Friday, 6 July 2018

पर्यावरण सरंक्षण पर बातें नहीं, ठोस काम जरूरी


विश्व पर्यावरण दिवस(5 जून ) पर विशेष 
शशांक द्विवेदी  
पूरी दुनियाँ की जलवायु में तेजी से परिवर्तन हो रहा है ,बेमौसम आंधी ,तूफ़ान और बरसात से हजारों लोगों की जान जा रही है साथ ही सभी ऋतु चक्रों में तेजी से बदलाव देखने को मिल रहा है । सच्चाई यह है कि पर्यावरण सीधे सीधे हमारे अस्तित्व से जुड़ा मसला है । दुनियाँभर में पर्यावरण सरंक्षण को लेकर काफी बातें, सम्मेलन, सेमिनार आदि हो रही है परन्तु वास्तविक धरातल पर उसकी परिणिति होती दिखाई नहीं दे रही है । जिस तरह क्लामेट चेंज दुनियाँ में भोजन पैदावार और आर्थिक समृद्धि को प्रभावित कर रहा है, आने वाले समय में जिंदा रहने के लिए जरूरी चीजें इतनी महंगी हो जाएगीं कि उससे देशों के बीच युद्ध जैसे हालात पैदा हो जाएंगे । यह खतरा उन देशों में ज्यादा होगा जहाँ कृषि आधारित अर्थव्यवस्था है । पर्यावरण का सवाल जब तक तापमान में बढोत्तरी से मानवता के भविष्य पर आने वाले खतरों तक सीमित रहा, तब तक विकासशील देशों का इसकी ओर उतना ध्यान नहीं गया । परन्तु अब जलवायु चक्र का खतरा खाद्यान्न उत्पादन पर पड रहा है, किसान यह तय नहीं कर पा रहे है कब बुवाई करे और कब फसल काटें । तापमान में बढ़ोत्तरी जारी रही तो खाद्य उत्पादन 40 प्रतिशत तक घट जायेगा, इससे पूरे विश्व में खाद्यान्नों की भारी कमी हो जायेगी । ऐसी स्थिति विश्व युद्ध से कम खतरनाक नहीं होगी । एक नई अमेरिकी स्टडी में दावा किया गया है कि तापमान में एक डिग्री तक का इजाफा साल 2030 तक अफ्रीकी सिविल वार होने के रिस्क को 55 प्रतिशत तक बढा सकता है । यानी महज अगले 12  वर्षों में अफ्रीकी देशों में संकट गहरा सकता है । यह स्टडी यूनिवर्सिटी आफ कैलीफोर्निया के इकानमिस्ट मार्शल बर्क द्वारा की गई है । इसमें कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण बनी स्थितियों में अकेले अफ्रीका के उप सहारा इलाके में युद्ध भड़कने से 3 लाख 90 हजार मौतें हो सकती हैं । इन युद्धों के बहुत विनाशकारी होनें की आशंका है ।
नेचर क्लाइमेट चेंज एंड अर्थ सिस्टम साइंस डाटा जर्नल में प्रकाशित  एक रिपोर्ट के अनुसार चीन, अमेरिका और यूरोपीय संघ के वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में क्रम से 26 ,15 और 11 फीसद की हिस्सेदारी है जबकि भारत का आंकड़ा सात फीसद है। इसमें बताया गया है कि प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन के मामले में भारत की हिस्सेदारी 2.44 टन है जबकि अमेरिका, यूरोपीय संघ और चीन की प्रति व्यक्ति हिस्सेदारी क्रम से 19.86 टन, 8.77 और 8.13 टन है।यह रिपोर्ट ब्रिटेन के ईस्ट एंजलिया विश्वविद्यालय के ग्लोबल कार्बन परियोजना द्वारा किये गये एक अध्ययन पर आधारित है ।  दुनियाँ भर में कार्बन उत्सर्जन की बढती दर ने पर्यावरण और खासकर जैव विविधता को बड़े पैमानें पर नुकसान पहुँचाया है , एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले एक दशक में विलुप्त प्रजातियों की संख्या पिछले एक हजार वर्ष के दौरान विलुप्त प्रजातियों की संख्या के बराबर है। जलवायु में तीव्र गति से होने वाले परिवर्तन से देश की 50 प्रतिशत जैव विविधता पर संकट है। अगर तापमान से 1.5  से 2.5  डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होती है तो 25 प्रतिशत प्रजातियां पूरी तरह समाप्त हो जाएंगी।  