Saturday, 9 March 2019

मीठेपन का साइड इफेक्ट

चंद्रभूषण
पीने लायक पानी पूरी दुनिया में मौजूद कुल पानी का 3 फीसदी ही है। वह भी ज्यादातर बर्फ की शक्ल में, जिसका इस्तेमाल न इंसान कर पाते हैं, न ही पेड़-पौधे या ज्यादातर जीव-जंतु। दुनिया के कुछ इलाकों के लिए यह बहुत बड़ी समस्या है, हालांकि इनमें से अधिकतर समुद्र के करीब हैं, जिसने धरती की सतह का तीन-चौथाई हिस्सा घेर रखा है। ऐसे में स्वाभाविक है कि समुद्री या खारे पानी से मीठा पानी निकालने की तकनीकों में विकास की खबर संसार भर के टेक्नोलॉजिकल जर्नल्स का स्थायी फीचर हुआ करती है।

इन कोशिशों का ही नतीजा है कि पिछले तीस वर्षों में इस काम पर आने वाली लागत आधी से भी कम रह गई है। अभी समुद्री पानी को पेयजल में बदलने की रनिंग कॉस्ट 35 से 65 रुपये प्रति हजार लीटर है, जो वैसे तो काफी कम है लेकिन प्लांट का पूंजी खर्च जोड़ने पर ज्यादा हो जाती है। आने वाले दिनों में प्लांट्स को वायु या सौर ऊर्जा से चलाने पर यह खर्च और कम हो जाएगा। पूरी दुनिया में इस काम के लिए लगभग 20 हजार प्लांट लगे हुए हैं, जिनमें कोई चार हजार सिर्फ खाड़ी देशों- ज्यादातर सऊदी अरब और यूएई में हैं।

मुख्यत: दो तरह की तकनीकें इस काम में इस्तेमाल होती हैं। डीजल या गैस से संचालित थर्मल टेक्नीक और बिजली से चलने वाली रिवर्स ऑस्मोसिस (आरओ) टेक्नीक, जो हमारे घरों में भी काम आती है। आरोप है कि ये दोनों तकनीकें तटीय समुद्रों को और ज्यादा खारा बनाकर समुद्री जीवन को नुकसान पहुंचाती हैं और थर्मल तकनीक खास तौर पर ग्लोबल वार्मिंग बढ़ाती है। बचाव में कंपनियां अपने कचरे के रूप में निकलने वाले अति-खारे पानी से किनोआ और सैलिकॉर्निया जैसी खारी दलदली फसलें उगाने लगी हैं।

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