Wednesday, 13 November 2013

कब संकट मुक्त होगी उच्च शिक्षा

हरिवंश चतुर्वेदी, निदेशक, बिमटेक
विश्वविद्यालयों की ग्लोबल रैंकिंग में जब हमारे विश्वविद्यालयों के नाम दिखाई नहीं देते, तो समूचा देश भारत की उच्च शिक्षा के बारे में आत्मग्लानि महसूस करता है। कभी-कभी इन ग्लोबल रैंकिंगों में आईआईटी या आईआईएम के नाम दिखाई देते हैं, तो हमें खुशी होती है कि कम से कम इंजीनियरिंग और प्रबंध शिक्षा में तो हमारी पहचान विश्वस्तरीय है। उच्च शिक्षा में हमारी शिखर संस्थाएं चमकती दिखाई देती हैं, लेकिन इस पिरामिड में धरातल के विश्वविद्यालय व कॉलेज बेरौनक होते जा रहे हैं। ज्यादातर युवकों को दाखिला देने वाले इन संस्थानों पर सवालिया निशान गहरे होते जा रहे हैं। देश में उच्च शिक्षा पाले वाले विधार्थियों में 58 प्रतिशत निजी क्षेत्र के अनुदानित या गैर-अनुदानित संस्थानों में पढ़ते हैं, जबकि 42 प्रतिशत सरकारी संस्थानों के विद्यार्थी हैं। ज्यादातर निजी कॉलेज राज्य विश्वविद्यालयों से संबद्ध होते हैं और इनमें प्रवेश, पाठ्यक्रम व परीक्षाएं इन्हीं विश्वविद्यालयों द्वारा संचालित होते हैं। देश की सरकारी  यूनिवर्सिटियों व कॉलेजों में पढ़ने वाले कुल 80 लाख विद्यार्थियों में से सिर्फ छह प्रतिशत केंद्र सरकार से पोषित संस्थानों में पढ़ते हैं। बाकी 94 प्रतिशत राज्यों के विश्वविद्यालयों या कॉलेजों में शिक्षा पाते हैं।
भारतीय अर्थव्यवस्था और समाज के रूपांतरण में उच्च शिक्षा के महत्व को कम करके नहीं आंका जा सकता। आने वाले दशकों में अगर हमें विश्व स्तर पर अमेरिका व चीन का मुकाबला करना है, तो उच्च शिक्षा में कुछ बुनियादी सुधार करने होंगे। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार, वर्ष 2020 तक 20 से 24 वर्ष के आयु वर्ग में भारत में 11.6 करोड़ और चीन में 9.4 करोड़ श्रमिक व कर्मचारी होंगे। वर्ष 2020 में भारत की औसत आयु 29 वर्ष होगी और 15 से 59 वर्ष के आयु वर्ग में हमारी 60 प्रतिशत आबादी होगी। अगर हम इस ‘डेमोग्राफिक-डिविडेंड’ को भुनाना चाहते हैं, तो निस्संदेह हमें भारत की उच्च शिक्षा की गुणवत्ता और सार्थकता को प्राथमिकता देनी होगी। सिर्फ केंद्रीय विश्वविद्यालयों व केंद्रीय संस्थानों को मजबूत बनाने से यह संभव नहीं होगा, हमें राज्यों के विश्वविद्यालयों व कॉलेजों की हालत भी सुधारनी पड़ेगी।
आज 316 राज्य विश्वविद्यालय और 13,024 अनुदानित कॉलेज जिस संकट का सामना कर रहे हैं, उसका मुख्य कारण है, उन्हें मिलने वाले वित्तीय अनुदानों का लगातार कम होते जाना। पिछली तीन पंचवर्षीय योजनाओं के दौरान जहां केंद्रीय विश्वविद्यालयों व संस्थानों को मिलने वाले वित्तीय अनुदान तेजी से बढ़े हैं, वहीं राज्य विश्वविद्यालयों को मिलने वाले अनुदान उस अनुपात में नहीं बढ़े। नौवीं पंचवर्षीय योजना और 11वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान केंद्रीय विश्वविद्यालयों को मिलने वाला वित्तीय अनुदान 2,272 करोड़ रुपये से बढ़कर 34,784 करोड़ रुपये हो गया, जो लगभग 15 गुना था। दूसरी ओर, राज्य विश्वविद्यालयों को मिलने वाला अनुदान 1,724 करोड़ रुपये से सिर्फ तीन गुना बढ़ा और 5,342 करोड़ रुपये ही हो पाया। केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है, ‘उच्च शिक्षा के लिए सरकारी सहायता में कमी, नतीजतन फीस बढ़ाने के उपाय और उच्च शिक्षा में निजी क्षेत्र की तीव्र बढ़ोतरी  उच्च शिक्षा की उपलब्धता, गुणवत्ता, समानता और कार्य कुशलता के लिए गंभीर समस्याएं पैदा कर रही है।’
