Thursday, 8 May 2014

चिकित्सा का नया आयाम

डीएनए की खोज का चिकित्सकीय महत्व 
डीएनए हमारे जीवन का कोड है। इसमें हमारी तमाम आनुवंशिक सूचनाएं दर्ज हैं। वैज्ञानिक काफी समय से इस अत्यंत महत्वपूर्ण जैविक मॉलीक्यूल के दूसरे उपयोग भी विकसित करने में जुटे हुए हैं। अमेरिका में हार्वर्ड के वीस इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने डीएनए की पिंजरानुमा संरचनाएं तैयार की हैं। सिर्फ डीएनए को लेकर पहली बार इतनी बड़ी और जटिल संरचनाएं निर्मित की गई हैं। भविष्य में इस तरह की संरचनाओं का उपयोग शरीर के ऊतकों तक दवाएं पहुंचाने के लिए किया जा सकता है। डीएनए के इन पिंजरों में हुक लगाकर उनके साथ दूसरे रसायन भी जोड़े जा सकते हैं। वीस इंस्टीट्यूट के प्रमुख वैज्ञानिक प्रो. पेंग यिन का कहना है कि डीएनए पर आधारित सूक्ष्म टेक्नोलॉजी अथवा नैनो टेक्नोलॉजी में दिलचस्प और असीमित संभावनाएं हैं। डीएनए के इन पिंजरों की मदद से वैज्ञानिक कई तरह की तकनीकें विकसित कर सकते है। मसलन, इनसे सूक्ष्म विद्युत संयंत्र निर्मित किए जा सकते हैं और खास तरह के रसायनों के उत्पादन के लिए सूक्ष्म फैक्टियां बनाई जा सकती हैं। इनके अलावा डीएनए की संरचनाओं की मदद से अत्यंत संवेदनशील सेंसर बनाए जा सकते हैं। ये सेंसर असामान्य ऊतकों द्वारा छोड़े जाने वाले रसायनों का पता लगाकर रोगों का सही निदान करने में मदद कर सकते हैं।
डीएनए संरचनाओं की खास बात यह है कि इन संरचनाओं की प्रोग्रामिंग की जा सकती है। वैज्ञानिक डीएनए के अक्षरक्रम को निर्धारित कर सकते हैं। कुछ उपयोगों के लिए डीएनए की बड़ी संरचनाएं तैयार करनी पड़ेंगी। इस क्षेत्र में काम करने वाले शोधकर्ता अभी तक डीएनए ओरिगामी नामक विधि का इस्तेमाल कर रहे थे। इस विधि से ज्यादा जटिल संरचनाएं बनाना संभव नहीं था। यिन और उनके सहयोगियों ने इस तकनीक को आगे बढ़ाते हुए प्रिज्म जैसी बड़ी-बड़ी संरचनाएं बनाईं। नैनो टेक्नोलॉजी के अलावा दूसरे क्षेत्रों में भी डीएनए रिसर्च आगे बढ़ रही है। मुख्य शोध चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में हो रही है। डीएनए की मदद से डॉक्टर यह पता लगा सकेंगे कि ट्यूमर हर मरीज को किस तरह से प्रभावित करता है। इस आधार पर वह यह तय कर सकेंगे कि किसी खास किस्म के कैंसर से निपटने के लिए कौन-सी दवा ज्यादा कारगर होगी। इससे मरीज के लिए सही इलाज खोजने का समय भी बहुत कम किया जा सकेगा। मानव जीनों के विश्लेषण में हाल ही में मिली सफलता का लाभ सभी लोगों को मिलेगा। वैज्ञानिकों का कहना है कि लोग भविष्य में कुछ भुगतान करके अपना आनुवंशिक कोड पढ़ सकेंगे। इससे उन्हें यह पता लग जाएगा कि आगे चलकर उन्हें किस तरह की बीमारियां हो सकती हैं। वैज्ञानिक डीएनए के अलावा आरएनए यानी राइबोन्यूक्लिक एसिड के चिकित्सकीय उपयोग पर भी शोध कर रहे हैं। डीएनए की तरह आरएनए प्रोटीन संश्लेषण में प्रमुख भूमिका अदा करता है। आनुवंशिक सूचनाओं के संप्रेषण में भी इसकी कुछ भूमिका होती है। शोधकर्ताओं का मानना है कि आरएनए पर आधारित दवाएं विभिन्न किस्म के कैंसर और एड्स आदि के इलाज में कारगर हो सकती हैं। परीक्षणों के दौरान ये दवाएं असरदार दिखाई दी हैं। आरएनए का स्वरूप अस्थिर होने के कारण इसके प्रयोग में भी कुछ बाधाएं आई हैं। शोधकर्ताओं को आरएनए आधारित दवाओं के कामयाब होने का पूरा भरोसा है।
इसी तरह ूमन माइक्रोबायोम प्रोजेक्ट से हासिल किए गए ज्ञान के आधार पर गंभीर किस्म की बीमारियों के इलाज के लिए माइक्रोबायोम टेक्नोलॉजी की मदद ली जा रही है। माइक्रोबायोम प्रोजेक्ट के तहत मनुष्य को प्रभावित करने वाले जीवाणुओं के जीनों को पढ़ने की कोशिश की गई है। अनगिनत अदृश्य बैक्टीरिया और जीवाणु मनुष्य के स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनके जीनों को पढ़कर हमें यह पता लग जाएगा कि ये जीवाणु शरीर के लिए प्रोटीन आदि का निर्माण कैसे करते हैं और हमारे शरीर के साथ या दूसरे जीवाणुओं के साथ ये किस तरह का व्यवहार करते हैं।

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