अंतरराष्ट्रीय संस्था वर्ल्ड वाइल्ड फिनिशिंग ऑर्गेनाइजेशन ने अपनी रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि 2030 तक घने जंगलों का 60 प्रतिशत भाग नष्ट हो जाएगा। वनों के कटान से वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की कमी से कार्बन अधिशोषण ही वनस्पतियों व प्राकृतिक रूप से स्थापित जैव विविधता के लिए खतरा उत्पन्न करेगी। मौसम के मिजाज में होने वाला परिवर्तन ऐसा ही एक खतरा है। इसके परिणामस्वरूप हमारे देश के पश्चिमी घाट के जीव-जंतुओं की अनेक प्रजातियां तेजी से लुप्त हो रही हैं।
पिछले दिनों पर्यावरण और वायु प्रदूषण का भारतीय कृषि पर प्रभाव शीर्षक से प्रोसिडिंग्स ऑफ नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस में प्रकाशित एक शोध पत्र के नतीजों ने  सरकार ,कृषि विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों की चिंता बढ़ा दी है । शोध के अनुसार भारत के अनाज उत्पादन में वायु प्रदूषण का सीधा और नकारात्मक असर देखने को मिल रहा है। देश  में धुएं में बढ़ोतरी की वजह से अनाज के लक्षित उत्पादन में कमी देखी जा रही है। करीब 30 सालों के आंकड़े का विश्लेषण करते हुए वैज्ञानिकों ने एक ऐसा सांख्यिकीय मॉडल विकसित किया जिससे यह अंदाजा मिलता है कि घनी आबादी वाले राज्यों में वर्ष 2010 के मुकाबले वायु प्रदूषण की वजह से गेहूं की पैदावार 50 फीसदी से कम रही। कई जगहों पर खाद्य उत्पादन में करीब 90 फीसदी की कमी धुएं की वजह से देखी गई जो कोयला और दूसरे प्रदूषक  तत्वों की वजह से हुआ। भूमंडलीय तापमान वृद्धि और वर्षा के स्तर की भी 10 फीसदी बदलाव में अहम भूमिका है। कैलिफॉर्निया विश्वविद्यालय में वैज्ञानिक और शोध की लेखिका जेनिफर बर्नी के अनुसार ये आंकड़े चौंकाने वाले हैं हालांकि इसमें बदलाव संभव है। संयुक्त राष्ट्र में जलवायु परिवर्तन के लिए बने अंतर सरकारी पैनल(आइपीसीसी)  रिपोर्ट में भी इसी तरह की चेतावनी दी गई थी । जलवायु परिवर्तन - प्रभाव, अनुकूलन और जोखिमशीर्षक से जारी इस रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव पहले से ही सभी महाद्वीपों और महासागरों में विस्तृत रूप ले चुका है। रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण एशिया को बाढ़, गर्मी के कारण मृत्यु, सूखा तथा पानी से संबंधित खाद्य की कमी का सामना करना पड़ सकता है। कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाले भारत जैसे देश जो केवल मानसून पर ही निर्भर हैं, के लिए यह काफी खतरनाक हो सकता है। जलवायु परिवर्तन की वजह से दक्षिण एशिया में गेहूं की पैदावार पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है । साथ ही वैश्विक खाद्य उत्पादन भी धीरे-धीरे घट रहा है। एक खास बात यह भी है कि जलवायु परिवर्तन से न केवल फसलों की उत्पादकता