Tuesday, 9 June 2015

जलवायु परिवर्तन और उपभोगवादी संस्कृति

ज्ञानेद्र रावत 
आजकल पर्यावरण क्षरण और जलवायु परिवर्तन का सवाल बहस का मुद्दा बना हुआ है कारण इसके चलते आज समूची दुनिया का अस्तित्व खतरे में है। पर्यावरणविद् इस बारे में समयस मय पर चेता रहे हैं और वैज्ञानिकों के शोध- अध्ययनों ने इस तथ्य को साबित कर दिया है। सच यह है कि जीवनदायिनी प्रकृति और उसके द्वारा प्रदत्त प्राकृतिक संसाधनों के बेतहाशा उपयोग और भौतिक सुख सुविधाओं की चाहत की अंधी दौड़ के चलते आज न केवल प्रदूषण बड़ा है बल्कि अंधाधुंध प्रदूषण से जलवायु में बदलाव आने से धरती तप रही है। यूएन की अंतर सरकारी पैनल की रिपोर्ट के अनुसार 2080 तक 3.2 अरब लोग पानी की तंगी से, 60 करोड़ लोग भोजन व तटीय इलाकों के 60 लाख लोग बाढ़ की समस्या से जूझेंगे। हालात की भयावहता की ओर इशारा करते हुए कोलम्बिया यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक स्टीफन मोर्स का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव मलेरिया, लू आदि बीमारियों के वितरण और संचरण में प्रभाव लाने वाला साबित होगा और ये पूरे

