Monday, 21 May 2012

इंटरनेट सेंसरशिप के बढ़ते कदम

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता  न होने की तुलना में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग हजारों गुना बेहतर होता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के आत्यंतिक महत्व को प्रतिपादित करने के लिए चार्ल्स ब्रेडला के इस उद्धरण का अक्सर हवाला दिया जाता है। लेकिन हमारे देश में उल्टी गंगा बह रही है। हमारे देश की सरकार और अदालतें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कथित दुरूपयोग को रोकने के नाम पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर ही नकेल कसने पर आमादा हैं। वे शायद यह भूल गए हैं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की आत्मा है। उसके बगैर लोकतंत्र की कल्पना भी नहीं की जा सकती। हम अपने को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहते हैं लेकिन हमारे देश की लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकारों में अक्सर तानाशाहों की आत्माएं घुस जाती हैं और वे बोलने की आजादी को जंजीरों में जकड़ने के हसीन सपने पालने लगती हैं। इन दिनों हमारी सरकार पर इंटरनेट पर अपना शिकंजा कसने का खब्त सवार हो गया है।
निकम्मी और भ्रष्ट सरकारों को हमेशा ही आभिव्यक्ति की आजादी अपने लिए सबसे बड़ा खतरा लगती है। पिछले दिनों भ्रष्टाचार के खिलाफ हुए अन्ना हजारे के जनआंदोलन को भारी जनसमर्थन मिला है और यह समर्थन जुटाने में सोशल नेटवर्क साइटों ने महत्वबूर्ण भूमिका निभाई। इसके अलावा सरकार के कुछ मंत्रियों और कांग्रेस के नेताओं के खिलाफ बहुत तीखी प्रतिक्रियाएं टिप्पणियां और कार्टून देखने को मिले। दिग्विजय सिंह ने कुछ वेबसाइटों पर मुकदमा दायर कर दिया है। तबसे सरकार सोशल नेटवर्क साइटों से खौफ खाने लगी है और उसे उनपर अंकुश लगाने की जरूरत महसूस होने लगी है। सबसे पहले केंद्र सरकार के मंत्री कपिल सिब्बल ने सोशल नेटवर्क साइटों पर लगाम लगाने का इरादा जाहिर किया था। लेकिन जब इसका बेहद विरोध हुआ तो सरकार लीपापोती करने लगी। कई क्षेत्रों में यह आशंका जताई जा रही है कि अब सरकार अदालतों के जरिये अपना इरादा पूरा करने की कोशिश रही है। सरकार का नापाक इरादा तो फिर भी समझ में आ सकता है लेकिन अदालतें क्यों उसकी इस मुहिम का हिस्सा बन रही हैं यह समझ से परे है। शायद वे कानूनों के प्रति बहुत तकनीकी रवैया अपना रही है।
यह सारा नजारा देखकर यह लगता है कि भारत सोशल नेटवर्क साइटों को सेंसर करने के मामले में चीन के नक्शेकदम पर चल रहा है। लेकिन हम भूल गए है कि हमारा देश लोकतांत्रिक देश है जबकि चीन साम्यवादी और अधिनायकवादी देश है जहां अभिव्यक्ति की आजादी नाम की कोई चीज ही नहीं है। उसके रास्ते पर चल कर तो हम अपने पैरों पर कुल्हाडी मार लेंगे। भारत की ताकत तो उसकी लोकतांत्रिक चेतना ही है। इंटरनेट से जन्मी सोशल नेटवर्क