Friday, 4 July 2014

इसरो की कारोबारी छलांग

 इसरो की ऐतिहासिक सफलता 
दैनिक जागरण 
शशांक द्विवेदी 
अंतरिक्ष के क्षेत्र में इतिहास रचते हुए भारत ने पीएसएलवी-सी23 राकेट जरिए चार देशों के पांच उपग्रहों का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण किया और ये उपग्रह कक्षा में स्थापित हो गए। 44 मीटर ऊंचे, 230 टन वजनी और करीब 100 करोड़ रुपए की लागत वाले पीएसएलवी सी-23 ने पांच विदेशी उपग्रहों को अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया। इनमें फ्रांस का 714 किलोग्राम भार वाला स्पॉट-7 प्रमुख है.इसके अलावा पीएसएलवी सी-23 ने जर्मनी के 14 किलो भार वाले एआईएसएटी, कनाडा के 15-15 किलो भार वाले एनएलएस7.1 (सीएएन-एक्स4) और एनएलएस7.2 (सीएएन-एक्स5) और सिंगापुर के सात किलो वजन वाले वीईएलओएक्स-1 उपग्रह को भी अंतरिक्ष में भेजा गया।
प्रधानमंत्री ने इसे ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि विदेशी उपग्रहों का यह सफल प्रक्षेपण ‘भारत की अंतरिक्ष क्षमता की वैश्विक अभिपुष्टि’ है। वास्तव में ये सफलता कई मायनों में बहुत खास है क्योंकि एक समय था जब भारत अपने उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए दूसरे देशों पर निर्भर था और आज भारत विदेशी उपग्रहों के प्रक्षेपण से अरबों डालर की विदेशी मुद्रा अर्जित कर रहा है । जिससे भारत को वाणिज्यिक फायदा हो रहा है । इसरो के कम प्रक्षेपण लगत की वजह से दूसरे देश भारत की तरफ लगातार आकर्षित हो रहें है । इसरो ने अब तक 19 देशों के 40 उपग्रहों का प्रक्षेपण किया है जिससे देश के पास काफी विदेशी मुद्रा आई है। चाँद और मंगल अभियान सहित इसरो अपने 100 से ज्यादा अंतरिक्ष अभियान पूरे करके इतिहास रच चुका है ।
19 अप्रैल 1975 में स्वदेश निर्मित उपग्रह ‘आर्यभट्ट’ के प्रक्षेपण के साथ अपने अंतरिक्ष सफर की शुरूआत  करने वाले इसरो की यह सफलता भारत की अंतरिक्ष में बढ़ते वर्चस्व की तरफ इशारा करती है । इससे  दूरसंवेदी उपग्रहों के निर्माण व संचालन में वाणिज्यिक रूप से भी फायदा पहुंच रहा है । ये सफलता इसलिए खास है क्योंकि भारतीय प्रक्षेपण राकेटों की विकास लागत ऐसे ही विदेशी  प्रक्षेपण राकेटों की विकास लागत का एक-तिहाई है । 
यह सफलता अंतरिक्ष जगत के दो वैश्विक प्रतिस्पर्धियों के बीच सहयोग की मिसाल भी बनेगी। भारतीय कंपनी एंट्रिक्स कॉरपोरेशन एवं फ्रांस की कंपनी एस्ट्रियम एसएएस विश्व बाजार में उपग्रहों से ली गई सुदूर संवेदी तस्वीरें भेजने के मामले में एक-दूसरे की प्रतिस्पर्धी हैं। स्पॉट एवं भारतीय सुदूर संवेदीउपग्रह धरती के छायाचित्र लेने वाले दो मशहूर उपग्रह हैं। इसके बाद भी एक भारतीय रॉकेट से उसके प्रतिस्पर्धी का उपग्रह स्पॉट-7  लांच किया जाना सुखद संकेत है । अमेरिका की फ्यूट्रान कॉरपोरेशन की एक शोध रिपोर्ट भी बताती है कि अंतरिक्ष जगत के छोटे खिलाडियों के बीच इस तरह का अंतरराष्ट्रीय सहयोग रणनीतिक तौर पर भी सराहनीय है। वास्तव में इस क्षेत्र में किसी के साथसहयोग या भागीदारी सभी पक्षों के लिए लाभदायक स्थिति है। इससे बड़े पैमाने पर लगने वाले संसाधनों का बंटवारा हो जाता है। खासतौर पर इसमें होने वाले भारी खर्च का। यह भारतीय अंतरिक्ष उद्योग की वाणिज्यिक प्रतिस्पर्धा की श्रेष्ठता का गवाह है ।
वैज्ञानिकों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सार्क देशों के लिए एक सार्क उपग्रह लॉन्च करने का आह्वाहन काफी महत्वपूर्ण है । उन्होंने कहा कि इस तरह के उपग्रह से  भारत के पड़ोसी देशों को आधुनिक तकनीकी का लाभ मिलेगा और यह उपग्रह भारत की तरफ से पड़ोसी देशों को तोहफा होगा । ताकि दूरस्थ शिक्षा, टेलिमेडिसिन, और कृषि संबंधी जानकारी जैसी सुविधाएं उन्हें मिल पाएं । ऐसे तकनीकी तोहफे से सार्क देशों के साथ भारत के सम्बंध भी मजबूत होंगे ।
