Sunday, 5 August 2012

उच्च शिक्षा में बड़े सुधार का समय

उच्च और तकनीकी शिक्षा की स्थिति पर शशांक द्विवेदी के विचार
दैनिक जागरण में 05/08/2012 को प्रकाशित
पिछले दिनों उच्च और तकनीकी शिक्षा के सुधार के लिए गठित इन्फोसिस के संस्थापक एनआर नारायणमूर्ति की अध्यक्षता में बनी समिति ने अपनी रिपोर्ट योजना आयोग को दी। इस रिपोर्ट के अनुसार उच्च और तकनीकी शिक्षा में विदेशी निवेश को प्रोत्साहित किया जाए, साथ में उच्च शिक्षा में और निवेश बढ़ाने के लिए संस्थानों को कम कीमत पर 999 साल का पट्टा दिया जाए और उन्हें टैक्स में छूट दी जाए। इस रिपोर्ट को अगर ध्यान से देखा जाए तो पूरी रिपोर्ट में कार्पोरेट समूहों को फायदा कैसे हो, इस बात पर विशेष जोर दिया गया है। कहीं भी उच्च शिक्षा की गुणवत्ता की बात नहीं की गई। वास्तव में कार्पोरेट्स के तौर पर उनसे ज्यादा उम्मीदें भी नहीं जानी चाहिए, क्योंकि यहां पर मुनाफा कमाना ही एक मात्र सिद्धांत और मूलमंत्र होता है। हम बार-बार विदेशी निवेश को आमंत्रित करने या देश में विदेशी विश्र्वविद्यालय खोलने की बात करते हैं, लेकिन देश में उच्च और तकनीकी शिक्षा के मौजूदा ढांचे और उसकी दशा को ठीक करने केलिए कुछ नहीं करते। आज देश में हालात ऐसे हैं कि उच्च और तकनीकी शिक्षा के पिछले सत्र में पूरे देश में लगभग 2.5 लाख सीटें खाली रह गई। इस बार भी सभी सीटें भर जाएंगी, ऐसा लगता नहीं है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि हमारे देश के नीति-नियंताओं को मौजूदा हालत क्यों नहीं नजर आती, नारायणमूर्ति की कमेटी ने इस विषय में क्यों कुछ नहीं कहा? ये तो वही बात हुई कि हमारे घर के हालत ठीक नहीं हैं और हम विदेशी निवेश को आमंत्रित करने के लिए तुले पड़े हैं। पहले अपने देश में मौजूदा स्थिति ठीक होती तब ये बातें की जाती तो समझ में आता। नारायणमूर्ति की अध्यक्षता में इस समिति से उम्मीद थी कि वह उच्च, तकनीकी शिक्षा की जमीनी हकीकत को देखते हुए सिफारिशें करेगी, लेकिन इस समिति ने सिर्फ निवेश आमंत्रित करने वाले उपायों और कार्पोरेट्स के होने वाले फायदे पर ही अपना फोकस रखा है। इस समिति की सिफारिश के मुताबिक अगर सरकार किसी संस्थान को 999 साल के लिए पट्टा दे दे और उसे टैक्स में छूट भी दी जाए तो क्या गारंटी है कि वह संस्थान गुणवत्ता आधारित शिक्षा ही देगा? अगर वह संस्थान गुणवत्ता के बजाए सिर्फ मुनाफा कमाने पर जोर देगा तो हम क्या करेंगे? समिति के अनुसार दुनिया के नामी विश्वविद्यालय भारत आएंगे और गुणवत्ता आधारित शिक्षा मुहैया कराएंगे, पर रसायन विज्ञान के लिए 2009 में नोबेल पुरस्कार विजेता भारतीय मूल के वैज्ञानिक वेंकटेश रामाकृष्णन का कहना है कि ब्रिटेन और अमेरिका के जिन प्रतिष्ठित विश्र्वविद्यालयों ने सिंगापुर या दूसरी जगहों पर अपना कैंपस खोला है, उनमें वैसी गुणवत्ता आधारित शिक्षा नहीं मिलती जैसी वे अपने मूल कैंपस में मुहैया कराते हैं। बेहतर होता कि कॉर्पोरेट निवेश को आमंत्रित करने के अंधानुकरण की बजाय गुणवत्ता बनाए रखने पर ध्यान दिया जाता। विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में कैंपस स्थापित करने की अनुमति देकर भारतीय उच्च शिक्षा को विदेशी प्रतिस्पर्धा के लिए खोलने से कुछ उसी तरह का असर हो सकता है जैसा कि 1991 के उदारीकरण के बाद हमारी अर्थव्यवस्था में देखने को मिला था। देश में विश्व के दूसरे दर्जे के संस्थानों का प्रवेश हो सकता है और वह भी मात्र ऐसे क्षेत्रों में जहां भारी कमाई की गुंजाइश होगी, वे अग्रणी राष्ट्रीय संस्थानों से अच्छे प्राध्यापकों को अपने संस्थान में ले जा सकते हैं और इससे गुणवत्ता या मात्रा (सीट) पर शायद ही कोई असर पड़े। वास्तव में तकनीकी और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में बड़े सुधार किए जाने का समय आ गया है। सिर्फ समिति और विधेयक बनाने से ही कुछ नहीं होगा, बल्कि बुनियादी स्तर से काम करना होगा। देश में शैक्षणिक आधारभूत संरचना में विस्तार के लिए निजी क्षेत्र को गुणवत्ता की गारंटी के साथ ही छूट में विचार होना चाहिए। तकनीकी शिक्षा के लिए सिर्फ ज्यादा संख्या में कॉलेज खोल देने और विदेशी विश्वविद्यालयों को आमंत्रित करने से कुछ हासिल नहीं होगा, बल्कि उनमें गुणवत्ता के लिए पहले से ही कठोर मानक और नियम बनाने होंगे जिनका कड़ाई से पालन किया जाए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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