Wednesday, 21 May 2014

कब पूरा होगा ऑनलाइन वोटिंग का सपना ?

दैनिक जागरण 
शशांक द्विवेदी 
वर्तमान लोकसभा चुनाव में करोड़ों लोग अपने अपने पैतृक घर से दूर काम-धंधे,रोजगार ,नौकरी की वजह से देश के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में और विदेशों में रहने की वजह से वोट नहीं डाल पाए । जबकि इन  करोड़ों लोगों की दिलचस्पी अपने देश ,प्रदेश ,शहर की राजनीति में रहती है । लेकिन अपने पक्ष और पार्टी को वोट देकर समर्थन न कर पाने का मलाल इन्हें जरुर रहता है । चुनाव आयोग के इतने सार्थक और सकारात्मक प्रयास के बावजूद पूरे देश में औसत वोटिंग 60-65 फीसदी ही रहती है । इसका मतलब साफ़ है कि बाकी के 40 प्रतिशत लोग अपना कीमती वोट नहीं दे पातें । अनिवासी भारतीय हो या देश के भीतर ही विस्थापित इन 40 प्रतिशत लोगों के लिए चुनाव आयोग को क्या गंभीर नहीं होना चाहिए ? बिना ऑनलाइन वोटिंग के व्यवहारिक रूप से 100 प्रतिशत मतदान संभव नहीं है । चुनाव आयोग इन करोड़ों लोगों की समस्या को देखते हुए ऐसी व्यवस्था  करनी चाहिए कि वो घर बैठे अपना वोट दे सकें । मतलब आनलाइन वोटिंग के माध्यम से  बिना  बूथ पर गए बिना अपना वोट डाल सकें ।अप्रवासी भारतीय भी काफी  समय से ऑनलाइन वोटिंग की माँग कर रहें है । मगर उनके लिए भी अब तक सिर्फ ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन की ही सुविधा है, ऑनलाइन वोटिंग की सुविधा उपलब्ध नहीं कराई गई है। इसके लिए उन्हें पोलिंग बूथ पर पहुंचना अनिवार्य है। यही वजह है कि लाखों अप्रवासी भारतीय वोटिंग के अधिकार से वंचित रह जाते है ।
फिलहाल देश का युवा वर्ग मौजूदा राजनीतिक परिस्थियों को लेकर काफी जागरूक है, बावजूद इसके एक बड़ा हिस्सा पोलिंग बूथ तक नहीं पहुंचता। उनकी पहुंच सिर्फ सोशल नेटवर्किंग साइट्स तक ही रहती है। दरअसल बड़े शहरों में रहने वाला युवावर्ग मोबाइल, लैपटॉप और फोन के जरिए ही अपने सारे जरूरी काम निबटाना पसंद करता है। यही वजह है कि तकरीबन सभी प्राइवेट कंपनियां और सरकारी विभाग अपनी ऑनलाइन सेवाएं उपलब्ध कराने लगी हैं। मगर लोकसभा और विधान सभा चुनाव के सम्बंध में यह सुविधा अभी भी एक सपने की तरह है। पूरे देश के लिए ऑनलाइन वोटिंग का सपना फिलहाल आश्चर्यजनक या फिर असंभव सा लग सकता है लेकिन दृढ इच्छाशक्ति के साथ ऑनलाइन वोटिंग का सपना पूरा किया जा सकता है । दुनियाँ इक्कसवीं सदी में प्रवेश कर गई है और विज्ञान तकनीक ने बहुत तरक्की भी कर ली है इसलिए ऑनलाइन वोटिंग वोटिंग का सपना आगे आने वाले समय में पूरा होने की उम्मीद जरुर की जा सकती है ।
ऑनलाइन वोटिंग और उसकी चुनौतियाँ
इंटरनेट या मोबाइल से वोटिंग करने के लिए सबसे पहले वोटरों का रजिस्ट्रेशन किया जाएगा। उसी वक्त वोटर का फोटो को साथ रजिस्ट्रेशन किया जाएगा। जो भी मतदाता ई-वोटर के तौर पर रजिस्टर्ड होगा उसका नाम सामान्य मतदाता सूची से निकाल दिया जाएगा, अर्थात एक बार ई-वोटर के तौर पर रजिस्टर्ड होने के बाद वह मतदान केंद्र पर जाकर मतदान नहीं कर सकेगा। इसका सबसे बड़ा नुकसान यह होगा कि मतदान के वक्त मतदाता की पहचान नहीं हो पाएगी। दूसरे इंटरनेट के जरिए वोटिंग करते वक्त यह सुनिश्चित नहीं हो पाएगा कि वोटिंग के वक्त वोटर के पास उसे प्रभावित करने वाला कोई तत्व मौजूद न हो और यह संविधान की गुप्त मतदान की अवधारणा के विपरीत है।
मोबाइल के जरिए मतदान करने से बोगस वोटिंग की संभावना बढ़ जाएगी। अगर किसी ने कई लोगों के नाम पर मोबाइल वोटिंग का रजिस्ट्रेशन करवा लिया और मतदान के दिन उनका उपयोग किया तो इससे बोगस मतदान बढ़ेगा। दूसरे इंटरनेट वोटिंग के लिए यह जरूरी है कि जिस कंप्यूटर के मार्फत रजिस्ट्रेशन कराया गया है वोटिंग भी उसी कंप्यूटर से की जाए। यानी एक कंप्यूटर से एक ही वोटर मतदान कर सकेगा। ऐसे में अगर एक घर में छह वोटर  होंगे तो सभी के लिए अलग - अलग कंप्यूटर की जरूरत होगी। जिनके पास खुद के कंप्यूटर नहीं है उनके लिए ई - पोलिंग बूथ की व्यवस्था करनी पड़ेगी जो कि एक हास्यास्पद स्तिथि होगी क्योंकि जो वोटर ई पोलिंग बूथ पर जाकर मतदान कर सकता है वह सामान्य पोलिंग बूथ पर भी जा सकता है।
नेशनल दुनियाँ 
चुनाव आयोग ई वोटिंग की पहल कर भी चुका है लेकिन अभी तक यह योजना विधानसभा और लोकसभा चुनाव में लागू नहीं हो पायी । चुनाव आयोग के अनुसार गुजरात नगरपालिका में 2010 और 2011 में ई-वोटिंग के माध्यम से मतदान कराया गया था । लेकिन इसके बाद यह योजना बहुत आगे नहीं बढ़ पाई । ऑस्ट्रेलिया, नॉर्वे और कनाडा जैसे कुछ देशों में ऑनलाइन वोटिंग के प्रयोग शुरू भी हो चुके हैं। अमेरिका में भी ऑनलाइन वोटिंग की सुविधा की मांग की जा रही है। इससे चुनाव में युवाओं की हिस्सेदारी बढ़ेगी और मतदान का प्रतिशत भी बढ़ेगा । लेकिन इसके दुरुपयोग की आशंका भी है । विशेषज्ञों के अनुसार राजनीतिक पार्टियां हैकरों की मदद से इस सिस्टम का दुरुपयोग कर सकती हैं। ऑनलाइन वोटिंग से सम्बंधित और भी कई तकनीकी समस्याएं है जिनके माकूल समाधान के बिना फिलहाल ये संभव नहीं लगती ऐसे में बाकी सुविधाओं के साथ-साथ वोटिंग को भी ऑनलाइन की लिस्ट में आने में शायद कई दशकों का समय लग जाएगा।
कुछ समाधान

