Sunday, 18 August 2013

वैज्ञानिक प्रगति कि ओर अग्रसर भारत

प्रमोद जोशी 
भारत ने अपने नेवीगेशन सैटेलाइट का प्रक्षेपण करके विज्ञान और तकनीक के मामले में जितना लम्बा कदम रखा है उतना हमने महसूस नहीं किया। इस नेटवर्क को पूरा करने के लिए अभी छह और सैटेलाइट भेजे जाएंगे। यह काम 2015 तक पूरा होगा। हम स्पेस साइंस की बिग लीग में शामिल हो चुके हैं। अमेरिका, रूस, यूरोपीय यूनियन और चीन के साथ। जापान का क्वाज़ी ज़ेनिट सिस्टम भी इस साल पूरी तरह स्थापित हो जाएगा। ग्लोबल पोज़ीशनिंग सिस्टम का इस्तेमाल हवाई और समुद्री यात्राओं के अलावा सुदूर इलाकों से सम्पर्क रखने में होता है। काफी ज़रूरत सेना को होती है। खासतौर से मिसाइल प्रणालियों के वास्ते।  

इस साल बजट अभिभाषण में राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने कहा था कि भारत इस साल अपना उपग्रह मंगल की ओर भेजेगा। केवल मंगलयान ही नहीं, चन्द्रयान-2 कार्यक्रम तैयार है। सन 2016 में पहली बार दो भारतीय अंतरिक्ष यात्री स्वदेशी यान में बैठकर पृथ्वी की परिक्रमा करेंगे। सन 2015 या 16 में हमारा आदित्य-1 प्रोब सूर्य की ओर रवाना होगा। सन 2020 तक हम चन्द्रमा पर अपना यात्री भेजना चाहते हैं। किसी चीनी यात्री के चन्द्रमा पहुँचने के पाँच साल पहले। इस बीच हमें अपने क्रायोजेनिक इंजन की सफलता का इंतजार है, जिसकी वजह से जीएसएलवी कार्यक्रम ठहरा हुआ है। देश का हाइपरसोनिक स्पेसक्राफ्ट किसी भी समय सामने आ सकता है। अगले दशक के लिए न्यूक्लियर इनर्जी का महत्वाकांक्षी कार्यक्रम तैयार है।

नए राजमार्गों और बुलेट ट्रेनों का दौर भी शुरू होने वाला है। देश के छह मार्गों पर हाईस्पीड यानी 300 किलोमीटर की गति से ज्यादा तेजी से रेलगाड़ियाँ चलाने की स्टडी चल रही है। रेल विकास निगम के अंतर्गत हाई स्पीड रेल कॉरपोरेशन के नाम से एक नई कम्पनी बनाई गई है। मौजूदा रेल नेटवर्क की स्पीड 200 किलोमीटर या उससे ऊपर करने का प्रोजेक्ट आईआईटी, खड़गपुर के रेलवे रिसर्च सेंटर को सौंपा गया है। इसकी रिपोर्ट सन 2015 तक मिलेगी। अगले दस साल में देश के ज्यादातर बड़े शहरों में मेट्रो ट्रेन चलने लगेंगी। देश की ज्ञान-आधारित संस्थाओं को जानकारी उपलब्ध कराने के लिए हाईस्पीड नेशनल नॉलेज नेटवर्क काम करने लगा है। यह सूची लम्बी है।

सारी सफलताएं अपनी जगह हैं और उत्तराखंड में आई आपदा और हमारे वैज्ञानिक अधिष्ठान की विफलता अपनी जगह है। इससे हम इंकार नहीं कर सकते कि तमाम रिमोट सेंसिंग तकनीकें पास में होने के बावजूद मई के महीने में बस्तर में और अब झारखंड में नक्सली हमले का पता हम नहीं लगा पाए। और यह भी कि नक्सली समस्या के मूल में क्या है। बहरहाल नेवीगेशन सैटेलाइट के सफल प्रक्षेपण को प्रधानमंत्री ने मील का पत्थर करार दिया है। और यह भी कहा कि देश के सामाजिक-आर्थिक विकास में अंतरिक्ष कार्यक्रम की भूमिका लगातार बढ़ रही है। प्रधानमंत्री कुछ भी कहें, विज्ञान और तकनीक हमारे सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा नहीं है। उसे हम फैंटेसी में देखते हैं। हमारी फिल्मों का वैज्ञानिक मोटा चश्मा पहनने वाला गंजा इंसान, जो गायब करने वाली मशीन बनाता है या दुनिया को तबाह करने वाला फॉर्मूला। यह अंधविश्वास है। साइंस वह पद्धति है जो रास्ते बताती है। वह हमारे समाज में कहाँ है?

आधुनिक विज्ञान की क्रांति यूरोप में जिस दौर में हुई उसे एज ऑफ डिसकवरी कहते हैं। ज्ञान-विज्ञान आधारित इस क्रांति के साथ भी भारत का सम्पर्क एशिया के किसी दूसरे समाज के मुकाबले सबसे पहले हुआ। जगदीश चन्द्र बोसको आधुनिक भारत का पहला प्रतिष्ठित वैज्ञानिक मान सकते हैं। उन्हें भौतिकी, जीवविज्ञान, वनस्पति विज्ञान तथापुरातत्व का गहरा ज्ञान था। वे देश के पहले वैज्ञानिक थे जिन्होंने एक अमेरिकन पेटेंट प्राप्त किया। जगदीश चन्द्र बोसके साथ प्रफुल्ल चन्द्र राय भी हुए, जिन्होंने देश की पहली फार्मास्युटिकल कम्पनी बनाई। सन 1928 में सर सीवी रामन को जब नोबेल पुरस्कार मिला तो यूरोप और अमेरिका की सीमा पहली बार टूटी थी। सन 1945 में जब मुम्बई में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च की स्थापना हुई थी तब विचार यही था कि आधुनिक भारत विज्ञान और तकनीक के सहारे उसी तरह आगे बढ़ेगा जैसे यूरोप बढ़ा। पर ऐसा हुआ नहीं। अमेरिका और यूरोप की बात छोड़िए हम चीन से काफी पीछे चले गए हैं।

