Tuesday, 8 May 2012

वैज्ञानिक साहित्य

भारतीय मानस तपस्या, हवन, पूजा आदिकाल से ऐसी दैवी शक्तियों तथा असाधारण सामर्थ्य की अवधारणा करता रहा है जो आज वैज्ञानिक अनुसंधानों के रूप में हमारे समक्ष भौतिक रूप में विद्यमान हैं। महाभारत, रामायण आदि प्राचीन ग्रंथों में युद्ध में प्रयुक्त विशेष अस्त्र शस्त्र जो पारंपारिक अस्त्रों से भिन्न दैवी वरदान के रूप में प्राप्त होते थे उनकी तुलना आज के अत्याधुनिक अस्त्रों से की जा सकती है। 

इसी तरह रामायण में प्रयुक्त पुष्पक विमान किसी छोटे हेलीकॉप्टर या हावर क्राफ्ट की तरह लगता है। आकाशवाणी का भी कई जगह जिक्र आता है कुछ इस तरह जैसे पास ही कहीं से कोई पब्लिक एड्रेस सिस्टम की तरह उद्घोषणा कर रहा हो। औषधि विज्ञान की तो ऐसी चमत्कारिक स्थितियाँ हैं कि जीता हुआ व्यक्ति लोप हो जाए, मरा हुआ पुन: जिन्दा हो जाए, एक शरीर के दो टुकड़े और पुन: दो के एक हो जाएं। कुल मिलाकर मन्तव्य यह कि विज्ञान, जो कि यथार्थ और सुविचारित स्वाध्याय तथा मेधा द्वारा नये नये आविष्कार करता है वह भारतीय प्राचीन ग्रंथों में शक्ति और वरदान की तरह प्रयुक्त होते हैं। 

मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि मनुष्य ने वैज्ञानिक शक्तियों से काफी पहले ही साक्षात्कार कर लिया था। परंतु उस समय की सामाजिक व्यवस्था ऐसी थी कि वैज्ञानिक अनुसंधान निहायत व्यक्तिगत संपत्ति की तरह उपयोग में लिये जाते थे और सारे चमत्कार राजाओं और राजकुमारों के पास ही रहते थे। भारतीय प्राचीन साहित्य में इन चमत्कारों और शक्तियों का भरपूर प्रयोग हुआ है परंतु चूँकि साधारण जन के पास उन शक्तियों के बारे में जानने का कोई जरिया नहीं था अत: उसने इन्हें चमत्कार के रूप में ही स्वीकारा।
आदिम मनुष्य अनेक क्रियाओं और घटनाओं के कारणों को नहीं जान पाता था। वह अज्ञानवश समझता था कि इनके पीछे कोई अदृश्य शक्ति है। वर्षा, बिजली, रोग, भूकंप, वृक्षपात, विपत्ति आदि अज्ञात तथा अज्ञेय देव, भूत, प्रेत और पिशाचों के प्रकोप के परिणाम माने जाते थे। ज्ञान का प्रकाश हो जाने पर भी ऐसे विचार विलीन नहीं हुए, प्रत्युत ये अंधविश्वास माने जाते लगे। आदिकाल में मनुष्य का क्रिया क्षेत्र संकुचित था। इसलिए अंधविश्वासों की संख्या भी अल्प थी। ज्यों ज्यों मनुष्य की क्रियाओं का विस्तार हुआ त्यों-त्यों अंधविश्वासों का जाल भी फैलता गया और इनके अनेक भेद-प्रभेद हो गए। अंधविश्वास सार्वदेशिक और सार्वकालिक हैं। विज्ञान के प्रकाश में भी ये छिपे रहते हैं। इनका कभी सर्वथा उच्द्वेद नहीं होता। जादू, टोना, शकुन, मुहूर्त, मणि, ताबीज आदि अंधविश्वास की संतति हैं। इन सबके अंतस्तल में कुछ धार्मिक भाव हैं, परंतु इन भावों का विश्लेषण नहीं हो सकता। इनमें तर्कशून्य विश्वास है। मध्य युग में यह विश्वास प्रचलित था कि ऐसा कोई काम नहीं है जो मंत्र द्वारा सिद्ध न हो सकता हो। असफलताएँ अपवाद मानी जाती थीं। आज के वैज्ञानिक युग में भी लोग टोना-टोटके, तंत्र-मंत्र और अंधविश्वास से जकड़े हुए हैं।
भारतीय संविधान में उल्लिखित नागरिकों के दस मूल कर्तव्यों में से एक कहता है कि भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करे। इस सामान्य से लगते क्रांतिकारी प्रावधान पर यदि हर नागरिक अमल कर ले तो हमारा समाज कूढ़मग्ज़ से वैज्ञानिक मन हो जाएगा। किन्तु इस वैज्ञानिक-तार्किक समय में हमारे देश की धर्म भावना का बढ़ता आलोड़न तो उलट सत्य ही सामने रखता है। अनेक अवैज्ञानिक अंधविश्वासी घटनाएं और जोर पकड़ रही हैं जो हमारे संविधान की भावना को मुंह चिढ़ाती हैं। देव-घरों (बाबाओं के आश्रम ?) में श्रद्धालुओं की रिकार्ड तोड़ भीड़ उमड़ रही है । हमारे देश में आज आस्थावादी लोग नए सिरे से बुद्धि, विवेक, तर्क, विज्ञान भौतिक यथार्थ आदि का निषेध कर समाजिक जड़ता व यथास्थितिवाद के पोषण का अभियान चला रहे हैं।

