Friday, 1 December 2017

एड्स से जान गंवाने वालों लोगों की संख्या में कमी

शशांक द्विवेदी  
पिछले दिनों जारी संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की एक रिपोर्ट के अनुसार बीते एक दशक के दौरान पूरी दुनिया में एड्स की वजह से जान गंवाने वालों लोगों की संख्या में 50 फीसदी से अधिक की कमी दर्ज की गई है. साल 2005 में इस जानलेवा बीमारी की वजह से 19 लाख लोगों की मौत हुई थी, जबकि 2016 में यह आंकड़ा घटकर 10 लाख पर आ चुका है. यूएन की रिपोर्ट के मुताबिक यह पहला मौका है, जब इस संख्या में कमी दर्ज की गई है. साल 1980 से अब तक तकरीबन साढ़े सात करोड़ लोग इस बीमारी से संक्रमित हो चुके हैं और इनमें से तकरीबन आधे मरीजों को अपनी जान गंवानी पड़ी है.
यूएन की रिपोर्ट के मुताबिक एड्स की वजह से न केवल जान गंवाने वाले लोगों की संख्या में गिरावट दर्ज की गई है, बल्कि इससे संबंधित नए मामलों में भी कमी आई है. इसके अलावा पहले के मुकाबले अब अधिक लोगों को बेहतर इलाज की सुविधा हासिल हो रही है. साल 2016 में एड्स के 18 लाख नए मामले सामने आए हैं, जबकि 1997 में यह आंकड़ा करीब 35 लाख था. इसके अलावा बीते साल एड्स पीड़ित कुल 3.67 करोड़ लोगों में से 1.95 करोड़ मरीजों को इलाज की सुविधा मिली थी. विभिन्न समुदायों और परिवारों की कोशिशों की वजह से एड्स के मामलों को पीछे धकेलन में सफलता हासिल हुई है.
यूएन की रिपोर्ट के तहत साल 2020 तक 90 फीसदी एड्स संक्रमित मरीजों को बीमारी से जुड़ी उनकी स्थिति के बारे में जानकारी देने और इनमें से 90 फीसदी (कुल मरीजों का 81 फीसदी) तक इलाज की सुविधा पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है. फिलहाल कुल संक्रमित मरीजों में से केवल 70 फीसदी को ही अपनी स्थिति के बारे में जानकारी हासिल है और इनमें से 77 फीसदी को ही सही इलाज की सुविधा मिल पा रही है.
क्या एड्स का इलाज संभव है ?
एचआईवी का फिलहाल कोई मुकम्मल इलाज नहीं है लेकिन इसके इलाज के शोध पर काफी सकारात्मक नतीजे आये है और निकट भविष्य में इसका इलाज संभव हो सकता है । एक बार शरीर में आ जाने के बाद वायरस ताउम्र शरीर में रहता है। फिर भी दवाओं की मदद से एचआईवी पॉजिटिव होने से लेकर एड्स होने तक के गैप को बढ़ाया जा सकता है। कोशिश की जाती है कि एचआईवी पीड़ित शख्स लंबे समय तक बीमारियों से बचा रहे। यह वक्त कितना बढ़ाया जा सकता है, यह उस शख्स पर निर्भर करता है। अलग-अलग मामलों में यह वक्त अलग-अलग हो सकता है। इसी तरह एड्स हो जाने के बाद व्यक्ति कितने दिनों तक जिंदा रहेगा, यह भी उसके अपने रहन-सहन, खानपान और इलाज पर निर्भर करता है। एचआईवी पॉजिटिव व्यक्ति को इलाज के दौरान एंटी-रेट्रोवायरल ड्रग्स दिए जाते हैं। एजेडटी, डीडीएल, डीडीसी