Monday, 9 October 2017

कूड़े का प्रबंधन और हमारी आदतें

सुनीता नारायण, पर्यावरणविद व महानिदेशक, सीएसई
हर दिन आती नई-नई खबरों के बीच गाजीपुर हादसे को  चंद रोज में ही हम भूलने लगे हैं। दिल्ली-उत्तर प्रदेश सीमा पर स्थित इस इलाके में पिछले दिनों कूड़े के पहाड़ के ढहने से दो लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। इस घटना के बाद संबंधित अमला सक्रिय जरूर हुआ, लेकिन वह सक्रियता भी चंद रोज में ही शांत होती दिखने लगी है। यहां आशय उस दुर्भाग्यपूर्ण घटना को फिर से शब्द देने का नहीं, बल्कि उस घटना के बहाने देश में कचरा प्रबंधन की स्थिति पर ध्यान खींचना है।
हम यह तो बखूबी जानते हैं कि कचरा आज एक बड़ी समस्या बन चुका है। मगर यह शायद ही हम जानते हैं कि इसका समाधान सिर्फ उसके निस्तारण की तकनीक में नहीं, बल्कि घरेलू स्तर के पृथक्करण तंत्र से तकनीक को जोड़ने में छिपा है, ताकि लैंडफिल एरिया (भराव क्षेत्र) तक उसके पहुंचने की नौबत ही न आए। यानी उसे पहले ही साफ किया जा सके और किसी न किसी रूप में उसका दोबारा इस्तेमाल हो सके। अगर ऐसा नहीं किया गया, तो ऊर्जा या अन्य दूसरे कामों के लिए कचरे का कोई मोल नहीं रह जाएगा। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि हमारी कचरा प्रबंधन प्रणाली इस मोर्चे पर निष्क्रिय-सी दिखाई देती है।
यह स्थानीय निकायों की जवाबदेही है कि वे शहरी ठोस कचरा (एमएसडब्ल्यू) कानून 2016 के अनुसार स्रोत पर ही कचरे को अलग-अलग करना सुनिश्चित करें। इसका अर्थ यह है कि लोगों को इसके लिए जागरूक किया जाए और फिर इस सूखे व गीले या सड़न योग्य या दोबारा इस्तेमाल होने वाले कचरे को नगर निकाय अलग-अलग जमा करके उनके उचित निस्तारण की व्यवस्था करे। असल में, कचरा प्रबंधन को लेकर एक आसान सा समाधान यही दिखता है कि उसे जमा करो और भराव क्षेत्र में डाल दो या फिर प्रोसेगिंग प्लांट (निपटान इकाई) के हवाले कर दो। मगर देश-दुनिया के अनुभव बताते हैं कि कचरे को अलग-अलग किए बिना निस्तारित किए जाने वाले कूड़े से तैयार ईंधन की गुणवत्ता खराब होती है और वह हमारे काम का नहीं रह जाता है। लिहाजा हमारे नगर निगमों को घर के स्तर पर ही कचरे को अलग-अलग करने की मुहिम चलानी चाहिए। 
इस मामले में गोवा की राजधानी पणजी एकमात्र ऐसा शहर है, जिसने इस व्यवस्था को सही मायने में जमीन पर उतारा है। वहां घरों से अलग-अलग दिन अलग-अलग कचरा जमा किया जाता है। इससे घरों में ही कचरे का पृथक्करण सुनिश्चित हो जाता है। इतना ही नहीं, वहां ऐसा न करने वाले नागरिकों पर जुर्माने की व्यवस्था तो है ही, कॉलोनी स्तर पर ही कचरे के निस्तारण की व्यवस्था भी की गई है। और सबसे खास बात यह कि होटल जैसे बड़े-बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के लिए बैग मार्किंग सिस्टम भी बनाया गया है, ताकि नियमों का उल्लंघन करने वाले प्रतिष्ठानों को पकड़ा जा सके और दंडित किया जा सके।
केरल के अलेप्पी में एक दूसरी व्यवस्था काम करती है। वहां म्युनिसिपल कॉरपोरेशन कचरा जमा नहीं करता, क्योंकि वहां ऐसी कोई जगह ही नहीं, जहां इसे फेंका जा सके। वहां के एकमात्र भराव क्षेत्र को नजदीकी गांव वालों ने बंद करा दिया है। साफ है, जब म्युनिसिपैलिटी कचरा जमा ही नहीं कर रहा, तो लोग इसका खुद प्रबंध कर रहे हैं। वे इसे अलग-अलग जमा करते हैं और फिर उससे जितनी खाद बना सकते हैं, बनाते हैं। यह खाद घरेलू बागवानी में काम आती है। रही बात नॉन-बायोडिग्रेडेबल (प्राकृतिक तरीके से न सड़ने वाला) कचरे की, तो इस मोर्चे पर सरकार सक्रिय है। ऐसे कचरों के निस्तारण के लिए वह पहले से ही व्यवस्थित अनौपचारिक वेस्ट-रिसाइकिलिंग क्षेत्रों की मदद लेती है। इस व्यवस्था को अपनाकर म्युनिसिपैलिटी ने कचरे के भंडारण या उसकी ढुलाई आदि पर होने वाला अपना खर्च भी बचा लिया है।
यह कचरा प्रबंधन का एक पहलू है। इसका दूसरा पहलू यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि ऐसे कूडे़ के लिए कहीं कोई जगह ही न छोड़ी जाए, जिसे छांटकर अलग न किया गया हो। मतलब साफ है कि शहरों में लैंडफिल एरिया का प्रबंधन सख्ती से किया जाए। एमएसडब्ल्यू कानून 2015 में कहा गया है कि लैंडफिल एरिया का इस्तेमाल सिर्फ ऐसे कचरे के लिए होना चाहिए, जो दोबारा उपयोग लायक न हो, किसी दूसरे काम में इस्तेमाल न आ सके, जो ज्वलनशील या रिएक्टिव न हो। सवाल यह है कि इसे लागू कैसे किया जाए? फिलहाल नगर निगम या नगर पालिकाएं कचरा प्रबंधन को लेकर जो अनुबंध करती हैं, उसमें अधिक से अधिक मात्रा में कचरे को भराव क्षेत्र तक लाने को प्रोत्साहित किया जाता है। चूंकि ठेकेदार को कचरे की मात्रा के अनुसार ही रकम अदा की जाती है, यानी अधिक से अधिक कचरा व उसी अनुपात में ठेकेदारों का आर्थिक लाभ। इतना ही नहीं, इन निकायों को कचरे को फिर से इस्तेमाल के लायक बनाने की बजाय उसे जमा करना, ढुलाई करना और फिर भराव क्षेत्र में फेंक देना कहीं ज्यादा आसान लगता है।

