Wednesday, 9 May 2012

उच्च शिक्षा का निजीकरण


उच्च शिक्षा पर भिड़े मोंटेक और सिब्बल
योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने विश्वविद्यालयों की मदद बंद करने और उनकी फीस बढ़ाने की वकालत कर उच्च शिक्षा महंगी होने की जमीन तैयार कर दी है। उच्च शिक्षा के लिए छात्रों को आसान शर्तो पर कर्ज देने की पैरोकारी कर रहे मोंटेक का केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने यह कहते हुए विरोध किया है कि जब तक सरकार ऋण की गारंटी नहीं देती तब तक कोई संस्था कर्ज नहीं देगी। सिब्बल ने योजना आयोग द्वारा शिक्षा वित्त निगम के प्रस्ताव को खारिज करने पर भी नाराजगी जताई है। उच्च शिक्षा में कारपोरेट क्षेत्र की भागीदारी पर मंगलवार को रिपोर्ट जारी करने के दौरान मोंटेक ने कहा कि सस्ती वित्तीय सहायता विश्वविद्यालयों को नहीं बल्कि विद्यार्थियों को दी जानी चाहिए। मैं विश्वविद्यालयों की फीस बढ़ाने के पक्ष में हूं। छात्रों को छात्रवृत्ति मिलनी चाहिए जिससे वे अच्छे विश्वविद्यालयों में प्रवेश ले सकें। अहलूवालिया ने कहा कि प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के लिए आवंटन के बाद उच्च शिक्षा के लिए सीमित संसाधन बचते हैं। ऐसे में, इसमें निजी क्षेत्र के निवेश की जरूरत है। सार्वजनिक संसाधन सर्वाधिक प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में बढ़ने चाहिए। प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा इसमें प्रमुख हैं। इस मौके पर सिब्बल ने कहा कि निजी क्षेत्र तब तक निवेश नहीं करेगा, जब तक कि उन्हें उचित माहौल नहीं मिलेगा। इसके लिए निजी क्षेत्र को जमीन की जरूरत है। उन्होंने कहा कि निजी क्षेत्र को जमीन देने को लेकर काफी विरोध है। सिब्बल ने कहा कि शिक्षा और स्वास्थ्य संस्थान बनाने के लिए निजी क्षेत्र को सस्ती दरों पर कर्ज दिया जाना चाहिए। शिक्षा संस्थानों के लिए बैंकों को निर्देश दिया जाना चाहिए वे 20 से 25 साल के लिए कर्ज दें। कोई भी 7 साल के लिए 12 या 16 प्रतिशत की दर पर कर्ज नहीं लेगा। 999 साल के लिए मुफ्त में मिले जमीन नई दिल्ली : उच्च शिक्षा में निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ाने के लिए सरकार को उन्हें बिना किसी शुल्क के 999 साल के लिए जमीन का आवंटन करना चाहिए। ताकि उस पर वे शैक्षणिक संस्थान का निर्माण कर सकें। यह सिफारिश योजना आयोग द्वारा गठित इंफोसिस के नारायणमूर्ति की अध्यक्षता वाली समिति ने की है। समिति ने अपनी रिपोर्ट मंगलवार को अहलूवालिया को सौंप दी। रिपोर्ट में कहा गया है कि शैक्षणिक संस्थान के लिए निजी क्षेत्र को दी जाने वाली जमीन के आसपास विश्र्वस्तरीय सुविधाएं होनी चाहिए।