उपग्रह के प्रक्षेपण में भारत कारोबारी छलांग पहले ही लगा चुका है, 23 अप्रैल 2007 को भारत के उपग्रहीय प्रक्षेपण यान ने इटली के खगोल उपग्रह एंजिल का सफलता पूर्वक प्रक्षेपण किया। यह पहला सफल कारोबारी प्रक्षेपण था जिससे भारत दुनिया के पांच देशों अमेरिका, रूस, फ्रांस और चीन के विशिष्ट क्लब में शामिल हो गया था। इन प्रक्षेपणों के द्वारा भारत व्यवसायिक दृष्टिकोण से विदेशी उपग्रहों को भी प्रक्षेपित करने वाली चुनींदा सूची में शामिल हो चुका है।  पिछले साल 5 नवंबर 2013 को भारत ने अंतरिक्ष के क्षेत्र में इतिहास रचते हुए  अपने मंगल मिशन को सफलतापूर्वक अंजाम दिया और पीएसएलवी सी25  रॉकेट  के माध्यम से मार्स आर्बिटर यान को अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित कर दिया था । यह देश के लिए बहुत बड़ी कामयाबी है । इस सफलता के साथ ही भारत विश्व के उन चार देशों में शामिल हो गया जिन्होंने मंगल पर सफलता पूर्वक अपने यान भेजे है । भारत की अंतरिक्ष एजेंसी इसरो अमरीका, रूस और और यूरोप के कुछ देश (संयुक्त रूप से) यूरोपीय यूनियन की अंतरिक्ष एजेंसी के बाद चैथी ऐसी एजेंसी बन गयी जिसने इतनी बड़ी कामयाबी हासिल की है । चीन और जापान इस कोशिश में अब तक कामयाब नहीं हो सके हैं। रूस भी अपनी कई असफल कोशिशों के बाद इस मिशन में सफल हो पाया है। अब तक मंगल को जानने के लिए शुरू किए गए दो तिहाई अभियान नाकाम साबित हुए हैं। 22 अक्टूबर 2008 मंे मून मिशन की सफलता के बाद इसरों का लोहा पूरी दुनिया मान चुकी है। चांद पर पानी की खोज का श्रेय भी चंद्रयान 1 को ही मिला। भविष्य में इसरों उन सभी ताकतों को और भी कडी टक्कर देगा जो साधनों की बहुलता के चलते प्रगति कर रहा है, भारत के पास प्रतिभाओं की बहुलता है।
इसरों अध्यक्ष के अनुसार भारत की अंतरिक्ष योजना भविष्य में मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशन भेजने की है। लेकिन इस तरह के अभियान की सफलता सुनिश्चित करने के लिए अभी बहुत सारे परिक्षण किए जाने हैं। भारत वर्ष 2016 में नासा के चंद्र मिशन का हिस्सा बन सकता है और इसरों चंद्रमा के आगे के अध्य्यन के लिए अमेरिकी जेट प्रणोदन प्रयोगशाला से साझेदारी भी कर सकता है। देश मंे आगामी चंद्र मिशन चंद्रयान 2 के सम्बंध में कार्य प्रगति पर है। चंद्रयान 2 के संभवता 2015 में प्रक्षेपण की संभावना है। 
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) और रूसी अंतरिक्ष एजेंसी रोस्कॉसमॉस के चंद्रमा के लिए संयुक्त मानव रहित इसरो अभियान चंद्रयान-2 मिशन रूस के नीतिगत निर्णय की प्रतीक्षा में अटक गया है। चीन के साथ साझा मिशन विफल हो जाने के मद्देनजर रूस अपने अंतरग्रही मिशनों की समीक्षा कर रहा है।इस पर सरकार को जल्दी फैसले के लिए रूस पर दबाव बनाना पड़ेगा । चंद्रयान-2 मिशन 2015 में प्रस्तावित हैं तथा इसे भू-समकालिक उपग्रह प्रक्षेपण यान (जीएसएलवी) एम के 2 से प्रक्षेपित किया जाएगा। 
1969 में प्रसिद्ध वैज्ञानिक विक्रम साराभाई के निर्देशन मंे राष्टीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन   का गठन हुआ था। तब से अब तक चांद पर अंतरिक्ष यान भेजने की परिकल्पना तो साकार हुई। अब हम चांद पर ही नहीं बल्कि मंगल पर भी पहुँच चुके है । प्रक्षेपित उपग्रहों से प्रदान सूचनाओं के आधार पर हम अब हम संचार, मौसम संबधित जानकारी, शिक्षा के क्षेत्र में, चिकित्सा के क्षेत्र में टेली मेडिसिन, आपदा प्रबंधन एवं कृषि के क्षेत्र में फसल अनुमान, भूमिगत जल के स्त्रोतों की खोज, संभावित मत्सय क्षेत्र की खोज के साथ साथ पर्यावरण पर निगाह रख रहे हंै।  भारत ने अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में जिस तरह कम संसाधनों और कम बजट में न सिर्फ अपने आप को जीवित रखा है बल्कि बेहतरीन प्रर्दशन भी किया है। 
भविष्य में अंतरिक्ष में प्रतिस्पर्धा बढेगी । भारत के पास कुछ बढत पहले से है, इसमें और प्रगति करके इसका बड़े पैमाने पर वाणिज्यिक उपयोग संभव है । कुछ साल पहले तक फ्रांस की एरियन स्पेश कंपनी की मदद से भारत अपने उपग्रह छोड़ता था, पर अब वह ग्राहक के बजाए साझीदार की भूमिका में पहुंच गया है । यदि इसी प्रकार भारत अंतरिक्ष क्षेत्र में सफलता प्राप्त करता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब हमारे यान अंतरिक्ष यात्रियों को चांद, मंगल या अन्य ग्रहों की सैर करा सकेंगे। भारत अंतरिक्ष विज्ञान में नई सफलताएं हासिल कर विकास को अधिक गति दे सकता है । 

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