Saturday, 17 October 2020

सुपरकंडक्टिविटी से बचेगा संसार

चंद्रभूषण

पिछली सदी में दुनिया की तरक्की जिस हद तक बिजली के दायरे में जारी खोजों पर निर्भर करती थी, कुछ वैसा ही मामला इस सदी में सुपरकंडक्टिविटी के साथ है। सुपरकंडक्टिविटी यानी बिजली का बिना रेजिस्टेंस के गुजर जाना। आम जनजीवन से इसका अनुमान लगाना असम्भव है। आप किसी सुपरकंडक्टिव मटीरियल का एक छल्ला बनाकर उसमें करेंट छोड़ दें। छल्ले में लगातार बिजली दौड़ती रहेगी, बिना किसी सोर्स के। यह वैसा ही है जैसे कोई सड़क इतनी चिकनी हो कि उसपर उतारी गई गाड़ी बिना एक्सिलरेटर दबाए अपनी शुरुआती स्पीड से ही चलती चली जाए।

सुपरकंडक्टिविटी कुछ खास पदार्थों का एक ऐसा भौतिक गुण है, जो बीती एक सदी में ही पकड़ में आया है। इसके होने की बुनियाद को लेकर खोजबीन जारी है। तांबा और चांदी जैसे सुचालकों का रेजिस्टेंस तापमान घटाने पर कम होता जाता है, यह जानकारी पहले से थी। लेकिन डच भौतिकशास्त्री हाइक कैमरलिंग ओन्स ने 1911 में बताया कि हर सुचालक के लिए तापमान की एक खास दहलीज ऐसी होती है, जिसके नीचे जाते ही उसका रेजिस्टेंस अचानक जीरो हो जाता है। 

यह अलग बात है कि इस दहलीज को शुरू में एब्सोल्यूट जीरो से जरा ही ऊपर -270 डिग्री सेंटिग्रेड के आसपास माना जाता था। ऐसा तापमान, जिसे उच्च भौतिकी की प्रयोगशालाओं में ही हासिल किया जा सकता है, वह भी बहुत ज्यादा बिजली खाने वाली भारी मशीनों के जरिये। इधर अच्छी बात यह हुई है कि जैसे-जैसे अत्यंत ऊंचे विभव पर काम करने वाले विद्युत चुंबकों की मांग बढ़ी है, वैसे-वैसे अपेक्षाकृत कम ठंड में भी सुपरकंडक्टिव हो जाने वाले पदार्थ खोजे जाने लगे हैं।

हालिया खबर रूम टेंप्रेचर सुपरकंडक्टिविटी की है। हालांकि इसे अव्यावहारिक स्थितियों में, सामान्य वायुदाब से लाखों गुना दबाव डालकर हासिल किया गया है। फ्यूजन रिएक्टर से लेकर पटरी छोड़कर चलने वाली ट्रेनें और विंड एनर्जी जैसे अक्षय ऊर्जा स्रोत कम खर्चीली सुपरकंडक्टिविटी मांग रहे हैं। रही बात फ्रंटलाइन रिसर्च की तो ज्यादातर क्षेत्रों की तरह चीनी और अमेरिकी इसमें भी बाकियों से बहुत आगे हैं। दुनिया की उम्मीदें उन्हीं पर टिकी हैं क्योंकि ग्लोबल वॉर्मिंग से बचाव का सुपरकंडक्टिविटी के सिवा और कोई रास्ता नहीं है।

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