Thursday, 10 May 2012


मनोरोग और मस्तिष्क का संबंध
मानव मस्तिष्क को समझने की जितनी अधिक कोशिश होती है, इसका रहस्य उतना ही उलझता जाता है. यही कारण है कि आज अगर किसी बात को लेकर सबसे अधिक शोध हो रहे हैं तो वह मानव मस्तिष्क. अब नये शोध से पता चला है कि (साइकोपैथी)मनोरोग का संबंध हमारे मस्तिष्क की असामान्य संरचनात्मक तंत्रिका से है. ब्रिटेन के किंग्स कॉलेज के इंस्टीट्यूट ऑफ साइकेट्री के शोधकर्ताओं ने यह शोध किया है. उन्होंने अपने शोध में बतलाया कि साइकोपैथी, एंटी-सोशल पर्सनालिटी डिसऑर्डर का एक विशिष्ट न्यूरो-डेवलपमेंटल उपवर्ग- एएसपीडी है. उन्होंने अपने इस शोध के दौरान पाया कि एएसपीडी उपवर्ग से ग्रसित एक छोटे समूह के लोगों द्वारा ही अधिकांश अपराध किये जाते हैं. शोध के दौरान उन्होंने पाया कि ब्रिटेन के जेलों में बंद लगभग आधे कैदी इसी के शिकार हैं. हालांकि, अधिकांश लोग इस तरह के मनोरोगी नहीं होते हैं. उन्हें कई वगरें में बांटा गया है. उन्होंने बताया कि जो लोग खुद को भावनात्मक रूप से अस्थिर मानते हैं वे किसी भी बात पर अधिक प्रतिक्रिया देते हैं. उनकी इस प्रतिक्रिया को कुंठा में दी गयी प्रतिक्रिया मान लिया जाता है. दूसरे प्रकार के वे लोग होते हैं, जिनके लिए भावनाओं का उतना महत्व नहीं होता है. वे जब किसी बात पर प्रतिक्रिया देते हैं तो काफी सोच-समझकर. इस तरह के लोग किसी भी काम को योजनाबद्ध तरीके से अंजाम देते हैं. इस तरह के लोग अपने गुस्से का इस्तेमाल भी सुनियोजित तरीके से करते हैं और इसका इस्तेमाल अपने लिए स्टेटस (रुतबा) और पैसा अजिर्त करने में करते हैं. गौरतलब है कि इससे पहले के शोध में कहा गया था कि मनोरोगी का मस्तिष्क एक स्वस्थ मस्तिष्क से काफी अलग होता है. लेकिन, अब इस शोध से साबित होता है कि मस्तिष्क की संरचना तो वही रहती है, लेकिन उनमें एएसपीडी के कारण अंतर आता है.
मानव हैं जीवन का सबसे  सफल स्वरूप
जी वन के नये स्वरूप की खोज दशकों से न सिर्फ वैज्ञानिकों को बल्कि आम लोगों को भी उत्साहित करती रही है. ब्रह्मांड में सिर्फ हम प्राणियों में ही जीवन का क्रियाशील स्वरूप है. अमेरिका के कैलिफोर्निया की शोध संस्था के प्रोफेसर गेराल्ड जोएस ने अपने शोध में जीवन के लिए जरूरी मौलिक जरूरतों का जिक्र किया है. उनका कहना है कि जीवन खुद-ब-खुद उत्पत्र होता है और यह डार्विन के सिद्धांत- प्राकृतिक चयन (नेचुरल सेलेक्शन) के मुताबिक विकास करता है. नया जीवन कैसे उत्पत्र हो सकता है? इस बारे में उनका कहना है कि कोई जीव रासायनिक प्रक्रिया के तहत प्रत्यक्ष तौर पर उत्पत्र हो सकता है या फिर मौजूद जीव वैज्ञानिक प्रक्रिया के माध्यम से. पहले वाले स्वरूप में जीवन खुद बनता है. ऐसा माना जाता है कि पृथ्वी पर भी जीवन इसी प्रक्रिया के तहत उत्पत्र हुआ. आरंभिक काल में किसी रासायनिक प्रक्रिया के तहत. आगे चलकर इस जीवन का स्वरूप बदलता गया और विकास होता गया. लेकिन, जीवन की उत्पत्ति रासायनिक घटनाक्रम के तहत हुआ या फिर जैविक प्रक्रिया के तहत इस बात को लेकर अब भी जानकारों के बीच भ्रम की स्थिति बनी हुई है. लेकिन, इन सबसे अलग हम जीवन के एक ही स्वरूप को जानते हैं, जिसके तहत हमारा जन्म होता है. इस तरह हम ब्रह्मांड के अन्य हिस्सों में जीवन के बारे में अनुमान नहीं लगा सकते. जोएस का कहना है कि इस ब्रह्मांड में मानव ही एकमात्र जीवन का सफल स्वरूप है. ऐसे में जब हम दूसरे जीवन की बात करते हैं तो अनुमानों के आधार पर ही एलियन की बात करते हैं, जो दूसरे ग्रहों पर हो सकते हैं. लेकिन इनके बारे में हमारे पास ठोस जानकारी नहीं है. जोएस के मुताबिक, यदि हमें जीवन के अन्य स्वरूप का पता लगाना है तो या तो हमें उसे प्रयोगशाला में बनाना होगा या कोई दूसरा विकल्प तलाशना होगा.

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