यह भी सच है कि आज विज्ञान हमारी जीवन शैली का एक अभिन्न अंग है। आज बहुत कुछ समाज के सामने हैं। यद्यपि आज भी सत्ताधारी वर्ग के स्वार्थ हैं। सम्पन्नता की जीत है और सामर्थ्य का बोलबाला है परंतु फिर भी विज्ञान हमारे दैनिक जीवन में एक महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करने लगा है। यातायात के आधुनिक साधन, प्रौद्योगिकी का विकास, उद्योग धंधे, उत्पादन, बिजली और प्रचार माध्यम, रसायन एवं औषधि विज्ञान हमारे दैनंदिन जीवन का अंग बन चुके हैं। जाहिर है समाज पर विज्ञान की इतनी बड़ी पकड़ को साहित्यकार भी नजर अंदाज नहीं कर सकता। 
प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से हमारी चेतना को वैज्ञानिक अनुसंधान प्रभावित कर रहे हैं। अत: साहित्य सृजन को भी वह प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित कर रहे हैं। हाँ उनका सीधा-सीधा उपयोग साहित्य में उस तरह स्थूल रूप में संभव नहीं है कि हमें लगे कि यह साहित्य वैज्ञानिक युग का प्रतिबिम्ब है अलबत्ता वैज्ञानिक साहित्य अब प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है।

विज्ञान और साहित्य के अंर्तसंबंधों की बात जब की जाती है तब यह ध्यान अवश्य रखा जाना चाहिए कि विज्ञान, विज्ञान है कला, कला। यहाँ बात मैं अंर्तसंबंधों की कर हूँ स्थूल संबंधों की नहीं। साहित्य पर विज्ञान का प्रभाव रूपांतरित होकर पड़ता है सीधा नहीं। हाँ कहीं कभी यदि भावभूमि की जगह दृश्य चित्रण होता है तब अवश्य वैज्ञानिक उपकरण या दृश्य साहित्य में अंकित होते हैं जिन्हें साहित्यकार देखता सुनता है। 

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में, “ज्ञान राशि के संचित कोष ही का नाम साहित्य है।इस कथन से यह स्पष्ट होता है कि साहित्य और जीवन का आपस में गहरा संबंध है। साहित्य का आधार जीवन है। प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ के समाज के ऊपर ही आश्रित रहता है। एक सच्चा साहित्यकार कभी भी समाज अथवा युग की उपेक्षा नहीं कर सकता। यदि वह समाज की उपेक्षा कर, कल्पना में विचरण करता हुआ साहित्य-रचना करता है तो उसका साहित्य कभी भी शाश्वत रूप धारण नहीं करता और न ही उस समाज का अस्तित्व घोषित होता है। साहित्य ही अपने समाज का स्वर और संगीत है।
अन्धकार वहीं जहाँ आदित्य नहीं है।
मुर्दा है वह देश, जहां साहित्य नहीं है।
हिन्दी कविता में साठ के दशक में प्रयोगवाद के तहत वैज्ञानिक चिंतन तथा चित्रण की अनेकों कविताएं लिखी गई परंतु विज्ञान की मूलभावना को पकड़ने वाले कवि बहुत कम थे। गजानन माधव मुक्तिबोध उन गिने चुने कवियों में थे जिन्होंने विज्ञान और फैंटेसी के आधुनिक तथा कलात्मक बिंब और भाव कविता में लिए। उनकी एक कविता 'मुझे मालूम नहीं' में मनुष्य की उस असहायता का चित्रण है जिसमें वह यथास्थिति तोड़ नहीं पाता। वह दूसरों के बने नियमों तथा संकेतों से चलता है। उसका स्वयं का सोच दूसरों के सोच पर आधारित होता है। दूसरों का सोच सत्ता के आसपास का चरित्र होता है। सत्ता अपने को स्थापित करने के लिए मनुष्य के सोच की स्थिरीकरण करती है। परन्तु मनुष्य की चेतना कभी कभी चिंगारी की भांति इस बात का अहसास कराती है कि वह जो सामने का सत्य है उससे आगे भी कुछ है। संवेदनहीन होते व्यक्ति की संवेदना को वह चिंगारी पल भर के लिए जागृत करती है।

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