कुछ कॉमन ड्रग्स हैं। बर्लिन के टिमोथी रे ब्राउन कैंसर से इलाज के जरिए पूरी तरह ठीक होने वाले दुनिया के पहले व्यक्ति माने जाते हैं। ब्राउन को ल्यूकीमिया था जिसे एचआईवी प्रतिरोधी जीन वाले व्यक्ति के स्टेम सेल ट्रांस्प्लांट द्वारा उनका इलाज किया गया था। रिसर्चर कुछ ऐसे टीके विकसित करने पर काम कर रहे हैं, जिससे रोगी का इम्युनिटी सिस्टम बढ़ाया जा सके ताकि वो एचआईवी वायरस का मुकाबला कर सके।
एक शोध के दौरान एक वैज्ञानिक ने लेबोरेटरी में एचआईवी से लड़ने के लिए एचआईवी का इस्तेमाल किया। उसने एक मौजूदा एचआईवी प्रोटीन को परिवर्तनशील कर प्रोटीन बनाया, जो वायरस को रोकने के लिए मजबूती प्रदान करता है। लेकिन इसका उद्देश्य वायरस के इलाज के लिए नहीं है।

एड्स एक खतरनाक बीमारी है जो इंसान को जीते जी मार देती है। असुरक्षित यौन संबंधों, दोषपूर्ण रक्त बदलने या अन्य कारकों से होने वाला यह रोग आज भी बड़े पैमाने पर लोगों की जिंदगियाँ प्रभावित कर रहा है . एचआईवी यानी ह्यूमन इम्यूनोडिफीशिएंसी वायरस, मानव की रोग प्रतिरोधक शक्ति को कम करने वाला यह विषाणु एक रेट्रोवायरस है जो मानव की रोग प्रतिरोधक प्रणाली की कोशिकाओं (मुख्यतः सीडी 4 पॉजिटिव टी) को संक्रमित कर उनके काम करने की क्षमता को नष्ट या क्षतिग्रस्त कर देता है। यह विषाणु मुख्यतः शरीर को बाहरी रोगों से सुरक्षा प्रदान करने वाले रक्त में मौजूद टी कोशिकाओं (सेल्स) व मस्तिष्क की कोशिकाओं को प्रभावित करता है और धीरे-धीरे उन्हें नष्ट करता रहता है. कुछ सालों के बाद  बाद (6 से 10 वर्ष) यह स्थिति हो जाती है कि शरीर आम रोगों के कीटाणुओं से अपना बचाव नहीं कर पाता और तरह-तरह के संक्रमण (इन्फेक्शन) से ग्रसित होने लगता है, इस अवस्था को एड्स कहते हैं।
फिलहाल एड्स को रोकने के लिए एंटी रेट्रोवायरल का ही इस्तेमाल किया जाता है। इसे रेट्रो वायरस, मुख्यतौर पर एचआइवी के संक्रमण से बचाव के लिए विकसित किया गया है। जब इस तरह की कई दवाइयों को एक साथ मिला दिया जाता है, तो यह उस सक्रिय एंटी रेट्रोवायरस थेरेपी या एचएएआरटी कहलाता है। पहली बार अमेरिकी स्वास्थ्य संस्था ने एड्स के रोगियों को इस दवा के इस्तेमाल का सुझाव दिया था। एंटी रेट्रोवायरल दवाइयों के भी विभित्र प्रकार है, जो एचआइवी के विभित्र स्टेज के लिए इस्तेमाल होते हैं। अब अमेरिका वैज्ञानिकों का कहना है कि उन्होंने एड्स फैलाने वाले एचआइवी वायरस के संभावित इलाज की ओर पहला कदम उठाया है। एचआइवी वायरस कई सालों तक मरीज के शरीर में बिना कोई हरकत किये पड़ा रहता है जिससे इसका इलाज करने में मुश्किलें आती हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक, कैंसर के खिलाफ इस्तेमाल होने वाली दवा (वोरीनोस्टैट) के इस्तेमाल से इस सुस्त प.डे वायरस को बाहर निकाला जाता है। इन वैज्ञानिकों ने आठ मामलों में इस वायरस पर हमला कर उसे सामान्य एंटी-रेट्रोवायरल दवाओं से खत्म कर दिया। लेकिन वैज्ञानिकों की इस टीम का कहना है कि दुनिया में एचआइवी से ग्रस्त करोड़ों लोगों के इलाज के लिए कारगर दवा को विकसित करने के लिए कई सालों तक शोध करने की जरूरत पड़ सकती है।