साल फैलेंगी। पहाड़ों पर ठंड के बावजूद भी मलेरिया फैलेगा। शहरों में आवासीय व जनसंख्या की समस्या विकराल होगी, दैनिक सुविधाएं उपलब्ध कराने में प्रशासन को दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा और खासकर विकासशील देशों में उच्च घनत्व वाली आबादी के बीच एचआईवी, तपेदिक, श्वास रोग व यौन रोगों में वृद्धि होगी। निष्कर्ष यह कि ग्लोबल वार्मिंग की मार से क्या शहर-गांव, क्या घनाढ्य या शहरी मध्य वर्ग, निम्न वर्ग या फिर प्राकृतिक संसाधनों पर सदियों से आश्रित आदिवासी-कमजोर वर्ग कोई भी नहीं बचेगा और बिजली-पानी के लिए त्राहि-त्राहि करते लोग संक्रामक बीमारियों से मौत के मुंह में जाने को विवश होंगे। वैश्विक तापमान के बारे में नासा के अध्ययन में यह खुलासा हुआ है कि बीते 30 सालों में धरती का तापमान 0.2 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है। यदि इसमें एक डिग्री का इजाफा हो जाता है तो यह पिछले 10 लाख साल के अधिकतम तापमान के बराबर हो जाएगा। रूटगर्स यूनिवर्सिटी के प्रख्यात मौसम विज्ञानी एलेन रोबॉक कहते हैं कि यदि आने वाले समय में ग्लोबल वार्मिंग दो-तीन डिग्री और बढ़ जाती है तो धरती की तस्वीर ही बदल जाएगी। वैज्ञानिकों के अनुसार 21 वीं सदी बीतते-बीतते धरती का औसत तापमान 1.1 से 6.4 डिग्री सेन्टीग्रेड तक बढ़ जाएगा। भारत में बंगाल की खाड़ी व उसके आस- पास यह वृद्धि 2 डिग्री और हिमालयी क्षेत्र में यह 4 डिग्री तक होगी जो समूची सभ्यता को तहस-नहस कर देगी। देखा जाए तो मौजूदा खतरे के लिए पश्चिमी या विकसित शक्तिशाली राष्ट्रों के साथसाथ् ा हम भी उतने ही दोषी हैं जितने अमेरिका, चीन, रूस और जापान।भारत विश्व में सबसे कम प्रदूषण करने वाला देश है और भारत की हिस्सेदारी विश्व कार्बन प्रदूषण में मात्र चार फीसदी ही हैकहने मात्र से हमारी जिम्मेवारी कम तो नहीं हो जाती। जबकि सीएफसी रसायनों का प्रयोग देश में आजादी से 20 साल पहले ही शुरू हो गया था और फिर 1950 के बाद इसमें आई तेजी में भी भारत का योगदान कम नहीं है। फिर भी हमारी सरकार विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) और अर्थव्यवस्था की बेलगाम तेज रμतार पर निसार है। दुनिया के 70 देशों में पर्यावरणीय लोकतंत्र सूचकांक के मामले में भारत का स्थान 24वां है। जबकि लिथुआनिया इस सूचकांक में शीर्ष स्थान पर रहा। बीते दिनों वॉशिंगटन के वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट और एक्सेस इनीशिएटिव द्वारा जारी दुनिया के शीर्ष 10 देशों में लिथुआनिया के बाद लातविया, रूस, अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका, ब्रिटेन, हंगरी, बुल्गारिया, पनामा और कोलंबिया का नाम सूची में है। इस तरह का आकलन दुनिया में पर्यावरण सतर्कता को लेकर 70 देशों में पहली बार किया गया है। असलियत में यह सूचकांक ऐसा शक्तिशाली आधार है जो सरकारों को पर्यावरण के मामले में ज्यादा पारदर्शी बनाने और आम नागरिकों को ज्यादा अधिकारों की वकालत करने में मदद करेगा। इसमें दो राय नहीं कि यदि हमें पर्यावरण सुधारना है, वायुमंडल को प्रदूषण से बचाना है तो हमें संयम बरतना होगा। वह संयम भोग की मर्यादा का हो, नीति के पालन का होना चाहिए, तृष्णा पर अंकुश का होना चाहिए, प्राकृतिक संसाधन यथा मिट्टी, जल, खनिज, वनस्पति आदि के उपयोग में होना चाहिए, तभी विश्व में शांति और स्थायित्व संभव है अन्यथा नहीं। यह सही है कि ग्लोबल वार्मिंग अब दरवाजे पर खड़ी नहीं है, वह घर के अंदर आ चुकी है और अब उससे आंखें नहीं मूंदी जा सकती हैं। जहां तक विश्व परिदृश्य पर ग्लोबल वार्मिंग से निपटने का सवाल है, यह उतना आसान नहीं है जितना समझा जाता है क्योंकि औद्योगिक क्रांति की शुरुआत के बाद बीसवीं सदी के अंत में बहुतेरे ऐसे देश भी औद्योगिक विकास की अंधी दौड़ में शामिल हुए जो पहले धीमी रतार से इस ओर बढ़ने की चेष्टा कर रहे थे। नतीजतन समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया। इसका यदि कोई कारगर समाधान है तो वह है विकास के किफायती रास्तों की खोज, जिसका धरती और वायुमंडल पर बोझ न पड़े। यह सच है कि यह काम इतना आसान और आनन-फानन में किया जाने वाला नहीं है। इसमें दो राय नहीं कि विभिन्न क्षेत्रों में अमरीका ने ही सबसे तेजी से औद्योगिक विकास किया जिसके बलबूते ही वह विश्व महाशक्ति के रूप में उभर कर सामने आया। इसके बावजूद पर्यावरण रक्षा की पहल में हिस्सेदारी से बचने का प्रयास उसके गैर जिम्मेदाराना रवैये का ही सबूत है। भले कार्बन डाईआॅक्साइड गैस के उत्सर्जन में भारत का योगदान 1.1 अरब टन ही क्यों न हो लेकिन यह तो सच है कि ग्लोबल वार्मिंग का असर तो हम पर भी पड़ेगा। वह बात दीगर है कि वह हमारी जमीन से उठी हो या फिर अमेरिका या चीन से। इसलिए अब जरूरत इस बात की है कि भारतीय नेतृत्व अपना यह तर्क बदले कि पहले पश्चिमी देश अपना उत्सर्जन कम करें फिर हम करेंगे। बेहतर यही होगा कि हम अपनी ओर से ऐसी पहल करें, जो विकसित देशों के लिए भी अनुकरणीय हो। यथार्थ में उपभोगवाद और सुविधावाद ने पर्यावरण की समस्या को और जटिल बना दिया है। इस मनोवृत्ति पर नियंत्रण परमावश्यक है। आज व्यक्ति, समाज और पदार्थ के चारों ओर अर्थ व पदार्थ परिक्रमा कर रहे हैं। इसलिए आज मानव जाति के अस्तित्व की रक्षा और इस भूमंडल को संभाव्य खतरों से बचाने के लिए जरूरी है कि हम सभी संयम प्रधान जीवनशैली का अनुसरण और संकल्प करें। आज एक दूसरे पर दोष मढ़ने, आरोप-प्रत्यारोप से कुछ होने वाला नहीं। खर्चीला र्इंधन जलाने वाला विकास का तरीका लंबे समय के लिए न तो उचित है, न उपयोगी ही। कारण अब धरती के पास इतना र्इंधन ही नहीं बचा है। यह सही है कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में आज उठाए गए कदम लगभग एक दशक बाद अपना सकारात्मक प्रभाव दिखाना आरंभ करेंगे। इसलिए जरूरी है कि समस्या के भयावह रूप धारण करने से पहले सामूहिक प्रयास किए जाएं। सरकार कुछ करे या न करे लेकिन अब समय आ गया है कि हम कुछ करें। हम सबसे पहले अपनी जीवन शैली बदलें और अधिक से अधिक पेड़ लगाएं जिससे र्इंधन के लिए उनके बीज, पत्ते, तने काम आएंगे और हम धरती के अंदर गड़े कार्बन को वहीं रखकर वातावरण को बचा सकेंगे। तभी धरती बचेगी। इतना तो हम कर ही सकते हैं।

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