प्रभावित हो रही है बल्कि उनकी पोष्टिकता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है । एशिया में तटीय और शहरी इलाकों में बाढ़ की वृद्धि से बुनियादी ढांचे, आजीविका और बस्तियों को काफी नुकसान हो सकता है। ऐसे में मुंबई, कोलकाता, ढाका जैसे शहरों पर खतरे की संभावना बढ़ सकती है। पिछले दिनों पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने भी जलवायु परिवर्तन पर इंडियन नेटवर्क फॉर क्लाइमेट चेंज असेसमेंट की रिपोर्ट जारी करते हुए चेताया था कि यदि पृथ्वी के औसत तापमान का बढ़ना इसी प्रकार जारी रहा तो अगामी वर्षों में भारत को इसके दुष्परिणाम झेलने होंगे। इसका सीधा असर देश की कृषि व्यवस्था पर भी पड़ेगा ।
पूरी दुनियाँ की जलवायु में तेजी से परिवर्तन हो रहा है ,बेमौसम आंधी ,तूफ़ान और बरसात से हजारों लोगों की जान जा रही है साथ ही सभी ऋतु चक्रों में तेजी से बदलाव देखने को मिल रहा है । सच्चाई यह है कि पर्यावरण सीधे सीधे हमारे अस्तित्व से जुड़ा मसला है । दुनियाँभर में पर्यावरण सरंक्षण को लेकर काफी बातें, सम्मेलन, सेमिनार आदि हो रही है परन्तु वास्तविक धरातल पर उसकी परिणिति होती दिखाई नहीं दे रही है । जिस तरह क्लामेट चेंज दुनियाँ में भोजन पैदावार और आर्थिक समृद्धि को प्रभावित कर रहा है, आने वाले समय में जिंदा रहने के लिए जरूरी चीजें इतनी महंगी हो जाएगीं कि उससे देशों के बीच युद्ध जैसे हालात पैदा हो जाएंगे । यह खतरा उन देशों में ज्यादा होगा जहाँ कृषि आधारित अर्थव्यवस्था है । पर्यावरण का सवाल जब तक तापमान में बढोत्तरी से मानवता के भविष्य पर आने वाले खतरों तक सीमित रहा, तब तक विकासशील देशों का इसकी ओर उतना ध्यान नहीं गया । परन्तु अब जलवायु चक्र का खतरा खाद्यान्न उत्पादन पर पड रहा है, किसान यह तय नहीं कर पा रहे है कब बुवाई करे और कब फसल काटें । तापमान में बढ़ोत्तरी जारी रही तो खाद्य उत्पादन 40 प्रतिशत तक घट जायेगा, इससे पूरे विश्व में खाद्यान्नों की भारी कमी हो जायेगी । ऐसी स्थिति विश्व युद्ध से कम खतरनाक नहीं होगी । एक नई अमेरिकी स्टडी में दावा किया गया है कि तापमान में एक डिग्री तक का इजाफा साल 2030 तक अफ्रीकी सिविल वार होने के रिस्क को 55 प्रतिशत तक बढा सकता है । यानी महज अगले 12  वर्षों में अफ्रीकी देशों में संकट गहरा सकता है । यह स्टडी यूनिवर्सिटी आफ कैलीफोर्निया के इकानमिस्ट मार्शल बर्क द्वारा की गई है । इसमें कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण बनी स्थितियों में अकेले अफ्रीका के उप सहारा इलाके में युद्ध भड़कने से 3 लाख 90 हजार मौतें हो सकती हैं । इन युद्धों के बहुत विनाशकारी होनें की आशंका है ।

