क-3 को बनाने में 160 करोड़ रुपये की लागत आई है।
क्या होगा फायदा
इसके साथ ही अंतरिक्ष में इंसान को भेजने का भारत का सपना जल्द पूरा हो सकता है। फिलहाल रूस, अमेरिका और चीन के पास इंसान को अंतरिक्ष में भेजने की काबिलियत है। अब भारत भी इन देशों की लीग में शामिल हो गया है।
42.4 मीटर लंबे जीएसएलवी एमके-3 के मिशन के पूरे होने से इसरो को भारी सेटलाइट्स को उनकी कक्षा में पहुंचाने में मदद मिलेगी। जीएसएलवी एमके-3 की परिकल्पना और उसकी डिजाइन इसरो को इनसैट - 4 श्रेणी के 4,500 से 5,000 किलोग्राम वजनी भारी कम्युनिकेशन सैटलाइट्स को लॉन्च करने की दिशा में पूरी तरह आत्मनिर्भर बनाएगा। इससे अरबों डॉलर के कमर्शल लॉन्चिंग मार्केट में भारत की क्षमता में इजाफा होगा।
क्या है जीएसएलवी?

भूस्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान अंतरिक्ष में उपग्रह के प्रक्षेपण में सहायक यान होता है। ये यान उपग्रह को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करने में मदद करता है। जीएसएलवी ऐसा बहुचरण रॉकेट होता है जो दो टन से अधिक भार के उपग्रह को पृथ्वी से 36 हजार किलोमीटर की ऊंचाई पर भू-स्थिर कक्षा में स्थापित कर देता है जो विषुवत वृत्त या भूमध्य रेखा की सीध में होता है। ये रॉकेट अपना कार्य तीन चरण में पूरा करते हैं। इनके तीसरे यानी अंतिम चरण में सबसे अधिक बल की आवश्यकता होती है।

रॉकेट की यह आवश्यकता केवल क्रायोजेनिक इंजन ही पूरा कर सकते हैं। इसलिए बिना क्रायोजेनिक इंजन के जीएसएलवी रॉकेट का निर्माण मुश्किल होता है। अधिकतर काम के उपग्रह दो टन से अधिक के ही होते हैं। इसलिए विश्व भर में छोड़े जाने वाले 50 फीसद उपग्रह इसी वर्ग में आते हैं। जीएसएलवी रॉकेट इस भार वर्ग के दो तीन उपग्रहों को एक साथ अंतरिक्ष में ले जाकर निश्चित किलोमीटर की ऊंचाई पर भू-स्थिर कक्षा में स्थापित कर देता है। यही इसकी की प्रमुख विशेषता है।
जीएसएलवी की उपलब्धियां

- जीएसएलवी-एफ 06 ने 25 दिसंबर, 2010 को जीसैट-5पी का प्रक्षेपण किया जो असफल रहा।

- जीएसएलवी-डी 3 ने 15 अप्रैल, 2010 को जीसैट-4 का प्रक्षेपण किया जो असफल रहा।
- जीएसएलवी-एफ 04 ने 2 सितंबर, 2007 को इन्सेट-4 सीआर का सफल प्रक्षेपण किया गया।
- जीएसएलवी-एफ02 ने 10 जुलाई, 2006 को इन्सेट-4 सी का प्रक्षेपण किया गया लेकिन यह असफल रहा।
- जीएसएलवी-एफ 01 ने 20 सितंबर, 2004 को एडुसैट (जीसैट-3) का सफल प्रक्षेपण किया गया।
- जीएसएलवी-डी 2 ने 8 मई, 2003 को जीसैट-2 का सफल प्रक्षेपण किया गया।
- जीएसएलवी-डी 1 ने 18 अप्रैल, 2001 को जीसैट-1 का सफल प्रक्षेपण किया गया।
सफलता की उड़ान 
भारत ने अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में एक और सधा हुआ कदम आगे बढ़ाया है। देश में बने सबसे बड़े रॉकेट जीएसएलवी मार्क-3 का सफल प्रक्षेपण किया गया। यह इस रॉकेट की पहली टेस्ट फ्लाइट है। इस तरह हम अंतरिक्ष में बड़े सैटेलाइट भेजने की क्षमता रखने वाले गिने-चुने मुल्कों में शामिल हो गए हैं। मंगल मिशन के बाद भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की यह एक चमकदार सफलता है। सच तो यह है कि हल्के उपग्रह ले जाने में सक्षम पीएसएलवी रॉकेटों के मामले में हमारे देश को महारत हासिल है पर, जीएसएलवी में हमारा हाथ तंग रहा है। इसके सभी प्रोजेक्ट अब तक असफल रहे थे। लेकिन इस बार के प्रक्षेपण से लगता है कि इस तकनीक को भी हमने साध लिया है। सबसे बड़ी बात यह है कि इसरो ने अपने इस प्रयोग के जरिये इंसान को स्पेस में भेजने के रास्ते पर पहला कदम बढ़ा दिया है।
जीएसएलवी मार्क-3 रॉकेट के साथ मनुष्य को अंतरिक्ष में ले जाने वाला एक कैप्सूल भी भेजा गया था, जिसे अंतरिक्ष से सफलतापूर्वक धरती पर उतार लिया गया है। यह एक बार में दो-तीन लोगों को अंतरिक्ष में ले जा सकता है। रॉकेट इस कैप्सूल को 125 किलोमीटर की ऊंचाई तक लेकर गया, जहां यह रॉकेट से अलग हो गया, और फिर पैराशूट के सहारे इसे बंगाल की खाड़ी में उतार लिया गया। कैप्सूल की इस कामयाब लैंडिंग से अगले कुछ सालों में भारतीय खोजी दल को चांद पर उतारने की योजना को पंख लग गए हैं।
अभी तक केवल अमेरिका चालीस-पैंतालीस साल पहले अपने अपोलो अभियान में गिनती के 19 लोगों को चंद्रमा पर पहुंचा कर वहां से उन्हें जीवित वापस ला सका है। इंसान को अंतरिक्ष में ले जाने की क्षमता उसके अलावा सिर्फ रूस और चीन के पास है। इसरो की इस कामयाबी के बाद हम भारी सैटलाइट्स भेजने के मामले में तो आत्मनिर्भर होंगे ही, अरबों डॉलर के कमर्शल लॉन्चिंग मार्केट में भी भारत की एंट्री हो जाएगी।आज विश्व में अगर एक ताकतवर ब्रैंड इंडिया उभर कर आया है, तो उसमें आर्थिक तरक्की के साथ-साथ अंतरिक्ष विज्ञान की हमारी उपलब्धियों का भी महत्वपूर्ण योगदान है। इसरो ने एक के बाद एक सफलता के झंडे गाड़े हैं, लेकिन थोड़े अफसोस की बात यह है कि अन्य वैज्ञानिक संगठनों की ओर से कोई बड़ी खुशखबरी बहुत दिनों से नहीं आई है। इसरो के बराबर समझे जाने वाले रक्षा शोध संगठन डीआरडीओ का बजट अच्छा-खासा होने के बावजूद वह कोई बड़ा काम नहीं कर पा रहा है, लिहाजा रक्षा के क्षेत्र में आयात पर हमारी निर्भरता कम होने का नाम नहीं ले रही है। कृषि और स्वास्थ्य के क्षेत्रों में भी हमारे शोध-अनुसंधान की हालत काफी कमजोर है। हमें विज्ञान के हर क्षेत्र में आगे बढ़ना होगा, तभी दुनिया हमें एक आधुनिक शक्ति के रूप में पहचानेगी।

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