Monday, 20 May 2013

नवाचार या आविष्कार में क्यों पीछे है भारत


विश्व मोहन तिवारी 
उत्कृष्ट मानव वही है जो समस्याओं का हल निकाले।आज के विज्ञान युग के जीवन की अधिकांश समस्याओं के हल निकालने में वैज्ञानिक शायद सर्वाधिक उपयुक्त हैं। मानव समाज की समस्याओं के निवारक होते हैं नवाचारी; संसार में नवाचारी ही करते हैं सफ़ल प्रगति; नवाचारी मानव के कष्ट और दुख निवारक होते हैं, और सुख सुविधा बढ़ाते हैं ; जैव विकास का मूल है नवाचार; और यह बहुत महत्वपूर्ण बात है कि देश को सुदृढ़ करवाते हैं नवाचार।
मैं चर्चा करना चाहता हूं एक ऐसे नवाचारी की जिसने भारत में क्रान्ति ला दी; जिसने 'हम भी दौड़े' के स्थान पर ला दिया हमें 'सफ़ल धावकों में' - ए. पी. जे. अब्दुल कलाम की। उऩ्होंने अपनी पहली ही प्रायोजना में भारत में प्रथमत: होवरक्राफ़्ट का सफ़ल निर्माण किया था; जिसे देखकर रायल सोसायटी इंग्लैंड के एक अधिकारी सर माइकैल लिटिल हिल ने कहा था कि संक्रियात्मक होवरक्राफ़्ट के इस कठिन नवाचार में इंग्लैंड के बाद भारत के द्वितीय स्थान बनने की संभावना है। किन्तु इस देश में राजनीति इतनी गंदी है कि इस पूर्णत: स्वदेशी नवाचार का सम्मान ही नहीं किया गया वरन इसे कचड़े की टोकरी में‌ डाल दिया गया।
जब भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के द्वारा 'एस एल वी ३' का सफ़ल प्रमोचन हुआ, तब दुनियां में कहा गया कि हम लोगों का विश्व में अंतरिक्ष प्रमोचन यान की प्रौद्योगिकी में चौथा स्थान है। जब 'पी एस एल वी' का प्रमोचन किया गया तब फ़िर कहा गया कि हमारा इस क्षेत्र में चौथा स्थान है। और जब भाभा परमाणु केन्द्र ने परमाणु बम का विस्फ़ोट किया, तब कहा गया कि विश्व में‌ हमारा इस अणु आयुध निर्माण प्रौद्योगिकी में पाँचवां स्थान है। जब 'सैन्टर फ़ार डिवैलपमैन्ट आफ़ एडवास्न्स्ड कम्प्यूटर', पुणे ने 'सुपरकम्पूटार' का निर्माण किया, तब फ़िर कहा गया कि विश्व में हमारा स्थान चौथा है। रक्षा अनुसंधान में कार्य करते समय कलाम साहब के नेतृत्व में प्रक्षेपास्त्रों के क्षेत्र में हमने अनेक क्रान्तिकारी कार्य किये, किन्तु उस चौथे के चक्कर को तोड़ नही पाए थे । हम अभी भी विकसित देशों की श्रेणी में नहीं आते । कलाम साहब का सपना है कि २०२० तक हम विकसित देशों की श्रॆणी में पहुँचें।
कलाम साहब कहते हैं कि हमें इस चौथे पाँचवें के चक्कर को तोड़कर आगे बढ़ना है। इसके लिये हमें भारी संख्या में आत्मविश्वासपूर्ण रचनाशील युवा मन चाहिये जो दृढ़ संकल्प के साथ नवाचार और रचनाशीलता से आगे बढ़कर इस चौथे के चक्कर को तोडें। कोई पूछ सकता है कि भारी संख्या में ऐसे नवाचारी युवा क्यों नहीं‌ मिल रहे हैं ?
क्या बात है कि इस विशाल देश में जहां अंग्रेज़ी में विज्ञान में शिक्षित विश्व में शायद सर्वाधिक संख्या में युवा हैं, वहां भी नवाचार नहीं के बराबर है; हम होमी भाभा, विक्रम साराभाई, ए. पी. जे. अब्दुल कलाम के अतिरिक्त शायद ही कोई ऐसा नाम ले सकते हैं जिसने हमें नवाचार में विश्व की अग्रिम पंक्ति में‌ खड़ा किया हो । एक तो अंग्रेज़ी माध्यम में शिक्षा विद्यार्थियों को विज्ञान के ज्ञान को आत्मसात करने में‌ मदद नहीं करती। और बिना आत्मसात हुए विज्ञान का ज्ञान नवाचार या अनुसंधान में मदद नहीं करता। दूसरे, अंग्रेज़ी में हमारी शिक्षा हमारे युवाओं में अंग्रेज़ों (अमैरिकी भी) की ओर देखने का आदी बना देती है। समस्या आने पर वे कहते हैं,' अरे भाई देखो इस समस्या का हल जो 'उऩ्होंने' निकाला है उसी की मदद ले लो।' विदेशी‌ माध्यम में शिक्षा हमारा आत्मविश्वास कम करती है और हमारी अनुसंधान की प्रवृत्ति को भी पंगु बनाती है। इज़राएल, जापान, कोरिया ऐसे छोटे देश भी‌विज्ञान में हम से आगे हैं और वे शिक्षा अपनी भाषाओं में दे रहे हैं, अंग्रेज़ी में‌ नहीं, यद्यपि अंग्रेज़ी‌ भी वहां पढ़ाई जाती है, किन्तु एक विदेशी‌ भाषा की तरह।