इस सोच को बदलने के लिए जरूरी है कि लैंडफिल टैक्स लगाया जाए। अनुबंध इस तरह के हों कि कचरे के लिए नगरपालिका कोई भुगतान न करे, बल्कि ठेकेदारों से इसके लिए रकम वसूली जाए। यह व्यवस्था कचरा निस्तारण इकाइयों को भी आर्थिक लाभ पहुंचाएगी और सुनिश्चित करेगी कि भराव क्षेत्र तक कम से कम कचरा पहुंचे। यहां यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि कचरे के आधार पर घरों से भी टैक्स वसूला जाए और अगर वे घरेलू कचरा अलग-अलग नहीं करते, तो उनसे जुर्माना लिया जाए। हमें यह मानना ही होगा कि हर घर, हर प्रतिष्ठान, हर होटल कचरा पैदा करने का स्रोत है, इसलिए वह प्रदूषक  है। लिहाजा उन पर भी वह टैक्स लगना चाहिए, जो किसी अन्य प्रदूषक इकाई पर लगता है, वरना हमारे शहर कचरे के ढेर में तब्दील हो जाएंगे।
इस मामले में ‘निम्बी’ यानी नॉट इन माई बैकयार्ड (मेरे घर के पीछे नहीं) अभियान एक गेम-चेंजर साबित हो सकता है। अब गरीब व गांव-समाज के लोग अपने-अपने घरों के पीछे कचरा फेंकने का विरोध करने लगे हैं। वे अब ऐसी जगहों के आस-पास कतई नहीं रहना चाहते, जहां लैंडफिल एरिया हो। वाकई जब यह भूमि अपनी है, तो फिर इसे साफ रखने की जिम्मेदारी भी हमारी ही होनी चाहिए। क्या हम ऐसा करेंगे?

No comments:

Post a comment