इंडियन साइंस एसोसिएशन सन 1914 से काम कर रही है। इस साल जनवरी में कोलकाता में राष्ट्रीय विज्ञान कांग्रेस के साथ इसका शताब्दि-वर्ष शुरू हुआ है। पिछले साल भुवनेश्वर में राष्ट्रीय विज्ञान कांग्रेस के उद्घाटन समारोह में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि हम विज्ञान और तकनीक में चीन से पिछड़ गए हैं। कोलकाता में राष्ट्रीय विज्ञान, तकनीक और नवोन्मेष की नई नीति की घोषणा भी की गई। इस नीति के तहत देश में इनोवेशन को बढ़ाने के तरीके खोजे जाएंगे। रिस्की आयडिया फंड बनाने की बात है। स्मॉल आयडिया, स्मॉल मनी का विचार है। कोलकाता में घोषित नीति का लक्ष्य है कि हम विज्ञान, तकनीक के विकास पर सकल घरेलू उत्पाद का दो फीसदी पैसा लगाएं। आज यह एक फीसदी भी नहीं है। हमारे मुकाबले चीन तकरीबन डेढ़ फीसदी कर्च करता है। चूंकि उसका जीडीपी हमारे मुकाबले कहीं ज्यादा है, इसलिए विज्ञान और तकनीक पर उसका खर्च हमारे खर्च के तीन गुने से भी ज्यादा है। भारत ने सन 2010 से 2020 के दशक को नवोन्मेष दशक घोषित किया है। नवोन्मेष के लिए जोखिम उठाने होते हैं, नए विचारों को बढ़ावा देना होता है। ऐसा वही समाज करता है जो भविष्य को देखता है।

हमने साइंस, टेक्नॉलजी और इनोवेशन को वह महत्व नहीं दिया जो उसे मिलना चाहिए। अमेरिकी तकनीकी शिक्षा संस्थान एमआईटी की तर्ज पर आईआईटी खड़गपुर की स्थापना करके हमने इस रास्ते पर भी सबसे पहले कदम बढ़ाए थे। पर जिस गति से इसका विस्तार होना चाहिए वह नहीं हो पाया। आज हमारे पास इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस है। सोलह आईआईटी हैं। तीस एनआईटी हैं। तीन हजार दूसरे इंजीनियरी कॉलेजों से पढ़कर करीब पाँच लाख इंजीनियर हर साल बाहर निकल रहे हैं। फिर भी नेशनल नॉलेज कमीशन के अनुसार हमें अभी 1500 नए विश्वविद्यालयों की ज़रूरत है। केवल विश्वविद्यालयों के खुलने से काम नहीं होता। शिक्षा की गुणवत्ता ज्यादा ज़रूरी है। तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि आधारभूत विज्ञान में बच्चों की दिलचस्पी घट रही है। वे कॉमर्स पढ़ना चाहते हैं। भला क्यों?

देखना होगा कि यूरोप और अमेरिका के समाज ने ऐसा क्या किया जो वे वैज्ञानिक प्रगति कर पाए। चीन ही नहीं जापान, ताइवान, हांगकांग, सिंगापुर और इस्राइल हमसे आगे हैं। अपनी समस्याओं को समझना और उनके समाधान खोजना वैज्ञानिकता है। उसी तरह जैसे दूसरे विश्वयुद्ध में पराजित जापान ने अपने पुनर्निर्माण के वक्त किया। भारत ने भी कुछ सफलताएं हासिल की हैं। हरित क्रांति, अंतरिक्ष कार्यक्रम, एटमी ऊर्जा कार्यक्रम, दुग्ध क्रांति, दूरसंचार और सॉफ्टवेयर उद्योग इनमें शामिल हैं। सफलता के बुनियादी आधार हैं आर्थिक प्रतियोगी व्यवस्था, विज्ञान, लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व, आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था, उपभोक्ता की चेतना और काम का माहौल। अमेरिकी प्रगति के पीछे है इनोवेशन। पिछले दो सौ साल में अमेरिका ने सारी दुनिया के विशेषज्ञों को अपने यहाँ बुलाया। यूरोप ने दुनिया को बड़े वैज्ञानिक दिए, पर उसके वैज्ञानिक भी अमेरिका गए। अलेक्जेंडर ग्राहम बैल, चार्ल्स स्टाइनमेट्ज़, व्लादिमिर ज्वोरीकिन, निकोला टेस्टा, अल्बर्ट आइंस्टीन और एर्निको फर्मी जैसे वैज्ञानिक अपने देश छोड़कर यहाँ आए। उस समाज ने मेरिट का सम्मान करने का रास्ता पकड़ा। दुनिया के आधे नोबेल पुरस्कार अमेरिका के पास हैं। वैज्ञानिकता पूरे समाज की विरासत होती है। सीवी रामन, रामानुजम या होमी भाभा जैसे कई नाम हमारे पास भी हैं। पर व्यक्तिगत उपलब्धियों के मुकाबले असली कसौटी पूरा समाज होता है। हम खुद को दुनिया का गुरु समझते हैं, पर हमें भी दूसरों से कुछ सीखना होगा।  


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