Saturday, 2 February 2013

होनहार होने की कसौटी

सतीश सिंह
अकादमिक फैक्टरियों से आजकल डॉक्टर, इंजीनियर और मैनेजर बाहर तो निकल रहे हैं, लेकिन गुणवत्ता की कसौटी पर खरे नहीं उतर पा रहे। चमत्कार तो दूर, वे अपना काम भी सुचारु तरीके से कर पाने में सक्षम नहीं हैं। जाहिर है, हमारी शिक्षा प्रणाली में कहीं न कहीं गड़बड़ी है। किताबी और व्यावहारिक ज्ञान के बीच संतुलन स्थापित करने में हमसे चूक हो रही है या फिर व्यक्ति विषेष की रुचि/अरुचि के अनुसार हम उन्हें शिक्षित नहीं कर पा रहे हैं। वस्तुत: विवेकहीनता की वजह से आज भी हम अंग्रेजों के जमाने से चली आ रही रटंत विद्या वाली शिक्षा की परिपाटी पर चल रहे हैं। अक्सर देखा जाता है कि कुछ छात्र सही वक्त पर मेहनत करके हमेशा जागरूक रहने वाले छात्रों से नौकरी की परीक्षा में बाजी मार लेते हैं। अकादमिक परीक्षा के दौरान कोई छात्र बीमार हो सकता है या उसकी पढ़ाई के प्रति अरुचि भी उत्पन्न हो सकती है। यहां जब जागो तभी सवेरा वाला फंडा काम करता है। जिस छात्र के मन में सफलता हासिल करने की चाहत जागृत हो जाती है, वह हर कक्षा में तृतीय श्रेणी से उत्तीर्ण होने के बावजूद अच्छी नौकरी पाने में सफल हो जाता है। नौकरी को यदि सफलता का पैमाना न मानें तो भी जीवन में कुछ करने के लिए संकल्पित छात्र आमतौर पर जीवन की नई ऊंचाइयां छूने में सफल हो जाता है। मूलत: बिहार के छपरा जिले के रहने वाले जर्नादन प्रसाद, रमेश कुमार और योगेंद्र प्रसाद ने सारण रिन्यूएबल प्राइवेट लिमिटेड के माध्यम से छोटे स्तर पर बिजली का उत्पादन कर उत्तरी बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश से जिस तरह अंधेरा दूर करने का अलख जगाया है, वह काबिले तारीफ है। ध्यान रहे इस कंपनी के तीनों प्रमोटरों का अकादमिक रिकॉर्ड एकदम साधारण रहा है। फिल्म थ्री इडियट तो आपको याद ही होगी। इसमें दिखाए गए फंडे को भी हम नकार नहीं सकते। जरुरी नहीं कि हर बच्चा इंजीनियर या डॉक्टर बने। आज दुनिया में करने के लिए इतने काम हैं कि आप किसी को मूर्ख नहीं मान सकते। यह आपके दृष्टिकोण पर निर्भर करता है कि आप किसे होनहार मानते हैं। अगर परंपरागत हिंदुस्तानी चश्मे से देखा जाए तो वाइल्ड लाइफ पर अनुसंधान करने वाला वैज्ञानिक आला दर्जे का बेवकूफ है, जबकि हकीकत यह है कि वह बेहद जहीन और समाज को हमेशा कुछ देने के लिए प्रतिबद्ध होता है। यह भी जरूरी नहीं कि हर विषय में हर छात्र की रुचि हो। महान वैज्ञानिक थॉमस अल्वा एडिसन की रुचि केवल भौतिक विज्ञान में थी। एल्बर्ट आइंस्टीन की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। समाज में ऐसे जीनियस लोगों के सैकड़ों उदाहरण बिखरे पड़े हैं। बीते दिनों उत्तर प्रदेश के बाढ़ग्रस्त इलाके में एक कारीगर ने 15 हजार रुपये की लागत से बेहतर माइलेज देने वाला एक कठौतीनुमा स्टीमर बनाया था। स्टीमर बनाने से पहले तक वह लोगों की नजरों में कमअक्ल और समाज के हाशिये पर रहने वाले तबके का सदस्य माना जाता था, लेकिन टीवी और अखबारों की सुर्खी बनने के बाद वह पल भर में गंवार से काबिल बन गया। होनहार कौन है, इसे तय करने के मानकों के बारे में हमारे समाज में शुरू से ही मतैक्य नहीं रहा है। बीते विविध कालखंडों से अलग वर्तमान में सत्ता के गलियारों में बैठे शिक्षाविद् स्कूल-कॉलेजों में अच्छे अंक लाने वाले बच्चों को जहीन मान रहे हैं। जो बच्चे बारहवीं तक लगातार अच्छे अंक लाकर नामचीन कॉलेजों में दाखिला लेने में सफल रहते हैं और फिर कॉलेज में अंकों की बाजीगरी में आगे निकलते हुए