मुझे याद आता है ब्रिटैन की रायल वायु सेनाअध्यक्ष के वैज्ञानिक सलाहकार (१९७९) से मैने पूछा था कि उनके यहां अनुसंधानों की सफ़लता का क्या प्रतिशत है। तब उनके उत्तर से मुझे आश्चर्य हुआ था - उऩ्होंने कहा कि तीन प्रतिशत अनुसंधान ही सफ़ल हो पाते हैं, क्योंकि अनुसंधान समय की अग्रणी समस्याओं से जूझते हैं जहां जानी मानी विधियां शायद ही कार्य कर पाती‌ हैं, वहां तो नवाचार कल्पना, बुद्धि और रचनाशीलता ही कार्य कर सकती है, और उसके बाद भी सफ़लता की कोई गारंटी नहीं।
इस ९७ % असफ़लता से निराश होने की कोई बात नहीं, क्योंकि अनुसंधान ही ऐसा क्षेत्र है जहां असफ़लता भी सफ़लता की ओर बेहतर मार्ग दर्शाती है। ऐसा नहीं है कि एस एल वी ३ या पी एस एल वी आदि क्षेत्र में हमें सफ़लता बिना असफ़लताओं के मिली हो। और इन सफ़लताओं ने हमारे देश की रक्षा को सुदृढ़ किया है, सम्पदा को भी‌ बढ़ाया है और हमारा गौरव बढ़ाया है ।
किन्तु नवाचारों की सफ़लता का प्रतिशत अनुसंधानों की सफ़लता से कहीं कहीं अधिक है। क्योंकि वहां आप जाने माने रास्ते से आगे बढ़ सकते हैं। जैसे वक्र सतहों पर लेबल मुद्रण करने वाली मशीन का आयात पहले विदेशों से होता था। उसे श्री लक्ष्मण प्रसाद ने उसे इस देश में नवाचार और अपनी रचनाशीलता तथा कर्मठता से बना दिया।
नवाचारों की आवश्यकता हर समय हर स्थान पर होती है। कोई काम करने में कठिनाई हो रही‌ है, उसे सरल करने के लिये नवाचार करिये, सफ़लता मिलेगी। कभी कभी नकल करना भी नवाचार कि ओर पहला कदम हो सकता है, क्योंकि तब आप उसमें नवाचार कर उससे बेहतर वस्तु का निर्माण कर सकते हैं।
नकल करने वाला तो स्पष्ट है कि पिछड़ा ही रहेगा, दूसरों की दया पर निर्भर करेगा, वह स्वाधीन नहीं हो सकेगा; भारत दुर्भाग्य से इसी दिशा में जा रहा है। अपनी‌ श्रेष्ठ भाषाओं में शिक्षा प्राप्त करिये, और नवाचार और अनुसंधान करिये और स्वाधीन बनिये । स्वाधीनता के बिना जीवन ही क्या !

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