Sunday, 20 July 2014

बुढ़ापे का मुकाबला

आहार में कैलोरी की मात्र कम करने से उम्र संबंधी जुड़ी बीमारियों को कम किया जा सकता है। वृद्ध होने की प्रक्रिया पर आहार के प्रभावों को जानने के लिए बंदरों पर 25 वर्ष तक किए गए अध्ययन में यह बात सामने आई है। यह अध्ययन अमेरिका की विस्कोंसिन मेडिसन यूनिवर्सिटी के नेशनल प्राइमेट रिसर्च सेंटर में 1989 में शुरू किया गया था। अध्ययन में 76 बंदरो को सम्मिलित किया गया। अध्ययन शुरू करने के समय इन बंदरों की आयु 7 से 14 वर्ष के बीच थी। इन बंदरों को दिए जाने वाले आहार में कैलोरी की मात्र 30 प्रतिशत कम कर दी गई थी। अध्ययन में शामिल दूसरे ग्रुप के बंदरों के आहार में कैलोरी की मात्र में कोई कटौती नहीं की गई। रिसर्चरों ने पाया कि जिन बंदरों ने भरपेट भोजन लिया उनमें बीमारियां उत्पन्न होने का खतरा कम कैलोरी लेने वाले बंदरों की तुलना में 2.9 गुना ज्यादा था। इसी तरह इन बंदरों में मृत्यु का खतरा तीन गुना अधिक पाया गया। इस अध्ययन से जुड़े प्रमुख रिसर्चर रिचर्ड वाइनड्रच का कहना है कि यह अध्ययन इस नाते महत्वपूर्ण है कि निचले क्रम के जीवों में हमने जो जीवविज्ञान देखा है वह प्राइमेट ग्रुप पर भी लागू होता है जिसमें मनुष्य भी शामिल है।
कैलोरी में कटौती के द्वारा बुढ़ापे का मुकाबला करने के पीछे जो प्रक्रिया है उससे उम्र से जुड़ी बीमारियों को रोकने वाली दवाएं विकसित करने में मदद मिल सकती है। शरीर को पोषक तत्वों की आपूर्ति बनाए रखते हुए कम कैलोरी वाली खुराक से मक्खियों और चूहों के आयुकाल में 40 प्रतिशत की वृद्धि देखी जा चुकी है। वैज्ञानिक काफी समय से कैलोरी कटौती की जीव-वैज्ञानिक प्रक्रिया को समझने की कोशिश कर रहे हैं। इस अध्ययन से जुडी एक अन्य रिसर्चर रोजालिन एंडरसन का कहना है कि बुढ़ापे की प्रक्रिया और उम्र से जुडी बीमारियों पर कैलोरी में कटौती के स्पष्ट प्रभाव दिखने की वजह से ही हम कैलोरी कटौती का विशेष अध्ययन कर रहे हैं। कुछ लोगों ने उन दवाओं का भी अध्ययन शुरू कर दिया है जो कैलोरी कटौती के समय सक्रिय रहने वाली प्रक्रियाओं को प्रभावित करती हैं। इन दवाओं में कुछ कंपनियां काफी दिलचस्पी ले रही हैं। विस्कोंसिन के रिसर्चरों के निष्कर्ष अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एजिंग यानी एनआइए में किए गए अध्ययन के नतीजों के एकदम विपरीत हैं। एनआइए ने 120 बंदरों पर अध्ययन करने के बाद कहा था कि कैलोरी कटौती वाले बंदरों में दूसरे बंदरों की तुलना में कोई खास अंतर नहीं देखने को मिला है। विस्कोंसिन के रिसर्चरों का कहना है कि एनआइए में किए गए अध्ययन में कटौती से मुक्त बंदरों की खुराक तय करने में जरूर कुछ गड़बड़ियां हुई होंगी। एंडरसन ने स्पष्ट किया है कि हम यह अध्ययन इसलिए नहीं कर रहे हैं कि लोग अपने आप कैलोरी की मात्र घटाने का फैसला करने लगें। यह मात्र एक अनुसंधान है, जीवन शैली बदलने की सिफारिश नहीं। उन्होंने बताया कि कैलोरी कटौती के अधिकांश लाभ ऊर्जा के नियमन से जुड़े हुए हैं। यह ईंधन के इस्तेमाल को प्रभावित करती है। कैलोरी कटौती मुख्य रूप से मेटाबोलिज्म को निर्धारित करती है।
वैज्ञानिकों ने अपना अध्ययन शुरू करने के छह महीने के भीतर ही कैलोरी कटौती से मुक्त बंदरों में डायबिटीज के लक्षण देखे थे। ये बंदर अपनी युवावस्था में ही थे। दूसरी तरफ आहार में कम कैलोरी लेने वाले बंदरों में काफी लंबे समय तक डायबिटीज का कोई लक्षण नहीं मिला। बहुत कम लोग कैलोरी में 30 प्रतिशत कटौती बर्दाश्त कर सकते हैं। फिर भी विस्कोंसिन में किए गए अध्ययन में बहुत सी बातें आशाजनक हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि चूहों, कीड़ों और मक्खियों में कैलोरी कटौती के पीछे जो बुनियादी जीवविज्ञान काम करता है वह वानर प्रजातियों में भी दिखाई देता है।

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