उच्च शिक्षा की गुणवत्ता?
शिक्षाविदों की दुनिया शायद ही इसे आसानी से स्वीकार कर पाए क्योंकि भारत में अब तक जो निजी संस्थान और विवि खुले हैं, उनमें से ज्यादातर पर आरोप यह है कि वे केवल पैसे कमाने का जरिया बन गए हैं
देश की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए उच्च शिक्षा में निवेश की आवश्यकता पर जोर दिया जा रहा है। सरकार अपने दम पर उच्च शिक्षा का लक्ष्य हासिल करने पर पहले ही हाथ खड़े कर चुकी है। २००४ में तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह के कार्यकाल में डीम्ड विश्वविद्यालयों को थोक के भाव से मान्यता देने की कोशिश इसके बाद ही शुरू हुई थी। अब तक १२८ डीम्ड विश्वविद्यालयों की लिस्ट में जो ९० विश्वविद्यालय जुड़ गए हैं, उनकी प्रगति रिपोर्ट खास नहीं है। उन्होंने गुणवत्ता आधारित शिक्षा की अवधारणा का ही गला घोंट दिया है। ज्यादातर निजी इंजीनियरिंग और दूसरे संस्थानों के भी यही हाल हैं। ऐसे में अगर नारायण मूर्ति समिति यह सिफारिश करती है कि उच्च शिक्षा में और निवेश बढ़ाने के लिए संस्थानों को कम कीमत पर ९९९ साल का पट्टा दिया जाए और उन्हें टैक्स में छूट दी जाए तो निश्चित ही कॉर्पोरेट दुनिया इसका स्वागत करेगी लेकिन शिक्षाविदों की दुनिया शायद ही इसे आसानी से स्वीकार कर पाए क्योंकि भारत में अब तक जो निजी संस्थान और विश्वविद्यालय खुले हैं, उनमें से ज्यादातर पर आरोप यह है कि गुणवत्ता आधारित शिक्षा देने की बजाय वे केवल पैसे कमाने का जरिया बन गए हैं।

मानव संसाधन विकास मंत्रालय संभालने के बाद कपिल सिब्बल ने जिस टंडन समिति को डीम्ड विश्वविद्यालयों की जाँच का जिम्मा सौंपा था, उनमें से ४४ पर जो सवाल उठे थे वे ज्यों के त्यों हैं। उन पर आरोप है कि वे शिक्षा की दुकानों में बदल गए हैं। उन्हें पारिवारिक व्यापार की तरह चलाया जा रहा है। तीन साल पहले जब टंडन समिति ने ये सवाल उठाए थे तो लगा था कि कपिल सिब्बल और उनका मंत्रालय देश में गुणवत्ता आधारित शिक्षा देने के लिए गंभीर प्रयास करेगा लेकिन अब तक सवालों के घेरे में आए विश्वविद्यालयों पर आखिरी फैसला नहीं हो पाया है और शिक्षाविदों की राय में उनका व्यापार जारी है। 

इन्फोसिस के संस्थापक एन. आर. नारायणमूर्ति की अध्यक्षता में योजना आयोग ने शिक्षा में विदेशी निवेश लाने की संभावना और उपाय तलाशने के लिए पैनल बनाया था। इस पैनल से उम्मीद यही की जा रही थी कि वह उच्च, तकनीकी शिक्षा की जमीनी हकीकत को देखते हुए सिफारिशें करेगा लेकिन इस पैनल ने सिर्फ निवेश आमंत्रित करने वाले उपायों पर ही अपना फोकस रखा है। अगर इस पैनल के मुताबिक किसी संस्थान को ९९९ साल के लिए पट्टा दे ही दिया जाए, उसे टैक्स छूट दी जाए तो क्या गारंटी है कि वह गुणवत्ता आधारित शिक्षा ही देगा? माना जा रहा है कि ऐसी कोशिशों से दुनिया के नामी विश्वविद्यालय भारत आएँगे और गुणवत्ता आधारित शिक्षा मुहैया कराएँगे पर रसायन विज्ञान के लिए २००९ में नोबेल पुरस्कार विजेता भारतीय मूल के वैज्ञानिक वेंकटेश रामाकृष्णन का कहना है कि ब्रिटेन और अमेरिका के जिन प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों ने सिंगापुर या दूसरी जगहों पर अपना कैंपस खोला है, उनमें वैसी गुणवत्ता आधारित शिक्षा नहीं मिलती, जैसी वे अपने मूल कैंपस में मुहैया कराते हैं। बेहतर होता कि कॉर्पोरेट निवेश को आमंत्रित करने के अंधानुकरण की बजाय गुणवत्ता बनाए रखने पर ध्यान दिया जाता।

No comments:

Post a comment