नेचर क्लाइमेट चेंज एंड अर्थ सिस्टम साइंस डाटा जर्नल में प्रकाशित  एक रिपोर्ट के अनुसार चीन, अमेरिका और यूरोपीय संघ के वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में क्रम से 26 ,15 और 11 फीसद की हिस्सेदारी है जबकि भारत का आंकड़ा सात फीसद है। इसमें बताया गया है कि प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन के मामले में भारत की हिस्सेदारी 2.44 टन है जबकि अमेरिका, यूरोपीय संघ और चीन की प्रति व्यक्ति हिस्सेदारी क्रम से 19.86 टन, 8.77 और 8.13 टन है।यह रिपोर्ट ब्रिटेन के ईस्ट एंजलिया विश्वविद्यालय के ग्लोबल कार्बन परियोजना द्वारा किये गये एक अध्ययन पर आधारित है ।  दुनियाँ भर में कार्बन उत्सर्जन की बढती दर ने पर्यावरण और खासकर जैव विविधता को बड़े पैमानें पर नुकसान पहुँचाया है , एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले एक दशक में विलुप्त प्रजातियों की संख्या पिछले एक हजार वर्ष के दौरान विलुप्त प्रजातियों की संख्या के बराबर है। जलवायु में तीव्र गति से होने वाले परिवर्तन से देश की 50 प्रतिशत जैव विविधता पर संकट है। अगर तापमान से 1.5  से 2.5  डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होती है तो 25 प्रतिशत प्रजातियां पूरी तरह समाप्त हो जाएंगी।  अंतरराष्ट्रीय संस्था वर्ल्ड वाइल्ड फिनिशिंग ऑर्गेनाइजेशन ने अपनी रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि 2030 तक घने जंगलों का 60 प्रतिशत भाग नष्ट हो जाएगा। वनों के कटान से वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की कमी से कार्बन अधिशोषण ही वनस्पतियों व प्राकृतिक रूप से स्थापित जैव विविधता के लिए खतरा उत्पन्न करेगी। मौसम के मिजाज में होने वाला परिवर्तन ऐसा ही एक खतरा है। इसके परिणामस्वरूप हमारे देश के पश्चिमी घाट के जीव-जंतुओं की अनेक प्रजातियां तेजी से लुप्त हो रही हैं। 
पिछले दिनों पर्यावरण और वायु प्रदूषण का भारतीय कृषि पर प्रभाव शीर्षक से प्रोसिडिंग्स ऑफ नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस में प्रकाशित एक शोध पत्र के नतीजों ने  सरकार ,कृषि विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों की चिंता बढ़ा दी है । शोध के अनुसार भारत के अनाज उत्पादन में वायु प्रदूषण का सीधा और नकारात्मक असर देखने को मिल रहा है। देश  में धुएं में बढ़ोतरी की वजह से अनाज के लक्षित उत्पादन में कमी देखी जा रही है। करीब 30 सालों के आंकड़े का विश्लेषण करते हुए वैज्ञानिकों ने एक ऐसा सांख्यिकीय मॉडल विकसित किया जिससे यह अंदाजा मिलता है कि घनी आबादी वाले राज्यों में वर्ष 2010 के मुकाबले वायु प्रदूषण की वजह से गेहूं की पैदावार 50 फीसदी से कम रही। कई जगहों पर खाद्य उत्पादन में करीब 90 फीसदी की कमी धुएं की वजह से देखी गई जो कोयला और दूसरे प्रदूषक  तत्वों की वजह से हुआ। भूमंडलीय तापमान वृद्धि और वर्षा के स्तर की भी 10 फीसदी बदलाव में अहम भूमिका है। कैलिफॉर्निया विश्वविद्यालय में वैज्ञानिक और शोध की लेखिका जेनिफर बर्नी के अनुसार ये आंकड़े चौंकाने वाले हैं हालांकि इसमें बदलाव संभव है। संयुक्त राष्ट्र में जलवायु परिवर्तन के लिए बने अंतर सरकारी पैनल(आइपीसीसी)  रिपोर्ट में भी इसी तरह की चेतावनी दी गई थी । ‘जलवायु परिवर्तन - प्रभाव, अनुकूलन और जोखिम’ शीर्षक से जारी इस रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव पहले से ही सभी महाद्वीपों और महासागरों में विस्तृत रूप ले चुका है। रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण