Tuesday, 1 October 2019

बढ़ने लगा है कोयले का ग्लोबल कारोबार

फिर से बढ़ने लगा है कोयले का ग्लोबल कारोबार
चंद्रभूषण
पूरी दुनिया में कोयले के उत्पादन में इधर तेज बढ़ोतरी देखी जा रही है। सन 2001 से 2009 की शुरुआत तक लगातार बढ़ी तेल की कीमतों ने दुनिया को वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत के रूप में कोयले का उत्पादन बढ़ाने की तरफ मोड़ा था, जो 2009 से लगातार बढ़ता हुआ 2014 तक अपने पीक पर पहुंचा था। लेकिन फिर पर्यावरण संकट को लेकर विश्व स्तर पर गंभीर बातचीत शुरू हुई, जिसका असर कोयले के उत्पादन पर पड़ा और यह साल-दर-साल नीचे जाने लगा।

आंकड़ों पर गौर करें तो 2014 में कोयले का ग्लोबल प्रॉडक्शन 8 अरब 165 करोड़ टन था, जो 2015 में 7 अरब 861 करोड़ टन और 2015 में 7 अरब 460 करोड़ टन रह गया। लेकिन 2019 में इसे 7 अरब 727 करोड़ टन दर्ज किया गया है और लगभग सारे बड़े कोयला उत्पादक देशों का रुझान इसे बढ़ाने का ही है।इस सिलसिले में अभी सबसे ज्यादा ग्लोबल चर्चा अफ्रीका के छोटे से दक्षिणी मुल्क बोत्स्वाना में पहली बार निजी खदानें शुरू होने को लेकर है।

बमुश्किल 22-23 लाख आबादी वाला यह लैंड-लॉक्ड देश हाल तक दुनिया के कोयला नक्शे पर कहीं भी नहीं आता था। 1966 में इसे आजादी मिलने के थोड़ा ही पहले पता चला कि यहां की जमीन के नीचे हीरा, सोना जैसे बहुमूल्य पदार्थों के अलावा भारी मात्रा में कोयला भी है। लेकिन कालाहारी रेगिस्तान से होकर किसी खनिज को समुद्र तक पहुंचाना इतना मुश्किल और कूटनीतिक रूप से इतना उलझनों भरा था कि कोयला निकालने का काम यहां हाल-हाल तक सिर्फ एक छोटी सी सरकारी कंपनी शहरी जरूरतों के लिए बिजली बनाने भर को ही किया करती थी।

ये स्थितियां इधर अचानक बदल गई हैं। बीते वर्षों में बोत्स्वाना को लेकर एक अद्भुत जानकारी यह मिली कि यहां का कोयला भंडार 200 अरब टन से भी ज्यादा है। यानी यहां से ज्यादा कोयला सिर्फ अमेरिका के पास है। दूसरी बात यह कि इस कोयले को अब समुद्र के रास्ते कहीं और ले जाकर बेचना भी जरूरी नहीं है। बड़े ताप बिजली संयंत्र लगाकर यहां के कोयले से यहीं के यहीं भारी मात्रा में बनाई हुई बिजली आस-पास के देशों को ही बेची जा सकती है।

इससे भी बड़ी बात यह कि कोयले को सीधे डीजल में बदलकर उससे रेलगाड़ियां और कारें चलाई जा सकती हैं। इतनी सारी संभावनाएं अचानक सामने आने की सबसे बड़ी वजह यह है कि खाड़ी का इलाका लगातार तनाव में है और कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। बीच में ऐसा लगने लगा था कि अमेरिका में फ्रैक्टिंग से निकाला जा रहा तेल खाड़ी इलाके को तेल के मामले में अप्रासंगिक बना देगा, लेकिन यह आकलन गलत सिद्ध हुआ।

समस्या यह है कि कोयले से बनाई जाने वाली बिजली अपने पीछे बहुत बड़ा कार्बन फुटप्रिंट छोड़ती है। दूसरे शब्दों में कहें तो ग्लोबल वार्मिंग बढ़ाने में इसका योगदान बहुत ज्यादा है। रही बात कोयले से डीजल बनाने की तो अभी इस टेक्नॉलजी में महारत दक्षिण अफ्रीका को ही हासिल है। इस काम में तो कार्बन डाइऑक्साइड इतनी ज्यादा निकलती है कि कंपनियां ग्लोबल प्रतिबंध के डर से जल्दी इसमें हाथ ही नहीं डालतीं।

दुनिया में कोयला भंडार के लिहाज से भारत का मुकाम अमेरिका, रूस, चीन और ऑस्ट्रेलिया के बाद पांचवां और उत्पादन के लिहाज से चीन के बाद दूसरा है। हाल में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सम्मेलन में भारत का स्टैंड यह था कि उसे न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप की सदस्यता न मिलना ही कोयले पर उसकी अति-निर्भरता का सबसे बड़ा कारण है। लेकिन ऐसा कोई न कोई कारण बड़े कोयला भंडार वाले हर देश के पास है। नतीजा यह कि विश्व ऊर्जा परिदृश्य में कोयले का दखल निकट भविष्य में तेजी से बढ़ने वाला है।

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