Wednesday, 19 June 2013

आईआईटी फीस बढ़ोत्तरी -गरीब छात्रों के सपनों से खिलवाड़


शशांक द्विवेदी
देश में उच्च और तकनीकी शिक्षा के खराब हालातों और बढ़ती चुनौतियों के  बावजूद मानव संसाधन विकास मंत्री एम. एम. पल्लमराजू की अध्यक्षता में आयोजित आईआईटी काउंसिल की बैठक में शैक्षिक सत्र 2013 से आइआइटी में ग्रेजुएट स्तर पर दाखिला लेने वाले छात्रों की फीस   सालाना 50 हजार से बढ़ाकर 90 हजार रुपये (80 फीसद) की वृद्धि  करने का निर्णय लिया है । एक तरफ देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री 100 वे विज्ञान कांग्रेस में उच्च शिक्षा में बड़े सुधार की वकालत करते हुए उसमें ज्यादा सरकारी निवेश की बात कर रहें है वही दुसरी तरफ सरकार आइआइटी की फीस लगभग दुगनी कर रही है । यहाँ पर यह जानना भी जरूरी है कि सरकार ने इसके पहले यह फीस बढोत्तरी 2009 में की थी तब आइआइटी की फीस 25 हजार रुपये सालाना से बढ़ाकार 50 हजार रुपयें किया था । इसका मतलब यह हुआ कि 4 साल में फीस में लगभग 4 गुने की बढ़ोत्तरी जबकि छात्रों-अभिभावकों पर बोझ बढ़ाने वाला यह कदम किसी भी तरह से न्यायसंगत और तर्कसंगत नहीं है ।
आईआईटी  की बढ़ी फीस को लेकर छात्र अभिभावक सब परेशान हैं, मध्यम व गरीब घर के बच्चे जो कर्ज लेकर, माँ के गहने गिरवी रख, एजुकेशन लोन आदि लेकर पढ़ाई कर रहे हैं वे तो मानसिक तनाव में आ गए हैं कि आखिर कैसे पूरा होगा इंजीनियरिंग का सपना । क्योंकि पहले से तय फीस को लेकर उनके घरों में जो बजट तैयार है वह फीस वृद्धि के फैसले की वजह से अचानक गड़बड़ा सकता है। देश में  लाखों गरीब बच्चे-बच्चियाँ स्कूली जीवन में ही इंजीनियर-डॉक्टर बनने के सपने देखते हैं लेकिन  देश में महगीं तकनीकी शिक्षा की वजह से उनकी  इच्छाओं  और सपनों पर पानी फिर जाता है ।  क्या केंद्रीय सरकार को गरीब प्रतिभावान छात्रों की कोई फिक्र है ? किसी देश या समाज के सर्वांगीण विकास  में उच्च और तकनीकी शिक्षा का सबसे बड़ा योगदान होता है । गौर से देखा जाए, तो दुनिया के ताकतवर व समृद्ध देशों की सफलता का एक बड़ा कारण विश्वस्तरीय उच्च शिक्षा ही है। अमेरिका, चीन, जापान, ब्रिटेन, फ्रांस, जमर्नी, दक्षिण कोरिया, ताईवान, सिंगापुर, मलेशिया, हांगकांग, आॅस्ट्रेलिया आदि देशों की आर्थिक प्रगति को उनकी विश्वस्तरीय उच्च शिक्षा से जोड़कर ही समझा जा सकता है। लेकिन हमारे देश के नीति नियंताओं को यह बात समझ में नहीं आती । देश में उच्च और तकनीकी शिक्षा की स्तिथि अत्यंत दयनीय है वर्तमान सत्र में ही पूरे देश में इंजीनियरिंग की 4 लाख से ज्यादा सीटें खाली है इनमें से कुछ आइआइटी भी शामिल है जहाँ 2012 में 300 सीटें और 2011 में 700 सीटें खाली रह गई थीं ।
सरकार आइआइटी में फीस बढ़ाने के निर्णय को तो इसी सत्र से तुरंत क्रियांवित कर रही है लेकिन आइआइटी की गुणवत्ता ,जवाबदेही व पारदर्शिता के लिए गंभीर नहीं है । पिछले दिनों उच्च शिक्षा के क्षेत्र में रैंकिंग बताने वाली क्यूएस वल्र्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग की ताजा सूची में आईआईटी सहित भारत के किसी भी संस्थान या विश्वविद्यालय को दुनिया के शीर्ष दो सौ संस्थानों में भी जगह नहीं मिली है। देश में अपनी गुणवत्ता के लिए विख्यात आईआईटी की भी साख  विश्व स्तर पर धूमिल होती जा रही है । विश्व के सात सौ संस्थानों पर किए गए इस सर्वे में भारतीय संस्थानों की रैंकिंग लगातार नीचे  ही गिर रही हैं। आईआईटी, दिल्ली 202 से गिरकर अब 218वें स्थान पर है और आईआईटी, मुंबई 187 से 225 वें स्थान पर। इस सूची में शीर्ष स्थान हासिल करने वाले अमेरिकी मैसाच्युसेट इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलाजी (एमआईटी) से आईआईटी की तुलना ही नहीं की जा सकती है। दोनों में शिक्षा, शोध और फैकल्टी के मामले में जमीन-आसमान का अंतर है। इसका प्रमाण तो यही है कि एमआईटी की फैकल्टी में 77 नोबल पुरस्कार विजेता संबद्ध हैं। देश में अनुसंधान की स्तिथि,गुणवत्ता और अंतरराष्ट्रीयकरण के पैमाने पर भी आईआईटी कमतर ही साबित हुए हैं । यह चिंतनीय विषय है कि हमारे आईआईटी इनोवेशन  क्यों नहीं कर पा रहे हैं । लेकिन इस तरफ सरकार का ध्यान ही नहीं जाता
दुर्भाग्य से देश में जो तकनीकी शिक्षा का स्तर है वह ठीक नहीं है । अगर समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो देश को इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे । देश की मौजूदा नीतियों के आधार पर  उच्च और तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में सुधार असंभव है । शिक्षा हर बच्चे का बुनियादी हक है इसे निशुल्क या बहुत कम फीस पर छात्रों को उपलब्ध करना सरकार की जिम्मेदारी है । आईआईटी में फीस बढ़ोत्तरी से कमजोर वर्गो के उन छात्रों के लिए दिक्कत बढ़ जाएगी, जिनमें प्रतिभा है और वे आइआइटी से पढ़कर आगे जाना चाहते हैं।इतना ही नहीं, बल्कि इससे सामान्य छात्र भी प्रभावित होंगे। वे कर्ज लेकर पढ़ने को भी आसान रास्ता नहीं मानते। क्या हम अपने बच्चों, देश की आने वाली पीढ़ी के लिए ऐसी कोई सोच विकसित कहीं कर सकते कि फीस आदि को लेकर उनमें अवसाद या तनाव न पैदा होने पाएँ। 

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