साइटों और न्यू मीडिया की विशेषता यह है कि उसने लोगों की अभिव्यक्ति की आजादी को व्यापक और सशक्त बनाया है। अब लोगों के पास जानकारी जुटाने और अपनी बात कहने के लिए ज्यादा प्रभावी साधन है। अब जिस किसी के पास एक अदद कंप्यूटर और इंटरनेट कनेक्शन है वह वेबसाइटों से दुनियाभर की जानकारी इकट्ठा कर सकता है। अखबार और टीवी जैसे परंपरागत मीडिया का सहारा लिए बगैर अपनी बात दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक पहुंचा सकता है। अब वह अपनी अभिव्यक्ति को दूसरों तक पहुंचाने के लिए अखबारों के संपादकों की मेहरबानी या टीवी एंकरों का मोहताज नहीं है। इंटरनेट साइटों पर लोग केवल अपने विचार प्रगट भर ही नहीं करते वरन दुनियाभर के विषयों पर बहस भी करते हैं और ये बहसें बहुत तीखी,जीवंत और विचारोत्तेजक होती है। बहस के ऐसे खुले मंच कम ही देखने को मिलते हैं। सारे मानव इतिहास में आम लोगों को अभिव्यक्ति का ऐसा अद्भुत माध्यम कभी नहीं मिला था। ये आलोचनाएं और बहसें लोकतंत्र को और ज्यादा सार्थक और मजबूत बनादी है। इस तरह लोगों की लोकतांत्रिक चेतना को विकसित करने में सोशल नेटवर्क साइटों की भूमिका है इसलिए भारत जैसे लोकतांत्रिक देश को उसे बढ़ावा देना चाहिए था नकि उसे नियंत्रित करने की कोशिश करनी चाहिए।
लेकिन हो उल्टा रहा है। सरकार ने कहा है कि सोशल साइटस के खिलाफ मुकदमों की अनुमति देगी। एक तरह से वह इन साइटों के खिलाफ कानून का डंडा भांजेगी। सीआरपीसी की जिन धाराओं में सरकार ने सोशल साइटस् के खिलाफ मुकदमें की इजाजत दी है वे बहुत गंभीर हैं। सरकार की दलील है कि इन पर बहुत सारी नफरत फैलानेवाली, लोगों की धार्मिक आस्थाओं को चोट पहुंचानेवाली, अवमानना करनेवाली सामग्री है। सोशल नेटवर्क साइटों को उसे साइट पर डालने से पहले सेंसर करना चाहिए वरना उनपर मुकदमा चलाना पड़ेगा। सरकार और अदालतों दोनों को यह समझ में नहीं आ रहा कि सोशल मीडिया की साइटस् पर जो सामग्री डाली जा रही है वह किसी की प्रशंसा या आलोचना का कोई संस्थागत प्रयास नहीं होता। वह लोगों के निजी विचार होते हैं जो एक ग्लोबल प्लेटफार्म पर रखे जाते हैं।
सरकार के इस कड़े ऱूख की एक वजह यह भी है कि वह और अदालतें सोशल नेटवर्क साइटों के चरित्र को समझने में असफल रही है। वे उसे पुराने माध्यमों के लिए बनी कसौटियों के आधार पर कस रही हैं जबकि सोशल नेटवर्क साइटों का कहना है कि उन पर आने वाली सामग्री के लिए वे जिम्मेदार नहीं है क्योंकि वह तो केवल मंच प्रदान करती हैं सामग्री तो लोग तैयार करके लगातार भेजते रहते हैं जिसे पहले देख पाना या उसे सेंसर कर पाना संभव नहीं है। लेकिन यह तर्क सरकार के गले नहीं उतर रहा। अभिव्यक्ति की आजादी का तर्क भी सरकार को रास नहीं आ रहा । सरकार और सेसरशिप के समर्थक जवाबी दलील देते हैं कि कोई भी स्वतंत्रता संपूर्ण नहीं होती। उनका यह भी कहना है कि समुदायों के बीच वैमनस्य फैलानेवाली, लोगों की धार्मिक