नौकरी के लिए आवेदन दाखिल करने लायक अर्हता अंक हासिल करने में सफल हो जाते हैं तो उन्हें होनहार मान लिया जाता है। उन्हें सामान्य बच्चों से बेहतर अवसर और सुविधा प्रदान की जाती है। इसी क्रम में विश्वविद्यालयों और उनसे जुड़े कॉलेजों में दाखिले की वर्तमान प्रक्रिया पर भी गाहे-बगाहे उंगली उठाई जाती रही है। इसका मूल कारण सभी बच्चों में अच्छे कॉलेजों में दाखिले की चाहत है। कोई भी इस चूहा-दौड़ में पीछे नहीं रहना चाहता है। इसमें बच्चों की कोई गलती नहीं है। मूलत: हमारी शिक्षा व्यवस्था और रोजगार सृजित करने वाले संस्थानों की सोच इस कदर संकुचित है कि वे कुएं के मेंढक बने हुए हैं और उससे बाहर निकलकर सोच ही नहीं पाते हैं। उनका मानना है कि जो बच्चा लगातार हर परीक्षा में अव्वल रहा है, सिर्फ उसी को अच्छे कॉलेज में दाखिला लेने का हक है। स्कूल-कॉलेजों में प्राप्त अच्छे अंकों को बच्चों की पढ़ाई के प्रति प्रतिबद्धता का परिचायक माना जाता है, लेकिन इसका अर्थ कभी भी यह नहीं है कि उस छात्र विशेष की अंकतालिका उसके मेधावी होने या न होने का भी प्रमाण है। किसी विषय में कम या ज्यादा अंक प्राप्त करने से किसी भी छात्र को मेधावी या मंदबुद्धि नहीं माना जा सकता। सबसे ज्यादा रोजगार सृजित करने में हमेशा से आगे रहने वाले बैंकिंग क्षेत्र में भी आजकल उन्हीं अभ्यर्थियों को योग्य माना जा रहा है जो हर कक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करते आए हैं, जबकि बैंक के कार्य के लिए प्रथम श्रेणी उम्मीदवार की कहीं जरूरत नहीं पड़ती। कारोबार बढ़ाने के लिए किसी डिग्री की नहीं, अक्ल की जरूरत होती है। कम पढ़ा-लिखा या खराब अकादमिक रिकॉर्ड वाला बैंककर्मी भी बैंक के लिए फायदेमंद हो सकता है। एक गैर सरकारी संगठन द्वारा किए गए सर्वे के अनुसार, हाल के वर्र्षो में सार्वजनिक बैंकों में भर्ती किए गए अच्छे अकादमिक रिकॉर्ड वालों का प्रदर्शन साधारण स्तर का रहा है। निश्चित तौर पर मैकेंजी जैसी संस्थाओं की अनुशंसाओं को आंख मूंदकर लागू करने से पहले उनके व्यावहारिक पक्ष पर गौर करना भी जरूरी है। अंग्रेजी में बात करने मात्र से कोई व्यक्ति जहीन नहीं हो जाता। संक्रमण के इस दौर में भी जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय का प्रबंधन बारहवीं या कॉलेज में प्राप्त अंकों को ज्यादा तहजीह नहीं देता है। यहां आज भी विभिन्न संकायों में दाखिले के लिए प्रवेश परीक्षा का आयोजन किया जाता है, जिनमें सिर्फ न्यूनतम अर्हता अंक का होना ही जरूरी है। इस संदर्भ में पूरे देश में विभिन्न विश्वविद्यालयों और उनसे संबद्ध कॉलेजों में प्रवेश के लिए एक सामूहिक परीक्षा आयोजित करने की मानव संसाधन मंत्रालय की पहल का स्वागत किया जाना चाहिए। इस सबसे स्पष्ट है कि भारत में एक सदी पहले से चली आ रही शिक्षा प्रणाली में ही अनेक खोट हैं। सरकार, शिक्षाविद, रोजगार सृजित करने वाले संस्थान और अभिभावक, सभी मिलकर फिलवक्त तथाकथित मेधावी बच्चों की फौज का उत्पादन करने में लगे हैं। इस पूरी प्रक्रिया में वे फैक्टरी मात्र बनकर रह गए हैं। इनमें से कोई भी मेधावी की सही परिभाषा को समझने की जहमत उठाना ही नहीं चाहता। शिक्षा प्रदान करने और ग्रहण करने के इस खेल में पैसा सभी पर हावी हो गया है। इन विपरीत परिस्थितियों में जरूरत इस बात की है कि पैसे के चक्रव्यूह को तोड़ा जाए और सैंद्धातिक की जगह व्यावहारिक ज्ञान पर बल दिया जाए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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