एड्स हो जाने के बाद इससे छुटकारा पाने की दुनिया में अभी कोई दवा नहीं बन पायी है। अभी तक जो भी दवाएं बनी हैं, वे सिर्फ बीमारी की रफ्तार कम करती हैं, उसे खत्म नहीं करतीं एचआइवी के लक्षणों का इलाज तो हो सकता है, लेकिन इस इलाज से भी यह बीमारी पूरी तरह खत्म नहीं होती है। एजेडटी, एजीकोथाइमीडीन, जाइडोव्यूजडीन, ड्राइडानोसीन स्टाव्यूडीन जैसी कुछ दवाइयां हैं, जो इसके प्रभाव के रफ्तार को कम करती हैं। लेकिन, ये इतनी महंगी हैं कि आम आदमी की पहुंच से बाहर हैं। अगर हम सिर्फ एजेडटी दवा की ही बात करें तो यदि एचआइवी से संक्रमित व्यक्ति इसका एक साल तक सेवन करता है, तो उसे साल भर के कोर्स के लिए एक से डेढ. लाखरुपये तक देना होगा। इन दवाओं के अलावा न्यूमोसिस्टीस कारनाई, साइटोमेगालो वायरस माइकोबैक्टीरियम, टोसोप्लाज्मा दवा उपलब्ध है। अब इम्यूनोमोडुलेटर प्रक्रिया का भी इस्तेमाल किया जाने लगा है। साथ ही, चिकित्सा वैज्ञानिक एड्स के वैक्सीन को विकसित करने पर काम कर रहे हैं। हालांकि, यह अभी प्रयोग के दौर से गुजर रहा है और इसे बाजार में आने में कई वर्ष लग जाएंगे। यह वैक्सीन भी इतना सस्ता नहीं होगा कि यह सभी के पहुंच में हो।
पूरी दुनिया में सभी स्थानीय सरकारें एचआईवी एड्स से बचे रहने के बारे में जागरूकता अभियान छेड़े हुए हैं। सभी सरकारें, स्वयंसेवी संस्थाए, सामाजिक कार्यकर्ता और स्वयंसेवक आम लोगों को यह बताने में अपनी पूरी ताकत लगा रहे हैं कि यह बीमारी छुआछूत से नहीं फैलती और इससे पीड़ितों के साथ सद्भावना से पेश आना चाहिए। लेकिन इसके ठीक उलट लोग एड्स से पीड़ित व्यक्ति को घृणा से देखते हैं और उससे दूरी बना लेते हैं। एचआईवी से संक्रमित व्यक्ति का राज खुलने पर उसके माथे पर कलंक का टीका लग जाता है। यह कलंक इस बीमारी से भी बड़ा होता है और पीड़ित को घोर निराशा का जीवन जीते हुए अपने मूलभूत अधिकारों और मौत के अंतिम क्षण तक एक अच्छी जिंदगी जीने से वंचित होना पड़ता है। अब वक्त आ गया है कि हम सभी एचआईवी एड्स को कलंक के रूप में प्रचारित करने की अपनी सोच और आचरण में बदलाव लाने के लिए काम करें । हमें एचआईवी एड्स से जुडी हर चर्चा, प्रतिबंधात्मक उपाय और शोध का कार्य करते रहने के दौरान इससे जुड़े कलंक को खत्म करने के मुद्दे को भी शामिल करना चाहिए।

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