आस्थाओं को चोट पहुंचानेवाली, लोगों की अवमानना करनेवाली सामग्री सोशल नेटवर्क साइटों पर है जिससे न केवल तनाव पैदा हो सकता है वरन हिंसा भी हो सकती है। लेकिन यह तर्क बहुत लचर है। शायद सरकार यह मानती है कि लोग इतने अज्ञानी हैं कि साइबर स्पेस की ऐसी सामग्री के कारण दंगा फसाद पर उतर आएंगे। कम से कम आजतक तो इस तरह का कोई उदाहरण नहीं मिला है। लेकिन इसका सहारा लेकर सरकार सेंसरशिप लागू करके लोगों की अभिव्यक्ति की आजादी का हनन जरूर करना चाहती है।
एक अजीब विडंबना यह है कि हमारे जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में हम लोगों की धार्मिक आस्थाओं को लेकर कुछ ज्यादा ही संवेदनशील हो गए हैं। धर्मों की या उनके देवताओं, पैगंबरों और मसीहाओं की आलोचना करना उन पर व्यंग्य करना, धर्म के कर्मकांड़ों की निंदा करना अपराध बनता जा रहा है। यह कहा जाने लगा है आप लोगों की आस्थाओं को ठेस नहीं पहुंचा सकते। जबकि आभिव्यक्ति की आजादी में आलोचना, निंदा और मजाक उड़ाने और व्यंग्य करने की आजादी निहित है। यदि ये आजादी न हो तो अभिव्यक्ति की आजादी दो कौडी की है। दरअसल धर्मों को अनावश्यक महत्व नहीं दिया जाना चाहिए वे भी एक तरह कि विचारधाराएं ही है। उनकों भी हरेक को तर्क की कसौटी पर कसा जाना चाहिए। कुछ भी तर्क और आलोचना के परे नहीं हो सकता। फिर कुछ धर्म के बुनियादी सिद्धांत ही ऐसे हैं जो दूसरे धर्म के विरोधी है मसलन इस्लाम और आर्यसमाज मूर्तिपूजा के घोर विरोधी है वे अगर अपने धर्म का प्रचार करेंगे तो वह अपने आप में सतानत धर्म की निंदा आलोचना होगी तो क्या उन्हें अपने धर्म के प्रचार करने की इजाजत नहीं होनी चाहिए। जाहिर है उन्हें उपने धर्म की बात कहने की आजादी होनी चाहिए तो दूसरों को उसका शांतिपूर्र्ण विरोध करने की और दोनों को बहस के द्वारा सत्य का स्वरूप जानने की कोशिश करना चाहिए । हमारे यहां शास्त्रों में कहा गया है वादे वादे जायते तत्वबोध:यानी वाद विवाद से ही सत्य निकलता है। कई बार तो ऐसा लगता है कि हमारे देश में सांप्रदायिक दंगे इसलिए ज्यादा होते हैं क्योंकि हमने धार्मिक मुद्दों पर बहस करना छोड़ं दिया और दंगे करके अपनी भड़ास निकालते हैं।
हाल ही में हमें इस तरह के उदाहरण बार-बार देखने को मिल रहे हैं। कुछ उग्रवादी या धार्मिक कट्टरतावादी ताकते हमें झुकने के लिए कहती है और हम रेंगने लगते हैं। इसलिए हाल के कुछ बर्षों के दौरान ऐसे दर्जनों उदाहरण मिल जाएगे जब हमारी सरकार और सिविल सोसाइटी उसे तमाशबीन बनकर देखते रहे या कहीं न कहीं इस घिनौने कृत्य के भागीदार बन गए। तसलीमा नसरीन का मामला हो या एमएफ हुसैन का, अहमदिया की कुरान प्रदर्शनी का सवाल हो या सलमान रूशदी का। हर बार यह साबित हो गया कि या तो अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर हम कंफ्यूज हैं या फिर हमारी प्रतिबद्धता ढुलमुल है। तभी तो हर बार लोकतंत्र की दुहाई देनेवाले राजनीतिक