इसके लिए राज्य सरकारें भी कम दोषी नहीं हैं। पूरे देश में राज्यों के सकल घरेलू उत्पाद का सिर्फ पांच प्रतिशत उच्च शिक्षा पर खर्च होता है। उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और झारखंड जैसे राज्यों का सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) भी कम है और उच्च शिक्षा पर प्रतिशत खर्च भी कम है। दूसरी ओर, तामिलनाडु, आंध्र प्रदेश, केरल, गोवा, त्रिपुरा जैसे राज्यों का प्रति विद्यार्थी खर्च और जीईआर, दोनों राष्ट्रीय औसत से बेहतर है। राज्यों के विश्वविद्यालय सिर्फ वित्तीय संकट का ही सामना नहीं कर रहे हैं, बल्कि राजनीतिक हस्तक्षेप, संबद्ध कॉलेज प्रणाली का बोझ, अकुशल प्रशासन, जवाबदेही के अभाव और निरंकुश नौकरशाही जैसी समस्याएं भी इन्हें निष्प्रभावी बना रही हैं।
संबद्ध कॉलेज प्रणाली वैसे तो ब्रिटिश शासन की ही देन है, लेकिन पिछले 30 वर्षों में इन कॉलेजों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई है। सन् 1975 के आसपास राज्य विश्वविद्यालयों में संबद्ध कॉलेजों की संख्या 50-75 के बीच होती थी। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अनुसार, आज देश में 20 ऐसे राज्य विश्वविद्यालय हैं, जहां पर संबद्ध कॉलेजों की संख्या 400 से 900 तक हैं। उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद में 901, पुणे यूनिवर्सिटी में 811 और राजस्थान यूनिवर्सिटी में 735 संबद्ध कॉलेज हैं। इनकी संख्या में बेतहाशा वृद्धि से हालांकि राज्य विश्वविद्यालयों की आय भी तेजी से बढ़ी है, किंतु इन विश्वविद्यालयों का ज्यादातर समय परीक्षाएं संचालित करने और परीक्षाफल घोषित करने में ही खर्च होता है। इससे शोध-अनुसंधान और शैक्षणिक गुणवत्ता सुधारने पर ध्यान देना इनके लिए मुश्किल होता जा रहा है।
यशपाल कमेटी और राष्ट्रीय ज्ञान आयोग ने संबद्ध कॉलेजों के बोझ से राज्य विश्वविद्यालयों को मुक्त कराने के लिए यह सुझाव दिया था कि अच्छे नतीजे दिखाने वाले कॉलेजों को ‘स्वशासी’ बना देना चाहिए। ये कॉलेज अपना पाठ्यक्रम और परीक्षाएं खुद संचालित करें। इस समय देश में 400 से अधिक स्वायत्त कॉलेज हैं। इनमें से कुछ सुप्रतिष्ठित कॉलेजों को तो विश्वविद्यालय का दर्जा भी दिया जा सकता है। प्रेसीडेंसी कॉलेज, कलकत्ता इसका अच्छा उदाहरण है, जिसे अब राज्य विश्वविद्यालय बना दिया गया है। राज्य विश्वविद्यालयों और उनसे संबद्ध कॉलेजों को मौजूदा खस्ता हाल से उबारने के लिए हाल ही में मानव संसाधन मंत्रालय ने राष्ट्रीय उच्च शिक्षा अभियान (रूसा) नामक नई योजना शुरू की है। रूसा के अंतर्गत 12वीं और 13वीं पंचवर्षीय योजनाओं के दौरान 98,138 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे, जिसमें केंद्र सरकार का हिस्सा 69,675 करोड़ रुपये होगा और बाकी राज्य सरकारों को देना होगा। शुरू में रूसा के तहत 316 राज्य विश्वविद्यालयों और 13,024 मौजूदा कॉलेजों को लाया जाएगा।
अगले नौ वर्षों में इसके  तहत राज्य सरकारों को 278 नए विश्वविद्यालयों और 388 नए कॉलेजों की स्थापना, 266 कॉलेजों को मॉडल कॉलेज बनाने के लिए मदद दी जाएगी। मंत्रालय का कहना है कि रूसा के अंतर्गत राज्य विश्वविद्यालयों को वित्तीय सहायता देने की एक नई प्रणाली का इस्तेमाल किया जाएगा। अच्छे नतीजे दिखाने वाले विश्वविद्यालयों व कॉलेजों को वित्तीय मदद दी जाएगी। जहां कुछ शिक्षाविद और राज्य सरकारें इस घोषणा से उत्साहित हैं, वहीं कुछ लोगों का कहना है कि इसकी असली परीक्षा केंद्र व राज्य सरकारों के स्तर पर प्रभावी क्रियान्वयन में होगी। उम्मीद की जानी चाहिए कि रूसा का हश्र शिक्षा के अधिकार (आरटीई), सर्वशिक्षा अभियान और पूर्ण साक्षरता अभियान की तरह निराशाजनक न हो।

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