ऑनलाइन वोटिंग में वोटर की आइडेंटिफिकेशन के लिए  आधार कार्ड और एनपीआर के डेटा को प्रयोग करके उसे  ऑनलाइन लिंक किया जा सकता

है इससे आइडेंटिटी के फर्जीवाडा से काफी हद तक बचा जा सकता है । आधार केंद्र सरकार की ओर से हर नागरिक को जारी किया जाने वाला एक विशिष्ट पहचान संख्या है जो कि भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण द्वारा प्रदान की जाती है । इस पर 12 अंकों का उस नागरिक का एक यूनिक नंबर लिखा होता है। किसी भी काम जिसमें पहचान की जरूरत होती है, इस कार्ड का इस्तेमाल किया जा सकता ळें इससे  वेरिफिकेशन की प्रक्रिया भी आसान हो जाएगी। कहीं भी, कभी भी, किसी भी स्तर पर वैरिफिकेशन एक डेटा बेस के जरिये हो सकता है । जबकि नैशनल पॉपुलेशन रजिस्टर में देश के हर नागरिक की जानकारी दर्ज होती है। इसमें इंट्री पंचायत, जिला, राज्य या राष्ट्रीय स्तर पर की जाती है। इसमें रजिस्टर करने के बाद 18 साल से ऊपर के सभी लोगों को स्मार्ट नैशनल आइडेंटिटी दिया जाता है ।  सिस्टम ,आन लाइन हैकिंग और तकनीकी गडबडी दूर करने के लिए चुनाव आयोग देश के 543 लोकसभा  के विभिन्न केन्दों में अपनी तरफ से अपने ही केन्द्रों में  ऑनलाइन वोटिंग की सुविधा भी कर सकता है जिससे घर से दूर बैठे लोग अपनी लोकसभा या विधानसभा के लिए वोट कर सके दूसरी बात अगर चुनाव आयोग घर बैठे ऑनलाइन वोटिंग करवा पाने में फिलहाल असमर्थ है तो कम से कम वो ऐसी व्यवस्था तो कर ही सकता है कि मुंबई में काम करने वाला वहीं मुंबई में अपनी लोकसभा के लिए वोट डाल सके और ऐसे बूथों की व्यवस्था तो की ही जा सकती है । कुलमिलाकर शत प्रतिशत मतदान के लक्ष्य को पाने के लिए इस तरह के नवीन प्रयोग किये जा सकते है और किये भी जाने चाहिए ।  क्योंकि इन क़दमों से लोगों की चुनाव में भागीदारी और हिस्सेदारी बढेगी जिससे  लोकतंत्र मजबूत होगा ।

No comments:

Post a comment