दलों में से किसी ने भी सरकार से अपील नहीं की कि उसे रूशदी की भारत यात्रा सुरक्षित हो इसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए। चंद कट्टरतावादियों के कारण ऱूशदी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नजरंदाज नहीं किया सकता। लेकिन सारे राजनीतिक दलों की नजरें चुनावी वोटों पर है इसलिए सबने अवसरवादिता का परिचय देते हुए लोकतांत्रिक मूल्यों को तिलांजलि दे दी। लेकिन यदि हम अपने देश में लोकतंत्र को उसके वास्तविक अर्थों में जीवित रखना चाहते हैं तो हमें उसकी कीमत चुकाने के लिए तैयार रहना चाहिए और सतत जागरूकता ही लोकतंत्र की कीमत है।
दोस्तों, आप भी इंटरनेट से किसी न किसी तरह से तो जरूर ही जुड़े होंगे।चाहे ट्वीटर के जड़िये, या फेसबूक के, या ब्लॉगर के जड़िये या फिर किसी और माध्यम से।आप ही बताइए कि क्या सरकार की इंटरनेट पर सेंसरशिप की नीति किसी भी मायने में सही है।इंटरनेट तो आजकल लोगों की जान बन चुका है और उस इंटरनेट पर पाबंदी लगाना तो जैसे लोगों की साँसें रोकने के बराबर है।
इंटरनेट ही तो वह माध्यम है जो समाज के हर लोग को अपनी बात खुलकर सबके सामने रखने का मौका देता है।इंटरनेट जात-पात के नाम पर मौका नहीं देता। इंटरनेट यह नहीं देखता कि कौन समाज के नीचे वर्ग से है और कौन ऊपरी तबके से।वह अमीर-गरीब का अंतर भी नहीं देखता।वह सबको बराबर का मौका देता है। समाज के हर वर्ग के लोगों को अपनी बात खुलकर सबके सामने रखने का मौका देता है इंटरनेट।वह किसी की भी बातों को प्रकाशित करने से पहले उसकी जाति नहीं देखता।देश में वही तो एक चीज बाकी रह गई है जिसमें अभी तक आरक्षण नहीं है। वरना इन नेताओं का क्या भरोसा कि कब संसद में इंटरनेट में भी आरक्षण की माँग उठा दे।ऐसे माध्यम पर पाबंदी लगाकर कम्युनिकेशन और आईटी मंत्री कपिल सिब्बल आखिर क्या साबित करना चाहते हैं?
कपिल सिब्बल को आखिर इंटरनेट के किस कंटेंट से इतना जोरदार धक्का लगा कि उन्होंने इस पर पाबंदी लगाने की ही ठान ली।इंटरनेट से करोड़ों, अरबों लोग जुड़े होते हैं।जितने लोग होते हैं उतनी तरह की बातें होती है, और फिर सारी दुनिया की सोच एक जैसी तो नहीं होती है न।सभी की सोच अलग-अलग होती है।कुछ को सरकार का काम अच्छा लगता है तो कुछ को नहीं।कुछ को सोनिया-मनमोहन की टीम अच्छी लगती है तो कुछ को नहीं।किसी भी एक मामले पर सभी की अलग-अलग राय होती है।कपिल सिब्बल ने इंटरनेट पर सोनिया-मनमोहन की विरोधी तस्वीरें देख ली तो उन्हें मिर्ची लग गई और उन्होंने इस पर पाबंदी लगाने की ही ठान ली।तो फिर उन तस्वीरों और खबरों का क्या जो सोनिया-मनमोहन की सिर्फ तारीफें ही बयाँ करती हैं।कपिल सिब्बल साहब को तो वैसी खबरें बहुत अच्छी लगती होंगी।ऐसे बहुत से लोग होंगे जिन्हें कि वो तस्वीरें और खबरें भी अच्छी नहीं लगी होंगी।तो क्या सिब्बल पूरे इंटरनेट पर नेताओं की चर्चा पर ही रोक लगा देंगे।इंटरनेट पर सेंसरशिप बेवकूफी के अलावा और कुछ नहीं है।कपिल सिब्बल आखिर चाहते क्या हैं कि सभी के सोच-विचार उनके जैसे ही हो जाएँ।सारी दुनिया के सोच-विचार सिब्बल और मनीष तिवारी जैसे नहीं हो सकते।सोनिया गाँधी और मनमोहन सिंह की तारीफें करना सभी के बस की बात नहीं है।वो काबिलियत सिर्फ वर्तमान के कांग्रेसी नेताओं में ही है।