एशिया को बाढ़, गर्मी के कारण मृत्यु, सूखा तथा पानी से संबंधित खाद्य की कमी का सामना करना पड़ सकता है। कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाले भारत जैसे देश जो केवल मानसून पर ही निर्भर हैं, के लिए यह काफी खतरनाक हो सकता है। जलवायु परिवर्तन की वजह से दक्षिण एशिया में गेहूं की पैदावार पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है । साथ ही वैश्विक खाद्य उत्पादन भी धीरे-धीरे घट रहा है। एक खास बात यह भी है कि जलवायु परिवर्तन से न केवल फसलों की उत्पादकता प्रभावित हो रही है बल्कि उनकी पोष्टिकता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है । एशिया में तटीय और शहरी इलाकों में बाढ़ की वृद्धि से बुनियादी ढांचे, आजीविका और बस्तियों को काफी नुकसान हो सकता है। ऐसे में मुंबई, कोलकाता, ढाका जैसे शहरों पर खतरे की संभावना बढ़ सकती है। पिछले दिनों पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने भी जलवायु परिवर्तन पर इंडियन नेटवर्क फॉर क्लाइमेट चेंज असेसमेंट की रिपोर्ट जारी करते हुए चेताया था कि यदि पृथ्वी के औसत तापमान का बढ़ना इसी प्रकार जारी रहा तो अगामी वर्षों में भारत को इसके दुष्परिणाम झेलने होंगे। इसका सीधा असर देश की कृषि व्यवस्था पर भी पड़ेगा ।
दुनियाँ भर के देशों की जलवायु और मौसम में परिवर्तन हो रहा है।  पिछले दो सालों में देश के कई इलाकों में बेमौसम बरसात और सूखे की वजह से किसानों की बड़ी आबादी बेहद मुश्किल दौर से गुजर रही है । पिछले साल अचानक आई बेमौसम बारिश ने कहर ढाते हुए कई राज्यों की कुल 50 लाख हेक्टेयर भूमि में खड़ी फसल बर्बाद कर दिया था । मौसम में तीव्र परिवर्तन हो रहा है ,ऋतु चक्र बिगड़ चुके है। मौसम के बिगड़े हुए मिजाज ने देश भर में समस्या पैदा कर दी है । सच्चाई यह है कि देश में कृषि क्षेत्र में मचे हाहाकार का सीधा संबंध जलवायु परिवर्तन से है । यह सब जलवायु परिवर्तन और हमारे द्वारा पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने  की वजह से हो रहा है ।
जलवायु परिवर्तन संपूर्ण मानवता के लिये एक बहुत बड़ा खतरा है ।एक अहम् बात और है कि सौर ,विंड जैसी वैकल्पिक ऊर्जा पर जोर देकर हम अपनी उर्जा जरूरतों के साथ साथ ग्लोबल वार्मिंग पर काबू कर सकतें है। बड़े पैमानें पर वैकल्पिक उर्जा  के उपयोग और उत्पादन के लिए अब पूरे विश्व को एक साथ आना होगा तभी कुछ हद तक वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में कुछ कमी आ पायेगी । 
कुलमिलाकर देश के प्राकृतिक संसाधनों का ईमानदारी से दोहन और पर्यावरण के संरक्षण के लिए सरकारी प्रयास के साथ साथ जनता की  सकारात्मक भागीदारी की जरुरत है । जनता के बीच जागरूकता फैलानी होगी, तभी इसका संरक्षण हो पायेगा । पर्यावरण संरक्षण का सवाल पृथ्वी के अस्तित्व से जुड़ा है। इसलिए हम सभी को इसके लिए संजीदा होना होगा  ।
(लेखक राजस्थान के मेवाड़ यूनिवर्सिटी में डिप्टी डायरेक्टर हैं और टेक्निकल टूडे मैगज़ीन के संपादक है )



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