कपिल सिब्बल कहते हैं कि इंटरनेट पर धर्म का अपमान होता है।जात-पात के नाम पर धर्म का जितना अपमान नेता करते हैं उतना अपमान इंटरनेट नहीं करता।अल्पसंख्यक और जात-पात की राजनीति जितना नेता करते हैं उतना इंटरनेट नहीं करता।पाबंदी तो पहले उन नेताओं पर लगनी चाहिए जिन्होंने मुस्लिम वोट-बैंक की खातिर कसाब की फाँसी टाल रखी है।पाबंदी लगानी ही है तो पहले उन नेताओं पर लगाओ जिनके सुबह की शुरूआत भी होती है आरक्षण का नाम लेकर और दिन खत्म भी होता है आरक्षण का नाम लेकर, जो आरक्षण नाम के राक्षस से देश को जकड़ के समाज को बाँटने का काम कर रहे हैं हर मोड़ पर।इन नेताओं ने हद तो तब कर दी जब जन लोकपाल जैसे एक भ्रष्टाचार निरोधी कानून में भी इन्होंने आरक्षण की माँग उठा दी।पहले ऐसे ही कुछ नेताओं पर पाबंदी लगाने की जरूरत है।
आखिर कपिल सिब्बल सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर भी पाबंदी क्यों लगा रहे हैं?क्या इसलिए कि अन्ना हजारे के आंदोलन को हिट करने में कुछ योगदान फेसबूक जैसे सोशल नेटवर्किंग साइट्स का भी था।अगर सचमुच वजह यही है तो सिब्बल जी ये न भूलें कि इन्हीं सोशल नेटवर्किंग साइट्स की मदद से अन्ना के आंदोलन के वक्त कुछ नेताओं ने अन्ना पर छींटाकशी की थी जिनमें मनीष तिवारी और खुद वो भी शामिल हैं।कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह भी अन्ना हजारे और उनकी टीम पर बेतूकी बयानबाजी करने के लिए सोशल नेटवर्किंग साइट्स का ही इस्तेमाल करते हैं।तब क्यों नहीं कपिल सिब्बल इन पर पाबंदी लगाने की सोचते हैं।क्या देश भर में सिर्फ मनीष तिवारी, कपिल सिब्बल और दिग्विजय सिंह सरीखे त्रिमूर्ति की ही बातें सही है, बाकी लोग जो भी सोचे, जो भी बोले सब गलत है?
सरकार को इस मामले में दखल नहीं देना चाहिए।साइट के कंटेंट साइट्स के मालिकों पर ही छोड़ देना चाहिए।वैसे भी सरकार की ये पुरानी आदत रही है कि जो काम उन के मंत्रियों को करना चाहिए वो काम नहीं करेंगे या शायद उस काम के बारे में उन्हें पता भी न रहता हो और जो काम करने की जरूरत नहीं है, जिस काम से देश को कोई फायदा नहीं होने वाला है वही काम करते हैं जैसा कि वर्तमान में कम्युनिकेशन और आईटी मंत्री कपिल सिब्बल कर रहे हैं।भारत के नेता भले ही कुछ मामले में आगे हो लेकिन इंटरनेट के मामले में उन्हें मार्क जुकरबर्ग सरीखे इंटरनेट के दिग्गजों को उनके साइट्स के कंटेंट के बारे में फैसले लेने की कोई जरूरत नहीं है।इंटरनेट के मामले में तो वो जरूर भारतीय नेताओं से आगे हैं।

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